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Tuesday, April 28, 2020

एक कप चाय



आज कम्पनी के शेयर होल्डर्स की वार्षिक सभा है, ड्राइवर सुबह ही वह गिफ्ट बॉक्स दे गया जी सभी शेयर धारकों को मिलता है, जिसमें मिठाई, नमकीन, भुजिया, जूस, चॉकलेट सभी कुछ है. सुबह नींद खुलते ही जैसे भीतर किसी ने कहा, चाय में नशा होता है, उस नशे से ही मुक्त होना है. कल या परसों नींद से जगते समय  दूध से आधा भर एक कप दिखाई दिया था. रात को किसी वक्त स्वप्न देखा, वह बाजार गयी है, कैमिस्ट की दुकान पर है, कोई दवा खरीद रही है, कम से कम डोज मांगी है, फिर दुकानदार से पूछा, यह नुकसानदायक है न, वह हामी भरता है. चाय में नशा होता है यह बात इस स्वप्न से जुड़ी है और जुड़े हैं वे चाय के कप, जो नींद में दिखे थे. परमात्मा कितने-कितने उपाय करके उसे इस आदत से, आसक्ति से छुड़ाना चाहता है. उसकी कृपाओं का अंत नहीं. आज पूरे दो हफ्तों बाद कार चलाई, अभ्यास छूट गया है और भीतर एक भय भी समा गया है इसलिये धीरे-धीरे ही चला ही पायी. ब्लॉग पर लिखा, कुछ पढ़ा भी और टिप्पणी की. जून अभी एक घण्टे बाद आने वाले हैं, सर में दर्द हो रहा है शायद निकोटिन के लिए, नौ बजे आधा कप बोर्नविटा लिया था. कल शाम क्लब में वरिष्ठ महिलाओं की मीटिंग थी, लौटते हुए सवा आठ बज गए थे, जून को भी डिनर पर  जाना था, पर वह सबसे मिलकर  जल्दी ही लौट आये. उन्हें भी आधी रात तक जगना पसन्द नहीं है. जीवन जब एक लक्ष्य को सम्मुख रखकर आगे बढ़ता है तो मार्ग में आने वाली बाधा स्वयं ही दूर होने लगती है. वे सत्य के पथ के राही हैं. नन्हे से बात हुई, वह नए घर में था, काम शुरू हो गया है, तीन महीने में उम्मीद है पूरा हो जायेगा. सोनू अपनी सखी से मिलने गयी है, हल ही में जिसके पिता की मृत्यु हो गयी है. सर्वेंट लाइन में झगड़ा हो गया था आज सुबह, कारण पूछा तो पता चला, किसी पियक्कड़ ने नशे में अपनी तीन-चार वर्ष की बेटी को भी दो-चार घूंट पिलाने का प्रयत्न किया. विरोध होने पर झगड़ा बढ़ गया. नरक क्या इससे कुछ अलग होगा. 

टीवी पर इण्डिया-पकिस्ताम मैच हो रहा है. एशिया कप के दावेदार दो देशों के मध्य, हजारों लोग इस मैच को देख रहे हैं. कल से आश्विन माह का आरंभ हो रहा है. पहली बार पितृ पक्ष पर कुछ विशेष जानकारी ली और इसके बारे में लिखा. आज शाम फोन पर ज्ञात हुआ कि पीछे कुछ दिनों से बड़े भाई का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, इस समय वह अस्पताल में हैं, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य प्रदान करें. छोटा भाई भाभी टूर पर हैं, पिताजी अकेले हैं घर पर पर इस उम्र में भी वह अपना सारा काम स्वयं कर लेते हैं. सुबह बंगाली सखी के यहाँ गयी, उसकी माँ को अब वार्ड में शिफ्ट कर दिया  हैं, पर उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है. 

वही कल का समय है. टीवी चल रहा है पर आवाज बंद है. जून फोन पर बात कर रहे हैं. उसने भी पिताजी से बात की. मंझला भाई वापस आ गया है, बड़े भाई को नर्सिंग होम में दाखिल करवा दिया है. उनको डेंगू बुखार है यह बात पक्की हो गयी है. उनके कान में भी कुछ दिन से समस्या थी पर अब वह ठीक है. भतीजी आज सुबह घर आ गयी है, वह घर से ही काम करेगी, पापा की सेवा भी जितना हो सकेगा, करेगी. जीवन में कभी-कभी बड़े कष्ट का अनुभव करना पड़ता है, ऐसे में भी जो मन की समता बनाये रख सके, वह साधक है. दोपहर को उसने भाई से बात की तो हीलिंग मेडिटेशन करने को कहा, बुखार जब बढ़ जाता है तब तो वह कुछ नहीं कर पाते होंगे. एक योग साधिका को भी बुखार है, उसे भी उसने श्वासों पर ध्यान देने को कहा. शारीरिक रोग उनकी परीक्षा लेने के लिए आते हैं या उनकी ही लापरवाही के कारण, कोई नहीं जानता. कर्मों के फल के रूप में भी रोग आते हैं और बाहरी वातावरण के कारण भी. उनकी मानसिक स्थिति कितनी मजबूत है इस पर भी निर्भर करते हैं. आज शाम को भी फॉलोअप हुआ, दीर्घ सुदर्शन क्रिया के बाद मन कितना शांत हो जाता है. गुरूजी की कृपा का कोई अंत नहीं, घर बैठे ही उन्हें फॉलोअप का वरदान प्राप्त हुआ है. दोपहर को बच्चे व महिलाएं भी आये योग करने, प्रसाद में उन्हें बगीचे का नारियल खिलाया. विज्ञान भैरव पर एक-दो प्रवचन सुने, अद्भुत ग्रन्थ है यह. ध्यान की एक सौ बारह विधियाँ शिव पार्वती को सिखाते हैं. सूत्रों के रूप में नहीं हैं, प्रश्रोत्तरी के रूप में हैं. सुबह क्लब की प्रेसीडेंट से फोन पर काफी देर तक बात हुई स्कूल के बारे में, वह बोलने से थकती नहीं हैं. दोपहर को सिर में हल्का दर्द था, नशा है जानते हुए भी चाय पी. संस्कार को मिटाना परमात्मा के भी हाथ में नहीं है. 

Friday, May 22, 2015

टालस्टाय की पुस्तक


कल शाम को उसने जून का इंतजार करते-करते चाय बनायी कि वह आ गये. ढेर सारा सामान गजक, मूंगफली, रेवड़ी, तिल के लड्डू, तिल बुग्गा लेकर, नन्हे को स्वेटर्स पसंद आये. कल शाम भर वह बेहद खुश था, उसके लिए पिज़ा बेस व पिज़ा चीज भी लाये हैं. कल डिनर में उसने वही खाया. रात को वे जल्दी सो गये. सुबह साढ़े चार बजे उठे, ‘क्रिया’ की और क्रिया के बाद उसे अद्भुत संगीत सुनाई दिया. कृष्ण उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उनकी बातें उसे भीतर बहुत सुनाई देती हैं, वह उसके प्रिय, सर्वस्व हैं ! सुबह सभी को फोन किया, पिताजी, दीदी, मंझला भाई.. बड़े भाई-भाभी का फोन कल शाम को आ गया था. जून सभी से मिलकर आये सभी से उपहारों का आदान-प्रदान किया. जीवन इसी लेन-देन का नाम है ! आज दीदी लोग बड़ी भांजी के रिश्ते के लिये जा रहे हैं. इस बार बात बन जाएगी, ऐसी उन्हें आशा है. उसने पिछले दिनों बहुत बार, बहुत जगह फोन किये अब कुछ कम करना होगा, मन पर नियन्त्रण रखना होगा. कल जून उसके लिए Light on yoga और Light on Pranayam भी लाये. दीदी ने दीपक चोपड़ा की पुस्तक The seven spiritual laws for success भी भिजवाई है. पुस्तकें उनकी मार्गदर्शक हैं. टालस्टाय की पुस्तक मन को भीतर तक छू जाती है. अंतर की छोटी-छोटी भावनाओं को कितनी दक्षता से पकड़ते हैं वह. मनोविश्लेषण करने में वह सिद्ध हस्त हैं. मन में हर पल न जाने कितने विचार आकर चले जाते हैं जिनके बारे में कोई ध्यान ही नहीं दता. मन को एक उसी पर टिका दें तो उसकी खबर लगती रहती है. हर पल का साथी है मन पर फिर भी इसकी गहराइयों में क्या छिपा है कोई नहीं जानता. विचित्र हैं इसकी गतिविधियाँ, पर मन कितनी ही चालाकियां करे सूक्ष्म नजर से बच नहीं सकता. अपने ऊपर ऐसी ही कड़ी नजर रखनी होती है सत्य के साधक को...उसका मन दर्पण सा बने जिसमें सारी चालाकियां साफ झलकें और सारी सच्चाईयाँ भी !

परसों पूर्णिमा थी. कल से माघ का महीना आरम्भ हो गया. उसने आज मौन व्रत रखा है, फोन निकाल दिया है पर ध्यान कई बार उस ओर गया. कबीरदास ने ठीक ही कहा है कि माला तो कर में फिरे..आज सुबह सद्गुरु ने बताया कि मौन में मन भीतर केन्द्रित होता है, उर्जा एकत्र होती है जिसे कोई साधना में उपयोग में ला सकते हैं. ज्ञान जब व्यवहार में उतर जायेगा तभी वह ज्ञान है, वरना तो पुस्तकों में अनंत ज्ञान भरा पड़ा है, वहाँ से थोडा सा मन में भर भी लिया तो कोई हर्ज नहीं है. ज्ञान का पथिक बनना है तो स्वयं को हर क्षण कसौटी पर कसना होगा, थोड़ी सी बेखबरी भी नहीं चलेगी ! साधना के पथ पर चाहे आरम्भ में कितनी ही कठिनाइयाँ हों, अंत में अनंत सुख है, न भी हो उसे सुख की चाह भी नहीं है, परम सत्य को जानना है. सच्चाई को स्वयं अपनी आँखों से देखना है, अंतिम सत्य क्या है ? वे इस जगत में क्यों आये हैं, उनकी मंजिल क्या है ? गुरुओं के बताये मार्ग पर स्वयं चलकर देखना है, ईश्वर का साक्षत्कार करना है. तत्व ज्ञान पाना है. उस परम अनुभव को अपना बनाना है. यही उसका साध्य है. उसका पथ ज्ञान, भक्ति और कर्म का मिलाजुला हो सकता है. पथ से पल भर के लिए भी डिगना नहीं है. उसका यह सौभाग्य है कि कृष्ण के प्रति हृदय में भक्ति है, सद्गुरु के प्रति श्रद्धा है तथा हृदय में कोई ऐसी कामना नहीं है जिसके पूरे न होने पर उसे शोक हो. लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, मत्सर से अभी पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है मन..संस्कार बहुत गहरे हैं, पर ध्यान, जो वह नियमित करती है इसमें अवश्य सहायक सिद्ध होगा ! ईश्वर की शरण लिए बिना मुक्ति असम्भव है.  


Monday, March 24, 2014

कम्प्यूटर पर रेसिपीज



कल दोपहर हिंदी में सृजनात्मक लेखन के लिए दूसरी कविता लिखी, कविता यदि गढ़ी जाये तो उल्लास के बजाय मन को तनाव से भर देती है. कुछ देर ‘सत्यजित रे’ की पुस्तक पढ़ी. फिर नन्हा स्कूल से आ गया और दोपहर बाद की दिनचर्या में व्यस्त हो गयी. शाम को लाइब्रेरी से ‘अनिता देसाई’ की किताब लायी है. कल घर से पत्र आया है, पर उसके निर्णय के अनुसार जवाब अगले हफ्ते देगी तब तक दूसरा कोई खत भी आ जायेगा. कल शाम जून ने कहा उसे कम्प्यूटर में एक लैटर पैड बना लेना चाहिए पर ऐसा कौन है जिसे वह नियमित पत्र लिखे वह भी अंग्रेजी भाषा में. आज भी गर्मी बहुत है अभी तक उन्होंने टेबल फैन नहीं निकाला है, निकालने पर नैनी का मांगना लाजमी है, उसने कहा है अगले महीने वह पंखा खरीदना चाहती है पर हिसाब लगाकर देखा तो पैसे कम पड़े, उसी में पूरे महीने का खर्च भी चलाना होगा, यूँ उसकी बेटी भी काम करती है. और जून के अनुसार जिसकी जितनी आय होती है उसी में वे गुजारा करना सीख जाते हैं. पर जो समर्थ हैं उन्हें भी तो उनके लिए कुछ सोचना चाहिए. उन्होंने इतना धन लगाकर कम्प्यूटर खरीदा और कुछ सहायता करके पंखा खरीदने में उसकी मदद नहीं कर सकते, जबकि वह काम करके धीरे-धीरे पैसे चुका ही देगी. दीपक चोपड़ा के अनुसार जब इच्छा मन में उत्पन्न हुई है तो उसे ब्रह्मांड की गोद में डाल दो, खुदबखुद पूर्ण हो जाएगी. जैसे आजतक उसके सारे काम होते आए हैं.

कल दिन भर पूसी उसके पीछे-पीछे थी आज सुबह से गायब है, कल जब संगीत कक्षा में गयी तो उसके पीछे वह भी गयी और पूरे समय बाहर बैठी रही. शाम को जून और वह टहलने गये तो पीछे चल दी, जानवरों की भाषा यदि वे समझ पाते तो.. सुबह दो-तीन बार घर में आ गयी और जबरदस्ती उसे बाहर निकाला, मन इतना कठोर हो जाता है जब उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम हो रहा हो. दीपक चोपड़ा कहते हैं जब लोग किसी व्यक्ति या परिस्थिति से परेशान होकर कुछ व्यक्त करते हैं या महसूस करते हैं तो यह प्रतिक्रिया उनकी भावनाओं के प्रति होती है और भावनाएं किसी अन्य की गलती से उत्पन्न नहीं हो सकती, उनकी जिम्मेदारी सिर्फ उनकी है, कोई कैसा सोचे यह उसी पर निर्भर करता है. there is always a choice and choice is ours. अपने मूड या अपनी मानसिक स्थिति के लिए किसी अन्य को दोषी या ज्जिम्मेदार ठहरने का किसी को कोई हक नहीं है, क्यों कि यह सत्य नहीं है. आज नन्हे की छुट्टी है, उसे कम्प्यूटर पर ढेर सारे काम करने हैं, सुबह से ही योजनायें बना रहा है.
कल शाम दो सखियाँ आयीं उनका नया टीवी देखने, एक को कम्प्यूटर भी देखना था, उसने अपना रेखाचित्र भी पढ़ने को दिया पर उसके छोटे-छोटे अक्षर वह ठीक से पढ़ नहीं पायी, वैसे भी इतने शोर में कोई गम्भीर बात पढ़ना आसान नहीं था. पर उसकी इच्छा पूर्ण हुई अपने आप ही. आज भी बादलों के कारण गर्मी कम है. आज टीवी पर एक कार्यक्रम देखा, जो दीपक चोपड़ा की उसी किताब पर आधारित था जिसमें आज पढ़ा कि उन्हें अपने आस-पास के लोगों व स्थितियों को वे जैसे हों वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए न कि अपना दृष्टिकोण उनपर थोपना चाहिए. जैसे कि उसने सुबह चाय बनाने के तरीके पर जून को टोका. कल नन्हे ने उसका टाइम टेबल कम्प्यूटर पर बनाया, और उन्होंने एक cd देखा जिसमें ढेरों रेसिपीज थीं. computer is real fun !







Wednesday, February 20, 2013

चाय-बागान में छिड़काव



कल दिल्ली से भी पत्र आ गया, छोटी बहन की सास ने लिखा है और उसके पति ने भी, उसने जून से उनके लिए एक बधाई कार्ड लाने को कहा है. असम में मौसम एक दिन में इतने रूप बदलता है जितनी पोशाकें फिल्मों में नायिका बदलती है, उतनी ही शीघ्रता से, कभी बदली, फिर धूप, फिर ओले, कभी तेज वर्षा, फिर धूप और न जाने क्या-क्या..नन्हा आज स्कूल गया है, कल मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ था, जून अपनी कार का पंक्चर ठीक करवाके घर आए थे, बोले, इसे मत भेजो, सर्दी विशेष तो नहीं पर खांसी अभी ठीक नहीं हुई है उसकी, बहुत खुश रहता है स्कूल जाकर, मगर वे दोनों सोचते हैं, घर में उससे ज्यादा पढ़ सकता है, आराम कर सकता है, गर्म भोजन भी खा सकता है, लेकिन स्कूल जाने से उसको खेलने को मिलता है, दोस्त मिलते हैं, घर से बाहर कुछ वक्त गुजार सकता है, सो जहाँ तक सम्भव हो उसे नियमित स्कूल भेजना ही ठीक है. दोपहर के दो बजे हैं, उसने कुछ देर फोन पर बात की. उसके बाद युद्ध कांड के दो-तीन अध्याय पढ़े, अद्भुत है ‘बाल्मीकि रामायण’. कल रात वे देर तक योजना बनाते रहे, बगीचे में क्या-क्या परिवर्तन लाना है, जो जगह खाली पड़ी है, वहाँ कौन से फूल लगाने हैं. बहुत दिनों से उसने काव्य जैसा कुछ नहीं लिखा-

कविता को लिखा नहीं जाता
उसे जीया जाता है
और उसे जीने के लिए पल दो पल का नहीं
एक लम्बा वक्त गुजारना होता है
ऐसा वक्त जब मन को अपनी गिरफ्त से परे छोड़ा जा सके
उन्मुक्त विचर सके वह भावों की अनोखी दुनिया में
कविता वस्तु नहीं है
यह एक प्रेरणा है, एक स्पंदन..
मगर इसे जगाने के लिए प्रयास चाहिए आतुर
उस हृदय का जो पत्थर में से पानी निचोड़ने की ताब रखता हो
पिघल पिघल कर स्वयं को गला सके, विचारों का ऐसा ताप ला सके
तब जो फूटेगा वह निर्झर सा स्वच्छ होगा
मुक्त होगा...असीम होगा और अपरिमित होगा...
वह बनेगा मधुर गीत..जिसे पोर पोर गायेगा ...
अंतर्मन से उपजा होगा न ...

नन्हे से सुबह कहा था कि वह नाश्ता खाने में इतनी देर लगाता है और अरुचि से खाता है, इस पर एक कहानी लिखेगी. उसने एक पात्र की कल्पना की, जाहिर है वह भी एक बच्चा ही होगा, जो सुबह उठाना पसंद नहीं करता हो, जो भोजन करते समय कुछ और करना चाहता हो, किताब पढ़ना, टीवी देखना या खेलना, अक्सर उसकी स्कूल बस छूटते छूटते रह जाती हो ....

मार्च का महीना शुरू भी हो गया और दूसरा हफ्ता खत्म होने को है. आज हफ्तों बाद डायरी खोली है. बाईस फरवरी को नन्हा अस्वस्थ हुआ, फिर जून भी गले के कारण परेशान थे, पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि कभी ऐसा वक्त आयेगा भी या नहीं जब वे तीनों एकदम ठीक हों, पहले की तरह. उसे ही ज्यादा ख्याल रखना पड़ेगा, खानेपीने का, सफाई का और नियमित व्यायाम का. होली का त्यौहार भी बीत गया, पंजाबी दीदी का बेटा आया था, जो जोरहाट में पढ़ाई कर रहा है. कल माँ-पिता के पत्र के साथ छोटी बहन का पत्र भी आया, लगता ही नहीं कि वह बड़ी हो गयी है, वही पुराना लहजा.. बच्चों की सी बातें. पड़ोसिन की तबियत भी ठीक नहीं है, लगातार दो दिन उसका पुत्र स्कूल नहीं गया. अस्वस्थ होना आजकल रोजमर्रा की बात हो गयी है, हवा इतनी दूषित हो चुकी है कि..इतने पेड़-पौधे होने के बावजूद हवा में एक गंध सी भरी रहती है, शायद सामने के चाय-बागान में कीट नाशक दवा का छिड़काव होता है या कोई रासायनिक खाद डाली जाती है.

उसने कहानी आगे बढ़ाई, स्कूल में सब बच्चे उसे मोटू कहकर बुलाते थे, क्योंकि जब वह छोटा था तो बिल्कुल गोल-मटोल था, उसके जन्मदिन की पार्टी में मित्रों ने उसके बचपन की कुछ तस्वीरें देखीं और तभी से उन्होंने उसका नाम मोटू रख दिया. शुरू में तो उसे बहुत बुरा लगा लेकिन माँ के समझाने पर उसने बाद में इस बात पर ध्यान देना छोड़ दिया. उसकी माँ ने कहा, लगता है तुम्हारे मित्रों को इसमें बहुत खुशी मिलती है, तुम्हें भी उनके साथ खुश होना चाहिए, क्योंकि तुम सचमुच के मोटे नहीं हो. उसकी एक बात अच्छी नहीं थी, वह थी बिना सोचे-समझे सबकी हाँ में हाँ मिलाना, वह कभी किसी को न नहीं कह पाता था. चाहे उसे बाद में कितनी हानि उठानी पड़े. एक बार उसके एक मित्र ने कहा कि वह अपना कलर बॉक्स लाना भूल गया है. टीचर जब उसकी मेज तक आयेंगी तब वह धीरे से कलर बॉक्स उसकी तरफ बढा दे जिससे उसे डांट न पड़े, वह मान गया, और नतीजा यह कि टीचर ने उसे ऐसा करते देख लिया और डांट उसे खानी पड़ी.


Monday, October 29, 2012

अदरक वाली चाय



परसों उसकी परीक्षा है, आठवीं कक्षा को विज्ञान में ‘चुम्बकत्व’ पढाना है, उसने सोचा, सिलसिलेवार प्रश्नों को याद करेगी तथा बोध प्रश्न भी. दूसरा पीरियड है सो ज्यादा इंतजार नहीं करना पडेगा, बारह बजे तक मुक्त हो जायेगी. अगले दिन वसंत पंचमी का अवकाश है. जून का पत्र आया है, उसे कई दिन कोई पत्र नहीं मिला यह सोच कर नूना को भी अच्छा नहीं लगा. पूरे पांच महीने हो गए उसे यहाँ आए हुए, अब दो ढाई महीने ही शेष हैं.

कल उसका बीएड का पहला प्रेक्टिकल हो गया, उसके हिसाब से तो ठीकठाक ही हुआ, अब देखें कैसे नम्बर आते हैं. कल गणित का है, जो परीक्षक आए हैं उनमें से एक गणित के हैं, आज वह थोड़ा ज्यादा सजग रहकर पढ़ाएगी, और समय का ध्यान रखते हुए जल्दी-जल्दी भी ताकि एक अन्विति तो पूरी हो जाये. परीक्षा तो जल्दी हो गयी थी, पर मैडम के आदेशानुसार दो बजे तक बैठा रहना पड़ा, कल की परीक्षा का समय जानने के लिए. टिफिन तो ले नहीं गयी थी, पहली बार कालेज कैंटीन में खाया पकौड़ा, स्वप्ना, कविता और उसने. सिर में दर्द कॉलेज में ही शुरू हो गया था, घर आयी तो बढ़ गया था, दवा ली, अब ठीक है. नन्हा आजकल खूब बातें करता है और गाना गाता है, टीवी पर जो भी सुनता है. पढ़ाई-लिखाई तो आजकल उसकी बिलकुल नहीं हो रही है, कल से उसे रोज एक घंटा पढ़ाएगी उसने मन ही मन सोचा. ननद अदरक वाली चाय दे गयी है, सिर में दर्द है यह पता चलने पर माँ-पिता व ननद सभी उसका बहुत ख्याल रख रहे हैं, वे सभी अन्ततः बहुत अच्छे हैं, वे जून के माता-पिता हैं, उसे भी ऐसे ही संस्कार मिले हैं, प्यार और स्नेह की शीतलता भी.
आज दूसरा प्रेक्टिकल भी हो गया, परीक्षक संतुष्ट नहीं थे, अब टीचर ने उन्हें जैसे बताया वैसे ही तो पढायेंगे न.. दो दिन छुट्टी है, परीक्षा के बाद कितना सुकून, लेकिन एक खालीपन सा लग रहा है, उसने सोचा कोई पत्रिका लाएगी. सभी को खतों के जवाब भी देने हैं.

आज धर्मयुग लायी, और नन्हे के लिए एक चित्र कथा खरीदी. नन्दन, पराग सभी उसे खरीदने को कहा पर वह कृष्ण का नाम सुनकर उसी को खरीदने की जिद कर रहा था. वसंत पंचमी का दिन अच्छा बीता, अब परसों से फिर कालेज और किताबें.

जून ने नवोदय स्कूल का फार्म भेजा है, शायद वह जानता नहीं है इन स्कूलों में अध्यापकों को वहीं रहना होता है. उसका एक पत्र तो पूरे एक महीने इधर-उधर घूमने के बाद मिला है, छब्बीस नम्बर का खत. आज कालेज की भूतपूर्व प्राचार्य श्रीमती सुन्दरी बाई के निधन पर शोक सभा थी, लड़कियों ने खूब शोर मचाया. एफिडेविट के लिए क्लर्क ने किस अजीब तरह का जवाब दिया पर नागर मैडम ने बहुत अच्छी तरह समझाया, वह अच्छी अध्यापिका ही नहीं अच्छी इंसान भी हैं. माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, वह बहुत जल्दी घबरा जाती हैं, कराह कर बोलती हैं, जिससे सभी लोग समझें कि बहुत बीमार हैं, या बीमार होकर हर व्यक्ति सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता है.

Saturday, October 27, 2012

छब्बीस जनवरी



सुधा मैडम से उसने कह तो दिया कि पता पास होने से ट्यूटर घर पहुंच जायेंगे पर..कितनी मुश्किल हुई होगी उन्हें घर ढूँढने में, शायद मिला भी न हो, आज आयेंगी तो पता चलेगा या फिर पाल मैडम से..वह भी क्या सोचेंगी न..कल रात भर परेशान रहा मन, वही कालेज के सपने...सिन्हा मैडम आयी हैं हमारे घर पर, वही जो बात बात पर इतनी परेशान हो जाती हैं. उन्हें चाय देने में इतनी देर लग रही है, पहले गुड़ की चाय बनाती हूँ और फिर प्लेट भी साफ नहीं है और टूट गयी है..किसी बात को लेकर मन कैसे बेचैन हो जाता है, हम बेबस हो जाते हैं उसके सामने, सोचने की कोशिश करती हूँ कि कुछ और सोचूं पर सिर के दोनों और की शिराएँ..जैसे लगता है कुछ दबा रहा है सिर को. भविष्य में कभी ऐसा काम नहीं करेंगे...कि किसी टीचर से वादा कर दिया हम आपका यह काम कर देंगे. उसने खुद से कहा इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, ईश्वर सहायता करेंगे और सब ठीक होगा...और सब ठीक हो गया, ट्यूटर मैडम के घर गया था और बात लगभगतय हो गयी. कल मैडम ने गणित का लेसन प्लान दुबारा लिखने को कहा. नन्हे को आज उसने बहुत दिन बाद डांटा ठीक से भोजन न करने के कारण.
जून का पत्र आया है, जल्दी-जल्दी लिखने पर भी इंतजार करना ही पड़ता है उन दोनों को, बड़ी ननद का भी, और छोटी बहन का भी, सो जवाब देने को तीन पत्र हो गए हैं, जब भी समय मिला, लिखेगी. कल एक नई जगह जाना है पढ़ाने ठीक से उसे रास्ता भी पता नहीं है, पर पहुंच ही जायेगी. अभी चार्ट बनाने का काम शेष है, माह के अंत में परीक्षा होते ही सारी व्यस्तता खत्म हो जायेगी. नन्हे को हेयरकट के लिए ले गयी थी, दस रूपये लिए, उसे ज्यादा लगे, अगली बार जायेगी तो पूछेगी. आज टीचर ने इंटरनल असेसमेंट किया कक्षा का..देखें क्या परिणाम आता है, कुछ भी हो उसे पता नहीं क्यों अब उतनी उत्सुकता नहीं है जैसे पहले हुआ करती थी.
जून के तीन पत्र आये हैं स्नेह से भरे हुए..छोटे भाई का पत्र भी आया है. कालेज गयी थी पहले पढ़ाने फिर अपने, काम थोड़ा सा था पर समय काफी लग गया, चुम्बक मिल गया जो उसे विज्ञान की कक्षा के लिए चाहिए था.
छब्बीस जनवरी इस बार कितनी चुपचाप आयी और जाने भी वाली है, सुबह बिजली न होने के कारण परेड भी नहीं देख सकी. फिर नन्हे को लेकर कालेज गयी वहाँ झंडा आरोहण देखकर कुछ अच्छा लगा..इस समय चित्रहार आ रहा है पर आवाज इतनी तेज है कि.. जैसे लाउडस्पीकर बज रहा हो, एक भी गीत गणतन्त्र दिवस से जुड़ा हुआ नहीं है. जैसे ऊटपटाँग गाने हैं वैसे ही दृश्य.


Wednesday, October 10, 2012

पड़ोस का सैलून



अगस्त का पहला दिन..मन अजीब दुविधा में पड़ा है, बनारस से उस फोन के अलावा और कोई सूचना भी तो नहीं मिली है. उसका एडमिशन यदि नहीं हो पाया तो..बनारस जाना तो था पर इतनी जल्दी जाना पडेगा यह नहीं सोचा था. गर्म पानी के सिस्टम की पाइप की वेल्डिंग करने के लिए कर्मचारी आए हैं, कितना शोर करती है वेल्डिंग मशीन. नन्हा होता तो शौक से देखता, स्कूल गया है उसे लेने भी जाना होगा स्कूल से, जून को फील्ड से आने में देर हो जायेगी. मौसम आज स्वच्छ है यानि खूब गर्मी पड़ेगी. लगातार वर्षा से रेलें भी तो नहीं चल रही हैं. कल बहुत दिनों बाद मंझले भाई का पत्र आया है. इसी महीने रक्षा बंधन भी है. जून को समय मिले तो बाजार जाकर राखी लायें. उसे दो रेसिपीज और मिली हैं, वह अच्छा खेल था, जब कुछ महिलाओं ने मिलकर आपस में रेसिपीज साझा करने का तरीका निकाला था.

कल बेहद गर्मी थी, दोपहर भर बेचैनी थी. आज सुबह के सवा नौ बजे धूप थोड़ी कम है बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है मगर कब तक ? नन्हे को कल सुबह ठंडे पानी से नहला दिया, उसे हल्का सी ठंड लग गयी है, जानबूझ कर हम मुसीबतों को निमंत्रण देते हैं नब्बे प्रतिशत मामलों में. उसे स्कूल लेने आज भी जाना है. जून व्यस्त हैं, कल रात आठ बजे आये. आज उन्होंने किन्हीं परिचित को चाय पर बुलाया है, दोपहर को ही नाश्ता बनाना है और बैठक ठीक-ठाक करनी है.

अभी-अभी जून डिब्रूगढ़ गए हैं अपने एक सहकर्मी के साथ. उनके कान का संक्रमण जो ठीक हो गया सा लगता था अब फिर से हो गया है. बांया कान कभी बंद हो जाता है कभी खुल जाता है. सभी रिपोर्ट लेकर गए हैं. दोपहर बाद तीन-चार बजे तक आयंगे. नन्हे की तबियत आज सुबह भी पूरी तरह ठीक नहीं थी, पता नहीं कैसा होगा, हिम्मती लड़का है मैनेज कर  ही लेगा. आज ट्रांजिस्टर पर कितने मधुर-मधुर गीत आ रहे हैं, प्रेम की चाशनी में पगे हुए, कल रात वे भी ऐसे ही भावों में भर रहे थे. शाम को नाश्ते का आयोजन ठीक रहा, हमारा रात्रि भोजन भी वही नाश्ता ही हो गया. नन्हे को लेने आज भी उसे ही जाना होगा, किसी से लिफ्ट मिल गयी तो ठीक नहीं तो रिक्शा ले लेंगे. बनारस से खत की प्रतीक्षा है पर ट्रेन न चलने की वजह से डाक भी तो समय पर नहीं आ रही है. पूरे देश में बाढ़ ने तबाही मचाई है. हर वर्ष यही होता है, करोड़ों रुपयों का नुकसान, कब हमारा देश सक्षम होगा, इन आपदाओं से निपटने में.

सोनू की खांसी बढ़ गयी है और हल्का बुखार भी है. कल शाम को वह बहुत खुश था, खूब बातें कर रहा था. पर रात वह बेचैन था, साँस तेज चल रही थी. वह उसे गुमसुम देखकर व्यग्र हो गयी, उसका उदास चेहरा देखकर वह भी उदास हो गयी, सुबह वे उसे अस्पताल ले गए थे. छह-सात बोतलें दी हैं डा. ने. बेनाड्रिल दी उसने, पीते ही सो गया, अभी तक उठा नहीं है कि कुछ खाने को दे. उन्हीं की लापरवाही का नतीजा भुगत रहा है यह नन्हा बच्चा. जून कल पांच बजे लौटे, उनका कान ठीक हो गया है, वैक्स जम गया था और कुछ नहीं.

नन्हा आज ठीक है, सुबह स्कूल नहीं गया. कल से भेजेगी. तीन दिन पढ़ाई-लिखाई बंद रही अब उसका गृहकार्य करने में मन ही नहीं लग रहा था. इस समय पापा के साथ अपने मित्र के यहाँ गया है, वही उनके घर के पीछे रहने वाले पड़ोसी. उसे यहाँ आये एक महीना होने को है वे लोग उनके यहाँ नहीं आये, न ही वह गयी. सुबह वह सोनू को यहीं पास में एक पार्लर में ले गयी थी बाल कटवाने के लिए, एक सरदारनी ने खोला है, जो बाल तो अच्छे काटती हैं पर समय बहुत लगाती हैं.

Friday, September 14, 2012

इतवार की सुबह



ग्यारह बजने में बीस मिनट, सुबह छह बजे उठने के बाद अब एक मिनट हुआ, बैठी है, डायरी लिखने का बहाना है, पैर कुछ विश्राम चाहते हैं और मन भी एक जगह रुक कर कुछ सोचना चाहता है. आज शायद जून का पत्र आये. कल दोपहर और फिर शाम को कितने घंटे व्यर्थ किये, स्वेटर का गला बनाने में, पर अभी तक नहीं बना है, उसे तो पूरा करना ही है, उसके बाद जो गणित की किताबें ली हैं, उन्हें देखना है. सोनू दादाजी के साथ आटा लेने गया है.

सुबह के साढ़े सात बजे हैं, नन्हा सोया है. सो उसे वक्त है कि दिन की शुरुआत करते हुए कुछ सोच सके. नीचे कमरे में एक तो गर्मी थी, दूसरे पडोस में टीवी की आवाज व्यवधान उत्पन्न कर रही थी, सो यहाँ उपर आ गयी है. यहाँ ठंडी हवा (धूल भरी ) आती है, यहाँ उनका बालकनी कम बाथरूम है, इस घर में इतनी समस्याएं हैं पर माँ-पिता ने कभी सोचा ही नहीं कि इसे बदला जाये. जिंदगी के चालीस साल इसी घर में गुजार दिए. माँ की तबियत ठीक नहीं है, उसे तो लगता है उनके तन की अस्वस्थता मन की ही छाया है, पर कौन समझा सकता है उन्हें. जब तक वे खुद न चाहें, वः कुछ करना ही नहीं चाहतीं, उदासीन हो गयी हैं सबसे, पर ऐसे कब तक जिया जा सकता है. वास्तविकता की दुनिया में जितनी जल्दी लौट आयें उतना ही अच्छा है. कल जून का पत्र आया वह उदास है कि उसे उनके पत्र नहीं मिल रहे हैं, पता नहीं क्यों. सुबह का एक कप दूध अभी पिया उसने, उसे समझ नहीं आता कि सुबह से बिना कुछ लिए यहाँ लोग दस-ग्यारह बजे तक कैसे रह लेते हैं. वह पुस्तक पढ़ने बैठ गयी जो प्रवेश परीक्षा के लिए लायी थी.

फिर वही कल का सा समय है, लेकिन वह नीचे कमरे में है, कपड़े प्रेस करने के लिए चादर बिछा रही थी की ननद ने बताया, पिताजी ने ऊपर कपड़े प्रेस करने को कहा है, नीचे जो बिजली खर्च होती है, उसका बिल आता है जबकि ऊपर की बिजली फ्री है, उसे समझ नहीं आता. रात अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही, पता नहीं इनमें कोई सार भी है या उसके मन का पागलपन है. कल सभी भाई-बहनों को पत्र लिखे.

सुबह साढ़े पांच बजे ही उठ गयी थी, छत पर टहलने गयी, सूर्योदय के समय बहुत अच्छा लग रहा था. हर जगह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं, और कुछ खामियां जैसे हर व्यक्ति की. आज इतवार है, सुबह का मीठा दूध पीते समय उसे याद आया, जून इतवार सुबह की चाय पी रहे होंगे. कैसे बीतते होंगे उनके दिन-रात, उसकी याद तो आती होगी. नन्हे ने नीचे से आवाज दी और वह उसे लेकर ऊपर आ गयी है, कह रहा है और सोयेगा और लेट गया है, देखें कितनी देर लेटता है.

Monday, August 20, 2012

चल कहीं दूर निकल जाएँ



आज भगवद् गीता का दूसरा अध्याय पढ़ा, ऐसे लगा जैसे पहली बार पढ़ रही है. एक-एक श्लोक अनमोल हीरे की तरह है, सचमुच गीता भटके हुए को राह दिखाने वाली है. उसने सोचा कि भविष्य में सदा इसका नियमित पाठ करेगी. सवा आठ बजे हैं, सोनू के उठने का समय. कल ‘एक बार फिर’ देखी, कुछ खास नहीं लगी, शायद बड़े स्क्रीन पर ज्यादा सुंदर लगती खासतौर पर लन्दन के दृश्य. आज ईदुलफितरहै. जून के दफ्तर में अवकाश है. सुबह उसने रसोईघर साफ किया, जून ने सारे घर के जाले साफ किये. मौसम में वही ठंडक है और आसमान में बादल. कल शाम वे इतवार की फिल्म देख रहे थे कि एक परिचित दम्पति मिलने आये, एक बार पहले भी वे रविवार को आये थे, वे लोग स्वयं कभी किसी के यहाँ इतवार शाम नहीं जाते. वह लिख रही थी कि नन्हा बार-बार उसका पेन  लेने की कोशिश करने लगा है और गोद में बैठना चाहता है, जब वह पाठ करती है तो किताब उठाता है, कभी हाथ जोड़ कर प्रणाम करता है. उसकी बांह पर मच्छर ने काट लिया है, कोमल त्वचा पर निशान उभर आया है.

आज डिब्रूगढ़ बंद है, जून घर में हैं, सुबह के साढ़े नौ बजे हैं, सभी का स्नान, नाश्ता हो गया है और अब सभी आराम से बैठे हैं. कल वे जून के बॉस के घर गए चाय पर गए थे. उनका विशाल व भव्य बरामदा व बैठक देखकर तो वह मंत्रमुग्ध रह गयी. इतना साफ-सुथरा आलीशान लग रहा था और शांत व शालीन भी. एक एक वस्तु चमक रही थी. उन्होंने भी अपनी बैठक की साज-सज्जा में कुछ परिवर्तन किया है, आँखों को भला लग रहा है. अपने घर को कैसे सुंदर बनाएँ यही सोच रहे हैं कल रात से. उसकी असमिया मित्र ने आज बहुत सुंदर पारंपरिक पोषाक पहनी थी, मेखला-चादर, काले कपड़े पर लाल व हरे रंग से कढ़ाई की हुई थी. उसने सोचा वह भी उससे सीखेगी और अपना एक कुरता काढ़ेगी.

कल रात पता नहीं जून को क्या सूझा कि अपनी मूँछें ही साफ कर दीं, अच्छा लग रहा है उसका चेहरा ऐसे भी, अपनी उम्र से कम का मालूम होता है. आज सम्भवतः नन्हें के जन्मदिन के फोटो मिल जाएँ. कल शाम वह जून के साथ सब्जी व चीनी लेने डेली मार्केट गयी थी, चीनी नौ रूपये किलो हो गयी है. कल उनकी लेन की एक महिला ने पत्रिका क्लब का सदस्य बनने से यह कहकर इंकार कर दिया कि उनके पास अखबार तक पढ़ने का समय नहीं है पत्रिका तो दूर की बात है, नूना को बहुत आश्चर्य हुआ, वह एक और महिला से मिली, सुख कर कांटा हो जाना किसे कहते हैं यह उन्हें देखकर जाना, बेहद दुबली हो गयी हैं कुछ ही महीनों में, पता नहीं क्या दुःख है या क्या रोग है जो उन्हें खा रहा है. मौसम हसीन है ऐसे में मन होता है कि दूर तक निकल जाएँ पर गृहस्थी के कामों में उलझे वे कहाँ जा सकते हैं.