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Thursday, December 27, 2012

भारत रत्न



आज एक जन्मदिन और...उम्र यूँ ही बीतती जाती है और जिन्हें जीना चाहिए सुला दिए जाते हैं, राजीव गाँधी के लिए जितने आँसूं बहें कम हैं.. भारत का यह हीरा..एक खरा इंसानएक समझदार राजनीतिज्ञ...आखिर कौन जिम्मेदार है उसकी मृत्यु के लिए.?

पिछली बार कब डायरी खोली थी, याद नहीं, और याद करने की जरूरत भी नहीं, न ही यह वादा करने की कि अब से नियमित लिखेगी...क्योंकि वादा हमेशा टूटने के लिए ही होता है. आज मन हल्का हल्का है, घर भी साफ-सुथरा और मौसम भी सही..यानि सुहावना, न ज्यादा गर्म न ज्यादा ठंडा, बहुत दिनों बाद पुराने घर की पड़ोसिन का फोन आया, अच्छा लगा. वह  घर आयेगी, कैरम खेलने और ‘सदमा’ फिल्म देखने, जिसका अंत बहुत कारुणिक है. कल वह नन्हे को लेकर क्लब गयी थी, एरोमॉडलिंग देखी, बहुत आनंद आया, नन्हे को उससे भी ज्यादा, वही दीदी मिलीं उन्होंने वापसी में लिफ्ट दी. आज सोमवार है यानि खत लिखने का दिन, इस हफ्ते तीन खत लिखने हैं.

कल शाम को जून ने दो लोगों को चाय पर बुलाया था, बाद में कहने लगे कि...बेकार ही बुलाया...जितने उत्साहित वह थे उतने आने वाले नहीं लगे, शायद इसीलिए..ऐसा कई बार होता है ...शायद सबके साथ होता हो. आज सुबह वह एक स्वप्न देख रही थी अद्भुत था किसी फिल्म की कहानी कल तरह..कल शाम को अल्फ़ा द्वारा अपहृत किये गए लोगों के बारे में सुनकर, (जो ओएनजीसी के थे, ऑयल के भी हो सकते थे) मन ही तो है डर गया..लेकिन मन अगर इसी तरह डरता रहा तो यहाँ वे कैसे रह सकेंगे..भगाना ही होगा इस डर को तो. जून कल एक फिल्म का कैसेट लाए थे, उसने सोचा कि वह अभी देखे या नन्हे के आने पर, उसे अभी सारी फ़िल्में नहीं दिखानी चाहिए. ज्यादातर फ़िल्मों में वही सब दिखाते हैं खून खराबा हत्या, यानि शुद्ध हिंसा, इसे ही मसाला फिल्म कहते हैं. कल वह स्कूल में गिर गया, सारे कपड़े गंदे हो गए, टीचर ने दूसरे कपड़े पहना कर भेजा.

अखबार खोलते ही कैसी भयानक खबर पढ़ने को मिली. लन्दन में दो बच्चे भूख और प्यास से मर जाते हैं क्योंकि उनकी माँ मर चुकी है और दस दिनों तक किसी को खबर नहीं होती, कैसा शहर है जहां पड़ोसियों को पड़ोसियों की खबर ही नहीं रहती.
कल रात उन्होंने ‘हिना’ फिल्म देखी, अच्छी फिल्म है, नायिका जेबा भी बहुत अच्छी है. आज अखबार नहीं आया, शायद कल फ्लाईट नहीं आई होगी. कल शाम को जून के साथ एक और सप्लायर आये थे, चाय पिलानी थी उन्हें, उसने बेमन से नाश्ता बनाया, गर्मी इतनी ज्यादा थी और उसके रेशमी कपड़े चिपक गए थे पसीने से, कुछ कोफ़्त पिछली रात की भी थी कि वह ठीक से किसी के सवालों के जवाब नहीं दे पायी, वही अंग्रेजी बोलने में झिझक..पता नहीं क्यों..आज फिर वर्षा हो रही है, बिजली भी चली गयी है, नन्हे के जन्मदिन के लिए पहला कार्ड आया है, उसकी छोटी बुआ ने एक पार्सल भी भेजा है, शायद ड्रेस भेजी होगी. चार वर्ष का हो जायेगा वह, समय कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता.

अभी-अभी राजीव गाँधी को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ दिए जाने का अलंकरण समारोह टीवी पर देखा. उनके बच्चों व पत्नी के लिए कैसा दृश्य रहा होगा, भारी पल रहे होंगे, बेहद भारी. अगर वे जीवित होते तो क्या यह सम्मान उन्हें मिलता. कितना कुछ कहा जाता, कितनी चर्चाएँ होतीं, विरोध होता. जून ने फोन किया कि दोपहर के खाने पर वह घर नहीं आ रहे हैं, कोई इंटरव्यू है, वह तो सुनकर समझी थी कि इंटरव्यू उन्हें देना है पर बाद में बताया कि लेना है, अब देने की उम्र नहीं रही उनकी. सोनू गृहकार्य करके टेस्ट के लिए पढ़ रहा है, उसकी बड़ी बुआ ने भी जन्मदिन पर पैसे भेजे हैं. सर्वोत्तम(रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण) का नवीनीकरण कराया था उन्होंने, उसे उपहार में मिलने वाली पुस्तक की प्रतीक्षा है. 

फिर एक अंतराल.. आज सब काम कुछ जल्दी ही निपट गए हैं, मन ने कहा डायरी उठा लो तो हाथों ने उठा ली. चारों और मन की ही सत्ता है, हर काम मन के इशारे पर होता है, उसका मन खुश तो वह भी खुश मन उदास तो...पर यह ‘मैं’ कौन ? क्या मन से अलग कुछ, हाँ, कुछ अलग तो है.. नन्हे की चंपक आई है आज, अब वह कहानियाँ सुनाने को कहेगा. गर्मी बहुत है आजकल, ऊपर से बिजली चली गयी कल रात, पर वर्षा हो गयी सो नींद आ ही गयी बाद में. ऐसे में जून को जुकाम हो गया है, कल शाम वे क्लब गए, आइसक्रीम खायी पर वह ने नहीं खा सके, परसों जो डिटेक्टिव किताब वह लाइब्रेरी से लायी थी शायद पहले भी ला चुकी है एक बार, हल्का सा याद आता है, पढकर रात भर स्वप्न आते रहे, शायद.. नहीं पक्का.. उसी किताब का असर था.


Tuesday, December 25, 2012

राजीव गाँधी का अस्त



उसने कहीं पढ़ा, किसी एक शहर का नाम लो...झट उत्तर आया..दुलियाजान, उसने फिर से वे पंक्तियाँ पढीं जो यहाँ आने के कुछ ही दिनों बाद लिखी थीं-

मन में भीतर तक उतर गया है
इस शहर का अक्स
वह अक्स.. जो बादलों के झुरमुट में..
कभी लबालब भर आए पोखर-तालों में
चमकती बिजलियों में.. नजर आता है
इसकी हरियाली अंदर तक फ़ैल चुकी है
पत्थर पर दूब उगाती, दीवारों से पेड़
यह धरती सब कुछ लौटा देना चाहती है
अपने गर्भ से उलीच कर.. जैसे
सब कुछ बाँट रही हो
हरियाली, रंग, चाय और तेल..
फूल इतने शोख देखे हैं कहीं
मौसम इतना नशीला
पंछी भी जैसे मधुपान कर गूंजते
दुनिया में होंगे कई शहर
पर ऐसे नाम वाला एक भी नहीं
शांत, सौम्य और सभ्य
यह अतीत में भी उसका प्रिय था
आज भी है..

मई आधा गुजर गया, पूरे एक महीने बाद उसने डायरी खोली है, कल पूरा एक महीना हो गया इस नए घर में आए हुए और इतने दिनों में कितनी ही घटनाएँ हुईं, बनारस से सभी लोग यहाँ आए, और वे सब कई जगह घूमने गए. उसके हाथ में एक बार दर्द हुआ शायद ज्यादा क्रोशिया चलाने के कारण या पता नहीं क्यों..सोनू का परीक्षा परिणाम आया, उसे एक बार बुखार हुआ, पर इतने दिनों में एक दिन भी दस मिनट का समय भी नहीं निकाल पायी. बहुत सारे बहाने मिल जायेंगे लेकिन सही बात यही है कि लिखने की इच्छा ही नहीं हुई सिवाय चिट्ठी लिखने और एकाध पत्रिका पढ़ने के, पढ़ने-लिखने से उसका सम्बन्ध ही कितना रह गया है. अफ़सोस होता है न, उसने खुद से कहा, पर बजाय अफ़सोस करने के लिखना शुरू करना चाहिए. अब कल से जून के ऑफिस जाने के बाद से पहला काम यही करेगी, अभी तो नन्हे की छुट्टियाँ भी हैं. आज सुबह एक स्वप्न देख रही थी, आज अखबार में उसके दो लेख छपे हैं, कल शाम किसी ने कहा था, आप हिंदी में आर्टिकल लिखती थीं...जैसे पिछले युग की बात हो. कोई भी शौक या रूचि हो, पनपने देने के लिए समय तो देना ही पड़ता है न, यूँ ही फालतू इधर-उधर के कामों में वक्त गंवाना क्या अच्छा है? जीवन एक ही बार मिलता है और उसका जीवन आधा तो बीत गया है, इसी महीने तीन दशक पार कर  लेगी...कुछ है गर्व से कहने के लिए किसी के पास उसके लिए? सचेत हो जाना होगा और कुछ वक्त देना होगा अपने आप को, अपने अंतर्मन को. लिखने का अभ्यास छूट जाने से हाथ में कैसा तनाव आ गया है, उसने हाथ की उंगलियों को खोला और बंद किया.

कल सुबह ट्रांजिस्टर खोलते ही यह भयानक समाचार सुना, कानों को विश्वास ही नहीं हुआ. राजीव गाँधी भी इंदिरा गाँधी की तरह हिंसा के शिकार हुए अपने ही देशवासियों के हाथों, जो करोड़ों के प्रिय थे, कितना सूनापन छा गया है जैसे पूरे वातावरण में. आँखें हैं कि..और मन भी भारी है. उनके चित्र आँखों के सामने आ जा रहे हैं. पलक झपकते सब कुछ खत्म हो गया..कितना निष्ठुर होता है स्वार्थी मानव, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेता है.

करोड़ों दिलों का मौन रुदन
एक फूल की दर्दनाक मौत पर
सुना है ?
करोड़ों की आवाज..एक सूर्य के अस्त होने पर
हाँ, वह सूरज था, प्रकाश था, स्वप्न था,
प्रतीक था आशा का
हिंसा का दानव जाने अभी कितना प्यासा है ?
बापू को छीना, इंदिरागांधी  को
और अब...
क्या पत्थर के लोग बसते हैं यहाँ
या नरभक्षी...आदमखोर !
जो आँखों के स्वप्न छीन कर भर जाते हैं अंतहीन सन्नाटा
कोई पूछे उनसे
क्या उनकी प्यास खून से बुझती है ?

उदासी उसकी रग-रग में छा गयी थी, देश में जो हो रहा था उससे अलिप्त नहीं रहा जा सकता था. एक और कविता लिखी थी तब..

हम कितने दीवाने थे तब

दुनिया को बदल कर रख देंगे
स्वप्नों में खोये रहते थे
आदर्श भरा जीवन होगा, काँटों से भरा फिर पथ होगा
सम्पूर्ण क्रांति को लक्ष्य बना
हम कितने अनजाने थे तब

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार
भूख, गरीबी, अत्याचार
नहीं जानते थे तब यह, जीवन समझौतों का नाम
यथार्थ नहीं स्वप्न ही थे
हम कितने दीवाने थे तब

लेकिन उदासी का साया कितना ही घना हो, भीतर गहराई में तो आनंद छिपा है, जो बाहर आना चाहता है. यदि कोई यह समझ नहीं पाया कि आनंद के क्षण ही जीवन का वास्तविक रूप दर्शाते हैं तो वह जीवन का मर्म नहीं समझ पाया. यह बात अलग है कि किसी को पीड़ा में ही आनंद का अनुभव हो.

उसे लिखना पड़ा

बस कुछ पल और अँधेरा है
फिर किरणें घूंघट खोलेंगी
कण-कण धरती का चमकेगा
लहरों में सूरज खेलेगा
पाखी नयनों से भांप सुबह
ऊंची उड़ान पर निकलेंगे
फिर खिलना होगा फूलों का
कलियाँ ज्यों सुगबुग सी करतीं
शिशु वैसे पलने में होगा
ऊं आं कर माँ को बुलाएगा
बस थोड़ी देर अबोला है
फिर ध्वनियाँ ही ध्वनियाँ होंगी
ओ पथिक नही घबराना तुम
नदिया का थाम किनारा इक
बस आगे ही बढ़ते जाना
बुलाता तुम्हें सवेरा है
नम धरती के मखमल तन पर
खेतों में बिछे ओसों के कण
चुपचुप सी हवा की गुपचुप सुन
इक गीत हवा में उड़ा देना
मंजिल-मंजिल बढ़ते जाना
बस कुछ पल और अँधेरा है !