Showing posts with label लेखन. Show all posts
Showing posts with label लेखन. Show all posts

Tuesday, January 3, 2023

देवों की भूमि

बाहर वर्षा हो रही है। रात्रि के नौ बजने को हैं। शाम के ध्यान के बाद जब वे नीचे उतरे तभी से वर्षा आरंभ हो गयी, सो भोजन के बाद रात्रि भ्रमण के लिए नहीं जा सके। शाम का ध्यान गहरा था, गुरूजी के शब्द सीधे दिल की गहराई तक जा रहे थे, उसका असर था या दोपहर को देखी फ़िल्म का, मन कैसा पिघला जा रहा था। जून की ज़रा सी बात भी उसे प्रभावित कर गयी। मन होता ही ऐसा है, पल में तोला, पल में माशा ! जहाँ से मन ऊर्जा पाता है, वह पराशक्ति है। मन शब्दों का ही आश्रय लेता है यदि मौन का ले तो बचा रह सकता है। चेतना पहले श्वास में बदलती है फिर शब्दों में, यदि श्वास रुक जाए तो मन भी ठहर जाता है। आज पंत पर लिखा लेख काव्यालय में प्रकाशित कर दिया। शाम को सब्ज़ी वाला ट्रक आया था, ‘फ़्रेश वर्ल्ड’, पुदीना लिया, जून ने चटनी पीस दी। सुबह बड़ी भांजी से बात हुई, उसने बताया, कैसे उसने अपने अंग्रेज़ी लघु उपन्यास ऑन लाइन प्रकाशित किए, पर मार्केटिंग नहीं कर पायी है।  एओएल की एक शोध कर्त्री द्वारा ‘अवसाद’ पर लिखे एक लेख का अनुवाद किया। कल श्राद्ध पर एक ज्योतिषाचार्य का वीडियो देखकर आलेख लिखना है। लेखन के ये कार्य उसके अनुभव क्षेत्र को बढ़ा रहे हैं, उसने मन ही मन गुरु जी का इस सेवा कार्य में सम्मिलित करने के लिए आभार व्यक्त किया।   


सुबह टहलने गए तो बादलों के पीछे से चाँद की ज्योति झलक रही थी। इस समय कितना सन्नाटा है, बाँयी ओर से जैसे झींगुर  बोलता है, एक ध्वनि आ रही है। सजग होते ही दाँयी तरफ़ से भी आने लगी है। सन्नाटा सधने लगा है कुछ-कुछ। गुरूजी दिन में दो बार ध्यान करवाते हैं। अक्सर वे व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा वाणी के रूप में खर्च करते हैं। बाहर के मौन के साथ-साथ भीतर का मौन भी आवश्यक है, बल्कि ज़्यादा ही आवश्यक है। विचार ही कृत्य बनते हैं। वे जो पहले सोचते हैं वही तो बाद में कर्म रूप में फलित करते हैं। सोसाइटी के जिम में वस्त्रों की सेल लगी है, पर उनके पास इतने वस्त्र हैं कि शायद अगले दस वर्षों तक खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।  


संध्या भ्रमण के समय कोने वाले घर में एक छोटा बच्चा रोज़ मिलता है, हाथ हिलाता है। इतना ही बड़ा नन्हा था, उसे प्रैम में लेकर वे जाते थे तो एक पंजाबी महिला उसे देखकर बहुत खुश होती थीं, बाद में उस परिवार से अच्छी जान-पहचान हो गयी थी। जून के पैरों की जलन सौंफ, धनिया और मिश्री का मिश्रण खाने से काफ़ी ठीक है। असम में कोरोना फैल रहा है। सभी जगह यही हाल है। यह महामारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है , कितनों की जानें भी जा चुकी हैं। भारत में संक्रमितों की संख्या चार लाख हो गयी है। 


आज शिक्षक दिवस पर अनेक शिक्षिकाओं को कविता भेजकर शुभकामना दी। शाम को वर्षा के कारण छत पर टहलने गए तो देखा पास वाले गोदाम की छत हटायी जा रही थी। हो सकता है यहाँ कोई दुकान बने। वे इधर उधर की बातें करते हुए टहल रहे थे कि बात बचपन के दिनों तक पहुँच गयी। उसने जून को बताया, वे लोग कौन सी पत्रिकाएँ पढ़ते थे, रेडियो पर नाटक सुनना भी उन दिनों विशेष आकर्षण होता था, आँगन में या छत पर सभी लोग अपने बिस्तर पर लेटे होते थे तब रेडियो पर रात्रि नाटक का समय होता था।कल नन्हा और सोनू आएँगे, वे लोग टेस्ट ड्राइव के लिए जाएँगे। नन्हे को अब कार की आवश्यकता महसूस होने लगी है, अब ओला, ऊबर सब बंद हैं। संयोग की बात है कि आज के ही दिन एक वर्ष पहले वे असम में विक्टर बनर्जी से मिले थे और आज ही उनकी पहली फ़िल्म ‘देवभूमि’ देखी, जो केदारनाथ में फ़िल्मायी गयी है।    


Wednesday, October 25, 2017

मन का मौसम


कल रात्रि वे सोने गये ही थे कि जून के एक सहकर्मी का फोन आया. कहा, माँ की तबियत ठीक नहीं है, एम्बुलेंस बुला दें. जून ने फोन किया अस्पताल में फिर उनके घर जाने के लिए कार निकाली. उसके कहने पर कि साथ ले चलें, उन्होंने मना किया, पर जाने के कुछ देर बाद ही उसे बुलाने के लिए फोन आया. बुजुर्ग आंटी ने दस-पन्द्रह मिनट के कष्ट के बाद ही प्राण त्याग दिए थे. वह पैदल ही चलकर पाँच-सात मिनट के बाद ही वहाँ पहुँच गयी. उनकी सेविका, एक परिचित डाक्टर तथा वे दंपति वहाँ थे. ग्यारह बजे तक वे दोनों भी रुके, उसी मध्य कुछ और लोग भी आये. कई फोन भी आये. गृहणी बहुत परेशान थी. वह मृतक के चेहरे को देखते हुए वहाँ बैठी रही. रात को स्वप्न देखा जो कितना अजीब था. एक कुंड में अनेक मृत वृद्ध व्यक्ति एक के ऊपर एक पड़े हैं, पास ही तीन बूढ़े जिनमें एक महिला है, कुछ काम कर रहे हैं. कितना वीभत्स था वह दृश्य, कितना विचित्र, उनके अंग बड़े-बड़े थे. फिर नींद खुली. पंछियों की आवाजें भी रात्रि को स्पष्ट सुनीं, वे वास्तविक थीं या .....कितना रहस्यमय है यह संसार.. और फिर तितलियों को उड़ते देखा. तितलियाँ आत्माएं हैं जो इधर-उधर उड़ रही हैं. इस समय शाम के सवा सात बजे हैं. वे अभी-अभी उस घर से आ रहे हैं. सुबह साढ़े छह बजे वहाँ गये थे. दस बजे के लगभग पंडित जी आये और मृत देह को दाह संस्कार के लिए ले जाया गया. वह वहीं रुकी रही, घर आकर नहा-धोकर दुबारा गयी. जून श्मशान से एक बजे लौटे तब वे घर आये, भोजन नैनी ने बना दिया था. भिजवाया व खाया. जून दफ्तर चले गये, उसने आधा घंटा विश्राम किया, एक स्वप्न पुनः देखा. इस परिवार से उनका आत्मीय संबंध है. आंटी के साथ भी प्रेम का रिश्ता था. इसी से जुड़ा स्वप्न था. अहसास बहुत तीव्र था, देह में उसे महसूस किया और नींद खुल गयी. एक कर्म बंधन छूट गया.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. जून क्लब गये हैं, एक प्रेजेंटेशन है. अभी-अभी बड़े भाई से बात हुई, वह अपने लिए रोटी बना रहे थे, सब्जी सुबह की बनी हुई रखी थी. कितना कठिन होगा उनके लिए भाभी के बिना रहना. समय के साथ शायद सब ठीक हो जायेगा, ईश्वर उन्हें शक्ति देगा. मंझली भाभी से बात की, वह उनका ध्यान रखती है, अभी तो भाई भी है. छोटा भाई भी रात को उनके घर ही सोयेगा. सभी के सहयोग से वे जीने का सम्बल जुटा ही लेंगे, ख़ुशी-ख़ुशी जीने का, एक महीने बाद उनकी बिटिया भी आ जायेगी. आज सुबह बादल बने थे पर वर्षा उनके प्रातः भ्रमण से लौटकर आने के बाद ही आरम्भ हुई, जो बाद में दिन भर होती रही. आज सुबह भीतर से आवाज आई कि प्रतिपल सजग रहो, परमात्मा सजग है, हर पल सजग..उसकी सजगता शाम को खो गयी थी पल भर के लिए..जून उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उन्होंने उसे कितनी सहजता से लिया. व्यर्थ की बातचीत उनकी ऊर्जा को  नष्ट ही करती है. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को स्कूल की पत्रिका व दिल्ली स्थित क्लब की पत्रिका के लिए लेख व कविता भेजी. अभी लेडीज क्लब की वार्षिक प्रतियोगिता के लिए के लिए लेख व कहानी लिखने हैं. शाम को देवदत्त पटनायक की पुस्तक ‘पशु’ पढ़ी, उसके बाद उन्हीं मित्र के यहाँ गये. उनकी पुत्री भी आई है जिसके विवाह की प्रथम सालगिरह है आज.   

कल सुबह से वर्षा हो रही है, जो अभी तक नहीं थमी. परसों दोपहर या रात को, अब कुछ याद नहीं. ओशो को देखा. उनकी श्वेत दाढ़ी है, एक तख्त पर लेटे हैं, कुछ जन सामने बैठे हैं, वह भी है और उनसे एक सवाल पूछती है. परिवार साधना में साधक है या बाधक है. वह क्या कहते हैं, ठीक से नहीं सुन पायी पर भाव था साधक है. उससे पहले वे बातें कर रहे थे, अनोखा स्वप्न था. कल लिख ही नहीं पायी, आजकल उसकी नींद गहरी हो गयी है. कल दोपहर को सोयी तो समय व स्थान का कोई ज्ञान ही नहीं रहा. गहरी नींद भी एक तरह की समाधि होती है. अभी बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी ने कल से जॉब पर जाना शुरू किया है. वह बैंक के लिए परीक्षा भी देना चाहती है. अब उसके भीतर कुछ करने का जज्बा जगा है. जून ने कहा उनके मन का मौसम भी सदा एक सा रहता है आजकल, उसे कभी लगता है सेवा का कोई विशेष काम वह नहीं करती, फिर भी संतोष होता है, लेखन का कार्य भी सेवा का ही माना जा सकता है. नेट पर कितना कुछ पढ़ने को, जानने को मिलता है. आज श्री श्री का भाषण सुना जो उन्होंने यूरोपियन पार्लियामेंट में दिया था, ‘द योगा वे’ अभी-अभी एक ज्योति बि९न्दु डायरी पर दिखाई दिया, परमात्मा जैसे आश्वस्त करने आया हो. अस्तित्त्व को उनकी फ़िक्र है, वे उसके ही भाग हैं. वे उससे जुड़े रहकर ही खुश हैं !   

Thursday, January 1, 2015

गीत समर्पण के


पिछले दो दिन डायरी नहीं लिख सकी. सुबह का वक्त जो श्रवण-लेखन में बीतता है, छुट्टी होने पर अन्य कार्यों में चला जाता है. जीव हर वक्त इन्द्रियों को तुष्ट करने में लगा रहता है. देहात्म बुद्धि से निजात पाना कितना कठिन हो जाता है पर इन सबके बीच ‘क्रिया’ के क्षण वरदान बनकर आते हैं, जब मन आत्मभाव में स्थित हो जाता है. आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, सुबह सभी से बात की, कल रात पिता से भी बात हुई, उन्होंने बताया, पत्र लिखा है. दीदी ने पत्र का जवाब फोन पर दिया. कल दोनों भाई उनके यहाँ परिवार सहित पहुंच गये आज दोपहर तक वापस आयेंगे. कुछ देर पहले छोटी बहन का फोन आया उसने नन्हे से यहाँ का पिन पूछा और कुशलता का समाचार लिया दिया. सुबह ससुराल से फोन आया यह याद दिलाने के लिए कि वे बधाई देने के लिए फोन अवश्य करें. यह फोन उन सभी परिवारजनों को आपस में जोड़े हुए है.

आज पूरे एक हफ्ते बाद नन्हे का स्कूल खुला है. वे सुबह जल्दी नहीं उठ पाए सो क्रिया भी नहीं हो सकी. अभी कुछ देर पहले बाबाजी का हिमाचल में हुआ सत्संग देखा, मन भर आया, गुरू का सन्निध्य कितना अमूल्य होता है. योग शिक्षक से वे पिछले इतवार को डिब्रूगढ़ में मिले थे, उसके बाद से कोई खबर नहीं है. उस दिन एक मित्र परिवार ने दो कैसेट दिए एक में समपर्ण के गीत हैं. सुनकर बहुत अच्छा लगता है. गुरू उन्हें कितनी ऊँचाइयों तक ले जाते हैं, गुरू भीतर ही हैं, सदा उनके पास हैं पर फिर भी किसी बाहरी आश्रय की आवश्यकता का अनुभव होता है, कोई ऐसा जो दो आँखों से ही अंदर का सारा हाल जान लेता है, जिसका एक वचन ही काफी होता है. जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए किसी न किसी से शिक्षा लेनी पड़ती है तो ईश्वर को जानने जैसे महान कार्य के लिए गुरू की आवश्यकता हो इसमें आश्चर्य क्या है. गुरू मन का वैद्य होता है. जो विकारों से मन को मुक्त करता है. ऐसा सद्गुरु आसानी से नहीं मिलता, पर ईश्वर की अनुभति वही करा सकता है. वह शिष्य के मंगल की कामना हर क्षण करता है, उसका हृदय ईश्वर की तरह अनंत प्रेम से भरा हुआ है. कल शाम से ही बल्कि दोपहर से ही उसका सिर भारी था, खैर, शरीर का अपना धर्म है और आत्मा तो सदा मुक्त है, कल उसने इन दोनों को अलग-अलग रखते हुए कोई दवा आदि नहीं ली और रात को कब अपने-आप ही दर्द ठीक हो गया पता नहीं चला. आज ‘जागरण’ में विभिन्न चक्रों के बारे में सुना. आत्मा के स्तर पर जीना यदि कोई सीख ले तो सारे चक्र अपने आप ही जाग्रत हो जायेंगे और उनसे मिलने वाली ऊर्जा से जीवन ओत-प्रोत हो जायेगा.

कल अंततः जून को शिक्षक का ईमेल मिला. उनके भाई का देहांत हो गया था जिसके एक्सीडेंट की खबर सुनकर वे गोहाटी गये थे, जीवन कितना क्षणिक है यह उनसे बेहतर कौन जान सकता है. देह का संबंध क्षणिक है मात्र ईश्वर से मानव का संबंध शाश्वत है. उन्होंने उसे दो आदेश दिए थे पहला सेवा करनी चाहिए दूसरा ऋषिकेश जाकर एडवांस कोर्स करने का आदेश. पर दोनों ही आदेशों का पालन वह नहीं कर पायी है. सेवा करने की क्षमता नहीं है, अपने परिवार और निज आत्मा की सेवा करने में ही सारा समय बीतता है. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा बलवती होती जा रही है. कृष्ण की चेतना में अपनी चेतना जोड़ने की इच्छा. भगवद स्मरण के सिवा और कोई भी कार्य स्वीकार्य नहीं लगता है. आज सुबह वे उठे तो गला खराब लग रहा था पर अब देह को आत्मा से अलग रख कर देखने की कला गुरूजी ने सिखा दी है. परमात्मा उसे जिस हाल में रखना चाहें, क्योंकि वही सब करा रहे हैं. उसके लिए जो भी अच्छा है वही होगा. वह जड़ वस्तु पर निर्भर न रहकर चेतना की ओर कदम बढ़ा रही है. इन्द्रियां अपना काम करती रहेंगी, मात्र उसकी चेतना इन्द्रियों की ओर न जाकर कृष्ण की ओर जा रही होगी.


कल सुबह एक सखी आई थी अपनी समस्या लेकर और गुरूजी ने उसे उसकी सहायता करने की प्रेरणा दी. सुबह उसको फोन किया. सुबह एक अन्य सखी के साथ बाजार गयी, वह अपने यहाँ कल पूर्णिमा की कथा का आयोजन कर रही है. बाद में लंच भी होगा जो उसके जन्मदिन का भी होगा, क्योंकि उस दिन करवाचौथ है. कल शाम दीदी का फोन आया उन्होंने बताया उनके घर के पास एक नर्सिंग होम बिक रहा है वह चाहती हैं वे सभी मिलकर उसे खरीद लें और चलायें पर उन्हें यह विचार जंच नहीं रहा है, न तो  उन्हें इसका कोई अनुभव है और न ही इतना धन है. जून आज देर से आने वाले हैं. इसी माह होने वाले एक कोर्स के लिए सहायता करने में व्यस्त हैं. कल पिता का एक लम्बा सा पत्र आया है. उसने उनके लिए एक कार्ड खरीदा और अभी छह कार्ड खरीदे जो जिनको मिलेंगे उन्हें ख़ुशी अवश्य देंगे, क्योंकि बहुत प्यार से चुने गये हैं. सुबह एक सखी को भी उसने इसी प्यार और विश्वास की बात कही, उसका जीवन कैसा अजीब सा हो गया है उसने स्वयं ही बना लिया है. ईश्वर से प्रार्थना करेगी और गुरूजी से भी की उसे सामर्थ्य दे, शक्ति दे ! art of living ने जैसे उसके जीवन में एक शांति, स्निग्धता और प्रेम की लहर ला दी है वैसी ही लहर उसके जीवन में भी आये. वह अपने रिश्तों की कद्र करना सीखे. 

Monday, September 22, 2014

ब्रेल लिपि में पुस्तक


अभी-अभी जून का फोन आया उन्हें उसका फोटोग्राफ चाहिए था जो किताब के अंतिम पृष्ठ पर छपेगा. प्रकाशक का इमेल आया था उसने पूछा है कि वे पाण्डुलिपि कब भेज रहे हैं. वे अगले हफ्ते के शुरू में ही भेज पाएंगे, उसका स्वप्न अब आकार लेता हुआ प्रतीत हो रहा है. इसके बाद ही वह सबको पत्र लिखेगी. तहलका प्रकरण इस कदर मन पर छा गया है और इसको बढ़ावा देने वाले हैं टीवी व अख़बार. क्या ये सब मिलकर सड़ी-गली इस व्यवस्था में सुधर ला पायेंगे ? वे पत्रकार जिन्होंने पर्दे के पीछे छिपे ढके कारनामों को सबके सम्मुख ला दिया है, क्या सचमुच बदलाव चाहते हैं ? कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये, उनका छोटा बेटा अस्वस्थ था, घर में सीलन की सी एक गंध आ रही थी जो बीमारी का कारण हो सकती है. आज सुबह एक परिचिता से बात हुई, उनका पुत्र दसवीं की परीक्षा दे रहा है, आगे की पढ़ाई के लिए कहीं भेजना चाहते थे पर अब यहीं रहकर पढ़ेगा. उन्हें भी नन्हे के लिए निर्णय लेना है, वह भी बारहवीं तक की पढ़ाई यहीं रहकर करे तो उन सभी के लिए अच्छा होगा. अभी-अभी एक सखी से बात हुई, बात तहलका से शुरू होकर मिसेज गाँधी पर लिखी किताब के जिक्र पर पहुंच गयी जिसमें उनके प्रेम प्रसंगों की जानकारी है. किसी के व्यक्तिगत जीवन पर कलम चलाना, फिर जो व्यक्ति कितने उच्च पद पर रह चुका हो और जो इस दुनिया में नहीं है, बहुत साहस का काम है, सच को उजागर करना इतना आसन नहीं है, लेकिन यही कार्य यदि कोई सस्ती लोकप्रियता के लिए करे तो बेहद निचले स्तर का लेखन है यह.

पिछले दो दिन व्यस्तता में गुजरे, परसों यानि शनिवार की सुबह उन कार्यों में व्यस्त रही जो इतवार की सुबह करती है और कल यानि इतवार की सुबह मोरान जाने के लिए तैयार होने में. बहुत समय से उसका मन था वहाँ के अंध विद्यालय जाने का, एक बार वे गये थे तो अवकाश चल रहा था, बहुत थोड़े से विद्यार्थी ही वहाँ थे. कल लेडीज क्लब की दो सदस्याओं के साथ उन लोगों के लिए भोजन लेकर वह गयी थी. इतने सारे अंध बच्चों या व्यक्तियों को देखने का यह उसका प्रथम अनुभव था. पहली नजर में वे सामान्य ही लगते हैं, वैसे ही बातें करते, मुस्कुराते चलते हैं पर पास से देखने पर उनके चेहरे के भाव सामान्य नहीं लगते. वे ज्यादा शांत लगते हैं. उन्हें दुनिया की कुरूपता को देखने का मौका जो नहीं मिला. लडके-लडकियाँ दोनों ही थे, हर उम्र के थे. वे आपस में या उनसे एक बार भी नहीं टकराए. अपनी-अपनी नियत सीट पर आकर बैठ गये और भोजन आरम्भ करने से पूर्व समूह प्रार्थना के स्वर गूँजे, जिसमें मधुरता थी. प्रिंसिपल के ऑफिस में कई वाद्य यंत्र पड़े थे, उन्होंने कहा, यदि वे इतवार अथवा छुट्टी के दिन आयें तो स्कूल का वातावरण देख पाएंगे, बच्चे उनके लिए संगीत का आयोजन करेंगे और वह चहल-पहल जो आमतौर से किसी भी स्कूल में होती है उन्हें देखने को मिलेगी. उसने पहली बार ब्रेल लिपि की पुस्तक भी देखी. यह विद्यालय पश्चिम बंगाल के फिल्म कलाकार विक्टर बनर्जी के पिता ने आरम्भ किया था, पच्चीस साल हो चुके हैं. स्कूल के पास काफी जमीन है बिल्डिंग भी बड़ी है, निर्माण कार्य चल रहा है. आस-पास की समाजसेवी संस्थाएं मदद देती रहती हैं. उनका क्लब भी हर महीने बच्चों के लिए भोजन भेजता है. वे बच्चे एक दूसरे से सामान्य बच्चों की तरह छेड़खानी भी कर रहे थे. उन्हें अपनी कमी का जैसे अहसास ही नहीं था क्यों कि दुनिया की रंगीनियों से वे बेखबर हैं.

 कल पिछले साल की डायरी में कविताएँ ढूँढ़ रही थी, कुछ पन्नों पर दृष्टि अटक गयी, लगा उस वक्त वह सत्य के ज्यादा निकट पहुंच गयी थी. उन्ही दिनों एक पेज पर ‘मिशन स्टेटमेंट’ लिखा था, पुस्तक छपवाने का और आज वह फलीभूत हो रहा है. प्रतिपल मन पर नजर रखने का प्रयास तो चलता ही रहता है, लेकिन वक्त के एक-एक क्षण का सदुपयोग और वाणी का संयम, ये नहीं सधते. पिछले दिनों आहार का विशेष संयम भी नहीं किया सो भारी तन से विचार भी गरिष्ठ ही उत्पन्न होंगे न. पत्र लिखने क कार्य शुरू नहीं कर पा रही है, अंतर्प्रेरणा की प्रतीक्षा है. कल दीदी, छोटे भाई व बहन तीनों से ही बात हुई. वे सभी भाई-बहन एक दूसरे के मन को समझते हैं, एक अटूट डोर से बंधे हैं. माँ की आँखें सामने रखे फोटो में यही कहती हुई प्रतीत हो रही हैं. जून उसकी किताब के लिए पूरे मनोयोग से जुटे हैं, उनका प्रेम उसके प्रति असीम है, जो हर छोटे-बड़े काम में झलकता है. नन्हा अपने मन की करना चाहता है, वह उम्र के उस दौर से गुजर रहा है जहाँ अपने निर्णय स्वयं लेने की प्रवृत्ति बेहद बलवती होती है. कल शाम वे पड़ोसी के यहाँ गये. पिता की मृत्यु होने पर उन्होंने मुंडन करवा लिया था. उसे लगा उनके पंजाबी समाज में यह रिवाज अब खत्म सा ही हो गया है. पड़ोसिन सखी ने कई अंग्रेजी फिल्मों के बारे में बताया. उन्हें फ़िल्में देखने का समय ही नहीं मिल पाता. वर्षों पहले नूना बहुत देखती थी पर अब अपनी संस्कृति ही भाती है. आज समाचारों में पाकिस्तान में टेप पर रहस्योद्घाटन की बात सुनी जिसमें नवाज शरीफ द्वारा जज पर जोर डाला गया है कि बेनजीर के खिलाफ मुकदमे का फैसला जल्दी हो और उसके खिलाफ हो. पत्रकारिता और जासूसी में कोई भेद नहीं रह गया है. आजकल फोन पर हों या अपने घर में, राजनेता कहीं सुरक्षित नहीं हैं. उनके पाप का घड़ा भर गया लगता है.


Friday, April 4, 2014

आंधी और तूफान


पिछले दो-तीन दिनों से वह ‘महिलाओं के लिए लेखन’ पुस्तक पढ़ती रही है पर प्रश्नोत्तर लिखने बैठी तो बात आगे नहीं बढ़ रही है. आज पड़ोसिन ने अपने घर आने का निमन्त्रण दिया है शाम को वह उन्हें क्लब भी ले जाएगी. क्लब में फिल्म है. उसे लेडीज क्लब की तरफ से पुराने वस्त्र एकत्र करने का काम सौंपा गया है, दोपहर को एक परिचित महिला आयीं कुछ वस्त्र लेकर, वह सामान्य वस्त्रों में थी, उसे उलझन में देखकर शायद..कुछ देर रुककर ही वह चली गयीं. जून होते तो वह इस समय ‘हिंदी कक्षा’ में होती, घर से बाहर निकलना कुछ करना अच्छा लगता है उसे. उसने सोचा उस सखी ने अच्छा निर्णय लिया, कामकाजी महिला की समस्याएं भी कम नहीं होतीं पर जीवन है तो समस्याओं से घबराना कैसा. फ़िलहाल तो वह अपनी मर्जी की जिन्दगी अपने तौर पर जी रही है. कहीं नौकरी करने का एक अर्थ गुलामी स्वीकार करना भी होगा, उसका वक्त उसका नहीं रहेगा, मन का चैन...उसे लगा शायद मन का चैन बढ़ जाये ? आखिर घर से बाहर जाना काम करना अच्छा लगता है !

जून का फोन आज सुबह आया, उसे लगा, उनकी आवाज में उदासी की छाप थी, पहले की तरह उत्साह से भरी आवाज नहीं थी, शायद उन्हें घर की याद आने लगी है. वे भी तो उनका इंतजार कर रहे हैं, उनकी उपस्थिति की यहाँ बहुत आवश्यकता है. मिलने वाले सभी सोचते हैं कि वे अकेले हैं और सदा ही सहायता करने की अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं और वह अपने स्वभाव के अनुसार किसी पर, किसी भी तरह से निर्भर होना नहीं चाहती.

It is 2 pm Nanha went for computer class in rain taking an umbrella, he is such a nice, energetic and lively person. He remains happy all the time these days busy in his project work, computer and watching TV cheerfully. He remembers papa often and always asks about phone calls he made.

Jun has come back but he is not well. Yesterday when he entered the house his face was totally white and very week. He was suffering from fever since last few days and he did not tell her. He wanted to save them from suffering so he suffered alone. She did not like it but appreciated his love for them. Today he went to dept but came back around 10, now taking rest. Nanha is busy doing his work, only fifty present of which is done till now. Yesterday was last meeting of the out going committee. Secretary asked her to stay for photo session but she had to come back with jun and Nanha they were waiting for her in lounge.

आज अगस्त का प्रथम दिन है, वर्षा सुबह से थम-थम कर हो रही है. शाम को वे तीनों बाजार गये उनके देखते-देखते ही काले घने बादल छा गये पहले आंधी शुरू हुई फिर वर्षा. वे किसी तरह कार तक पहुंचे और घर आये. जून अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुए हैं. किसी भी बात का जवाब हाँ, हूँ या कम से कम शब्दों में देना पसंद करते हैं. घर जाकर अस्वस्थ हो जाना उन्हें रास नहीं आया, किसी को भी नहीं आएगा. पिछले शनिवार को उसने एक कहानी शुरू की थी जो अभी तक अधूरी है.

Today she got up before 5, her student came and solved the questions she gave her, she was suffering from cold as usual, then at six jun and Nanha awoke, they ate breakfast and jun went to office, Nanha was writing today's news, but it seems he is again asleep. She is not feeling cheerful this morning. Last night they came back from a friend’s party at 10 pm, food was good but something went wrong when she gave flowers to him, they all felt awkward perhaps she should not take flowers for them ever. Nanha is reading one novel by Ian Flaming it also disturbs her but she should keep one thing in mind that one is responsible for her/his state of mind and should not brood over petty things, but should overcome them as soon as they come.


कल दिन भर वह नन्हे को उसके कार्य में सहायता करने में व्यस्त रही. शाम को जून अपने पुराने मूड में आ गये थे, खुशदिल और ऊपर तक प्रेम से लबरेज. उनकी तबियत अब जाकर पूरी तरह ठीक हुई है. उनका जन्मदिन इसी महीने आने वाला है, उसे उनके लिए उपहार लेना है. आज सुबह से कुछ भी सार्थक नहीं किया है  सिवाय अख़बार में काश्मीर में पुनः बढ़ती हुई हिंसा के समाचार पढ़ के. हाँ, पत्रों के जवाब के साथ पहली बार एक अंग्रेजी पत्रिका का क्रॉसवर्ड भी भर कर भेजा. कुछ देर Kane and able भी पढ़ी, हिंदी फिल्मों की तरह कहानी में जाने-पहचाने मोड़ आते हैं, लगभग समाप्त हो गयी है किताब पर उसे अच्छी नहीं लगी बहुत, सीधी सपाट किताब है.  

Monday, March 24, 2014

कम्प्यूटर पर रेसिपीज



कल दोपहर हिंदी में सृजनात्मक लेखन के लिए दूसरी कविता लिखी, कविता यदि गढ़ी जाये तो उल्लास के बजाय मन को तनाव से भर देती है. कुछ देर ‘सत्यजित रे’ की पुस्तक पढ़ी. फिर नन्हा स्कूल से आ गया और दोपहर बाद की दिनचर्या में व्यस्त हो गयी. शाम को लाइब्रेरी से ‘अनिता देसाई’ की किताब लायी है. कल घर से पत्र आया है, पर उसके निर्णय के अनुसार जवाब अगले हफ्ते देगी तब तक दूसरा कोई खत भी आ जायेगा. कल शाम जून ने कहा उसे कम्प्यूटर में एक लैटर पैड बना लेना चाहिए पर ऐसा कौन है जिसे वह नियमित पत्र लिखे वह भी अंग्रेजी भाषा में. आज भी गर्मी बहुत है अभी तक उन्होंने टेबल फैन नहीं निकाला है, निकालने पर नैनी का मांगना लाजमी है, उसने कहा है अगले महीने वह पंखा खरीदना चाहती है पर हिसाब लगाकर देखा तो पैसे कम पड़े, उसी में पूरे महीने का खर्च भी चलाना होगा, यूँ उसकी बेटी भी काम करती है. और जून के अनुसार जिसकी जितनी आय होती है उसी में वे गुजारा करना सीख जाते हैं. पर जो समर्थ हैं उन्हें भी तो उनके लिए कुछ सोचना चाहिए. उन्होंने इतना धन लगाकर कम्प्यूटर खरीदा और कुछ सहायता करके पंखा खरीदने में उसकी मदद नहीं कर सकते, जबकि वह काम करके धीरे-धीरे पैसे चुका ही देगी. दीपक चोपड़ा के अनुसार जब इच्छा मन में उत्पन्न हुई है तो उसे ब्रह्मांड की गोद में डाल दो, खुदबखुद पूर्ण हो जाएगी. जैसे आजतक उसके सारे काम होते आए हैं.

कल दिन भर पूसी उसके पीछे-पीछे थी आज सुबह से गायब है, कल जब संगीत कक्षा में गयी तो उसके पीछे वह भी गयी और पूरे समय बाहर बैठी रही. शाम को जून और वह टहलने गये तो पीछे चल दी, जानवरों की भाषा यदि वे समझ पाते तो.. सुबह दो-तीन बार घर में आ गयी और जबरदस्ती उसे बाहर निकाला, मन इतना कठोर हो जाता है जब उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम हो रहा हो. दीपक चोपड़ा कहते हैं जब लोग किसी व्यक्ति या परिस्थिति से परेशान होकर कुछ व्यक्त करते हैं या महसूस करते हैं तो यह प्रतिक्रिया उनकी भावनाओं के प्रति होती है और भावनाएं किसी अन्य की गलती से उत्पन्न नहीं हो सकती, उनकी जिम्मेदारी सिर्फ उनकी है, कोई कैसा सोचे यह उसी पर निर्भर करता है. there is always a choice and choice is ours. अपने मूड या अपनी मानसिक स्थिति के लिए किसी अन्य को दोषी या ज्जिम्मेदार ठहरने का किसी को कोई हक नहीं है, क्यों कि यह सत्य नहीं है. आज नन्हे की छुट्टी है, उसे कम्प्यूटर पर ढेर सारे काम करने हैं, सुबह से ही योजनायें बना रहा है.
कल शाम दो सखियाँ आयीं उनका नया टीवी देखने, एक को कम्प्यूटर भी देखना था, उसने अपना रेखाचित्र भी पढ़ने को दिया पर उसके छोटे-छोटे अक्षर वह ठीक से पढ़ नहीं पायी, वैसे भी इतने शोर में कोई गम्भीर बात पढ़ना आसान नहीं था. पर उसकी इच्छा पूर्ण हुई अपने आप ही. आज भी बादलों के कारण गर्मी कम है. आज टीवी पर एक कार्यक्रम देखा, जो दीपक चोपड़ा की उसी किताब पर आधारित था जिसमें आज पढ़ा कि उन्हें अपने आस-पास के लोगों व स्थितियों को वे जैसे हों वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए न कि अपना दृष्टिकोण उनपर थोपना चाहिए. जैसे कि उसने सुबह चाय बनाने के तरीके पर जून को टोका. कल नन्हे ने उसका टाइम टेबल कम्प्यूटर पर बनाया, और उन्होंने एक cd देखा जिसमें ढेरों रेसिपीज थीं. computer is real fun !