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Wednesday, May 22, 2013

ईद की सेवइयाँ



मार्च की पहली तारीख, पर मौसम कितना ठंडा और भीगा है, कमरे में हीटर जल रहा है,  जैसे जनवरी का कोई दिन हो. नन्हा स्कूल गया है, उसने सोचा उसे भी ठंड लग रही होगी, वह तो अच्छा हुआ, स्काउट की ड्रेस पहन कर नहीं गया. उसे याद आया वे भी बचपन में बेहद ठंडे दिनों में स्कूल जाया करते थे. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, कैरम खेला और रुबिक क्यूब बनाया, आज उसने बीस मिनट में ही ‘रुबिक क्यूब’ बना लिया.

कल सुबह से ही उसे असमिया क्लास की प्रतीक्षा थी, पर शाम को उनके सहपाठीजनों  का फोन आया कि आज वे नहीं आ पाएंगे, उसे खराब लगा और उसकी आवाज की तल्खी जरुर उस तक पहुँची होगी, उन्हें जिम्मेदारी का थोड़ा सा भी अहसास नहीं है. कल नन्हे का एडमिशन लेटर भी आ गया, खशी तो है ही पर जून की बातें और उनके व्यव्हार से यही लगा कि ज्यादा फ़ीस को लेकर वह चिंतित हैं. नन्हा खुश है यही बात मन को संतोष देती है. आज कई दिनों बाद धूप निकली है, गमलों में जरबेरा के सात फूल खिले हैं, और इम्पेशेंट के छोटे-छोटे गुलाबों जैसे फूल भी.

परसों सुबह उसने जून की पैसों को लेकर चिंता के बारे में लिखा था वह शत प्रतिशत सही लिकला. जब जून खाना खाने आये, उन्होंने प्रिंसिपल से बात की और निराश हुए, बात दरअसल पर्सनल मैनेजर से ही हो सकी, हर वर्ष १५% से २०% की बढ़ोतरी भी वार्षिक खर्च में होगी. वे दोनों ही परसों दिन भर उदास रहे, शाम को अमिताभ बच्चन की एक फिल्म लाये. कल ईद की छुट्टी थी दोनों की, उसने सेवइयाँ बनाई थीं. शाम होने तक वे काफी सामान्य हो चुके थे. जून के ऑफिस में कम्प्यूटर गेम खेला. और फिर एक मित्र के यहाँ गये, वह एक और मित्र भी थे, फिर तो बहुत बातें हुईं, सार यही निकला क नन्हे को तीन-चार वर्ष के बाद बाहर भेजना ज्यादा अच्छा रहेगा, तब तक उन्हें पैसों का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए. कल शाम को ही पड़ोसी भी आ गये, उन्हें भी शायद नन्हे की पढ़ाई के बारे उत्सुकता रही होगी. जून ने फैक्स भी भेजा है और किन्हीं श्री बोरबोरा से बात भी करने वाले हैं जिन्हें ज्यादा फ़ीस की वजह से अपने बेटे को वापस बुला लेना पड़ा था. आज फिर बदली छाई है, दिन में भी शाम जैसा अहसास हो रहा है. कल रात उन्हें फिर नींद नहीं आ रही थी, जून ने कहा फिल्म देखते हैं, ऐसा वह कम ही कहते हैं, सवा बारह बजे वे सोये पर उसके बाद भी परेशान करने वाला वही स्वप्न आया जो कई बार पिछले दो वर्षों में आ चका है.


Monday, May 20, 2013

गोल्फ फ़ील्ड में भ्रमण



कल दोपहर उसने टमाटर प्यूरी बनाई, उनके घर में उगे टमाटर अब साल के उन दिनों में भी उनका साथ देंगे जब वे बाजार में नहीं मिलते. परसों शाम उन्होंने ‘अलादीन’ फिल्म देखी. बहुत अच्छी लगी. कल शाम उसकी बंगाली सखी ने खाने पर बुलाया था, उसे अच्छा लगा, उसकी बातें अच्छी लगती हैं, और वह जानती है कि वह भी उसका साथ पसंद करती है. उसने शाम को क्लब में होने वाले “संगीत कार्यक्रम” में जाने के लिए कहा है, उसने सोचा यदि जून और नन्हा मान जाएँ तो वह जा सकती है.

अज भी ठंड ज्यादा है, उसने सारे काम निपटा लिए और हीटर के सामने आ गयी, जून का कहना है कि उसके घर आने से पूर्व खाना बिलकुल तैयार होना चाहिए. छह खतों के जवाब लिखे. जून एक स्वास्थ्य पत्रिका भी लाये हैं, जो वह तभी लाते हैं जब घर में कोई अस्वस्थ होता है.
आज मन में एक विचार आया है क क्यों न धूप में कुछ देर टहल आया जाये, इस समय सडकें भी खाली होती हैं. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, उनके पिता आए हुए थे, उसने सोचा तेजपुर से लौटकर वे भी उन्हें अपने घर बुलायेंगे, इतना लिखकर वह गोल्फ फील्ड तक टहलकर आयी है, कुछ दूर फील्ड के अंदर भी गयी, सूखी घास पर, सूखे पत्तों पर चलना अच्छा लग रहा था. कल रात वर्षा के साथ तूफान भी आया, उनके बगीचे में कई नाजुक पौधे जमीन पर गिर गये हैं, उसने सहारा देकर उन्हें खड़ा तो कर दिया पर बाद में माली ही उन्हें ठीक से सम्भालेगा. आज धूप में कई दिनों बाद तेजी है, वह चटाई पर बैठी है पिछले बरामदे में.

  कल शाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनकी ‘असमिया क्लास’ हुई. उसके कुछ देर बाद उसकी असमिया सखी आ गयी, उसके साथ वह बहुत अपनापन महसूस करती है. नन्हा कल शाम फिर कह रहा था, बोर्डिंग स्कूल नहीं जायेगा, पर बाद में उनके समझाने पर मान गया, यदि उसका दाखिला हो जाता है तो उसके भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा. वह कहाँ रहकर पढ़ेगा यह तो भविष्य ही बतायेगा.

अभी अभी उसकी हमराशि पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, लिखने का क्रम टूट गया तो अब कुछ मुश्किल हो रही है विचारों को पकड़ पाने में, मन कितना तेज भागता है. इस एक पल में जब वह एक वाक्य लिखती है, मन में एक पूरा विचार अंकित होकर जा चुका होता है. ऐसी कोई मशीन कभी न कभी बनेगी जो मन के एक एक भाव को पकड़ सके. ऋषि-मुनियों ने इसी भागते हुए मन को लगाम लगाने का प्रयास तपस्या के बल पर किया था. उसका सारा प्रयास उस वक्त व्यर्थ चला जाता है जब वह मन ही मन गीता पाठ करती है. उस दिन उसकी सखी ने ठीक ही कहा था, बोल कर पाठ करने से मन जल्दी एकाग्र होता है.