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Sunday, September 11, 2016

भोर के तारे


आज पुनः आल्मारी में वस्त्रों के नीचे छिपाई हुईं टेबलेट्स व अन्य दवाइयाँ मिलीं. पहले भी कई बार बेड के नीचे, गद्दे के नीचे चार-पांच गोलियां मिलती रही हैं. कई दिनों से नहीं मिलीं तो सबने सोचा अब माँ ने मुंह से निकाल कर दवा छिपाना/ फेंकना बंद कर दिया है, पार आज तो पूरी बारह गोलियां थीं. पूछा तो बच्चे की तरह कहने लगीं, हमने ही रखी होंगी. पता नहीं कब रखीं, जबकि पिताजी दवा देकर सामने ही खड़े रहते हैं. कई बार तो दवा खाने की मेज पर ही दी जाती है, पर किसी न किसी तरह वह छिपा लेती होंगी. पिछले सवा साल से दिन भर में दसियों गोलियां खाने पर तो कोई भी ऊब जायेगा और छोड़ देना चाहेगा. इस समय वह अपने कमरे में कुर्सी पर बैठी कुछ धीरे-धीरे बोल रही हैं, शायद जाप कर रही हों. जून पिताजी को दांत के डाक्टर के पास ले गये हैं, उनका डेंचर फिट नहीं हो रहा है. आज शनिवार है, शाम को वे एक मित्र परिवार से मिलने जायेंगे, हो सका तो उसे अपना ब्लॉग दिखाएगी. कल दोपहर की कक्षा में वे एक ड्रामा करवाएंगे, ‘कृष्ण जन्म’, कल बिना ड्रेस के और अगले हफ्ते ड्रेस के साथ. परसों मृणाल ज्योति जाना है. टीचर्स को ध्यान के बारे में बताएगी. एक अवैतनिक अध्यापिका जो हाल ही में विधवा हुई थीं और अब सेवा के भाव से स्कूल आती हैं, काफी परेशान रहती हैं. जब तक परमात्मा को अपने जीवन का केंद्र न बना ले कोई, उसके दुःख कम नहीं हो सकते. यहाँ सभी परेशान हैं, धनी भी निर्धन भी, रोगी भी स्वस्थ भी. यहाँ वही सुखी है जो मन के पार चला गया ! समय का पहिया इसी तरह घूमता जायेगा और एक दिन मृत्यु द्वार पर आ खड़ी होगी. आज सुबह संध्या बेला में तारों भरा गगन देखते समय कितनी सुंदर कविता फूटी थी सहज ही, अब कुछ याद नहीं है. कितनी बार नींद में, तंद्रा में कविता की पंक्तियाँ अपने आप भीतर गूँजने लगती हैं, उन्हें रचा नहीं होता..पर बाद में याद नहीं रहतीं. क्या इसी को वेद के ऋषि द्रष्टा होना कहते थे. वेद वाणी को उन्होंने देखा था, रचा नहीं था..उसे अपने साथ एक छोटी डायरी और पेन रखना चाहिए ताकि फौरन उन्हें लिख ले ! आज सेंट्रल स्कूल जाना है, वाद-विवाद प्रतियोगिता है, ‘क्या भारत विश्व का नेतृत्व कर सकता है, क्या उसके पास यह क्षमता है’ ! उसे निर्णायक बनना है, पहले भी एक बार निर्णायक बनी थी, हिंदी में बोली अंत में, लेकिन आयोजकों का विचार था कि सम्भवतः वह अंग्रेजी में ही बोलेगी. आज अगर बोलने का अवसर आया तो भारत पर लिखी अपनी उस कविता की कुछ पंक्तियाँ ही पढ़ देगी.   

एक-एक पल कीमती है, श्वास-श्वास में उसका नाम लेना है, लूट मच रही है. चारों ओर वह बिखरा हुआ है, उसे कैसे समेटे, समझ में नहीं आता..कहना चाहिए कि कैसे बिखेरे..जो पाया है भीतर कैसे लुटाये उसे अनोखा है यह प्रेम ..जो सृष्टि के कण-कण के लिए भीतर घुमड़ता है, अनोखी है यह प्रीत जो सारे ब्रह्मांड के लिए दौड़ी जाती है, सबको गले लगाने को आतुर है..इतना पाया है भीतर कि समेटे नहीं सिमटता..आत्मा में अनंत शक्ति है, अनंत प्यार है, अनंत आनंद है..अनंत..ये सारे शब्द उसके मुख से प्रकट होते थे अब उनका साक्षात अनुभव होता है..होते होते ही यह घटा है..मिलते-मिलते ही मिला है..भरते-भरते ही घड़ा भरा है..बूंद-बूंद से सागर होता है कितना सही कहा गया है..जीवन जैसे एक वरदान बन गया है, एक उत्सव..परमात्मा की, सद्गुरु की कृपा से जीवन एक मशाल बन गया है, एक फूल बन गया है और बन गया है एक मिसाल...जो शहद से मीठे इस प्रेम को एक बार अनुभव कर ले वह तो जैसे बौरा ही जाता है..कदम बहकने लगते हैं, आँखें चमकने लगती हैं..नयन बरसने लगते हैं..वचन बहने लगते हैं..क्या नहीं होता उस एक की प्रीत में..जो उससे लगन लगा लेता है वह धनी हो जाता है..फिर कुछ भी पाने की लालसा नहीं रहती, इसी का नाम योग है..आत्मा का परमात्मा से योग...!


आज सुबह ध्यान में सद्गुरु की उपस्थिति को बिलकुल स्पष्ट किया उनके बोल भी सुने, परमात्मा हर जगह है, हर समय है इसमें कोई संशय नहीं रह गया है, वही तो है, उसके सिवाय कोई है भी नहीं..अभी-अभी दीदी से बात की, वे लोग चाय पीने जा रहे थे, अब परांठे के साथ वाली चाय छोड़ दी है ! परमात्मा सबका सुहृद है ! आज भी पिछले कई की तरह वर्षा का मौसम बना हुआ है, सुबह वे टहलने भी नहीं जा सके. कल शाम से आज सुबह तक कितनी पंक्तियाँ भीतर गुजरीं पर अब कुछ याद नहीं है, एक में तो देवी-देवों का जिक्र था. त्रिदेव तथा त्रिदेवियाँ साथ में सन्तोषी माँ, शीतला माँ सभी देवता उनके इस तन में ही तो वास करते हैं !    

Friday, August 5, 2016

नवधा भक्ति


दो-तीन दिन की धूप के बाद मौसम ने फिर अपना मिजाज बदल लिया है, पुनः बादल बरस रहे हैं. आज सुबह वे फिर भ्रमण के लिए निकले. नेहरू मैदान में कल रात भर की वर्षा के बाद पानी भरा हुआ था पर लोग फिर भी चल रहे थे सो वे भी गये. जूते, ट्रैक सूट सभी भीग गये. जून अब पहले से ठीक लग रहे हैं. उसे लगता है यह अस्वस्थता उनके भीतर से उठी पुकार का परिणाम है कि अस्तित्त्व उन्हें देखे, उन पर ध्यान दे. हर दुःख अपने भीतर एक सुख छिपाए रहता है, जैसे हर सुख अपने भीतर एक दुःख..अब वह परिवर्तन के लिए तैयार हैं. जीवन के प्रति उनकी रूचि बढ़ी है और इधर उसका क्या हाल है ? उसे लगता है, प्रगति नहीं हो रही है, कारण वह अपने समय का बेहतर उपयोग नहीं कर रही है. सद्गुरु से इस विषय में राय लेना ठीक रहेगा, उन्हें एक पत्र लिखेगी, वह जहाँ कहीं भी होंगे उसे निर्देश देंगे कि क्या करना उचित होगा. उसे मान की कामना है तभी न कविता भेजकर यही उम्मीद बनी रहती है कि कोई प्रतिक्रिया मिलेगी. जब तक संसार से सुख पाने की आशा बनी हुई है तब तक परमात्मा से प्रेम कैसे टिकेगा..परमात्मा उसकी इस झूठी आस को चूर-चूर कर देना चाहते हैं, अहंकार की पुष्टि के अलावा क्या होने वाला है..न जाने कितनी बार मान चाहा है और फिर अपमान के घूँट भी पीने पड़े हैं. अपमान और मान दोनों मिलते हैं यहाँ एक साथ..दोनों से ऊपर उठना है और इसके बावजूद अपना काम किये जाना है..किये ही जाना है. फल पर उनका अधिकार नहीं केवल कर्त्तव्य पर ही उनका अधिकार है !

कल शाम को उसकी कामना का दंश केवल उसे ही नहीं चुभा बल्कि जून को भी पीड़ित कर गया. वह बहुत परेशान हुए लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो गया और कई दिनों के बाद वे रात भर ठीक से सोये. जून और उसका जीवन इतना मिला हुआ है कि थोड़ी सी भी दूरी बेचैनी पैदा कर देती है. उसे विवाह के फौरन बाद के दिन याद आने लगे हैं, किसी ने ठीक कहा था विवाह बार-बार किसी के प्रेम में पड़ने का नाम है...पति-पत्नी निकटतर से निकटतम होते हैं फिर दूर हो जाते हैं, पुनः निकट आते हैं..ऐसे ही उनकी जीवन यात्रा चलती है, भीतर प्रेम जगा हो तो कोई भी संबंध मधुर बन जाता है..उसे उनके रिश्ते में एक सुखद नवीनता का अहसास हो रहा है. जून नितांत पारिवारिक व्यक्ति हैं, उनके लिए घर ही सारे कर्मों का आश्रय स्थल है अर्थात उनके कर्म घर के लिए हैं..वही उनका विश्राम स्थल भी है और वही उनका साध्य भी, एक व्यक्ति जो मन के अनुसार जीता है, जो कभी सुखी होता है तो कभी दुखी..जिसको अभी मन के पार की खबर नहीं हुई है. सद्गुरू की कृपा से उसे अपने भीतर एक ऐसा ख़ुशी का स्रोत मिल गया है कि सारे कार्य उसके लिए समान हैं..लेकिन इस ज्ञान ने इतनी समझ तो दी है कि अपने आस-पास के लोगों के मन को समझकर उनके अनुकूल व्यवहार कर सके..वह जानती है, उसकी वाणी कठोर है..न जाने कितने नश्तर चुभोये हैं इस वाणी ने..कितने दिलों में..सबसे ज्यादा जून के दिल में..जो उसके लिए प्रेम से भरा है..वह उसे सम्पूर्ण पाना चाहते हैं..उसका मन व आत्मा तक को..कुछ भी उसके भीतर ऐसा न हो जो उनकी पहुंच से दूर हो..और वह ..उसने अपने मन को जान लिया तो मानो सबके मनों को जानने की कुंजी मिल गयी..आत्मा सबकी एक सी है.


आज ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ. उसके बाद किया ‘पाठ’ भी विशेष समझ में आया. विवेक जागृत रहे तो जीवन कितना सुंदर हो जाता है. विवेक को सजग रखने के लिए ध्यान कितना जरूरी है, इसीलिए सभी संत ध्यान पर इतना जोर देते हैं. सुबह टहलने गये, पांच बजे लौटे तो सूर्य देव काफी ऊपर आ चुके थे. टीवी पर मुरारीबापू गुजरती में रामकथा कह रहे हैं. ‘श्रवणं कीर्त्तनं विष्णु पादसेवनं अर्चनं वन्दनं दास्यम सख्यम् आत्मनिवेदनं’ यह नौ प्रकार की भक्ति है. जिसको सामाजिक सन्दर्भ में समझाने का प्रयास बापू कर रहे हैं. आज उनके यहाँ सत्संग है, अगले हफ्ते गुरूजी का जन्मदिवस है, तब भी सेंटर पर कार्यक्रम होगा. आज फिर बदली छायी है. कल शाम वे एक परिचित के यहाँ गये, उन्हें स्पाईनल कार्ड में हुई एक ग्रोथ के कारण दर्द था. 

Tuesday, May 10, 2016

वाणी का वरदान


संत कहते हैं, पत्थर, वनस्पति, पशुओं की दुनिया को पार कर वे मानव बने हैं. मानव के पास मन है, वाणी है ! वाणी से ही मनुष्य की पहचान होती है. परमात्मा भी शब्द के माध्यम से प्रकट हुआ है. इस शब्द को जब कोई भीतर सुनता है तो मानो परमात्मा के द्वार पर ही पहुंच गया है. संगीतमयी वह धुन अनवरत भीतर गूँज रही है. बाहर का संगीत भी भीतर से ही उपजा है. भीतर अमृत के झरने बह रहे हैं. मनुष्य का जन्म इसी को सुनने के लिए हुआ है. मनुष्य परमात्मा से ही जन्मता है, उसमें ही जीता है व विलीन होता है, लेकिन वह जानता नहीं. वह सोचता है जैसे सांसारिक वस्तुएं बाहर से मिली हैं वैसे ही परमात्मा भी बाहर कहीं मिलेगा. हर मानव एक खजाना अपने भीतर छुपाये है. अभी वह सोया है, स्वप्न में भिखारी हो गया है ! अभी मन का एक हिस्सा जगा है नौ भाग सोया है. जागा हुआ एक भाग हार जाता है नौ भाग जीत जाते हैं. जप करके अपने मन को जगाया जा सकता है. मानव का मन विकसित हुआ है तभी विज्ञान इतना आगे बढ़ा है किन्तु उसका अचेतन मन अभी भी पाशविक वृत्तियों का शिकार बना है. भक्त अपने मन के भीतर परमात्मा को प्रकट करता है. अनगढ़ा मन भगवान नहीं है, जैसे-जैसे मन जगता जायेगा परमात्मा प्रकट होता जायेगा ! जैसे एक संगतराश अनगढ़ पत्थर में से एक सुंदर मूर्ति को गढ़ता है वैसे ही भक्त या साधक अपने मन में से एक प्रकाशपूर्ण ज्योतिस्वरूप परमात्मा को गढ़ता है. मन को मथ कर वह अमृत कुम्भ प्रकट करता है.

शरीर का सुख प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने करने पर निर्भर करता है पर मन की शांति बाहरी पदार्थों पर निर्भर नहीं कर सकती ! मन तो तभी आनंदित होता है जब वह स्वयं को परमात्मा के अनुकूल बना लेता है, अर्थात अपने स्वभाव में टिकता है. निज स्वभाव में रहना मानो धर्म को धारण करना है. मन ही जीवन का आधार है, मन के स्वास्थ्य पर ही तन का स्वास्थ्य टिका है. मन की पवित्रता पर ही आत्मा की सबलता निर्भर करती है. मन यदि शांत है तो कर्म भी पुण्यशाली होंगे, स्थिर है तो संबंध भी दृढ़ होंगे, समता में है तो उसकी शक्तियों का उपयोग जगत के लाभ के लिए होगा और परमात्मा को उसके माध्यम से प्रकट होने का अवसर मिलेगा. परमात्मा को उन हाथों की तलाश है जो उसका काम करें, उन पावों की तलाश है जो उसके पाँव बनें !


आज मौसम बहुत ठंडा है, परमात्मा का जहाँ वास हो वह स्थान बहुत मनोरम हो जाता है. टीवी पर राम कथा आ रही है, कई बार सुनी है पर हर बार नई लगती है. वह रसपूर्ण परमात्मा भी तो नित नूतन रस बरसाता है. वह अनंत है, अपार है ! जिस दिन कोई आँख उठाकर परमात्मा को देखता है तो अपने को ही देखना होता है. बुद्धि जब थक कर चुप हो जाती है तो भीतर की शांति प्रकट होती है. एकांत में उसके पास एक गहन शांति के अलावा कोई दूसरा नहीं होता, भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाती है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो शांति कहीं छिप जाती है. परमात्मा एकछत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई अन्य नहीं रह सकता. ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समायें’   

Monday, April 4, 2016

फेन, तरंग, बूंद


शाम के पांच बजे हैं. शाम का नाश्ता बना लिया है और रात के भोजन की तैयारी भी हो गयी है. जून आज देर से आने वाले हैं, सो उसने डायरी उठा ली है. मन पर नजर डाले तो एक इच्छा दिखाई देती है. आंटी के द्वारा कमल के फूल का फोटो देख लिया गया या नहीं, यदि हाँ तो उन्हें कैसा लगा, इसकी जानकारी मन चाहता है. लेकिन कल सवेरे ही उन्हें फोन करना ठीक रहेगा. इसी हफ्ते पुस्तकालय में एक मीटिंग है उसे जाना ही चाहिए. ‘साहित्य सभा’ से एक पत्र आया है जो उसे हिंदी पढ़ने आने वाली छात्रा पढ़कर सुनाएगी. सभी को राखियाँ व पत्र मिल गये हैं पर किसी ने भी जवाब नहीं दिया. आज मानव कितना भावना शून्य होता जा रहा है. उनमें वह भी शामिल है. खैर ! कलयुग का अंत समय है ( ब्रह्मकुमारियों के अनुसार ). बाहर मौसम अच्छा है, शीतल मंद पवन डोल रही है पर वह यहाँ अंदर बैठी है. प्रकृति के निकट जाने का कोई अवसर चूकना नहीं चाहिए. प्रकृति, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी में आत्मा है और जहाँ भी आत्मा है उससे ऊर्जा तो निकल ही रही है. सुबह चार बजे उठी और चालीस मिनट लग गये पानी पीने, नित्य क्रिया आदि करके योग के लिये बैठने में, सुबह वक्त कितनी तेजी से दौड़ता है. आज ध्यान भी एक घंटे से कम हुआ. राखी बनाना शुरू किया, कई सारी बना ली हैं. बनाना कितना सरल है. किसी भी वस्तु से, वस्त्र, ऊन या धागे से ही बनायी जा सकती हैं. सासु माँ बाहर बैठी हैं बरामदे में. वह शांत रहकर सुबह से शाम तक का वक्त कैसे बिना अशांत हुए गुजार देती हैं, अचरज होता है, सुबह टहलने जाती हैं, फिर आकर स्नान, नाश्ता आदि, कभी किचन में कुछ काम कर लेती थीं पर अब उनका मन नहीं होता. दोपहर को आराम करती हैं, कुछ देर टीवी, फिर शाम का भ्रमण और फिर केवल बैठना, शाम को टीवी देखना उन्हें ज्यादा पसंद नहीं है. बीच-बीच में दवा और मालिश आदि में कुछ वक्त जाता है. उनमें धैर्य बढ़ रहा है !
 
आज सुबह से परमात्मा उसे सचेत करने का प्रयत्न कर रहे हैं और उसने जैसे अचेत रहने की कसम खा ली है. सुबह अलार्म बजा तो पांच मिनट बाद उठी. बाथरूम में पानी गिरा दिया बिना इसकी परवाह किये कि बाद में अन्यों को भी बाथरूम इस्तेमाल करना है. नैनी की चाय बनायी तो गैस पर ही उबलती रह गयी, उसने भी ध्यान नहीं दिया. दलिया बनाया तो उसमें सब्जियां डालकर ही छोड़ दिया, दलिया डालना ही भूल गयी, तुर्रा यह कि एक बार खोल कर देखा भी तब भी समझ में नहीं आया कि कुछ गलती हुई है. कॉर्न फ्लेक्स में गाय के दूध की जगह अमूल डाल दिया. हर कदम पर गलतियाँ ही गलतियाँ. परमात्मा सोचता होगा सजग रहने का अब तो प्रयत्न करेगी पर ध्यान में भी वही इधर-उधर के ख्याल. मन टिकता ही नहीं था यह अस्थिर मन किसकी निशानी है, यह प्रमाद की निशानी है. मोह की निशानी. कुछ कर ले, कुछ बन जाये, कुछ पा ले, ऐसा जो ज्वर भीतर है, यह उसी की निशानी है. परमात्मा उन्हें झकझोर कर जगाता है. आँखें खोलो, क्या पाना है? कहाँ जाना ही ? क्यों इतनी भाग-दौड़, क्यों इतनी आतुरता, इतनी शीघ्रता, मन जैसे रेस में भाग रहा है, द्वन्द्वों से ग्रसित मन कहीं टिककर बैठता ही नहीं, ऐसा तो नहीं होता एक साधक का मन, यह सद्गुरू कहना चाहते हैं !
आज सुबह पुनः दस मिनट देर से उठी, पर अपेक्षाकृत मन सजग था सो अभी तक तो कोई भूल नजर नहीं आती, हाँ एक भूल जो हर पल, हर वक्त, चैबीसों घंटे, सातों दिन, बारह महीने जारी है, वह है वाणी की कटुता. वाणी का दोष ठीक नहीं करती है सो यह बढ़ता ही जा रहा है. इसी क्षण इसके प्रतिकार का मौका मिला है, अच्छा है, झट उपयोग कर लेना चाहिए. आज का सत्संग एक नर्सरी चलाने वाले के यहाँ है, पर उनका जाना सम्भव नहीं होगा. कल दिनकर की ‘कवि’ कविता पढ़ी. कवि का हृदय कोमल होता है किसी का भी दुःख हो उसे छू जाता है, उसका हृदय दूसरों की पीड़ा को अनुभव करता है, वह जीवन को एक ऐसे नजरिये से देखता है जिसमें सभी एक हैं, एक ही परिवार के अंग, सबका सभी कुछ साझा है. ऐसा कवि हृदय ही एक दिन परम सत्य की ओर बढ़ जाता है. कल शाम मीटिंग है, फिर एक सखी के यहाँ पूजा में जाना है, पता नहीं, दोनों जगह जाना सम्भव होगा या नहीं. जून कल ‘परंपरा पनीर मसाला’ लाये हैं, उसकी गंध से भी मन भर गया है जैसे भोजन कर लिया हो. सुबह उन्होंने वजन व रक्त दबाव नोट किया, ऊपर का नब्बे से भी कम है और नीचे का साठ से. वजन पचास से. बीपी कम होने से उसे कोई दिक्कत तो नहीं होती. कल जीजाजी ने पर्यावरण पर कुछ भेजने को कहा, उन्हें तीन कविताएँ भेजी हैं.


आज मौसम अपेक्षाकृत गर्म है, वर्षा नहीं हो रही है. सुबह थोड़ा जल्दी उठी, मन शांत है, जिसका बीपी इतना कम हो उसका मन शांत नहीं होगा तो क्या होगा. इस वक्त लग रहा है कि ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो करना शेष हो. जैसे सारे कार्य हो चुके हैं. अब तो बस एक उसी की प्रतीक्षा है, यह भी क्या एक कार्य नहीं हुआ, प्रतीक्षा तो उसकी करें जो कहीं दूर हो, आने वाला हो, जो कहीं गया ही नहीं, सदा निकट ही है, जो स्वयं ही है वह भला क्यों और किसकी प्रतीक्षा करे, तो प्रतीक्षा भी नहीं बस अपने होने का अहसास लेकिन इस अपने होने में अहंकार नहीं, केवल होने का अहसास. जब ‘मैं’ ही नहीं रहा तो करेगा कौन, कर्ता नहीं है केवल एक सत्ता है, वह सत्ता सहज रूप से कर्म होते देखती है, शरीर के भीतर श्वास आ जा रही है, दिल धड़क रहा है, हाथ लिख रहा है, मन संकल्प उठा रहा है, लेकिन इन सबको एक सूत्र में बाँधने वाला कोई नहीं, ये सब वैसे ही हैं, जैसे जल में तरंगे, बूंदें, लहरें, फेन सभी अपने आप में स्वतंत्र भी और एक भी !

Thursday, February 25, 2016

संस्कारों के बीज


फिर एक अन्तराल ! नये वर्ष का चौथा महीना बीतने को है, कितने ही पल हाथ से गुजरते जा रहे हैं, कुछ खट्टे कुछ मीठे, वह साक्षी है उन सभी की. सभी के प्रति सम्मान का भाव सदा मन में रहता है पर कभी-कभी वाणी कठोर हो जाती है, पूर्व के संस्कार कभी-कभी प्रकट हो जाते हैं. उनकी भावनाएं चाहे शुद्ध हों पर कर्म जब तक उनकी साक्षी नहीं देते तब तक वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते. आज सुबह इतने वर्षों में पहली बार स्वीपर को भी उसके क्रोध का प्रसाद मिला. चाहे उनके क्रोध करने का कारण कितना भी सही क्यों न हो पर क्रोध सदा करने वाले को तथा जिस पर किया गया हो उसे, दोनों को जलाता है, क्योंकि क्रोध में वे द्वैत का शिकार होते हैं. क्रोध क्षणिक पागलपन ही है, वही बात जो वे क्रोध में कह रहे हैं, शांत भाव से भी तो कह सकते हैं. क्रोध के बाद सिवाय पछतावे के कुछ भी हाथ नहीं आता. उसके भीतर अभी भी कितनी नकारात्मक भावनाएं भरी हैं. इतने वर्षों का ध्यान भी उन्हें मिटा नहीं पाया, बीज रूप में वे संस्कार पड़े हैं जो मौका मिलते ही पनप उठते हैं, लेकिन गुरू का ज्ञान तत्क्षण हाजिर हो जाता है और भीतर प्रतिक्रमण होने लगता है, पुनः हृदय पूर्ववत शांत हो जाता है. लेकिन जहाँ वे शब्द गये हैं वहाँ तो पीड़ा पहुँच ही चुकी है, दूसरे की गलती होने पर भी उसे पीड़ा पहुँचाने का उन्हें कोई हक नहीं बनता, उसमें उनकी ही हार है, स्वयं के लिए ही उन्हें शांत रहना सीखना होगा.


सुबह पांच बजने से पूर्व उठी, सद्विचारों को सुना. क्रिया आदि की. भीतर झाँका तो पाया सम्मान पाने की, अपने लिखे लेख पर कुछ प्रतिक्रिया सुनने की आकांक्षा भीतर बनी हुई है. उसका लिखने किसी अन्य के लिए महत्वपूर्ण क्यों हो ? किसी को क्या पड़ी है कि पहले तो वह पढ़े फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे. यदि वह लिखती है तो इसलिए कि उसे उसमें सुख मिलता है, बस वही उसका प्राप्य होना चाहिए. ईश्वर ने उसे यश का भागी बनाकर अहंकार से भरने के लिए तो इस संसार में नहीं भेजा है. उसके जीवन का उद्देश्य परम सत्य को पाना ही तो है, उसमें बाधक हैं यश, सुख-सुविधाएँ, अति व्यस्तता. उसका जीवन तो कितना साधारण है, यहाँ एकांत है, समय है, साधना का उपयुक्त वातावरण है. ऐसा सहज, सरल, स्वाभाविक जीवन पाकर और क्या चाहिए. आत्मस्वरूप में स्थिति बनी रहे, बोध बना रहे, किसी को उसके कारण रंचमात्र भी पीड़ा न हो, उसके मन को भी कभी कोई दुःख स्पर्श न करे. सहज हों उसके सभी कार्य, उसके सभी संबंध भी सहज हों तभी तो भीतर सत्य प्रकट होगा. उसके लिए अनुकूल वातावरण भीतर बनाना है, कोई चाह नहीं, कोई कामना नहीं, कोई आकांक्षा नहीं, बस एक प्रतीक्षा ! कब आएगा वह, और एक अटल विश्वास कि वह परम भीतर प्रकटेगा अवश्य ! वह अस्तित्त्व, वह चिन्मय तत्व जो भीतर कभी नाद तो कभी प्रकाश रूप में दिखाई देता है, वह स्पष्ट हो उठेगा, पर उसके पूर्व धो डालना होगा सारा कलुष, धो डालनी होगी सारी आतुरता, सारा द्वेष, सारी असंवेदनशीलता, भरना होगा प्रेम से भीतर का वातायन !

Tuesday, November 24, 2015

फूलों के पेड़


आज सुबह उठने में देर हुई. कपड़े प्रेस करते समय प्रेस में आग की हल्की सी एक लपट निकली, दिखानी होगी. घर के बाहर फूलों के पेड़ लगवाने के लिए गड्ढे खुदवाये और गुरूजी को सुना. कह रहे थे साधक को आत्मग्लानि से सदा बचना चाहिए. अपने मुक्त स्वभाव में रहना चाहिए, न प्रभाव में न अभाव में बल्कि अपने मूल स्वभाव में. जो प्रेम, शांति, करुणा और भक्ति का स्थान है, जहाँ न राग है न द्वेष और वही वास्तव में वह है. कल शाम टहलते हुए वे नन्हे के मित्र से मिलने गये पर घर बंद था. एक सखी से फोन पर बात हुई, वे लोग हिमाचल की यात्रा पर हैं. कल एक सखी ने फोन किया सत्संग के बारे में, वह उत्साही है बस अपने मुख से अपना बखान करती है थोड़ा सा, उसकी सहयोगी है बच्चों के कार्यक्रम अंकुर में.

आज चिदाकाश के बारे में सुना, जिसे बुद्ध शून्य कहते हैं. वह प्रकाश भी नहीं है, रंग भी नहीं और ध्वनि भी नहीं, इसे देखने वाला शुद्ध चैतन्य है, जो आकाश की तरह अनंत है और मुक्त है. जो कुछ भी दिखाई पड़ता है या अनुभव में आता है वह सब क्षणिक है, नष्ट होने वाला है पर वह चेतना सदा एक सी है. मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म शरीर में होकर उसका अनुभव किया जाता है बल्कि वही अनुभव करता है. मन के द्वारा वही सुख-दुःख भोगता है, जब तक कोई उसे मन से पृथक नहीं देख पाता. अधिक से अधिक साधक को उसी में टिकना है. आनन्द स्वरूप उस चेतना में साधक जितना-जितना रहना सीख जायेगा, मृत्यु के क्षण में उतना ही शांत रहेगा. आगे की यात्रा ठीक होगी. ध्यान में साधक उसी में टिकता है या टिकने का प्रयास करता है. वहाँ कुछ भी नहीं है, न मन, न बुद्धि, न कोई देखने वाला, न दृश्य, न कोई संवेदना, केवल शुद्ध चेतना !

आज गुरूजी ने बताया कि जब साधक से कोई भूल हो जाये तो उसे प्रायश्चित करना चाहिए. गुरु के साथ आत्मा का संबंध, हृदय का संबंध बनाना चाहिए, शरीर व मन दोनों से परे है गुरु ! माँ शारदा कीं कथा पढ़ी, अद्भुत कथा है. ईश्वर चारों ओर न जाने कितने रूपों में है, वे ही उसकी ओर नजर नहीं डालते !

उसे अब समझ में आने लगा है, बोलते समय वाणी के साथ भीतर की तरंगें भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर होगी तो तरंगें प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जाएँगी, और यदि भीतर कटुता है, खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी के पहले तरंगे वही लेकर जाएँगी. वाणी का असर नहीं होगा, बल्कि बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो तभी तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा तभी हो सकता है जब कोई उस जगह रहना सीखे जहाँ कोई विक्षेप नहीं, जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर वर्तमान की सुखद वायु बहती है, मन से परे आत्मा के उस आंगन में अपना निवास बनाना है जहाँ प्रेम आनन्द और शांति के सिवा कुछ है ही नहीं. जब जरूरत हो तब चित्त, बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट आयें. तब विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी, ऐसे में वह शक्ति जो अभी व्यर्थ सोचने, बोलने में चली जाती है, बचेगी, ध्यान में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वत ही होने लगेगा.     




Friday, November 6, 2015

रस्ता और मुसाफ़िर


वाणी का दोष पुनः हुआ, उसने नये माली की तारीफ़ की और पुराने माली की निंदा, अब निंदा का दोष जो लगा वह तो है ही, नया माली प्रशंसा सुनकर दो घंटे से पहले ही चला गया. इन्सान अपनी जिह्वा के कारण कितनी बार फंस जाता है. वाणी पर संयम रखना कितना कठिन है, एक बार वे बोलना शुरू करते हैं तो खत्म कहाँ करना है, यह भूल जाते हैं. आज शाम को सत्संग में जाना है, नॉलेज पॉइंट्स लेकर जाने हैं. सुबह सुना जिस तरह मिट्टी आग में तपकर प्याला बन जाती है और उपयोग में आती है वैसे ही उनका यह मिट्टी का तन जब ईश्वर की लगन रूपी लौ में तप जाता है तब यह उसके हाथों का उपकरण बन जाता है और काम में आता है. ईश्वर की लगन भी क्रमशः तीव्रतर होती जाती है, पहले राख में छिपे अंगारे की तरह जो ऊपर से दिखती भी नहीं, फिर तपते हुए लाल अंगारे की तरह, जो प्रकाश भी देता व ताप भी, फिर गैस के चूल्हे की नीली लपट की तरह और फिर माइक्रोवेव की तरह जो नजर भी नहीं आती, बस चुपचाप अपना काम कर देती है. सद्गुरु ने कहा कि ज्ञान पा लिया है यह अहंकार भी छोड़ना होगा पर नहीं मिला है सदा यह संदेह भी नहीं रखना है. मध्यम मार्ग पर चलना श्रेष्ठ है. आत्मा का परमात्मा से नित्य का संबंध है. उन्हें बनाना नहीं है, वे स्वयं आत्मा हैं यह बात जितनी दृढ़  हो जाएगी तो उतना ही वे परमात्मा से अभिन्नता अनुभव कर सकेंगे, और तब शेष ही क्या रहा ?

आज गुरूजी ने कहा शब्दों से वे लाख चाहें, अपनी बात समझा नहीं सकते जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. वे अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से अपने विरोधी को प्रभावित कर सकते हैं किसी हद तक. आज भगवद्गीता पर उनके प्रवचन का प्रथम भाग सुना, कल दूसरा सुनेगी, भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़े, सुने तृप्ति नहीं मिलती, वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता फिर उसे सामने बिठाकर पूजता है पर दो के मध्य की दूरी भी उससे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है, केवल एक ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है. और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

मैं हूँ मंजिल, सफर भी मैं हूँ, मैं ही मुसाफिर हूँ...

आज सद्गुरु ने कितना सुंदर गीत गाया. मन व् बुद्धि भी उसी आत्मा से निकले हैं, यानि वही हैं जिन्हें आत्मा तक पहुंचना है ..मन रूपी यात्री विचार रूपी रस्ते को पार करके घर पहुँचता है. कितना सरल और सहज है अध्यात्म का रास्ता..न जाने कितना पेचीदा बना दिया है इसे लोगों ने. सीधी- सच्ची बात है जब मन स्वार्थ साधना चाहता है तो आत्मा से दूर निकल जाता है जब यह अपनी नहीं सबकी ख़ुशी चाहता है तो यह आत्मा में टिक जाता है. यह जान जाता है कि जगत एक दर्पण है जो यहाँ किया जाता है वही प्रतिबिम्बित होकर वापस आता है, तो यह खुशियाँ देना आरम्भ करता है. अहंकार को पोषने से सिवाय दुःख के कुछ हाथ नहीं आता, क्योंकि अहंकार उसे सृष्टि से पृथक करता है, जबकि वे सभी सृष्टि के अंग हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं. स्वतंत्र सत्ता का भ्रम पलने के कारण ही वे सुखी-दुखी होते हैं. वे ससीम मन नहीं असीम आत्मा हैं !



Wednesday, December 3, 2014

चित्रकला का संसार


आज सुबह से ही अपने–आप में नहीं है, एक के बाद एक मूर्खतापूर्ण कार्य और वाणी का प्रयोग उसे असमंजस में डाले जा रहा है. सुबह जून देर से उठे उसकी वजह भी वही थी. कल उसके सामने ही घड़ी reset हो गयी पर न तो उसे ठीक ही किया न ही जून को बताया. सुबह नन्हे को डांटा. जून से असत्य कहा, संगीत कक्षा भी है, फिर शीघ्रता में ही स्वीपर के न आने की खबर सफाई दफ्तर में कर दी जबकि बाद में वह आ गया है, उन्हें कितनी असुविधा हुई होगी उसकी वजह से दूसरा व्यक्ति परेशान हुआ जिसे काम मिल गया था. नैनी को तो उसकी गलती के लिए टोकना आवश्यक था. ...और अब उसका मन उसे ही कोस रहा है या फिर वह मन को...उसे स्वयं पर संयम नहीं था इसी का परिणाम था यह सब. शायद वह संगीत सीखने नहीं जा पायी इसकी वजह से..बाबाजी कहते हैं..छड्डो परे....और ईश्वर से सच्चे दिल से क्षमा मांग लो. परम शांति तो स्वयं की ही है..हर क्षण ..हर पल !

पिछले कई दिनों से अधर्म की वृद्धि हो रही थी और ईश्वर अपने वायदे के अनुसार मन के द्वार पर दस्तक देने आया है. उसके साथ सदा ऐसा ही होता है. जब कभी संसार उसे घेर लेता है एक बेचैनी उसे वहाँ से भागने पर विवश कर देती है. कुछ दिन या कुछ पल यदि ईश्वर के स्मरण के बिना गुजरे हों तो एक छटपटाहट सी होने लगती है जो कहती है कि यह मार्ग उसका नहीं है. आज सुबह गुरुमाँ ने सत्य कहा था कि यदि कोई सुख चाहता है तो उसे याद करे वरना न करे. उसे याद करते रहें तो अपने कर्त्तव्यों का बोध भी बना रहता है. कर्त्तव्य अपने देह, मन, आत्मा के प्रति, अपने परिवार, संबंधियों, पड़ोसियों के प्रति, अपने समाज, शहर व देश के प्रति तथा मानवता के प्रति अपने मातहत काम करने वालों के प्रति. जीवन एक उपहार है जो ईश्वर ने दिया है. हर श्वास पर उसी का अधिकार है, अभिमान करने योग्य यदि कुछ है तो यही कि मानव जन्म पाया है. इसे सार्थक करना या इसका अपमान करना उसके वश में है. आज कैलेंडर देखा तो पता चला कि कल अमावस्या थी, उसके व्रत का दिन पर उसे याद नहीं रहा, इतवार का दिन जो था. अब आने वाले कल रखेगी. कल एक पुराने परिचित आये, उन्हें भोजन कराया वह मिठाई लाये थे अपने शहर की. यह प्रेम का संबंध ही तो है जो उन्हें उनके पास लाता है. ईश्वर के प्रति प्रेम हो तो वही प्रेम अन्यों के प्रति झलकता है. उसका हृदय प्रेमयुक्त हो !


आज गयी थी संगीत सीखने, सो ‘जागरण’ नहीं सुना. लौटी तो ध्यान आदि किया, भोजन बनाया. पत्र अधूरे ही पड़े हैं, कुछ नया लिखा भी नहीं, पत्रिकाएँ पढने का भी समय नहीं मिला. चित्रकला का अभ्यास भी उसने कुछ दिन पहले शुरू किया था, बीच में ही छूट गया है, पर कल नन्हे ने बहुत दिनों के बाद एक चित्र बनाया अपने स्कूल में होने वाली एक प्रदर्शनी के लिए  आज सुबह वह अपने आप ही उठा, फिर बस स्टैंड तक उसे छोड़ने जून गये. अभी-अभी उनका फोन भी आया. कल कहा कि उन सभी को घर पर भी अच्छी वेशभूषा में ही रहना चाहिए, अस्त-व्यस्त सा नहीं. क्लब की मीटिंग का बुलेटिन भी आया है, जाने का अभी तो ज्यादा उत्साह नहीं है लेकिन सदस्या बनी है तो मीटिंग में जाना कर्त्तव्य भी तो है जब तक कि बेहद आवश्यक कार्य न हो अनुपस्थित नहीं होना चाहिए. कल माली ने तीन क्यारियों में खाद डाल दी है, इस बार वे सर्दियों की सब्जियां शीघ्र लगा सकते हैं. अभी एक सखी से बात हुई, उसने घर आने का निमन्त्रण दिया है, वे अवश्य जायेंगे.

Friday, October 31, 2014

बादल का टुकड़ा


वाणी मधुमंडित, सुवासित हो जिसमें अहंकार की गंध न हो, स्वार्थ की महक न हो. ऐसी वाणी निर्वासनिक मन से ही उपजती है. निष्कपट भक्ति भी ऐसे ही मन में जगती है. प्रार्थना भी ऐसी ही भावदशा में  की जा सकती है. ऐसा मन सभी तरह के विक्षेपों को पचाने योग्य बनता है. कल रात वह प्रार्थना करते-करते सोई. स्वप्न में कन्याकुमारी के दृश्य देखे. सुबह उठी तो मन शांत था. बाबाजी कहते हैं देर सबेर ईश्वर सबके हृदयों में अवश्य प्रकट होगा, उसके स्वागत के लिए मन का दरवाजा हमेशा खुला रखना होगा, मन को निष्कपट, स्वच्छ और कोरा रखना होगा. कामना हर पल नीचे गिराने का प्रयत्न करती है और प्रार्थना ऊपर उठाने का. कल शाम कुछ पुरानी कविताओं को पूर्ण किया. कादम्बिनी को भी दो कविताएँ भेजी हैं, उसके अंतर में कई कविता संग्रह अभी भी दबे हुए पड़े हैं. थोड़ा सा प्रोत्साहन मिले तो बाहर आ जायेंगे, न भी मिले तो कोई हर्ज नहीं, अपने सुख के लिए कविता रचना तो सदा ही जारी रहेगा !

कल अंततः उसकी इच्छा फलवती हुई जून और वह मार्किट गये, उसके जन्मदिवस पर पहनने के लिए हल्के हरे रंग की एक ड्रेस लाये, थोड़ी लम्बी है उसे ठीक किया जा सकता है. आभी आज और कल दो दिन का वक्त शेष है. कल उसने अपना इमेल अकाउंट खोला. आज सुबह हरिद्वार मामीजी के लिए पहले इमेल लिखा, अभी भेजा नहीं है. नन्हे का आज टेस्ट है. गर्मी पूर्ववत है. सुबह नींद खुली तो स्वप्न में कम्प्यूटर, इमेल यही सब देख रही थी, उसके चेतन मन से ज्यादा अवचेतन मन पर इसका प्रभाव पड़ा दीखता है. आज बाबाजी और गोयनका जी दोनों को कपड़े प्रेस करते-करते सुना, एक जो कहता है दूसरा उसका विपरीत कहता हुआ सा लगता है पर दोनों का लक्ष्य एक है. गोयनका जी का मार्ग ज्यादा कठिन है, बाबाजी का बिलकुल सहज ! सहज भाव से अपने भीतर के आत्मदेव पर भरोसा करना है. सुख में ललक पैदा न हो बल्कि सुख बांटने की प्रवृत्ति हो और दुःख में सिकुड़े नहीं, सम भाव रहे यही उनकी शिक्षा का सार है. जैसे-जैसे व्यवहार में समता आती जाएगी, ममता छूटती जाएगी और एक दिन मन सुख-दुःख से ऊपर उठ जायेगा. देह या मन में कोई पीड़ा हो तो यह याद रखना होगा कि यह अनित्य है, सदा रहने वाली नहीं है. परसों उसके जन्मदिन के दिन ही लेडीज क्लब की मीटिंग है, एक सीनियर सदस्या का विदाई दिन भी है. पर वह नहीं जा पायेगी, दो साल पूर्व जब वह जाते-जाते रह गयी थीं, उनके लिए जो लेख लिखा था वह ऐसे ही रखा रह जायेगा. जून और नन्हे को मनाना आसान नहीं होगा, सो जो हो रहा है उसे होने देना चाहिए, वैसे भी इतने वर्षों में कुल मिलाकर दस-पन्द्रह बार से ज्यादा नहीं मिली होगी उनसे, उनके लिए शुभकामनायें घर से ही भेज सकती है.


जो हमारे पास है उसका महत्व जानें और जो नहीं है उसके पीछे न भागें तो जीवन में सुख ही सुख है. लेकिन जो भी है वह सदा के लिए नहीं रहेगा यह भी याद रखना है. लक्ष्मी सदा खड़ी रहती है और सरस्वती सदा बैठी रहती है. ज्ञान कभी साथ नहीं छोड़ता लेकिन धन-दौलत व वस्तुएं साथ छोड़ भी सकती हैं. सत्संग को सुनकर गुनने से ही उसका लाभ मिलता है. “एक बुढ़िया थी वह बचपन में ही मर गयी”. यह कहानी बताती है कि सारी उम्र लोग नादान ही बने रहते हैं. ईश्वर स्मरण बना रहे तो यही नादानी समझदारी में बदल जाती है. कल वह ध्यान में ज्यादा देर तक नहीं बैठी, इतर कार्यों में लग गयी सो रात को मन अशांत था, नींद नहीं आ रही थी, कोई कारण नजर नहीं आ रहा था. आज बाबाजी के संगम तट पर दिए गये प्रवचन की रिकार्डिंग सुनाई गयी. हजारों लोगों को पल में हँसा व रुला सकने की सामर्थ्य है. वह लोगों के मन में स्थित ईश्वर को जगा देते हैं. मन उच्च केन्द्रों की ओर चला जाता है, दुनियावी बातें सारहीन लगती हैं. सभी के प्रति मन प्रेम से भर जाता है. आज सुबह उसने बगीचे में काम करने की इच्छा व्यक्त की पर धूप तेज थी, न जाने कहाँ से बादल का एक टुकड़ा आ गया. हवा भी बहने लगी. आधा घंटा वह काम कर सकी. कल उसके जन्मदिन पर भी मौसम अच्छा हो जायेगा, ऐसा उसका पूर्ण विश्वास है.   

Saturday, August 9, 2014

किचन में रंग-रोगन


इतने दिनों से सन्त वाणी सुनकर उसे इतना तो निश्चय हो गया है कि उन्हें अपने जीवन को आध्यात्मिक बनाना है. बाबाजी ने बताया, अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर उतरना, भीतर का संयोजन, नियोजन व शोधन, आत्म विश्लेषण ! मन को उच्च आदर्शों, उत्थान, और मूल्यों के प्रति समर्पित करना, अंतकरण को पवित्र करना और अपने मूल स्वरूप को पहचानना. ऊपरी मन बहुरूपिया है कभी उत्थान की ओर जाता है कभी पतन की ओर ले जाता है. कभी संयमी हो जाता है कभी विलासी, यह मन मात्र ही चरित्र का गठन नहीं कर सकता, इससे परे एक ऐसा मन भी है जिसे आत्मा कह सकते हैं, जो निर्विकार है, जहाँ उतार-चढ़ाव नहीं हैं. वहीं तक पहुंचना, अभ्यास व वैराग्य के द्वारा वहाँ तक पहुंचना ही अध्यात्म है. इसके लिए जरूरी है उनकी आस्था का केंद्र उच्च हो, मन में श्रद्धा हो. मन इच्छाओं से मुक्त हो, ऐसा मन निर्मल आकाश की तरह है - स्वच्छ, असीम, अनंत ! जीवन यदि प्रेम, भावना, करुणा से युक्त हो तो मन आत्मा में ही रहता है.

आज उसने फिर सुना, प्रेम एक व्यापक तत्व है, समन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! मोह संकीर्ण धारा की तरह है, मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. रात से ही वर्षा की झड़ी लगी थी, जून और नन्हा जब गये तो वर्षा हो ही रही थी, अब थमी है, आकाश जो बादलों से ढक गया था फिर स्पष्ट दिखाई दे रहा है, नीला आकाश जो उसके मन का स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल विशाल और मुक्त ! उन्हें अपने मन के उसी स्वभाव में रहना सीखना है, विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी उन्हें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिपल, प्रतिक्षण ! उसका मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्रित करना है एक रूप देना है, यानि प्रतिक्षण जागरूक रहना है. यह संसार जैसा उसे दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं, प्रतिक्षण बदलते इस संसार को साक्षी भाव से देखते जाना है. दीदी ने बहुत पहले लिखा था, प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पडती, वह तो स्वयंभू है.

Sunday , it is quarter to eight in the evening. Today they got up at six in the morning, did all Sunday jobs, went for a walk in the afternoon. Watched tera jadu chal gya on tv, talked to parents and one friend, who came back today from Bombay. Now they are watching ‘Rishtey’ on Zee tv. Nanha is studying in his room, jun is here with her. Rishtey is very very touchy and warm  serial, really they feel it in their heart.


धर्म उसका है जो उस पर चलता है. जो खुद के प्रति ईमानदार है. जो नये-नये कर्म बंधन नहीं बांधता, ह्रदय में जो गांठे पड़ गयी हैं उन्हें खोलता चलता है. जो स्वयं के लिए सुख-सुविधापूर्ण जीवन की अभिलाषा नहीं रखता बल्कि जैसा समय और परिस्थितियां हों स्वयं को उनके अनुसार ढाल लेता है. धर्म तो भीतर की वस्तु है, अंतर्मन की, भीतर क्या-क्या चल रहा है, क्या वे अपने सहज स्वाभाविक रूप में सदा रह पाते हैं या अपने आप से नजरें चुराते हैं, यदि वे स्वयं की नजरों में धार्मिक हैं तभी दुनिया की नजरों में धार्मिक बने रहने का उन्हें अधिकार है.


उन्हें ऊपर की ओर उठना है, नीचे गिरना तो सहज है, पतन के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, पुरुषार्थ तो उसी में है जब मन आत्मा में स्थित रहे. आज उन्हें दिगबोई जाना है, नन्हे के स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग है. अगले सोमवार से उसकी परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं. तैयारी ठीक चल रही है, अब हर वक्त उसे उसके साथ नहीं बैठना होता, स्वयं ही याद करता है, स्वयं को ही सुनाता है. उसे उसकी पढ़ाई से कोई शिकायत नहीं है, जून और वह दोनों संतुष्ट हैं कि उनका पुत्र बुद्धिमान है. कल दोपहर को पहली बार उसे कुछ असहज सा महसूस हुआ शरीर में, कल रात ठीक से सो नहीं पायी. आज सुबह से ही फिर अस्वस्थ महसूस कर रही है. आज ही किचन में रंग-रोगन होने की भी बात थी पर रात से लगातार होती वर्षा के कारण शायद वे लोग आज न आयें, यही बेहतर होगा. कल शाम वे एक मित्र-दंपत्ति से मिलने गये. अगले महीने वे फिर अगले इलाज के लिए जा रहे हैं. ईश्वर चाहेंगे तो उसकी सखी की दिली इच्छा कि वह माँ बने जल्दी ही पूरी होगी.

Wednesday, July 30, 2014

हवाई जहाज की दुर्घटना


Still she has to go far, very far ! she has so many shortcomings, some of them she is not even aware of. Today in the morning she scolded Nanha and after years badly. Jun and she both do not like his bad habit of late rising. He does not look fresh even after getting up these days, it means he sleeps very late also. उसकी लिखाई से स्पष्ट है कि मन शांत नहीं है, भावनाओं से युक्त है.

आज का कोटेशन भी अच्छा है – The future belongs to those who believe in the beauty of their dreams- Eleaner Roosevelt
And what are her dreams ? Are they still alive and beautiful also? Years ago she dream t to be a writer or poet, but it is still a dream buried in the  heart of her heart. उसके मन के किसी कोने में दबा-छिपा बैठा है यह स्वप्न, जो कभी सच होने को आतुर था. कई  बार तो उसने उसे अपना मानने से भी इंकार कर दिया लेकिन Anne Frank के शब्दों ने, उसके साहस और प्रसन्नता ने, उसके आत्मविश्वास ने उसे अंदर तक छू लिया है और वह स्वप्न धूल झाड़ता हुआ, डगमगाता हुआ फिर से खड़ा हो गया है. उसका विश्वास उसमें फिर से जागृत हो रहा है. लेकिन अभी भी मन में कहीं न कहीं आशंका का बादल मंडरा रहा है. कल रात पूसी फिर लौट आई, इस निरीह प्राणी ने अपना नाता उनसे किस मजबूती से जोड़ लिया है, मनुष्य भी इतने निरादर और उदासीनता के बाद सम्बन्ध नहीं रख पाते पर जानवर होकर वह कितनी जुड़ गयी है अपने परिवेश से, पिछले चार-पांच वर्षों से वह उनके साथ है, कई बार बिछड़ी पर हर बार लौट आई है. आज नये हफ्ते का प्रथम दिन है. गोयनका जी चित्त की प्रधानता पर बल दे रहे थे. वाणी का अथवा शरीर का कर्म तो बाद में होता है पहले चित्त का कर्म होता है. वहाँ बीज बोया जाता है, जिसका परिणाम बाद में मिलता है, जैसा बीज होगा फल वैसा ही होगा. Anne का चिन्तन कितना मौलिक था, उसकी सोच उसके अनुभव के साथ-साथ परिपक्व होती चली गयी. she loves her !

All is well with her today but deep down heart is heavy with the burden of one more plane crash. Which  took place yesterday near Patna aerodrome’s runway, 54 persons were killed in this, only few lucky survived . These days TV covers not only cause and consequence of accident bur takes viewers  to the homes of dead persons. So every tragedy which earlier was only an news item now becomes  a personal loss. The grim faces of kith and kin of passengers, there tears and anguish… all this they can feel. But how long will  these  occur due to negligence. Babaji today scolded her and he was right, when he says things that she likes, she adore him and when someday he does not use the language of her choice she does not listen him but he is above all this worldly good or bad, there is nothing evil or ill for him. He knows the ultimate truth from which they ( at least she) is very very far away. But she tries to reach there by using awareness and keeping  an eye on her ever restless mind.





Monday, July 7, 2014

गुझिया की मिठास


आज उसका मन पूर्णत शांत है, उद्ग्विनता है तो यही कि हर पल सचेत नहीं रह सकी, बिना किसी कारण के असत्य भाषण किया, उस समय चेतनता नहीं थी पर बोलते ही अनुभव हुआ. चाहे कितना भी निर्दोष या छोटा सा झूठ भी हो पर दाग तो लग जाता है न, दीदी-जीजा जी से फोन पर बात की, वही जानी–पहचानी आवाज. नन्हा और जून जा चुके हैं. जागरण में बताया जा रहा है कि सबसे भयंकर हिंसा वाणी की हिंसा है, अपनी जिह्वा रूपी गौ को खूंटे से बाँध कर रखें क्योंकि यह दूसरों के हरे-भरे मन उपवन को तहस-नहस कर सकती है. वाणी का बहुत महत्व है. कल सुबह फोन पर जब उसे लगा कि भाषा थोड़ी रूखी थी तो शाम को वह उनके घर गयी अपने उस दोष का प्रायश्चित करने. आज फोन पर बात न ही करनी पड़े तो अच्छा है क्योंकि मौनव्रत लेने को बाध्य है. मानव मन देह के सुख-दुःख से ऊपर उठना ही नहीं चाहता, इसलिए मन से परे बुद्धि  और बुद्धि से परे आत्मा को जानने की बात पूर्वजों ने की. कल शाम वह स्कूल में कम्प्यूटर की अध्यापिका के यहाँ भी गयी, उसका क्लास वन में पढने वाला बेटा बहुत प्यारा है, नन्हा भी बचपन में ऐसा था. आज वह बायोलॉजी कक्षा के लिए कुछ टहनियां लेकर गया है. रसोईघर में नैनी कुछ खटपट कर रही है शायद उसे आकर्षित करने के लिए पर उसका तो मौनव्रत है न !

कल ईद की छुट्टी थी जून और नन्हा घर पर ही थे, परसों रात को असमिया सखी की बिटिया के जन्मदिन पार्टी से लौटकर सोते-सोते थोड़ी देर हो गयी सो सुबह नींद भी देर से खुली, फिर दोपहर को उन्होंने मिलकर गुझिया बनाई. नन्हे ने भरावन का कार्य किया, जून ने तलने का और उसने बेलने का. शाम को एक मित्र के यहाँ गये, उस सखी से काफी देर तक बात हुई, विषय वही था, स्कूल, कभी उसका ज्यादातर सखी का. आज जागरण में कोई जैन आचार्य आये हैं. अभी-अभी कुछ सखियों को फोन किया कल रात्रि होली के विशेष भोज के लिए. पड़ोसिन ने पूछा, वह क्लब की मीटिंग में गए जाने गाने की रिहर्सल में क्यों नहीं आ रही है, उसे वह गाना पसंद नहीं आया था, बहुत हल्का-फुल्का सा गीत है, पर और किसी को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आई. सच्चाई की राह पर अकेले ही चलना पड़ता है, इससे उसे ताकत ही मिलेगी.

आज से वह मुक्त है, कल स्कूल में सभी को होली की गुझिया खिलाकर विदा ली, मन ही मन वह सभी स्मरण किया जो पिछले कुछ दिनों से वहाँ घटा था. आज से अपनी उसी पुरानी दिनचर्या में लौट जाना है, स्वाध्याय, आसन, लेखन व संगीत !

कल भारत शारजाह में साउथ अफ्रीका से पहला मैच हार गया, शायद इस हार से कुछ सीख लेकर आज का मैच जीत जाये. ‘जागरण’ चल रहा है, अपने मूल स्वरूप को पहचानकर अंतहीन सुख के साम्राज्य को प सकने का उपदेश दे रहे हैं. संसार सारहीन है, नश्वर है लेकिन अपना आप जो चेतन है, नित्य है, अपरिवर्तन शील है. उसी चैतन्य को पाना ही जीवन का ध्येय है, ये बातें हर जगह सुनने को नहीं मिलतीं, लेकिन जीवन को सार्थक ढंग से जीने के लिए, अपने कर्त्तव्य का पालन करने के लिए, हृदय में सहनशीलता, त्याग व आत्म विसर्ग की उद्दात भावनाओं के स्फुरण के लिए इनको सुनते रहना अति आवश्यक है. ये मन को उहापोह से मुक्त रखती हैं, वहीं एकाग्र रखने में भी सहायक हैं. कल दोपहर उसने मध्यमा का कोर्स शुरू कर दिया है, अभी बहुत कुछ सीखना है. अध्यापिका को भी सिखाने का शौक है सो उसकी संगीत यात्रा अभी जारी रहेगी. कल बहुत दिनों के बाद माँ-पापा का पहले का सा पत्र मिला. छोटी बहन ने उस दिन फोन पर कविताओं के लिए कहा. अगली मीटिंग में क्लब में भी साहित्य का कार्यक्रम है उसने तीन कविताएँ चुनी हैं, यदि अवसर मिला तो पढ़ेगी.




Thursday, August 23, 2012

किताबों की दुनिया



सत्य, प्रिय, हितकर और दूसरे को उद्वेग न देने वाले वचनों को बोलना और स्वाध्याय वाणी का तप है. अभी भगवद् गीता के सत्रहवें अध्याय में यह श्लोक पढ़ा. पिछले कई दिनों से जब से उसने सुबह गीता पाठ में नियमितता बरती है उसकी वाणी कुछ कोमल होती जा रही है. जून को परेशान, दुखी करने वाले कई शब्द जो वह पहले हृदय हीनता का परिचय देती हुई कह जाती थी, कहीं विलीन हो गए. उसने फिर वही पुरानी दिनचर्या शुरू कर दी है, पहले स्नान, फिर पाठ, फिर डायरी और उसके बाद नन्हें का कार्य फिर भोजन बनाना. संभवतः आज सफाई कर्मचारी भी आये, पिछले हफ्ते बाढ़ के कारण नहीं आया. बाढ़ का प्रकोप अभी भी बना हुआ है, आज ही खबरों में सुना तेल का उत्पादन भी ठप है. कल इतवार शाम की फिल्म किरायेदार अच्छी थी और दोपहर की बंगला फिल्म फटिक चंद तो उससे भी अच्छी थी.

हफ्तों से घर से पत्र नहीं आया, पता नहीं क्या बात है. बल्कि कल छोटी बुआ का पत्र आया था, फूफाजी का स्वास्थ्य पहले से ठीक है. मौसम आज सुहाना है, पिछले हफ्ते उसे कॉमन कोल्ड हो गया था, कुछ करने का उत्साह नहीं था. जून ने उसी दिन दांत निकलवाया हा, उसे सूजन थी अब दोनों ठीक हैं.

वर्षा अभी भी हो रही है. ऐसा लगता है कि जब भी वह डायरी लेकर बैठी है वर्षा लगातार होती ही रही है. आज वे तिनसुकिया जायेंगे यदि तब तक मौसम ठीक हो गया. कल उसने हिमांशु श्रीवास्तव की किताब खत्म की, नई सुबह की धूप, अच्छी पुस्तक है, अब दूसरी पुस्तक निमाई भट्टाचार्य की मेमसाहब भी पढ़ेगी. बहुत दिनों पहले भी पढ़ी थी जब जून को पत्र लिखा करती थी, कुछ पंक्तियाँ उसमें से चुरा कर भी लिखी थीं. उसने सोचा देखें अब उन लाइनों का वैसा असर होता है यह नहीं. कल चित्रहार में साधना का नृत्य और यह गीत सुंदर था, ‘घेरे नजरें हसीं यानि तुम हो हसीं..’

कल वे तिनसुकिया गए थे, बाद में वर्षा थम गयी थी . अच्छा रहा ट्रिप, खूब खरीदारी की, वाल्मीकि रामायण, ओवन, कुकर, इडली स्टैंड, चप्पल तथा भुने हुए चने. शाम तक थकान हो गयी थी. आलू- गोभी की तहरी ही बनायी. आज अभी आठ बजने वाले हैं, नन्हा अभी सोया है, दस मिनट ही रामायण पाठ किया होगा कि घंटी बजी, स्वीपर आया था. एक दिन भी सफाई न हो तो घर कितना गंदा हो जाता है. सुबह रसोईघर साफ किया, कितनी चीटियाँ आ जाती हैं आजकल हर जगह. उन्होंने बैठक में एक शो केस कम बुक केस रखा है, कमरा कितना भर सा गया है, जून ने किताबें भी कितने करीने से लगायी हैं उसमें.