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Monday, November 2, 2015

महावीर के सूत्र


आज यूँ तो द्वादशी है पर कल वह भूल गयी सो आज उपवास है, उपवास यानि निकट बैठना, उसके निकट जो वे हैं, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है, यानि आत्मा, वही तो परमात्मा है. आज ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, विचार शून्य चेतनता का अनुभव काफी देर तक होता रहा, फिर मन ने कैसे-कैसे रूप गढ़े. गीलापन, तेल, स्वाद अभी कुछ ध्यान में कितना स्पष्ट अनुभव होता है, मोती, प्रकाश और भी न जाने क्या-क्या. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वे अपनी आत्मा को जानें यानि खुद को जानें. जिसके बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. वे सभी कुछ करते हैं पर भीतर से बिलकुल अछूते रहते हैं. सब नाटक सा लगता है कुछ भी असर नहीं करता. वे इन छोटी-छोटी बातों (संसार ही छोटा हो जाता है) से ऊपर उठ जाते हैं. जीना तब कितना सहज होता है, मन भी हल्का और तन भी हल्का, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना भी नहीं, कुछ जानना भी नहीं, कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं, खेल करना है बस, जगना, सोना, खाना-पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. वह परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था, अपने सबसे करीब हो जाता है, वही अब खुद की याद दिलाता है, वह जग जाता है जो जन्मों से सोया हुआ था. सद्गुरु की बातें अक्षरशः सही लगती हैं, शास्त्र सही घटित होते हुए लगते हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

आज ‘महावीर जयंती’ है, गुरूजी ने उस पर प्रकाश डालते हुए कहा, उन्हें आत्मलोचन करना है, उनके सिद्धांतों को व्यवहार में लाना है. अहिंसा को मनसा, वाचा, कर्मणा में अपनाना है. उन्हें संग्रह की भी एक सीमा बांधनी है, उनका मन यदि सजग हो प्रतिपल, तो चेतना की अनंत शक्तियों को पा सकता है. मन यदि पल भर के लिए भी विकार ग्रस्त होता है तो वह उस शक्ति से वंचित हो जाता है. चेतना का सूरज जगमगाता रहे इसके लिए प्रमाद के बादलों को बढ़ने से रोकना होगा, तंद्रा के धुंए से बचना होगा. जीवन थोड़ा सा ही शेष बचा है, हर व्यक्ति मृत्यु का परवाना साथ लेकर आता है, कुछ वर्षों का उसका जीवन यदि किसी अच्छे काम में लगता है तो ईश्वर के प्रति धन्यता प्रकट होती है. सद्गुरु कितनी सुंदर राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. साधक भटक न जाएँ इसलिए वह भीतर से कचोटते भी रहते हैं, वे मंजिल के करीब आ-आकर फिर भटक जाते हैं !

बल, बुद्धि, विद्या उन्हें श्री हनुमान से प्राप्त होते हैं तथा अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष राम से, इन सभी के साथ जब तक विवेक न हो तो यही सभी वरदान उनके लिए शाप भी बन सकते हैं. उसकी बुद्धि  में धैर्य नहीं है, उसके बल में विवेक की कमी है और उसकी विद्या में नम्रता नहीं है. नीरू माँ कहती हैं जो कोई रिकार्ड करके लाया है वही तो बोलेगा. नूना भाव शुद्ध करती है भीतर प्रण भी लेती है पर वे भीतर ही रह जाते हैं, बाहर निकलती है केवल एक उदासीनता, एक कटुता, एक खीझ और एक अतृप्ति. जो मन नाचता था, गाता था और खिला रहता था हर पल, वह किसी बाहरी प्रभाव के कारण ऐसा पीड़ित हो जायेगा, यह कहाँ पता था. पर इसके लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो वह स्वयं  है, यात्रा के दौरान तो साधना में खलल पड़ा ही, यहाँ लौटकर भी पहले की सी तीव्रता नहीं है, बल्कि मन को इधर-उधर के कामों में ही उलझाये रखा, मन तो छोटा बच्चा है और बुद्धि उसकी बड़ी बहन, पर दोनों का आधार तो आत्मा है, आत्मा यदि स्वस्थ हो, सबल हो, सजग हो तो इनमें से किसी के साथ तादात्म्य नहीं करेगी, अपनी गरीमा में रहेगी, उस गुंजन को सुनेगी जो रात-दिन भीतर हो रही है, उस ज्योति को देखेगी जो भीतर जल रही है.

तमोगुण की प्रधानता होने पर जीवन में रजोगुण व सतोगुण दब जाते हैं. हो सकता है यह उसके किसी पूर्व कर्म का फल हो अथवा पुरुषार्थ में कमी का अथवा तो सजगता की कमी हो, पर दुःख देने वाला यह तम रूपी विष उसकी इन्द्रियों को ताप दे रहा था. आज नीरू माँ ने कहा यदि जीवन में अभी भी दुःख है तो कोई आत्मा को जानता है, ऐसी बस उसकी मान्यता भर ही है. उसका स्वभाव यानि प्रकृति वैसी की वैसी ही बनी हुई है, सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है, अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर वह खोना नहीं  चाहती, उसका ‘स्व’ अत्यंत संकीर्ण है, आत्मा को जानने वाला तो उदार होता है, उल्लास उसका साथ कभी नहीं छोड़ता, वह कामनाओं से उपर उठा होता है. अपने भीतर झांक कर देखे तो कोई विशेष कामना नजर नहीं आती, सिवाय इसके कि..परमात्मा से उसकी भेंट हो जाये, पर उसके लिए तो हृदय को पवित्र करना होगा, राग-द्वेष से मुक्त होकर, छल-छिद्र और कपट से रहित होना होगा, वाणी को मधुर बनाना होगा, वाचा, मनसा, कर्मणा एक होना होगा, हृदय व बुद्धि का मिलन करना होगा. आज इस वक्त दोपहर के साढ़े बजे वह सद्गुरु और कान्हा की उपस्थिति में स्वयं से वादा करती है कि सजगता के साथ हर कार्य करेगी. तमोगुण का अर्थ ही है बेहोशी, प्रमाद. उसे सत्वगुण के भी पार जाना है, उसकी डायरी में नीचे लिखी सूक्ति में गाँधी जी भी यही कह रहे हैं जब किसी के मन, वाणी तथा कर्म में साम्य होगा, तभी वह प्रसन्न होगा !
 


   

Wednesday, April 1, 2015

तहरी का स्वाद


उसे लगता है क्रोध व्यक्तित्व को मिटा देता है, इच्छा अपने इशारों पर नचाती है और मोह विवेकहीन कर देता है. अपना आपा भूल जाएँ तो ऐसे शब्द निकल आते हैं जिनपर बाद में पछताना पड़ता है. एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सिर उठा लेती है और मोह भय का कारण बनता है. जीवन की धारा तभी बदल सकती है जब यह ज्ञान हो कि देह साधन रूप में मिला है. मुस्कुराते, गुनगुनाते तथा सबके भीतर तरंग पैदा करते हुए जीना होगा. मन का स्नेह, बुद्धि का विचार और आत्मा का आनंद सभी तो परमात्मा का दिया हुआ है. जो मिला है वह कभी भी छूट सकता है. जब तक देह में बल है तब तक इसकी कद्र करनी है. मन की सौम्यता को बनाये रखना है. ईश्वर हर क्षण साक्षी रूप से साथ है, अल्प बुद्धि से वे अल्प ही तो सोचेंगे. उसके साथ योग लगा रहेगा तो बुद्धि मार्ग पर रहेगी. मन एकदम हल्का हो जाये, पारदर्शी.. तो उसकी झलक अपने आप ही दिखायी देगी.

आज अमावस्या है, यानि उसके उपवास का दिन. सही मायनों में उपवास तो तभी होगा जब मन दिन भर भगवद् भाव से परिपूर्ण रहे. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में वे उठे. ‘क्रिया’ की और सत्संग सुना. संतों की वाणी सुनकर मन भाव विभोर हो गया है. भगवद् प्रेम की एक बूंद भी मन को भरने के लिए पर्याप्त है, वही मन जो संसार भर की वस्तुएं पाकर भी अतृप्त ही रहता है, ईश प्रेम के रस में पूर्ण हो जाता है. वह जो इस सृष्टि का स्रोत है, उसे प्रिय है. उसका स्मरण ही उसे सारे दुखों से दूर ले जाता है.

आज दीदी का फोन आया. उन्हें व बुआजी को पत्र मिल गये हैं यानि दो के जवाब उसे मिल गये. आज सुबह वे देर से उठे. कल सत्संग से आयी तो जून ने खाना ( तहरी)  बना लिया था. खाते-खाते थोड़ी देर हुई. कल योग अध्यापक भी आये थे. उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित बहुत अच्छे कुछ नये भजन गाए. इसी माह एक दिन विश्व शांति दिवस है, गुरूजी ने उस दिन शाम को साढ़े चार बजे सभी को अपने अपने सेंटर पर सत्संग करने को कहा है. इससे सब ओर शांति का संदेश फैलेगा, उनका भी योगदान उसमें रहेगा. आध्यात्मिकता का एक बड़ा उद्देश्य है लोकसंग्रह, यानि सेवा, दूसरों के जीवन में यदि कोई ख़ुशी का संचार कर सके, तो समाज के ऋण से कुछ तो मुक्त हो सकता है. एक व्यक्ति अपने लिए समाज से कितना कुछ लेता है यदि उसका शतांश भी लौटा सके तो समाज का कितना भला होगा. आज सुबह उसने सुना साधना के लिए पहला गुण है पवित्रता, अर्थात मन कभी कपट का आश्रय न ले, प्रमादी न हो. भक्ति मार्ग सरल कर देती है. कल शाम उन्होंने कृष्ण के कई भजन गाए, अच्छा लगता है उसके नाम का उच्चारण ! वह अति निकट है, इतना निकट,...इतना निकट कि दरम्यान से गुजर सके न हवा !


आज सुबह ध्यान में कृष्ण की अनुभूति हुई, जैसे वह उसके प्रश्नों को सुन रहे थे और जवाब दे रहे थे. ऐसा होता है कि कुछ दिन उसका हृदय, मन, बुद्धि पूरी तरह उसे अपनी धारणा का विषय बना लेते हैं और फिर अपने आप ही कभी-कभी वह दूर चला  जाता है. करने से कुछ नहीं होता. ‘थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई’ वह अपने आप ही हृदय में आकर दस्तक देता है. लेकिन इतना तो निश्चित है कि एक बार उसे चाहने की कला आ जाये वह उन्हें कभी छोड़कर नहीं जा सकता. वह भी उतना ही अपना लेता है. आज शनिवार है उसकी संगीत कक्षा का दिन, वर्षा कल रात से ही हो रही है. नन्हा स्कूल गया है, आज वह अपना प्रोजेक्ट ले गया है. उसे आराम-आराम से अपना काम करना पसंद है. जून की तरह जल्दबाजी उसके स्वभाव में नहीं है और यह भी कि जितना जरूरी हो उतना ही काम किया जाये, व्यर्थ ही अपने ऊपर बोझा लादना भी उसे पसंद नहीं, यह मानसिक स्थिरता की निशानी है. ईश्वर उसे सद्बुद्धि भी दे और वह सफलता प्राप्त करे. 

Thursday, March 26, 2015

गुरू पूर्णिमा का चाँद


गुरू पूर्णिमा’ में कुछ ही दिन शेष हैं. उस दिन वह उपवास व मौन व्रत भी रखने का विचार रखती है. गुरू से उसका मानसिक सम्पर्क बना हुआ है इसका आभास कल दोपहर को हुआ जब हृदय में से उसके नाम का उच्चारण स्पष्ट सुनाई पड़ा. वह दर्द में थी उस पीड़ा में गुरू की आवाज जैसे मरहम लगाती हुई आयी. बहुत अच्छा लगा. वासनाएं मिटती जा रही हैं, क्रोध आने से पूर्व ही शांत होने लगा है. जाने कौन आकर समझा जाता है, जो कहने वाली थी वह न कहकर कुछ ऐसा कहती है जो प्रेम को दर्शाता है, अर्थात प्रेम की पकड़ क्रोध से ज्यादा हो गयी है. सभी के प्रति बस एक ही भाव उसे अपने हृदय में दिखायी पड़ता है, प्रेम और स्नेह का भाव. सभी उस परमात्मा के ही तो हैं जिसे वह इतना चाहती है. कभी-कभी दोनों आँखें भर जाती हैं. आँसू बहते हैं पर इनमें भी कैसी प्रसन्नता है. वह कृष्ण भी जैसे उसका साथ पसंद करने लगा है. वह उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता. उस कृष्ण के नाम के साथ भाव की हिलोरें उठती हैं. समझ नहीं आता कौन ज्यादा प्रिय है सद्गुरु या कान्हा. कभी लगता है दोनों एक ही हैं और वह अपना मन उन्हें अर्पित कर देती है. her ordinary mind merges with their wisdom mind.

आज जागरण में ‘श्रद्धा’  के बारे में सुना. श्रद्धा जितनी दृढ होगी सात्विक भाव भी उतना ही दृढ़ होगा. आज सुबह वे उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी धूप न होते हुए भी उमस युक्त गर्मी है, पर उनकी सुबह ‘योग’ से होती है, ऐसे में मौसम की प्रतिकूलता या अनुकूलता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता. ईश्वर ने, उसके कान्हा ने भी तो कहा है कि शीत-उष्ण, सुख-दुःख सभी में समान भाव से रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहना होगा. सुख बाहरी परिस्थितयों पर नहीं बल्कि उनके सच्चे स्वरूप पर निर्भर करता है जो सदा एक सा है, आकाश के समान मुक्त, विक्षेप रहित !

आज गुरू पूर्णिमा है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. स्नान-ध्यान किया फिर नन्हे और उसके मित्र के लिए नाश्ता बनाया. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी The Gospel of Buddha पढ़ रही है. शाम को aol के फॉलो अप में जाना है. कल शाम को मन उद्ग्विन था, ध्यान किया सोने से पूर्व. काफी समय बाद लगा कि अब सो जाना चाहिए. मन एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करता है उसे उसी तरह मनाना, पुचकारना और कभी-कभी फटकारना भी पड़ता है. गुरुमाँ कहती हैं जिसके विचारों की श्रंखला टूट गयी है वही मुक्त है, सो वह हर क्षण मन पर नजर रखती है कि कहीं कोई बिन बुलाये मेहमान सा अनचाहा विचार तो प्रवेश नहीं कर रहा. उसे क्षण भर देखें तो जैसे समुन्दर में लहर स्वयं शांत हो जाती है वह विचार स्वयं समाप्त हो जाता है. पर देखना पड़ेगा अन्यथा पता ही नहीं चलता और एक से दूसरा शुरू होते होते श्रंखला सी बन जाती है. आज सुबह पिताजी व छोटी बहन से बात की, जो आजकल मुम्बई में है. पिता ने कहा राखियाँ अच्छी बनी होंगी. उसके लिए तो वह अध्याय समाप्त हो गया है. सिर्फ यह क्षण यानि वर्तमान का क्षण जीवित है. जो छूट गया वह चला गया और अब मृत प्रायः है. उन्हें हर क्षण को अंतिम क्षण मानकर जीना आ जाये तो मन क्यों अतीत व भविष्य के चक्कर लगाए. यही बुद्ध कहते हैं, यही योग वसिष्ठ में कहा गया है यही श्री श्री कहते हैं.




Thursday, December 11, 2014

यात्रा का आरम्भ


आज की सुबह की शुरुआत सामान्य हुई, सुबह ही संगीत कक्षा में जाना था. लौटी तो साधना शुरू की, दो फोन आये, बीच में उठकर जाना पड़ा. अब उन्होंने तय किया है शनिवार को शाम चार बजे वे साधना करेंगे, जैसे इतवार को वे दो मित्रों के साथ करते हैं. अज सुना था, जिसका प्रत्येक कर्म ईश्वर को समर्पित है, वह हर क्षण उससे जुड़ा है लेकिन उनका हर कर्म प्रभु के लिए कहाँ हो पाता है, अपनी ख़ुशी के ही लिए वे कर्म करते हैं. उसे लगता है, उसके फल की प्राप्ति में सम रहना ही कर्म ईश्वर को अर्पित करना है. मानव को अपनी अयोग्यता के विषय में ज्ञान उतना नहीं होता जितना योग्यता के बारे में वह सचेत रहता है, बल्कि वास्तविकता से कहीं ज्यादा ही सोचता है. अपने अवगुणों के प्रति सजग रहना ही उन्हें निकालने की ओर पहला कदम है. सही-गलत व उचित-अनुचित का भेद करना इतना सहज नहीं है लेकिन धर्म का तत्व तर्क-वितर्क करके प्राप्त नहीं किया जा सकता. यह तो महापुरुषों का अनुसरण करने से ही मिलता है.

आज उपवास का दिन है, यह विचार स्वास्थ्य की दृष्टि से ही उसे आया था पर इस समय लग रहा है ईश्वर ने ही उसे यह प्रेरणा दी होगी. वैसे भी कोई भी कार्य अकारण नहीं होता, अदृष्ट का हाथ तो इसमें रहता ही है. टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है, जनक राजा होते हुए भी विदेह भाव में रहते थे, उनको छूकर गयी हवा ने पीड़ितों के दुखों को कम कर दिया तो वे नर्क में आकर रहने को भी तैयार हो गये. लोक कल्याण की भावना की पराकाष्ठा थी यह, उन्हें भी अपने जीवन में पहले स्वयं को उन्नत करना है फिर अपनी शक्ति का उपयोग अपने इर्दगिर्द की उन्नति में लगाना है. परसों उसकी यात्रा का शुभारम्भ है, तीन दिनों की यह यात्रा सम्भवतः उसके जीवन में एक सुखद मोड़ साबित होगी !

“मानव जन्म सर्वोत्तम है, मानव ऊँचाई के शिखर पर पहुंच सकता है. मानव ही ब्रह्म को जान सकता है. वह अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, वह ज्योतियों की ज्योति है. वह अज्ञान के अंधकार से दूर जा सकता है. जो उसका आत्मा है वह सुख के केंद्र है मानव आसुरी तथा दैवीय अंश का सम्मिश्रण है. जब कोई आत्मा के निकटतर होता है, दैवीय अंश उसमें प्रमुख रूप से प्रकट होता है”. आज उपरोक्त बातें ‘जागरण’ में सुनीं. इस समय दोपहर के पौने तीन बजे हैं, उसकी तैयारी सम्पन्न हो चुकी है. एक बैग तथा एक छोटी से अटैची. मन में उत्साह है, यात्रा का उद्देश्य बहुत पवित्र है. सद्गुरु के दर्शन होंगे, सद्गुरु जो ईश्वर का प्रतिनिधि है. आजकल ध्यान में अति आनंद आता है, मन अद्भुत शांति से भर जाता है. अगले तीन दिन यह डायरी उसके पास नहीं रहेगी लेकिन दूसरी छोटी डायरी में गोहाटी के अनुभव जरूर लिखेगी. शाम को एक मित्र परिवार आएगा, उनका नया बुककेस देखने. बैठक में थोड़े फूल लगाने हैं और नाश्ता तैयार करना है. शाम को किसी वक्त एक और सखी का फोन भी आएगा. कल नन्हे की अंतिम  परीक्षा थी. उनका कम्प्यूटर अपने आप ही ठीक हो गया जैसे उस दिन खराब हुआ था. ईश्वर उसकी पुकार सुनते हैं.  



Tuesday, August 6, 2013

आर्मी कैंटीन


अभी कुछ देर पहले ही एक सखी का फोन आया, कल दोपहर को उसने ‘मौन व्रत’ रखा था, सो फोन नहीं उठाया. उसने सोचा गाँधी जी की आत्मकथा में उपवास और मौन के बारे में पढ़ेगी. आज धूप तेज है जो उनके नये लगाये भिंडी और मकई के बीजों के लिए अच्छी है. इस समय उसका मन कैसे एक बात से दूसरी बात पर जा रहा है. आज पीटीवी पर एक मजाहिया ड्रामा भी देखा कुछ देर, कैसे दोनों पति-पत्नी एक दूसरे की मौत का इंतजार करते-करते एक दूसरे की फ़िक्र करने लग जाते हैं. अचानक उसे ख्याल आया बरसों बाद जब जून और वह रिटायरमेंट के बाद जीवन बिता रहे होंगे तो यह सब पढकर हँसेंगे, पर कुछ भी हो, कुछ तो मिलता ही है...घास की नोक पर ओस की बूंद सा सुख का अहसास या सुकून !

कल घर से पत्र आया, माँ ने लिखा है, शायद उसने अपनी पत्र लिखने की आदत छोड़ दी है, लो..और इधर वह उनका पत्र न मिलने से परेशान थी. यानि उन्हें भी पत्र समय पर नहीं मिल रहे हैं. आज बहुत दिनों बाद शाम से ही बादल घिर आये हैं, सुबह ही उसने उड़द दाल की बड़ी बनाई थी, हर साल की तरह किचन में ही सुखानी पड़ेगी. जून अभी क्लब से नहीं आए हैं, नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है और वह अभी अभी पीटीवी पर यह सुनकर आ रही है कि इन्सान जिस तरह झाड़ियों से अपना दामन बचाकर निकलता है, वैसे ही संसार में रहते हुए संसार के गुनाहों से बचकर निकल जाना चाहिए. बुराइयाँ बुराई का रूप धरकर नहीं आतीं, वह रूप बदल कर आकर्षित करती हुई आती हैं, और लोग उनके वश में हो जाते हैं, उनसे बचना तभी सम्भव है जब हर वक्त  अल्लाह की मौजूदगी का अहसास होता रहे. अध्यात्मिक उन्नति करने के लिये पहले नैतिक बनना होगा. हर क्षण इस तरह बिताना कि पवित्रता का अहसास हो न कि अपराध बोध का. उसे महसूस हुआ की सारे धर्म एक ही बात कहते हैं.

आज सुबह वह नहाकर ‘एक योगी की आत्मकथा’ पढ़ने बैठी ही थी, फोन की घंटी बजी, अभिमान जगा और मन ने कहा उसी सखी का फोन होगा जिसने उसका फोन नहीं उठाया था, वह भी तो पाठ कर रही है, पर पांच मिनट बाद फिर घंटी बजी, उसी का था, अपने साथ आर्मी कैंटीन ले जाना चाहती थी, वे गये और उसने ढेर सारा सामान खरीदा, उसे भी ख़ुशी का इजहार करते हुए एकाध सामान खरीदना पड़ा और समय तो गया ही, इसी कारण घर में सफाई नहीं हो पायी. एक सखी के कहने पर उसने ढेर सारे मटर छिलवा कर फ्रिज में रखवाए हैं. इस उम्मीद में कि अब उन्हें गर्मी के मौसम में भी मटर-पुलाव व मटर-पनीर खाने को मिल सकेगा. इन्सान जन्मजात संग्रही होता है, अगले क्षण का भरोसा नहीं पर अगले महीनों, सालों के लिए जुगाड़ कर लेता है. मानसिक शांति व स्थिरता भंग करने वाले कारणों में एक यह संचयी प्रवृत्ति भी है.

हवा चलेगी तो मेरी खुशबू बहेगी
पाकिस्तान की शायरा से गुफ्तगू उसे पसंद आई और यह है उनकी गजल-

छुपा हुआ मेरा घर इस्तराब रहने दो
कि कर चुके हो बहुत अभी बात रहने दो

सफर का साथ है यह मंजिलों का साथ नहीं
गुजर ही जायेंगे लम्हे हिसाब रहने दो

शिकस्ता करके इन्हें फासले बढ़ा दोगे
सजे हुए मेरे हाथों में ख्वाब रहने दो

और इसके आगे चंद अश्यार उसके खुद के कुछ इस तरह हैं-

इकतरफा ही सही सिलसिला जारी रहे
जगह दो दिल में खत का जवाब रहने दो

सूखे हुए पत्तों को धीमे से रख वर्कों में
 घर के किसी कोने में किताब रहने दो

बरसों से उजड़े इस वीरान चमन से

 काट दो जंगल जंगली गुलाब रहने दो 

Friday, February 15, 2013

साइकिल की सवारी



कल सुबह से लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, दोपहर को उपवास किया, फिर शाम को टिफिन में उबले आलू खा लिए कि कुछ तो खा लेना चाहिए और खेलने चली गयी, खाली पेट में आलू वात बढ़ाते हैं, यह पता ही नहीं था, गैस सिर पर चढ़ गयी और दर्द से फटने लगा अच्छा भला सिर. घर आकर वमन किया फिर एक घंटा आराम और तब जाकर सब ठीक हुआ. पूरे वक्त जून के साथ नन्हा उसका बहुत ख्याल रख रहा था. उसको हिंदी में पूरे नम्बर मिले हैं, अगले हफ्ते उसे हिंदी में समाचार बोलने हैं स्कूल की असेम्बली में. उन्हें साथ वाले घर में हो रही शादी में जाना था, जल्दी ही लौट आए वे. वहाँ का प्रबंध बहुत अच्छा था, न ज्यादा शोर न भीड़भाड़, दुल्हन बहुत छोटी लग रही थी बहुत सुंदर. कल उसका फैब्रिक पेंटिंग का काम पूर्ण हो गया, आज दोपहर को पहले पत्रिका पढ़ेगी, फिर न्यूजट्रैक का कैसेट देखेगी फिर थर्मोकोल पर काम शुरू करेगी वह. कल शाम जून ने बहुत दिनों के बाद कहा कि वह हरी साड़ी में अच्छी लग रही थी, उन्हें शिकायत थी कि वह सिर्फ कहीं जाने के लिए ही क्यों तैयार होती है, इसका अर्थ हुआ कि वह उसकी पोशाक आदि पर नजर रखते हैं.

“आदमी अगर जिन्दा रहे तो उसे सौ साल बाद भी खुशी मिल सकती है”, अभी-अभी बाल्मीकि रामायण में हनुमान के मिलने पर सीता के मुख से यह वाक्य पढा. यह बिलकुल ठीक है, हम थोड़ी सी परेशानी होने पर जीवन को व्यर्थ मानने लगते हैं लेकिन कहीं न कहीं खुशी होती है, जो हमें मिलने वाली है. जैसे आज वे खुश हैं, कल उसने गाजर का हलवा बनाया, लाल गाजरें यहाँ नहीं मिलती, नारंगी रंग का हलवा कुछ अलग सा लगता है. उन्होंने किचन में पेंट करवाया था, नई नैनी ने सूखने की प्रतीक्षा लिए बिना पानी डाल दिया, सारा पेंट उतर गया पर..अब इसे कुछ कहने से क्या लाभ. नन्हे के स्कूल जाना है, जून ने फोन पर कहा था, उसको क्लास कैप्टन ने कल मारा था, शाम को वह थोड़ा उदास था, पर सुबह बिलकुल ठीक था. फरवरी का आरम्भ हो गया है, आदर्श महीना है, न सर्दी न गर्मी..यानि वसंत का महीना. कल उसकी पड़ोसिन ने गुलाब की एक कटिंग दी, पीला, लाल व नारंगी रंग का मिलाजुला रंग है उसका, माली ने शाम को लगा दी थी, इस मौसम में तो शायद ही खिले लेकिन अगले मौसम में जरूर फूल आयेगा. कल की तरह आज भी उसने साड़ी पहनी है, अच्छा लगता है हल्का-हल्का, खुला-खुला सा. जून को पसंद भी है, और उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं इसका तो ख्याल उसे रखना है न...और इससे उसे खुशी मिलती है, और खुशी इंसान की पहली जरूरत है.

आज नैनी जल्दी आ गयी है, खाना भी बन गया है, इसका अर्थ गाड़ी पटरी पर आ रही है, पिछले दिनों ग्यारह बज जाते थे और काम बिखरा रह जाता था. कल वे स्कूल गए थे, नन्हे की क्लास टीचर और साइंस टीचर से मिले. आज सुबह नन्हा बहुत अच्छे मूड में था, खिला- खिला और ताजा सा. टेप रिकार्डर पर ‘मिली’ फिल्म का गाना आ रहा है, छोटे भाई का उपहार उनकी शादी की सालगिरह पर. कल भी परसों की तरह उसने साइकिल चलाई, बहुत अच्छा लगता है हवा को काटते हुए गति से आगे बढ़ना. लगभग दस सालों के बाद वह साइकिल चला रही है. कितना अजीब लगता है सोचकर कि बचपन कितना पीछे छूट गया है. याद करो तो लगता है कल की ही तो बात है. नन्हा कल पिछले या उससे पिछले साल की गर्मियों को याद कर रहा था कि कैसे एक आम के लिए वह गुस्सा कर रही थी, फिर जून और भी नाराज हो गए थे, उसकी याददाश्त बहुत तेज है. उसे कहानी सुनाने की प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार मिला, उदास था कि प्रथम क्यों नहीं मिला.