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Wednesday, July 1, 2020

ट्रांसिडेंटल मैडिटेशन


जगत के प्रति राग-द्वेष जब कम हो जाता है तो उसकी स्मृति मन में नहीं आती. वह जैसे विलुप्त हो जाता है. ‘नई दृष्टि नई राह’ में अद्भुत ज्ञान सूत्र मिलते हैं. वे जितना-जितना समता में रहते हैं, आत्मा की शक्ति बढ़ती जाती है. शाम के पांच बजने वाले हैं. आज भजन का दिन है. सुबह गुरूजी को औरंगाबाद में कहते सुना, जीवन में गान, ध्यान और ज्ञान तीनों होने चाहिए. जून ने आज से मन्त्र जप शुरू किया है, ध्यान भी करेंगे और ज्ञान भी सुनेंगे. कुछ देर पूर्व वे लॉन में टहल रहे थे. ग्लैडियोली के फूल खिले हैं, डायन्थस, पॉपी आदि तो हैं. जरबेरा, गेंदा भी खूब खिल रहे हैं. सुबह सुबह को-ऑपरेटिव गयी, सभी ‘ज़ी न्यूज़’ पर मोदी का भाषण सुनने में तल्लीन थे. अभी टीवी पर सुना, मोदीजी कांग्रेस के खिलाफ बोल रहे हैं. चुनाव का वर्ष है, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगने व लगाने स्वाभाविक हैं. 

कल सुबह-सुबह जून को एयर पोर्ट जाना है. फ्लाइट दोपहर ढाई बजे है पर बंद( ताई अहोम द्वार) के कारण सुबह तीन बजे ही निकल जाना होगा. कल मोदी जी गोहाटी आ रहे हैं उनका विरोध करने के लिए ही इस बन्द का आयोजन किया गया है. जब कि वह एम्स की नींव रखेंगे, नुमालीगढ़ में बायो रिफाइनरी का शिलान्यास और ब्रह्मपुत्र पर एक सड़क पुल का भी. वह त्रिपुरा भी जा रहे हैं. वर्षों बाद भारत को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो देश के विकास के लिए दिन-रात एक कर रहा है. आज शाम को गुरूजी की किताब से कुछ वाक्य पढ़े तो सभी साधिकाओं के भीतर कोई न कोई विचार जाग उठा. वह ठीक कहते हैं , प्रेम जगत को गतिशील करता है. 

जून रात को दो बजे ही उठ गए, तीन बजे निकल गए. अभी भी एयरपोर्ट पर ही होंगे. प्रधानमंत्री कल पेट्रोटेक का उद्घाटन करेंगे, उस कार्यक्रम में भी शायद वह शामिल हो पाएं. इस समय चांगसारी में पीएम की रैली हो रही है. भीड़ बहुत ज्यादा है. उन्होंने कहा, कल गोहाटी से निकलने वाले अख़बारों में इसकी कोई खबर नहीं होगी, एक क्षण के लिए उनके स्वर में उदासी दिखी. पर अव वह असम के महापुरुषों को याद कर रहे हैं. उगते हुए सूरज की भूमि अरुणाचल में आज उनकी यात्रा हो रही है. हर राज्य की तरह यहाँ भी कई योजनाओं की घोषणा हुई. बीजेपी देश की संस्कृति को बढ़ावा देती है.. एक नए टीवी चैनल की भी शुरुआत हुई. ‘बच्चों की पढ़ाई, युवा को कमाई, वृद्धों को दवाई, किसान को सिंचाई, जन-जन की सुनवाई’ इस पंच धारा विकास को बढ़ावा देती है यह सरकार. कल सरस्वती पूजा है, नैनी ने आज सरस्वती माँ की तस्वीर को ढक कर रख दिया है. कल वह मृणाल ज्योति में पूजा के बाद दोपहर को खिचड़ी आदि का प्रसाद बनाकर घर पर भी पूजा करेगी. नन्हे से बात हुई, कल वे लोग नए घर जायेंगे.  

उस डायरी में पढ़ा, जाग्रत, स्वप्न और सुष्पति, तीन अवस्थाओं से ऊपर चौथी अवस्था में पहुँचना ध्यान है. मन को केंद्रित नहीं करना है न कोई प्रयत्न करना है, केवल मन्त्र को दोहराना है और शांत हो जाना है. उसे आश्चर्य हुआ,  कालेज में भी भावातीत ध्यान यानि ट्रांसिडेंटल मेडिटेशन की बात सुनी थी, पर तब इसका अर्थ जरा भी समझ नहीं आया होगा. अवश्य ही इसने अनजाने में नई दिशा और नई आशा प्रदान की होगी, इस पर चलने का समय अभी बहुत आगे था. 

उसे एक पत्र की प्रतीक्षा थी पर नहीं आया, सारी गड़बड़ डाक विभाग की है, है न ! वह सोचती है नम्रता बड़ी चीज है पर उसका स्वभाव ही ऐसा नहीं है. शायद अब पता नहीं क्यों मन पर एक किलो का बोझ लादा हुआ है, समाधान उपेक्षा से नहीं होगा, उतारना ही होगा, पर किस तरह यह स्पष्ट नहीं. (उस समय गुरु जो नहीं मिले थे) धर्मयुग में देश की वास्तविक आर्थिक स्थित पर लेख पढ़ा था दोपहर को, पढ़ती चली गयी. हे भगवान ! कितने कितने हथकंडे अपनाते हैं व्यापारी और सरकार का प्रोत्साहन ही उन्हें मिलता है. कंट्रोल का लाभ व्यापारियों को, नुकसान तो जनता को ही है. दिनमान भी पढ़नी है अभी. कालेज में एक सखी दिखी, एमजीआर उसने अनदेखा कर दिया, शायद जानबूझ कर, शायद वह समझती है उसके अनुत्तीर्ण हो जाने पर अब वह उसकी सखी नहीं है. एक अन्य सखी मिली बेहद खुश... नवविवाहिता का श्रृंगार नहीं पर स्वाभाविक प्रसन्नता जरूर दिखाई दी उसके चेहरे पर. अर अब यह की स्मृतियाँ मन में ही रहें, वहीं सुरक्षित हैं, कागज के पन्ने पर स्मृतियाँ नहीं रखी जा सकतीं. 

Wednesday, September 13, 2017

समता की चट्टान


रात्रि के आठ बजने को हैं. एक दिन और साक्षी भाव में बीत गया. सुबह समय से उठी, गला अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं है, बायीं तरफ के निचले दांत में दर्द है, पर लगता है ये सब किसी और को हैं. मन भी जैसे दूर खो गया लगता है, भीतर बस एक गहन मौन है. उम्मीद है अगले एकाध दिन में स्वास्थ्य पूर्ववत हो जायेगा. मन में एक विचार आता है, कोर्स के दौरान अन्यों को खांसते जो विरोध का भाव मन में जगाया था, वह सही नहीं था. शायद उसी का परिणाम हो, साक्षी में रहना होगा. देखकर सुबह ब्लॉग पर एक कविता पोस्ट की, कुछ अन्य पढ़ने का अब मन नहीं होता. जीवन में एक बिलकुल ही नया मोड़ आया है.  दोपहर को धम्मा रेडियो खोलकर कुछ सुनना चाहा तो हर्मन हेस के उपन्यास सिद्धार्थ की बात ही सुनाई दी. पुस्तक का नायक वासुदेव एक नदी को देखकर अपने मन के रहस्यों का पता लगा लेता है. मन भी हर वक्त एक नदी की तरह बहता जाता है. नदी की तरह कितने मौसम बदलते हैं मन के. मन का आधार वे संस्कार हैं जो हर पल लहरों की तरह बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है, वह इससे प्रभावित नहीं होता. कल मृणाल ज्योति गयी थी, कमेटी में वर्किंग प्रेसिडेंट का काम देखना होगा. पहले सा ही काम होगा, बस कुछेक जगह हस्ताक्षर करने होंगे.

आज सुबह जून से कहा, डाक्टर को दिखा लेते हैं. अस्पताल गयी, दोएक दवाएं दी हैं. अब शाम हो गयी है, पर जून को किसी कार्यवश दफ्तर जाना पड़ा है. आजकल वह उसका बहुत ध्यान रखने लगे हैं, उन्होंने उसके भीतर आए परिवर्तन को देखा है और उसने भी उनके भीतर आए परिवर्तन को. उनके मध्य आत्मिक मैत्री की एक मधुर रसधार बहने लगी है. वे एक-दूसरे के साथ उतने ही सहज रहते हैं जैसे अपने साथ. आज सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी, इस वक्त भी बादल गरज रहे हैं. सुबह एक स्वप्न में देखा जून और वह बिना छाता लिए तेज वर्षा में एक लम्बी सड़क पर चल रहे हैं, आगे जाकर अँधेरा होने लगता है पर वे रुकते नहीं, फिर पता नहीं कब स्वप्न टूट गया. उसकी आध्यात्मिक यात्रा एक पड़ाव पर आकर रुक सी गयी लग रही है, पर अभी और आगे जाना है, मंजिलें और भी हैं. अपने भीतर जगी इस अनोखी शांति को परिपक्व होने देना है. जीवन को एक उत्सव बनाना है, जीवन की पूर्णता को प्राप्त करना है. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, वही तो है. उसकी स्मृति, उसका ख्याल नहीं वही साक्षात् ! जीवन की पूर्णता का अनुभव यही तो है, जीवन का उत्सव भी यही है. चित्त की निर्मलता ही साधना का लक्ष्य है, कोई अनुभव कितना भी सुंदर क्यों न हो, समाप्त हो जाता है पर भीतर की समता एक चट्टान की तरह अडिग रहती है.


आज भी वर्षा हो रही है, सुबह-शाम दोनों वक्त बरामदे में ही टहलना पड़ा, कुछ देर के लिए लॉन और ड्राइव वे पर निकले पर रह-रह कर बूंदे बरसती रहीं और कुछ ही मिनटों में वापस आना पड़ा. फरवरी का मौसम असम में ऐसा ही होता है, शाम होते ही बादल गरजने लगते हैं और..उसका मन एक अतीव मौन में डूबा हुआ है. अभी तक देह अस्वस्थ है पर वह उससे प्रभावित नहीं है, देह और मन से दूरी बढ़ती जा रही है. उस अनाम की उपस्थिति का अहसास गहराता जा रहा है. लगता है अब कुछ भी पाने को या जानने को शेष नहीं रहा है, जीवन आगे बढ़ने का नाम अवश्य है पर अब आगे बढ़ना गहराई में डूबना होगा अथवा ऊँचाई पर चढ़ना, न कि किसी राह पर आगे बढ़ना. सारा विश्व जैसे एक सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र उससे होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा. यह देह एक दिन गिर जाएगी, फिर भी यह चेतना तो रहेगी ही. आज सुबह ध्यान में बैठी तो किसी विधि का आश्रय नहीं लिया, परमात्मा चारों ओर है, बस उसे सीधे ही अनुभव करना है. अब सारी विधियाँ बेमानी हो गयी हैं, जैसे अब किसी शास्त्र को पढ़ने की भी आवश्यकता भी महसूस नहीं होती. मन उस नितांत मौन में डूबे रहना चाहता है जहाँ कभी-कभी एकांत को तोड़ने एक पक्षी की दूर से आती आवाज सुनाई देती है. ईश्वर ही उसके जीवन के आगे के मार्ग का निर्धारण करेंगे. संवेदनाओं के द्वारा भीतर राग-द्वेष जगाने के दिन समाप्त हुए, अब साक्षी भाव ही सध रहा है. समता भाव ही योग है, कृष्ण ने भी कहा है.    

Tuesday, February 21, 2017

शांति का साम्राज्य


फिर तीन दिनों का अन्तराल ! कल एक पुरानी डायरी पढ़ी, नन्हा तब छह महीने का था, तब से अब तक कितना वक्त गुजर गया है लेकिन भीतर भीतर कुछ ऐसा है जो जरा भी नहीं बदला. कल से माँ का इलाज पुनः शुरू हुआ है, डिब्रूगढ़ से एक आर्थोपेडिक्स आए थे, उन्होंने ही कई सुझाव दिए. सुबह से मन स्थिर नहीं है, साक्षी भाव से देख तो रही है पर भीतर विचार हैं. कल शाम को एक सखी की जन्मदिन की पार्टी में गरिष्ठ भोजन किया फिर घर आकर टीवी देखा, ऊलजलूल डायलॉग सुने, शिवानी को नहीं सुना, फिर छोटी बहन के लिए कविता लिखने का प्रयास किया.

कल शाम जून बहुत दिनों बाद उदास हुए और उसके भीतर भी हलचल मच गयी. अब एक बूंद भर भी असहजता नहीं सही जाती, भीतर शांति का एक साम्राज्य बनता जा रहा है जिसपर अशांति का एक कण भी ठहर नहीं सकता. आत्मवत् सबको देखने का यह परिणाम होता है, समानुभूति का यह परिणाम होता है, उनके कारण इस ब्रह्मांड में किसी को भी दुःख न पहुंचे, पहुँचेगा तो पहले उन्हें भी कष्ट देगा. अपने ही बचाव के लिए उन्हें सदा मधुर वचन बोलने चाहिए. मानव स्वयं ही अपनी आत्मा पर दाग लगाता है, शरीर को रुग्ण करता है.

आज केवल ‘वही’ है, ‘उसका’ कहीं पता नहीं है, व्यर्थ ही इतना बोझ सिर पर डाला हुआ था. अभी-अभी जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए कुछ लिखने का अनुरोध आया है. वह अपनी कुछ कविताएँ ही देगी, जो किसी भावपूर्ण क्षण में लिखी गयी थीं. यह देखो, ‘वह’ तो पुनः जिन्दा हो गया, पुराने संस्कार जाते-जाते ही जायेंगे. सफाई का कार्य चल रहा है. ड्राइंग व डाइनिंग रूम में आज पेंटिंग होगी, कल तक सभी काम पूरा हो जायेगा. जीवन की पहेली आज सुलझती हुई नजर आ रही है. जब तक वे हैं तब तक परमात्मा दूर खड़ा रहता है, वे सीट खाली करते हैं तो वह आ विराजता है. अति साधारण होता है वह, सामान्य जन से भी भी सामान्य, अति सामान्य !

नया सप्ताह आरम्भ हुआ और नया महीना भी, उसे खबर ही नहीं हुई. शनिवार से जो अस्वस्थता आभास दे रही थी, कल शाम तक खिंचती चली गयी, अभी भी आँखों में दर्द है, परमात्मा उसके साथ है सो छोटी-मोटी या बड़ी भी बीमारी का कोई भय नहीं है. भीतर समता बनी रहती है, विशेष कुछ हो या न हो, कर पाए या न कर पाए, एक समरसता सहज ही रहती है. जून कल देहली चले गये हैं, वहीं से बनारस भी जायेंगे. एक बहुत प्रिय बचपन के मित्र की बिटिया के विवाह में सम्मिलित होने. मंगल को लौटेंगे. माँ अस्पताल में ही हैं, पिताजी भी उनके साथ. पता नहीं और कितने दिन रहना होगा. वह रोज ही वहाँ जाती है कभी-कभी नैनी को साथ लेकर, जो उन्हें तेल आदि लगाती है और बाल बना देती है. कल विश्व विकलांग दिवस है, उसे जाना है. मौसम आज बदली भरा है.

अभी भीतर भय शेष है, आज सुबह एक विचार आया कि इतने दिनों अकेले रही कोई और होता तो सोचता, तभी लगा जैसे कोई है, पल भर को भय हुआ पर फिर समझ में आया स्वप्न है, उनके स्वप्न भी वे स्वयं ही गढ़ते हैं. इस समय उसका मन उदास है. आज वर्षों बाद यह बात उसने लिखी है, कारण है उसकी मूर्खता, मूर्खता के अलावा कोई कारण आज तक किसी की उदासी का न हुआ है और न होगा कभी, उसकी लापरवाही भी कह सकते हैं, अकर्मण्यता भी, फोन कभी नहीं उठाती समय पर और फोन खराब है इसकी खबर भी नहीं रखी. दो दिन से इंटरनेट डाउन है, ध्यान नहीं दिया. जून को बताया तक नहीं. आज वह वापस आ रहे हैं. इतने दिनों तक ढीले कपड़े पहनने के कारण उसे पता ही नहीं चला कि कब पेट का घेरा इतना बढ़ गया.

कल जो भावदशा थी वह भी गुजर गयी और जो आज है वह भी गुजर जाएगी. भीतर देखने वाला साक्षी ज्यों का त्यों रहेगा पर वह द्रष्टा कोई अलग नहीं है, शांत हुआ मन ही वही साक्षी है. वह कोई अलग हो भी कैसे सकता है. अहंकार ही उसे अलग मानता है, वासना है तो अहंकार बचा ही हुआ है, अहंकार बचा है तो उदास होना स्वाभाविक है. देह ऐसी हो, मन ऐसा हो, घर ऐसा हो, रिश्तेदार ऐसे हों, ये सभी कामनाएं ही उन्हें बांधती हैं. चाह ही बांधती है और चाह पूर्ति में कोई बाधक हो तो क्रोध आता है. उनकी इमेज खराब होती है तो क्रोध आता है. देह बेडौल होने लगती है तो क्रोध आता है. बुढ़ापा नजदीक आता है तो क्रोध आता है. सबके पीछे है अहंकार व कामना और कुछ भी नहीं ! प्रमाद व आलस्य इसकी जड़ में है, मोह, राग, द्वेष इसके मूल में हैं. मोह से प्रमाद होता है, आलस्य उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता. नींद मृत्यु की निशानी है, जागना ही मुक्ति है !    




    

Monday, February 1, 2016

तुलसी ममता राम से..समता सब संसार


पिछले दो-तीन दिनों से डायरी नहीं खोली. नीरू माँ कह रही हैं कि पति-पत्नी को आपस में मेल से रहना चाहिए. उसे जून की गम्भीरता को भी सहज स्वीकार करना चाहिए. उनके मुखड़े पर सहज मुस्कान अपने आप भीतर से ही जगेगी. उसकी प्रतीक्षा करनी होगी. क्लेश उदय कर्म नहीं है पर हानि कर्म का फल है. इसलिए हानि होने पर मन में समता बनाये रखना ही पुरुषार्थ है. क्लेश करना अज्ञानता के अधीन है, जो भी कर्म उदय होता है वह अपने ही कर्मों के कारण है. वे अज्ञान के कारण स्वयं अपनी राह में कांटे बिछा लेते हैं और बाद में पछताते हैं. एक व्यक्ति जो सुख की चाह में बाहर भटकता है, दुखी होकर ही लौटता है, क्योंकि वह बाहर मिलता ही नहीं. आज जो सुख है कल वही दुःख में बदल जायेगा. हरेक को अपने भीतर झांकना है.

आज सुबह महीनों बाद एक घटना घटी, होना तो यह चाहिए था कि उस पर इसका जरा भी असर न हो, समता के भाव में रहने का अभ्यास बढ़ जाना चाहिए था, पर कुछ सोचने पर विवश किया ही है इस घटना ने. उसके किसी पूर्वजन्म के कर्म का ( इस जन्म के ही सही, पूर्व कर्म का ) हिसाब भी चुकता हो गया. कल ही उसने लिखा कि क्लेश उदय कर्म नहीं है सो दुःख तो मनाना ही नहीं है. भीतर पूर्ववत् शान्ति है पर बाहर के काम कुछ और ही कहानी कह रहे हैं. कल रात से ही बल्कि पिछले कुछ दिनों से ही तनाव दिख रहा था. कल रात को झलक मिली थी और आज सुबह वह पूर्णतया प्रकट हो गया. एक निमित्त बना उसका वह कृत्य जिसे जैसे किसी ने जानबूझ कर करवाया. वातावरण कितना बोझिल हो जाता है जब कोई तनाव में होता है. इसका मूल कारण भीतरी है, उनके सारे दुःख खुद के ही बुलाये हुए होते हैं. वे स्वयं को ठीक से जानते नहीं, उनकी इच्छाएं ही दुःख को जन्म देती हैं. पिछले कुछ दिनों से उसे देह में कुछ परिवर्तन लग रहा है. आजकल आसन करते समय मध्य में कुछ देर विश्राम करना पड़ता है, भार बढ़ गया है. अहंकार बहुत सूक्ष्म रूप से अपना काम कर जाता है और वे उसके शिकंजे में फंस जाते है. उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वह गलत रास्ते पर ले जाती है. इतना तो सद्गुरु से सीखा है, Accept people as they are accept situation as it is.अपनों का प्रेम जब तक चाहिए तभी तक उनका क्रोध भी प्रभावित करता है. जब ‘चाहिए’ का आग्रह न रहे तब मुक्त ही हैं.

कल शाम सत्संग में जाना नहीं हो सका. घर पर ॐ ध्यान किया. जून ने कल सुबह की बात की और पुनः वातावरण हल्का हो गया. जब मन भारी हो तो उसका असर वातावरण पर पड़ता है. अभी ध्यान कर उठी है. आत्मा में स्थित होने का नाम ही तो ध्यान है. वे जब मन, बुद्धि, चित्त या अहंकार अथवा शरीर या संसार में स्थित होते हैं तो उनके गुणों को ग्रहण करते हैं, जब आत्मा या परमात्मा में स्थित होते हैं तो..

चार दिनों का अन्तराल..पिछले कई दिनों से लिखने का क्रम छूट सा गया है. आज इस समय दोनों छात्राएं प्रश्न पत्र हल कर रही हैं, सो उसे यह समय मिल गया है. कल शाम वे ऑयल की पचासंवी सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम देखने गये. संगीत, नृत्य तथा गायन का कार्यक्रम..तेज रौशनी, तेज आवाजें, शोर और तड़क-भड़क वाले कपड़े. शास्त्रीय व लोक कला ही उन्हें ज्यादा भाती है बजाय आधुनिक गीत-संगीत के. रात लौटने में देर हो गयी तो बिना भोजन किये सो गये. अब जून भी भोजन पर निर्भरता कम करते जा रहे हैं. परसों शाम आत्मा पर ब्रह्मकुमारी द्वारा बताया गया ज्ञान वह ध्यान से सुन रहे थे. आज सुबह एक पुरानी परिचिता से बात हुई, वह पहले की तरह धीरे-धीरे बोलती हैं. एक अन्य परिचिता से भी बात हुई, वह दवा के सहारे अपनी थॉयराइड की बीमारी पर नियन्त्रण पा चुकी हैं. उसने आज जून को परीक्षाओं के लिए शुभकामना हेतु चार कार्ड लाने को कहा था, उन्होंने भिजवा दिए हैं. सुबह उसकी कविताओं को प्रिंट करके लाये जो ‘कुछ रिश्ते मीठे से’ के नाम से एक फ़ाइल में लगाई हैं ! वह उसका बहुत ध्यान रखते हैं, वह खुद उन्हें कभी-कभी तीखे वचन बोल ही देती है. चाहे उनकी मंशा भली ही क्यों न हो अप्रिय सत्य कभी नही बोलना चाहिए, साधक को तो बिलकुल नहीं. उसे दो जगह अपनी कविताएँ भेजनी हैं, पुस्तकालय जाना है. पूजाकक्ष की अलमारी सहेजनी है. कम्प्यूटर एडिक्शन पर इंटरनेट से कुछ जानकारी भी लानी है. ये सारे कार्य आज व कल दो दिनों में खत्म करने हैं.


Thursday, March 26, 2015

गुरू पूर्णिमा का चाँद


गुरू पूर्णिमा’ में कुछ ही दिन शेष हैं. उस दिन वह उपवास व मौन व्रत भी रखने का विचार रखती है. गुरू से उसका मानसिक सम्पर्क बना हुआ है इसका आभास कल दोपहर को हुआ जब हृदय में से उसके नाम का उच्चारण स्पष्ट सुनाई पड़ा. वह दर्द में थी उस पीड़ा में गुरू की आवाज जैसे मरहम लगाती हुई आयी. बहुत अच्छा लगा. वासनाएं मिटती जा रही हैं, क्रोध आने से पूर्व ही शांत होने लगा है. जाने कौन आकर समझा जाता है, जो कहने वाली थी वह न कहकर कुछ ऐसा कहती है जो प्रेम को दर्शाता है, अर्थात प्रेम की पकड़ क्रोध से ज्यादा हो गयी है. सभी के प्रति बस एक ही भाव उसे अपने हृदय में दिखायी पड़ता है, प्रेम और स्नेह का भाव. सभी उस परमात्मा के ही तो हैं जिसे वह इतना चाहती है. कभी-कभी दोनों आँखें भर जाती हैं. आँसू बहते हैं पर इनमें भी कैसी प्रसन्नता है. वह कृष्ण भी जैसे उसका साथ पसंद करने लगा है. वह उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता. उस कृष्ण के नाम के साथ भाव की हिलोरें उठती हैं. समझ नहीं आता कौन ज्यादा प्रिय है सद्गुरु या कान्हा. कभी लगता है दोनों एक ही हैं और वह अपना मन उन्हें अर्पित कर देती है. her ordinary mind merges with their wisdom mind.

आज जागरण में ‘श्रद्धा’  के बारे में सुना. श्रद्धा जितनी दृढ होगी सात्विक भाव भी उतना ही दृढ़ होगा. आज सुबह वे उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी धूप न होते हुए भी उमस युक्त गर्मी है, पर उनकी सुबह ‘योग’ से होती है, ऐसे में मौसम की प्रतिकूलता या अनुकूलता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता. ईश्वर ने, उसके कान्हा ने भी तो कहा है कि शीत-उष्ण, सुख-दुःख सभी में समान भाव से रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहना होगा. सुख बाहरी परिस्थितयों पर नहीं बल्कि उनके सच्चे स्वरूप पर निर्भर करता है जो सदा एक सा है, आकाश के समान मुक्त, विक्षेप रहित !

आज गुरू पूर्णिमा है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. स्नान-ध्यान किया फिर नन्हे और उसके मित्र के लिए नाश्ता बनाया. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी The Gospel of Buddha पढ़ रही है. शाम को aol के फॉलो अप में जाना है. कल शाम को मन उद्ग्विन था, ध्यान किया सोने से पूर्व. काफी समय बाद लगा कि अब सो जाना चाहिए. मन एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करता है उसे उसी तरह मनाना, पुचकारना और कभी-कभी फटकारना भी पड़ता है. गुरुमाँ कहती हैं जिसके विचारों की श्रंखला टूट गयी है वही मुक्त है, सो वह हर क्षण मन पर नजर रखती है कि कहीं कोई बिन बुलाये मेहमान सा अनचाहा विचार तो प्रवेश नहीं कर रहा. उसे क्षण भर देखें तो जैसे समुन्दर में लहर स्वयं शांत हो जाती है वह विचार स्वयं समाप्त हो जाता है. पर देखना पड़ेगा अन्यथा पता ही नहीं चलता और एक से दूसरा शुरू होते होते श्रंखला सी बन जाती है. आज सुबह पिताजी व छोटी बहन से बात की, जो आजकल मुम्बई में है. पिता ने कहा राखियाँ अच्छी बनी होंगी. उसके लिए तो वह अध्याय समाप्त हो गया है. सिर्फ यह क्षण यानि वर्तमान का क्षण जीवित है. जो छूट गया वह चला गया और अब मृत प्रायः है. उन्हें हर क्षण को अंतिम क्षण मानकर जीना आ जाये तो मन क्यों अतीत व भविष्य के चक्कर लगाए. यही बुद्ध कहते हैं, यही योग वसिष्ठ में कहा गया है यही श्री श्री कहते हैं.