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Wednesday, July 24, 2013

इम्तहान इम्तहान

पिछले चार दिन व्यस्तता में बीते. पहला दिन रविवार था, सोमवार को एक सखी के यहाँ गयी थी, शाम को नन्हे को पढ़ाने में व्यस्त थी, मंगल, बुध को शाम को खेलने भी नहीं जा पाई. आज नन्हे का पहला इम्तहान है, गणित का तैयारी ठीक हुई है, अब उसके अपने ऊपर है. जितनी चिंता उसे है उससे ज्यादा नहीं तो उतनी उन्हें भी है, जून से थोड़ी ज्यादा उसे है, अभी सोशल साइंस का पेपर बनाना है. इस तरह छोटे-छोटे इम्तहान देते वह एक दिन जिन्दगी के बड़े इम्तहान देने के योग्य भी बन जायेगा. सुबह के दस बजे हैं, अभी-अभी ‘सोना चाँदी’ पीटीवी का एक हास्य धारावाहिक देखा. आज बगीचा बहुत साफ-सुथरा लग रहा है, कल ही घास काटी गयी है. गुलाबी फूल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं. कल जून ने क्लब की पत्रिका के लिए लिखी उसकी दूसरी रचना भी टाइप कर दी है कम्प्यूटर पर. उन्होंने यह भी कहा, वह लिख सकती है और उसे कुछ कविताएँ हिंदी पत्रिकाओं को भी भेजनी चाहिएं. उसने सोचा कि उन्हें कहेगी वह सिर्फ लिख सकती है उन्हें टाइप करने, भेजने का काम उसके बस के बाहर है. वह  जानती है उसके कहने पर वे ये काम भी कर देंगे. उन्हें अगले महीने शायद मद्रास जाना पड़े, उनकी विवाह की सालगिरह पर उसे अकेले रहना होगा.
कल नन्हे ने परीक्षा में एक प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा, आते हुए भी भूल से छूट गया, बहुत देर तक परेशान था, लेकिन बाद में भूल गया, अपनी गलतियों पर देर तक दुःख मनाते रहना भी कहाँ की बुद्धिमानी है? हाँ, इतना जरुर है कि वही  गलती भविष्य में न करे. आज ठंड ज्यादा नहीं है, धूप निकली है चाहे धुंधली सी ही है. नन्हे और उसके मित्र को बस में बैठकर जब वह और पड़ोसिन लौट रहे थे तो उसने अपनी परेशानी के बारे में बताया, वह अपनी लम्बी बीमारी से घबरा गयी है. नूना को लगता है, किसी भी तरह से उसकी सहायता करे, उसने सोचा जब भी समय मिलेगा वह कुछ देर के लिए उसके पास जाएगी. उसे मेडिकल गाइड में दिल के बारे में पढ़ना भी चाहिए.
पिछले कई दिनों से कुछ नहीं लिखा. इस पल अचानक महसूस होने लगा, कहीं कुछ छूट रहा है, जो पकड़ में नहीं आ रहा. दिल में एक हौल सा उठ रहा हो जैसे, अकेलेपन का एक अहसास कचोटने लगा है. यह साल विदा लेने को है, सिर्फ तीन दिनों के बाद एक नया साल आ जायेगा कुछ नई उम्मीदें और नये सपने लिए. इस बार आने वाले साल के लिए कोई कविता नहीं लिखी, कोशिश ही नहीं की. नये वर्ष के कार्ड आने शुरू हो गये हैं जैसे उन्होंने भी सभी को भेजे हैं, उन सभी को जिन्हें इस विशाल संसार में अपना कहते हैं, जिनसे उनका  परिचय है अगर वे लोग भी न होते तो वे कितने अकेले होते....
वर्ष का अंतिम दिन, समय, शाम के सात बजे हैं. वे लोग डिश एंटीना पर ‘जी टीवी’ पर नये वर्ष के उपलक्ष में कार्यक्रम देख रहे हैं. वे बहुत खुश हैं. कल एक मित्र परिवार के साथ तिनसुकिया गये थे, खाना भी बाहर खाया, जून ने उसे एक पुलोवर उपहार में दिया, विवाह की वर्षगाँठ के लिए. आज साल के अंतिम दिन बीते साल की की बातें याद आ रही हैं, कुल मिलाकर यह वर्ष अच्छा बीता लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी हुईं जो दुखद थीं जैसे हरियाणा में हुआ अग्निकांड.





Friday, December 21, 2012

हर्बी गोज बनाना



कल रविवार था, दिन में उसकी दो सखियाँ आयीं, दोपहर बाद गयीं, शाम भी फिर सारे काम निपटाते जल्दी से बीत गयी. पर सोमवार की शाम बिताए नहीं बीतती, उन्होंने कैरम खेला, डांस किया, नन्हे ने होमवर्क किया, कुछ देर राइम्स की किताब पढता रहा, उसकी लिखाई भी अब सुधरती जा रही है, टेस्ट में भी अच्छे मार्क्स आए हैं. और फिर वे जल्दी ही सोने आ गए, जून के होने पर वह इस समय खाना बनाने जाती है.

आज सुबह उसने अपनी पड़ोसिन को दिन में आने के लिए निमंत्रित किया था, दोपहर भर वे साथ रहे. शाम को मालूम हुआ कि उसे बुखार हो गया है, नूना को बहुत खराब लगा. शायद वह उसमें अपनी छोटी बहन को देखती है तभी उसका दुःख अपना दुःख लगता है. सुबह से जून का फोन नहीं आया था, पर उसकी बंगाली सखी आई उनका समाचार लेकर, उसके पति ने खबर दी थी जो जून के साथ ही काम कर रहे हैं. उन्होंने ड्राइवर के हाथ फल भिजवाए थे और दो कैसेट भी, एक हिंदी फिल्म “हम” दूसरा “हर्बी गोज बनाना” जो बहुत अच्छी कॉमेडी फिल्म है.

सप्ताहांत पर वे वापस आए हैं, उन्हें एक जगह सत्यनारायण की कथा में जाना था. वहाँ से लौटे तो पड़ोसियों के यहाँ गए, दरवाजा खुलने में थोड़ी देर लगी, बाद में उसे लगता रहा व्यर्थ  ही गए वहाँ. कल वे लोग तिनसुकिया जा रहे हैं और बाद में आर्मी कैंटीन भी, उसने सोचा  पहले कितना सोच-समझ कर वे पैसे खर्च करते थे और अब मन में ख्याल आते ही उस सामान को मूर्त देखना चाहते हैं. गर्मियों में माँ-पिता आ रहे हैं, कुछ सामान उसी की तैयारी है. हो सकता है तब तक वे बड़े घर में शिफ्ट हो जाएँ.

वे फिर चले गए हैं, नन्हा झूला पार्क गया है, उसने कुछ देर बगीचे में सफाई की, कुछ देर अखबार पढा, पर मन नहीं लगा. कढ़ाई का काम भी अधूरा पड़ा है. तिनसुकिया से सारिका भी लायी थी, अभी तक एक कहानी ही पढ़ी है, वह भी रास्ते में ही पढ़ ली थी कार में. किसी को दुखी देखकर, परेशान देखकर दिल में कैसी गांठ सी पड़ जाती है, आँखों में आँसू आ जाते हैं, जाने कहाँ से, क्या इसी का नाम सहानुभूति है, भाईचारा है, प्यार है, मानवता है..उनकी महरी के मन में भी ऐसी ही गांठ पड़ जाती है, उसका दिल भी ममता से भरा है, दुनिया में कितने ही लोग ऐसे होंगे.

पिछले कुछ दिनों से डायरी लिखने का अभ्यास या कहें क्रम कुछ बिखर सा गया है. आज फिर एक बार यह सीखने के बाद कि..अपने घर सा सुख कहीं नहीं..मन अपने अंदर की ओर झाँकने को कह रहा है. उसने सोचा, वे हमेशा बाहर ही देखते हैं, बाहर ही सब कुछ खोजते हैं, किसी से कुछ न कुछ कहने को, सुनने को लालायित रहते हैं. पर कितना समय वे अपने आप को देते हैं..अपने मन से बातें करते हैं, अपनी आवाज को पहचानते हैं. उसने सोचा उसे तो कम से कम इधर-उधर भटकने के बजाय अपनी प्रिय डायरी के पास होना चाहिए जो उसकी सारी बातों को सुनती है, जवाब भी देती है, उसे अकेलेपन से मुक्त करने के बजाय उससे जुड़ने का सुख देती है. जून का प्रेम असीम है यह बात वह पहले भी कई बार महसूस कर चुकी है और लिख भी चुकी है पर बार-बार कहने का मन होता है. उसका प्रेम इतना विशाल है कि उसकी कड़वी बातें भी उसकी मिठास में घुल जाती हैं, और उसे भी उसके सान्निध्य में अवश्य ही सुख मिलता होगा तभी तो..और कभी थोड़ी बहुत नोक-झोंक होने पर नन्हा बड़ी जल्दी सुलह करा देता है.

कल माँ-पिता का पत्र मिला, हमेशा की तरह चंद पंक्तियाँ पिता की अंग्रेजी में लिखी हुईं फिर लम्बा सा पत्र माँ का. सुबह से ही वह सोच रही थी कि उन्हीं रिश्तेदार को फोन करके घर आने के लिए कहेगी पर..साढ़े नौ बजे के लगभग उनकी नौकरानी ने बताया कि वे लोग घर गए हैं, उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गयी है. सुनकर कैसा तो लगा, वह तो रो ही पडती शायद कि जून आ गए..उन्हें फिर दो दिनों के लिए तलप जाना था सो सामान लेने आए थे. दोपहर को उसकी असमिया सखी आई, शाम को सामने वाले घर की छोटी बालिका के साथ कैरम खेला, वे लोग भी आज नए घर में शिफ्ट कर रहे हैं. पुराने लोगों में इस लेन में वे ही रह गए हैं, एक दिन उन्हें भी जाना होगा, शाम के पांच बजे हैं नन्हा सोया है, वह बाहर बैठ कर  लिख रही है, पूरी लेन खाली है.

Friday, October 19, 2012

बड़ा दिन ठंडा सा



आज उसने तीन फाइलों का काम खत्म किया, अभी फाइनल का लेसन प्लान बनाना है. बैठे-बैठे उसकी कमर अकड़ गयी है, काफी देर से कुर्सी पर बैठी है और कपड़े सिलने में भी सीधा बैठना पड़ा, कितने ही सलवार-कमीज की सिलाई खुल गयी थी वही ठीक करती रही. लिखने का काम अभी भी बहुत है. शेष पढ़ाई तो बिलकुल नहीं हो रही है. लाइब्रेरी से कुछ किताबें ली थीं, उनसे भी नोट्स बनाने हैं.

इतवार के कारण कल टीवी पर महाभारत आया, सभी के साथ नन्हा भी बहुत शौक से देख रहा था. उन्हें एक परिचित परिवार के यहाँ जाना था, दो घंटे तो लग ही गये. आज कालेज शायद बंद है, अब न भी हो तो क्या, वह तो नहीं गयी है, लिखने का काम आज तो पूरा कर ही लेना चाहिए. आज सुबह उसने जून को पत्र लिखा, पोस्टमैन भी एक घंटे में आ जायेगा. आज उन्होंने दोपहर का भोजन जल्दी बना लिया है, अब कोई चिंता नहीं. सिर्फ लिखना और आराम करना दिन भर..पढ़ना-लिखना बस...एक बजे नन्हे को सुलाएगी, अभी बारह बजे हैं.
आज जून के पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स मिले, हमेशा की तरह मधुर से पत्र..ऐसा लगता नहीं कि उससे दूर है...या उससे दूर रहने की आदत पड़ गयी है. धीरे धीरे सम्बन्धों में स्थिरता आती है, फिर यह भौतिक दूरी मायने नहीं रखती. इतनी दूर रहकर भी वे एक-दूसरे को उसी तरह समझ सकते हैं जैसे पास रहकर. छोटी बहन का पत्र आया है, वह खुश है. माँ-पिताजी का पत्र भी आया है, छोटा भाई भी गुड़िया का पापा बन गया है. उसने सोचा आज ही जवाब दे दे तो ठीक रहेगा, फिर बाद में उपहार भेजेगी, एक स्वेटर या फ्रॉक !

अब रात को ठंड बढ़ गयी है, आज से रजाई लेनी होगी. अभी तक कम्बल से ही काम चल रहा था. परसों कालेज खुल रहे है. मेजर का काफी कार्य हो गया है, अब चार्ट बनने का काम शेष है, कल बाजार जाकर चार्ट पेपर खरीदेगी. आज क्रिसमस है, बड़ा दिन, पर उनके लिए आज का दिन बड़ा किसी भी तरह से तो नहीं है. मन बेचैन है, एक घुटन सी महसूस कर रहा है, और माहौल भी वही है कल का सा बेचैनी भरा. कल उसने जून को अधूरा पत्र लिखा अब उसका पत्र आने पर ही पूरा करेगी.

साल का अंतिम दिन और साल का अंतिम रविवार भी. कल से नववर्ष का शुभारम्भ हो रहा है और उसका मन हर वर्ष की तरह कई मधुर कल्पनाओं से ओत-प्रोत है...जून की स्मृति भी है तो..स्नेह की मधुर यादों के साथ उन्हें एक अच्छा खत लिखेगी और पुराने वर्ष के सभी पत्रों के जवाब भी देने हैं न...नए वर्ष में नए खत नए जवाब..!