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Friday, October 19, 2012

बड़ा दिन ठंडा सा



आज उसने तीन फाइलों का काम खत्म किया, अभी फाइनल का लेसन प्लान बनाना है. बैठे-बैठे उसकी कमर अकड़ गयी है, काफी देर से कुर्सी पर बैठी है और कपड़े सिलने में भी सीधा बैठना पड़ा, कितने ही सलवार-कमीज की सिलाई खुल गयी थी वही ठीक करती रही. लिखने का काम अभी भी बहुत है. शेष पढ़ाई तो बिलकुल नहीं हो रही है. लाइब्रेरी से कुछ किताबें ली थीं, उनसे भी नोट्स बनाने हैं.

इतवार के कारण कल टीवी पर महाभारत आया, सभी के साथ नन्हा भी बहुत शौक से देख रहा था. उन्हें एक परिचित परिवार के यहाँ जाना था, दो घंटे तो लग ही गये. आज कालेज शायद बंद है, अब न भी हो तो क्या, वह तो नहीं गयी है, लिखने का काम आज तो पूरा कर ही लेना चाहिए. आज सुबह उसने जून को पत्र लिखा, पोस्टमैन भी एक घंटे में आ जायेगा. आज उन्होंने दोपहर का भोजन जल्दी बना लिया है, अब कोई चिंता नहीं. सिर्फ लिखना और आराम करना दिन भर..पढ़ना-लिखना बस...एक बजे नन्हे को सुलाएगी, अभी बारह बजे हैं.
आज जून के पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स मिले, हमेशा की तरह मधुर से पत्र..ऐसा लगता नहीं कि उससे दूर है...या उससे दूर रहने की आदत पड़ गयी है. धीरे धीरे सम्बन्धों में स्थिरता आती है, फिर यह भौतिक दूरी मायने नहीं रखती. इतनी दूर रहकर भी वे एक-दूसरे को उसी तरह समझ सकते हैं जैसे पास रहकर. छोटी बहन का पत्र आया है, वह खुश है. माँ-पिताजी का पत्र भी आया है, छोटा भाई भी गुड़िया का पापा बन गया है. उसने सोचा आज ही जवाब दे दे तो ठीक रहेगा, फिर बाद में उपहार भेजेगी, एक स्वेटर या फ्रॉक !

अब रात को ठंड बढ़ गयी है, आज से रजाई लेनी होगी. अभी तक कम्बल से ही काम चल रहा था. परसों कालेज खुल रहे है. मेजर का काफी कार्य हो गया है, अब चार्ट बनने का काम शेष है, कल बाजार जाकर चार्ट पेपर खरीदेगी. आज क्रिसमस है, बड़ा दिन, पर उनके लिए आज का दिन बड़ा किसी भी तरह से तो नहीं है. मन बेचैन है, एक घुटन सी महसूस कर रहा है, और माहौल भी वही है कल का सा बेचैनी भरा. कल उसने जून को अधूरा पत्र लिखा अब उसका पत्र आने पर ही पूरा करेगी.

साल का अंतिम दिन और साल का अंतिम रविवार भी. कल से नववर्ष का शुभारम्भ हो रहा है और उसका मन हर वर्ष की तरह कई मधुर कल्पनाओं से ओत-प्रोत है...जून की स्मृति भी है तो..स्नेह की मधुर यादों के साथ उन्हें एक अच्छा खत लिखेगी और पुराने वर्ष के सभी पत्रों के जवाब भी देने हैं न...नए वर्ष में नए खत नए जवाब..!

Tuesday, May 29, 2012

काली घटाएं ठंडी हवाएं


वर्षा आज भी हो रही थी, सुबह जब वे उठे और इस समय भी शीतल मधुर बयार बह रही है. बादलों की मनोहर घटा छाई है. कल रात उसे फिर से नींद नहीं आ रही थी, किसी करवट चैन नहीं आ रहा था, सीधा भी नहीं लेटा जा रहा था. पता नहीं कितने बजे होंगे, जून भी जग गया था, सुबह एक स्वप्न देख रही थी, उसे ही देखा, सोते-जागते उठते-बैठते एक यही ख्याल तो है जो मन पर छाया रहता है, कि कब आयेगा वह, कौन सा दिन, कौन सा पल होगा कितनी लंबी प्रतीक्षा है यह. आज वह हिंदी लाइब्रेरी की सब किताबें वापस ले गया है, कुछ नई किताबें लाने के लिये. गीता के सभी अध्याय पूरे पढ़ लिये हैं अब कल से दुबारा आरम्भ से पढ़ेगी. छत्तीस दिन में पूरी होगी या चालीस दिन में. सासु माँ कभी-कभी सुनती हैं सामने बैठकर.

कल माँ का पत्र आया, मंझले भाई का और चचेरे भाई का भी. दो-तीन दिन वर्षा अपना रूप दिखा कर विश्रामगृह में चली गयी है. बहुत दिनों बाद आज कुछ अधिक कपड़े धोए, महरी काम पर नहीं आयी, बीमार है या..किन्तु विशेष परेशानी नहीं हुई, यूँ कहें जरा भी परेशानी नहीं हुई, अब वह इस स्थिति में रच-बस गयी है, नौ महीने कोई कम तो नहीं होते, कितनी-कितनी अनुभूतियाँ हुई हैं इन महीनों में, अब तो एक माह से भी कम समय रह गया है. कल शाम से जून कुछ परेशान सा था, आमतौर पर वह हमेशा खुश रहता है, खीझता नहीं किसी बात पर, कभी-कभी ऐसा होने पर उसे बहुत अजीब लगता है, पर वह जानती है उसका दोष नहीं है, घटना विशेष ने उसके मन को प्रभावित किया होता है, पर आज सुबह वह खुश-खुश विदा हुआ है, शायद जोराजान फील्ड जायेगा.