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Friday, September 26, 2014

साहित्य अमृत - एक पत्रिका


सत्-चित्त-आनन्द और सत-सिरी-अकाल एक ही सत्ता की ओर संकेत करते हैं, उस आनन्द को पाने के लिए ध्यान में उतरना होगा, क्योंकि इस आनन्द को कोई भौतिक इन्द्रियों से महसूस नहीं कर सकता, उसे तो निर्विकार, निर्विकल्प होकर ही अनुभव किया जा सकता है. आज जून ने उसकी किताब के प्रकाशक शर्मा जी से बात की, उन्हें किताब मिल गयी है, पर अभी तक फ्लापी नहीं देखी है. अब उन्हें धैर्य रखना होगा, उनका कार्य समाप्त हो गया है, अब शेष कार्य प्रकाशक का है. आज कोई नया स्वीपर आया है, इसके काम में सुघड़ता है. कल उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ के संपादक को वार्षिक चंदा भेजा. कल एक पुरानी डायरी में लिखी कई कविताओं को पुनः पढ़ा तो कई स्थानों पर नये शब्द सूझ गये, उसकी साहित्य यात्रा का आरम्भ धीरे-धीरे हो रहा है. नन्हा आज स्कूल गया है, आज सुबह जल्दी उठाया था उसे ताकि आराम से तैयार हो सके.  जून कल शाम को थोड़े खफा हो गये लगते थे, ‘स्क्वैश’ की सब्जी में नमक बहुत ही कम था, नन्हा और उसने खा ली पर वह नहीं खा पाए. आजकल वह उनका विशेष ख्याल नहीं रख रही है, अभी-अभी ‘ध्यान’ पर लिखी एक पुस्तक में पढ़ा, दूसरों की भावनाओं का सदा ध्यान रखना चाहिए, स्वयं को महत्व न देकर सामने वाले की ख़ुशी का ध्यान रखना चाहिए, मन जब निज स्वार्थ से ऊपर उठ जायेगा, जब अपनी ख़ुशी ही सर्वोपरि नहीं होगी तभी ध्यान सधेगा, और वास्तव में वही असली स्वार्थ सिद्धि होगी, अर्थात दूसरों का ख्याल रखकर कोई अपना ही ख्याल रख रहा होता है. घोष वाली वह किताब काफी पढ़ ली है, ‘डॉली’ उसकी एक पात्रा भी ध्यान करती है. दिल्ली की जनता CNG बसों के पर्याप्त मात्र में न होने के कारण बेहाल है, हिंसा पर उतर आए हैं लोग, उसे भतीजी का ध्यान हो आया, उसे स्कूल जाने में जरूर दिक्कत हुई होगी इस अव्यवस्था के कारण. अभी उसे दो पत्र और लिखने हैं, समय मिलते ही लिखेगी.

मानक.आज सुबह जो सुना था वही इस वक्त उसके मन में घुमड़ रहा है. सत्य की राह पर चलने वाले को कदम-कदम पर ध्यान रखना पड़ता है, मन को कुसंग से बचाना है, क्रोध से भी, न जाने कितने जन्मों के संस्कार, कर्म बीजों के रूप में  जो मन में पड़े हुए हैं, जरा सा प्रोत्साहन पाते ही विकसित हो जाते हैं. हर देखे, सुने का चित्र मन पर अंकित हो जाता है, इसलिए अनावश्यक देखना भी नहीं है, सुनना भी नहीं है. जाने अनजाने वे कोई जो भी इच्छा करता है वह समय पाकर किसी न किसी रूप में जरुर पूरी होती है. दुःख को मिटाते-मिटाते और सुख की चाह करते-करते जीवन बीत जाता है, मिथ्या की सत्यता स्पष्ट नहीं होती, तपन कम नहीं होती. ज्ञान रूपी सूर्य को पीठ देकर छाया के पीछे दौड़ते हैं. जीवन में क्रम या नियम तो होना ही चाहिए, इससे ही दक्षता आती है, दक्षता से ही खुद में श्रद्धा होती है, और श्रद्धा से ही खुद को पा सकते हैं. स्वयं को कोसना स्वभाव न बन जाये, इसका अर्थ होगा अपने से तुच्छ को ज्यादा महत्व दे दिया. सुखों के पीछे की गयी अंधी दौड़ पतन के मार्ग पर ही ले जाती है. The glass palace में एक-एक कर सभी मुख्य पात्र मृत्यु के ग्रास बनते चले जाते हैं, उनका भी एक दिन यही हश्र होगा, उससे पूर्व ही सचेत होना है. जिन वस्तुओं के पा लेने पर वे गर्व से फूले नहीं समाते वे उस वक्त काम नहीं आएँगी जब जीवन की अंतिम यात्रा पर जा रहे होंगे. वास्तविक सुख कहाँ है, उसकी खोज करनी है अथवा परम सत्य की खोज करनी है. यह संसार और सारे संबंध सभी वस्तुएं सापेक्ष हैं जो प्रतिक्षण बदलती हैं लेकिन कुछ तो इन सबके पीछे है जो मानक है जिसको मानक मानकर वे उसके जैसा होना चाहते हैं. वह आगे बढ़ते तो हैं, वहाँ तक पहुंच नहीं पाते पर प्रयत्न तो यही रहता है. इस एक परम सत्ता, परम सत्य की खोज में ही वास्तविक आनन्द है, शेष सारे कार्य उनके उस एक उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त ही होने चाहिए, उनका व्यवहार, उनका संग, उनकी वाणी इस बात के परिचायक हों कि वे उस पथ के यात्री हैं !

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, और आज भी सुबह नहीं लिख पाई, ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे, सो बाकी सारे कार्य तो किये बीएस यही रह गया, क्योनी डायरी लिखना यानि खुद के करीब आना, और खुद के करीब आना एक खस मन स्थिति में ही सम्भव है. आज गोयनका जी आये थे, उनकी बताई विधि से ध्यान में देर तक बैठ पायी. बाबाजी ने भी इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में, बुद्धि को स्व में स्थित कर ध्यानस्थ होने की विधि बताई. कल शाम वे 'ग्लैडिएटर' देखने गये, वापस आये तो जैसे फिल्म का प्रभाव उनके मन, वाणी पर पड़ चुका था, वे एक-दूसरे से क्रोध में बात कर रहे थे. सुबह तक उसे यह असर महसूस हुआ. कल दोपहर को उसे पूसी के बच्चों की आवाजें आयीं, परसों उन्होंने अनुमान लगाया था की पूसी माँ बनने ही वाली है. कल शाम को दूर से उसे देखा, छत के निचे बनी पर छत्ती पर वह बैठी थी. कल रात में स्वप्न में एक मार्जारी को देखा, जो उन्हें पंजों से पकड़ क्र बुला रही थी, बिलकुल वैसे ही जैसे इन्सान बुलाते हैं. आज दोपहर उसने नैनी के लिए उसी के लाये कपड़े का ब्लाउज सिला कपड़ा नया तो नहीं था, पर सही हालत में था. हाथ का काम वह खुद करेगी. पूरे दो घंटे लगाये पर पता नहीं कितना सही बना है. अभी अभी एक सखी को फोन किया तो पता चला परसों वे डिब्रूगढ़ गये थे तो उनके लिए तरबूज लाये थे, जून से ड्राइवर को भेजकर मंगवाने के लिए कहा है. सवा तीन हो गये हैं, नन्हा अभी तक नहीं आया है, उसका गला बभी सुख रहा है, दोपहर जून के जाने के बाद से चाय या पानी कुछ नहीं पिया है और अब एक गिलास ठंडा पानी पीने का वक्त ही रह गया है, थोड़ी ही देर में जून भी आते होंगे और उनके दिन का तीसरा भाग शुरू हो जायेगा.

  


Tuesday, August 12, 2014

ग्लेडिएटर - अमेरिकन एपिक ड्रामा


आज सुबह जून ने कहा, “हैप्पी सेवेंथ” और तब उसे लगा कि आजकल वह उनका ज्यादा ख्याल नहीं रख रही है, ज्यादातर वक्त उसके मस्तिष्क में नन्हे की अस्वस्थता का ख्याल रहता है या फिर किताबें. कल रात से वर्षा लगातार हो रही है. इस साल पूरे देश में ही वर्षा काफी हुई है, फिर भी इतने बड़े देश का कोई न कोई भाग सूखे की चपेट में आया होगा. बंगाली सखी ने फोन पर नन्हे का हाल पूछा, बाकी सभी से कई दिनों से कोई बात नहीं हुई है. नन्हे के ठीक होने पर ही वे कहीं जायेंगे. घर से पत्र भी नहीं आया है, कल स्वप्न में मंझले भाई को देखा, वे इस बार उनका दिया उपहार नहीं लाये शायद वह.... वरना कभी-कभी उसका पत्र तो आ जाया करता था. सुबह ‘जागरण’ में सुना इस संसार में सभी रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हैं, स्नेह की धारा लोगों के दिलों में सूख जाती है वक्त के साथ-साथ... एक उसका मन ही है जो सभी को याद किया करता है, शायद वे लोग भी ऐसा ही सोचते हों.  खैर, उसकी आध्यात्मिक यात्रा में कुछ शिथिलता आ गयी है. इच्छा मुक्त मन की कल्पना कर आज ध्यान में बैठी तो अच्छा लगा था, कोई प्रार्थना नहीं, कोई आशा, अपेक्षा नहीं निर्विकार, शांत मन !

प्रधानमन्त्री विदेश यात्रा पर गये हैं, देश का हित होगा उनके प्रयासों से. अस्वस्थता के बावजूद वे अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं. पिछले दिनों UNO में विश्व शांति सम्मेलन हुआ और आजकल सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष मिलकर चर्चा कर रहे हैं, शांति की स्थापना ही उसका उद्देश्य है. उनके काश्मीर में भी शांति की स्थापना हो !   

आज अभी सुबह के आठ बजे हैं, मौसम सुहाना है, वर्षा होकर थमी है, अभी भी बदली है, हवा में शीतलता है. नन्हे को अब हाथ में दर्द नहीं है, कल उसने Gladiator देखी, नई फिल्म है, आज वह भी देखने का विचार रखती है. कल शाम जून उन्हें अपने दफ्तर ले गये, internet surfing करने पर लाइन नहीं मिली. वे वापसी में इस फिल्म का CD लाये. रात को स्वप्न में उसने net surfing की तथा पिता को जून से बात करते हुए भी सुना, स्वप्न में इन्सान की सारी इच्छाएं अपने आप पूर्ण हो जाती हैं.

जैसे-जैसे बुद्धि विवेकशील होती जाएगी, मन कामना से मुक्त होता जायेगा. कर्म के फल की आसक्ति नहीं रहेगी, कोई अपेक्षा नहीं रहेगी. ध्यानस्थ होना सरल होता जायेगा. आज उपरोक्त वचन सुने, मन कैसा आश्वस्त हो गया. जो सत्य बाहर दीखता है वही सत्य भीतर भी घट रहा है, प्रतिपल, प्रतिक्षण ! जो भीतर के सत्य को देखना सीख जाये वही मुक्त है. धर्म परम मुक्त होना सिखाता है. बात बहुत सीधी है और सरल है पर वे जानकर भी अनजान बने रहते हैं.

Nanha their son is eating his lunch. Today he went to hospital, doctor said that plaster would be opened after two more weeks so they have to wait and watch. Yesterday didi rang her, she could not tell her about Nanha’s health, neither they have told her parents. That day she came to know, her cousin sistermarriage has been fixed on 26 Nov, she has to write at least one congratulation letter.


जून ने आज सुबह तिनसुकिया जाने की बात कही, उनके अनुसार नन्हे को यदि कल से स्कूल जाना है तो आज का अभ्यास ठीक रहेगा, इससे पता भी चल जायेगा कि सफर में उसे दर्द या असुविधा तो नहीं होगी. उसे स्कूल गये पन्द्रह दिन हो गये हैं, आज अंतिम परीक्षा है. सुबह घर से father-in-law का फोन आया वे चिंतित थे, जो स्वभाविक है. इस समय साढ़े आठ ही हुए हैं पर धूप कल की तरह इतनी तीव्र है कि लगता है दोपहर हो गयी है. उसके सुबह के कार्य हो चुके हैं. नन्हा अभी तैयार नहीं हुआ है, उसकी बातें सुनना, उससे फिजिक्स के प्रश्न पूछना और साथ-साथ टीवी पर कोई कार्यक्रम देखना बहुत अच्छा लगता है. बच्चों का दृष्टिकोण अलग होता है, वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते.