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Monday, June 10, 2019

जीवन का अंत



दो दिनों का अन्तराल ! परसों लक्ष्मी पूजा का अवकाश था, वे सुबह-सुबह फोटोग्राफी के लिए निकट के एक गाँव में गये. जून ने कमल के फूलों के सुंदर चित्र लिए. आज शनिवार है. सुबह टाइनी टॉटस की मीटिंग में शामिल हुई, शाम को क्लब में मीटिंग है. प्रेसिडेंट बहुत अच्छा बोलती हैं, पर कुछ अधिक ही. वह निरंतर काम में व्यस्त रहती हैं, ऊर्जावान हैं. दोपहर को प्रेस जाना है. मृणाल ज्योति से फोन आया, 'विश्व विकलांग दिवस' के लिए पेपर कार्ड या बुक मार्क बनाने के लिए सुझाव माँगा है. एक परिचिता की माँ अस्पताल में दाखिल हैं, एक के पति की ओपन हार्ट सर्जरी हुई है दिल्ली में.  जून को यात्रा से लौटने के बाद से सर्दी लगी है व गले में खराश है. उसे भी आज पाचक लेना पड़ा है. कल लोभ के कारण खान-पान  में परहेज नहीं रखा. मिठाई खाई, स्कूल में प्रसाद भी लिया और लाल चाय. क्लब में भी औपचारिकता वश कुछ खाना पड़ा. शरीर किसी का भी हो बद परहेजी उसे जरा भी नहीं भाती. नैनी आज अपनी बेटियों के स्कूल की मीटिंग में गयी. सरकारी स्कूल में पढ़ाई को लेकर माता-पिता व शिक्षक पहले से सजग हुए हैं. मोदी सरकार की पहल से कई सुधार देश में हो रहे हैं.  

आज सुबह तैरने गयी. कोच ने आज दोनों हाथों को लगातार चलाने के लिए कहा. तैरना अपने आप में एक सुखद अनुभव है. नाक से पानी आ रहा है, पर कुछ देर में अपने आप ठीक हो जायेगा. वापस आई तो जून ने उपमा लगभग बना ही लिया था. आज बगीचे में गोबर की खाद डलवाने का दिन था. ड्राइवर अपनी बड़ी गाडी लेकर आया था. दोनों माली अन्य दो मजदूरों को लेकर सुबह से शाम तक चार बार में पूरे वर्ष के लिए गोबर ले आये हैं. मृणाल ज्योति के एक कर्मचारी के द्वारा एक दुखद समाचार मिला, स्कूल के एक अध्यापक ने आत्महत्या कर ली है, जो कई दिनों से अस्वस्थ था और छुट्टी पर था. उस क्षण उसका यह वाक्य जैसे असत्य प्रतीत हुआ. मन उसे स्वीकारने को तैयार नहीं था. पर खबर देने वाले ने कहा, मृतक की भाभी ने उन्हें यह सूचना दी है. उसने भाभी का नम्बर लिया, बात की. उसने कहा, सुबह वे उठे तो अध्यापक बिस्तर पर नहीं था. आज उसके भाई उसे लेकर स्कूल आने वाले थे. उसे ढूँढ़ते हुए वे गाय बाँधने के स्थान पर गये तो  वह मृत अवस्था में मिला. पुलिस आयी, शव को पोस्टमार्टम के लिये ले जाया गया है. पिछले कई महीनों से वह अस्वस्थ था. पहले उसकी आँख में कुछ समस्या हुई थी फिर मोटरसाईकिल से गिर जाने के कारण हाथ की हड्डी टूट गयी, यहाँ इलाज भी ठीक से नहीं हुआ. पटना जाकर दुबारा ऑपरेशन हुआ, शायद वह भी ठीक से नहीं हो पाया हो. दुखी होकर उसने अपनी जान ही लेली. स्कूल की सभी अध्यापिकाएं और अध्यापक दुखी हैं और शायद वे भी यही सोच रहे होंगे की काश समय रहते बात कर लेते और उसका दुःख बाँट लेते. उसने लगभग एक वर्ष पूर्व अपनी समस्याओं से उसे अवगत कराया था. उसके बाद ही सभी अध्यापकों के लिए एक कार्यक्रम भी हुआ था, वह खुश था. ऐसा उसने जाहिर भी किया था. पर वह शायद स्कूल में अलग-थलग पड़ गया था. स्कूल में हो रहे बदलावों को भी स्वीकार नहीं पाया था. जो भी हुआ हो पर अब वह उनके मध्य नहीं है. उसने प्रार्थना की, वह जहाँ भी रहे, परमात्मा उसे शांति प्रदान करें.   
 
आज भी धूप तेज है. मृणाल ज्योति से फोन आया, एक अध्यापिका दो सौ दीये बिक्री के लिए उनके घर रखवाना चाहती है, उसने 'हाँ' कह दी है. दीपावली तक अथवा तो उसके पूर्व ही बिक जायेंगे. कोई आये या जाये, संसार अपनी गति से चलता रहता है. दोपहर को बड़ी ननद का फोन आया. उसकी बड़ी बिटिया को ससुराल में कुछ समस्या हो गयी है. बात बढ़ गयी है. वह कह रही थी, नन्हा उसे जाकर ले आये. जून ने मना कर दिया पर बाद में पता चला नन्हा और सोनू दोनों उसे लेने गये थे. उनसे ही बात की, वे लोग घर पहुँच गये थे. भांजी के जीवन में जो भी उलझन है शायद अब उसका कोई हल निकल आये. अब व्हाट्स एप पर संदेश भेजने का मन नहीं होता. इतने सारे ग्रुप हो गये हैं और इतना समय भी व्यर्थ ही जाता है. कल जून ने विवाह के कार्ड्स पर पते के लेबल चिपकाये. अभी कुछ दिनों तक यह कार्य चलेगा. बंगलूरू से वापस आने पर वे कार्ड्स वितरण का कार्य आरंभ करेंगे.

Tuesday, January 22, 2013

होमर की किताब - ओडिसी



किसी के प्रति द्वेष न रखो, अपने सब कर्म ईश्वर को अर्पण कर निस्वार्थ भाव से जीवन जीते चलो, ऐसे में न मन में कोई चिंता होगी न विकार, शांत मन और व्यर्थ भावुकता से परे हृदय ! आज गीता में यही पढ़ा. बारहवें अध्याय में कृष्ण कहते हैं- “सुख-दुःख, निंदा-स्तुति में समान, हर्ष व द्वेष से रहित, मान-अपमान से परे, आशा मुक्त, चिंताओं से दूर मेरा भक्त मुझे प्रिय है.” कितने सुंदर विचार भरे पड़े हैं गीता में. कल रात को माँ से बात हुई, लगा जैसे आमने-सामने बातें कर रहे हों, अभी एक पत्र लिखेगी उन्हें, दोनों बहनों को भी पत्र लिखने हैं. कल दोपहर भर नन्हे के लिए नाईट ड्रेस सिलती रही, उसका चेहरा कितना खिल गया था, कहने लगा, आप हमेशा कपड़े खुद सिलकर मुझे दीजियेगा, देखें, कितने साल तक घर के  सिले कपड़े पहनता है. शाम को वे क्लब गए खाना वहीं खाया.

आज सुबह ईश्वर की विभूतियों का वर्णन पढ़ा, पहले वह बादलों, सूरज और हरियाली... सभी में भगवान को महसूस करती थी, लेकिन बौद्धिकता के साथ आध्यात्मिकता नहीं रह जाती, अब ईश्वर याद आता है तो तब जब मन हर तरफ से निरुपाय हो जाता है, लेकिन कहीं न कहीं ईश्वर की सत्ता है जरूर, यह तो मन मानता ही है. नन्हे का स्कूल बीहू के कारण चार दिनों के लिए बंद है, एक दिन खुलेगा फिर “गुड फ्राई डे” का अवकाश होगा. सुबह उसने व्यायाम किया, और चार दिन बाद होने वाली कला प्रतियोगिता की तैयारी कर  रहा है. कल उनके लॉन में पंजाबी दीदी का दिया झूला लग गया, उनके अहसान बढ़ते ही जा रहे हैं. कल सुबह जो पढ़ा था, शाम को ही भूल गयी, जब क्लब में खाने को देखकर नापसंदगी जाहिर की, अपना मन तो परेशान हुआ ही, जून और सोनू का भी. जून तो आज सुबह भी उदास थे उसकी नासमझी के कारण ही तो. न जाने कब उसका सम भाव का सपना पूर्ण होगा. पढ़ने में जो बातें अच्छी लगती हैं, उनपर चलना उतना ही मुश्किल होता है, पर बार-बार पढ़ने से तत्व को आचरण में लाया जा सकता है, या तत्व व आचरण का अंतर कम किया जा सकता है.

वे लोग छुट्टियों में घूमने गए, उसने एक साड़ी खरीदी, हल्के शेड में कोटा की साड़ी. वीसीपी पर फ़िल्में देखीं. मित्रों के यहाँ गए और मजे-मजे में दिन बीत गए. उसने किसी किताब में ये लाइनें पढीं- “पहले वैष्णव बनो, नरसिंह मेहता के बताए रास्ते पर चलकर फिर गुणातीत व  सतोगुणी स्वयं बन जाओगे”. सात्विकता इतनी दुर्लभ तो नहीं ? अगर वह दैवी सम्पदा लेकर इस जगत में आई है तो आचरण भी उसके अनुसार ही करना चाहिए.

आज बहुत दिनों का सोचा हुआ एक काम किया, गमलों की देखभाल, पानी नहीं दिया, धूप तेज हो गयी थी. शाम को सभी पत्तों को नहला कर पानी डालेगी. जरा सी देख-रेख से कैसे खिल उठा है बरामदा. पौधों को उगा कर छोड़ देने से वे उद्दंड बच्चों की तरह हो जाते हैं. कल क्लब में एक रोचक विषय पर डिबेट सुनी. आज क्विज है. नन्हा कल रामायण की अपनी किताब स्कूल में ही छोड़ आया है, पता नहीं आज उसे मिलेगी या.. जून हैं सदा की तरह स्नेहिल..पर उसे ही आजकल पता नहीं क्यों कुछ अच्छा नहीं लगता.

आज मन हल्का है तन भी, मालिश के बाद स्नान से कितना सुकून मिलता है, समय जरूर ज्यादा लग गया पर उसने सोचा हफ्ते में एक बार तो इतना समय स्नान को देना ही चाहिए. आजकल पिछले कुछ दिनों से वह ‘होमर’ की ‘ओडिसी’ पढ़ रही है, अनुवाद है अंग्रेजी में. बहुत रोचक है.

एकांत में खिले फूल के पास जाओ
फूल के पास अकेले जाओ
जैसे हवा जाती है
जैसे तितली जाती है
जैसे माँ जाती है
अपने घर में कोई खाली जगह ढूंढो
मिट्टी ! यह तन मिट्टी
धरती और आकाश की मिट्टी
जाहिर में बेरंग है मिट्टी !



Saturday, October 20, 2012

बच्चे मन के सच्चे



पिछली बार उसने शिकायत की थी सो इस बार जून पहले से उसके लिए नए वर्ष की कत्थई डायरी रखकर गए हैं, पहले पन्ने पर शुभकामना भी लिख दी है. उसकी यह पंक्ति पढकर मन कुछ स्थिर हुआ है वरना नए वर्ष का पहले दिन इतना उलझन भरा है कि बस.. सब कुछ गड्डमड्ड हो रहा है सुबह से. ऊपर से लाइट भी गायब है. बिजली है मगर उनके यहाँ तार हिल जाने से नहीं आ रही. एक तो इतनी देर से आँख खुली, सारी परेशानी तभी से शुरू हुई, सर में हल्का दर्द भी है, शायद घर से बाहर निकलने पर खुली हवा में ठीक हो जाये. चुपचाप आंख बंद करके बैठी रहे ऐसा ही मन हो रहा है इस समय, पर नन्हे ने ठीक से नाश्ता नहीं किया है, उसने सोचा उसके न रहने पर भी तो ऐसे ही करता होगा. उठो लेट तो सभी काम लेट हो जाते हैं, ग्यारह बजे हैं, बारह बजे वह स्कूल जायेगी, तैयार होने में उसे विशेष देर नहीं लगती. कल रात जून को स्वप्न में देखा, क्लब में है, वह नन्हे को लेकर पैदल ही क्लब जा रही है. वहाँ नए साल का कार्यक्रम है. कल रात नव वर्ष की पूर्व संध्या पर टीवी पर उन्होंने दो अच्छे कार्यक्रम देखे, शायद इसी का परिणाम था यह स्वप्न.

कल दिन की शुरुआत जितनी उलझन भरी थी अंत उतना खराब नहीं था. जून को पत्र लिखते लिखते ही मन हल्का हो गया. उसके प्यार ने हर बार उसे डूबने से बचा लिया है. उसके स्नेह की कोई सीमा नहीं, भले ही उसने वादे न किये हों पर...आज उसका भी पत्र आयेगा. कल गोपिराधा में आठवीं में बहुत दिनों बाद गणित पढ़ाया, ठीक था मगर आज कल से भी अच्छी तरह पढ़ाना होगा, ज्यादा बड़ी प्रमेय है आज. ननद का जन्मदिन है आज, वह शाम को उसे उपहार दिलाने ले जायेगी. कल बड़ी बुआजी का पत्र आया बहुत दिनों के बाद. फुफेरी बहन को चौथा बच्चा हुआ, बेटी, लेकिन उसकी मृत्यु हो गयी, यह पढ़कर उसे दुख नहीं हुआ, बहन भी अजीब स्थितियों का शिकार हो गयी है. कितनी बार दर्द सहेगी, बुआजी भी उसे समझाती नहीं हैं.  
कल जून के चार पत्र आए और विवाह की वर्षगाँठ के लिए एक कार्ड भी. वह तिनसुकिया गए उस कार्ड को लेने. आज गुरु गोविन्द सिंह की जयंती के उपलक्ष में अवकाश है. सुबह से ठंड काफी है, दोपहर को धूप निकली. कल शाम से सोनू की तबियत कुछ ठीक नहीं है, इस समय सोया है, माथा गर्म है, पर उसके पास क्रोसिन भी तो नहीं है.

आज पढ़ने या लिखने के नाम पर शून्य है, यहाँ तक कि न पत्र लिखा न पढा. आज एक कार्ड आया छोटे भाई के फादर इन ला का, इसका हिंदी अनुवाद ठीक सा नहीं लगता. सुबह नाश्ता बना रही थी कि पता चला सात तारीख तक स्कूल-कालेज सब बंद है. उसे अपनी पढ़ाई सलीके से शुरू कर देनी चाहिए, टीचर्स के सहारे रहकर तो कोर्स पूरा हो नहीं सकेगा. आए दिन स्कूल-कालेज बंद रहते है आजकल, या फिर इसी वर्ष ऐसा हो रहा है. शुरू से ही छुट्टियाँ ही छुट्टियाँ, एक तरह से अच्छा ही है नन्हे के लिए और उसके लिए भी, ज्यादा दिन उसे छोड़कर नहीं जाना पड़ा है. पर यह भी लगता है कि इस कारण परीक्षाएं देर से न हों. दोपहर को सोनू को सुलाया, लाइट नहीं थी सो ऊपर छत पर चली गयी किताब लेकर, आधा घंटा भी नहीं हुआ होगा की लाइट आने पर नीचे आयी, नन्हा जगकर रो रहा था, वह उसे ढूँढ रहा था, उसकी तबियत ठीक न होने के कारण ही शायद देर तक सो नहीं पाता. इस समय रात्रि के नौ बजने वाले है, नन्हा खेल रहा है, बच्चे थोड़ी सी उर्जा भी बचा कर रखना नहीं चाहते.