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Sunday, July 16, 2017

फुटबाल का विश्वकप


कल से उसके बाँए कान में सुनाई देना कम हो गया है और एक आवाज भी आती है. शायद इन्फेक्शन है या पानी चला गया है, अथवा तो वैक्स है और या तो ज्यादा सुनने से कान की श्रवण शक्ति कम हो गयी है. उम्र के साथ-साथ भी शरीर में कई परिवर्तन होते हैं. आज इतवार है और जून ने लंच में विशेष पुलाव तो बनाया ही था, शाम को ब्लू बेरी, रोस्टेड आलमंड, डेट्स तथा बगीचे से तोड़ा ताजा भुना हुआ भुट्टा. कल सिनेमा हॉल में HSKD देखी, फिल्म उसे ज्यादा पसंद नहीं आयी. अमेरिकन कॉर्न खाए और चालीस रूपये कप वाली चाय पी, यानि कल दिन भर मस्ती की. शाम को सत्संग में गये. गुरू पूर्णिमा  उत्सव के कारण गुरू पूजा थी. आज ट्विटर पर गुरूजी का संदेश देखा, यू ट्यूब पर उनका कल का संदेश भी कुछ देर के लिए सुना था. अभी वे कुछ देर बैडमिंटन खेलेंगे फिर शेष भाग सुनेंगे. फुटबाल के विश्व कप के खेल समाप्त हो चुके हैं. जर्मनी जीत गया है, ब्राजील चौथे स्थान पर है. जून भी डायरी लिख रहे हैं. लिखने से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है. जीवन को एक दिशा मिलती है. वे वही हो जाते हैं जैसा सोचते हैं. चेतना जब परम के साथ जुड़ी होती है तब कोई दुःख कोई परेशानी उन्हें छू भी नहीं सकती.

आज भी वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण स्थगित करना पड़ा, शाम को यदि मौसम खुल गया तो जा सकते हैं. उनके बगीचे में अन्नानास लगा है पर जून ने बाजार से लाये अनानास की तस्वीर व्हाट्स ऐप के एक ग्रुप में डाल दी, सब लोग खुश हैं और अगले वर्ष यहाँ आने का प्रोग्राम बना रहे हैं. अभी कुछ देर पहले ही आँख-कान-गला विशेषज्ञ से मिलकर आ रही है. उनके केबिन के बाहर काफी लोग बैठे थे. जून ने फोन कर दिया था सो सबसे पहले उसे ही बुलाया. कान साफ किया और अब खुला-खुला लग रह है, कान में डालने की दवा भी दी है. उसका गला भी थोड़ा सा खराब है पर डाक्टर ने देखकर कुछ कहा नहीं है. दवा के काउंटर पर भी काफी भीड़ थी. जनसंख्या इतनी बढ़ रही है सो हर जगह भीड़ तो बढ़ेगी ही, धैर्य सिखाती है भीड़ भी. वहाँ बातूनी सखी मिली, उसे भी इन्फेक्शन था, एक कोर्स कर चुकी है पर ठीक नहीं हुआ. नैनी ने तुलसी लाकर दी, फिर गर्म पानी भी थर्मस में भर दिया है, वह बहुत ख्याल रखती है हर बात का. सलाद सजाने में उसका जवाब नहीं. आज भी वर्षा हो रही है, जून अभी आने वाले हैं. उन्हें भी उसका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगता होगा जैसे उसे लिखकर लगता है. आज सुबह उन्हें कुछ अच्छी बातें परमात्मा ने कहलवायीं इस मुख से, वे अवश्य ही उन्हें याद रख पाएंगे. उसका जीवन भी सद्मार्ग से विचलित न हो, ऐसी प्रार्थना उसने अपने लिए की.

आज सुबह फिर एक अनोखे स्वप्न ने जगाया. एक नई ब्याहता को उसके पति का नवजात शिशु थमाया जाता है, जिसकी माँ मर चुकी है. वह उसे स्तनपान कराती है और लो..उसके स्तनों में दुग्ध उतर आता है. वात्सल्य की गहरी भावना उसके मन में जगती है और यह चमत्कार घटता है. ऐसे ही परमात्मा की गोद में जब वे अबोध शिशु की तरह वे जाते हैं तो उसका असीम आनंद उन्हें सहज ही मिलने लगता है. वह वहाँ था ही, उसे प्रकट भर होना था. तभी संतजन परमात्मा को माँ के रूप में भजते हैं. माँ कहने का भाव तभी सिद्ध होगा जब वे अबोध शिशु बन जाएँ, जो वास्तविक भी है. क्या जानते हैं वे इस संसार के बारे में, उनकी जानकारी अल्प है और अज्ञान अनंत है. उससे पूर्व भी कुछ स्वप्न देखे. एक में लोभ की प्रवृत्ति स्पष्ट दिख रही थी. स्वप्नों की दुनिया भी कितनी विचित्र है. कल रात बिजली चली गयी थी. वे पहले पूजा रूम में गये, जहाँ पांच खिड़कियाँ हैं, फिर बिजली आने पर अपने कमरे में, पुनः वहाँ जाना पड़ा और फिर लौटे, नींद लेकिन आ ही गयी. परमात्मा की कृपा ही है गहरी निद्रा, लेकिन अभी भी उसे स्वप्न बहुत आते हैं. जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में भी तूरीया यानि चौथी अवस्था बनी रहे, ऐसी ही कामना साधक की होती है, पर वह अवस्था कामना से नहीं मिलती.

सुबह किस स्वप्न ने जगाया याद नहीं, वर्षा नहीं थी सो टहलने गये, आकाश गुलाबी था और हवा में हल्की सी ठंडक. दोपहर को वह बाजार गयी, राखी बनाने का सामान खरीदा. अगले महीने की दस तारीख को राखी है, उसे बच्चों के लिए ढेर सारी राखियाँ बनानी हैं. उन्हें भेजने की तैयारी भी करनी चाहिए. सुबह कविता लिखी ब्लॉग पर और दोपहर को व्हाट्सएप पर पढ़ी. छोटी बहन ने सुंदर भजन गाया. शाम को पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, उसके पुत्र की मंगनी की खबर देने के लिए, दिसम्बर में विवाह है. नन्हे ने बताया अगले तीन महीनों में उसकी कम्पनी में काम करने वालों की संख्या दुगनी हो जाएगी.  



Sunday, September 11, 2016

भोर के तारे


आज पुनः आल्मारी में वस्त्रों के नीचे छिपाई हुईं टेबलेट्स व अन्य दवाइयाँ मिलीं. पहले भी कई बार बेड के नीचे, गद्दे के नीचे चार-पांच गोलियां मिलती रही हैं. कई दिनों से नहीं मिलीं तो सबने सोचा अब माँ ने मुंह से निकाल कर दवा छिपाना/ फेंकना बंद कर दिया है, पार आज तो पूरी बारह गोलियां थीं. पूछा तो बच्चे की तरह कहने लगीं, हमने ही रखी होंगी. पता नहीं कब रखीं, जबकि पिताजी दवा देकर सामने ही खड़े रहते हैं. कई बार तो दवा खाने की मेज पर ही दी जाती है, पर किसी न किसी तरह वह छिपा लेती होंगी. पिछले सवा साल से दिन भर में दसियों गोलियां खाने पर तो कोई भी ऊब जायेगा और छोड़ देना चाहेगा. इस समय वह अपने कमरे में कुर्सी पर बैठी कुछ धीरे-धीरे बोल रही हैं, शायद जाप कर रही हों. जून पिताजी को दांत के डाक्टर के पास ले गये हैं, उनका डेंचर फिट नहीं हो रहा है. आज शनिवार है, शाम को वे एक मित्र परिवार से मिलने जायेंगे, हो सका तो उसे अपना ब्लॉग दिखाएगी. कल दोपहर की कक्षा में वे एक ड्रामा करवाएंगे, ‘कृष्ण जन्म’, कल बिना ड्रेस के और अगले हफ्ते ड्रेस के साथ. परसों मृणाल ज्योति जाना है. टीचर्स को ध्यान के बारे में बताएगी. एक अवैतनिक अध्यापिका जो हाल ही में विधवा हुई थीं और अब सेवा के भाव से स्कूल आती हैं, काफी परेशान रहती हैं. जब तक परमात्मा को अपने जीवन का केंद्र न बना ले कोई, उसके दुःख कम नहीं हो सकते. यहाँ सभी परेशान हैं, धनी भी निर्धन भी, रोगी भी स्वस्थ भी. यहाँ वही सुखी है जो मन के पार चला गया ! समय का पहिया इसी तरह घूमता जायेगा और एक दिन मृत्यु द्वार पर आ खड़ी होगी. आज सुबह संध्या बेला में तारों भरा गगन देखते समय कितनी सुंदर कविता फूटी थी सहज ही, अब कुछ याद नहीं है. कितनी बार नींद में, तंद्रा में कविता की पंक्तियाँ अपने आप भीतर गूँजने लगती हैं, उन्हें रचा नहीं होता..पर बाद में याद नहीं रहतीं. क्या इसी को वेद के ऋषि द्रष्टा होना कहते थे. वेद वाणी को उन्होंने देखा था, रचा नहीं था..उसे अपने साथ एक छोटी डायरी और पेन रखना चाहिए ताकि फौरन उन्हें लिख ले ! आज सेंट्रल स्कूल जाना है, वाद-विवाद प्रतियोगिता है, ‘क्या भारत विश्व का नेतृत्व कर सकता है, क्या उसके पास यह क्षमता है’ ! उसे निर्णायक बनना है, पहले भी एक बार निर्णायक बनी थी, हिंदी में बोली अंत में, लेकिन आयोजकों का विचार था कि सम्भवतः वह अंग्रेजी में ही बोलेगी. आज अगर बोलने का अवसर आया तो भारत पर लिखी अपनी उस कविता की कुछ पंक्तियाँ ही पढ़ देगी.   

एक-एक पल कीमती है, श्वास-श्वास में उसका नाम लेना है, लूट मच रही है. चारों ओर वह बिखरा हुआ है, उसे कैसे समेटे, समझ में नहीं आता..कहना चाहिए कि कैसे बिखेरे..जो पाया है भीतर कैसे लुटाये उसे अनोखा है यह प्रेम ..जो सृष्टि के कण-कण के लिए भीतर घुमड़ता है, अनोखी है यह प्रीत जो सारे ब्रह्मांड के लिए दौड़ी जाती है, सबको गले लगाने को आतुर है..इतना पाया है भीतर कि समेटे नहीं सिमटता..आत्मा में अनंत शक्ति है, अनंत प्यार है, अनंत आनंद है..अनंत..ये सारे शब्द उसके मुख से प्रकट होते थे अब उनका साक्षात अनुभव होता है..होते होते ही यह घटा है..मिलते-मिलते ही मिला है..भरते-भरते ही घड़ा भरा है..बूंद-बूंद से सागर होता है कितना सही कहा गया है..जीवन जैसे एक वरदान बन गया है, एक उत्सव..परमात्मा की, सद्गुरु की कृपा से जीवन एक मशाल बन गया है, एक फूल बन गया है और बन गया है एक मिसाल...जो शहद से मीठे इस प्रेम को एक बार अनुभव कर ले वह तो जैसे बौरा ही जाता है..कदम बहकने लगते हैं, आँखें चमकने लगती हैं..नयन बरसने लगते हैं..वचन बहने लगते हैं..क्या नहीं होता उस एक की प्रीत में..जो उससे लगन लगा लेता है वह धनी हो जाता है..फिर कुछ भी पाने की लालसा नहीं रहती, इसी का नाम योग है..आत्मा का परमात्मा से योग...!


आज सुबह ध्यान में सद्गुरु की उपस्थिति को बिलकुल स्पष्ट किया उनके बोल भी सुने, परमात्मा हर जगह है, हर समय है इसमें कोई संशय नहीं रह गया है, वही तो है, उसके सिवाय कोई है भी नहीं..अभी-अभी दीदी से बात की, वे लोग चाय पीने जा रहे थे, अब परांठे के साथ वाली चाय छोड़ दी है ! परमात्मा सबका सुहृद है ! आज भी पिछले कई की तरह वर्षा का मौसम बना हुआ है, सुबह वे टहलने भी नहीं जा सके. कल शाम से आज सुबह तक कितनी पंक्तियाँ भीतर गुजरीं पर अब कुछ याद नहीं है, एक में तो देवी-देवों का जिक्र था. त्रिदेव तथा त्रिदेवियाँ साथ में सन्तोषी माँ, शीतला माँ सभी देवता उनके इस तन में ही तो वास करते हैं !    

Tuesday, May 24, 2016

सुखबोधानन्द जी का आगमन


जून आए और उसी शाम माँ को अस्पताल में भर्ती किया गया. आज चौथा दिन है. बारी-बारी से सभी अस्पताल जाते हैं. रात को नन्हा रहता है दादी के साथ. दिन में देर तक पिताजी. आज उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार नजर आ रहा है. कल क्लब में मीटिंग है, उसे दो कार्य करने हैं, पहला मृणाल ज्योति पर छोटा सा भाषण दूसरा हिंदी कविता पाठ का निर्णायक बनना. उसने सोचा वह मासिक डोनर मेम्बर बनने के लिए सदस्याओं से अपील करेगी. दान की महिमा पर भी कुछ कहेगी.  

नये महीने का आरम्भ हुए आठ दिन हो गये, और वह पहली बार लिख रही है. माँ अस्पताल से वापस आयीं पर दो दिन बाद फिर उन्हें जाना पड़ा. अभी तक वहीं पर हैं. टीवी पर एक सिख संत कह रहे हैं जिन्दगी की राह का आरम्भ गर्भ में होता है, मातापिता की वासना के साथ जब जीव की वासना मिल जाती है तब एक जीवन शुरू होता है. जन्म लेने के बाद जो जन्मदिन मनाते हैं वह वास्तविक नहीं है. कोई अपना आदि नहीं जानता. इसी तरह कोई नहीं जानता सृष्टि कब बनी, क्योंकि जब सृष्टि का निर्माण हुआ उसके पूर्व समय था ही नहीं. जो सूक्ष्म से स्थूल बनता है वही स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है. उस सूक्ष्म में प्रवेश करने के लिए सूक्ष्ममति चाहिए. मति स्थूल तब हो जाती है जब हर वक्त संसार के विचार ही मन में घूमते रहते हैं. सत्संग करते करते जब चेतन मन का दायरा बड़ा होने लगता है तब मति सूक्ष्म होने लगती है. जब मति सूक्ष्म हो जाती तब भीतर का ज्ञान प्रकट होता है.

आज शाम को क्लब में सुखबोधानन्द जी का कार्यक्रम है. उनके प्रवचन सीडी से सुने हैं पहले, एकाध बार टीवी पर भी सुना है. किताब पढ़ने का अवसर कभी न कभी मिल जायेगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनके लेख पढ़े हैं पर सामने सुनने का अवसर मिलेगा, अवश्य अच्छा लगेगा. जून एक बार घर आएंगे, नन्हे को अस्पताल व पापा को घर छोड़ देंगे. उनकी नई नैनी काम ठीक कर रही है, उसे आज एक हफ्ता हो गया है, सभी काम जान गयी है. घर जाने की जल्दी नहीं होती उसे, अभी विवाह नहीं हुआ, एक बार इस चक्कर में आ गई तो फटाफट काम खत्म करके भागने की फ़िक्र में रहेगी. पुरानी के साथ किस्मत ने जो किया उसका चले जाना ही ठीक था. पिछले महीने उसके अपाहिज पति का लम्बी बीमारी के बाद देहांत हो गया, दो बच्चे हैं, पांच वर्ष की बेटी दो वर्ष का पुत्र. ससुराल में रहकर ठीक एक महीने का शोक उसने मनाया पर उसके अगले ही दिन पड़ोसी के पुत्र के साथ कहीं चली गयी. बच्चे दादा-दादी के पास हैं. ममता को किस तरह भुला कर उसने यह कदम उठाया होगा. आस-पड़ोस के लोग आश्चर्य कर रहे हैं पर वह जानती रही होगी, उसके बिना भी बच्चे सुरक्षित हैं. रोज-रोज के कलह से तो अच्छा है दूर चले जाना. जीवन कितना विचित्र है, माँ जब ठीक थीं उसके बच्चों के साथ खेलती थीं, बीमार होने के बाद एक दिन कहने लगीं देखना यह चली जाएगी, उस वक्त सबने उनकी बात को मजाक में लिया था. 

Monday, May 23, 2016

द सीक्रेट - रोंडा बर्न की किताब

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मई का महीना आरम्भ हुए दो हफ्ते होने को हैं. आज पहली बार डायरी खोली है. कितना कुछ हुआ, हो रहा है और होने वाला है, भीतर भी और बाहर भी ! परहेज न करने के कारण सर्दी-जुकाम हो गया. सेहत बनाने के चक्कर में एक बार पुनः सेहत का बिगाड़ कर लिया. दो बार मृणाल ज्योति जाना हुआ, उनकी समस्याओं से रूबरू हुई. उन्हें आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है, उनका सेंटर जहाँ पर है वह स्थान बहुत नीची जगह पर है. मैदान बनवाने के लिए अथवा निर्माण कार्य करने से पहले जमीन को मिट्टी से भरवाना पड़ता है, जिसमें बहुत खर्च आता है. उनके पास बच्चों को लाने व छोड़ने के लिए एक वैन है जो पुरानी हो गयी है और उसके रख-रखाव पर काफी खर्चा आ रहा है, कोई बाऊँड्री वाल नहीं है, जिसे बनवाने के लिए फंड चाहिए. बूंद –बूंद से सागर बनता है, अगर वह क्लब में सहायता के लिए अपील करे तो कुछ लोग मदद करने के लिए आगे आ सकते हैं.

संतजन कहते हैं सभी मंजिल पर पहुंच सकें, इसलिए देह रूपी वाहन मिला है, जीवन की लालसा उन्हें इस वाहन में बैठे रहने पर विवश करती है. क्योंकि वे मंजिल तक पहुंच नहीं पाते, मृत्यु से भय लगता है. जिसे मंजिल का पता चल गया वह मृत्यु से नहीं डरता, असली जीवन इस ज्ञान के बाद ही शुरू होता है ! भय मुक्त मन ही अस्तित्त्व के प्रति प्रेम से भर जाता है और ऐसा मन ही परमात्मा के प्रति समर्पित हो सकता है ! लेकिन मानव इस सत्य से अनभिज्ञ रहता है और सारा जीवन गुजार देता है ! मृत्यु उसे डराती है और वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है. अविद्या, अशिक्षा व अज्ञान सबसे बड़े रोग हैं, स्कूली व कालेज की शिक्षा नहीं बल्कि जीवन की शिक्षा ! जो सद्गुरु देते हैं, लेकिन वे सद्गुरु के द्वार तक ही नहीं पहुंच पाते. गुरु परमशान्ति का द्वार है लेकिन उस शांति का अनुभव बिरले ही कर पाते हैं.

पिछले हफ्ते सास-ससुर यहाँ आये तब उन्हें माँ की बीमारी के बारे में ठीक से पता चला. वृद्धावस्था की कारण वह भूलने की बीमारी से ग्रसित हो गयी हैं. उन्हें दिन का, समय का, महीने का कोई बोध नहीं रह गया है. जब से यहाँ आई थीं, शारीरिक रूप से वह स्वस्थ हो रही हैं पर मानसिक रूप से अस्वस्थ ही हैं, वृद्धावस्था अपने आप में एक रोग है. वह स्वयं भी तो उसी की ओर कदम बढ़ा रही है, आँखों की शक्ति घट रही है, मन सदा विचारों से भरा रहता है. पिछले कई दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं. जून बाहर गये हैं, अभी तीन दिन और हैं उन्हें लौटने में, समय की कमी नहीं है. कल लाइब्रेरी से दो किताबें लायी. पहली The Secret  दूसरी पुस्तक बराक ओबामा पर है. इस बार कई अच्छी पुस्तकें आई हैं. 

एक दिन और बीत गया, माँ की बीमारी घटती नजर नहीं आती. सम्भवतः उन्हें मतिभ्रम हो गया है. हर बात में शिकायत करना स्वभाव बन गया है, सहन शक्ति बिलकुल खत्म हो गयी है. पिताजी कितने उपाय करके उन्हें समझाते हैं पर कोई असर होता नजर नहीं आता. इस समय रात के साढ़े नौ बजे हैं. परसों दोपहर जून आ रहे हैं, सबके लिए कुछ न कुछ ला रहे हैं.

Friday, September 19, 2014

बादल और सूरज


कल रात फिर माँ को सपने में देखा. वे सभी थे. पिता, सभी भाई-बहन. वह काम कर रही थी, जैसे कि सशरीर हों, वास्तव में वह नहीं थीं, फिर वह पलंग पर बैठ जाती हैं और पानी मांगती हैं. वे उन्हें पानी नहीं दे पाते क्योंकि उनका भौतिक अस्तित्त्व नहीं है. मंझला भाई बोतल से उन्हीं के सामने पानी पी रहा है और वह गिड़गिड़ाती हैं, फिर दुःख और क्रोध से कहती हैं कि उन्हें पानी न देकर क्या वे सब जीवित रह पाएंगे? कैसा अजीब सा स्वप्न था, पर स्वप्न का अर्थ ही है अजीब...इसके बाद ही वह जग गयी और यही सोचती रही कि उसके ही मन ने इसे गढ़ा होगा, वास्तव में ऐसा नहीं होगा कि माँ को अंतिम समय में पानी की जरूरत रही हो और वह उन्हें न मिला हो. पर अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं है, जाने वाले एक बार जाकर वापस नहीं आते. कल जून ने “बस इतना सा सरमाया” की spiral binding भी करवा दी. नन्हे ने उस दिन कवर पेज भी कम्प्यूटर पर प्रिंट कर दिया था. माँ की कृतज्ञ है कि न होने पर भी उन्होंने उसे इतना बल दिया. कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये. सखी की तबियत ठीक नहीं थी पर उसने अच्छी आवभगत की अब वापसी पर घर आने का निमन्त्रण भी दे दिया है. आज सुबह से सूरज निकला है अभी पैकिंग का कुछ काम शेष है. जून के आने से पहले समाप्त हो जाने से अच्छा है वरना वह बहुत जल्दी परेशान हो जाते हैं.

आज सुबह पिता से बात की, ठंड वहाँ कम हो गयी है सो ज्यादा गर्म कपड़े ले जाने की आवश्यकता नहीं है. इस समय फिर आकाश बादलों से ढका है, धूप निकलती है तो सब कितना स्पष्ट दिखाई देता है ऐसे ही जब मन पर अज्ञान के बादल छाये हों तो कुछ भी स्पष्ट नहीं सोच पाता. ज्ञान की एक किरण ही कितना प्रकाश भर देती है. सुबह बंगाली सखी ने उसकी कविताओं की तारीफ की उसने अपने पति से उनके बारे में सुना था. कल दो और मित्र परिवारों ने भी पांडुलिपि देखी. एक रचियता के लिए सबसे सुखद पल वे होते हैं जब कोई उसकी रचना को पढ़े व समझे.    

मार्च का मध्य आ गया है. फरवरी के अंतिम सप्ताह में वे यात्रा पर निकले थे. उस दिन के बाद आज पहली बार डायरी खोली है. वे तीन दिन पहले वापस आ गये थे, आने के बाद सफाई आदि के कार्य से निबट कर पुनः पुस्तक के काम में जुट गयी है. अभी भी आठ-दस दिनों का काम शेष है. नन्हा सुबह सोकर उठा तो पेट दर्द की शिकायत कर रहा था, उसे सम्भवतः अपच हो गया है. सुबह एक सखी से बात हुई उसने कहा, वह कहानियाँ भी लिखे, एक बार पहले भी उसने यह बात कही थी. उसकी अगली पुस्तक कहानियों की हो सकती है, विचार बुरा नहीं है. अज सुबह छोटी बहन से बात की, वह थोड़ी चुपचुप लगी, परिवार से दूर होने के कारण या वे उससे मिलने नहीं गये शायद इस बात का मलाल हो या उसका वहम् भी हो सकता है. आज नन्हे को नई किताबें लेने स्कूल जाना है जून उसे दोपहर को ले जायेंगे.




Monday, September 15, 2014

यादों की परछाइयाँ




 ध्यान वह स्थिति है जहाँ मन नहीं रहता अथवा तो मन समाहित हो जाता है, न भूतकाल की चिंता न भविष्य की कल्पनाएँ ! संसार समय की बदलती हुई स्थिति को दर्शाता है. ध्यान समय, संसार और विचार तीनों से पार ले जाता है. ध्यानस्थ मन ही ज्ञान का अधिकारी हो सकता है. ध्यान एक तरह से मन का स्नान है, मन उज्ज्वल होता है, हल्का होता है, स्वस्थ होता है अर्थात स्व में टिक जाता है, स्वच्छ होता है अर्थात निर्मल होता है. आज बाबाजी ने कितनी सुंदर बातें कहीं, जगत का अभिन्न उपादान ईश्वर है, जो इस जगत को ईश्वरमय जान लेता है उसका ध्यान टिकता है. आज सुबह छोटी बहन से बात की उसे इसी माह पुनः फील्ड ड्यूटी जाना है, अगले माह ही पूरा परिवार पुनः मिलेगा. कल शाम जून ने उसकी डायरी पढ़ी, वर्षों बाद उन्होंने ऐसा किया है. नन्हे की आज बायोलॉजी की प्रयोगात्मक परीक्षा है. कल रात खाने के समय उसका मनपसन्द कार्यक्रम टीवी पर देखने को नहीं मिला तो कैसे चुप हो गया था, हरेक के पास नाराजगी जाहिर करने का कोई न कोई उपाय है.

इस क्षण ऐसा लग रहा है, सब ठीक है. आज से दो हफ्ते पहले आज ही के दिन वे कितने उदास थे. एक बार पढ़ा था कि जब भी किसी दुःख या विपत्ति का सामना करना पड़े तो उसे दो हफ्ते या दो महीने बाद कल्पना में देखना चाहिए कि उस वक्त उसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा. दुःख की घड़ी में बुद्धि भ्रमित हो जाती है, सही निर्णय लेना तो दूर सही वार्तालाप भी नहीं कर पाते. अब माँ की यादें ही उनके साथ रह गयी हैं, वह स्वयं पूर्ण विश्रांति पा चुकी हैं. उसने याद करने की कोशिश की, पिछले वर्ष या पिछले महीने आज के दिन वे किस मनः स्थिति में थे. दुःख या सुख का अनुभव किया होगा किन्तु कुछ याद नहीं आया, वह समय बीत गया परन्तु वे फिर भी हैं ऐसे ही आज के सुख-दुःख भी बीत जाने वाले हैं. वे साक्षी भाव में उसे देखते चलें. उसमें डूब कर अपनी मानसिक, आत्मिक व शारीरिक ऊर्जा का हनन न करें. सन्त कहते हैं, सारा संसार सपना  है और जो उसे देखने के योग्य बनाता है वह परमात्मा ही अपना है. कल उसने बैक डोर पड़ोसिन के यहाँ, जो घर में ही पार्लर चलाती है, हेयर कट करवाए. बहुत अच्छे तो नहीं कटे पर जून ने कहा ठीक हैं, और उसके जीवन की नैया की पतवार तो उनके ही हाथ में है. गुजरात में कल फिर भूकम्प के झटके महसूस किये गये, भयभीत और पीड़ित लोग और घबरा गये. ईश्वर इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है. धीरे-धीरे वहाँ जीवन सामान्य होता जा रहा था. पुनर्निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका है.

कल सुबह जून को उसने जब परेशान होकर कहा कि छोटे भाई ने फरवरी में आने के लिए मना किया था अपने बच्चों की परीक्षाओं के कारण और इस विषय में बहनों से ही उसकी बात हुई है तो वे सोच में पड़ गये. उन्होंने भी तो नन्हे की परीक्षाओं को महत्व देते हुए उनके बाद ही यात्रा करने का निर्णय लिया था. दोनों का ही दिन सोच-विचार में बीता, पर शाम होते-होते उन्होंने निर्णय ले लिया कि अब इस बात को यहीं छोड़कर आगे बढ़ने का वक्त आ गया है. बड़े भाई का फोन आया, उन्हें उसकी फ़िक्र है ऐसा लगा, उन्होंने पुनः फोन करने को कहा है. कल रात वे ठीक से सो पाए, फिर भी एक स्वप्न तो उसने पिछली कई रातों की तरह देखा जो माँ से जुड़ा था. अभी अभी ससुराल से फोन आया वे लोग इस महीने के अंत तक नये मकान में चले जायेंगे.

कल रात छोटे भाई का फोन आया, उसके अनुसार उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि आने को मना करना इतना बुरा लगेगा. उन्होंने सामान्य तौर पर यह बात कही थी. छोटी बहन ने माना कि उसने ही पिता को इसके बारे में बताया था. जून ने भी सभी से बात की, इतने दिनों का उहापोह खत्म हो गया. उसने दीदी को भी धन्यवाद देने के लिए फोन किया जिन्होंने भाई को नूना की मनः स्थिति से परिचित कराया पर वह पूजाघर में थीं, उसने जीजाजी को संदेश दे दिया.  

आज सुबह बहुत दिनों बाद वे आराम से उठे, क्यों कि रात आराम से बीती. कल ‘जनगणना’ कार्यालय के कर्मचारी आये, उसने उनके प्रश्नों के उत्तर दिए. उनका घर जाना अब तय हो गया है. मन जैसे हल्का हो गया है. इस दौरान उन्हें भाई व दीदी के शहर भी जाना है. हो सका तो एक दिन के लिए मामीजी से मिलने उनके शहर भी जाना है. बड़ी बुआ जी के साथ भी एक दिन बिताना है. पैतृक निवास पर भी जाना होगा. चचेरी बहन से मिलना है. फुफेरी व ममेरी बहन से फोन पर बात करनी है. छोटी बुआ से भी वह बात करेगी, हो सका तो रास्ते में मासी के घर भी जाएगी. वह उन सब के साथ मिलकर माँ की उन यादों को बांटना चाहती है जो उनके मध्य साझी हैं. इसके अलावा अपनी किताब के लिए प्रकाशक की तलाश करनी है.   


Wednesday, July 23, 2014

भुट्टे के फायदे



उन्हें यहाँ आये अर्थात घर वापस आये तीन दिन हो गये हैं, कल दो पत्र लिखे, अभी स्मृतियाँ सजीव हैं. यहाँ भी वर्षा ने उनका स्वागत किया. जून, वह और नन्हा तीनों बहुत खुश हैं, यात्रा और कुछ दिन घर से दूर रहने के कारण घर की हर वस्तु उन्हें अच्छी लग रही है. माँ का ख्याल हमेशा बना रहता है, उनकी तबियत सुधर रही होगी या नहीं, इतनी दूर बैठे वे जान नहीं सकते, जानकर भी कुछ नहीं कर सकते, ईश्वर से मात्र प्रार्थना जरूर कर सकते हैं. प्रार्थना के आगे मात्र लगाकर उसके सत्य को कम करने का उसका इरादा नहीं है बल्कि अपनी क्षुद्रता पर पर्दा डाल रही है कि उसकी प्रार्थना में कोई असर होगा भी या नहीं. इतने दिनों भगवान से दूर जो रही, अपनी व्यस्तता में उसे भुला बैठी. सभी सखियों से फोन पर या मिलकर बात हुई, अच्छा लगा, वह बातूनी सखी दूसरी बार माँ बनी है बेटे की, कुछ दिन बाद देखने जाएगी. एक मित्र परिवार मिठाई खाने नहीं आ सका जो वे उनके लिए लाये थे, सम्भवतः आज आयें, कल शाम उन्होंने बगीचे में भी काम किया, भुट्टे बहुत हो रहे हैं, जिन्हें वे शाम को नाश्ते में खाते हैं. उसने भुने हुए भुट्टों के फायदे के बारे में कहीं पढ़ा था.

कर्म ही पूजा है, यह विचार इस समय उसके मन में प्रधान है. भक्ति की अपेक्षा कर्म का मार्ग उसे अधिक रुचता है, कर्म के द्वारा ही कोई अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितयों तथा स्तर में सुधार ला सकता है, कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है क्योंकि उसके पास विचार करने को अन्य कुछ नहीं रहता. कर्म, सद्कर्म हो यह लेकिन पहली शर्त है, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंदर ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो, ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. कल शाम को वह माँ के स्वास्थ्य के बारे में सोचती रही, मन कहीं और लग ही नहीं रहा था, आज सुबह फोन किया पर मिला नहीं, ईश्वर से प्रार्थना की तो चैन मिला. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता. उसी का बनाया हुआ यह माया जाल है सो सब कुछ उसी पर छोड़कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.

आज उसे संगीत क्लास में जाना है, अभ्यास तो पिछले एक महीने में दो-चार बार ही हुआ फिर भी टीचर के साथ अभ्यास करने से उत्साह बढ़ेगा ही. आज उसे उस नये शिशु से मिलने भी जाना था पर वर्षा की झड़ी जो जून के दफ्तर जाने से पहले लगी थी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. अभी उसे भोजन बनाना है और नन्हे को पढ़ाई में मदद करनी है, वह आजकल रोज रात को देर से सोता है सो सुबह देर से उठता है, पर जब से घर से वे आये हैं साधारणतया खुश रहता है, उसके मित्र भी पढ़ाई में व्यस्त हैं सो फोन से ज्यादा डिस्टर्ब भी नहीं करते. आज बहुत दिनों बाद ‘जागरण’ सुना, बाबाजी आज भक्तिभाव में विभोर होकर नृत्य करने लगे थे, उसे लगता है हजारों लोग जो घंटों वहाँ बैठते हैं यदि कार्य करें तो देश का कितना कल्याण हो. लोगों का खुद कल्याण हो, हो सकता है वे श्रमदान के लिए शिविर भी लगते हों.  कल माँ-पिता से फोन पर बात हुई, माँ ने दवाएं न लेने या कम करने का फैसला किया है, दवाइयाँ खाना तो किसी को भी पसंद नहीं पर जब दवा जीने की शर्त ही बन जाये तो कोई कैसे छोड़ सकता है.





Saturday, July 19, 2014

हिमाचल की वादियाँ



कल शाम दीदी चली गयीं, माँ की अस्वस्थता के कारण वे नहीं गये, आज सुबह उसने फोन पर उन्हें माँ के स्वास्थ्य के बारे में बताया, छोटी बहन भी यहाँ आने के लिए तैयार है पर पिता ने उसी की असुविधा को देखते हुए मना कर दिया. इस समय भाई के साथ जून भी माँ को डाक्टर के पास ले गये हैं. बच्चे यहीं पढ़ाई में लगे हैं, पिता उन्हें फल व खाखरा आदि खिला रहे हैं. आज कई दिनों बाद उसने पिता के हारमोनियम पर रियाज किया, सुबह ‘ओशो’ की एक पुस्तक में से चंद लाइनें पढ़ीं, सभी धर्मगुरू सभी धर्म एक सी बातें कहते हैं. कल रात वह काफी देर तक सो नहीं सकी, उसके बिस्तर से माँ का बिस्तर दिख रहा था वह हर पांच-दस लेटने के बाद उठ जाती थीं, उठ कर बैठतीं फिर बैठ-बैठे ही सोने लगतीं, उन्हें देखकर लगा कि उनकी तबियत काफी खराब है पर दिन में जाहिर नहीं होने देती हैं, उनकी हिम्मत देखकर रश्क होता है.

दो ही दिन हुए हैं पर लग रहा है बहुत दिनों के बाद लिख रही है. उस दिन सुबह वे हिमाचल प्रदेश के सुंदर शहर सोलन जाने के लिए रवाना हुए तो माँ का स्वास्थ्य पहले जैसा ही था. छोटी बहन वहाँ प्रतीक्षा कर रही थी सो वे चल पड़े, रास्ता आराम से कट गया. तीन बजे वे गंतव्य स्थल पर पहुंच गये. सोलन एक खुबसूरत पहाड़ी जगह है, बहन उन्हें लेने आई थी, उसने बताया, भाई का फोन आया था, माँ को अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल ही वह भी उनके साथ घर जाएगी, वह उन्हें घर के पास की पहाड़ी पर ले गयी, दो घंटे वे पहाड़ों पर घूमते रहे, वापस आकर खाना बनाया और सुबह की वापसी की तैयारी करके सो गये.

उनके पूर्व कार्यक्रम के अनुसार आज उनका यात्रा का दिन था, पर इन्सान जो सोचता है वही तो नहीं होता. उन्हें यहाँ आये आज आठवां दिन है. कल मामी जी भी माँ को देखने आयीं, आज वापस चली गयीं. माँ अब काफी ठीक हैं पर पूरी तरह से नहीं, उन्हें अभी बहुत देखभाल की जरूरत है. जून छोटी बहन के साथ अस्पताल गये हैं, जो डाक्टर है सो उसका यहाँ होना लाभदायक है. जून और वह एक बार भी साथ-साथ नहीं गये, शायद यह इस कारण हो कि वह यहाँ आकर अपने पुराने दिनों में लौट आयी है. अपनी उम्र का भी अहसास नहीं होता. नन्हा दीदी के यहाँ गया हुआ है, उसे लेने उन्हें जाना है. शायद आज या कल. मौसम यहाँ बेहद गर्म हो गया है और बिजली चली जाने पर घुटन हो जाती है. रात को वे सोये तो छोटी बहन और उसकी बेटियां भी उनके कमरे में थीं, देर रात तक बातें कीं फिर भांजी सोये-सोये कोई स्वप्न देखने लगी या गर्मी से परेशान होकर रोने लगी. बहन को उसने कहा उसे थोड़ा स्वालम्बी बनाये पर उसने कई और बातें कहीं, जिससे यही सिद्ध हुआ कि वह वैसे ही खुश है, उसे बच्चों के रोने या जिद करने पर खीझ नहीं होती, न झुंझलाहट. वह हिम्मती तो है ही और किसी को judge करने या सलाह देने की भूल करने की सजा तो भुगतनी ही पडती है.

आज उसका जन्मदिन है, किन्तु हर वर्ष जैसी उमंग जो इस दिन स्वतः ही होती थी आज नहीं है, पिछले वर्ष वह असम में थी, सुबह-सुबह सभी ने फोन से मुबारकबाद दी थी, आज यहाँ घर पर है, छोटी बहन, भाभी, पिता और जून बधाई दे चुके हैं, ससुराल से भी फोन आ चुका है. असम में भी उसकी सखियों ने याद किया होगा. कितने दिनों से बाबाजी को सुना नहीं, यहाँ सुबह ही बिजली चली जाती है. माँ कल घर वापस आ गयी हैं, अभी कुछ दिन मंझले भाई के यहाँ रहेंगी. आज बड़े भैया-भाभी वापस जा रहे हैं. पिछले दिनों सभी ने मिलजुल कर माँ-पिता को सहयोग दिया, सभी भाई-बहन एक सूत्र में बंधे हैं. चौबीस घंटों के लिए दीदी के घर भी गयी, उनका घर बहुत बड़ा है, सामान भी तरह-तरह के हैं. दीदी को भी क्रॉस वर्ड भरने का शौक है, अभी भी बच्चों की तरह उत्साह से भर जाती हैं छोटी-छोटी बातों पर, उम्र का कोई असर उनके मन पर नहीं हुआ है. छोटी बहन भी वैसी ही है, उसको डाक्टरी ज्ञान, लेकिन बहुत है, पिछले दस-बारह वर्षों का अनुभव ! जून से उसकी बातचीत बहुत सीमित ही हो पाती है, कल वे मार्केट गये, घरके लिए व स्वयं के लिए कई छोटे-मोटे सामान खरीदे. अभी एक हफ्ता उन्हें यहाँ और रहना है.



माँ का स्वास्थ्य



अंततः वह दिन आ गया, आज उन्हें यात्रा पर निकलना है, मन में उत्साह है और जोश भी, यात्रा अपने आप में सम्पूर्ण जीवन है, तरह-तरह की परिस्थितयों से गुजरना, लोगों से मिलना और यात्रा का आरम्भ व अंत, जैसे कि जीवन में होता है. सुबह वर्षा के कारण नींद जल्दी खुल गयी. बादल गरज भी रहे थे और बरस भी रहे थे, नन्हे ने आज सुबह से सभी कार्यों में सहयोग दिया है जिससे कि बाकी बचे समय में वह कम्प्यूटर गेम खेल सके. जैन मुनि ने आज बताया, जिस सुख को लोग बाहर खोजते हैं वह उन्हें अन्तर्मुखी होकर अपने भावों, संवेदनाओं और विचारों को समझ कर ही मिल सकता है. बाबाजी ने सहज स्वभाव की बात की तो नानक की यह बात उसे याद आई, ‘थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप सुरंजन सोई’ ! जैसे फूल अपने आप खिलता है, अंतर से ख़ुशी स्वयंमेव निकलनी चाहिए, वह ख़ुशी जो अंतर्मन को तो प्रकाशित करे ही बल्कि अपने बाहर, इर्द-गिर्द भी खुशबू फैला दे. जैसे तुलसी दास ने कहा है, रामनाम का दीया अधरों पर रखने से अंतर्मन के साथ-साथ बाहर भी उजाला फैलता है. देहरी पर रखे दीपक की भांति. मौसम उनका पूरा साथ दे रहा है. अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर उनके साथ है. वह तो हमेशा ही उनके सिरों पर अपना हाथ रखे हुए है.

It is a pleasant morning. They reached  Guwahati at 4.15 am in the morning, she was dreaming then but got up around five fifteen due to continuous flow of passengers in and out both. They are in first coupe so every next moment some one comes or goes. Nanha is still in bed on upper berth. She went for a stroll with jun and they bought a newspaper, which he is reading now. Yesterday when they left home it was raining, reached station before time, waited for some time and train came on right time. Mrs singh their co passenger is a well educated soft spoken garwali lady, they talked about her favourite subject hills of Garwal for one hour in empty coupe,  drinking tea and viewing the greenery of Assam till they reached  first stop. Then she read the book, Meditation, till soup and dinner was served. It was nice, soup and dinner both but article in the book was superb, it gave inner peace, inspiration and insight to her mind and she came to know once again that all things, relationships and possessions are subject to change and  decay.

रात को वे सोये तो उनकी ट्रेन बरौनी में थी और सुबह उठे तो इलाहबाद आ गया था, रात भर वह आराम से सोयी जैसा कि सदा रेल यात्रा में उसके साथ होता है. नन्हा अभी भी सो रहा है, जून और वह चाय ले चुके हैं, उनके अन्य सहयात्री भी सुबह उठने वालों में से हैं, पर मिसेज सिंह अभी भी सो रही हैं, शायद उनकी तबियत ठीक नहीं है क्योंकि ज्यादातर समय वह सोती रही हैं. घर पर सभी को उनकी प्रतीक्षा होगी, शाम तक वे घर पहुंच जायेंगे और जैसा कि उसने सोचा है उनका हर दिन एक खास दिन हो इस तरह से रहेंगे. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है, सभी जाने-अनजाने उस परम सत्ता की ओर खिंचे चले जा रहे हैं पर उसने सचेत होकर उसका मार्ग चुना है, इस विशाल ब्रह्मांड में हर ओर उसी की सत्ता का प्रसार है, उनका अल्प जीवन, अल्प बुद्धि, अल्प समझ उसे मात्र प्रेम के द्वारा ही समझ सकती है, प्रेम का प्रतिदान प्रेम ही होता है.

कल शाम छह बजे उनकी ट्रेन गन्तव्य पर पहुँची, देहली से मंझली भाभी व भतीजी भी उनके साथ हो ली थीं, उन्हीं से पता चला कि माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, पिता के साथ जून अभी उन्हें heart checkup कैंप में ECG के लिए ले गये हैं, उसके पहले एक डाक्टर से मिलने उनके घर गये थे. यहाँ सभी बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं, बड़ों के पास उनके लिए वक्त नहीं है. गर्मी अभी उतनी नहीं है. कल शाम वर्षा हो गयी थी, रात को हवा काफी ठंडी थी. उसकी आँखों में धूप व धूल की वजह से हल्का सा दर्द है. छोटे भाई व दीदी से आध्यात्मिक विषय पर थोड़ी चर्चा हुई, उसके शब्दों में कहीं अहंकार झलका था ऐसा उसे बाद में लगा. नम्रता, जबकि पहली जरूरत है. आज सुबह छोटी बहन से भी बात हुई, आज शाम को उन्हें दीदी के साथ जाना है, कल शाम लौटेंगे, परसों छोटी बहन के पास हिमाचल प्रदेश जायेंगे. जैसे कहानी से कहानी का जन्म होता है, वैसे ही उनकी यात्रा से कई यात्राओं का होना था. यहाँ आस-पास कई मकान बन गये हैं, लोग बढ़ गये हैं, सो पहले की सी बात नहीं है लेकिन परिवर्तन तो जीवन का सबसे बड़ा सत्य है.


Wednesday, May 28, 2014

द तिबतियन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग


She is waiting for Nanha to vacate the bathroom he is there since last one hour, he has to go his school with jun to bring his new books and dress  for new class. Today in the morning when she saw the capsicum bed, became sad to see its bad condition but then recalled ‘The Gospel of Buddha’ immediately became cheerful again and arranged it to be cleaned. Everything depends upon the mental state ie attitude which one  takes  towards various things. Ma-papa are sitting outside in the sun.
कल शाम माँ ने रास्ते में, जब वे घूम कर आ रहे थे, पिता की कठोरता की शिकायत की. उनका स्वभाव बच्चों जैसा है, मानसिक विकास भी उनका वहीं तक सीमित है, स्कूल कभी गयी नहीं, सीधा-सपाट मन जो प्रेम से भरा है और मीठी बोली, पर घर में सभी उनकी अस्वस्थता व भोलेपन की वजह से उन पर हुकुम चलाना अपना अधिकार समझते हैं. कोई उन्हें गम्भीरता से नहीं लेता. इसका उन्हें दुःख था.

Today is Women’s day ! she is proud to be a woman. Just now read another chapters  in ‘The gospel of Buddha’ and ‘The Tibetan book of living and dying’. Both are full of knowledge and stimulate the mind. They say all are changing with this continuously changing world. Today  weather is cloudy and cold. Her inside is also dull , feeling some fullness in stomach and hips. May be this is due to not doing exercise properly today. Yesterday they had a get together with DPS people. Nanha ‘s  maths teacher praised him very much she was happy to hear all the praise coming from all the sides. It is a great satisfaction to have a son or daughter  who is intelligent and laborious. Today she could not practice music but still there is time.

Last night it rained so weather is pleasant now. Surroundings are green and clean, wind is cool and so is earth, wet and cool. Tibetan master has advised-
Always recognize the dream like qualities of life and reduce attachment and aversion. Practice good-heartedness toward all beings. Be loving and compassionate, no matter what others do to you. What they will do not matters so much when you see it as a dream. The trick is to have positive intention during the dream. This is the essential point. This is true spirituality.
William black said-
He who binds to himself a joy
 Does the winged life destroy
He who kisses the joy as it flies
Lives in eternity’s Sun rise.

Every thing around us is bound to change so it is futile to hope for permanence and security. To let go is to love. When one lose someone he realizes  that he loves him/her.

कल उसने कुछ नहीं लिखा, ऐसा लगा जैसे लिखने को कुछ है ही नहीं. इस वक्त लेकिन मन में कितना कुछ है. सुबह छह बजे से कुछ पहले ही उठी, कल शाम को घर से जनवरी का लिखा खत आया, महीनों बाद लेकिन पूरा नहीं पढ़ा, उसके बाद का खत भी आ चुका है और फोन से बात भी हो चुकी है सो पत्र पढ़ने का उत्साह ही नहीं हुआ. वैसे भी घर पर मेहमान आये हुए हों तो दिमाग एक ही तरफ रहता है. परसों वे लोग यानि माँ-पापा वापस जा रहे हैं सो उसके बाद ही सभी पत्रों का जवाब दे पायेगी. मन की सहज स्वाभाविक स्थिति देर तक नहीं रह पाती, कभी-कभी शिकायती हो जाता है, एक क्षण में कैसे जीया जाता है कल यही पढ़ रही थी पर थोड़ी देर तक ही याद रहता है फिर सुविधाजीवी मन थोड़ी सी असुविधा भी सहन नहीं कर पाता और जाले बुनने लगता है.
वह कल का खत उसने आज पढ़ा, मन आर्द्र हो उठा है, पिता ने उसके उस पहले पत्र में व्यक्त भावों की कितनी अच्छी तरह समझा और जवाब दिया और वह सोचती रही कि उसका पत्र बिना जवाब के रह गया. डाकविभाग की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लोगों के बीच गलतफहमी पैदा करने में. उसे भी अब एक खत लिखना है जो उम्मीद करती है वक्त से मिल जायेगा.

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Friday, September 27, 2013

हवाई जहाज की दुर्घटना


..और आखिर आज धूप निकल आई है, इतने दिनों के बाद पेड़, पौधे, घास सभी को धूप अच्छी लग रही होगी. पंछियों को भी, जैसे उन्हें इसका स्पर्श कोमल लग रहा है. यहाँ उसके कमरे में खिड़की से आती हल्की तपन भली लग रही है. कल रात आठ बजे वे तीनों आये, थके हुए थे पर स्वस्थ थे. पिता इतना सारा सामान लाये हैं, और माँ उन सबके लिए वस्त्र लायी हैं सदा की तरह, उसे अपनी ड्रेस उतनी अच्छी नहीं लगी, क्यों कि वे बहुत गहरे रंग के रेशमी वस्त्र लाती हैं. वह हल्के और सूती कपड़े पहनना पसंद करती है, पर वह उन पर यह बात जाहिर नहीं करेगी. कल शाम को इंतजार करते समय और आज सुबह भी कुछ देर आचार्य रजनीश की किताब पढ़ी, मन को बांध लेते हैं उनके शब्द, उसे उनकी कुछ बातें अच्छी लगीं कुछ नहीं भी लगीं. कुछ बातें समझ में आती हैं, कुछ बहुत मुश्किल हैं और कुछ पर विश्वास ही नहीं होता.


जून उनकी डाइनिंग टेबल लाने तिनसुकिया गये हैं और कार की बैटरी भी जो परसों गोहाटी से वापस आने पर उन्हें खराब मिली. नन्हा आज देर से आयेगा उसकी असमिया कक्षा होगी. सारी सुबह आजकल कैसे बीत जाती है पता ही नहीं चलता, इस समय पिता टीवी पर क्रिकेट मैच देख रहे और माँ ने स्वेटर बनाना शुरू किया है. घर में चुप्पी है, सिवाय टीवी की हल्की आवाज के या किचन में नैनी के बर्तनों की आवाज के. कल शाम उनके एक मित्र स्वयं ही आ गये, उसने देखा है, यदि लोगों के पीछे भागो तो दूर भागते हैं उन्हें छोड़ दो तो स्वयं ही निकट आते हैं.  और आचार्य के शब्दों में मित्रता सिर्फ प्रसन्नता का आभास मात्र देती है वह भी प्रारम्भ में, बाद में उससे उदासी ही ज्यादा मिलती है. सो जैसा मार्ग में आता जाये वैसा ही लेकर चलते रहना चाहिए. किसी से बंधने की कोशिश करना व्यर्थ है. इन्सान जब स्वयं अपने आप का मित्र नहीं रह पाता है कई अवसरों पर, तो वह दूसरों से हर वक्त ऐसी उम्मीद कैसे कर सकता है ? लेकिन पहले कई बार उसे ऐसा लगा है और आगे भी लगता रहेगा कि दोस्ती भी एक सच्चाई है और वे उससे मुंह नहीं मोड़ सकते, they need friends and they matter for them. आज भी मौसम अच्छा है, यानि बगीचे में काम किया जा सकता है. आज सभी को भाईदूज की चिट्ठियां लिख दीं.

आज बहुत दिनों के बाद लिख रही है, सुबह उसकी लापरवाही से बाएं हाथ की छोटी ऊँगली जल गयी, हल्की जलन है पर उसे सावधान रहना चाहिए था. शाम को मार्किट जाना है, दीवाली की पूजा का सामान लाना है तथा उसके अगले दिन होने वाले विशेष भोज के लिए भी. मौसम आजकल सुहाना है, न ठंड न गर्मी, दीवाली के लिए आदर्श मौसम.

दीवाली आई और चली भी गयी और उन्होंने दीवाली की ख़ुशी में पार्टी का आयोजन भी सफलता पूर्वक किया, और आज घर पहले की तरह व्यवस्थित हो चुका है. पिछले दिनों लिख नहीं सकी और इसी का परिणाम है शायद उसका विचलित मन, पता नहीं कहाँ से आते हैं, छोटे, नाटे, व्यर्थ विचार जो मन को हिला देते हैं और यकीनन चेहरे पर उनकी झलक पडती ही होगी. पर अब जैसे धुंध छंटने लगी है और सूरज निकलने लगा है.

अभी कुछ देर पूर्व पिछले साल का इसी दिन का पन्ना पढ़ा, अच्छा लगा, आज भी सब कुछ ठीक है, वे तीनो स्वस्थ हैं, कोई उलझन नहीं और न किसी प्रकार की प्रतीक्षा, किसी वस्तु, घटना या किसी प्राणी की. दोपहर का वक्त है, धूप जो सुबह बहुत तेज थी, अब गायब हो गयी है. थोड़ी देर में जून माँ को अस्पताल ले जाने के लिए आने वाले हैं, नन्हे के लिए चार्ट पेपर्स पर उसे बाउंड्री लाइन्स खीचनी हैं. आज पिछले दो दिन का अख़बार पढ़ा, दोनों पर मुख्य समाचार हवाई जहाज की दुर्घटना का है. दिल्ली हवाई अड्डे से उड़ान भरना सुरक्षित नहीं है, black listed है हमारा सबसे बड़ा हवाई अड्डा, कमी हर चीज में है फिर भी हम भारतीय सन्तोषी जीव हैं, काम चलाना जानते हैं. पर कभी-कभी ऐसी भयंकर दुर्घटनाओं का सामना करना ही पड़ता है. परसों नन्हे के लिए नानी का बनाया सुंदर सा स्वेटर मिला. कल वे पड़ोस के बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में गये, नन्हे ने उसकी सहायता की, दोपहर को गुब्बारे लगाने में और बाद में बच्चों के लिए गेम करवाने में, और उसे इस बात पर कोई अभिमान नहीं था, he was just a helping friend. कभी-कभी बड़े बच्चों से बहुत कुछ सीख सकते हैं.