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Saturday, December 26, 2015

हरे रंग का विला


आज सुबह वह जल्दी उठ गयी, छोटी भांजी भी शायद आवाज सुनकर उठ गयी, पर अँधेरा देखकर पुनः सो गयी. स्नान किया, क्रिया की, मुसली का नाश्ता खाया. बच्चे स्कूल गये और बहन उसे यहाँ ले आई है. उसके पतिदेव का होटल भी सड़क के पार नजदीक ही है. वे यहाँ शाम तक रहेंगे. उसके पास लिखने-पढ़ने का सामान है. कम्प्यूटर पर गुरू माँ का सीडी सुनने की सुविधा भी है. बहन नीचे मरीजों को देख रही है. उसका भावी क्लीनिक अभी खाली पड़ा है, वह यहीं बैठी है. लम्बी काली मेज है, ऊँची घूमने वाली काली ही कुर्सी है. उसका अस्पताल एक फैक्ट्री में है, जहाँ टाईल्स बनती हैं. मजदूरों की संख्या आठ हजार है. रोज ही कोई न कोई छोटी-मोटी दुर्घटना हो जाती है. फैक्ट्री का मालिक वही है जो उस होटल का है जिसमें उसके पतिदेव काम करते हैं. वह शेख है, यहाँ का शासक !     
 
गुरू माँ कह रही हैं कि परमात्मा को प्रेम करने के असंख्य तरीके हैं. यूएइ में वर्षों पहले बड़ी बहन रह चुकी हैं, उनसे कितना कुछ सुना था, पर जो जानकारी यहाँ आकर दो-चार दिनों में ही मिल गयी है, वह इतने वर्षों में भी नहीं मिली. यहाँ पहाड़, मैदान, रेगिस्तान तथा समुद्र सभी कुछ है. अभी आबादी बहुत कम है. समुद्र में पत्थर डालकर जमीन को पुनः प्राप्त किया जा रहा है. सडकें बहुत चौड़ी-चौड़ी हैं, चारों और उजाला ही उजाला है. ट्रैफिक का शोर लगातार आता रहता है. रेतीले पहाड़ों पर हरियाली के लिए पेड़ लगाये जा रहे हैं. वह एक फैक्ट्री के मेडिकल सेंटर में है. मशीनों का शोर भी अनवरत आ रहा है. अभी उसे यहाँ  पौने दो घंटे ही हुए हैं. पांच घंटे और हैं ! जिसमें सुनना, पढ़ना, लिखना, भोजन शामिल हैं.

यहाँ विदेश में जिस तरह भारतीय सुखद भविष्य की तलाश में आए हैं, वैसे ही पाकिस्तानी, बंगलादेशी, तुर्की तथा अंग्रेज भी आये हैं. बहन के क्लीनिक में ही एक डाक्टर भारतीय है तथा दूसरा फिलस्तीनी. दो साल पहले वह अपनी चली-चलाई प्रैक्टिस छोड़कर आई थी. यहाँ प्रैक्टिस करने के लिये यूएइ का सर्टिफिकेट लेना जरूरी था, पहली बार परीक्षा दी तो असफल रही, सोचा कि पूरी तैयारी नहीं थी, पर जब अगली बार फिर असफलता मिली तो माथा ठनका. इतने बड़े घर में दिन भर अकेले रहते मन नहीं लगता था. बच्चे सुबह जल्दी स्कूल निकल जाते, एक घंटे बाद पतिदेव भी और फिर वह और बड़ा सा अहाता जिसमें चार घर थे पर सिर्फ दो में लोग रहते थे और वह अपने घर में अकेली. कभी बैठ-बैठे आँख लग जाती तो लगता पीछे कुछ बच्चे खेल रहे हैं, चाह कर भी पीछे देख नहीं पाती. घर के बाहर तेज धूप होती थी, गेंदे की फूलों की कतारें, गुलाब की कलमें, मौसमी फूल अभी कल्पना में ही थे. वास्तव में तो क्यारियों में पत्थर भरे हुए थे. बच्चों को फुसलाकर कई बार थैले भर-भर के पत्थर बाहर फेंके थे. कोई माली या मजदूर कैसे मिलेगा, पता नहीं था. यहाँ काम करने वाले अधिकतर मजदूर भारतीय हैं. हफ्ते में दो दिन घर में सफाई होती है और दो बार ही कपड़े प्रेस करने वाला आता है. वह तो बहुत बाद में मिला, पहले ढेरों वस्त्र प्रेस करते करते कमर टेढ़ी हो जाती थी. बर्तन अभी भी खुद साफ करने पड़ते हैं. विला का सुंदर हरा रंग अभी भी वैसा का वैसा है. यहाँ वर्षा ज्यादा नहीं होती और होती भी है तो रंग इतने पक्के हैं. पूरे खुजाम में एक ही हरे रंग का विला है. यहाँ जीवन ठीक-ठाक चल तो रहा है पर अपने देश जैसी पूरी आजादी कहाँ है, जी-हुजूरी करनी पड़ती है और मन के किसी कोने में एक डर तो लगा ही रहता है कि कौन जाने किस दिन बोरिया-बिस्तर बांधना पड़े. बच्चे अपने स्कूल से संतुष्ट हैं, उनके साथ कितने ही देशों के बच्चे पढ़ते हैं, टीचर भी विदेशी हैं, नई भाषा सीख रहे हैं, ये आने वाली दुनिया के बच्चे हैं, जिसमें सारा विश्व एक ही परिवार होगा. अपनी मातृभाषा में सीखने का उन्हें अवसर नहीं मिला, खैर, कुछ पाने के लिए कुछ त्याग तो करना ही पड़ता है.

आज सुबह उठी तो साढ़े पांच हो चुके थे. ‘क्रिया’ कर रही थी कि छोटी बिटिया को जगाने बहन आयी. वह समझदार और प्यारी है. कल शाम को वे उसके स्कूल गये पेरेंट-टीचर मीटिंग थी. उसकी अध्यापिका मिस ग्रीड आस्ट्रेलियन हैं. बड़ी तारीफ कर रही थीं. उसकी फाइल भी दिखाई. लौटे तो बाजार होते हुए. घर का कुछ सामान लिया वापसी में उनके पड़ोसी के साथ एक दूसरी टैक्सी में आये. कल सुबह जब वह क्लीनिक गयी थी तो पूरा विश्वास था कि शाम तक जून का वीजा आ जायेगा, पर नहीं मिला था, कुछ घंटे वे सभी परेशान रहे. फिर रात साढ़े आठ बजे पता चला कि वीजा बन गया है और वह आज पौने बारह बजे तक दुबई पहुंच जायेंगे, दो बजे तक घर आ जायेंगे और तब वह सीडी निकालेंगे जो लैप टॉप में अटक गया है. सबके जाने के बाद उसने खाना बनाया, बर्तन साफ किये, स्नान किया अभी उसके पास दो घंटे हैं जिनमें वह लिख सकती है, पढ़ सकती है. कल क्लीनिक में उसने एक भारतीय क्लर्क को देखा, एक डाक्टर से कुछ देर बात हुई, वह फिलस्तीनी है. हिंदी फ़िल्में पसंद हैं. सलामे इश्क की बात कर रहे थे, बहन की तारीफ भी कर रहे थे. उन्हें यहाँ आये आज छठा दिन है. दो दिन बाद वे एक दिन के लिए दुबई रुकते हुए भारत वापस जायेंगे.  


Friday, January 3, 2014

स्वर्ण जयंती समारोह


अभी-अभी भगवद् गीता का वह श्लोक पढकर आ रही है जहां भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, उन्हें श्रद्धा से भेंट की गयी एक पत्ती भी अति प्रिय है, एक स्नेह भरा हृदय...और कुछ नहीं चाहिए ईश्वर को, अब तो वैज्ञानिक भी ईश्वर की सत्ता को मानने लगे हैं. बिग बैंग का प्राइम कॉज कहें या गॉड कहें कोई सुपर पावर तो है ही, और हमारे मन में उन असीम सम्भावनाओं का खजाना छिपा है जो इस रहस्य को खोल सकती हैं. ध्यान का महत्व और भी बढ़ जाता है. कल क्लब में डिब्रूगढ़ विश्व विद्यालय से आये प्रोफेसर राज का भाषण बहुत रोचक था, अन्तरिक्ष व ब्रह्मांड के बारे में नई जानकारियां मिलीं, कई सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों के विचार जानने को मिले. आज शाम को कोई मेहमान आयेगा शायद सुबह से ही बैठक में फूल सजाने की प्रेरणा हो रही है.

आज जून का जन्मदिन है और कल हमारे देश का भी जन्मदिन यानि जश्ने आजादी कल मनाया जायेगा. यहाँ कर्फ्यू रहेगा सुबह ६ बजे से दोपहर १२ बजे तक. कैसी विडम्बना है भारत में रहकर वे यहाँ झंडा आरोहण में भाग नहीं ले सकते. यूँ देखा जाये तो देश भक्ति मन में होनी चाहिए  अगर झंडा नहीं भी फहरा सके तो क्या ?

आज आजादी की पचासवीं सालगिरह के शुभ अवसर पर उसका मन भारतीय होने पर गर्व अनुभव कर रहा है और वह पूरे दिल से यह चाहती है कि जितनी बार भी उसका जन्म इस धरती पर हो भारत ही उसका देश हो ! टीवी पर आधी रात को हुए संसद के विशेष अधिवेशन की रिकार्डिंग आ रही है. कल रात ११ बजे तक वह जगी फिर नींद ने घेर लिया. मल्लिका साराभाई का नृत्य और ए आर रहमान का गीत संगीत दोनों ही भव्य थे. कल शाम को जून के जन्मदिन की छोटी सी पार्टी अच्छी रही सिवाय एक बात को छोड़कर, नैनी ने पहले ही चाय बनाकर रख दी और वह कड़क हो गयी. गल्ती उसी की थी, पर सब अपने लोग थे जो किसी ने कुछ नहीं कहा. आज सुबह  लालकिले की प्राचीर से प्रधान मंत्री का भाषण सुना, जो प्रेरणादायक होने के साथ कमियों की ओर ध्यान दिलाने वाला था. इस समय भीम सेन जोशी का आवाज में ‘वन्दे मातरम्’ यह प्रसिद्ध गीत बज रहा है जो बंकिम चन्द्र ने आजादी की लड़ाई के दौरान लिखा था. कुछ गीत अमर हो जाते हैं जैसे इक़बाल का तराना, सारे जहाँ से अच्छा..गांधीजी, नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस के भाषणों के अंश सुने और मन उनके सम्मुख स्वतः झुक गया. लता मंगेशकर के गाए गीत की अभी प्रतीक्षा है. आज रात star टीवी  पर Train to Pakistan आएगी और १५ अगस्त का दिन बीत जायेगा.

आज इतवार है, कल शाम से ही वह कुछ परेशान है. कारण वह जानती है पर उसका निवारण नहीं कर पा रही है. उस दिन उन्होंने वह फिल्म देखी, सामान्य ही लगी उसे. कल शाम वे मेला देखने गये, आज सुबह उसने तिरंगा सैंडविच बनाया और दिखाने के लिए सेक्रेटरी के यहाँ ले गयी, उन्हें पसंद आया और कुछ देर पहले उनका फोन आया कि वह स्टेज की सजावट की जिम्मेदारी भी ले, हॉल का प्रबंध तो वह दख ही रही थी अब यह काम....शायद यही उसकी परेशानी का सबब  है और एक बात और उसे परेशान कर रही है, पिछले कुछ दिनों से हिंसा की घटनाएँ बढ़ गयी हैं, उल्फा और बोडो दोनों ने ही असम के निर्दोष लोगोंपर हमले तेज कर दिए हैं, इन्सान कहाँ जा रहा है, इस अंधी दौड़ का कहीं तो अंत होगा. उसने ईश्वर से प्रार्थना की, वह उन्हें सही मार्ग दिखाए.

कैसी है यह विडम्बना
हँसते हैं अधर, पर आँखों में अश्रु आते भर
इक हाथ उठा, इक हाथ बढ़ा
दोनों का लक्ष्य भिन्न मगर
हिंसा का कैसा चला दौर
आजाद मुल्क आजाद फिजां
फिर क्यों न बने यह सबका घर