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Wednesday, August 21, 2019

दिव्य समाज का निर्माण



साढ़े आठ बजने को हैं रात्रि के. आज का दिन कुछ भिन्न था. सुबह एक स्वप्न देखकर उठी. एक विशाल मैदान में जहाँ ताज़ी खुदी हुई मिटटी है, हवा और आँधी के साथ उड़कर हजारों छोटे-छोटे बीज बिखर रहे हैं. पता नहीं कहाँ से आ रहे हैं वे बीज. तभी विचार आया, सृष्टि के आरम्भ में सम्भवतः ऐसे ही इतने वृक्ष व वनस्पतियां उगी होंगी. विचार आते ही स्वप्न कहीं खो गया. अद्भुत है यह सृष्टिकर्ता...प्रातः भ्रमण के समय चारों ओर उगे विविध वृक्षों और घास में उगे जंगली पौधों को देखकर एक अपनापन जगा महसूस हो रहा था. दूब घास पर कदम धरते ही भीतर एक अनोखी सिहरन को महसूस किया, यह अनुभव पहले भी कई बार उसे हुआ है, दूब घास अपनी ओर खींचती सी लगती है. उसमें कोई चुम्बकीय तत्व अवश्य है. प्रातःराश के बाद मृणाल ज्योति के कार्यक्रम में बोलने के लिए एक छोटा सा वक्तव्य लिखा. जाने से पहले भोजन बनाया. कार्यक्रम ग्यारह बजे आरम्भ हुआ. 'डाउन सिंड्रोम डे' के साथ 'आपदा प्रबन्धन' की ट्रेनिंग भी दी गयी. विभिन्न गाठें बांधनी सिखाई गयीं, पट्टी बांधना भी और स्ट्रेचर बनाना भी. आग बुझाने का प्रदर्शन भी किया गया. शाम की योग कक्षा में उपस्थिति कम थी. एक ने बताया कमर में दर्द है, दूसरी ने कहा, जुकाम है. मालिन कल नहीं आई थी, आज आई, बताया माली से झगड़ा हुआ था, कितना सह रही है वह दूसरी पत्नी बनकर.

आज 'विश्व जल दिवस' है. कुछ दिन पहले जब नारे लिखे थे, पढ़ा था इसके विषय में. असम में तो जल की कमी नहीं है, पर बंगलूरू में हो सकती है, जहाँ वे अगले वर्ष अक्तूबर में सदा के लिए रहने  जाने वाले हैं. जून को कल सुबह खाली पेट रक्तजाँच करानी है, सो रात्रि भोजन हो चुका है ताकि बारह घंटों का उपवास निश्चित हो सके. अगले महीने वे बंगलूरू जा रहे हैं, उनकी दूसरी आँख का भी कैट्रैक ऑपरेशन होना है. बारह दिन वे वहाँ रहेंगे. एक योग साधिका को वह कक्ष की चाबी देकर जाएगी, जिससे उसकी अनुपस्थिति में भी वे लोग नियमित साधना करती रहें. कुछ देर पूर्व नन्हे से बात हुई, वह आज सुबह ही देहली गया था, अब वापसी की यात्रा में है. ग्यारह बजे रात घर पहुंचेगा. पिछले एक हफ्ते से देर रात तक दफ्तर में काम करता रहा है, इस बार भी सप्ताहांत में भी व्यस्त रहेगा. आज सुबह नर्सरी स्कूल में मीटिंग थी, जिसमें अध्यापिकाओं को स्कूल के नियमों की पुस्तिका दिखाई गयी. प्रेसिडेंट के उसूल बहुत अच्छे हैं, बस थोड़ा ज्यादा बोलती हैं. शाम को फोन पर पता चला बुआ जी घर लौट आई हैं, पर दो-चार शब्द ही बोले गये उनसे. कल दोपहर बाद मृणाल ज्योति में मीटिंग है और शाम को एक मित्र परिवार को भोजन पर बुलाया है, अगले हफ्ते वे लोग सदा के लिए यहाँ से जा रहे हैं. कुछ वर्ष पूर्व भी एक बार उनका तबादला हुआ था, उस समय उनके संबंध पूर्ण सहज नहीं थे. हालात अलग थे तब, अब उस सखी में काफ़ी परिवर्तन आया है और उसे भी सुमति मिली है. उन्होंने अपने संस्कारों को पहचाना है और उनमें परिवर्तन आया है. परमात्मा की कृपा ही इसके पीछे काम कर रही है.

आज सुबह वे उठे तो वर्षा के आसार थे, रात को हो चुकी थी. टहल कर जैसे ही घर के निकट आ गये, बूँदें पड़नी शुरू हुईं. जून को आज भी रक्त जाँच के लिए जाना था, सो नाश्ते की जल्दी नहीं थी. आराम से साधना की. शाम के भोजन की तैयारी में न ध्यान हुआ न लेखन का कोई कार्य. दोपहर को तीन बजे तक सब तैयारी करके मीटिंग के लिए गयी. बारिश  में लडकों के छात्रावास का जो कमरा नष्ट हो गया था, उसे बनवाने का निर्णय हुआ, एक अन्य कमरे का फर्श भी ठीक करवाना है. उसे उन महिला को पत्र लिखना है, जिन्होंने स्कूल के लिए सहायता राशि देने की बात कही है. वापसी में एक टीचर ने स्कूल में उगे 'सब्जी वाले केले' दिए. योग कक्षा में एक बार फिर प्राणायाम का महत्व उसने बताया और सही तरीका भी. एक सप्ताह बाद 'दिव्य समाज का निर्माण' नामक आर्ट ऑफ़ लिविंग का एक कोर्स होने वाला है. कितना सही समय है, जून उसी दिन गोहाटी जा रहे हैं, उनकी कार भी खाली रहेगी और समय भी अपने हाथ में रहेगा. परमात्मा ने ही यह सुयोग रचा है. वह अकारण दयालु है. वह आज ही ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए जून से कहेगी. पिछली बार यह कोर्स करने गोहाटी गयी थी पर प्रतिभागियों की संख्या कम होने के कारण कोर्स हुआ ही नहीं. कोर्स से एक दिन पहले महिला क्लब की मीटिंग है, तीन महिलाओं का विदाई समारोह, उनके लिए कविताएँ लिखी हैं उसने. मित्र परिवार के साथ रात्रि भोज ठीक रहा, उनका सामान पैक हो रहा है.  

Monday, February 6, 2017

आकाश में हाथी


आज करवाचौथ है, बड़ी भाभी का फोन आया था, उनका जन्मदिन भी आ रहा है, उन्हें एक कविता लिख भेजनी है, तथा दीवाली कार्ड व भाईदूज का टीका भी. ‘दादीजी’ पर उसने एक स्मृति लेख लिखा है, जून ने उनका फोटो भी स्कैन कर के डाल दिया है. दोपहर को एक पंजाबी सखी के यहाँ जाएगी, नहीं भी जा सकती, मन में एक संदेह ने जन्म लिया है, तो मन अभी तक बचा है, चलो मन तो बचा पर उसमें संदेह भी बचा है, कैसा आश्चर्य है ! सुबह से मन उच्चावस्था में था, संसार की आंच लगते ही निम्न केन्द्रों में चला गया. मन की यही तो विशेषता है, उसे जैसा रंग लगाओ वह उसी में रंग जाता है. परमात्मा की आंच में वह परमात्मा ही हो जाता है. आज सुबह से कितने दोहों का अर्थ स्पष्ट हो रहा है भीतर..लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल..परमात्मा हर कहीं है जैसे सागर में लहर उठती है वैसे ही प्राणी इस परमात्मा के सागर में उठने वाली लहरे हैं..सभी कोई..इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है. परमात्मा की नजर में सभी समान हैं एक कीट से ब्रह्मा पर्यन्त ! अब कौन इस परम को अपने भीतर प्रकटने का अवसर देता है इस बात पर उसकी प्रसन्नता टिकी है. कोई जग जाये तो परम उसमें प्रविष्ट हो सकता है. सद्गुरू ऐसे ही होते हैं..वे स्वयं हट जाते हैं और परमात्मा उनमें प्रवेश कर लेता है. भीतर अमृत बह ही रहा है, उसके प्रति सजग भर होना है. जो स्वयं ही भीतर समाया है फिर वहाँ परमात्मा को स्थान कहाँ मिलेगा. यही अज्ञान है, यही मोह है. वे जो स्वयं है वहाँ सिवाय दुःख के कुछ नहीं लाता और जो वह है सिवाय सुख के कुछ नहीं देता..अब उनके हाथ में है कि वे चाहते क्या हैं ?

आज माली ने पौधों के बीज डाल दिए. फूलों के बीज, धनिया, पालक, लाही साग व मूली के बीज भी. कल वह नर्सरी से पिटुनिया, टमाटर, गोभी आदि की पौध लाएगी. और परसों वह भी लगा दी जाएगी. दस बजने को हैं माँ रोज की तरह पिताजी को ढूँढ़ रही हैं. उनकी बातें सुनकर कभी तो वे हँस देते हैं, कभी क्रोध करते हैं जैसा मन हो, मन बदलता रहता है कभी इधर तो कभी उधर..मृणाल ज्योति ने दीवाली के लिए सुंदर दीपक रंगे हैं, परसों शाम कोओपरेटिव में बिक्री करने के लिये आएँगे वे लोग.

कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नीला आकाश अपनी विशालता व भव्यता के साथ मजूद है और रह रह कर उसका रंग गाढ़ा नीला हो जाता है. चमत्कार जैसा ही लग रहा था. पिताजी भी थे और भी कई लोग थे. स्वप्न में इतने शोख रंग पहले देखे हों याद नहीं आते. बचपन का एक स्वप्न आज तक याद है जिसमें आकाश में चारों दिशाओं में बड़े-बड़े हाथी अपनी सूंड से जल वर्षा कर रहे थे और सारा आकाश फूलों से सजा था..स्वप्न में उनकी चेतना ही कितने रूप धर लेती है. ऐसे ही यह जगत उस परमात्मा का स्वप्न है..कितना अनोखा है यह सब कुछ ...   
  
 ‘गॉड लव्स फन’ ! कल रात को एक अनोखा स्वप्न देखा. बाबा रामदेवजी का फोन आया है उसके लिए. उसने कहा, विश्वास ही नहीं हो रहा कि उनसे बात कह रही है. तब बाबा ने कुछ कहा ..कि ऐसी क्या बात है और हर्षातिरेक में स्वप्न टूट गया. फिर आज सुबह क्रिया के बाद यह अनुभव हुआ की वह ही आत्मा है, अनोखा अनुभव है यह जानना कि वह ही इन्द्रियों के माध्यम से देख, सुन, बोल रही है. बचपन में वे कितने विश्वास से कहते थे कि उनके भीतर जो बोल रहा है वह परमात्मा है, तब ये सामान्य बातें हुआ करती थीं, हर कोई इन्हें जानता था, पर आज के युग में कोई परमात्मा को अपना अनुभव बनाना नहीं चाहता, माया प्रबल है.    

Tuesday, September 13, 2016

दर्पण में प्रतिबिम्ब


पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली. आजकल कितनी ही पंक्तियाँ सहज ही मन में आती हैं पर उस वक्त लिखने की सुविधा नहीं होती, बाद में भूल जाती हैं..पर उस क्षण तो वह स्वान्तः सुखाय कुछ रच ही लेती है ! परसों कुछ पंक्तियाँ मन में आ रही थीं-

जीवन एक मौका है
बीज से वृक्ष बनने का
बूंद से सागर और कली से पुष्प
होने का..
मिटना होगा बीज को इस प्रयास में
खोना ही होगा अपना आप बूंद और कली को भी
चूक जाते हैं हम इसी मोड़ पर
‘हमीं’ बनकर पाना चाहते हैं
आकाश की ऊँचाइया
बने रहकर पूर्ववत्
पा सकेंगे क्योंकर
वृक्ष सी विशालता, गहराई सागर सी
सौन्दर्य फूल का..स्वयं बने रहकर
छोड़ दें ‘हम’ होने का लोभ
हो जाएँ रिक्त अपने आप से
तो भीतर जो अनछुआ बीज है
वह पनपेगा..
बूंद बह चलेगी सरिता बनकर 
सागर की तलाश में
और सुप्त कलिका स्वप्न देखेगी प्रस्फुटन का..

पिछले तीन दिन फिर यूँ ही निकल गये और डायरी नहीं खोली. अभी दीदी का ब्लॉग देखा, उनका ब्लॉग पहली बार इतने लोगों ने पढ़ा, जीजाजी भी प्रसन्न होंगे, दीदी इतना अच्छा लिख रही हैं. पंजाबी दीदी का भी जवाब आया है, वह सदा ही तारीफ करती हैं उसकी कविता की. जून आज फिर पिताजी को अस्पताल ले गये, कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ दिन दवा लेनी होगी. माँ का हाल वही है, उन्हें आजकल दिन में लेटना जरा नहीं भाता, बैठे-बैठे थक जाती होंगी पर कहने पर भी लेटना नहीं चाहतीं. आज उनके पड़ोसी जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर भी हैं, मृणाल ज्योति गये हैं, वह अध्यापिकाओं को ध्यान, प्राणायाम आदि के बारे में कुछ बतायेंगे. सद्गुरु भी यही चाहते हैं. आज सुबह ध्यान में उनकी आवाज सुनी, जो उसकी स्मृति में सुरक्षित है, अर्थात यह मन का ही खेल है. लेकिन प्रकाश के वे स्तम्भ तो मन का खेल नहीं हो सकते, उनकी उपस्थिति को वह बिलकुल स्पष्ट अनुभव करती रही है. परमात्मा और गुरू में कोई भेद नहीं है, वह सर्वव्यापी चेतना एक ही है, वह सदा उनके साथ है. इस अनुभव के बाद अब लौटना नहीं होगा. कल शाम को कुछ पलों के लिए मन विचलित हुआ पर वह ऊर्जा का अपव्यय ही था जैसे दर्पण में कोई प्रतिबिम्ब ठहरता नहीं है वैसे ही आत्मा में कोई भाव टिकता नहीं है. वह जैसे पहले थी वैसे ही हो जाती है, केवल मन स्वयं को उसमें देख लेता है. मन ने देखा कि उसे निंदा नहीं भाती, स्तुति भाती है. उन्हें दोनों के पार जाना होगा, एक चाहिए तो दूसरा मिलेगा ही. उनका फोन खराब हो गया है, एक तरह से तो शांति है पर साथ ही अशांति भी है क्योंकि वे भी फोन नहीं कर पा रहे हैं, यहाँ सब कुछ जोड़े में मिलता है, मन का नाम ही द्वंद्व है. शुद्ध, निर्विकार, अचिन्त्य आत्मा सदा एकरस, आनंद से पूर्ण है, शक्तिसंपन्नदृष्टि आता है  दीदी को अवश्य उसकी बात समझ में आई होगी. कल नन्हे से बात नहीं हुई, वह व्यस्त है आजकल.



Wednesday, January 27, 2016

मेहनतकश मजदूर


अनुकूल संयोग यदि भोजन हैं तो प्रतिकूल संयोग विटामिन हैं. जीवन में जो कुछ भी अच्छा-बुरा मिलता है, स्वयं के ही कर्मों का फल होता है यदि ऐसी किसी की मान्यता है तो दुखों के आने पर उसे प्रसन्न होना चाहिए कि एक बुरा कर्म कट रहा है. भीतर समता बनाये हुआ जब कोई हर परिस्थिति को झेल जाता है तो भविष्य के लिए कोई कर्म बंधन भी नहीं बांधता. आज भी ध्यान में कुछ अलग अनुभव हुआ. एक सखी ने फोन किया, उसने स्वप्न देखा कि उसके घर में वह अपने जन्मदिन पर नृत्य कर रही है. अद्भुत है यह स्वप्न, उसका मन तो आजकल सदा ही नृत्य करता है कदम भले ही स्थिर हों. परसों एक दूसरी सखी की बिटिया का पहला जन्मदिन है, उसके लिए जो कविता लिखी थी, उसे टाइप करना है. कल शाम सत्संग था उसके बाद भोजन का भी प्रबंध था, समूह भोज का अपना ही स्वाद होता है. सुबह जून से बात हुई, वह ठीक हैं. एक समय था जब अकेलापन उसे खलता था, एक आज का वक्त है जब एकांत उसे भाता है, नितांत एकांत ! जब एक वही होता है कोई दूसरा नहीं होता. एक में कितनी शांति है, अद्वैत ही उनका लक्ष्य है, जहाँ दो हुए, सारे विकार आए.

ब्रह्म का बीज लिए तो सब आते हैं पर बिन बोये ही चले जाते हैं, ऐसे बीज और कंकर में अंतर भी क्या. हर मन की गहराई में ब्रह्म छिपा है पर जैसे बीज को मिटना होता है फूल खिलने के लिए, मन को भी मिटना होता है तभी ब्रह्म का फूल खिलता है. जिस दिन मन जान लेता है कि उसके होने में ही बंधन है तब यह स्वयं को सूक्ष्म करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है. यह ‘मैं’ का पर्दा मखमल से मलमल का करना है, जिस दिन मन पूरा मिट जाता है उस दिन परमात्मा ही बचता है.  जीवन में दो ही विकल्प हैं, या तो ‘मैं’ भाव में जियें या प्रेम भाव में. जगत और परमात्मा दो नहीं है पर वह तभी दिखाई देता है जब संसार माया हो जाता है. अभी मन खाली नहीं है, भीतर कोलाहल है, इसे शांत करके ही मन महीन किया जा सकता है. जो जितना सूक्ष्म होता जायेगा उतना ही शक्तिशाली होता जायेगा. वह चट्टान सा दृढ़ भी होगा और फूल से भी कोमल. वह होकर भी नहीं होगा और उसके सिवा कुछ होगा भी नहीं, सारे द्वंद्व उसमें आकर मिट जयेंगे. वह होने के लिए कुछ करना नहीं है. वह तो है ही, केवल उसे जानना भर है. मन को खाली करना ऐसा तो नहीं है कि कोई बर्तन खाली करना हो. कामना को त्यागते ही या समर्पण करते ही मन ठहर जाता है. ठहरा हुआ मन ही खाली मन है !

कल रात स्वप्न में गुरूजी को देखा, सुबह तक उसकी स्मृति बनी हुई थी. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं, घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है, सब सामान फैला है पर इस बिखराव में भी एक सौन्दर्य है. काम खत्म हो जाने पर जब सब सामान पूर्ववत् रख दिया जाता है तो कैसा संतोष भीतर जगता है. ये मजदूर जो दूसरों के घर सजाते हैं अपने कपड़े भी गंदे कर लेते हैं, उनके हाथ भी कितने रूखे हो जाते होंगे, पेंट छुड़ाते-छुड़ाते. इस दुनिया में हजारों पेशे करने वाले लोगों का समाज है, घटिया से घटिया काम भी और बढ़िया से बढ़िया भी, लेकिन हर काम की जरूरत तो है ही. उसका मन इन मजदूरों की ओर जाता है तो उनको कुछ देने की इच्छा होती है. चाय के साथ चंद बिस्किट देकर वह अपनी इस इच्छा की पूर्ति कर लेती है. आज सुबह से ही लग रहा है कि सद्गुरु का वरदहस्त सिर पर है. वह परमात्मा ही सदगुरुओं के रूप में समय-समय पर अवतरित होता है, उन्हें जो पहचान लेता है वह स्वयं का दीपक भी जलाने का इच्छुक हो जाता है. कृपा तो हरेक पर समान रूप से बरसती है पर कोई-कोई उस कृपा को अपने जीवन में फलीभूत होने का अवसर देते हैं. वे मस्ती में खोये रहते हैं. वे अपने भीतर आनन्द के स्रोत से जुड़ जाते हैं. ध्यान और प्रेम के पथ पर निडर होकर कदम रख देते हैं. ऐसा पथ जो प्राप्ति भी कराता है और गति भी भी प्रदान करता है !

       

Thursday, January 29, 2015

इदुलजुहा की रौनक


कल वह छह बजे से थोड़ा पहले उठी, दिन भर संसार का संग किया सो रात को देखे स्वप्न भी ईश्वर के नाम से संयुक्त नहीं थे. कल रात सिर में दर्द था, उस क्षण उसे सचमुच ही संसार दुखों का घर लग रहा था, जैसे शास्त्रों में वर्णन किया गया है. मन बहलाने के लिए वे चाहे लाख प्रसन्नता के उपाय कर लें लेकिन ख़ुशी टिकती नहीं, उसके लिए तो गोविन्द का ही आश्रय ही लेना पड़ेगा. उसने कृष्ण से प्रार्थना की इससे मुक्ति की ! इस जीवन का मोह नहीं रह गया है उसे, किसी भी क्षण इस कठोर दुनिया से उठ जाने के लिए तैयार है लेकिन अगला जन्म भी न हो ...इसकी गारंटी नहीं है सो...कृष्ण को आर्त भक्त नहीं भाते तो सोचा ज्ञान का आश्रय लेना चाहिए. यूँ अगर छोटी-मोटी बातों से मन व्यथित रहा तो मार्ग और भी लम्बा हो जायेगा. इस संसार में तो कहीं ठौर नजर नहीं आता, होश में आ चुके को तो कतई नहीं, पल-पल रंग बदलता है यह जग..स्वार्थ की भाषा बोलता है, पर कृष्ण की नजर से देखो तो कृष्णमय नजर आता है. फिर सब में उसी का रूप और सभी उस पथ के राही दीखते हैं. सब उसी के बनाये खेल के पात्र हों जैसे, तब कोई भेद नहीं रह जाता, कोई आक्रोश नहीं, यह सब एक महानाटक लगता है जिसके सूत्रधार कृष्ण  हैं, और तब मन शांत हो जाता है. अपनेप्रति, सम्बन्धों के प्रति और कर्त्तव्यों के प्रति सजग ! इन्द्रियां तब मन में, मन बुद्धि में, बुद्धि आत्मभाव में स्थित हो जाती है. तन फूल की तरह हल्का, मन रुई के फाहों सा ! कहीं कोई स्थूलता नहीं, कोई भारीपन नहीं, कोई अलगाव नहीं, वाष्प वत आत्मा और उसके निकट परमात्मा..   परसों वह उस सखी के साथ मृणाल ज्योति गयी थी. आज उसने बताया कि अभी वह स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं पा रही, वह उस दिन परेशान रही, असहाय बेबस, बच्चों को देखना उससे सहन नहीं हुआ. नूना को भी उस रात स्वप्न आया कि आग लगने पर बच्चों को छोड़कर वह स्वयं अपनी जान बचाने के लिए भाग आती है.

कोई जो चाहता है, वह होता नहीं, जो होता है वह भाता नहीं और जो भाता है वह टिकता नहीं...इस बात को वे जितनी गहराई से समझ लें उतना ही जीवन सरल व सरस होगा. कृष्ण कहते हैं, मन में प्रसाद हो तो यह मानसिक तप है. करने की शक्ति, जानने की शक्ति और मानने की शक्ति सबके भीतर है, जिनका सदुपयोग करना है. कृष्ण की गीता अद्भुत है, विश्व में अनोखा ग्रन्थ है यह, पढ़ो तो लगता है कृष्ण सम्मुख बैठे हैं और प्यार से समझा रहे हैं. कितने भिन्न-भिन्न कोण से वह उन्हें समझाते हैं. कभी थोडा कठोर होते हैं कभी आश्वस्त करते हुए स्नेह देते हैं, कृष्ण की तरह उनकी बोली भी निराली है ! अभी बहुत कुछ सीखना शेष है, ज्ञान का अथाह भंडार सम्मुख पड़ा है, उसमें से मोती चुगने हैं.

कल एक आध्यात्मिक पत्रिका का अंक मिला, परसों भी एक अंक मिला था, छोटी ननद से बात हुई तो पता चला उन्होंने ही subscribe करायी है. आज मौसम ठंडा है, कल रात आंधी-तूफान और वर्षा हुई. कल शाम ही उन्होंने भिंडी के बीज लगवाये थे, पानी डालने का काम प्रकृति ने अपने ऊपर ले लिया. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है कल उनकी शादी की सालगिरह है, परसों उन्हें यात्रा पर जाना है सो आज ही मना रहे हैं. उसे भी हेयर कट के लिए जाना है, मन के साथ-साथ देह की साज-संवार तो करनी ही पड़ती है. मानव का दुर्लभ तन ईश्वर ने ही दिया है !

कल इदुलजुहा है, उनकी नैनी के यहाँ ढेरों मेहमान आये हैं, जिनकी वह खातिरदारी कर  रही है. जून का ऑफिस बंद है. उन्हें तिनसुकिया जाना है, उसकी किताबें आ गयी हैं, जिन्हें वहाँ से लाना है. सुबह एक परिचिता के यहाँ कोरस में गाया जाने वाला गीत लेने गयी. उसे गले में खराश लग रही थी सो कुछ दिनों के लिए दही खाना बंद किया है आज से, जून ने भी कुछ दिनों से दूध-दही बंद किया है. उम्र के साथ-साथ खान-पान में कुछ परिवर्तन तो करने ही होंगे.


Thursday, August 2, 2012

काबुली चने


नन्हा अब ठीक है, कुछ देर पहले उसने आँखें खोलीं फिर करवट बदल कर सो गया. आज उसके खुद के गले में हल्की खराश महसूस हो रही है, जून होते तो उसे नमक पानी का गरारा करने को कहते. उसने दही लगाकर बालों को धोया था, अब ठंड के डर से कोई कब तक बालों को न धोए...ईश्वर भली करेंगे. आज पहली अप्रैल है, अभी तक तो किसी को मूर्ख नहीं बनाया, उसने सोचा पीछे रहने वाली असमिया पड़ोसन को आज बुद्धू बनाएगी.

इतवार की सुबह, दोनों बाप-बेटा अभी सो रहे हैं वह बाहर घूमने गयी थी, सड़क किनारे एक पॉपी का सूखा पौधा दिखा जिसके कुछ बीज उसने ले लिये अगले मौसम में उन्हें उगाएगी तब ढेर सारे पॉपी के फूल खिलेंगे, और तब वह आज का दिन याद करेगी. कल रात उन्होंने एक चीनी फिल्म देखी, उदास करने वाली, रुलाने वाली एक कविता हो जैसे. उसकी आँखें एक क्षण को नहीं सूखीं, बहुत दिन पहले एक और अच्छी चीनी फिल्म देखी थी. कल शाम जून कुछ सोच रहे थे, उन्हें ऑफिस का कुछ काम भी करना है, तीन-चार घंटों का शायद इसी का तनाव हो.

आज सुबह जून बहुत खुश थे, उन्होंने विवाह के बाद के साल को याद किया. नन्हा जल्दी उठ गया था पर दूध पीकर फिर सो गया, अब खरगोश से खेल रहा है, सचमुच का नहीं, खिलौने से. आज वह ट्रंक आ ही जायेगा जिसका उन्हें इतना इंतजार है. कल उनकी पड़ोसिन ने इडली बनायी परसों उसने दोसा बनाया था और साथ में मूंगफली की चटनी, सबने मिलकर खायी. वह जो नन्हे का स्वेटर बना रही थी कल पूरा हो गया, गले के बार्डर में बहुत सफाई नहीं आयी है. उसने सोचा वह खोल कर फिर से बनाएगी.
रेलवे स्टेशन से वह ट्रंक ले आये जून, उसमें सभी कुछ था जो वे डाल कर आये थे, बस कूकम और डाला गया था. वह नन्हे को लेकर पार्क में गयी तो जून ने चने बना दिए, बहुत स्वादिष्ट, उसे बहुत अच्छा लगा, वह जैसे पहले साल में पहुँच गया था, वही भोलापन और प्यार छलकती आँखें. कल वे दोनों उसके काम के कारण ग्यारह बजे तक बैठे थे. वह अखबार पढ़ रही थी पर आँखें थीं कि नींद से बोझिल हो रही थीं.

Saturday, July 28, 2012

जीनिया के बीज



कल दिन भर वह खुश थी, आज का आरम्भ भी सुखद है. नवभारत टाइम्स में डॉ धर्मवीर भारती की फागुनी कवितायें पढ़ी हैं. मन में कितनी स्मृतियाँ सजीव हो उठीं, कितना अच्छा लिखते हैं वह. उनका टीवी बंद पड़ा है. चैनल नम्बर बदल जाने के कारण एंटीना बदलना पड़ेगा सो तब तक सिर्फ सुन सकते हैं, यानि टीवी टीवी न रहकर रेडियो हो गया है. अभी जून के ऑफिस जाने से पहले वे लोग अक्तूबर के उन दिनों की बातें कर रहे थे जब बड़े भाभी-भैया वहाँ आयेंगे और शायद मंझले भी. उसने सोचा अगर छोटा भाई व बहन भी आ सकें तो कितना अच्छा हो, बहन की चिट्ठी भी नहीं आयी. देवर का खत परसों आया था पर उस ट्रंक के बारे में जाने क्यों कुछ नहीं लिखा, कल दोपहर कुछ लिख तो नहीं पायी, इस वक्त भी प्रयत्न किया जा सकता है, प्रातःबेला, चिड़ियों की चहचहाहट और एकांत ! नन्हा अभी तक उठा नहीं है, किन्ही स्वप्नों में खोया होगा.

अभी-अभी गीता में पढ़ा भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं जिसको मान-अपमान, हानि-लाभ, सुख-दुःख नहीं व्यापते उसी की बुद्धि स्थिर है. हिंदी लिखने का अभ्यास छूटता जा रहा है, जरा सा कठिन शब्द आया तो कलम अटकने लगती है, उसने सोचा, जून से हिंदी का शब्दकोश लाने को कहेगी. आजकल उसे स्वप्न में रोज दीदी दिखाई देती हैं पता नहीं क्यों ? कल शाम उनकी लेन की मिसेज सेन के घर छोड़ कर जाने की बात सुनकर उसे बहुत आश्चर्य हुआ, कल ही वह पहली बार उनके घर गयी थी, नन्हें के स्वेटर के लिये उनकी सास से कोई नमूना पूछने. कल शाम को पहली बार उसने एक बड़ी सी लोहे की ट्रे में जीनिया के बीज डाले हैं, देखें कब तक निकलते हैं. माली को भिन्डी आदि सब्जियों के लिये भी कहा है.