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Thursday, September 19, 2019

फूलों की तस्वीर






आज कामवाली नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आयी है, उन्हें भी बाद में एक सहायिका को नियुक्त करना होगा, इतने बड़े घर की देखभाल व सफाई के लिए कोई तो चाहिए होगा. जून नेट फ्लिक्स पर 'तीन' देख रहे हैं, अमिताभ बच्चन की फिल्म है यह. उसे फ़िल्में देखने का जरा भी मन नहीं होता अब, जगत ही नाटक लगने लगे तो किसी और नाटक की जरूरत ही नहीं रहती. यहाँ आने के बाद एक बार भी तैरने नहीं गयी, मौसम सदा ही ठंडा रहता है, भीगा-भीगा सा. लेखन कार्य भी बंद है. अपना घर अपना ही होता है, यह बात उनके मन को कितना संकुचित कर देती है, अपना तो यह सारा जहान है !

दोपहर के बारह बजकर दस मिनट हुए हैं. मौसम हल्का गर्म है, धूप तेज है. शाम को मॉल जाना है. वाशिंग मशीन की एएमसी करके अभी-अभी कर्मचारी गया है. कल रात देर से सोये, नन्हा नये घर के लिए खरीदने वाली वस्तुओं की सूची बना रहा था. सोनू देर से लौटी, उसके बाद साढ़े ग्यारह बजे वे सोने गये. सुबह मन्दिर के बाहर बैठने वाली मालिन से फूल लेने गये, छोटी-छोटी दो मालाएं और गुलाब के ढेर सारे फूल ! वह मर्फी की किताब के साथ कार्नेगी की एक पुस्तक भी पढ़ रही है. जीवन को जब तक कोई दिशा नहीं मिलती, वे नया सीखने में उत्सुक नहीं रहते. आत्मा का स्वभाव है जानना, वह हर पल नयी है और नया सीखना चाहती है. अभी क्रोम बुक नही खोली है, आज की पोस्ट लिखनी है.

आज पूरा एक सप्ताह हो गया उन्हें यहाँ आए हुए. नन्हे व सोनू का घर बहुत सुंदर है, सारी सुख-सुविधाओं से पूर्ण, उनका आपसी व्यवहार भी बहुत अच्छा है, भरोसे और सहयोग से भरा ! शाम को नेत्रालय जाना है, परसों डेंटिस्ट के पास. इंटीरियर डेकोरेटर के पास सप्ताहांत में. आज बड़ी भाभी की तीसरी बरसी है. समय जैसे पंख लगाकर उड़ता है. आज सुबह पांच बजे नींद खुली. सुंदर स्वप्न चल रहा था, मुस्कान थी चेहरे पर जब आँख खुली. फूलों की तस्वीरें उतारीं. कल शाम को एक जगह सुंदर फूल देखे थे, पर आज सुबह नहीं थे, माली ने कटिंग कर दी, पता नहीं कहाँ फेंके होंगे श्वेत व रक्तिम वे पुष्प ! जून ने कल रात ढेर सारा पुलाव बना दिया, नन्हा सुबह टिफिन में वही ले गया है. जाने से पूर्व घर भी ठीक-ठाक कर के जाता है, उसे जरा भी काम नहीं करने देता. उसे अँधेरे से डर लगता है, बचपन में ही यह डर उसके मन में बैठा होगा. उसके खुद के मन में भी कितने भय के संस्कार थे, जिनका सामना करने से वे समाप्त प्रायः हो गये हैं. जून आज सुबह भविष्य के लिए चिंतित थे जब वे वृद्ध हो जायेंगे. यह घड़ी पर्याप्त है जीने के लिए, न कोई भूत सताये न भविष्य  सताये..वर्तमान का यह पल ही पर्याप्त है ! नेट पर एक लेख पढ़ा मछली खाने को लेकर, लेखिका को एक रोग है जो व्यक्ति को कमजोर कर देता है. गेहूँ, चावल, दूध के बने पदार्थ उन्हें नहीं पचते. उसे इतने बड़े विश्व में इस पल अथवा तो ज्यादातर समय किसी से कुछ लेना-देना नहीं होता, वह अपने आप में ही प्रसन्न है ! कोई जवाबदेही न हो किसी के भी प्रति, यही तो सच्ची आजादी है ! यह आजादी जिसने एक बार अनुभव कर ली वह भला क्यों बंधना चाहेगा ! सेवा का बंधन भी नहीं, कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं..सदा-सर्वदा मुक्त और अपनी आजादी में जो हो उसे होने देना..जो अस्तित्त्व कराए हो जाने देना !

दस बजे हैं सुबह के, आज असमिया सखी आने वाली है, कई बार पहले भी उसने कहा, अंततः वे लोग यहाँ आ रहे हैं. हो सकता है एक और मित्र परिवार भी आये. आज बहुत दिनों बाद दीदी का ब्लॉग पढ़ा. शाम को बड़े भाई से बात की, कल दोपहर वह परेशान हो गये थे, अकेलेपन का दंश और भाभी की उपस्थिति का अभाव उन्हें चुभ रहा था, पर स्वयं को स्वयं ही समझाकर वह उस स्थिति से बाहर आ पाए. मन का काँटा मन से निकलता है फिर उस कांटे को भी फेंक देना है. मौसम आज अच्छा है, बाहर का भी और मन का भी !

Thursday, April 7, 2016

आदमीनामा


आजादी की इकसठवीं सालगिरह ! आज उन्होंने पहली बार झंडा ऊँचा लगाया है. ओशो कह रहे हैं सतयुग और कलियुग दोनों साथ-साथ चलते हैं, व्यक्ति पर निर्भर है कि वह किस युग में रहना चाहता है. उसका जीवन अंधकार से भरा हो अथवा प्रकाश से यह उसके ऊपर निर्भर है. राम, कृष्ण इसलिए पूजे जाते हैं क्योंकि उन्होंने सतयुग में रहना चुना, उनके साथ ही रावण, कंस तथा अँधेरे में रह रहे लोग भी थे. ‘मैं’ जब शुद्ध ‘मैं’ में परिवर्तित हो जाता है, अहंकार मुक्त हो जाता है तो सारे प्रश्न स्वयं हल हो जाते हैं.
आज भी घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है. सारा घर अस्त-व्यस्त है, लेकिन उसका मन अनंत विश्राम में डूबा है. मजदूरों के रूप में भी वही चेतना है. वही जड़ में है वही चेतन में. वह जब एकटक कहीं देखती है, दीवार हो या घास का मैदान, सब कुछ रूप बदलने लगता है. जैसे सब कुछ पिघल रहा हो, नजर बदली तो नजारे बदले ! ऑंखें बंद करते ही जैसे आकाश नजर आता है नन्हे-नन्हे सितारों से युक्त ! भीतर व बाहर एक ही सत्ता है और सत्ता में परम शांति है, विश्राम है, आनन्द है, कितना अनोखा अनुभव है यह, कोई नहीं समझ सकता जब तक कि वह स्वयं ही न जाने. सद्गुरू ने उसे यह अनुभव कराया है, कृपा का पात्र समझा है. उनकी वह दृष्टि जो उस पर पड़ी थी, भीतर बीज बो गई थी, अब वह पनपने लगा है !
उनके देश में कितनी ही उन्नत, महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ संस्थाएं हैं, जहाँ ज्ञान है, प्रकाश है और जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. जहाँ कला है, विज्ञान है, शोध है, आदर्श हैं, समूह भावना है, जहाँ देश की विरासत को, प्रेम को बढ़ावा दिया जाता है. जहाँ सीखने का, जानने का और कुछ नया करने का जोश है, जहाँ सामान्य से ऊपर उठकर कुछ ऐसा करने की प्रेरणा मिलती है जिसका असर सारी मानवता पर पड़ता है अथवा तो जहाँ मानव अपने भीतर से जुड़ता है. वह भी अपने भीतर से जुड़ी है, जहाँ एक ऐसी सत्ता का साम्राज्य है जो प्रेम के तन्तुओं से बनी है, शांति जिसका आधार है और आनन्द के वस्त्र जिसने धारण किये हैं. वह सत्ता ज्ञान की तलवार लिए है और सुख के कमल पर बैठी है, वह पावन सत्ता उनमें से हरेक के भीतर है, सभी एक न एक दिन उसका ज्ञान पा लेंगे. सद्गुरू की कृपा से इस जन्म में उसे वह ज्ञान मिला है. उसका समय, उसकी ऊर्जा, उसकी वाणी, उसके विचार, उसकी बुद्धि सभी कुछ उसी से भरी हुई हो. वाणी में दोष अब भी बहुत दिखाई देता है, भीतर छल भी है और द्वेष भी साफ दिखाई देता है. अब से पूर्ण प्रयत्न करेगी कि ऐसी गलती दोबारा न हो. अभी कुछ देर में एक छात्रा पढ़ने आने वाली है, उसे ‘आदमीनामा’ पढ़ाया था. नजीर की यह कविता इसी फितरत पर तो बयान दर्ज करती है, आदमी कितने रंग बदलता है. रक्षक भी वही है, भक्षक भी वही है. कभी वह प्रेम का पुतला बन जाता है तो कभी क्रोध का अंगार, कभी द्वेष से भर जाता है तो कभी ऐसा अनुरागी कि उसे देखकर फरिश्ते भी शरमा जाएँ !

पिछले चार दिनों से डायरी नहीं लिखी, याद नहीं आता क्यों समय नहीं मिला. कल इतवार था सो तो ठीक है, शनि को भी वह सुबह योग सिखाने जाती है, शुक्र व गुरूवार को क्या व्यस्तता थी, उम्र के साथ-साथ याद भी कमजोर पड़ती जाती है. अगले वर्ष अर्ध शतक लग जायेगा. अभी कल की ही बात लगती है, विवाह से पहले घर के सामने रहने वाली एक पागल सी लडकी ने पूछा, कितने साल की हैं आप, तो ‘बीस’ जवाब में सुनकर वह बोली, इतनी बड़ी ! पर आज तो अर्ध शतक भी ज्यादा नहीं लगता. मन तो वैसा ही है बल्कि गुरूजी की कृपा से बच्चों जैसा हो गया है ! अभी-अभी एक सखी से बात की, उसे नन्हे के जॉब की खबर उसकी बिटिया ने दी है.   

Saturday, November 7, 2015

आजादी की पहली लड़ाई


कल एक नन्ही बालिका से मिली, एक सखी की नन्ही सी बेटी, अभी तीन महीने की भी नहीं हुई, कल होगी. बहुत अच्छा लगा, वे सभी बहुत खुश थे, एक परिवार पूरा हुआ, बच्चे के होने पर ही परिवार पूर्ण होता है. नूना का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, गला खराब है, सर में दर्द है, लेकिन ये सब वास्तव में उसमें नहीं हो रहा है, वह शरीर से परे है, शरीर को ऐसा अनुभव पहले भी कई बार हुआ हैं. प्रारब्ध का कोई कर्म होगा जो अब सामने आया है. वैसे पिछले दो-तीन दिनों में भी कई ऐसे कर्म किये उसने जो ठीक नहीं थे. बालों में खराब हो गई मेंहदी को लगाना और ढक कर रखना पूरे तीन घंटों तक, सुबह-सुबह ठंडे पानी से स्नान, मैदे का आहार तथा बाहर का खाना, ये सारी बातें निमित्त बनीं उसके प्रारब्ध को प्रकट होने के लिए. दीदी का फोन कुछ देर पहले आया, कुछ देर को सब भूल गयी. बहुत दिनों बाद छोटी चाची से भी बात की, वह कई दिनों से उन्हें फोन करने की बात सोच रही थी. उन्होंने अपने काम की परेशानियों के बारे में बताया, कढ़ाई का कम अब पहले सा नहीं रहा. कम्प्यूटर वाली मशीनें आ गयी हैं. वह चाहती थीं कि नूना छोटी बहन से बात करे कि उनके बड़े पुत्र को विदेश आने के लिए कहे, पर उसे लगता है इन पारिवारिक मामलों में न पड़ना ही ठीक है, वैसे भी छोटी बहन दो महीने बाद आ रही है वह स्वयं ही बात कर लेंगी.

आजादी की पहली लड़ाई १८५७ में लड़ी गई थी आज उसको डेढ़ सौ वर्ष हो गये हैं. टीवी पर सोनिया गाँधी इस अवसर पर लाल किले से ओजस्वी भाषण दे रही हैं. उनका भाषण तो किसी अन्य ने लिखा होगा लेकिन उनके बोलने का तरीका तथा उच्चारण काफी अच्छा हो गया है. उसने पिछले दिनों इंदिरा, नेहरु तथा आजादी की लड़ाई के वक्त की घटनाओं के बारे में पढ़ा. गाँधी फिल्म भी देखी, उनके देश की कहानी अद्भुत है और अनोखा है सेनानियों का बलिदान !

कल उन्होंने बच्चों के कार्यक्रम के द्वारा गुरूजी का जन्मदिन मनाया. उनका उत्साह देखते ही बनता था. इसी महीने मृणाल ज्योति भी जाना है. इसी महीने उसका जन्मदिन भी है, ऐसे ही कुछ और जन्मदिन आयेंगे और फिर आएगा निर्वाण का दिन, जीते जी जिसने आत्मा का अनुभव कर लिया उसका निर्वाण तो निश्चित है. उसके बाद उनका मन है कि वे इस धरा पर कहाँ जन्म लें. अभी तक तो वे अपने कर्मों के द्वारा भटकाए जाते रहे हैं, पर अब सद्गुरु के द्वार पर आकर यह भटकन खत्म हो गई है, वह उनकी आत्मा है, उनके रूप में मानो अपनी आत्मा को ही पा लिया है. उन्हें अपने भीतर भी वैसी ही पवित्रता, मस्ती और आनन्द का खजाना मिल गया है, जैसे वे जगत में बांटते फिरते हैं. वे पूर्ण तृप्त हो गये हैं. पूर्ण काम और पूर्ण निश्चिन्त !

जब ध्यान स्वयं घटित होने लगे तो अलग से उसके लिए बैठने की बहुत आवश्यकता महसूस नहीं होती, आज यह उसके ध्यान का समय है पर वह लिख रही है, कितनी बातें भीतर है जो उससे कहनी हैं जो सब जानता है. लिखना भी अब अति आवश्यक नहीं रहा, मन पूरी तरह खाली होना चाहता है, कोई अपेक्षा नहीं, कोई बंधन नहीं. आज वर्षा की रिमझिम जारी है. पिछले तीन-चार दिनों से ऐसा ही हो रहा है, उनके सतनाम-ध्यानकक्ष की सभी पाँचों खिड़कियाँ खुली हैं, ठंडी हवा रह-रह कर आ रही है. सामने की दीवार पर गुरूजी तस्वीर में मुस्कुरा रहे हैं, उनकी मुद्रा मोहक है. मुस्कान चित्ताकर्षक है. उसके पीछे राधाकृष्ण की मूर्ति है तथा दीपदान जो वे वाराणसी से लाये थे. इस कमरे को जून ने कितनी लगन से उसके साथ मिलकर सजाया है पर अफ़सोस कि उनके हृदय में संतों के प्रति कोई आदर नहीं है, ईश्वर के प्रति प्रेम भी नहीं, आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर कहती है यह जरूरी तो नहीं कि सब उनके जैसे हों, उसे यह प्रतीक्षा धैर्यपूर्वक करनी होगी तथा प्रार्थना भी कि उनके आसपास के लोग भी उस आनन्द को चखें जो उन्हें मिला है !    



Thursday, April 3, 2014

शरलक होम्स के कारनामे


कुछ देर पूर्व एक सखी का फोन आया, कल से वह पढ़ाने जा रही है, खुश है, फ़िलहाल प्राइमरी सेक्शन को पढ़ाना होगा. कल से उसके जीवन में एक परिवर्तन आएगा, छह घंटे उसे घर से बाहर रहना होगा. जून की आज भी फील्ड ड्यूटी है. नन्हे को आज भी कम्प्यूटर क्लास जाना है, उसे encyclopedia में ‘कोलस्ट्रोल’ पर एक लेख मिल गया है जो उसे biology project work के लिए लिखना है. कल एक सखी से बात की, पर उसका ‘कोरस प्रतियोगिता’ के बारे में एक भी सवाल न पूछना उसे अच्छा नहीं लगा. फिर स्मरण हो आया, किसी की कोई बात अच्छी लगना या न लगना यह उसकी समस्या है, और वह क्यों व्यर्थ ही अपनी समस्या को बढाये, सो वह कोई अपेक्षा नहीं रखेगी and she will not judge any body.

जून अभी-अभी तिनसुकिया चले गये हैं और वहाँ से रात की ट्रेन से घर के लिए रवाना होंगे. यूँ लग रहा है जैसे उसके मन का एक कोना खाली हो गया है, कोई कुछ ले गया है छीनकर, जून का साथ जो पोर-पोर में समाया हुआ है वह कैसी कसक जगा रहा है मन में, मन जो रुआंसा सा हो गया है. मगर आने वाले आठ-दस दिन उसे उनके बिना रहना ही होगा, सुखद स्मृतियों के साथ..मौसम बहुत अच्छा हो गया है, उसने सोचा लाइब्रेरी जाना चाहिए या यूँ ही टहलने तो दीवाना दिल कुछ तो संभल जायेगा. आज सुबह वे साथ-साथ उठे, दोपहर को साथ-साथ भोजन किया, आज का साथ पिछले कई वर्षों के साथ से ज्यादा मोहक लग रहा है, क्यों कि उनके मन उसे पूरी तरह महसूस कर अपने में समो लेना चाहते थे. प्रेम एक निहायत ही खूबसूरत व पाक जज्बा है जो दो दिलों को एक-दूसरे के लिए धड़कने पर विवश कर देता है, ऐसा ही प्रेम वह इस वक्त महसूस कर रही है.

आज उसे नींद नहीं आ रही, नई-नई मिली आजादी का जश्न मन के साथ-साथ आँखें भी मना रही हैं. जब तक नींद न आए तब तक सोया न जाये यह नियम क्रन्तिकारी तो नहीं पर जोशीला तो है. मन जोश से भर जाये ऐसा कई दिनों से नहीं हुआ, तेज संगीत पर थक जाने तक थिरकने का ख्याल भी तो कब से नहीं आया, न ही बादलों को बरसते देख मन में कविता जगी. जिन्दगी एक रस्म की तरह निभती चली जा रही है, लोग मिलते हैं, इधर-उधर की बातें होती हैं, मौसम के ऊपर कभी एक दूसरे के जीवन के बारे में, पर ऊपरी-ऊपरी सतह तक, कभी अंदर उतर कर झाँकने की कोशिश भी करें तो एक गर्म हवा का झोंका चेहरे को झुलसा डालेगा ऐसा तेजी से आता है कि चार कदम पीछे लौटना पड़ता है. हरेक अपनी-अपनी सलीब ढोये आगे बढ़ रहा है. कुछ पल रुककर बातचीत कर लेते हैं लोग, कुछ पलों के लिए कंधों का बोझ हल्का लगता है फिर वही यात्रा. लेकिन क्या ये कुछ पल भी जरूरी नहीं हैं, सतही ही सही कोई चीज तो है ही जो लोगों को जोड़ती है और अगर किसी का दिल साफ है, शफ्फाफ है, खुद पर भरोसा है, मजबूत है तो अपनी शर्तों पर जियेगा. अगर ऐसा नहीं है तो वह किसी पर विश्वास नहीं कर पायेगा, तो जीने का सही तरीका अपने अंदर की ताकत से उपजता है.

अभी कुछ देर पहले जून का फोन आया, उसे लगा, चाहे वह यहाँ से दूर हैं पर उनका दिल यहीं है. कल उसके सिर में दर्द हो गया था, नन्हे ने दवा दी. सुबह वह सोच रही थी कि जून ने उससे एक बार भी  अपने साथ जाने के लिए नहीं कहा, पर अब उसे लग रहा है, वह उन्हें यात्रा की तकलीफ से बचाना चाहते थे. आज उसने गुलदाउदी के लिए गमले साफ करवाए. नन्हे के साथ बाजार गयी, उसने मेहमानों के लिए समोसे खरीदे, एक सखी ने कहा था शाम को आयेगी, पर जब वह चाय बनाने के लिए उठी तो वे कहने लगे, उन्हें जल्दी जाना है, वह तो पहले से ही प्रसन्न नहीं थी, उनकी यह बात उसे और परेशान कर  गयी. बाद में सोचा कि उन्हें कोई आवश्यक कार्य होगा याकि लोग भिन्न समय पर भिन्न व्यवहार करेंगे ही. वह इतनी संवेदनशील है कि पलक झपकने मात्र से ही कुम्हला जाती है. उसने सोचा उसे मजबूत बनना होगा.

शाम को उन्होंने कुछ पहेलियाँ हल कीं फिर लाइब्रेरी गये, नन्हे ने ‘शरलक होम्स’ की एक किताब ली, उसे डिटेक्टिव नॉवल पढना बहुत अच्छा लगता है. नूना को भी फेलूदा की कहानियाँ अच्छी लगती हैं. जून का फोन आज आ सकता है, अब वह मात्र एक हफ्ते के लिए दूर हैं, अगले हफ्ते वे साथ होंगे, A happy family !




Friday, January 3, 2014

स्वर्ण जयंती समारोह


अभी-अभी भगवद् गीता का वह श्लोक पढकर आ रही है जहां भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, उन्हें श्रद्धा से भेंट की गयी एक पत्ती भी अति प्रिय है, एक स्नेह भरा हृदय...और कुछ नहीं चाहिए ईश्वर को, अब तो वैज्ञानिक भी ईश्वर की सत्ता को मानने लगे हैं. बिग बैंग का प्राइम कॉज कहें या गॉड कहें कोई सुपर पावर तो है ही, और हमारे मन में उन असीम सम्भावनाओं का खजाना छिपा है जो इस रहस्य को खोल सकती हैं. ध्यान का महत्व और भी बढ़ जाता है. कल क्लब में डिब्रूगढ़ विश्व विद्यालय से आये प्रोफेसर राज का भाषण बहुत रोचक था, अन्तरिक्ष व ब्रह्मांड के बारे में नई जानकारियां मिलीं, कई सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों के विचार जानने को मिले. आज शाम को कोई मेहमान आयेगा शायद सुबह से ही बैठक में फूल सजाने की प्रेरणा हो रही है.

आज जून का जन्मदिन है और कल हमारे देश का भी जन्मदिन यानि जश्ने आजादी कल मनाया जायेगा. यहाँ कर्फ्यू रहेगा सुबह ६ बजे से दोपहर १२ बजे तक. कैसी विडम्बना है भारत में रहकर वे यहाँ झंडा आरोहण में भाग नहीं ले सकते. यूँ देखा जाये तो देश भक्ति मन में होनी चाहिए  अगर झंडा नहीं भी फहरा सके तो क्या ?

आज आजादी की पचासवीं सालगिरह के शुभ अवसर पर उसका मन भारतीय होने पर गर्व अनुभव कर रहा है और वह पूरे दिल से यह चाहती है कि जितनी बार भी उसका जन्म इस धरती पर हो भारत ही उसका देश हो ! टीवी पर आधी रात को हुए संसद के विशेष अधिवेशन की रिकार्डिंग आ रही है. कल रात ११ बजे तक वह जगी फिर नींद ने घेर लिया. मल्लिका साराभाई का नृत्य और ए आर रहमान का गीत संगीत दोनों ही भव्य थे. कल शाम को जून के जन्मदिन की छोटी सी पार्टी अच्छी रही सिवाय एक बात को छोड़कर, नैनी ने पहले ही चाय बनाकर रख दी और वह कड़क हो गयी. गल्ती उसी की थी, पर सब अपने लोग थे जो किसी ने कुछ नहीं कहा. आज सुबह  लालकिले की प्राचीर से प्रधान मंत्री का भाषण सुना, जो प्रेरणादायक होने के साथ कमियों की ओर ध्यान दिलाने वाला था. इस समय भीम सेन जोशी का आवाज में ‘वन्दे मातरम्’ यह प्रसिद्ध गीत बज रहा है जो बंकिम चन्द्र ने आजादी की लड़ाई के दौरान लिखा था. कुछ गीत अमर हो जाते हैं जैसे इक़बाल का तराना, सारे जहाँ से अच्छा..गांधीजी, नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस के भाषणों के अंश सुने और मन उनके सम्मुख स्वतः झुक गया. लता मंगेशकर के गाए गीत की अभी प्रतीक्षा है. आज रात star टीवी  पर Train to Pakistan आएगी और १५ अगस्त का दिन बीत जायेगा.

आज इतवार है, कल शाम से ही वह कुछ परेशान है. कारण वह जानती है पर उसका निवारण नहीं कर पा रही है. उस दिन उन्होंने वह फिल्म देखी, सामान्य ही लगी उसे. कल शाम वे मेला देखने गये, आज सुबह उसने तिरंगा सैंडविच बनाया और दिखाने के लिए सेक्रेटरी के यहाँ ले गयी, उन्हें पसंद आया और कुछ देर पहले उनका फोन आया कि वह स्टेज की सजावट की जिम्मेदारी भी ले, हॉल का प्रबंध तो वह दख ही रही थी अब यह काम....शायद यही उसकी परेशानी का सबब  है और एक बात और उसे परेशान कर रही है, पिछले कुछ दिनों से हिंसा की घटनाएँ बढ़ गयी हैं, उल्फा और बोडो दोनों ने ही असम के निर्दोष लोगोंपर हमले तेज कर दिए हैं, इन्सान कहाँ जा रहा है, इस अंधी दौड़ का कहीं तो अंत होगा. उसने ईश्वर से प्रार्थना की, वह उन्हें सही मार्ग दिखाए.

कैसी है यह विडम्बना
हँसते हैं अधर, पर आँखों में अश्रु आते भर
इक हाथ उठा, इक हाथ बढ़ा
दोनों का लक्ष्य भिन्न मगर
हिंसा का कैसा चला दौर
आजाद मुल्क आजाद फिजां
फिर क्यों न बने यह सबका घर



Tuesday, November 19, 2013

लौह पुरुष- सरदार वल्लभ भाई पटेल


आज बहुत दिनों बाद सुबह लॉन में धूप में बैठकर लिख रही है, हल्की हवा भी बह रही है जो प्रातः उठने पर बर्फीली थी पर अब सूर्य के उगने से उसका दंश कम हो गया है. बहुत दिनों से बड़ी बहन का खत नहीं आया, एक बार उन्हें लिखा था, अब पहले की सी कंपाने वाली ठंड नहीं पडती पर इस बार पूरे देश में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में ठंड बहुत है. उधर ऑस्ट्रेलिया में तापमान ५० डिग्री तक पहुंच गया है. पहले दूध वाला आया फिर स्वीपर, सो वह घर के अंदर चली गयी. कुछ देर पूर्व एक धारावाहिक का अंश देखा, उसकी नायिका एक लेखिका है, भावुक और सच्चे प्रेम की आकांक्षी, अंत अच्छा था. जैसे उसकी और जून की नाराजगी का अंत कल अच्छा हुआ, कल उन्होंने परेड देखी, नन्हे ने बाहर झंडा भी फहराया और आटे का एक तिरंगा भी बनाया है. दोपहर को ‘सरदार’ फिल्म देखी, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन कितना महान था. उन्होंने देश की आजादी के बाद सारे राज-रजवाड़ों को एक करने में, एक राष्ट की स्थापना में अमूल्य सहयोग दिया. परेश रावल ने पटेल की भूमिका अच्छी बनाई. ‘दो आँखें बारह हाथ’ भी कुछ देर देखी, अच्छी कहना उपयुक्त नहीं होगा, ऐसी फ़िल्में अब कभी नहीं बनेगीं. शाम को पड़ोसिन के यहाँ से मिली ब्रोकोली बनाई सबको बहुत पसंद आई.

पिछले दो दिन फिर यूँ ही निकल गये, नन्हे के स्कूल न जाने से कल सुबह उसी के साथ व्यस्त रही. परसों भी उसकी बस एक घंटा लेट आई थी, सेन्ट्रल स्कूल के बस ड्राइवरों की हड़ताल आज भी जारी रही और शायद कुछ दिन और चलेगी. नन्हा आज पड़ोसी की गाड़ी में गया और वापस अपने मित्र के साथ आया. सुबह एक सखी का सुंदर बगीचा देख कर आयी थी सो आज शाम अभी कुछ देर पहले उसने भी बगीचे में काम किया. उसने बहुत स्वादिष्ट गाजर का हलवा खिलाया, जून को बताया तो उनके मुंह में पानी भर आया. परसों दोपहर वह ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर कविता या कहें तुकबन्दी करने की कोशिश करती रही, तीन ‘नारे’ भी लिखे हैं, जो आज जून ने भिजवा दिए हैं, देखें इस मशक्कत का क्या परिणाम निकलता है.

कभी ओस से भीगी घास पर पाँव पड़े
जो ठंडक दिल में समा गयी
वही मेरे और तुम्हारे मन के बीच पुल बन गयी है
कभी फूलों के झुरमुट में सिकुड़ा तन
उनकी रंगत और खुशबु समेटे नयन
तुम्हारे स्वप्न उकेरने लगे...  
ग्यारह बजने वाले हैं और अभी खाने में फिनिशिंग ट्चेज शेष हैं, पर सुबह से इधर-उधर के कामों को निपटते हुए अब थोड़ी थकन सी महसूस होने लगी है. नन्हा और पड़ोस का उसका मित्र आज साइकिल से स्कूल गये हैं, बसों की हड़ताल लम्बी खिंचती चली जा रही है. थक तो काफी गये होंगे, चार-पांच किमी दूर है उनका स्कूल, सवा नौ बजे निकले थे आधे घंटे में पहुंच गये होंगे. सुबह एक अजीब सा स्वप्न देखा, अब कुछ भी याद नहीं है पर वह फीलिंग याद है जिसने उसे उठा दिया, फिर ‘जागरण’ सुना, बाद में ध्यान करते समय मन केन्द्रित नहीं कर पाई, वे आवाजें भी तब और स्पष्ट सुनाई देने लगती हैं वैसे जिनकी तरफ ध्यान भी नहीं जाता.

कल दोपहर वह बैकडोर पड़ोसिन के साथ बैडमिंटन खेलने क्लब गयी, अच्छा लगा पर जून के साथ जाना और खेलना उसे ज्यादा पसंद है, उसने सोचा, देखे, यह दोपहर का रूटीन कितने दिन चलता है, वैसे उसकी पड़ोसिन अच्छा खेलती है और वह उससे कुछ सीख सकती है. फिर cycling का अपना आनन्द है, कुछ दिन यही सही. आज सुबह गोयनका जी ने बताया, धर्म जब तक धारण न किया जाये उस पर चर्चा करना व्यर्थ है. कल उसकी एक सखी आई थी जो अपनी चचेरी, ममेरी बहनों की खूब बातें बताती है, इधर उसकी कजिन्स तो कभी भूलकर भी याद नहीं करतीं या कहें वह ही नहीं करती. कल दोनों बहनों को पत्र लिखे जून ने भी, वे यकीनन खुश होंगीं.

Monday, February 18, 2013

पुस्तक मेला



आज से लक्ष्मी काम पर वापस आ गयी है, सब कार्य समय पर हो गए हैं, जैसे घर बहुत दिनों बाद पुनः शांत हो गया हो. आज धूप कल से भी कम है, अंततः चिप्स सुखाने के लिए रसोईघर में रखने ही होंगे. आज वह अपने कुछ अच्छे मूड्स में से एक में है, गार्डन सिल्क की ब्राउन साडी पहनी है, वह भी स्टाइल से, अच्छा लगता है खुला-खुला सा, बन्धनों में रहते रहते भूल ही गयी थी कि आजादी क्या होती है. पता नहीं मरियम का क्या होगा, उस उपन्यास की नायिका का, जो कल देर तक पढ़ती रही. आज क्रिकेट मैच भी है, जून आते ही स्कोर पूछेंगे, पर उसे अभी याद आया है, टीवी बंद है. कल वे एक परिचित तेलेगु परिवार के यहाँ गए, गृहणी बहुत मोटी हो गयी हैं, और नाश्ता सफाई से नहीं बनाती हैं, ऐसा उसे लगा, संस्कार और शिक्षा के कारण लोग बहुत सी बातें सीख जाते हैं और बहुत सी नहीं सीख पाते. कल उसने पहली बार एग डालकर केक बनाया, आज नन्हे को टिफिन में देना भूल गयी. उसे पसंद आया, पर जून को उतना अच्छा नहीं लगा, पर वह उसे बहुत अच्छे लगते हैं जब कान में कुछ कहते हैं, जबकि कमरे में उनकी बात सुनने वाला कोई भी नहीं होता.

इतने वर्षों में कल पहली बार यहाँ पुस्तक मेला देखने गयी, सिर्फ पुस्तक मेला ही नहीं है और भी बहुत कुछ है उसमें. इतना विशाल, इतना अच्छा लगा कि कल से सोच रही है, कब वे वहाँ दुबारा जायेंगे, पर मौसम को भी आज ही बिगड़ना था, गर्जन-तर्जन करते बादल पता नहीं किस पर क्रोधित हो रहे हैं. इतनी दूर-दूर से व्यापारी अपना सामान लेकर आये होंगे, और खुले आसमान के नीचे बैठे थे, सिर्फ दुकानों पर ही तो तम्बू थे, आज कहाँ गए होंगे....और सुना है मात्र तीन दिनों के लिए. वे लोग शायद ही आज जा पायें, अगर यह पानी बरसना बंद हो जाये. बाहर पौधों को जी भर के पानी मिल गया पर बरामदे के गमले सूखे ही रह गए, उसने सोचा लिख कर उन्हें भी पानी देगी. कल नन्हे का स्कूल भी बंद हो गया, “शंकरदेव जयंती” के कारण, इसी उपलक्ष में ही तो मेला लगा है.

भारत की इंग्लैड पर एक और विजय, सोनू बहुत उत्साहित है. आज वह स्कूल नहीं गया, कल दिन भर सर्दी से परेशान था, आज ठीक लग रहा है. आज सुबह वह उठी तो मन उलझन से भरा था, लग रहा था कि कहीं कुछ भी ठीक नहीं है, कि जिंदगी समझौतों का दूसरा नाम है और यह कि कितनी भी विपरीत स्थितियां हों, चेहरे पर मुस्कान का लेबल लगाये रखना पड़ता है और भी न जाने क्या-क्या ..कल रात नींद नहीं आ रही थी. एक कहानी सोचने लगी, शब्द खुदबखुद आते जा रहे थे, भावों की कमी नहीं थी. अगर कोई ऐसा टाइपराइटर होता जो मन के वाक्यों को टाइप कर लेता तो एक सुंदर कहानी उसके सामने होती. उस समय सोच रही थी यही शब्द, यही वाक्य.. सुबह आराम से लिख सकेगी पर अब वे कितने दूर गए लगते हैं. वैसे भी अब समय नहीं है, अभी खाना भी पूरा नहीं बना है. कल दोपहर जून से किसी बात पर मतभेद हो गया, लेकिन वह विवाद से बचते हैं, एकाध बार कुछ कहकर चुप हो जाते हैं. उनका गला भी उतना ठीक नहीं है आजकल, सुबह पूरा नाश्ता नहीं खा सके, आज उसे भी विशेष भूख नहीं लगी, नन्हे की सर्दी..यानि पूरा परिवार ही.. खैर..अब वह शांत है और करने को इतना कुछ है कि और कुछ सोचने का वक्त कहाँ है, खत भी तो लिखने हैं.

कल शाम की शुरुआत एक अच्छी खबर से हुई, माँ-पिता के पत्र से मालूम हुआ कि छोटी बहन ने गुड़िया को जन्म दिया है. अभी-अभी उसने एक खत और एक कविता लिखी है उसके लिए. कल क्लब में एक स्तरीय कार्यक्रम था, वे गए थे नन्हे को ढाई घंटे के लिए उसके मित्र के यहाँ छोड़कर. आज सुबह से ही वह रोजमर्रा के काम छोड़कर इधर-उधर के काम कर रही है, जो अक्सर रह जाते हैं, दोपहर को करेगी रोज के काम.