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Friday, September 7, 2018

कमल कुंड



शाम के चार बजकर बीस मिनट हुए हैं. जून अभी कुछ देर में आने वाले होंगे. मौसम गर्म है. टीवी पर प्रधानमंत्री तमिलनाडु के एक परमाणु ऊर्जा केंद्र को राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं. कुडनकुलम के इस केंद्र को बनाते समय उसका विरोध हुआ था, पर विकास की धारा को कौन रोक सकता है. ओलम्पिक खेलों में भारत के लिए आज अच्छा दिन रहा है. हाकी टीम ने अर्जेंटीना को हराया है. सुबह साढ़े चार बजे उठे वे, बाहर लॉन में कुछ देर टहले, आजकल दूर तक टहलने नहीं जा रहे हैं. जून को डाक्टर ने मना किया है. नौ बजे एक योग साधिका ध्यान के लिए आती है. उसे ध्यान के बारे में समझा सकी, उस वक्त जैसे कोई भीतर से अपने आप बोलने लगता है, परमात्मा हर क्षण उनके साथ है ! समय कितना बदल गया है. जो मित्र होते हैं, वही एक समय शत्रु बन जाते हैं फिर वही मित्र बन जाते हैं. कर्मों की गति अति गहन है. विचित्र है अस्तित्त्व की लीला, कर्मों का हिसाब-किताब पूर्ण होता है तो शुद्ध प्रेम का प्रवाह होने लगता है. सुबह बगीचे से ढेर सारी भिंडी मिली. चार नारियल भी तोड़े हैं, नारियल पानी के लिए. स्कूल में बच्चों को ध्या कराया, अब वे ठीक से करना सीख गये हैं, कुछ क्षणों में शांत हो जाते हैं. पिछले दिनों एक दुखद घटना भी हुई, पूसी शाम को सड़क पर निकल गयी, और किसी वाहन से टकरा कर आहत हो कर किसी और दुनिया में चली गयी. चंद महीनों का ही उसका साथ था पर उसे बहुत दुःख हुआ. नन्हे को जब पता चलेगा उसे भी बहुत दुःख होगा. जीवन सुख-दुख दोनों के तानों-बानों से बुना है. नैनी आज और राखियाँ बनाने के लिए सामान ले गयी है. अभी तक लगभग साठ राखियाँ बन गयी हैं.

शाम के पांच बजे हैं, जून अभी-अभी आये हैं. बड़ी ननद की राखी आज मिल गयी, उसने लिफाफा खोल कर देखा, शायद कोई पत्र हो, पर कुछ भी नहीं है, एक पंक्ति भी नहीं. पत्र लिखने का संस्कार छूटता ही जा रहा है. आज बाहर धूप तेज है. कमल कुंड में पानी का स्तर फिर घट गया है, शायद नीचे तले या दीवारों के सीमेंट में छेद हो गया है, जल रिसकर भूमि में जा रहा है. ताल खाली करवा कर ठीक करवाना होगा. यह कार्य तो सर्दियों में ही ही सम्भव होगा, जब पत्ते कम हो जाते हैं और फूल नहीं खिलते. आज बाल्मीकि रामायण में अयोध्या की स्त्रियों के विलाप के बारे में लिखा. कवि की दृष्टि कितनी सूक्ष्म है, उनके दुःख का कितना सजीव वर्णन उन्होंने किया है. आज फिर ताओ पर प्रवचन सुना. जब ताओ था तब मन्दिर नहीं थे, पूजा भी नहीं थी, नीति का निर्धारण भी नहीं था. सहज ही सब धर्म को धारण करते थे. परमात्मा अनुपम है. भीतर उसकी रश्मिया प्रवाहित होती महसूस होती हैं. पूसी की स्मृति अब दुःख देती प्रतीत नहीं हो रही, नियति को यही मंजूर था. इन्सान का मन समय के साथ-साथ बदलता रहता है. यदि उसके पास भूलने की क्षमता न हो तो मन कितना भारी हो जाये. ध्यान के द्वारा मन को प्रतिपल नया रखना आना चाहिए. ज्ञान के द्वारा जीवन के रहस्यों को आत्मसात करन भी ! आज बंगाली सखी से बात की, वह अगले माह घर जा रही है, पूजा में केरल. क्लब की सेक्रेटरी से बात की, वह गोहाटी जा रही है, पड़ोसिन से बात हुई, वह परसों कोलकाता से आई हैं. यात्रा जीवन का एक अभिन्न अंग है. उड़िया सखी से बात हुई, वह राखी पर उसके साथ मृणाल ज्योति जाएँगी. दो दिन बाद जून का जन्मदिन है, शाम को छोटी सी पार्टी होगी. दोपहर को बच्चों के साथ पन्द्रह अगस्त का पूर्व दिन व रक्षा बंधन का उत्सव मनाना है. उसके पूर्व नैनी के पुत्र के पहले जन्मदिन की पार्टी में कालीबाड़ी जाना है, यानि पूरा दिन व्यस्तता बनी रहेगी. कल दोपहर को पूसी के सारे चित्र व वीडियोज का एक फोल्डर बनाना है, उसकी स्मृति में लिखा आलेख भी जून को दिखाना है. आज पार्लियामेंट का वर्षा सत्र समाप्त हो गया. इस बार काम शांतिपूर्ण ढंग से हुआ है.

Tuesday, August 28, 2018

दफ्ती का घर



शाम होने को है. टीवी पर केन्द्रीय मंत्री बता रहे हैं कि उत्तर-पूर्व भारत के विकास और सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार क्या काम कर रही है, इसको बताने के लिए एक पुस्तिका का प्रकाशन भी हुआ है. पिछले दिनों यहाँ काफी ‘बंद’ हुए और तेल कम्पनी को भी इसके कारण काफी खामियाजा भुगतना पड़ा है. जून अभी आने वाले हैं, शाम को उन्हें बंगाली सखी के यहाँ जाना है, चाय पर बुलाया है. कल शाम को एक अन्य सखी ने रात्रि भोज पर बुलाया है. ‘नजर बदली तो नजारे बदले’, कितनी सही कहावत है यह. किसी के प्रति उनका दृष्टिकोण बदलते ही सामने वाला भी बदला सा नजर आने लगता है. यदि पहले कभी मित्रता रही हो तो वही पहले वाला प्रेम भरा. किसी के प्रति कभी भी कोई विपरीत भाव न जगे, क्योंकि एक का ही विस्तार है सब. एक के प्रति भीतर प्रेम जगे तो सबके प्रति उसकी खुशबू फ़ैल ही जाती है और उसमें प्रेम देने वाला स्वयं भी शामिल होता है. जगत के साथ उनका व्यवहार खुद के साथ के व्यवहार को ही झलकाता है. जब भी जगत के प्रति उनके मन में कोई भी निंदा का भाव जगता है, वे हर बार स्वयं को ही पीड़ित कर रहे होते हैं. भीतर की शाश्वतता का अनुभव जिसे हो जाये फिर वह बदलने वाले इस जगत को नहीं देखता, उसके पीछे छिपे अबदल ही देखता है, जो बदल ही रहा है, उसकी चिंता कब तक और क्यों ? जो अबदल है उससे ध्यान हटते ही पीड़ा व दुःख का संसार आरम्भ हो जाता है. उनके भीतर ही है शांति का वह परमधाम जहाँ अनंत सुख का साम्राज्य है !

नन्हे ने आज अपनी कम्पनी व कार्य के विषय में बहुत कुछ बताया. अगले कुछ वर्षों में वे अधिक लाभ प्राप्त करेंगे, अभी तो वे पैसा लगा रहे हैं, जो इन्वेस्टर ने लगाया है. वह अपने काम से संतुष्ट लगता है. सुबह उसकी मित्र से फोन पर बात हुई, वह इसी माह नन्हे को अपने पिता से मिलाएगी. वह कह रही थी कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, उसे जरा भी अंदाजा नहीं है. चार बजने को हैं शाम के. अभी कुछ देर पूर्व अस्पताल से लौटी. आँख का दबाव सामान्य है. दस दिन बाद फिर जाना है. आंख के आगे एक काला घेरा सा दिखाई देता है. उसकी वजह से और कोई समस्या तो नहीं है फ़िलहाल. नन्हे ने पूसी के लिए दफ्ती का एक घर बना दिया है, पर वह उसमें कम ही टिकती है. कल ही वह वापस जा रहा है.

सुबह से लगातर वर्षा हो रही है. अभी-अभी धोबी आकर धुले सूखे कपड़े दे गया, ऐसे मौसम में भी वह अपना कर्त्तव्य पूरी तरह निभाता है, पुत्र की पढ़ाई को लेकर चिंतित है. उसे बीए के बाद एमए कराना है, क्या उसके बाद सरकारी नौकरी मिल जाएगी, क्या पढ़ाई कर लेने मात्र से ही मिल जाएगी ? ये उसके प्रश्न थे. नन्हे ने कहा, प्राइवेट नौकरी ही ढूँढनी पड़ेगी. आज लाओत्से पर ओशो के वचन सुने. अद्भुत वचन हैं उसके, ज्ञान जितना-जितना बढ़ेगा, पाखंड भी बढ़ेगा, होशियारी बढ़ेगी तो चालाकी भी बढ़ेगी. जब तक कोई द्वन्द्वों के पार नहीं चला जाता, उनसे मुक्त नहीं हो सकता. अच्छे बने रहने का आग्रह बुरे से पीछा छुड़ाने नहीं देता. आत्मा में रहकर मन के सारे द्वंद्व स्पष्ट दिखने लगते हैं. शिवानी भी कहती है, सतयुग में ज्ञान की, पूजा की कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी क्योंकि अज्ञान ही नहीं होगा. स्वभाव में टिकना आ जाये किसी को तो वह सुख-दुःख दोनों के पार निकल जाता है.    

Monday, August 6, 2018

पूसी की मस्ती



शाम के चार बजे हैं. मौसम सुहाना है और आकाश पर बादल हैं. अभी-अभी वे बाहर लॉन में टहल कर आए हैं. पूसी उनके साथ-साथ दौड़ती है. नन्ही सी यह बिल्ली पता नहीं कहाँ से आ गयी है यहाँ, जून भी उसे सुबह-शाम कुछ न कुछ खाने को देते हैं. आज ‘भगवद गीता’ का प्रथम अध्याय सुना उन्होंने; कहा, मन को व्यवस्थित करने का मार्ग सीखना है, यानि ‘ध्यान’, कुछ देर ध्यान किया फिर फलों का नाश्ता. इस मौसम के पहले आम भी खाए, मीठे थे. जून क्लब चले गये हैं, जहाँ कोई सरकारी  कार्यक्रम है, उनका भोजन भी बाहर ही होगा. उसने सब्जी और थोड़ा सा गाजर का अचार भी बनाया. शाम को सम्भवतः कुछ लोग योग के लिए आयें. कुछ देर पहले एक साहित्यकार व ब्लागर से बात की, उन्होंने जोरहाट में होने वाले हिंदी के कार्यक्रम के लिए उसे आमंत्रित किया है. सुबह परमात्मा से कुछ बातचीत हुई जैसे पहले भी कई बार हुई है. वह उन्हें सदा ही सन्मार्ग पर ले जाने का प्रयास करता है, वह अति प्रिय है, सुहृद है, मित्र है और वही तो सब है, वे उसके साथ रहकर कितने प्रसन्न हैं !

अभी कुछ देर में ‘सिया के राम’ आने वाला है, अभी जून अपना मनपसन्द कार्यक्रम देख रहे हैं, ‘तारक  मेहता का उल्टा चश्मा’ आज शाम को एक नया ध्यान ‘मुस्कान’ किया, कल बच्चों को भी वही कराएगी, उसने सोचा है. जगह की कमी के कारण बच्चों को असेम्बली में खड़े-खड़े ही ध्यान करना होता है. जिस शिक्षिका के साथ वह स्कूल जाती है, वह कल भी शायद ही जाये, उसकी प्रिय सखी के पति पिछले चार-पांच दिनों से अस्पताल में हैं, उन्हें अभी तक एक बार भी होश नहीं आया है, वह वेंटीलेटर पर ही हैं. शायद उन्हें अब बचाया नहीं जा सकता. इस परिवार की कितनी बड़ी क्षति हुई है. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि उन्हें शक्ति दे, समय के साथ वे सभी आने वाले दुःख को सहने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से वे उनके बिना ही तो जी रहे हैं, जी पा रहे हैं, आगे भी जी लेंगे. यही इस दुनिया का दस्तूर है !

दोपहर को बच्चों के साथ गुरूजी का जन्मदिन मनाया, चालीस बच्चे आ गये थे, उन्होंने भजन गाए और केक बांटा. बच्चों ने चित्र बनाये, अगले हफ्ते उन्हें पुरस्कार भी देने हैं. आज दोपहर को सोई तो पिताजी व परिवार के कई सदस्यों को स्वप्न में देखा, रोचक स्वप्न था. उस दिन भतीजी को देखा था, पर कितना विचित्र था वह स्वप्न, ढेर सारे कीट दिखे थे. आज दोपहर के भोजन में तरबूज खाया और नाश्ते में इडली. सुबह की योग कक्षा में दो महिलाओं को योग कराया, उसके पूर्व प्रातः भ्रमण से लौटकर स्वयं किया. मौसम ठंडा था उस समय, सब तरफ हरियाली ही हरियाली. बगीचे में ढेरों फूल खिले हैं आजकल, बालसम के कितने ही पौधे अपने आप निकल आये हैं.    

रात्रि के पौने आठ बजे हैं, जून ‘भगवद् गीता’ का दूसरा अध्याय सुन रहे हैं, बाहर वर्षा तेज हो गयी है. वे रात्रि भोजन के बाद कुछ देर के लिए बाहर गये, पूसी भी आ गयी और पैरों में लिपटने लगी. उसे घी लगी रोटी पसंद आई. दूध की जगह दही ज्यादा पसंद है उसे. शाम को सात लोग योग करने आये, चार बच्चे व तीन महिलाएं. आखिर में उसे खांसी आ गयी. ॐ के उच्चारण से पूर्व भ्रामरी में. शायद गले में कुछ खराश सी हुई. बाबा रामदेव कहते हैं, रोगी व्यक्ति जैसे विनम्र होता है, वैसे ही विनम्र उन्हें रहना चाहिए. शायद इसीलिए परमात्मा उन्हें बीच-बीच में रोग देता रहता है. आज चार कविताएँ भी चुनीं और रिकार्ड कीं, जो जोरहाट के कवि सम्मेलन में उसे सुनानी हैं, तब तक प्रतिदिन ही एक बार अभ्यास कर लेना ठीक होगा. मृणाल ज्योति के लिए लेख लिखा पर आज ब्लॉग पर कुछ भी नहीं लिखा.  

Saturday, August 4, 2018

पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन



सुबह के साढ़े दस बजे हैं, भोजन लगभग बन गया है. मौसम आज अपेक्षाकृत गर्म है. सुबह स्कूल गयी थी, बच्चों को खेल-खेल में ध्यान कराया, अध्यापिकाएं असेम्बली में खड़ी नहीं होती हैं आजकल, प्रधानाचार्या के न होने से स्कूल में ऐसा होना स्वाभाविक है. कल रात बल्कि सुबह-सुबह स्वप्न में कितने चेहरे दिखाई दिए, शायद उसके पिछले जन्मों के चेहरे..कितनी बार वे इस पृथ्वी पर आ चुके हैं. कितना अच्छा हो, वे जन्म तो लें पर अपनी इच्छा से...स्वतंत्र हों कि कब और कहाँ उन्हें जन्मना है. आत्मा स्वतंत्र होना चाहती है, अपनी ख़ुशी के लिये वह किसी पर निर्भर नहीं है. देह को रखने के लिए कितने सारे प्रयत्न करने होते हैं, किंतु स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए देह तो चाहिए ही, मन भी. मन से परे जो वह स्वयं है उससे परिचय भी तो चाहिए. आज सुबह भी टहलते समय बीच-बीच में वे दौड़े, जून को भी अच्छा लग रहा है. वह कल शाम को कह रहे थे, कुछ दिनों के लिए छुट्टी चाहिए, उन्हें किसी आश्रम में जाना चाहिए कुछ दिनों के लिए.

पिछले दो दिन क्लब के कार्यक्रम के लिए पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन बनाने में व्यस्त रही. परसों सुबह एक सखी ने आकर सहायता की, बताया, क्या होता है. जून ने एक बना-बनाया पीपीटी भी भेज दिया था देखने के लिए. दोपहर को जब सेक्रेटरी आई, तब तक कुछ उसका बनाया भी कुछ आकार ले चुका था. कल सुबह स्कूल से आकर नये सिरे से बनाना शुरू किया, काफी तस्वीरें डालनी अभी शेष हैं. आज दोपहर सेक्रेटरी फिर आने वाली है. कल उसके कहने पर एक नाराज सदस्या को फोन किया, उन वरिष्ठ सदस्या का क्रोध अभी तक कम नहीं हुआ है, वह सत्य सुनना ही नहीं चाहतीं, व्यर्थ ही दोनों परेशान हो रही हैं, ईश्वर सभी को सदबुद्धि दे. चार दिन बाद एक कार्यक्रम है, तब तक सभी के मन शांत हो जाएँ और मेल-मिलाप का वातावरण बन जाये. दो-तीन दिन पूर्व बिल्ली का जो बच्चा घर में आ गया था, अभी तक है, उसे दूध दिया, फोटो उतारी, अगले महीने तक रह जाये तो अच्छा होगा. बच्चे आने वाले हैं, उन्हें ख़ुशी होगी. जून की ट्रेनिंग आज भी है, सुबह गुरूजी को सुनकर उन्हें लोगों व परिस्थिति को स्वीकारने की बात समझ में आयी, अच्छा लगा उन्हें.

पिछले कुछ दिन व्यस्तता बनी रही, डायरी नहीं खोली. अभी छोटी बहन से बात हुई. उसने भतीजी का सामान भिजवाया भाभी को, पर उन्हें लगता है कुछ सामान अभी भी छूट गया है. लोग वस्तुओं को ज्यादा और व्यक्तियों को कम महत्व देते हैं, दुख का यह एक कारण हो सकता है. जीवन का हर पल कितना सुंदर है. आज सुबह जो निर्णय लिया कि उसे मन की छाया नहीं बनना है, बल्कि मन को उसकी छाया बनकर रहना है. मौसम बाहर बेहद गर्म है पर यहाँ अंदर सामान्य है. कल शाम को आंधी-तूफान आये थे पर वर्षा नहीं हुई. पूसी भी किसी कोने में छाया में बैठी होगी, लगता है जैसे वह उन्हें पहले से जानती है, शायद वर्षों पूर्व जो बिल्ली गुजर गयी थी, पुनः जन्म लेकर आई हो. उसकी एक पुरानी छात्रा की माँ का फोन आया, उसे अगले महीने कालेज में दाखिला लेना है, मनोविज्ञान ले या मास कम्युनिकेशन, अभी तय करना है. कुछ देर पहले बगीचे से गाजरें निकालीं, फोटो डाला व्हाट्सएप पर, कमेंट्स आने शुरू हो गये हैं, मोबाइल ने दूरियां घटा दी हैं. भोजन में भी कटहल बनाया है बगीचे से तोड़कर. आज छोटे भांजे का पेन ड्राइव से दिया हुआ एओएल का कलेक्शन देखा, गुरूजी के कई प्रवचन हैं, भजन हैं और भगवद गीता का आडियो भी. कई ध्यान की विधियाँ भी हैं, जून को भी अवश्य देगी आज. ब्लॉग पर आज की पोस्ट भी लिखी, सात वर्ष पूर्व वह मृणाल ज्योति की सदस्या बनी थी, समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ता है. उस दिन जल्दी के कारण किचन के दरवाजे का जो शीशा टूट गया था, आज लग गया है. ‘सिया के राम’ देखने की जल्दी थी. राम को प्रेम करती है शूर्पनखा पर उसे अपमानित होना पड़ता है, उसी अपमान का बदला था सीता हरण. कई दिनों से कोई कविता नहीं लिखी, टिककर बैठना ही नहीं हुआ, अचानक कभी प्रेरणा मिलेगी, इस इंतजार में रही तो शायद लिखना हो ही न पाए ! मृणाल ज्योति के लिए भी लेख लिखना है.

Friday, August 29, 2014

गेंदे की क्यारी


कल शाम वह नैनी पर झुंझलाई और आज सुबह स्वीपर पर, दोनों अपने काम को टालने का प्रयत्न कर रहे थे. कभी-कभी ऊपर से क्रोध करना जरूरी हो जाता है, पर क्या वास्तव में सिर्फ ऊपर से ही क्रोध कर रही थी? इसका एक प्रमाण तो यह है कि अगले ही पल मन शांत था जबकि पहले देर तक असर रहता था. पूसी ने अपने बच्चों को बाहर खुले में ही रख छोड़ा है, जून का विचार है कि उन्हें प्राकृतिक रूप से पलने-बढ़ने दिया जाये, उसका भी यही विचार है, उस दिन उनके लिए दफ्ती के डिब्बे का घर बनाते-बनाते स्वयं को रोक लिया. आज भी धूप निकली है पर हवा बह रही है वह बाहर लॉन में ही बैठी है. दूर से किसी वाहन की आवाज आ रही है. कभी संगीत की और पंछियों की आवाजें भी ध्यान से सुनने पर आती हैं. कल शाम की पार्टी में पता चला कि ग्रेटर नोएडा में अपना घर बनाने के लिए जो सोसायटी बनाई गयी है उसमें ज्यादातर लोग रहने के लिए नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट के लिए पैसा लगा रहे हैं. जून भी कल की मीटिंग से ज्यादा खुश नहीं थे. पहली किश्त भरने के लिए उन्होंने पहले मकान के किराये के जमा हुए पैसे मंगाए हैं. सबकी बातें सुनकर तो उसे लगा कि एक बार और उन्हें भी सोच लेना चाहिए. रोज के कामों के आलावा आज उसे नन्हे का स्वेटर बनाना है, सुभाष चन्द्र बोस व शंकरदेव पर किताबें भी पढनी हैं. पत्रिकाएँ और अख़बार तो हैं ही. कविताओं वाली डायरी खोलनी है. बगीचे में भी कुछ समय देना है. कुल मिलाकर आज का दिन व्यस्त रहने वाला है.  

आज उसने जो सुना, उसका सार था, “साधना करने के लिए सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, श्रद्धा, भावना और विश्वास चाहिये, पुलक चाहिए, मन को पूरी तरह अहंकार से मुक्त करना होगा. भीतर डूबना आना चाहिए. ध्यानस्थ होना पड़ता है. अपने चित्त की सौम्यता को नष्ट नहीं होने देना चाहिए. मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भाव रखते हुए अपने चित्त को प्रसन्न रखना होगा. समय की धारा के साथ पुराने कर्मों का लेन-देन चलता रहता है. नये कर्मों का बंधन न बने यही प्रयास करना चाहिए.

कल वह गाने की प्रैक्टिस में नहीं जा सकी, आज साढ़े पांच बजे जाना है. परसों मीटिंग है. वह बाहर है गेंदे की क्यारी के पास, अभी एकाध फूल ही खिले हैं इसमें. आज सुबह माँ से फोन पर बात की. कल चचेरी बहन की शादी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. उसके मामा के परिवार ने काफी कुछ दिया. इधर उनकी तरफ से सभी का सहयोग रहा. यहाँ बाहर बैठकर चेहरे पर जो शीतल हवा छूकर जाती है, भली लगती है, उसका अहसास अंदर घर में नहीं हो सकता, पर तरह-तरह की आवाजें आती रहती हैं सो गम्भीर कार्य नहीं हो पाते. आज सुबह वह जल्दी उठी थी सो सभी कार्य समय से सम्पन्न हो चुके हैं. आजकल जून के प्रति उसका व्यवहार थोड़ा कम स्नेहपूर्ण रहता है. छोटी-छोटी बातों से चिढ़कर वह जवाब दे देती है. सहनशीलता खोती जा रही है या फिर अपनापन बढ़ता जा  रहा है. अब संगीत का समय है सो अंदर जाना चाहिए.

जीवन में ज्ञान और ध्यान हो तभी मुक्ति सम्भव है ! कल सुबह उसके दायें हाथ की अंगूठे के पास वाली अंगुली में जोड़ पर एक कांटा लग गया, बात छोटी सी है पर उसके मन ने उस हल्के दर्द को भी बड़ा मानकर देखा. नन्हे के हाथ का दर्द इससे कहीं ज्यादा रहा होगा लेकिन उसने संयम से सहा. इस वक्त सुबह के साढ़े सात बजे हैं वह टीवी पर  बाबाजी के आने की प्रतीक्षा में है.

“अपने मन. बुद्धि, विचार को देखने वाला इनसे अलग है, यदि इनसे जुडकर रहेंगे तो सही निर्णय नहीं कर पाएंगे. देह, मन बुद्धि के साथ जुड़कर कोई ‘स्वयं’ को खो देता है. इसका कारण तमो व रजो गुण है. यदि सात्विक गुण की प्रधानता हो तो धीरे-धीरे इन से मुक्त होना आयेगा. तमो गुण की प्रधानता का अर्थ है आलस्य व स्वार्थ और रजो गुण की प्रधानता का अर्थ है अपने मान-सम्मान की वृद्धि का सदा प्रयास करते रहना. देह की आवश्यकता सांसारिक वस्तुएं हैं, पर ‘स्वयं’ की आवश्यकता परमात्मा का स्वभाव है. ‘स्वयं’ को खोजना ही वास्तविक विज्ञान है. अंत में उन्होंने कहा एहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन भर प्रयास चलता रहता है पर स्वयं की आवश्यकता को नजर अंदाज कर दिया जाता है.

  



Thursday, July 17, 2014

मुकेश के गीत


आज बाबाजी ने भारत के मनीषियों के मनोविज्ञान की चर्चा करते हुए कहा, मन की यह विशेषता है कि वह एक साथ दो स्थितियों में नहीं रह सकता, जिस क्षण वह संतुष्ट है, दुखी नहीं है और जिस क्षण वह तृप्ति का अनुभव नहीं कर रहा, सुखी नहीं है. इस विशेषता का लाभ उठाते हुए यदि कोई दुःख में एक क्षण के लिए भी मुस्कुरा दे तो सुख बरस जायेगा, और मुस्कुराना बेवजह मुस्कुराना उसकी आदत में शामिल हो गया है. आज सुबह ऐसा लगा कि उसकी वाणी में रुक्षता आ गयी है पर सचेत थी सो संभल गयी. जून भी कल रात को थोड़ा सा उद्ग्विन दिखे, यात्रा से आने के बाद पहली बार, शायद गर्मी के कारण या नन्हे के देर तक क्लब में रह जाने के कारण. आज सुबह नन्हे के पेट में दर्द था, वह ठीक से नाश्ता भी खाकर नहीं गया, लेकिन वह जानती थी, बहादुर लड़का है, इस बात से छुट्टी नहीं लेगा. जून के साथ कल माँ के लिए साड़ी और कुछ अन्य उपहार खरीदे.

सुबह पांच बजे उठ कर बाहर आयी तो पूसी अकेली दिखी, उसने बच्चों को शायद कहीं शिफ्ट कर दिया है. आज भी विद्वान् वक्ता ने अच्छी बातें कहीं, वह भाषाएँ भी कई जानते हैं. क्लब में children meet होने वाली है, उसकी संगीत अध्यापिका बच्चों के साथ व्यस्त हैं. सो आज क्लास नहीं होगी. अस्पताल जाने के लिए उसने जून को फोन किया, कई दिनों से ऊपरी अधर के पास छोटा सा दाना उभर आया है, जो कितने उपाय करने से भी ठीक नहीं हुआ, अब डाक्टर की राय लेना ही ठीक रहेगा. संभल-संभल के चलना है, व्यर्थ ही कल्पनाओं में भ्रमित रहेंगे तो वर्तमान को कटु बना लेंगे. बीमारी का आगमन तभी होता है जब स्वास्थ्य के नियमों का पालन नहीं करते.

आज सुबह नन्हा उठ नहीं रहा था पर क्रोध नहीं आया, अच्छा लगा कि सहज शब्दों में उसे समझा सकी. जून का हृदय भी उसके प्रति स्नेह से भरा है, उसकी हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का ध्यान रखते हैं, ऐसे ही ईश्वर भी उनकी हर तरह से सहायता करता है, उन्हें इतना कुछ दिया है, उसकी हर छोटी-बड़ी मुश्किल में साथ देता है. और तब भी कृतज्ञता स्वरूप वह उसे अपना एकनिष्ठ प्रेम नहीं दे पाती.

आज बाबाजी ने फटकार लगायी, बारह साल कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह चक्कर लगाते रहें ऐसे भक्त उन्हें नहीं चाहिए, जो सातत्य भक्ति कर सकें, यात्रा पूरी करने का सामर्थ्य रखते हों वही इस क्षेत्र में आयें. कल रात को वह बेचैन थी, मन को एकाग्र रखने का प्रयास व्यर्थ हुआ, शायद उसमें श्रद्धा की कमी है, या वह कई मार्गों पर एक साथ चलने का प्रयास करती है तभी भटक जाती है. आज से वह निश्चित कर लेती है, ‘भगवद् गीता’ उसका इष्ट ग्रन्थ है, इसके अतिरिक्त वह किसी ग्रन्थ का अध्ययन फ़िलहाल अभी नहीं करेगी. कृष्ण ही उसके प्रेम का केंद्र होंगे. रास्ता एक हो उसका ज्ञान हो तो मंजिल शीघ्र मिल सकती है. गीता में भगवान ने स्वयं कहा है, एकनिष्ठ व संशय रहित होकर जो उन्हें भजता है उनके कुशल क्षेम का ध्यान वह स्वयं रखते हैं. प्रभु  जिसके राखनहार हों उसे अन्य किसी से प्रयोजन भी क्या हो सकता है. कल क्लब में छोटे-छोटे बच्चों को इतनी मधुरता से गाते देखकर अच्छा लगा, संगीत में जादू है और फिर संगीत से कोई आराधना भी कर सकता है. कल अध्यापिका ने ‘तीसरी कसम’ फिल्म का एक गीत सिखाया. सजन रे झूठ मत बोलो...मुकेश का गाया यह गीत उसने बचपन में कई बार सुना था.

आज ‘भारत बंद’ के कारण नन्हे का स्कूल बंद है, नूना ने उसे गृह कार्य करने को कहा, पर वह दूसरे-दूसरे कार्यों में व्यस्त है. कभी कभी बच्चे माता-पिता के धैर्य की परीक्षा लेने के लिए ही जैसे उनका कहा नहीं सुनते.




Tuesday, July 15, 2014

पूसी का परिवार


आज उनतीस अप्रैल की सुबह नौ बजे वह पंच भूतों, समस्त देवी-देवताओं व परम सत्ता को साक्षी बनाकर एक घोषणा करना चाहती है. “मानवीय सद्गुणों में जो सर्वोत्तम है, जिसके कारण इस सृष्टि में सुन्दरता है, वही प्रेम समस्त प्रश्नों का हल है”. उसने सोचा, यदि मानव, मानव के प्रति प्रेम का भाव रखे तो इस संसार से सारे वैमनस्य, सारी क्षुद्रता पल भर में मिट जाये. प्रेम लेकिन सच्चा होना चाहिए, ऐसा प्रेम प्रतिदान नहीं माँगता, वही प्रेम जो सबके जीवन में एक न एक बार अवश्य उदित होता है, पर उसे कुचल दिया जाता है, ईर्ष्या, लोभ, मोह, और क्रोध जैसे अवगुण उसे ढक लेते हैं. वह बीती वस्तु बन कर रह जाता है और कभी-कभी लगता है कि प्रेम कहीं था ही नहीं, शायद वह भ्रम था, पर वह भ्रम नहीं था, वह सत्य था जो झूठ के नीचे दबा सिसक रहा होता है. यदि क्रोध सत्य हो सकता है तो प्रेम क्यों नहीं. जरूरत है तो बस उस कोमल पौधे को जीवित रखने की, आस-पास के झाड़-झंखाड़ साफ कर उसे सही पोषण देकर बड़ा करने की, वही प्रेम का पौधा जीवन में फलीभूत होगा और खुशियों के फल देगा.

यह डायरी उसकी आध्यात्मिक यात्रा का भी दस्तावेज है, वर्षों पहले उस यात्रा का बीज अंतर में प्रकृति ने बोया था, पर मौसम आते-जाते रहे, कभी अनुकूलता मिली, कभी प्रतिकूलता और अंकुर से पौधा बनने में इतना वक्त लग गया. आज भी यह एक पौधा है अर्थात यात्रा का आरम्भिक चरण, लेकिन अब इसे दिशा मिल गयी है. भारत के मनीषियों, ऋषियों, संतों और अवतारों के जीवन, उनके सदुपदेश ने इसे पानी और भोजन दिया है. कल जून कोलकाता होते हुए मुम्बई से यहाँ आ गये. वह दोपहर का खाना खाकर थोड़ा आराम कर रही थी, टीवी पर ‘दिल ही दिल में’, internet love पर फिल्म आ रही थी. जून थोड़ा थके हुए थे, जो स्वाभाविक ही है, पर खुश थे, उनका भाव वही पहले की तरह था छलकता हुआ. शाम को एक सखी आयी, बेटे के लिए हिंदी के प्रश्न पूछने. बाद में उसे एक सखी को बुलाना पड़ा, जिसे पेट्स का अनुभव है, पूसी अपने बच्चों को भूखा छोड़कर रात से ही गायब थी, भूख से व भीग जाने के कारण वे रो रहे थे, उसने बड़े प्यार से दूध पिलाया और सुखाया और तब वे सो गये. रात को पूसी आ गयी थी, शायद वह कहीं शिकार को गयी थी. नन्हे का आज विज्ञान का टेस्ट है, कह रहा था प्रोजेक्ट वर्क में व्यस्त रहने के कारण क्लासेस ही अटेंड नहीं कर पाया था,  अपने आप पढकर, समझकर, याद करना कठिन कार्य है लेकिन उसे मालम है नन्हे का टेस्ट हमेशा की तरह अच्छा होगा.

ईश्वर पर विश्वास करो तो सब कुछ कितना सहल हो जाता है. आज मई महीने का दूसरा दिन है. उसके जन्मदिन का महिना. इस बार वह उस दिन अपने जन्मस्थान में होगी, जहाँ उन्होंने एक घर भी बनाया है भविष्य में रहने के लिए. वर्षों पहले जब वह बीस की हुई थी, सोच रही थी बहुत बड़ी हो गयी है, उस उम्र में बीस का होना भी बहुत बड़ा होता है. यह भी सोच रही थी कि इतने वर्षों में अपने जीवन का, ऊर्जा का, मानसिक शक्ति का सदुपयोग नहीं किया किन्तु आज वह मलाल नहीं है. जिन्दगी ने उसे बहुत कुछ दिया है और भरसक प्रयत्न करके उसने ईश्वर के मार्ग पर चलने का प्रयास जारी रखा है, क्योंकि वही एकमात्र सत्य है और हर मानव का अंतिम उद्देश्य है सत्य की प्राप्ति. आज सुबह जून ने उसे उठाया, वह और नन्हा दोनों उसके स्नेह के पात्र हैं, ऐसे स्नेह के जो निस्वार्थ, निष्काम और शुद्ध है, जो स्नेह के लिए स्नेह है, love for the sake of love क्योंकि सत्य के साथ ईश्वर प्रेम भी है. आज ‘जागरण’ में सुना सुख-दुःख आदि अवस्थाएं आती रहती हैं, इन्हें साक्षी भाव से देखने वाला आत्मा इनसे अलिप्त रहता है तो उसे यह प्रभावित नहीं करतीं. कल लाइब्रेरी से चार नई किताबें लायी है. आज से योगासन करते समय सचेत रहेगी, क्योकि ध्यानयुक्त होकर आसन करने से ही उसका लाभ मिल सकता है. आज नन्हे के स्कूल में extempore speech का टेस्ट है. नानाजी की दी एक डायरी से उसने सहायता ली है, कुछ साल पहले पिता ने ये डायरी उसे दी थी, जिनमें विभिन्न विषयों पर जानकारी है.






Tuesday, June 3, 2014

पतझड़ का मौसम


She began her spiritual journey long ago but still she is very far from destination, when in college read books and in those days she used to feel a presence but with passing of years began to doubt even in its existence. Now again after fruitless effort  of obtaining true happiness and peace that never lasts, she has come to Him. He says that she should change herself because all her sorrows and despairs are her own creations, created by ego. When she will do her duties with selfless love she will be happier, and when she will be at ease with herself, Meditation will find its way, nowadays mind wanders because it has no base to stay in. Buddha also says your mind is your friend and is your enemy. It is  mind with false ego which dances  on its tune. Never doubting  real self one should be above from its whims and fancies.

शाम का वक्त है, मौसम अच्छा-खासा है, न सर्दी न गर्मी, न पूरी तरह दिन अस्त हुआ है न दिन शेष ही है. शाम का ऐसा सुहाना वक्त जब दिन और रात मिलते हैं. पडोस की छोटी लड़की घर की सीढ़ियों पर बैठकर कविताएँ याद कर रही है. माली दिन की जाती रोशनी में गुलाब के पौधों की निराई करने में व्यस्त है. वह इतने सारे घरों में काम करता है, सुबह से ड्यूटी बजाते-बजाते हर दिन किसी न किसी घर में शाम हो जाती है. पूसी, घर की बिल्ली घास पर लेटी अपनी थकान मिटा रही है. बीच-बीच में चौकन्नी होकर इधर-उधर ताकने लगती है फिर बदन सिकोड़ती हुई गड्डमड्ड सी हो बैठ जाती है. मई महीने की शाम वर्षा के कारण थोड़ी सी नमी लिए हुए है, पौधे हरे-भरे होकर शांत-संतोषी भाव लिए दीखते हैं. पौधों में जान होती है, शायद उनमें भावनाएं भी होती हों, वर्षों तक एक ही जगह खड़े-खड़े पीपल, आम और कटहल के पेड़ क्या ऊब नहीं जाते होंगे, सामने खड़ा कनकचम्पा का पेड़ आधा हरा है, नये कोमल पत्ते धारण कर चुका है और आधा अभी पुराने सूखे पत्ते लिए काला दीखता है. गुलदाउदी के पौधों में कुछ पर फूल आ चके हैं, कुछ अभी तक पुष्प हीन हैं. प्रकृति में सभी संयमी हैं, जिनपर फूल आ गये हैं उन्हें कोई घमंड नहीं और जिनपर नहीं आये हैं उन्हें कोई दुःख नहीं, वही पेड़ जो वसंत आने पर फूलों से लद जाता है, पतझड़ में ठूँठ सा लगता है पर अपने ऊपर सारे मौसमों की मार सहता हुआ तटस्थ भाव से खड़ा रहता है. दूर से कु कू.. की आवाजें आ रही हैं, दो पंछी जैसे जुगलबंदी कर रहे हों.

आज चार दिनों के बाद डायरी खोली है, पिछले चार दिन सुखमय थे, उसके मन पर किसी भी तरह का बोझ नहीं था, जिन्दगी पहले की तरह खुशनुमा लगने लगी थी और यह कायाकल्प हुआ काम करने से, उसने हर क्षण अपने को व्यस्त रखा. पिछले दिनों की उदासी अकर्मण्यता का परिणाम थी. हाथ सदा काम में लगे रहें तो मन भी शांत रहता है, कहीं कोई उहापोह नहीं. आज भी सुबह से कार्यों का क्रम जारी है. मानव अपने लिए परेशानियों की किले खुद ही बनाता चलता है. उम्र के साथ-साथ स्वभाव में जो परिपक्वता आनी चाहिए कभी-कभी उसका अभाव खटक जाता है. स्वयं को नहीं जाना, ऐसा लगता है. कभी कभी रात को जब नींद से आँखें बोझिल होती हैं. मन में विचार एक रील की तरह चलते हैं, एक-दूसरे से बिलकुल अलग विचार, जिन पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं है. उसकी सारी समस्याओं का हल उसके अंतर में ही मिल सकता है क्योंकि वहीं चैतन्य का निवास है, जो मानव को अच्छे कर्मों पर आनंद और विकर्मों पर दुःख की अनुभूति कराता है. कल उसने तीन पत्र भी लिखे..


Monday, May 12, 2014

ग्रीक पौराणिक कथाएं


इन सर्दियों में आज पहली बार धूप में बैठकर लिख रही है, पंछियों के कलरव, गुलाब, गेंदे, गुलदाउदी के पौधों के मध्य. कभी ऐसा होता है कि चलते-चलते अचानक बैठकर सुस्ताने का मन हो, पीछे मुड़कर देखने का भी, कितना रस्ता तय कर आये, कितना अभी बाकी है. सो आज उसके साथ यही हो रहा है, पिछले दिनों थककर बैठने का सुस्ताने का वक्त ही नहीं था, हर वक्त कोई न कोई व्यस्तता लगी ही रही, अब लम्बे सफर पर जाने से पूर्व थोड़ा थम कर सोचने का वक्त मिला है. नन्हा स्कूल गया तो कुछ सुस्त लग रहा था, पर उसे लगता है, स्थान परिवर्तन का उसपर अच्छा असर होगा लौटकर आएगा तो उत्साह से परिपूर्ण होगा.

...पूसी लौट आई है, कहानियों में सुना था कि मीलों दूर जाकर भी पालतू पशु अपने घर लौट आते हैं, कल वह बगीचे पीछे वाले भाग में गयी, तो देखा लीची के पेड़ के नीचे वह बैठी थी, आश्चर्य और ख़ुशी से उसने जून और नन्हे को बताया, उसके पास जाते ही पैरों से लिपटने लगी, थोड़ी मोटी हो गयी है, जैसे कुनमुना कर कुछ कहने का प्रयत्न कर रही थी.

आज उसकी बंगाली सखी के विवाह की वर्षगाँठ है, आजकल वे लोग भारत से बहुत दूर हैं, किसी पश्चिमी देश में, लोग अपना घर-परिवार देश छोड़कर दूर निकल जाते हैं और नये-नये आयाम तलाश लेते हैं. आज भी वही कल का सा वक्त है, धूप है, पूसी है, हरी घास है, कितने अचरज की बात है चिड़ियाँ हर वक्त बोलती हैं, पर मानव अपने कान उनकी तरफ से बंद किये रहते हैं. परसों की पिकनिक पर वे देर से जाकर जल्दी आने की बात सोच रहे हैं. सभी से मेल-मुलाकात भी हो जाएगी और बुधवार को उनकी यात्रा के लिए एक छोटी सी रिहर्सल भी. नदी किनारे रेत पर बैठकर महल बनाना और स्वादिष्ट भोजन, पिकनिक का इस साल यही अर्थ होगा, पानी में पैर डालकर बैठना भीगना-भिगोना और दूर तक जंगल में घूमने जाना सम्भव नहीं होगा. उसने ऊपर देखा, चारों ओर की हरियाली को छोड़कर जाना, जिसके पीछे से आकाश की नीलिमा झांक रही है कितना मुश्किल है. आज सुबह बहुत दिनों बाद जागरण में ‘गोयनका जी’ को सुना, श्वास का आना-जाना देखते-देखते विकारों से मुक्ति की बात सिखा रहे थे. मनुष्य के पास सुधरने के के लिए हर वक्त गुंजाइश रहती है, हर कृत्य में सुधार किया जा सकता है.

आज उनके लॉन में एक नन्ही बच्ची की आवाजें भी हैं, नैनी की बेटी की बेटी की तुतलाहट भरी आवाज, पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह परिवार बढ़ते हैं अपने विचार रीति-रिवाज, परंपरायें एक दूसरे को सौंपते हुए हर नई पीढ़ी उसमें कुछ और जोड़ती चली जाती है. उनके बाएं तरफ की पड़ोसिन ने कल भी ठीक इसी वक्त अपने ड्राइंग रूम की खिड़की खोली थी, उससे मिले भी कई दिन हो गये हैं. वह धूप में बैठी है, स्वेटर भी पहना है, पर धूप का अहसास नहीं हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वह नन्ही बच्ची एक सूती फ्राक पहने छाया में दौड़ रही है. आजकल वह ग्रीक कथाओं की एक पुस्तक पढ़ रही है. ये कथाएं भी भारतीय पौराणिक कथाओं की तरह बहुत रोचक हैं, she finds herself near to Hestia, the Goddess of the earth and fire, she remains in back ground and is content in herself.






Friday, March 14, 2014

हनुमान मन्दिर


उसने सोचा, वक्त आ गया है कि कुछ पल बैठकर मन का लेखा-जोखा किया जाये, मन जो इस वक्त शांत है. कल रात को जीजीएम के संदेश का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते समय आने वाली दिक्कतों से थोड़ा परेशान हो गया था, पर वक्त पर पूरा करके दे सकी इसका श्रेय भी इसी मन को है. जून होते तो रात साढ़े दस बजे तक बैठकर उसे काम नहीं करने देते शायद तब इतनी देर भी नहीं लगती, उसने दो-तीन तकनीकी शब्दों का हिंदी अनुवाद एक मित्र के यहाँ फोन करके पूछा, बाद में पता चला वे लोग पहले पैकिंग करने के कारण देर से भोजन कर रहे थे और उन्हें उठकर फोन रिसीव करना पड़ा. उसे लगा, उन्हें अपने परिचितों को taken for granted नहीं लेना चाहिए. खैर जो हुआ सो हुआ ! कल दोपहर उड़िया पड़ोसिन के साथ भोजन अच्छा लगा, उस सखी की तरह इसने भी उत्तर भारतीय खाना बनाया था, राजमा वाली काली दाल, मिश्रित सब्जी और पनीर दो प्याजा तथा कढ़ी. नन्हा जिस तरह पांच-साथ मिनट में कपड़े बदल कर वहाँ आ गया, देखकर अच्छा लगा. नये स्कूल में पढ़ने जाने से वह होशियार हो गया है स्मार्ट भी. उसने समय देखा, मात्र दो घंटे बचे हैं, समय का नियोजन यदि करे तो आधा घंटा अभ्यास कर सकती है. कल घर से भी फोन आया, उन्होंने भी उनके अकेलेपन को दूर करने के लिए फोन किया, लोगों को उनकी परवाह है, जानकर ख़ुशी होती है.

आज सुबह भी देखा तो पूसी बरामदे में रखी रॉकिंग चेयर पर सोयी थी, रात को किसी वक्त जब जाली से कूद कर आई होगी तो अपने पंजों के दबाव से एक गमला भी उल्टा किया होगा, उसे देखकर क्रोध आया और उसे डांट के भगा दिया पर मन में यह ख्याल भी बना हुआ है कि मूक जानवर भला क्या जाने कि उसके किस काम से कोई खफा है. नन्हे के पैर में कल रात अचानक cramp हो गया, घुटने के पास से दांया पैर मुड़ ही नहीं रहा था, दर्द था, फिर बाद में कुछ राहत मिली तो सो गया पर सुबह तैयार होकर जब स्कूल के लिए निकला तो दर्द फिर आ गया, मना करने पर भी स्कूल तो गया है क्योंकि अगले पांच दिन स्कूल बंद है सो आज जाना ठीक ही था, कल उसने debate के लिए कुछ points लिखवाये पर कापी ले जाना भूल गया. कल रात स्वप्न में जून को देखा, अब यूँ भी अकेले रहना खलने लगा है.

आज जून आने वाले हैं, सो नन्हा और वह उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, इतवार का सारा कार्य हो गया है. आज सुबह से वर्षा हो रही है, अलार्म भी सुनायी नहीं दिया, कल एक मित्र परिवार के साथ वे हनुमान मन्दिर गये, उनके कारण कभी-कभी मन्दिरों के दर्शन हो जाते हैं, उसे ध्यान के सिवा सब बचकाना लग रहा था पर घर पर अकेले रहने से बेहतर था. ‘हनुमान जयंती’ के उपलक्ष में एक जगह हनुमान पूजा भी देखी.

कल दोपहर दो बजे जून आ गये, साथ-साथ भोजन किया, घर जैसे भर गया. उनके लाये ढेर सारे सामानों से और उनकी बातचीत से. फिर शाम को बाजार गये. नन्हे की कुछ किताबें लेने जब उसका एक मित्र आया तो उसने कुछ नानुकुर की पर नन्हे ने समझाया कि उसे इन किताबों की कोई जरूरत नहीं है, बच्चे कभी-कभी बड़ों को राह पर ले आते हैं. उसका मन संवेदनशील नहीं है, पूसी को भगाया फिर कभी-कभी बेवजह पत्ते भी तोड़ देती है. यूँ ही झुझला जाती है पर जानती है कि यह सब वह कर रही है और ऐसा करना उचित नहीं है लेकिन क्यों कि ऐसा करने से कोई विशेष दुःख उसे नहीं उठाना पड़ता सो इससे परहेज नहीं करती. आज ध्यान में वह अपने विचारों को देख पाई कभी धीरे-धीरे कभी एक के बाद एक आते जा रहे विचार, मन एक पल भी खाली नहीं बैठता, आज जून शायद देर से आयेंगे straight शिफ्ट है. आज बैसाखी है पर सुबह से उत्सव जैसी कोई बात नहीं हुई. यदि मन स्थिरता से युक्त न हो तब उत्सव भी अर्थहीन हो जाता है.