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Wednesday, April 29, 2015

हरसिंगार के फूल


आज सुबह उसने डायरी नहीं खोली, फूलों को इकट्ठा किया और उन्हें सजाया घर में. इस वक्त तक हरसिंगार के ये पुष्प मुरझा गये हैं पर सुबह बहुत सुंदर लग रहे थे. ‘जागरण’ पर सद्वचन सुनकर अंतर्मन खिल गया है. भीतर ही ज्ञान है, शक्ति है, प्रेम है, साहस है, ऊर्जा है, उत्साह है, ईश्वर है पर मानव को उसका ज्ञान नहीं. शास्त्र और गुरू उससे परिचय कराते हैं, तब कोई नये उत्साह से जीवन का सामना करता है. सब कुछ बेहद सरल लगने लगता है, हृदय प्रेम से भर उठता है, अकारण प्रेम..सारी सृष्टि के लिए प्रेम...जैसे कृष्ण उन्हें दे रहे हैं अनवरत...उसकी ओर मुड़े तो पाएंगे कि वह उन्हें प्रेम भरी दृष्टि से देख रहे हैं ! उसके सभी कार्य वही तो सम्पन्न करते हैं, उनकी ही चेतना से सारी सृष्टि चल रही है. वे खुद उनके हाथों में एक साधन मात्र हैं. जैसे देह उसके लिए साधन है, चित्त भी साधन है, यदि कोई इसे उनकी ओर मोड़ दे तो वह स्वयंमेव ही आगे का कार्य सरल कर देते हैं. वही भीतर से निर्देश देते हैं, सामर्थ्य देते हैं, सत्कर्मों की प्रेरणा देते हैं. अपनी अनुभूति कराते हैं. कृष्ण को वह कितने ही रूपों में देख चुकी है, अपने मन की आँखों से भी और इन आँखों से भी...वह स्वयं जब चाहते हैं..मिलते हैं...   

उसने दिनकर की पुस्तक में डॉ राधा कृष्णन के विचार पढ़े तो डायरी में लिख लिए- “ सम्यक ज्ञान की स्फुरणा एकाग्र-चिंतन से होती है, एक ही विषय पर दिन-रात ध्यान लगाये रहने से होती है. निदिध्यासन सोचने की उस प्रक्रिया का नाम है, जिसमें मनुष्य सम्पूर्ण मस्तिष्क तथा समग्र अस्तित्त्व से सोचता होता है. सम्यक चिंतन संश्लिष्ट चिंतन है, पूर्ण चिंतन है. यह चिंतन की वह प्रक्रिया है जिसमें सभी इन्द्रियां, सम्पूर्ण बुद्धि, समग्र चेतना, वस्तुतः सारा अस्तित्त्व विचारों से संचालित रहता है. शरीर का कोई अवयव नहीं है जो मन या आत्मा के नियन्त्रण से परे हो. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य का सारा व्यक्तित्व एक है. उसके अवयव, मन और चित्त उस एक ही व्यक्तित्व के भिन्न-भिन्न पक्ष हैं. बुद्धि से जो विचार तैयार होता है, उसे मनुष्य के अंतर्मन के भीतर पहुंचना चाहिए जिससे चिंतक के चेतन व अचेतन दोनों ही अंश उस विचार से अनुप्राणित हो सकें. शब्द और विचार दोनों को मनुष्य के मांस में मिल जाना है. मानव-मनोविज्ञान का यही रूपांतरण रचनात्मक कहलाता है. रचना मनुष्य की वह मानसिक प्रक्रिया है जिससे वह अपनी अपरिचित एवं निगूढ़ आत्मा को जानने में समर्थ होता है.”

पिछले तीन दिन फिर डायरी नहीं खोली. कल ‘सुदर्शन क्रिया’ का फालोअप था. योग शिक्षक पहले की तरह सभी को हँसाते नहीं है, कुछ दूरी बनाकर रखते हैं, खैर..वक्त बदलता है, रिश्ते बदलते हैं और इन्सान भी बदलते हैं. सड़क पर कुछ मजदूर हँसते हुए चले जा रहे हैं. इन्सान किसी भी स्थिति में क्यों न हो हँसी और ख़ुशी उसका साथ नहीं छोड़ती, जैसे कि दुःख..तो क्यों न वे दोनों को समान भाव से अपनाते चलें. दोनों ही आते-जाते रहेंगे भिन्न-भिन्न रूपों में, पर एक तो वही एक है अपना आप.. जिसे न सुख व्याप्ता है न दुःख. जो रसमय है, जो जीवन को अर्थ देता है, चुनौती देता है, लक्ष्य देता है. जो अपना दिव्य रूप धरे अपनी ओर आकर्षित करता है. वह खुद सा बनाना चाहता है, बल्कि उसने खुद सा ही बनाया था, पर वे उससे दूर होते चले गये और संसार को अपना मानकर उसमें फंसते गये जो हाथ से रेत की तरह फिसलता जाता है..देह जो दिन-प्रतिदिन जरा की ओर बढ़ रही है, कोई न कोई व्याधि उसे सताती है. मन जो सदा किसी न किसी ताप में जलता रहता है...और वह जो शीतल फुहार सा, अलमस्त झरने सा, प्रेम का झरना भीतर ही कहीं बह रहा है, उससे वे अनजान ही बने रहते हैं !  


Wednesday, July 30, 2014

हवाई जहाज की दुर्घटना


Still she has to go far, very far ! she has so many shortcomings, some of them she is not even aware of. Today in the morning she scolded Nanha and after years badly. Jun and she both do not like his bad habit of late rising. He does not look fresh even after getting up these days, it means he sleeps very late also. उसकी लिखाई से स्पष्ट है कि मन शांत नहीं है, भावनाओं से युक्त है.

आज का कोटेशन भी अच्छा है – The future belongs to those who believe in the beauty of their dreams- Eleaner Roosevelt
And what are her dreams ? Are they still alive and beautiful also? Years ago she dream t to be a writer or poet, but it is still a dream buried in the  heart of her heart. उसके मन के किसी कोने में दबा-छिपा बैठा है यह स्वप्न, जो कभी सच होने को आतुर था. कई  बार तो उसने उसे अपना मानने से भी इंकार कर दिया लेकिन Anne Frank के शब्दों ने, उसके साहस और प्रसन्नता ने, उसके आत्मविश्वास ने उसे अंदर तक छू लिया है और वह स्वप्न धूल झाड़ता हुआ, डगमगाता हुआ फिर से खड़ा हो गया है. उसका विश्वास उसमें फिर से जागृत हो रहा है. लेकिन अभी भी मन में कहीं न कहीं आशंका का बादल मंडरा रहा है. कल रात पूसी फिर लौट आई, इस निरीह प्राणी ने अपना नाता उनसे किस मजबूती से जोड़ लिया है, मनुष्य भी इतने निरादर और उदासीनता के बाद सम्बन्ध नहीं रख पाते पर जानवर होकर वह कितनी जुड़ गयी है अपने परिवेश से, पिछले चार-पांच वर्षों से वह उनके साथ है, कई बार बिछड़ी पर हर बार लौट आई है. आज नये हफ्ते का प्रथम दिन है. गोयनका जी चित्त की प्रधानता पर बल दे रहे थे. वाणी का अथवा शरीर का कर्म तो बाद में होता है पहले चित्त का कर्म होता है. वहाँ बीज बोया जाता है, जिसका परिणाम बाद में मिलता है, जैसा बीज होगा फल वैसा ही होगा. Anne का चिन्तन कितना मौलिक था, उसकी सोच उसके अनुभव के साथ-साथ परिपक्व होती चली गयी. she loves her !

All is well with her today but deep down heart is heavy with the burden of one more plane crash. Which  took place yesterday near Patna aerodrome’s runway, 54 persons were killed in this, only few lucky survived . These days TV covers not only cause and consequence of accident bur takes viewers  to the homes of dead persons. So every tragedy which earlier was only an news item now becomes  a personal loss. The grim faces of kith and kin of passengers, there tears and anguish… all this they can feel. But how long will  these  occur due to negligence. Babaji today scolded her and he was right, when he says things that she likes, she adore him and when someday he does not use the language of her choice she does not listen him but he is above all this worldly good or bad, there is nothing evil or ill for him. He knows the ultimate truth from which they ( at least she) is very very far away. But she tries to reach there by using awareness and keeping  an eye on her ever restless mind.





Tuesday, March 4, 2014

चुलबुली सी बालिका


आज वह बेहद हल्का महसूस कर रही है. दादा धर्माधिकारी की पुस्तक में मनुष्यता की परिभाषा पढकर मनुष्य की गरिमा और उसकी शक्ति पर विश्वास और बढ़ गया है. कल का दिन एक भरपूर दिन था. कल दिन भर उसने एक एक पल को पूरे मन से जीया. मानव होना और फिर स्त्री होना, संस्कार युक्त, शिक्षित और स्वस्थ होना, अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, कुछ न कुछ करते रहने की तीव्र इच्छा, निरंतर कुछ न कुछ सीखने की आकांक्षा, जीवन को कलात्मक रूप से जीने का प्रयास, स्वयं को समाज के प्रति या परिवार के प्रति उत्तरदायी मानते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करना, ये सारी बातें उसमें किसी हद तक तो हैं न, और हर बात के लिए स्वयं को दोषी मानते रहना अपनी शक्ति पर संदेह करना, अपने आप पर भरोसा न कर पाना ये दोष भी हैं. पर अब उसे भयभीत होकर पीछे-पीछे रहकर चलने की जरूरत नहीं है, उसकी कमियां जो भी हों उन्हें लेकर स्वयं को अपमानित महसूस करने की जरूरत नहीं है. सदा ही तृतीय स्थान पाने की अपनी आदत को जारी रखने की भी नहीं. आज नन्हे का गणित का इम्तहान है जो उसे कठिन लगता है, पर वह जानती है वह बहुत होशियार है, अवश्य अच्छा करेगा. कल शाम वे टहलने गये, हवा ठंडी थी और चेहरे को छूकर सिहरा जाती थी

Today again she is so happy ! yesterday one friend got a prize of 16,000 Rs from the makers of Nyle Shampoo. They went there to celebrate the joy and to eat sweets. Today she rang her to say that they liked it, then she talked to asamiya friend, she is waiting for the D-day, she promised her to be there in the hour of need and it makes her happy that she will be of some use to someone ! Nanha has prepared well for Sanskrit exam. He has learnt twenty shlokas in Sanskrit, when she was of his age she never learned so many shlokas..

पिछले चार दिनों से नहीं लिख पायी, आज उन्हें तिनसुकिया जाना है, लंच भी वहीं खाना है. कल होली मनायी, परसों शाम बड़े भाई भाभी को फोन किया, छोटी बहन को फोन किया कल सुबह -सवेरे दीदी का फोन आया, उन्होंने कहा, बड़ा भांजा और छोटी भांजी शायद यहाँ आयें छुट्टियों में.

आज संगीत कक्षा में ‘काफी’ की तान सिखाई गयी. कल वे तिनसुकिया में ही थे कि पता चला उस सखी ने बिटिया को जन्म दिया है, वापसी में अस्पताल गये, गुलाबी रंग की छोटी सी बच्ची आँखें बंद किये लेटी थी, अभी तक चेहरा स्पष्ट नहीं था कि किस पर गया है, माँ स्वस्थ लगी, साहसी है वह, वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर आकर माँ बनने का निश्चय करना ही साहस पूर्ण कदम था जो वह नहीं उठा पायी थी, अपना सब कुछ दे देना पड़ता है न. आज से उसकी छात्रा ने फिर से आना शुरू कर दिया है. कल उसने एक चप्पल ली, एक जोड़ी बुँदे, एक नेल पॉलिश और एक लिपस्टिक यानि अपने ऊपर खर्च ! इस समय तीन बजे हैं, नन्हा एक कहानी लिखते-लिखते बीच में ही टेनिस खेलने गया है. शाम को वे पुनः अस्पताल जायेंगे और बाद में एक मित्र के यहाँ, उनकी छोटी बेटी बहुत प्यारी है उतनी ही चुलबुली भी.   

‘कविता लेखन के सामान्य सिद्धांत’ पढना शुरू किया तो भीतर विचार जगने लगे. उसे लगा, मन जितना संवेदन शील होगा जितना गहराई से सोचेगा जीवन उतना ही अर्थपूर्ण होगा, वे हैं कि उथले-उथले ही जीए जाते हैं, अंतर में झाँकने से डरते हैं खुद के भी और इर्दगिर्द भी, कहीं कुछ ऐसा न दिख जाये जो आँखों में खटक जाये, बस आँखें बंद किये ताउम्र जिए चले जाते हैं, न ही टूटकर प्यार करते हैं न ही नफरत, बस कामचलाऊ जिंदगी जीते हैं, शिद्दत की कमी है अहसासों  में ती जीवन में गहराई कहाँ से आये.

पिछले कई दिनों से, हफ्तों से, महीनों से कुछ नहीं कहा, कविता लिखी नहीं जाती, कही जाती है पहले अपने आप से फिर कागज से, ऐसा तो नहीं कि महसूस करने की शक्ति नहीं रही, अब भी एक मार्मिक शब्द आँखों को धुंधला जाता है, मौसम के बदलते रूप और ढंग अदेखे नहीं रहते, आते-जाते उगता डूबता सूरज और चाँद जब दिखता है तो मन में एक हिलोर सी जगती है, फूल अब भी भाते हैं और दर्द अब भी होता है पर ऐसा भी बहुत कुछ है जो अब नहीं होता जैसे कि अपनी सुविधा-असुविधा की परवाह किये बिना किसी की सहायता करने की ललक. अपना ख्याल पहले आता है जैसे कि इस डर से फोन न पकड़ना कि कहीं पड़ोसिन किसी काम के लिए न बुला ले, अब अपने नियमित रूटीन को तोड़कर उसके लिए समय निकालना जबकि अपना सिर भी दुःख रहा हो, सेवा/सहायता ही कहलायेगा न, पर क्यों कि लोग नितांत अपने लिए जीते हैं ! दूसरों के लिए इसमें जगह कहाँ है ?





Thursday, October 4, 2012

उफ़ ! यह कॉमन कोल्ड



यहाँ आए उसे चार दिन हो गए हैं. कल व परसों भी घर में चहल-पहल होने के कारण कुछ लिख नहीं सकी. चाचीजी और उनके बच्चे कल चले गए. परसों वह भी उनके घर जायेगी, उसी घर में जहां उसका बचपन बीता था. माँ उसे लेकर बाजार गयीं, सास, ननद, नन्हे व उसके लिए कपड़े खरीद कर दिए. नन्हा यहाँ भी उतना ही खुश है पर खाना ठीक से नहीं खाता है. आज से उसका ज्यादा ध्यान रखेंगे, उसने सोचा. जून के दो पत्र मिले यहाँ आकर, वह उसे अपने पास क्यों नहीं बुला लेता उसके मन में ख्याल आया. कल वह अपना वजन करवाने गयी थी, केवल बयालीस केजी...कितना कम है.

ननद का पत्र आया है, उसका प्रवेशपत्र आ गया है, चौदह को परीक्षा है, उसे कम से कम दो-तीन दिन पहले जाना चाहिए. कल वे दीदी के घर गए थे, परसों जीजा जी आए थे, कल सुबह अपने साथ ले गए. वहाँ अच्छा लगा, दीदी, जीजाजी, व बच्चे सभी उन्हें अपने बीच पाकर बहुत खुश थे. उनका व्यवहार भी बहुत अच्छा था. उन्हें एक पत्र लिखेंगे उसने मन ही मन सोचा.

कई दिन बाद डायरी लिखने बैठी है. इस बीच कितनी ही बातें हुईं, ऐसी भी जो यादगार बन गयीं पर आलस्य वश ही कहना चाहिए, लिखा नहीं. एक बार क्रम टूट जाये तो जल्दी जुड़ता नहीं है. उसे दो दिन से जुकाम ने परेशान किया है, कमजोरी भी महसूस होती है, और..कभी कभी बेचैनी भी. खुशी है तो बस इस बात की कि जून दस दिन बाद आ रहे हैं. आज भी उनका पत्र आया है, दोपहर उसने सभी को पत्र लिखे. कल परीक्षा हो गयी. उसने पढ़ाई जरूर की पर सोच-समझ कर नहीं की. खैर, जो होना था हुआ, अब उसे बदला नहीं जा सकता, यदि उसका दाखिला नहीं हुआ तो यह भले ही शर्म की बात हो, वह वापस जा सकेगी, यह क्या कम होगा, जून के साथ-साथ रहने का, जीने का  मन होता है, खुले आकाश में, अपने निज के घर में, अपने मन से जीने का...यहाँ सब कुछ ठीक है पर फिर भी अपना घर तो अपना ही है. उसका मन फिर पीछे लौट गया...समाचार भी ध्यान से सुने होते पिछले तीन-चार दिनों से तो..यह आत्मग्लानि मानव की सबसे बड़ी शत्रु है, क्या स्वयं को छोटा किये बिना मनुष्य कुछ सीख नहीं सकता...शायद नहीं.

फिर दो दिन का अंतराल. वह स्वस्थ हुई तो सोनू को सर्दी हो गयी, अभी भी खांसी है, इस समय सोया है इसी कारण, दिन में सोना उसे जरा भी पसंद नहीं, बहुत मना कर सुलाना पड़ता है. आज  उसे स्नान में काफी वक्त लग गया पर वास्तविक स्नान इसे ही कहते हैं, मालिश से भी कैसे तन में जान आ जाती है. यहाँ आयी है तब से वह ननद के लिए टॉप पर कढ़ाई कर रही है, लगभग एक तिहाई हो गया है, जून के आने से पहले ही पूरा हो जाये तभी अच्छा है, उसका पत्र आया है पर तिथि नहीं लिखी है. भूल ही गया है शायद.. आजकल वह अक्सर खुद को इस बारे में सोचते हुए पाती है कि जब वह यहाँ होगा तो इस वक्त वे क्या कर रहे होंगे.

कल रात जब पिता काम से वापस आये तो उनके हाथ में चोट लगी हुई थी. उसे इस बात का पता बाद में लगा जब वह सोनू की लगातार होती हुई खांसी के कारण उसे दवा पिलाने व नीचे सुलाने ला रही थी. उस वक्त भी सिर्फ उनके हाथ पर बंधा कपड़ा दिखा था. अभी सुबह कुछ देर पहले माँ ने बताया कि चोट काफी गहरी थी और वह रात भर ठीक से सो नहीं सके. सोनू दवा लेने के बाद आराम से सोया रहा, शुरू में कुछ देर तो बेचैन था पर बाद में ठीक से ही सोया रहा. बल्कि उसकी नींद ही बार-बार खुलती रही.


Tuesday, August 14, 2012

हीट एंड डस्ट



मन उसके वश में नहीं है, कितना पढ़ती है, समझती है फिर भी न जाने कहाँ से उद्वेग, उदासी और उदासीनता के भाव मन में घर कर ही लेते हैं. वह शांत भाव जिसकी हर क्षण तलाश रहती है कहीं नजर आता ही नहीं. कल रात नन्हे के मित्र का बुखार एकाएक तेज हो गया जिसका जन्मदिन मनाया था. उसे हॉस्पिटल लेकर जाना पड़ा. जून वापसी में भीग गए. कल फिल्म देखी - Heat and dust , उपन्यास ज्यादा अच्छा था. फार्म आज भी नहीं आया, मनुष्य कितना विवश है, दीदी की बात का अर्थ अब समझ में आता है. सिर में जैसे कोई बात है जो चारों ओर से दबाव डालती रहती है हल्के-हल्के ही !
कल नहीं परसों उसने अपने सर्टीफिकेटस की फोटोस्टेट कॉपी व दो फोटो घर भेज दिए अब यदि उन्हें समय पर मिल जाएँ तो वे फार्म जमा कर सकते हैं नहीं तो इस वर्ष बीएड एक स्वप्न ही रह जायेगा. नन्हें को कल रात बुखार था कल सुबह से जुकाम था. इस वक्त ठीक लग रहा है. उसके गले में भी हल्की खराश है. अगले हफ्ते सासु माँ व दोनों ननदें आ रही हैं.

कल तीन दिन बाद सबको गोहाटी से लेकर जून आया और उसे उसका व्यवहार कुछ विचित्र सा लगा, उससे बात करने का स्नेह जताने का कोई प्रयत्न नहीं किया, बिस्तर में पहुंचते ही वह गहरी नींद में सो गया. पहले वह एक दिन के लिये भी जाता था तो वापस आते ही इतनी खुशी व्यक्त करता था. माना कि अब वह संभव नहीं था सबके सामने, पर रात को शुभ रात्रि भी नहीं. उसे समझ नहीं आया वह ऐसा क्यों कर रहा था.
कल सुबह एक ऐसी दुर्घटना के बारे में सुना कि दिल दहल गया और उसके मन के वह उलजलूल प्रश्न कहीं दफन हो गए. जीवन का कोई भरोसा नहीं, कब, कौन, किसे गोली मार दे, क्या पता, फिर कितने दिन साथ रहने को मिले हैं. शिकवे शिकायत किये ही क्यों जाएँ. जून की तबियत ठीक नहीं थी उसे बुखार भी था. और अभी तक यात्रा की थकान भी दूर नहीं हुई थी. चाहे यह सब अंशतः सत्य हो या फिर उसने इस बारे में कुछ सोचा ही न हो, खैर..कल जब वे नाश्ता कर रहे थे उनकी पड़ोसिन ने रात हुई एक अधिकारी की हत्या के बारे में बताया. कल दिन भर सारा शहर जैसे सिर्फ वही सोच रहा था, वही कह रह था, भयभीत था. आतंकवादी अपने उद्देश्य में, आतंक फ़ैलाने में सफल हुए. कुछ हद तक उसी संस्था का काम है जिसका हेड ऑफिस बर्मा में है. ऐसा पुलिस की अपराध शाखा का कहना है.
जून को आज माँ को मेडिकल चेकअप के लिये ले जाना था, पर वह बाइक लेकर नहीं गया था. कल दिन भर सामान्य बीता उसकी आँख में  में दर्द कुछ कम है. आज सुबह ही उड़िया पड़ोसिन ने बताया कि नामरूप में एक अन्य अधिकारी (फर्टिलाइजर प्लांट के) की हत्या कर दी गयी है. मौसम इन दिनों शांत है पर वातावरण गर्म है. दीदी का पत्र आया है वह आज जवाब लिखेगी. नन्हा आजकल खूब बातें बनाना सीख गया है, बुआ के साथ खूब खेलता है. जून कल शाम घर पर ही थे जब वे सब घूमने गए था. कभी-कभी उसे लगता है वह उसका ध्यान नहीं रख पा रही है उतना जितना पहले रखती थी. उसे कहे सांत्वना के शब्द भी खोखले लगते हैं, उसकी पीड़ा खुद की पीड़ा बन जाये ऐसा प्रेम कहाँ चला गया. पहले उसे जरा सी चोट लग जाने पर वह व्याकुल हो जाती थी.





Sunday, August 5, 2012

रवा दोसा और कटलेट



कल वह अभी स्नान ही कर रही थी कि नन्हा उठ गया और उसके बाद पढ़ना-लिखना कुछ नहीं हुआ, दोपहर को भी वह सिर्फ एक सवा घंटा ही सोया, उसके साथ व्यस्त रहते समय का पता ही नहीं चलता. दिन बीत गया और आज अभी तक वह निद्रालोक में है. जून की कल रात की ड्यूटी थी, सुबह आये, सो वह भी सो रहे हैं. कर्मचारियों की हड़ताल के कारण उनकी ड्यटी ओ.सी.एस.१ पर लगी थी. हड़ताल वापस ले ली गयी है सो सुबह छह बजे वे लौट आये, अन्यथा उन्हें आज का दिन व रात भी अकेले ही रहना पड़ता. कल उसने बड़ी बनाने के लिये दाल भिगोई थी, पीस भी दी थी, पर सुबह से वर्षा, बादल...धूप का तो नाम भी नहीं. आज गीता का चौदहवां व पन्द्रहवां अध्याय पढ़ा, सात्विक, राजसी व तामसी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के गुण बताए गए हैं. उसकी प्रकृति राजसी है, आखिर क्षत्रिय वंश की है.
जिस पेन से वह पहले लिखती थी, नहीं मिला शायद जून ले गए हों. आज सुबह उसने अलार्म सुना था पर फिर सो गई, सोचा जून अभी उठेंगे और उसे उठायेंगे, पर वे खुद भी देर से उठे, जल्दी-जल्दी सब करके उन्हें ऑफिस जाना पड़ा. उसे अपने व्यवहार पर आश्चर्य हुआ, उसे अपना यह व्यवहार खुद भी समझ में नहीं आता. अलार्म सुन कर उसका न उठ पाना और यह सोचना कि उसने ने भी तो सुना होगा, सुबह की नींद कितनी आलस्य भरी होती है, शायद उन्हें सुनाई ही नहीं दिया हो, उसने सोचा आज वह उनसे पूछेगी, सुबह तो समय ही नहीं था. आज क्लब में फिल्म है, Passage to India   वे जायेंगे. उसने याद करने की कोशिश की कि आज क्या पढ़ा था पर सफल नहीं हुई, उसे लगा वह आजकल पाठ पुरे मनोयोग से नहीं करती, कुछ याद नहीं रहता. इससे तो कोई लाभ नहीं सम्भवतः कुछ लाभ तो अवश्य है पर विशेष नहीं.

नन्हा कल रात सो नहीं पाया मच्छरों के कारण सो अभी तक सो रहा है. वे दोनों भी कहाँ सो पाए, उसे तो बहुत देर से नींद आयी और जब नींद खुली तो जून जा चुके थे. पता नहीं कैसे उनकी मसहरी में मच्छर चले आते हैं. कल क्लब में Passage to India  देखी, कोई भी हिंदी फिल्म इस तरह दिल-दिमाग पर नहीं छायी होती, रात भर फिल्म के सीन ही आँखों के सामने आ रहे थे और अभी सुबह भी डॉ आज़िज़ की पुकार, उसका निष्पाप चेहरा. लेकिन जून को बीच में ही नन्हें को लेकर बाहर आना पड़ा, हमने तय किया है अब से एक बार में एक ही जन देखेगा, एक सोनू के साथ घर पर ही रहेगा और बाद में कहानी सुन लेगा. कल दोपहर वह जून से फिर छोटी सी बात पर नाराज हुई, कितना मन को समझाये और कितना पढ़े पर उस वक्त यह सब याद कहाँ रहता है.

कल-परसों दो दिन नही लिख सकी, परसों जून खरसांग गए थे शाम को लौट आये. कल दिन में उसने बारबरा कार्टलैंड का नॉवल lane to rescue पूरा किया, छोड़ने का मन ही नहीं होता था, लगता था सब आँखों के सामने हो रहा है. बेल बजी है सफाई कर्मचारी आया है. नन्हा अभी सोया है. कल शाम वे लोग प्रार्थना गए थे, रवा दोसा और कटलेट मंगवाया, अच्छा लगा, घर आकर दोनों टेली फिल्म देखीं अच्छी थीं दोनों ही. पता नहीं कैसे कल वे दोनों अलग-अलग सोच रहे थे कि शाम को बाहर जायेंगे किसी रेस्त्राँ में.