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Tuesday, August 18, 2020

साहित्य का उद्देश्य

 

पिछले आधे घण्टे से नूना ‘प्लैनेट अर्थ’ देख रही थी. वालरस की विचित्र दुनिया और रंगीन पक्षियों के अद्भुत नृत्य ! प्रकृति की विविधता और सौंदर्य अनूठा है पर माया की इस नगरी का कोई अंत नहीं है. कोई कितना भी देखे और कितना भी सराहे, इसमें न कोई सार है न कोई अंत. नेत्र थक जायेंगे और मन भी पर न तो जीवन में कोई ऐसा आनंद झलकेगा जिसका कोई अंत न हो और जो पूर्णता का अनुभव कराने वाला हो, वह तो मायापति से मिलकर ही पाया जा सकता है. आज भी सुबह कल की तरह थी, वापस लौटे तो रक्तजांच के लिए रक्त का नमूना लेने एक व्यक्ति आकर बैठा था. कैल्शियम की जाँच होगी और कुछ दूसरे टेस्ट भी. रिपोर्ट ईमेल में आ जाएगी. जून ने भी कल डॉक्टर को दिखाया, आज घर बैठे टेस्ट हो गए. बड़े शहर में रहने का यह बड़ा फायदा है. दोपहर को वे नए घर जायेंगे, पेंटिंग का कार्य सम्भवतः पूरा हो चूका होगा. नन्हा दफ्तर जा चुका है, उसका कालेज का  मित्र जो पास ही रहता है और जिसका भोजन यहीं बनता है, अभी तक आया नहीं है. उसकी चाय दो घण्टे से बनी हुई है, आकर गर्म करेगा और नाश्ता भी. 


सत्व, रज और तम की साम्यावस्था होने पर ही वे गुणातीत होते हैं. पहले तमस को रजस में बदलना होगा, फिर रजस को सत्व में. बढ़ा  हुआ  तमस मन को  क्रोधित और ईर्ष्यालु बनाता है. रजस  व्यर्थ के कामों लगाता है. जब यह ऊर्जा सत्व में परिवर्तित हो जाती है तो भीतर समता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है. साम्यावस्था में दीर्घ काल तक टिके रहने के बाद ही साधक गुणातीत अवस्था का अनुभव करता है. आज सदगुरू को सुना, तमस की अवस्था में भी भीतर एक शांति का अनुभव होता है पर वह जड़ता का प्रतीक है. बाहर का जीवन गतिमय हो और भीतर शांति हो वही गुणातीत की निशानी है. आज दिन भर व्यस्तता बनी रही. 


रात्रि के आठ बजे हैं, आज भी कल की तरह वे दिन भर व्यस्त रहे. घर में काम काफी आगे बढ़ गया है. आज योग कक्ष में वॉल पेपर भी लग गया. ऊपर की बैठक  तथा मुख्य शयन कक्ष में भी. कमरे अच्छे लगने लगे हैं, अभी पर्दे नहीं लगे हैं  और न ही फर्नीचर आया है. कल सम्भवतः गहन सफाई होगी. आज यहाँ आये छठा दिन है, समय जैसे भाग रहा है. आजकल योग वशिष्ठ पढ़ रही है और सुन भी रही है. अनुभवानन्द जी कहते हैं, परमात्मा सद है इसका अर्थ है वह सत व असत दोनों से परे है, वह चिद है यानि चितिशक्ति उसके पास है जिसका विस्तार आनंद के रूप में होता  है. आनंद -  इच्छा, क्रिया व ज्ञान इन तीन शक्तियों के रूप में प्रकट होता है. ज्ञान यदि शुद्ध है तो इच्छा भी शुद्ध होगी और उसकी पूर्ति हेतु क्रिया भी श्रेष्ठ होगी. जैसा ज्ञान, वैसी इच्छा, वैसा कर्म ! यदि कोई सांख्य मार्ग का साधक है तो वह स्वयं को शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा के रूप में अनुभव करता है. कर्म के मार्ग का साधक धीरे-धीरे अंतःकरण को शुद्ध करता है, इसी तरह उपासना मार्ग का साधक भी अपने भीतर परम का अनुभव करता है. ज्ञान प्राप्त करने का साधन अंत:चतुष्टय तथा ज्ञानेन्द्रियाँ हैं. इच्छा आत्मा का सहज स्वभाव है, सुख-दुःख, इच्छा-द्वेष, प्रयत्न-ज्ञान आत्मा के गुण हैं.  


‘’वह विज्ञान की छात्रा रही है किन्तु उसका रुझान साहित्य की ओर है यदि वह साहित्य की छात्रा रही होती तो सम्भवतः इसका विपरीत हुआ होता अथवा नहीं भी. शब्दों से उसे प्यार है, शब्दों का जादू उस पर चलता है. कभी रुलाते कभी हँसाते शब्द ! मानव ने जब प्रथम बार शब्दों का प्रयोग किया होगा तो वह क्षण कितना महान होगा ! फ़िराक गोरखपुरी साहित्य को उद्देश्यपूर्ण होना आवश्यक नहीं समझते. वह समझती है चाहे साहित्य हो या अन्य कोई कला विकास तो वह करती ही है, चाहे मानसिक विकास ही, लेकिन लक्ष्य तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व वह नहीं ले सकती. चरैवेति-चरैवेति का संदेश वह अवश्य देती है. परन्तु साहित्य बिना किसी उद्देश्य के लिखा जाता है यह बात कभी भी मान्य नहीं हो सकती.  रचनाकार यदि स्वयं का उत्थान चाहता है तो यह भी एक उद्देश्य हुआ, या सन्तुष्टि अथवा प्रसन्नता ही. उसकी इच्छा है कि वह भी कुछ लिखे. लिखना और पढ़ना ये दो कार्य ही उसे पसन्द हैं और वह आसानी से इन्हें कर सकती है पर वह कितनी-कितनी देर यूँही बैठी रह जाती है. कितना समय नष्ट करती है, कल से नियमित रहेगी हर कार्य वक्त पर’’. कालेज के अंतिम वर्ष में उसने यह सब लिखा था, उसे स्वयं ही पढ़कर आश्चर्य हुआ ! 



Monday, May 4, 2015

बरामदे में गमले


जून कल दोपहर दो बजे मुम्बई के लिए रवाना हुए, वह दिल्ली होते हुए रात्रि साढ़े दस बजे वहाँ पहुंचें. उनकी याद कल दिन में कई बार आयी. शाम को वह टहलने गयी, दिन में आलमारी सहेजी. सर्दियों के वस्त्र निकले, गर्मियों के रखे. बरामदे के गमले बाहर रखवाए थे, आज माली ने निराई की. अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया. उन्होंने भी ‘क्रिया’ की, उसने भी सुबह पौने पांच बज उठकर वे सभी कार्य किये जो वे रोज करते हैं. सद्गुरु का ज्ञान उसके साथ है. उसे लगता है यह देह कृष्ण का मन्दिर है, इसे स्वस्थ-सुंदर रखना उसका कर्त्तव्य है, स्वस्थ रखना तो और भी आवश्यक है, मन में उसकी मूरत जो बसी है. वह उसके इतने निकट है कि कभी-कभी उसका स्पर्श भी महसूस होता है, सारा जगत जैसे अदृश्य हो जाता है, सिवाय एक उसकी स्मृति के वह अन्य किसी छोटी-बड़ी बात को स्थान देना नहीं चाहती. वह नितांत अपने लगते हैं, पूर्व हितैषी, पुराने मित्र, जाने पहचान से और बेहद प्रिय ! कृपा उसपर अवश्य हुई है अन्यथा इतने सारे सालों में पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ.

आज सुबह चार बजे से पहले ही नींद खुल गयी थी, वर्षा हो रही थी. स्नान-ध्यान आदि किया, समय की यदि कोई कद्र करे तो समय भी संभालता है. आज ‘जागरण’ में ध्यान के सूत्र सुने. सरल शब्दों में धीरे-धीरे बड़े प्यार से सद्गुरु ने कुछ बातें बतायीं, कि ध्यान करते समय यदि शरीर में कहीं दर्द हो तो उसे गहराई से महसूस करना है, उसके भीतर जाना है. शरीर का वह अंग उस बच्चे की तरह है जो माँ का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है. ध्यान धारणा पर आधारित होना चाहिए, कल्पना पर नहीं. अपने शरीर के अंग-प्रत्यंग की भाषा को सुनते हुए, श्वास-प्रश्वास पर अपना ध्यान टिकाते हुए जब मन एकाग्र हो जाये तो वही ध्यान है. उसके बचपन से किये कितने ही छोटे-बड़े अपराध आजकल याद आते हैं और तब लगता है इतना कलुषित था तब मन फिर भी ईश्वर की निकटता का अनुभव वह कर सकी, अर्थात उसका आश्रय लो तो सारे कलुष धुल जाते हैं. वह स्वच्छ कर देता है. भीतर से भी बाहर से भी. अपने सारे अपराधों की क्षमा मांगते हुए उसने कुछ आँसूं बहाये तो मन हल्का हो गया और आश्चर्य तो इस बात का कि ज्यादातर ऐसे में सिर भारी लगता है. सदगुरुओं की कही सारी बातें सच प्रतीत होती लगती हैं. उसके अंतर में लगा भक्ति का बीज अंकुरित हो रहा है और यह बेल बढ़ती ही जाएगी. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को उन्हें जाना है.

आज फिर तमस ने अपना प्रभाव दिखाया. सुबह नींद नहीं खुली. नन्हे के मित्र ने फिजिक्स ट्यूशन पर जाने के लिए पांच बजे फोन करके उठाया. नन्हा अब समझदार हो गया है, फौरन उठकर चला गया. कार ले गया था, वापस आया तो स्कूल के लिए तैयार हुआ और दौड़ते हुए बस स्टैंड तक पहुंचा. नूना की गलती की सजा उसे उठानी पड़ी, खैर अंत भला तो सब भला ! जून से फोन पर बात भी की, आज वे वहाँ किसी संबंधी से मिलने वाले हैं.






Wednesday, February 25, 2015

हरमंदिर का कीर्तन


मैं कौन हूँ ? इसका ज्ञान हो जाये तो सारे संशय मिट जायेंगे. वे जो नहीं हैं, स्वयं को मानते हैं अपने वास्तविक स्वरूप को भूले हुए हैं, इसलिए ही सुख-दुःख के झूले में झूलना पड़ता है. मन को मनमानी करने के लिए छोड़ दें तो भीतर से आनंद की धारा सूखने में देर नहीं लगेगी. माया बहुत दुस्तर है, कृष्ण की शरण में गये बिना इससे छुटकारा नहीं. आज बाबाजी ने गुरू नानक की कथा सुनाई, कैसे उन्हें ज्ञान हुआ और कैसे उन्होंने अपने अनुभव  को ‘जपुजी’ में प्रकट किया.

दोपहर के पौने तीन बजे हैं, चारों ओर एक सन्नाटा पसरा हुआ है. सभी अपने घरों में बंद गर्मी की दोपहर का लुत्फ़ ले रहे होंगे. मौसम इतना गर्म तो नहीं कि सड़क पर निकला भी न जा सके. आज से बीहू का अवकाश आरम्भ हो गया है. अब चार दिन बाद स्कुल व दफ्तर खुलेंगे. स्थानीय स्कूलों में तो शायद और भी लम्बी छुट्टी होगी. आज बैसाखी भी है, सुबह ‘हरमंदिर साहब’ से शब्द कीर्तन सुना. उस दिन गुरुमाँ ने हरमंदिर साहब की नींव किसी मुस्लिम पीर से रखवाये जाने की बात कही थी, संत-महात्मा जानते हैं कि असल में सभी धर्म एक ही हैं सिर्फ ऊपरी सजावट अलग-अलग है. नन्हा गणित पढ़ रहा है जून अख़बार पढ़ रहे हैं. उसे अपने लिए कोई सार्थक कार्य तय करना है, जून के लेख water water everywhere... का हिंदी में अनुवाद या कादम्बिनी के नये अंक को पढ़ना, पत्रों के जवाब या सिलाई का पेंडिग काम. आज सुबह एक परिचिता का फोन आया, अगले मंगलवार को उनके स्कूल ला सिल्वर जुबली कार्यक्रम है, जिसमें हिंदी कविता पाठ के लिए एक निर्णायक की भूमिका उसे नभानी है.

आज शाम को उन्हें एक सहभोज में जाना है, साथ-साथ खाने से अवश्य ही आत्मीयता बढ़ती होगी. आज भी रूटीन लगभग रोज का रहा, छुट्टी के बावजूद जून कुछ देर के लिए दफ्तर गये हैं, कर्मयोगी बन रहे हैं, प्रमादी नहीं, यह अच्छा लक्षण है. इतनी सुविधाजनक जिन्दगी उन्हें मिली है कि इसमें विशेष अवकाश की आवश्यकता नहीं है. नन्हा नाश्ता कर रहा है टीवी के सामने बैठकर. कल शाम असमिया सखी परिवार सहित आयी, उसकी सास भी आयीं थीं, जो काफी शांत और सौम्य लगीं, सडसठ वर्ष की उमर में भी चेहरे पर ओज व चमक थी.

आज सुबह दीदी का फोन आया, पिताजी उनके पास गये हैं, आँखों के डाक्टर को दिखाया है, उसने इलाज भी शुरू कर दिया है. आज बीहू की छुट्टियों के बाद दफ्तर खुला है. नन्हे की लम्बी छुट्टियाँ हैं, कोचिंग क्लास हफ्ते में मात्र तीन दिन है, उसे कुछ सिखाना बहुत मुश्किल है, अपनी जिद पर अड़ा रहता है शायद इस उमर में सभी बच्चे ऐसे होते हैं.

लगता है तमस के दिन जा रहे हैं और नवप्रकाश का उदय हो रहा है. सद्गुरु ने मीठी फटकर लगते हुए समझाया कि साधक स्वयं पीठ किये रहता है प्रभु से और उम्मीद करता है कि उससे मिलन होगा और जब कभी उसकी ओर नजर कर भी ली तो इतना अहम भीतर भर लेता है कि फिर दूर हो जाता है. मन की चाह उसे खोखला कर देती है यदि समता भाव में रहे तो ईश्वर से सम्बन्ध स्वतः स्फूर्त है. जब मन कृतज्ञता से भरना भूल जाये और शिकायतों का अम्बार लेकर बैठा रहे तो प्रेम कैसे टिकेगा. अपने भीतर ओढ़ी हुई कल्पनाओं और विचारों का इतना कूड़ा-करकट एकत्र कर लेता है कि आनंद का जो स्रोत भीतर था वह ढक जाता है. एक एक करके इन सारी परतों को हटाते जाना है, बिलकुल खाली हो जाना है. इसी का नाम भक्ति है !

नैया पड़ी मझदार, गुरू बिन कैसे लागे पार, हरि बिन कैसे लागे पार ! कबीर ने उनकी तरफ से ही तो कहा था उस क्षण जब उनके गुरू उनसे रुष्ट हो गये थे. ‘चिन्तन ही मानव को पशु से भिन्न करता है’, अभी-अभी गुरुमाँ ने यह वाक्य कहा. यूँ तो इन्सान भी सामाजिक प्राणी कहा जाता है, पर वह अपनी भूलों को सुधार सकता है, स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए वह पूर्णता को प्राप्त कर सकता है.  आज सतोगुण का उदय हुआ है. सुबह ध्यान में मन टिका. कल रात को महाभारत पढ़कर सोयी थी. अथाह ज्ञान का सागर है महाभारत. आज शाम को एक कार्यक्रम में उसे कविता पाठ करना है, ईश्वर उसके साथ हैं !