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Thursday, January 26, 2017

सिक्किम का भूकम्प


कल पंखा भी था, टीवी भी था फिर भी गर्मी का जिक्र किया आज न बिजली है, न पंखा है, न टीवी पर बापू की कथा आ रही है, पर भीतर संतोष है. जून आधे घंटे में आ जायेंगे. आज सुबह काफी वर्षा हुई. सिक्किम में भूकम्प के कारण काफी नुकसान हुआ है, जापान में पुनः बाढ़ व तूफान आया है. पाकिस्तान में भी बाढ़ है. मानव ने अपनी मूर्खताओं से ऐसी स्थिति उत्पन्न कर ली है. प्रकृति का तो यह रोज का काम है. रोज ही कहीं न कहीं भूकम्प आते ही रहते हैं. पृथ्वी के होने का यही तरीका है. सागर है तो तूफान आयेंगे ही !

‘वह कौन है’ यह प्रश्न भीतर गूँज रहा था कि किसी ने पूछा, प्रश्न पूछने वाला कौन है..और गहन शांति हो गयी. कोई जवाब नहीं आया. लेकिन मौन में भी मन मुखर था. कुछ दृश्य, कुछ शब्द सुनायी दे रहे थे. आज से उसने यही ध्यान करने का निश्चय किया है. मन का शुद्धिकरण तो साधना से होता है पर विस्तार भी बहुत हो जाता है. जब सारा ब्रह्मांड ही खुद के भीतर भासने लगे तो अहंकार भी उतना ही विशाल होगा. अभी भी यही कामना भीतर बनी रहती है, देह स्वस्थ रहे, मन शांत हो, बुद्धि तीक्ष्ण हो, जगत में यश हो, सारी सुख-सुविधाएँ हों तो इन कामनाओं में और एक संसारी व्यक्ति की कामनाओं में जरा सा भी भेद नहीं है. हाँ, इतना जरूर हुआ है अब भीतर द्वेष नहीं रहा है, कोई विशेष पदार्थ ही मिले ऐसा आग्रह नहीं रहा, पर जब तक भीतर कोई भी कामना है, तब तक परमात्मा से दूरी बनी ही हुई है. भक्त को यह विश्वास होता है कि परमात्मा हर तरह से उसकी मदद करते हैं, जो भी उसकी उन्नति के लिए श्रेष्ठ है वही वह होने देते हैं !

आज सुबह जून को उसने शून्य के बारे में बताया, void के बारे में, कुछ नहीं है....केवल ब्रह्म सत्य है. जगत मिथ्या है, आज ध्यान में यह सूत्र समझ में आया. आज भी समाचारों में सिक्किम में आए भूकम्प की भयानक खबरें सुनीं, अब भी कई लोग लापता हैं, कुछ मलबे के नीचे दबे हैं. प्रकृति कितनी कठोर हो सकती है, यह वे सोचते हैं, लेकिन प्रकृति इतनी विशाल है, अनंत है, उसमें थोड़ा सा विक्षेप एक ग्रह पर आए तो उसके लिए कुछ भी नहीं है. जैसे कोई लखपति हो और उसके गाँव के अनेकों घरों में से एक ढह जाये तो उसे क्या अंतर पड़ेगा. मानव भी प्रकृति का ही अंश है, मानव इस सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर अनुभव कर सकता है, लेकिन प्रकृति के सम्मुख वह भी विवश है.

आज जून मुम्बई जा रहे हैं. दस बजने को हैं, थोड़ी देर में वह भोजन बनाने जाएगी. शाम को एक सखी की बिटिया से मिलने जाना है, उससे पहले घर में सत्संग है. कल सुबह केन्द्रीय विद्यालय जाना है एक प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाने. दोपहर को एक मीटिंग में दुलियाजान क्लब जाना है. शाम को भी मीटिंग है, पर उसमें वह नहीं जाएगी. आजकल माँ को किचन में जलती गैस से भय लगने लगा है, वह कब उठकर गैस बंद कर आती हैं पता ही नहीं चलता. वह कड़ाही में सब्जी रखकर आयी, और कुछ देर बाद जाकर देखा तो गैस बंद है. उसे पल भर के लिए क्रोध आया, पर फिर समझाया मन को, वह हर हाल में बड़ी हैं, उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिये. पिताजी उन्हें प्रेम से धमका सकते हैं, उनकी बात और है. नैनी की बेटी को खसरा हुआ था, पर अब उसका चेहरा लाल दानों से भर गया है, अस्पताल जाकर इलाज कराने के नाम से ये लोग घबराते हैं. नन्हा गोवा से लौट आया है, उसने वहाँ water sports तथा paragliding की. जीवन कितना अमूल्य है, एक-एक श्वास यहाँ अनमोल है, यह विचार उसके मन में कौंध गया जैसे ही नन्हे ने वह बताया.

आज उसने दीवाली के लिए सफाई का श्रीगणेश किया है. आज महालय है, आश्विन कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन. कल से नवरात्रि का आरम्भ हो रहा है. सिक्किम में लोग आपदा से जूझ रहे हैं, वहीँ गुजरात में लोग नृत्य में झूम रहे हैं. अजब है यह गोरखधन्धा, स्वप्न में जी रहे हैं जैसे सभी लोग. ऊपर से तुर्रा यह कि यह स्वप्न केवल रात को ही नहीं चलता, दिन को भी चलता है. यह स्वप्न चौबीसों घंटे चलता है. वे एक बड़ी साजिश के शिकार तो नहीं बनाये गये हैं ...?


Tuesday, October 18, 2016

जापान में भूकम्प


पिछला पूरा हफ्ता बिलियर्ड मन पर छाया था. शनिवार को कुछ ज्यादा ही. रात को स्वप्न में भी बॉल दिख रही थी. ज्वर इसे ही कहते हैं. असमिया सखी कितनी शांत और सहज नजर आ रही थी, वह खेल में जीत भी गयी. कल जून ने उनके बगीचे के फूलों का वीडियो भी उतारा. कल दीदी से बात हुई, सभी बच्चों के बारे में, माँ के पास बच्चों के सिवाय बात करने का दूसरा क्या विषय हो सकता है. होली में मात्र पांच दिन रह गये है, कविता लिखी है, बस रंगों से सजाना भर है, आज शाम को जून सहायता करेंगे, फिर सभी को भेजेंगे. कल संडे क्लास में बच्चों को काल्पनिक रंगों से होली खिलाई, बच्चे कितने सरल होते हैं, झट मान गये और एक-दूसरे पर रंग छिड़कने लगे. आजकल माँ बाहर बगीचे में जाकर नहीं बैठतीं, पिताजी अकेले बैठे अखबार पढ़ते हैं या कोई पत्रिका.

बड़ी भांजी ने कविता पढ़कर जवाब भेजा है. जापान में जो हुआ उसके बाद प्रकृति पर भरोसा करना ज्यादा मुश्किल है, लेकिन वह तो जड़ है, उसे कोई चला भी नहीं रहा. प्राकृतिक नियमों के आधार पर ही वह काम करती है. शरीर, मन, बुद्धि सभी तो प्रकृति के अंग हैं, लेकिन मन चेतना का आश्रय पाकर मनन् कर सकता है, अर्थात मन पदार्थ से ऊपर उठ सकता है यदि चाहे तो, जब पदार्थ का संयोग चेतन से होता है तो एक तीसरा तत्व पैदा होता है, वही अहंकार है, स्वयं के होने का आभास तभी होता है. यह सत्य है कि उनका होना एक लीला मात्र ही है, क्या हो जायेगा अस्तित्त्व में यदि वे न रहें या रहें ! इसका अर्थ हुआ कि वे सदा से थे या सदा नहीं थे !

कल पिताजी का जवाब आया, उन्होंने तीन कविताओं का जिक्र किया है. दो स्मरण में आ रही हैं, तीसरी याद नहीं. कविताएँ भी उससे लिखी जाने के बाद जैसे कुछ और हो जाती हैं, उनसे कोई संबंध नहीं रहता..क्योंकि वह जो वास्तव में है, अलिप्त है, निर्विकार है, कोई वस्तु उसे छू नहीं सकती. कल शाम को मृणाल ज्योति गयी. कई बातों की जानकारी हुई. कम्पनी में हड़ताल हो गयी है, जून वापस आ गये हैं, आज वह गुझिया बनाने वाली है, अब तो वह भी सहायता करेंगे.


वर्षा के कारण मौसम एक बार फिर ठंडा हो गया है. फागुन का महीना जैसे सावन में बदल गया है. वैसे भी मन बार-बार जापान के लोगों की तरफ जाता है. जिनके लिए इतनी बड़ी विपदा सम्मुख आ खड़ी हुई है. लेकिन जापानवासियों को भूकम्प झेलने की आदत हो गयी है, आपदा प्रबन्धन में वे बहुत आगे हैं. परमाणु रिएक्टरों से जो रिसाव हो रहा है उसे रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाये जा रहे हैं. अभी वे सुरक्षित हैं, लेकिन कब तक रहेंगे, कौन कह सकता है ! अभी कुछ देर पूर्व पिताजी की उम्र की बात चल रही थी. अस्सी के होकर भी वह बिलकुल सीधे चलते हैं, मन में जोश भरा है और जवानों की सी फुर्ती है. कल क्लब में होली उत्सव मनाया जायेगा. 

Wednesday, February 5, 2014

बाल दिवस पर मस्ती


आज हफ्तों बाद डायरी खोली है. बहुत दिनों से न लिखने के कारण अभ्यास छूट गया सा लगता है. इस दौरान वे घर जाकर वापस आ भी गये. उसने वापसी में गोहाटी से असम सिल्क की एक साड़ी ली. एक दिन वह तिनसुकिया गयी, बालदिवस पर बच्चों को देने के लिए लेडीज क्लब की तरफ से ढेर सारे गिफ्ट्स खरीदे, जिन्हें कल एक सखी के साथ मिलकर पैक किया. सेक्रेटरी के कहने पर आज सुबह छह सदस्याओं को फोन किये, तेरह को मीटिंग है. जिन्दगी लहरों पर शांत भाव से बहती नाव की तरह आगे बढ़ी जा रही है. आज सवा नौ बजे के लगभग भूकम्प के दो झटके महसूस हुए. पिछले तीन दिनों से मौसम काफी ठंडा हो गया है, वर्षा भी हो रही है, चारों तरफ हरियाली और ठंडक है, ऐसा मौसम उसे भाता है. सुबह वक्त पर उठे वे, नन्हा आज पहली बार यात्रा के दौरान खरीदा ब्लेजर पहन कर स्कूल गया है.

आज ‘बाल दिवस’ है, चाचा नेहरु का जन्मदिन, आज ही ‘गुरुनानक जयंती’ भी है और नूना के पिता का जन्मदिन भी, दादी को अंग्रेजी महीनों का ज्ञान नहीं था उन्हें इतना याद था कि टुबड़ी के दिन पुत्र जन्म हुआ था. पड़ोस के बच्चे का जन्मदिन भी आज है और उड़िया सखी के बेटे का जन्मदिन भी. और इस वर्ष आज ही ‘गुड फ्राइडे’ भी है. कल उनकी मीटिंग अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी, ‘रेकी’ पर एक भाषण दिया गया, किन्ही श्री और श्रीमती दास के गजल व भजन ने तो समां ही बाँध दिया. वह सात बजे वापस आ गयी, भोजन बनाया, जून ने सूप बनाकर रखा था, आज उन्होंने फलाहार लेने का व्रत लिया है शाम तक, रात जन्मदिन की पार्टी में जाना है. जून एक पेपर लिख रहे हैं उसी सिलसिले में दफ्तर गये हैं, नन्हा ‘बाल दिवस’ पर दिखाई जाने वाली फिल्म का इंतजार कर रहा है और उसने आज सुबह ‘परमहंस योगानन्द जी’ की पुस्तक पढ़कर पुनः ध्यान किया, मन स्थिर हो पाया मगर कुछ देर के लिए ही. मानव मन को न ही भौतिक सुखों में शांति मिलती है, न ही वह पूरी तरह अध्यात्मिक क्षेत्र में समर्पित हो जाता है, वह त्रिशंकु की तरह बीच में ही रहने को विवश है. लेकिन जो पूर्ण विश्वासी होते हैं उनके साथ ऐसा नहीं होता होगा. उसका शंकालु मन एक ओर टिकता ही नहीं. पिछले कई दिनों की स्वयं के आगे अनुपस्थिति इसी का परिणाम थी.

आज कई हफ्तों बाद संगीत कक्षा में जाना है. सोमवार है हफ्ते का प्रारम्भ. मौसम ठंडा है पर धूप भी पुरजोर है, सो ठंडक भली लग रही है. कल बच्चों के खेल आदि भी हो गये, सुबह जल्दी जाने वालों में वह प्रथम थी, शेष सभी धीरे-धीरे आराम से आ रहे थे. कार्यक्रम ठीक ही रहा जैसे इस तरह के कार्यक्रम होते हैं, कुछ शिकायतें, कुछ गिले. छोटे-छोटे बच्चों ने उत्साह से दौड़ में भाग लिया, उन्हें देखकर विशेषतया एक बच्चे को, जिसका नाम पंछी था, देखकर अच्छा लगा. उसे घर आने में दोपहर के दो बज गये, थकान भी हो गयी थी. भोजन बनाने के साथ ही जून ने सारे कार्य अकेले ही किये जो वे इतवार को मिलजुल कर करते हैं, शाम को वे बाजार होते हुए एक मित्र के यहाँ से गये, जिनके पिता इन दिनों आए हुए हैं, अंकल से मिलकर कई बातों का ज्ञान हुआ. वह अपने पुराने दिनों को बहुत मुग्धता से याद करते हैं, क्या सभी ऐसा करते हैं? युवा भविष्य की ओर देखते हैं और वृद्ध अतीत की ओर. उसने सोचा, अभी व्यायाम करना है, संगीत अभ्यास भी, आधा घंटा टीवी पर सैलाब देखना है, सो लिखना यहीं बंद करेगी, वैसे भी अभ्यास न रहने के कारण लिखने का मूड नहीं बन पा रहा है, किसी दिन देवी सरस्वती की कृपा होगी तो स्वयंमेव ही लेखनी से धरा फूटेगी, वह दिन जल्द ही आये ! आमीन !



Tuesday, December 17, 2013

ईरान में भूकम्प


कल सुबह जब जून और नन्हा सो रहे थे, बाहर भी कोई शोर नहीं था, वह ध्यान में बैठी, आधा घंटा कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, आज भी वही हुआ, इस पुस्तक ने वाकई उसकी बड़ी सहायता की है. मौसम आज भी ठंडा है, वर्षा पिछले शनिवार को जो शुरू हुई है तो आज तक नहीं थमी है. २३ मई को उसे ‘हिंदी कविता पाठ’  के लिए जाना है, पढ़ने के लिए नहीं सिर्फ सुनने के लिए, और विजेताओं का फैसला करने में सहायता के लिए भी. उस दिन जालोनी क्लब की ओर से एक सदस्य आये और कविताएँ चुनने के लिए कहा, जो कक्षा १ से १२ तक के छात्र-छात्राएं पढ़ेंगे. कल शाम छोटी बहन का फोन आया, उसने आर्मी में डाक्टर की नौकरी के लिए योग्यता प्राप्त कर ली है, छह महीनों बाद ज्वाइन करेगी, उसे कैप्टन का रैंक मिला है. कल शाम को जून ने घर पर फोन किया, छोटा भाई स्टेशन पर नहीं  आ पाया था, सबकी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं, इसलिए ऐसा मौका ही नहीं आने देना चाहिए कि किसी से सहायता लेनी पड़े.

आज छोटी भांजी का जन्मदिन है, सुबह दीदी को फोन किया, हर बार की तरह समझ में नहीं आया और क्या कहे, सभी की कुशलता पूछने व शुभकामनायें देने के बाद ही फोन रख देना चाहिए था पर इतने दिनों बाद किसी अपने की आवाज देर तक सुनने का मन करता है. रात को ठंड बढ़ गयी थी और वे कम्बल लेकर नहीं सोये थे,. नन्हा आजकल देर से उठता है सो सुबह-सुबह ही उसे डांट पड़ जाती है, फिर उसका मन भी ठीक नहीं रहता, कल से उसे जल्दी उठने की आदत डालनी है, थोड़ा अनुशासन ही उसे अच्छी आदतें सिखाएगा.. आज सुबह भी ध्यान किया, अनोखे अनुभव होते हैं, कब कौन सा पुराना विचार उभर कर सतह पर आएगा पता ही नहीं चलता. आज पिता के नामों को बिगड़ कर बोलने की बात याद आई, जो उसे कभी पसंद नहीं थी. आज स्वीपर जल्दी आ गया है, सो स्नान भी नहीं हो पाया है अभी तक, थोड़ी सी परेशान है पर जानती है एक क्षण में ही खुद को संयत कैसे किया जा सकता है. जून ने कल नये एसी के लिए ड्राफ्ट बनवा लिया, आज जमा करने जा रहे हैं. तिनसुकिया से वह मेज भी लायेंगे जो उन्हें कम्प्यूटर के लिए चाहिए. घर में सामान बढ़ता ही जा रहा है, वे विकास की ओर अग्रसर हैं या..

नन्हा स्वीमिंग पूल जाने के लिए तैयार बैठा है, जून के आने में भी चंद मिनट हैं, आज धूप तेज है, मौसम गर्म हो गया है, पहले नन्हे को गृह कार्य में सहायता की फिर कुछ कपड़े ठीकठाक किये. आज सुबह ध्यान सफल नहीं हो पाया, शायद कल की घटना का असर अब भी मन पर है, कुछ तो ऐसे होंगे जिनपर यह असर बरसों बरस रहेगा, शायद जीवन भर ही. सुबह असमिया सखी का फोन आया, वह ‘सपने’ देख रही है, कुछ देर पहले टीवी पर इसका रिव्यू देखा, शायद अगले हफ्ते जब जून की छुट्टी होगी, वे भी देखें, शाम को क्लब जायेंगे, जीवन तो चलता ही रहेगा. सब कुछ पूर्ववत नहीं रहेगा फिर भी, जो नुकसान होना था वह तो हो गया जो बचा है उसी के साथ जीवन, यह धरती, यह आकाश सब अपना-अपना काम करते रहेंगे, ईरान में भूकम्प में हजारों मर गये, रोज ही मरते हैं, मगर यह दुनिया ज्यो की त्यों है.






Thursday, March 14, 2013

बापू ! सुन ले यह पैगाम



सितम्बर का महीना खत्म होने को है, आज कई हफ्तों के बाद कलम उठाई है. पहले जून अस्वस्थ रहे फिर वह कोलकाता चले गये, नूना घर की सफाई में लगी रही. फिर नन्हा अस्वस्थ हुआ और फिर वह व्यस्त रही दुनियादारी में. ईश्वर से जो निकटता उन दिनों वह पुस्तक पढते समय अनुभव की थी उसी का असर है कि इतने झंझटों या कहें सांसारिक कार्यों के बीच भी उसकी याद बनी रही, जिसने उसे शांत रखा है. कुछ देर पूर्व जून से कुछ पूछ रही थी, पर निष्कर्ष यही निकला कि जिन बातों पर वश नहीं उसके बारे में सोच कर अपना समय व्यर्थ करने से कोई लाभ नहीं. आज उन पंजाबी दीदी का पत्र आया है, संभवतः कोलकाता में वे उनसे मिलेंगे. गुलदाउदी के पौधों को धूप में रखा है, लेकिन धूप फिर आँखें चुरा रही है, ईश्वर से थोड़ी धूप मांगी है और वह देगा भी जरूर.

  अभी-अभी वह गमलों की कुड़ाई करके आई है, जब इन पौधों में फूल आएंगे तो यह सारी मेहनत(अगर यह मेहनत है तो) या कार्य सफल होगा, और अगर फूल न भी खिले तो भी उसे कोई अफ़सोस नहीं होगा, पौधों की देखभाल की इतना ही पर्याप्त नहीं क्या ? शनिवार को बाहर ट्रक जो मिट्टी ड़ाल गया था, मजदूर आज उसे अंदर ला रहे हैं, नई मिट्टी में यकीनन फूलों का रंग शोख होगा. आज भी धूप नहीं है, धूप की इतनी कमी शायद ही कभी इतनी महसूस की हो, जब धूप बिखरी रहती थी तब कद्र नहीं की उसकी. जून का एक बटन आज दफ्तर में टूट गया..पहली बार ऐसा हुआ इतने बरसों में. कल उसकी पुरानी पड़ोसिन ने हरा ब्लाउज सिल कर दे दिया, सुंदर सिला है, जून ने भी लो बैक पर कोई एतराज नहीं किया.

 कल मीटिंग सामान्य रही, पहली बार तम्बोला खेला. वह अपनी बंगाली सखी के साथ गयी थी, मगर सदा की तरह उसने वहाँ खुद को अकेला पाया..यह अकेलापन उसकी नियति बन चुका है.. भीड़ में रहते हुए भी अकेलापन. धूप निकली है सुबह से पहली बार, उसने सोचा सारे गमले धूप में रख देगी, यह लिखने के बाद.  
 
   महीने का अंतिम दिन, आज नन्हे का हाफ डे है, बचपन में ऐसा होने पर बच्चे ‘आधी छुट्टी सारी’ गाते हुए आते थे. नन्हा आज सुबह फिर उठना नहीं चाह रहा था, वह पहले से कुछ दुर्बल भी हो गया है, अगले महीने उसके यूनिट टेस्ट हैं, पढ़ाई उतनी नहीं हो पायी है जितन होनी चाहिए. उसके प्रिंसिपल ने यूनिट टेस्ट का टाइम टेबिल देकर अच्छा किया है. निर्माण कार्य भी चल रहा है स्कूल में. कुछ पल पहले राधाकृष्णन व विवेकानंद की पुस्तकों के कुछ अंश पढ़ने का प्रयत्न किया पर सफल नहीं हो पायी, लगता है अब काफी पढ़ लिया है, अमल में लाना चाहिये जितना पढ़ा है. सुबह से झुंझला रही थी, कारण कुछ खास नहीं पर जून के आते ही कहना होगा. कल शाम वे एक परिचित परिवार के यहाँ गए, गृह स्वामिनी ने नूडल्स खिला दिए, रात को वे खाना भी नहीं खा सके, हर बार उनके यहाँ जाने पर ऐसा ही होता है.

  दोपहर के पौने दो बजे हैं, पंखे की घर-घर के आलावा और कोई आवाज कहीं से भी नहीं आ रही है, जैसी ख़ामोशी बाहर है, वैसी ही मन में भी, खुशवंत सिंह कहते हैं कि शांत मन क्रियेटिव नहीं हो सकता, लेकिन अशांत मन क्रिएटिव ही होगा, ऐसा भी तो नहीं है न. कल बापू का जन्मदिन है, संडे मैगज़ीन में एक लेख आया है उनके बारे में, अभी पढ़ा नहीं है, लाल बहादुर शास्त्री नेहरु के प्रिय थे एक जगह पढ़ा, उनका भी जन्मदिन है कल. बचपन में यह गीत कितना सुना करते थे- आज है दो अक्टूबर का दिन...  सुबह समाचारों में भूकम्प से हुई तबाही के चित्र देखे, सुन-देखकर यह ख्याल आता है कि कौन जाने एक दिन उनका भी यही हश्र हो, दुःख तो होता ही है उन ग्रामवासियों के लिए, जो सोये-सोये ही गहन निद्रा में लीन हो गए, पूरा परिवार एक साथ..मानव कितना बेबस है प्राकृतिक आपदाओं के सम्मुख. उन्हें इसी माह घर जाना है, पता नहीं कैसा होगा इस बार का सफर, एक लिस्ट भी बनानी है जो सामान कोलकाता से खरीदना है, चचेरे भाई-बहन, भतीजियों के लिए उपहारों की भी, उपहार देने में जो सुख है वह लेने में कहाँ ?



Monday, January 28, 2013

रूह अफजा की आइसक्रीम



टीवी पर समाचारों में सुना, हर्षद मेहता व कई अन्य गिरफ्तार हुए. इसकी भूमिका तो बहुत दिनों से बन ही रही थी. अभी-अभी उसने स्टोरी टाइम में एक कहानी पढ़ी, how much does a horse know? बहुत अच्छी लगी. नन्हे का स्कूल ग्रीष्मावकाश के कारण अगले डेढ़ माह के लिए बंद है, उसे नियमित रूप से कम से कम एक घंटा तो पढ़ाना ही है. रात को उसने स्वप्न में देखा, भूकम्प आ गया है, वे सभी बाहर चले गए है, परसों भी एक बड़ा सा. अजीब सा स्वप्न देखा था, सोचा था लिखेगी पर अब कुछ याद नहीं है. पहले की तुलना में अब उसे स्वप्न कम आते हैं, शायद इसलिए कि दिन में सोना बंद हो गया है, रात को नींद अच्छी आती है.
कल दोपहर वे तिनसुकिया गए थे, बहुत तेज वर्षा हो रही थी, सड़क पर पानी भर गया था, उन्हें सड़क पार करने के लिए रिक्शा करनी पड़ी, जब घर से निकले तब आकाश पर थोड़े से बादल भर थे. टीवी पर आजकल “हेलो जिंदगी” देख रहे हैं वे, अच्छा धारावाहिक है. कल देखी “वेलकम टू १८” फिल्म भी, फोटोग्राफी अच्छी थी, समुद्र के दृश्य, रंगों का संयोजन बहुत अच्छा था. आज गर्मी बहुत है, साँस लेना मुश्किल है, पसीना सूखता ही नहीं है, ए.सी नहीं होता तो...पर हर वक्त तो उस कमरे में बैठा नहीं जा सकता. शायद इसी कारण या किसी अन्य वजह से वह  दुर्बलता अनुभव कर रही है, मन होता है लेट कर कोई किताब पढ़ती रहे. कल जून सुबह चार बजे ही चले गए थे, गैस कलेक्टिंग स्टेशन में ड्यूटी थी, लौटे शाम को सवा छह बज, बेहद थके हुए और गर्मी से परेशान.

“धूप किनारे” सचमुच एक बहुत अच्छा पाकिस्तानी धारावाहिक था. पिछले तीन-चार दिनों से डॉ अहमद, डॉ शीना, डॉ जोया और डॉ इरफ़ान इस कदर दिलोदिमाग पर छाये हुए थे कि और क्या हुआ कुछ खबर नहीं. डॉ जोया का चरित्र काफी सशक्त था, अंजी और इरफ़ान ने भी बहुत प्रभावित किया. उसने सोचा छोटी बहन को लिखेगी इस धारावाहिक के बारे में जो खुद भी डॉ है, ज्यादा समझ पायेगी. उसकी एक परिचिता की सासु माँ ने भी कहा था, यह सीरियल देखने के लिए, पर अब तक तो शायद वह घर चली गयी होंगी. जून कल जोरहाट चले गए थे, आज शाम को लौटेंगे. घर से पत्र आया है, ट्रेन टिकट बुकिंग करने केलिए वह परेशान हैं, हर कम जल्दी से जल्दी करना उनका स्वभाव है. इस समय नन्हा भी डायरी लिख रहा है. उसकी फरमाइश है कि आज वह रूह-अफजा वाली आइसक्रीम बनाये. कभी-कभी वह मैंगो आइसक्रीम के लिए कहता है, कस्टर्ड में उसकी पसंद की वस्तु डाल कर कुछ देर के लिए वह  फ्रीजर में रख देती है और ऐसी आइसक्रीम पाकर वह कितना खुश हो जाता है  कल रात भी जोरों की वर्षा हुई, रात एक बजे उसकी नींद खुली, फिर एसी बंद करके वे दूसरे कमरे में सोने गए.. आज मन में एक सुकून सा है, जैसे सब कुछ ठीक हो एक शांत धारा की तरह.. कुछ देर पहले जीनिया के फूल देखने गयी थी, कुछ फूल बहुत सुंदर हैं, शोख रंगों के..एक छोटा स नया फूल भी खिला है उस छोटे पॉट में जिसमें कुछ ही दिन पूर्व ही उसने अपनी मित्र से एक पौधा लाकर लगाया था.

पिछले दो तीन दिन घर की सफाई में लगी रही, पहले स्टोर फिर किचन और अभी भी काफी काम बाकी है. दराज वगैरह साफ करनी हैं और कपड़ों की आलमारी भी. अगले हफ्ते नन्हे का स्कूल खुल रहा है. आज भी मौसम अच्छा है. कल शाम वे पड़ोसी के यहाँ गए, मिसेज अ की तबियत ठीक नहीं है, डॉ ने अल्सर बताया है. पिछले कई दिनों से. आज दोपहर उसे भी अस्पताल जाना है पर अपने लिए नहीं, उसकी नैनी लक्ष्मी के लिए, उसे भी कभी कभी कमजोरी का अहसास होता है, फिर लगता है वहम ही होगा, अच्छी भली तो है. कल जून के एक परिचित का उसके जन्मदिन का कार्ड आया पूरे एक महीने बाद, अजीब-अजीब लोग होते हैं.