Showing posts with label दर्द. Show all posts
Showing posts with label दर्द. Show all posts

Wednesday, May 10, 2017

जीवन की शाम


आँगन में आम के पेड़ से पंछियों की आवाजें निरंतर आ रही हैं. हवा दरवाजे को धकेल कर बंद कर रही है. प्रकृति निरंतर क्रियाशील है. कल शाम से उसे देह में एक हल्कापन महसूस हो रहा है, जैसे भार ही न हो और चलते समय एक तिरछापन सा लगता है, शायद यह वहम् ही हो. मन हल्का हो तो तन भी हल्का हो जाता है. पिताजी आज अपेक्षाकृत ठीक हैं. आज होली पर पहली कविता ब्लॉग पर पोस्ट की. हर कोई अपनी अहमियत किसी न किसी तरह जताना चाहता है, हर कोई उसी परमात्मा का अंश जो है, हर कोई पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता है, परमात्मा का भक्त भी पूर्ण स्वतंत्र है. परमात्मा उनके कितने करीब है, उनसे भी ज्यादा करीब..श्वासों की श्वास में वह है..सुक्षमातिसूक्ष्म.. जून आज देर से आयें शायद, उनके पूर्व अधिकारी आये हैं, शाम को उन्हें भोजन पर भी बुलाया है. पिताजी बाहर बरामदे में बैठे हैं, जून की प्रतीक्षा करते हुए, चटनी के लिए धनिया व पुदीना तोड़ लाये हैं बगीचे से.

कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. अतिथि अकेले ही आये, भोजन बच गया. आज सुबह वास्तविक अलार्म बजने से पहले ही मन में अलार्म की घंटी की आवाज सुनाई दी, जगाने के लिए अस्तित्त्व कितने उपाय करता है, कभी ऐसे स्वप्न भेजता है कि उठे बिना कोई रह ही नहीं सकता. कल शाम जून और पिताजी को योग वशिष्ठ पढ़कर पढ़कर सुनाया तो वे प्रसन्न हुये आत्मा के बारे में जानकर. अभी-अभी दो सखियों को होली के लिए निमंत्रित किया. गुझिया के लिए तिनसुकिया से खोया भी लाना है. शनिवार को जून ने एक कुर्ती का ऑर्डर किया था नेट से, आज पहुंच गयी, बहुत सुंदर एप्लिक का काम है उस पर. मौसम बहुत अच्छा है आज, हल्के बादल हैं और ठंडी सी हवा भी बह रही है. शायद कुछ दूर वर्षा हुई है. परमात्मा नये-नये रूपों में प्रकट हो रहा है. डायरी के पन्नों पर चमकते हुए प्रकाश कणों के रूप में, फिर श्वेत धुएं सा कोई बादल तैरता हुआ सा दीखता है, हाथ के चारों ओर नीले रंग की आभा के रूप में, सब कुछ कितना सुंदर लग रहा है, हवा, धरा, गगन और परमात्मा.. कल रात स्वप्न में ठोस वस्तु को देखते-देखते आकर बदलते देखा, स्वप्न कितने विचित्र अनुभव कराते हैं.  

कल शाम जून ने कहा शुक्रवार को वे कुछ सहकर्मियों को खाने पर बुलाना चाहते हैं, जबकि उसे होली पर या उसके बाद ही ऐसा करने का मन था, सो अपने मन की बात कही, कारण क्या था वह उसे स्वयं भी पता नहीं था, पर भीतर से यही आवाज आ रही थी कि शुक्रवार को ठीक नहीं रहेगा. आज सुबह जब जून को फोन आया कि उस दिन उन्हें बाहर जाना है तो बात स्पष्ट हो गयी, कोई अंतः प्रेरणा थी शायद. पिताजी की गर्दन में दर्द है, गर्म पानी की बोतल से सेंक करते-करते सो गये हैं, भोजन के लिए आवाज देने पर उठे नहीं. जून उनके लिए दर्द कम करने की दवा ले आये हैं. आजकल वे बैठे-बैठे भी सो जाते हैं, धीरे-धीरे चलते हैं और ज्यादा वक्त लेटे रहते हैं, शांत हो गये हैं. जीवन धीरे-धीरे सिमट रहा है, उन्हें देखकर ऐसा ही लगता है. टीवी देखना कम कर दिया है. दोपहर को जून के एक मित्र आये थे खाने पर, सदा की तरह देर से आये, जल्दी-जल्दी खाकर चले गये. इन्सान का स्वभाव बदलता कहाँ है, जैसे उसका मन..जो हल्की सी कसक, एक हल्का सा स्पंदन बना ही लेता है, लेकिन सद्गुरू कहते हैं पता तब ही चलता है जब कोई उसके पार हो जाता है. सूक्ष्म स्पंदन भी जब नहीं रहते, तब वह अचल, स्थिर सत्ता स्वयं को प्रकट करती है, वह स्वयं ही स्वयं को देख सकती है. आज ठंड काफी है, जून के आने के बाद वे भ्रमण के लिए जायेंगे. 

Sunday, July 31, 2016

दर्द का अनुभव


सन् अठानवे में TTC Phase1(शिक्षक कोर्स) भी कर लिया और उसके बाद से पूर्णकालिक शिक्षिका हैं और सदा यात्रा करती रहती हैं, सरल स्वभाव है, रंग गोरा है, मीठा बोलती हैं, धीरे-धीरे बोलती हैं, उसे उन्होंने मन्त्र दीक्षा दी है. स्नेहमयी हैं, मस्त हैं और प्रसाद पूरी रुचि से ग्रहण करती हैं. गुरूजी के प्रति पूर्ण समर्पित हैं, कहती हैं कि वे सब कुछ जानते हैं. सहज समाधि कहाँ हुआ, किसके घर हुआ, उसे तो सुनकर ही सिहरन होने लगी. सद्गुरू के साथ उन्हें भी कृपा के कई व्यक्तिगत अनुभव हुए हैं. वह जादूगर हैं..ईश्वर से अभिन्न हैं, ऐसे महापुरुष, महात्मा कभी-कभी ही होते हैं, बिरले ही होते हैं. वह एक सखी के यहाँ बैठी थी, उनकी प्रतीक्षा कर रही थी कि सहज ध्यान होने लगा. सद्गुरू का भावपूर्वक स्मरण करते ही वह भीतर अनुभूत होने लगते हैं, वह एक ही सत्ता है, वह कैसी अनोखी सत्ता है..जितना रहस्य खुलता जाता है, उतना ही बढ़ता जाता है.  

आज बैसाखी है, पंजाब का त्यौहार ! फसलों और मेलों का उत्सव ! कुछ लोगों को उसने SMS संदेश भेजा है. कल से बीहू की छुट्टियाँ हैं. जून का दर्द अभी तक ठीक नहीं हुआ है. पूरा एक महीना होने को है. आज वह न तो टहलने गये न ही सुबह प्राणायाम, व्यायाम आदि कर पाए.

बीहू का पहला अवकाश. मौसम आज खुला है. धूप के दर्शन हो रहे हैं. कल रात जून को दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी. उनकी छाती में दायीं ओर पसलियों में दर्द होता है, दिल की धड़कन भी महसूस होती है. कल डिब्रूगढ़ दूसरी बार गये इसी सिलसिले में. इस वक्त भी लेटे हैं. मानव का बस, बस थोड़ी दूर तक ही चलता है, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के सामने उसका कोई बस नहीं चलता. इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजने को हैं. वह सहज ध्यान करने बैठी तो दुनिया भर के विचार आने लगे, पहले कुछ शारीरिक व्यायाम करके ध्यान करने बैठो तो सहज ही होता है !
योग शिक्षिका का SMS आया है –

छोटे से जीवन में छोटी सी
मुलाकात थी प्यार भरी
आज आपका शब्दों का गुलदस्ता पाया मैंने और समर्पित किया उनको जो मुझे बनाये आप जैसे उनके प्यारों के लिए !  

उसे जवाब लिखना है –

माना छोटी सी थी मुलाकात
दिल ने दिल से कर ली बात,
आपका जीवन जन-जन अर्पित
सृष्टा को है पूर्ण समर्पित !

शांति सरलता की जो मूरत
सदा प्रेम झलकाती सूरत,
नृत्य भरा कदमों में जिनके
याद रहेगी उनकी मन में !

मस्त चाल अनोखी मुद्रा
सजल नयन विश्वास भरा,
सारी पूजाएँ, अर्चना
हों एक के लिए सदा !





Thursday, August 20, 2015

गोपी गीत


आज उनके यहाँ सत्संग है. सुबह सवा पाँच बजे नींद खुली, उसके कुछ देर पूर्व प्रार्थना की तब तंद्रा  थी, गुरूजी कहते हैं वह संध्याकाल है, तब वे आत्मा के निकट होते हैं. जिस तरह वे जागृत, सुषुप्ति तथा स्वप्नावस्था का अनुभव करते हैं, वैसे ही तुरीयावस्था का भी कर सकते हैं. जब वे ध्यान की  गहराई में होते हैं. पिछले कई दिनों से जैसे वह ध्यान ठीक से नहीं कर पाती अथवा तो अब वह उसकी सामान्य दिनचर्या बनता जा रहा है, अथवा तो ध्यान अब अलग से करने जैसी कोई विधि नहीं रह गया है. उसे हर क्षण ही मन पर नजर रखनी है, न व्यर्थ का चिन्तन न व्यर्थ की कल्पनाएँ ही, तभी भीतर की शांति को ऊपर आने का अवसर मिलेगा. अभी एक परिचिता से बात हुई उन्होंने एक अन्य महिला के बारे में बताया, जिनके पति को बोन मैरो का अंतिम स्टेज का कैंसर है. आज ही मद्रास से वे लोग आ रहे हैं. स्वामी रामदेव कहते हैं कि प्राणायाम से कैंसर भी ठीक होता है, आज उनकी बात पर विश्वास करने का मन होता है. आbज सुबह से कुछ नहीं सुना, लगा कि बाहर से अधिक ज्ञान भरने से कहीं अपच न हो जाये, जो सुना है उस पर मनन भी तो करना चाहिए. सभी संत तथा सभी शास्त्र एक ही बात कहते हैं कि स्वयं को देह मानना मोह है. जड़ प्रकृति के साथ अपनी एकता मानना भूल है. स्वयं को परमात्मा का अंश मानना तथा असीमता का अनुभव करना ही उनका ध्येय है. जड़ तथा चेतन के संयोग से उनका जन्म हुआ है, तो वे जड़ को ही क्यों अपना रूप मानें क्यों न चेतन से जुड़ें, क्योंकि जड़ तो मिटने वाला है पर चेतन सदा रहता है वह पुनः जड़ से मिलकर नया शरीर धरेगा. यदि मुक्त हो गया तो विदेह हो जायेगा अन्यथा उसे विवश होकर आना पड़ेगा भिन्न-भिन्न योनियों में !

उसकी एक सखी के पैरों व लोअर बैक में दर्द है, वह अपने इस दर्द को हिम्मत से सह रही है. ठीक ही कहा गया है यह संसार दुखों का घर है, यहाँ वे अपने ही किये पूर्व कर्मों का फल भुगतने को बाध्य हैं. ज्ञान उन्हें सचेत करता है कि आगे ऐसे कर्म न बांधें जो दर्द का कारण बनें. ईश्वर कृपा ही करता है जब कष्ट भेजता है. वे ज्यादा सहिष्णु बनें, सजग बनें और दूसरों के दुःख-दर्द को समझें ऐसा वह उन्हें सिखाना चाहता है. वे उसके इशारे को समझ नहीं पाते, वे सोये रहते हैं, वह चाहता है वे उसके साथ आनंद में नाचें झूमें गएँ ! वह कहाँ चाहता है कि वे दुखी हों, उसने तो मानव को अपने जैसा बनाया था, वह तो उनके साथ खेलना चाहता था, वे ही उसकी ओर पीठ करके बैठ गये और अपने छोटे-छोटे सुखों को.. कांच के टुकड़ों को सहेजने में लग गये, उन्हें हीरे और कांच में भेद करना कहाँ आता है, उन्हीं टुकड़ों को सहेजने में वे कर्म बांधते रहे फिर दुखों के भागी हुए, दोष दूसरों को दिया, अपने ही बनाये जाल में वे बार-बार फंसते रहे. ईश्वर सब देखता है और सद्गुरु को उनके पास भेजता है !


दोपहर के डेढ़ बजने वाले हैं, जून अब तक मलेशिया पहुंच चुके होंगे, शायद कुछ देर में उनका फोन आये. नन्हे से बात हुई, उसके टीचर से भी बात हुई कैमिस्ट्री में उसकी हाजिरी कम है इस सिलसिले में, लापरवाही के कारण उसने मेडिकल सर्टिफिकेट पहले नहीं दिखाया, खैर ! मौसम ठंडा हो गया है, रात भर वर्षा होती रही, सुबह से भी रुक-रुक कर हो रही है, रात को सोने में देर हुई, सखी के यहाँ से आते-आते ही दस बज गये थे. काफी देर नींद नहीं आई, बाद में स्वप्न देखती रही, गुरुमाँ को देखा, उनके घर आई हैं, खूब बातें कर रही हैं, बिलकुल अपनों जैसी. एक बार देखा कि उसके हाथों-पैरों पर लाल रंग के कोई जीव चिपक गये हैं पर वह भय व्यक्त नहीं कर रही, आराम से उन्हें निकाल रही है, स्वप्न की दुनिया कितनी झूठी होती है, वास्तविकता से उसका जरा भी संबंध नहीं, ऐसी ही बाहर का संसार हैं, भीतर की शांति से उसका जरा भी संबंध नहीं. वह शन्ति जो मौन में है, ध्यान में है, मन से भी पार है, जो बस ‘है’, जिसका बोध तब होता है तो बोध करने वाला भी खो जाता है, वह स्वयं बोध ही हो जाता है. कल शाम को एक सखी की प्रतीक्षा करते हुए भक्तियोग पर एक प्रवचन सुना, सगुण साकार ईश्वर की भक्ति से जो आनंद मिलता है वह निराकार की भक्ति से नहीं मिल सकता. भागवत में ‘गोपीगीत’ पढ़ा था, गोपियों का प्रेम कृष्ण के लिए कितना अधिक था, वे उनके प्राण थे. पर उनकी पूजा तो सुविधा पर निर्भर करती है. भगवान भी जानते हैं कि यदि अभी वे उनके पास नहीं गये तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, वे सोचते हैं अभी तो बहुत वक्त है, आराम से बाद में भक्ति-पूजा कर लेंगे ! जून का फोन आया है, उन्होंने उसके लिए एक स्टिल डिजिटल कैमरा खरीदा है. नन्हा इलेक्ट्रोनिक्स की परीक्षा की तैयारी कर रहा है. कल दीदी और बड़ी ननद से भी फोन पर बात की. 

Friday, September 19, 2014

बादल और सूरज


कल रात फिर माँ को सपने में देखा. वे सभी थे. पिता, सभी भाई-बहन. वह काम कर रही थी, जैसे कि सशरीर हों, वास्तव में वह नहीं थीं, फिर वह पलंग पर बैठ जाती हैं और पानी मांगती हैं. वे उन्हें पानी नहीं दे पाते क्योंकि उनका भौतिक अस्तित्त्व नहीं है. मंझला भाई बोतल से उन्हीं के सामने पानी पी रहा है और वह गिड़गिड़ाती हैं, फिर दुःख और क्रोध से कहती हैं कि उन्हें पानी न देकर क्या वे सब जीवित रह पाएंगे? कैसा अजीब सा स्वप्न था, पर स्वप्न का अर्थ ही है अजीब...इसके बाद ही वह जग गयी और यही सोचती रही कि उसके ही मन ने इसे गढ़ा होगा, वास्तव में ऐसा नहीं होगा कि माँ को अंतिम समय में पानी की जरूरत रही हो और वह उन्हें न मिला हो. पर अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं है, जाने वाले एक बार जाकर वापस नहीं आते. कल जून ने “बस इतना सा सरमाया” की spiral binding भी करवा दी. नन्हे ने उस दिन कवर पेज भी कम्प्यूटर पर प्रिंट कर दिया था. माँ की कृतज्ञ है कि न होने पर भी उन्होंने उसे इतना बल दिया. कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये. सखी की तबियत ठीक नहीं थी पर उसने अच्छी आवभगत की अब वापसी पर घर आने का निमन्त्रण भी दे दिया है. आज सुबह से सूरज निकला है अभी पैकिंग का कुछ काम शेष है. जून के आने से पहले समाप्त हो जाने से अच्छा है वरना वह बहुत जल्दी परेशान हो जाते हैं.

आज सुबह पिता से बात की, ठंड वहाँ कम हो गयी है सो ज्यादा गर्म कपड़े ले जाने की आवश्यकता नहीं है. इस समय फिर आकाश बादलों से ढका है, धूप निकलती है तो सब कितना स्पष्ट दिखाई देता है ऐसे ही जब मन पर अज्ञान के बादल छाये हों तो कुछ भी स्पष्ट नहीं सोच पाता. ज्ञान की एक किरण ही कितना प्रकाश भर देती है. सुबह बंगाली सखी ने उसकी कविताओं की तारीफ की उसने अपने पति से उनके बारे में सुना था. कल दो और मित्र परिवारों ने भी पांडुलिपि देखी. एक रचियता के लिए सबसे सुखद पल वे होते हैं जब कोई उसकी रचना को पढ़े व समझे.    

मार्च का मध्य आ गया है. फरवरी के अंतिम सप्ताह में वे यात्रा पर निकले थे. उस दिन के बाद आज पहली बार डायरी खोली है. वे तीन दिन पहले वापस आ गये थे, आने के बाद सफाई आदि के कार्य से निबट कर पुनः पुस्तक के काम में जुट गयी है. अभी भी आठ-दस दिनों का काम शेष है. नन्हा सुबह सोकर उठा तो पेट दर्द की शिकायत कर रहा था, उसे सम्भवतः अपच हो गया है. सुबह एक सखी से बात हुई उसने कहा, वह कहानियाँ भी लिखे, एक बार पहले भी उसने यह बात कही थी. उसकी अगली पुस्तक कहानियों की हो सकती है, विचार बुरा नहीं है. अज सुबह छोटी बहन से बात की, वह थोड़ी चुपचुप लगी, परिवार से दूर होने के कारण या वे उससे मिलने नहीं गये शायद इस बात का मलाल हो या उसका वहम् भी हो सकता है. आज नन्हे को नई किताबें लेने स्कूल जाना है जून उसे दोपहर को ले जायेंगे.




Wednesday, April 9, 2014

नामघर का पुजारी


कल शाम जब जून ऑफिस से आए तो अभी तीन ही बजे थे, नन्हा भी उसी वक्त आ गया, उन्होंने रोज की तरह चार बजे तक नाश्ता खत्म किया. जून को डेंटिस्ट के पास जाना था और नन्हे को कम्प्यूटर क्लास, उसे किचन में काम था. सभी कुछ ठीक था फिर शाम पौने छह बजे वह क्लब गयी, लौटी तो उसकी आँखों में दर्द था, नन्हा आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था. कार न होने के कारण उसे साइकिल से जाना पड़ा था, थकान से या अन्य किसी कारण से वह ठीक महसूस नहीं कर रहा था. सुनकर नूना का दर्द और बढ़ गया और बिना डिनर खाए वे तीनों ही जल्दी सो गये. सुबह वह तो ठीक थी पर नन्हे को हल्का बुखार था.

आज इतवार को ‘नामघर’ से कुछ लोग चंदा मांगने आये, उन्होंने लाल गमछा ओढ़ा हुआ था, हाथ में कुछ पारंपरिक वाद्य यंत्र भी थे, श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे. जून ने उनमें से एक का नमस्कार सुनते ही कहा, ‘हम चंदा नहीं देते’. पर वापस आकर उन्हें लगा चार-पांच व्यक्ति घर-घर जाकर इस तरह क्यों मांग रहे हैं, जबकि कोई उन्हें कुछ देने को तैयार नहीं है. वह पहले कभी इतना सोचते नहीं थे. आज सुबह उठकर उन्होंने सारे घर का जाला भी साफ किया वैक्यूम क्लीनर की सहायता से. सुबह दोनों घरों पर बात की, माँ से बात करके उसे लगा वह कुछ उदास हैं, ननद से बात करके महसूस किया, उसमें काफी आत्मविश्वास है.

सुबह नन्हा उठा तो डल था, शनिवार को स्कूल नहीं गया था, पर आज उसका टेस्ट है, कल जिसकी तैयारी भी की थी. उसे लगा वह थोड़ी तकलीफ सह सकता है. ईश्वर उसे शक्ति देगा और वह स्वस्थ होकर घर आएगा, लिखते हुए उसने सोचा, जून भी नन्हे के बारे में ही चिंतित होंगे, सुबह वह उसे स्कूल भेजने के पक्ष में नहीं थे पर उसने कई तरह से उन्हें समझाया, फिर बाद में महसूस भी किया वह कोई बच्चे तो नहीं, पर क्या कई बार बड़ों को भी सलाह की जरूरत नहीं पड़ जाती.

कल वे नन्हे को होमोयोपथिक डाक्टर के पास ले गये. उसे AC चलाकर सोने के लिए मना किया है. कल ‘गणेश पूजा’ के कारण जून के दफ्तर में छुट्टी थी. एक पुराने मित्र को लंच पर बुलाया था, इतवार की शाम वे अचानक मिलने आ गये थे, जून जब उन्हें छोड़ने गये तो ‘हल्दीराम की सोनपापड़ी’ का एक डिब्बा उन्होंने दिया. जो फ्रिज में रखने के बाद कैसे चिपक सी गयी है. रात्रि को उसे पहले तो गर्मी के कारण नींद नहीं आई फिर परेशान करने वाले स्वप्न देखती रही, नन्हे के स्वास्थ्य को लेकर हुई चिंता के कारण आये सपने. मेडिकल गाइड में ‘ब्रोंकाइटिस’ के बारे में कल काफी कुछ पढ़ा था, वही सत्य होकर रात को भयानक लग रहा था. सुबह के सारे कार्य करते और दो लेख पढ़ने के बाद जिनमें से एक डेल कार्नेगी का था और दूसरा जे कृष्णामूर्ति का, मन कुछ संयत हुआ है. दोनों के विचार प्रेरणा देते हैं, जीवन को बहुत करीब से देखने की, सही मायनों में जीने की और मानसिक आवश्यकता को भी पूर्ण करते हैं अर्थात कुछ सोचने को विवश करते हैं. नन्हा कल से बेहतर है. आज दोपहर को उनके बाएं तरफ की पड़ोसिन आएगी, उससे सिन्धी कढ़ाई का टांका सीखने, जो उसे भी पुनः याद करना पड़ेगा. अभी तो उसे कपड़े धोने हैं, BPL वाशिंग मशीन के सौजन्य से. कल शाम बच्चों ने एक प्रश्नावली दी working mothers vs house wives, जो उसकी जगह नन्हा ही भर देगा.

कल समाचारों में सुना, मिलावटी सरसों का तेल खाने से कुछ लोगों की मृत्यु हो गयी और कितने ही अस्पताल में हैं. उसे आश्चर्य हुआ, अल्प लाभ के लिए कुछ व्यापारी कितना नीचे गिर जाते हैं. कल शाम जून के एक मित्र आये उनके कम्प्यूटर पर कुछ cd चलाकर देखने जो उनके यहाँ नहीं चल पा रहे हैं, उसे बुनते देखकर कहा, सर्दियों की तैयारी शुरू हो गयी. मोज़े जो उसने पिछले हफ्ते शुरू किये थे अभी तक नहीं बन पाए हैं, घर में बच्चा अस्वस्थ हो तो सारा ध्यान उधर ही रहता है फिर आजकल वे टीवी बहुत कम देखते हैं, पिछले साल टीवी देखते उसने बुनने का काफी काम किया था. जून ने उसके नाम से दो ड्राफ्ट भेजे हैं फिक्स्ड डिपाजिट के लिए, वह उसे पिछले पन्द्रह वर्षों में की गयी हर छोटी-बड़ी बचत के बारे में बताना भी चाहते हैं.





Tuesday, September 10, 2013

अनाम दास का पोथा


टीवी पर भारत और अर्जेंटीना के बीच हॉकी मैच चल रहा है और लगता है भारत यह मैच हार जायेगा, फाइनल में पहुंचने का उसका स्वप्न अधूरा ही रह जायेगा. जैसे कि किसी व्यक्ति का स्वप्न एक निस्वार्थ औए सच्चा मित्र पाने का होता है, जो उसे, वह जैसा है, स्वीकार कर सके, इसी तरह वह खुद भी उसे जैसा वह है स्वीकारे, क्योंकि उनके मध्य केवल प्रेम हो. इस समय भारतीय खिलाडियों की जो हालत हो रही है वह  उसे अच्छी तरह महसूस कर सकती है, पूरे देश में लाखों लोगों के दिल इसी तरह धडक रहे होंगे, लेकिन अगर भारत हार जाता है तो भी उन्हें उदास नहीं होना चाहिए, क्योंकि इन्सान का बस कभी-कभी नहीं भी चलता है.

आज सोमवार है, अभी-अभी उसकी एक सखी का फोन आया और पीड़ा जो परसों शाम  महसूस की थी, कल दोपहर से लग रहा था खत्म हो गयी थी, फिर उभर आई है. उस दिन की सारी घटनाएँ एक-एक कर सम्मुख आ रही हैं, एक बार फिर उसकी मित्रता का अपमान हुआ, फिर भी जाने क्यों उसके भीतर का स्नेह कभी खत्म नहीं होता. कल वे तिनसुकिया गये थे, उसका नया चश्मा बन कर आया, नन्हे के लिए स्केट्स और जून की नई हवाई चप्पल.

आज उसका मस्तिष्क बहुत उर्वर हो गया है, भावों के बीज हैं कि फूटते जा रहे हैं और विचारों की नई-नई कोंपलें स्वतः ही उग रही हैं. सब कुछ जैसे व्यवस्थित हो गया है, संसार कोई अजनबी स्थान नहीं रह गया बल्कि एक सुंदर मैत्री पूर्ण स्थल बन गया है जहाँ लोग एकदूसरे की कद्र करते हैं, हृदय कृतज्ञता से भरे होते हैं. आज एक अजनबी ने कहा, आपका बगीचा बहुत सुंदर है, और लो, उसका बगीचा इतना सुंदर हो गया है कि वह उसके बारे में एक कविता लिखने की सोच रही है. जून अभी तक नहीं आए हैं, आजकल वह ‘स्ट्रेस मैनेजमेंट’ पर एक कोर्स अटेंड कर रहे हैं एक ट्रेनिंग प्रोग्राम, कल उन्होंने बहुत रोचक बातें बतायीं, वह कुछ बहुत अच्छा सीख रहे हैं.

कल रात से ही उसकी पीठ में दर्द है, इतने वर्षों में पहली बार इस तरह का दर्द महसूस कर रही है, उठने-बैठने यहाँ तक की हल्का सा खांसने या उबासी लेने में भी दर्द बढ़ जाता है. दोपहर को गाने की प्रैक्टिस के लिए जाना है, जून के आने का समय हो रहा है, पर फुल्के बनाने का उसमें सामर्थ्य नहीं है, जून आकर सहायता करेंगे. पीठ का दर्द इतना तकलीफदेह होता है पहले उसे पता नहीं था.

आज पीठ में दर्द नहीं है पर पूरी तरह से स्वस्थ अनुभव नहीं कर रही है, अभी गरारे करते समय याद आ रही थी परसों सुबह की ख़ुशी, हर ख़ुशी की कीमत चुकानी पडती है न. आज टीवी पर एक अच्छी फिल्म देखी, ‘एक फूल चार कांटे’, वहीदा रहमान इतनी सुंदर है और उतनी ही अच्छी अदाकारा है, इस फिल्म में उसका चरित्र बहुत जानदार है.

आज कल से बेहतर है. सुबह सारे कार्य किये, सिर्फ योगासन छोड़कर. दोपहर पढ़ाई भी की. कल शाम को ‘अनाम दास का पोथा’ पढ़ना शुरू किया, उसे भी काफी पढ़ चुकी है और यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे बार-बार पढ़ते रहना चाहिए. मन, बुद्धि, आत्मा के रहस्यों को खोलती हुई वह जीवन का सीधा-सच्चा मार्ग दिखलाती है. फेमिना में एक ब्रह्मकुमारी का आत्मकथ्य पढ़ा और एक लेख, quality in death भी, दोनों ही लेख अच्छे लगे. सुबह-सवेरे जागरण में life after death सुनकर मृत्यु उसके लिए पहले जैसी रहस्यमयी और क्रूर नहीं रह गयी है. मृत्यु स्वाभाविक है और उसे इसी रूप में ग्रहण करना चाहिए. there must be quality in death like in life. आज रिहर्सल में शाम को जाना है.

थोड़ा सा वक्त है, सोचा क्यों न इसका उपयोग कर ले. अभी नन्हे के लिए टिफिन बनाना है, उसकी पसंद के भरवां आलू बन रहे हैं. सुबह-सुबह ‘रैक्य आख्यान’ का अंतिम भाग पढ़ा था सो अंतरात्मा की निकटता महसूस कर पा रही है. वह उसे गाइड ही नहीं कर रही, एक अनोखे सुख से उसका अंतर भर गया है. असीम सम्भावनाओं के द्वार खुल गये हों जैसे, कहीं कोई भय नहीं कोई उहापोह नहीं. परसों क्लब में वह कार्यक्रम है जिसकी तैयारी इतने दिनों से चल रही है, उन्हें वहाँ इडली खिलानी है, उम्मीद है सब ठीक होगा. खाने की जिम्मेदारी उसकी सहयोगिनी की है और कोरस की उस पर. उसे ईश्वर पर विश्वास है, वह उसकी सहायता करेगा, वह जो उसके दिल में रहता है और दिल की हर बात जानता है, यह भी कि उसे उसी की लगन है. वह जो सारी उलझनों को सुलझा देता है.

तुम ! मात्र तुम शाश्वत हो
हे अखिलेश्वर ! और तुम्हारा अंश जो समाया है मुझमें
ब्रह्मांड की विशालता
आकाश की निस्सीमता
और धरा की दृढ़ता में मात्र तुम जाग्रत हो !
सूर्य, चन्द्र और कोटि तारागण के प्रकाश में
अन्तरिक्ष के शून्य में
सागर के विस्तृत फैलाव में
मात्र तुम दृष्टिगोचर हो
जो बीत गया, होने वाला है जो
उन सबमें
मात्र तुम गतिमान हो !



Monday, July 8, 2013

सावन तो सावन है


इस क्षण उसके पास करने को कुछ नहीं है यही विचार मन में बार-बार आ रहा है, शाम के सवा चार हो गये हैं, जून अभी तक लौटे नहीं हैं. उसकी बायीं बांह में इंजेक्शन के कारण हल्का दर्द है और सिर भी भारी है. पिछले कई दिनों से स्वास्थ्य की एक समस्या के कारण, जो उसे कुछ सिखाने आई है. उसे लगता है यह आत्म निरीक्षण और साहसी बनने का समय है. ईश्वर चाहेगा तो अगले दो हफ्तों में वह बिलकुल ठीक हो जाएगी. अच्छा लगता है जब जून बहुत स्नेह से उसका ध्यान रखते हैं. शाम को वे क्लब जायेंगे उसे लाइब्रेरी से पुस्तकें बदलनी हैं. उसे याद आया दो हफ्ते पहले उसने स्वास्थ्य पर  विशेष ध्यान देना शुरू किया था, उसके चार-पांच दिनों बाद ही यह समस्या शुरू हुई...अर्थात..

आज सुबह जब नन्हे ने असमिया के अक्षर बनाने सीखे तो उससे वर्गीय ‘ज’ बन ही नहीं रहा था, सो आज से फिर अभ्यास शुरू किया है वरना इतने दिनों की मेहनत व्यर्थ चली जाएगी. उसने टीचर को फोन किया, वह अब लिखने की जगह बोलने का अभ्यास कराएँ पर वह नहीं मिलीं, उसे लगता है गलत बोलने पर लोग हँसेंगे सो वह बोलती ही नहीं, वैसे हिंदी यहाँ सभी समझते और बोलते हैं सो दूसरी भाषा में बोलना अपनी ख़ुशी के लिए ही है,

Feeling  not good. God has punished her. So dull headache and boredom is with her since jun left for field duty. He will be back in the evening. It is about two o’ clock, All is not well. Yesterday they got two letters and day before four, but she was not feeling to reply them. Nanha has made one beautiful greeting card for his teacher in the morning. और वह पिछले दिनों अपने अंतर में झाँकने का प्रयास कर रही थी, उस डिवाइन फ्लेम की खोज में जो  सबके भीतर है, सच पूछो तो उसी ने उसे उजाला दिया है पिछले दिनों. वरना इस दर्द को सहना इतना आसान नहीं था. She will bear it with courage and smiles and she will never ever cry for this. Because if it is superficial then it is not worth crying and if it is something serious then what is the use of crying. She will prepare herself for the long journey. Jun says he will bring six dresses for her, he loves her so much and nanha also. She will make them happy while she is with them. If she is losing interest in her surroundings then it is  not a good sign but it is not true, today in the morning she went to see her neighbor.

गमे दिल को इन आँखों से छलक जाना भी आता है...
आज सुबह के पौने दस बजे पीटीवी की इन सुरीली आवाजों ने न जाने उसके दिल के किस तार को छू दिया है कि आँखें सावन-भादों बन गयी हैं.
ऐ दिल किसी को याद करके इतना उदास क्यों है  और सबाए लाये तन्हा
इस चमन की कली तन्हा ...
ये आवाजें इतनी दर्द भरी थीं कि यादें जो भूली हुई थीं, फिर से ताजा हो गयीं.
सावन तो सावन है बरसेगा
पागल है दिल फिर भी तरसेगा
लगता है मन कहीं गहरे तक उदास था जो जरा सी हमदर्दी पाकर पिघल गया है.
चलो उस मोड़ पर हम भी चढ़ जाएँ
जहाँ से जाके फिर कोई वापस नहीं आता
सुना है एक साये अजनबी बाँहों को फैलाये
जो आए उसका इस्तकबाल करती है
जो तारीकियों में लेके आखिर डूब जाती है
यही वह रास्ता है जिस जगह साया नहीं जाता
जहाँ पे जाके...
जो सच पूछो तो हम तुम जिन्दगी भर से हारते आये
हमेशा बेयकीनी के कुफ्र से कांपते आये
हमेशा खौफ के पैराह्नों से अपने पैकर ढांपते आए
हमेशा दूसरों के साये में एक दूसरे को चाहते आये
बुलाता है अगर उस कोह के दामन में छुप जाएँ
जहाँ पे जाके..
अभी अभी जून का फोन आया वह एक घंटे में आ रहे हैं.
He will miss her so much.



Tuesday, March 12, 2013

ला ओपेला का सेट



गुलदाउदी के पौधे एक-दो दिनों में मिल जायेंगे, फोन उसकी सखी ने ही किया था, सो उसका यह आक्षेप कि सदा उसे ही फोन करना पड़ता है, गलत सिद्ध हो गया जिसकी उसे खुशी है. शाम को असमिया सखी के घर जाना है, उससे भी बात हुई है, वह उसके नए लाल सूट में इंटर लॉकिंग कर के देगी अपनी नई फ्लोरा पर, और आज सुबह से दो बार प्रेम की अधिकता या भावों की अधिकता के कारण उसकी आँखों में अश्रु झलक आये, कल भी ऐसा हुआ था, कहीं यह उस स्वप्न का असर तो नहीं, या सम्भव है सात्विक भाव प्रगट हुए हों. लेकिन मन ने कल एक-दो बार ऐसा सोचा कि उनकी परवाह किसी को नहीं, उन्हें ही सबकी परवाह है - लेकिन यह सत्य नहीं है, और अगर ऐसा हो भी तो इसमें उदास होने की कोई बात नहीं, बल्कि उन्हें किसी से अपेक्षा करने का कोई अधिकार नहीं. जून के दांत का दर्द कम है, कल उन्हें फिर जाना है. नन्हा आज जल्दी उठ गया था, पर तैयार होते-होते उसे पौने नौ बज गए, शायद उसे खांसी फिर से परेशान कर रही है, वैसे वह गंध के प्रति बहुत संवेदन शील है, हल्की सी गंध से खांसने लगता है.

मौसम भीगा-भीगा है, बादल बरस कर अभी-अभी थमे हैं. खिडकी से नजर बाहर डालो तो बस हरियाली ही हरियाली है. जून इस वक्त तिनसुकिया में होंगे. नन्हा कह रहा था आज से उसकी छुट्टी देर से होगी, उसका टाइम टेबिल आज से बदल रहा है. उसकी पुरानी पड़ोसिन का फोन आया तो उसे अच्छा लगा. कल रात को एक बार गर्मी के कारण नींद खुली फिर सुबह ठंड के कारण- एक जमाना था कि नींद आती थी तो सर्दी-गर्मी और मच्छर किसी का पता नहीं चलता था. बेसुध और बेखुद हो जाती थी. रात बचपन को याद करके सोयी थी, बचपन के माँ-पिता को भी. कल उनका पत्र आया था, लिखा है, अगले महीने उनका घर बनना आरम्भ हो जायेगा, जनवरी तक पूरा भी हो जायेगा. कल जून एक महिलाओं की एक अंग्रेजी पत्रिका लाए, इंग्लैण्ड में प्रकाशित, वहाँ कि संस्कृति यहाँ से कितनी अलग है, उसने गार्डनिंग पर एक लेख पढ़ा, फिर पड़ोसिन से हेज के पास खड़े होकर बात करने लगी पता ही नहीं चला सवा घंटा कैसे बीत गया. उसके बेटे को चिकन पॉक्स हो गया है, वह सो रहा था.

  कल उसके जीवन का एक बहुत अच्छा दिन था, शाम को उसकी एक छात्रा अपने माँ-पिता व छोटी बहन के साथ आयी. वे लोग उसके लिए एक उपहार भी लाए. उन्हें उन सबके आने की उम्मीद नहीं थी, उसके पहले एक मित्र परिवार आया था, घर काफी अस्त-व्यस्त सा हो गया था, खैर.. वे लोग अचछे लगे सरल और सहज..और इतना सुंदर ला ओपेला ला का dessert set.

  उसके पैरों में आज वही दर्द है, डायरी उठाई है, दस बजने को हैं अभी..बस..कुछ..भी..ये चारों शब्द उसके मन की अस्थिरता के परिचायक हैं. कल फेमिना में एक बहुत अच्छा लेख पढ़ा. रात को देर तक सोचती रही कि उसे अपने वक्त का सदुपयोग करना चाहिए, कोई न कोई काम करते रहने की वैसे उसकी आदत तो है ही, बस काम थोड़ा उद्देश्यपूर्ण हो इसका ध्यान रखना होगा. लेकिन अब इस दर्द में तो सिर्फ आराम से बैठकर पढ़ा जा सकता है, नहीं जी, अब इतना भी नाजुक नहीं होना चाहिए इंसान को कि जरा सा मौका मिला नहीं कि लम्बी तान ली...मगर वह तो पढ़ने की बात कर रही थी और वह भी विवेकानंद की किताब का तृतीय अध्याय.  

  दोपहर के पौने दो बजे हैं. किसी परिचिता ने बताया कि नन्हे को कल बस में किसी बच्चे ने मारा था, उसने उन्हें बताया नहीं, शायद इसका कारण यह तो नहीं कि वे उसे कमजोर कहते हैं, मार खाकर आने पर, इस तरह तो वह अपनी समस्या बताएगा नहीं, उसने मन ही मन तय किया, अब से वह ऐसा नहीं करेगी. वह आजकल सुबह सब काम समय पर कर लेता है, पहले की तरह बार-बार नहीं कहना पड़ता. नन्हे से पूछने पर उसने इंकार कर दिया कि बस में किसी से झगड़ा हुआ था, इसका अर्थ हुआ कि सूचना सही नहीं थी. उसका गणित का टेस्ट कल फिर नहीं हुआ. कल ड्राइंग प्रतियोगिता है, पिछले दो-तीन दिनों से उसके मित्र शाम को खेलने आ जाते हैं. वे सब अँधेरा होने तक खेलते रहते हैं, उसे अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं, जब माँ भीतर से आवाज देती थीं और वह अपनी सहेलियों के साथ रस्सी कूदने, गेंद गिट्टी खेलन में व्यस्त रहती थी.

Monday, March 11, 2013

भोज के वृक्ष



भारत छोडो आन्दोलन की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में आज अवकाश है, वे तिनसुकिया गए, एक और परिचिता व उसके छोटे से बेटे के साथ. शाम को एक परिवार मिलने आया, दिन भरा-भरा सा रहा. शाम को जून को थकावट हो गई, धूप में ड्राइविंग करने के कारण ही शायद.
अभी-अभी कल्याण में उसने पढ़ा, जिसके हृदय में भगवान रहते हैं वहाँ भय, विषाद, शोक, व्याकुलता, उद्वेग, निराशा, क्षोभ, संदेह, अश्रद्धा, ईर्ष्या, कायरता, द्वेष आदि का स्थान कहाँ है ? वहाँ तो निर्भयता, शक्ति, तेज, प्रकाश, प्रेम, निष्कामता, संतोष और परम आनंद का निवास होता है. जब ईश्वर अपना लेते हैं, तब वही जो कुछ विधान करेंगे, कल्याण के लिए करेंगे. दुःख हम अपनी ही भूल से अनुभव करते हैं, उस भूल को मिटाने की देर है कि चित्त स्थिर रह सकता है. जैसे स्वप्न में वह तरह-तरह की आपदाओं को झेलती है मगर यह भान होते ही कि यह तो स्वप्न है, मन शांत हो जाता है उसी तरह जीवन में कोई परेशानी हो तो उसे स्वप्न वत मानकर झेल लेना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सुदिन आएंगे ही.

  आज जन्माष्टमी है, सुबह से जो मन शांत था अभी कुछ देर पूर्व नन्हे पर झुंझला ही गया, बच्चे तो आखिर बच्चे ही हैं, काम धीरे-धीरे ही करेंगे न. आज उसने व्रत रखा है, नन्हे और उसने मिलकर मंदिर सजाया है, अच्छा लगता है ईश्वर के करीब रहना लेकिन मन फिर कहीं  और चला जाता है. कल दीदी का छब्बीस का लिखा पत्र आया और कैसा संयोग है उसी दिन उसने भी उन्हें लिखा था. कल छोटे भाई के लिए जन्मदिन का कार्ड लायी थी. नन्हे का स्कूल खुला है, जून आज किसी से लिफ्ट लेकर ऑफिस गए हैं, ‘स्टूडेंट्स यूनियन’ ने चौबीस घंटे का बंद घोषित किया है, कार ले जाना ठीक नहीं था. कल शाम एक सखी के बुलाने पर वे लोग उसके यहाँ गए. लेकिन आज उसे इन दुनियादारी की बातों से मन हटाकर पूर्णता की ओर ले जाना है, जहाँ कोई उलझन नहीं..अद्भुत प्रकाश है, जिसके आगे कुछ पाना शेष नहीं रहता न ही कुछ जानना. दीदी ने लिखा है, “कहीं कुछ ऐसा पढ़ो जिसके आगे लगे कि अब और कुछ नहीं, फ़िलहाल कुछ भी नहीं, तो लिखना”. उसने सोचा अभी पढ़ेगी विवेकानंद की दूसरी पुस्तक उसमें अवश्य ही ऐसा कुछ मिलेगा.

  कल का उपवास अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया. जून को कल दोपहर दांत में दर्द था, आज तिनसुकिया गए हैं डेंटिस्ट के पास. आज उसने लंच अकेले ही खाया, जून अभी एक घंटे बाद आएंगे. शायद उन्हें रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ेगा. कई बार जाना होगा. सुबह अलमारी की सफाई के काम में लगी रही. पढ़ने की कोशिश की पर मन नहीं लगा, रात को फिर स्वप्न देखे, इधर-उधर के, अभी उस दिन ही मरते-मरते बची थी एक स्वप्न में. शाम को उन्हें एक परिवार के साथ बैठकर “हम हैं राही प्यार के” देखनी है, कल जून का जन्म दिन है, उसने अभी-अभी एक कार्ड बनाया है. कुछ देर पहले जून को विवाह से पूर्व लिखे कुछ खत पढ़े, कितन प्रगाढ़ था उनका रिश्ता, प्यार के रिश्ते सचमुच कितने मजबूत होते हैं.

  जून का जन्मदिन अच्छा रहा, उसने केक बनाया था. घर पर ही भुजिया भी बनाई थी. पन्द्रह अगस्त पर वे तीनों नेहरु मैदान गए, झंडा आरोहण में सम्मिलित होने. कल रात को एक मधुर स्वप्न देखा, वर्षों बाद भी वह सब उसके अवचेतन में उतना ही सजीव है जितना उस क्षण था, सोलह-सत्रह वर्ष पहले की बात है जब वे पहाड़ों में रहे थे, लेकिन अब भी स्मृति पटल पर सब कुछ कितना स्पष्ट है. वर्षों से स्वप्नों में ही मिलती रही है, लगता है हर साल एक बार मिलना हो जाता है उन वादियों से. यूँ फूट-फूट कर रोना...एक अनजानी तृषा..एक अधूरा वादा लिए ही लगता है इस जग से जाना होगा...वे झरने.. वे रास्ते..वे पहाड़ कभी मिलेंगे उसे? अभी तक जैसे पोर-पोर महसूस कर रहा है वह सब कुछ..स्वप्न इतने मधुर भी हो सकते हैं ? अभी तक उसके मन का एक कोना सुरक्षित है उन यादों के लिए यह उसे स्वयं भी मालूम नहीं था, इतनी शिद्धत से महसूस कर सकती है उस छुअन को इस पल जो वर्षों पहले भी अनजानी थी और आज भी है पर स्वप्न सारे बांध तोड़ देते हैं..नदियाँ मिल जाती हैं..तट तोड़कर...और स्वप्न क्या सिर्फ उसके हिस्से में ही हैं ? और यह भी कि प्रेम सिर्फ बचपना नहीं है..प्रेम उम्र की सीमाओं से परे है. जैसे उसका मन इस समय एक अनोखे प्रेम से लबरेज है..कसक भरा प्यार उन भोज वृक्षों के लिए और फूलों की घाटी में बहती उस चांदी के समान जल धार के लिए..   





Monday, January 7, 2013

दांत का दर्द



उसकी बंगाली सखी का जन्मदिन आने वाला था, जिसे बागवानी में बहुत रूचि थी. उसने सोचा एक कविता लिखेगी उसके लिए-
फूलों सा हो मन उसका
कलियों जैसी ऑंखें,
खुले पलक तो रंग-बिरंगी
मुस्कानें बिखरा दे !

पात-पात से बात करे
ऐसी भाषा उसकी हो
पंखुरी-पंखुरी ओस बिछी जो
ऐसी हँसी बिखेरी हो !

सुरभि कुसुम की बने भावना
विचार पराग बना हो,
वायु सुवासित ज्यों उपवन की
जीवन प्रमुदित उसका हो !

लहरा कर ज्यों झूमा करतीं
कुसुम कतारें विकसित हो,  
सहला दे हर मन की उलझन
पवन झकोरा प्रमुदित हो !

आज उन्हें साथ-साथ चलते हुए पूरे सात साल हो गए हैं. उसक मन भरा है भावों से और उन स्मृतियों से जब उन्होंने प्रेम के अमृत का घूंट पहली बार पिया था...जब पहले-पहल उन्होंने एक-दूसरे को चाहा था. तब से कितनी बार..कितनी ही बार महसूस हुआ है की जितना प्रेम वह उससे करता है उतना किसी ने किसी को नहीं किया होगा..क्या उसे भी कभी ऐसा लगा है ? और अब तो वे एक-दूसरे में इतना रच-बस गए हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं..कुछ साल पहले उसने अपनी डायरी की शरुआत सात जनवरी से की थी और आज भी इस साल का पहला पन्ना है. कल रात एक स्वप्न देखा कि वे लोग यहाँ से जा रहे हैं..इतनी जल्दी में कि किसी से मिल भी नहीं सके, सामान पैक हो गया है बस कार का इंतजार है, हो सकता है यह स्वप्न उस बातचीत के कारण हो जो सोने से पूर्व उन्होंने की थी, वे उसकी छोटी बहन की शादी में जाने की बात पर चर्चा कर रहे थे.

कल व परसों नहीं लिख पायी, दांत में दर्द ज्यादा था, बांया गाल फूलकर गोलगप्पा हो गया है...चार-पांच दिन पूर्व ही उसने सोचा था कि अब वह पूर्ण स्वस्थ है कुछ भी नही होता..और ऐसा सोचना ही शायद पूर्वाभास था कि अब कुछ होने वाला है. डेंटिस्ट को अभी दिखाया नहीं है, पर दिखाना जरूरी है यहाँ या तिनसुकिया जाएँ शायद कल. कल से दवा शुरू की है, पता नहीं कब पूरी तरह ठीक होगा. कल उनकी ट्रेन व फ्लाईट की टिकट हो गयीं. उसने गलती से एक दिन पहले के पेज पर लिख दिया है..हालात क्या इतने बिगड़ गए हैं...

मौसम इस तरह बदले हैं अब के बरस
बरसात आ के चली गयी खबर ही न हुई

कल टीवी पर एक बेहद अच्छा कार्यक्रम देखा, आधुनिक उर्दू शायर मोयद्दीन पर, शेर कैसे होता है ? कितना अच्छा जवाब था उतने ही अच्छे सवाल का, एक बेचैनी सी होती है..कैफियत सी ..फिर शेर होता है खुदबखुद, बेइरादा. जून को यह प्रोग्राम पसंद नहीं...अगर वह भी साहित्य में दिलचस्पी लेता तो शायद ...मगर उसे इन बातों से कोई खास या आम कोई असर नहीं होता, उसका मन जल्दी पिघलता नहीं है जैसे वह कोई पंक्ति पढकर या सुनकर भावुक हो जाती है...फिर भी तो वह उसकी जान है, उसके होने से ऐसा लगता है जैसे अब कोई डर नहीं वह सब कुछ सम्भाल लेगा.. सम्भाल ही लेगा, और नन्हे की भी अपने पापा के बारे में कुछ यही राय है.