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Wednesday, May 10, 2017

जीवन की शाम


आँगन में आम के पेड़ से पंछियों की आवाजें निरंतर आ रही हैं. हवा दरवाजे को धकेल कर बंद कर रही है. प्रकृति निरंतर क्रियाशील है. कल शाम से उसे देह में एक हल्कापन महसूस हो रहा है, जैसे भार ही न हो और चलते समय एक तिरछापन सा लगता है, शायद यह वहम् ही हो. मन हल्का हो तो तन भी हल्का हो जाता है. पिताजी आज अपेक्षाकृत ठीक हैं. आज होली पर पहली कविता ब्लॉग पर पोस्ट की. हर कोई अपनी अहमियत किसी न किसी तरह जताना चाहता है, हर कोई उसी परमात्मा का अंश जो है, हर कोई पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता है, परमात्मा का भक्त भी पूर्ण स्वतंत्र है. परमात्मा उनके कितने करीब है, उनसे भी ज्यादा करीब..श्वासों की श्वास में वह है..सुक्षमातिसूक्ष्म.. जून आज देर से आयें शायद, उनके पूर्व अधिकारी आये हैं, शाम को उन्हें भोजन पर भी बुलाया है. पिताजी बाहर बरामदे में बैठे हैं, जून की प्रतीक्षा करते हुए, चटनी के लिए धनिया व पुदीना तोड़ लाये हैं बगीचे से.

कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. अतिथि अकेले ही आये, भोजन बच गया. आज सुबह वास्तविक अलार्म बजने से पहले ही मन में अलार्म की घंटी की आवाज सुनाई दी, जगाने के लिए अस्तित्त्व कितने उपाय करता है, कभी ऐसे स्वप्न भेजता है कि उठे बिना कोई रह ही नहीं सकता. कल शाम जून और पिताजी को योग वशिष्ठ पढ़कर पढ़कर सुनाया तो वे प्रसन्न हुये आत्मा के बारे में जानकर. अभी-अभी दो सखियों को होली के लिए निमंत्रित किया. गुझिया के लिए तिनसुकिया से खोया भी लाना है. शनिवार को जून ने एक कुर्ती का ऑर्डर किया था नेट से, आज पहुंच गयी, बहुत सुंदर एप्लिक का काम है उस पर. मौसम बहुत अच्छा है आज, हल्के बादल हैं और ठंडी सी हवा भी बह रही है. शायद कुछ दूर वर्षा हुई है. परमात्मा नये-नये रूपों में प्रकट हो रहा है. डायरी के पन्नों पर चमकते हुए प्रकाश कणों के रूप में, फिर श्वेत धुएं सा कोई बादल तैरता हुआ सा दीखता है, हाथ के चारों ओर नीले रंग की आभा के रूप में, सब कुछ कितना सुंदर लग रहा है, हवा, धरा, गगन और परमात्मा.. कल रात स्वप्न में ठोस वस्तु को देखते-देखते आकर बदलते देखा, स्वप्न कितने विचित्र अनुभव कराते हैं.  

कल शाम जून ने कहा शुक्रवार को वे कुछ सहकर्मियों को खाने पर बुलाना चाहते हैं, जबकि उसे होली पर या उसके बाद ही ऐसा करने का मन था, सो अपने मन की बात कही, कारण क्या था वह उसे स्वयं भी पता नहीं था, पर भीतर से यही आवाज आ रही थी कि शुक्रवार को ठीक नहीं रहेगा. आज सुबह जब जून को फोन आया कि उस दिन उन्हें बाहर जाना है तो बात स्पष्ट हो गयी, कोई अंतः प्रेरणा थी शायद. पिताजी की गर्दन में दर्द है, गर्म पानी की बोतल से सेंक करते-करते सो गये हैं, भोजन के लिए आवाज देने पर उठे नहीं. जून उनके लिए दर्द कम करने की दवा ले आये हैं. आजकल वे बैठे-बैठे भी सो जाते हैं, धीरे-धीरे चलते हैं और ज्यादा वक्त लेटे रहते हैं, शांत हो गये हैं. जीवन धीरे-धीरे सिमट रहा है, उन्हें देखकर ऐसा ही लगता है. टीवी देखना कम कर दिया है. दोपहर को जून के एक मित्र आये थे खाने पर, सदा की तरह देर से आये, जल्दी-जल्दी खाकर चले गये. इन्सान का स्वभाव बदलता कहाँ है, जैसे उसका मन..जो हल्की सी कसक, एक हल्का सा स्पंदन बना ही लेता है, लेकिन सद्गुरू कहते हैं पता तब ही चलता है जब कोई उसके पार हो जाता है. सूक्ष्म स्पंदन भी जब नहीं रहते, तब वह अचल, स्थिर सत्ता स्वयं को प्रकट करती है, वह स्वयं ही स्वयं को देख सकती है. आज ठंड काफी है, जून के आने के बाद वे भ्रमण के लिए जायेंगे. 

Monday, August 24, 2015

नीला नभ उजला पाखी


सेवा का जो इतना गुणगान किया गया है, वह यूँ ही नहीं है. आज बच्चों को उन्होंने अपना जो समय दिया वह कितना शांति प्रदायक रहा उनके स्वयं के लिए. गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में उन्होंने एक सेवा का प्रोजेक्ट लिया है. अभी तो यह शुरुआत है, धीरे-धीरे वे इसे और बढ़ाएंगे. कल रात को उसे नींद ही नहीं आ रही थी. शाम को वर्षा में भीगते हुए बच्चों के घर जाकर उन्हें बुलाने का दृश्य बार-बार आ रहा था हृदय पटल पर. गुरूजी लाखों लोगों को एक साथ लेकर कार्य करते हैं और शांत रहते हैं, इधर वे हैं कि छोटा सा भी कार्य उन्हें उद्वेलित करने को पर्याप्त है. उसे थोड़ी सी थकान का अनुभव हो रहा है, कल शाम दो घंटे और आज दो घंटे जो नया कार्य किया शायद उसके कारण, पर उसका मन बहुत शांति में है. आज सुबह बंद आँखों के सम्मुख गुरूजी का चेहरा अपने –आप ही आ रहा था, जैसे वह दूर से ही आशीष दे रहे हों. अभी नन्हे से बात हुई, वह यात्रा में हैं, परसों इस समय तक घर पर होगा, जून उसके और नन्हे के घर में..जब वह छोटा सा था तो वे तीनों एक साथ मिलकर कहा करते थे – ‘वे तीनों’. जून को कल बैंकाक जाना है उसके बाद सम्भवतः वे उनसे बात नहीं कर पाएंगे. आज भी मौसम सुहावना है, प्रकृति भी उनके साथ है, सभी कुछ धुला-धुला स्वच्छ है. भीतर भी कोई विचार नहीं उठ रहा. गुरू माँ कहती हैं जिसके मन में विचारों की दौड़ नहीं है वह मुक्त है. उसने प्रार्थना की, सद्गुरु का जन्मदिन मनाने का सौभाग्य उन्हें ऐसे ही मिलता रहे बरसों बरस,  वे स्वयं को जानने की तरफ कदम बढ़ाते रहें, भीतर प्रेम का दरिया बहता रहे और कविताओं के रूप में उसके मन के भाव प्रकट होते रहें, अहंकार का नाश हो !

उनकी स्वतन्त्रता का मोती चमकता रहे, साधना का यही तो लक्ष्य है. जहाँ बंधन है, वहाँ दुःख है, जब उन्हें अपनी सीमाओं का बोध होता है तो भीतर कैसी पीड़ा होती है, साधना के द्वारा वे वहाँ पहुँच जाते हैं, जहाँ कोई सीमा नहीं, कोई बंधन भी नहीं. आत्मा नित मुक्त है और वे आत्मा हैं, अनंत ऊर्जा और प्रेम का भंडार ! उनके भीतर प्रेम का दरिया अविरत रूप से बह रहा है, उनकी खुद की प्यास की तो बात ही क्या, वे अपने आस-पास भी एक सुंदर गुलिस्तां बना सकते हैं, उनके प्रेम की महक से जहाँ को महका सकते हैं. जो कार्य उन्होंने शुरू किया है उसे अवश्य ही जारी रखना होगा. आज सुबह साढ़े चार बजे नींद खुल गयी, नन्हे को फोन किया वह कोलकाता पहुंच चुका है. कल इस समय वह उसे लेने जाएगी, कल शाम को उसे कुछ देर के लिए अकेले रहना होगा, जब वह जन्मदिन के उत्सव में जाएगी. आज टीवी पर सुना कि वस्तु से ज्यादा महत्वपूर्ण है व्यक्ति, व्यक्ति से विचार, विचार से विवेक और विवेक से से भी ज्यादा महत्व परमात्मा का है, तो वह परमात्मा के लिए यदि व्यक्ति को कुछ देर के लिए छोड़ती है तो यह कत्तई गलत नहीं होगा. नन्हा इसे अवश्य समझेगा, बच्चे बड़ों से कई मामलों में अधिक विवेकी होते हैं. उपरोक्त बात सुनकर उसे अपने द्वारा की गई व्यक्ति की उपेक्षाएं स्मरण तो आयीं पर कारण वस्तु कदापि नहीं था, परमात्मा ही था, ध्यान, सत्संग ही वे कारण थे.

वर्षों पूर्व उसने अपनी एक डायरी के कवर पर लिखा है – “नीलवर्णी स्वच्छ गगन में विचरते श्वेत वर्णी पक्षी के उज्ज्वल पंखों की आभामयी ज्योति उसके मन को प्रकाशित कर दे”.. और उसकी वह पुकार अनसुनी नहीं गयी. गुरूजी कह रहे हैं भयरहित होने के चार कारण हो सकते हैं, अहंकार, घृणा, प्रेम और ज्ञान. रावण अहंकारी था, उसकी निडर अवस्था में जड़ता है पर ज्ञानी सबको सरंक्षण देता है, उसमें एक मस्ती होती है. थोडा बहुत भय यदि किसी के भीतर रहे तो वह अहंकारी होने से बचा लेता है, प्रकृति उनका बचाव करने के लिए भय देती है. आज ही उत्सव है, शाम को सत्संग तथा भोजन का आयोजन किया गया है. उसे बारह बजे नन्हे को लेने जाना है, अभी साढ़े नौ बजे हैं. भोजन बनाना है, तैयार होना है. सुबह ध्यान नहीं कर पायी, फोन आते रहे, बाहर से फूल तोड़े, नन्हे का कमरा ठीक किया. रास्ते में ध्यान कर लेगी, नैनी ने कहा है वह भी जाएगी, तब तो शायद बातचीत भी होती रहे. एक दक्षिण भारतीय सखी ने फोन किया वह बहुत उत्साहित थी. आज ‘बुद्ध पूर्णिमा’ भी है, गोयनका जी के साथ ही थोड़ी देर ध्यान हो जायेगा. ध्यान उसके जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है, परमात्मा तब स्वयं आते हैं उससे बातें करने, वे क्या सोचेंगे, इसके पास सारी दुनिया से बातें करने के लिए समय है पर मेरे साथ बातें करने के लिए वक्त की कमी पड़ गयी. सद्गुरु ने आज बताया कि जिस क्षण यह पूर्ण विश्वास हो जाता है कि एक माँ को जैसे बच्चे की फ़िक्र रहती है, उसी तरह परमात्मा को उसकी फ़िक्र है, वह उससे वैसे ही प्रेम करता है तो जीवन में कोई दुःख नहीं रहता, प्रेम ही प्रेम भर जाता है, सद्गुरु भी उनकी चिंता करते हैं !