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Wednesday, October 28, 2015

कान्हा और राधा


क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, कोई कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करे, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो सम्भवतः वहाँ तक भी नहीं ले जाते, जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है आत्मा का, वहाँ कुछ भी नहीं है न कोई दृश्य न द्रष्टा, न कोई ध्वनि न प्रकाश, केवल शुद्ध चैतन्य, वहाँ कोई भाव भी नहीं, अभाव भी नहीं..वहाँ शुद्ध चेतना अपने-आप में है, बस वह परमात्मा में है या कहें वही परमात्मा भी है. उस क्षण दोनों एक हो जाते हैं और जब वही चेतना मन, बुद्धि के साथ जुड़कर संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है. आज सदगुरु ने नारद भक्ति सूत्र पर आगे बोलना शुरू किया, कितना सरल है उनसे गूढ़ शास्त्रों का अध्ययन करना, जो लोग उनके सम्मुख बैठे थे, वे कितनी तृप्ति का अनुभव करते होंगे. इस जन्म में उसके भाग्य नहीं हैं कि निकट से वह ज्ञान ले, पर टीवी के माध्यम से से ही सही उसका जीवन हर दिन उच्च होता जा रहा है. परमात्मा अपनी कृपा हर पल बरसाता है और अब उसे उस कृपा को समेटना भी आने लगा है, भीतर की प्रसन्नता का अनुभव अब अन्यों को भी लाभ देने लगा है, सभी जगें यही तो सद्गुरु की कामना है !

जीवात्मा में कारण शरीर, तेजस शरीर तथा आत्मा तीनों होते हैं. मृत्यु के समय तीनों स्थूल शरीर को छोड़ देते हैं तथा कारण शरीर में जो कर्मों का लेखा जोखा होता है उसी के अनुसार नया शरीर मिलता है. उसका अगला जन्म अवश्य ही किसी संत के करीब ही होगा, संतों के प्रति उसके मन में सहज स्वाभाविक प्रेम जो है. आज सद्गुरु ने होली का महत्व बताया. होली के एक दिन पहले भगवान शिव ने कामदेव को जलाया था होलिका भी जलकर राख हुई थी अर्थात उन्हें कामनाओं को दग्ध करना है, द्वेष को जलाना है तथा घर में जो भी टूटा-फूटा पुराना सामान है उसे भी जलाना है ताकि नये वर्ष में नया जीवन मिले. फागुन के बाद चैत्र का महीना नये साल का पहला महीना ही तो है. दूसरे दिन सभी खुश होते हैं तथा रंगों से एक-दूसरे को नहलाते हैं ! कल होली है उसे सभी के लिए कुछ लिखना है, दो-दो पंक्तियाँ ही सही, ऐसा कुछ जो उन्हें गुदगुदा जाये. उनका नया कमरा बन कर तैयार हो गया है, जून उसके लिए एक पेपर पर नाम भी लिख कर लाये हैं, सतनाम ध्यान कक्ष अगले हफ्ते वे उसे सजायेंगे जैसे कि उसने पहले कल्पना की थी. आज उसके लिए कार्पेट का आर्डर देने तिनसुकिया जाना है, उसकी पुस्तक का काम भी आगे बढ़ रहा है. जून उसकी पूरी सहायता कर रहे हैं, उस दिन के उसके रोष का असर हुआ है.


पिछले तीन-चार दिन व्यस्तता में बीते, पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करके जून ले आये हैं. लेख का कार्य भी हो गया है, अब शेष है नये कमरे को सजाने का कार्य जो आज सम्भवतः हो जायेगा जब कारपेट आ जायेगा. उसकी साधना भी कम हुई पर नीरू माँ कहती हैं कि क्रिया और पदार्थ दोनों के बिना ही ज्ञान को हृदय में धारण करने से ही परम तत्व की प्राप्ति हो जाती है. सदा यह याद रहे कि वह आत्मा है, मन, शरीर व् बुद्धि नहीं है. आत्मा का गुण है शांति, जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि आत्मा में स्थिति है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना तथा मन, बुद्धि आदि में यदि कोई हलचल हो भी तो उसे साक्षी भाव से देखने भर से ही वह हलचल जैसे उत्पन्न हुई थी वैसे ही नष्ट हो जाती है. आत्मा में सारे ही गुण हैं, जहाँ प्रेम है वहाँ किस बात की कमी हो सकती है ? संसार के सुख जिसे फीके लगते हैं उसे ही इस आत्मा की प्राप्ति होती है, सद्गुरु की कृपा से ही उसे यह अमूल्य धन प्राप्त हुआ है और परमात्मा की कृपा से ही सद्गुरु जीवन में आते हैं ! नये कमरे के लिए काफी पहले जून एक सुंदर मूर्ति लाये थे, वह कृष्ण उसके ध्यान कक्ष में राधा के साथ विराजमान हैं, उसमें उसने प्राण प्रतिष्ठा की है अब वह जीता-जागता है, जड़ नहीं है, वह सदा उनके साथ है. सद्गुरु की मुस्कुराती हुई तस्वीर भी इस कमरे की शोभा बढ़ा रही है, उन्हें देखकर चेहरे पर अपने-आप ही मुस्कान आ जाती है, वह भी उनके साथ हैं. मीठी-मीठी गुंजन जो उसके दायें कान से सदा सुनाई देती है, उन्हीं का पता बताती है.