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Tuesday, November 27, 2018

गैस भरा गुब्बारा



कल रात्रि वे बारह घंटों से भी कुछ अधिक लंबी हवाई यात्रा के बाद बंगलूरू पहुंचे. कोलकाता में काफी देर रुकना पड़ा. नन्हा उन्हें लेने आया था. घर पर दोनों ननदों के बच्चों ने स्वागत किया. इस समय दोपहर का लंच तैयार है, दोनों भाई-बहन किसी संबंधी के यहाँ गये हैं. वे दोनों नन्हे के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल रात्रि विचित्र स्वप्न देखा. जिस जगह पर कोई सोता है, उस स्थान का असर भी स्वप्नों पर पड़ता है. हर जगह का वातावरण भिन्न प्रकार की ऊर्जाओं से भरा होता है. एक स्वप्न में देखा, गुब्बारा फुलाने की एकल प्रतियोगिता हो रही है. नारंगी रंग का एक गुब्बारा उसके पास भी है, जो सबसे ज्यादा फूल जाता है. उसका गुब्बारा सबसे बड़ा है पर गाँठ नहीं लगी थी. एक बच्चा जीत जाता है, तभी विजेता के लिए एक बहुत बड़ा हॉट एयर बैलून हवा में छोड़ा जाता है. जो पहले ऊपर जाता है, फिर किसी ऊंची मंजिल पर स्थित घर से टकरा जाता है. वहाँ कुछ टूट-फूट भी होता है. रंग, रौशनी और उत्सव का स्वप्न अंत में विनाश पर समाप्त होता है. एक स्वप्न में सड़क पर नृत्य करते युवा दिखते हैं.

सुबह पांच वे बजे उठे, पांचवी मंजिल से उतरकर नीचे टहलने गये भी गये. हवा ठंडी थी और झूमते हुए फूल मोहक प्रतीत हो रहे थे. साढ़े नौ बजे अस्पताल गये, लौटते-लौटते तीन बज गये. जून के पैर में आज प्लास्टर लग गया है. अब उन्हें दो हफ्ते बाद फिर से अस्पताल जाना है. जहाँ पुनः एक्सरे होगा तथा पता चलेगा प्लास्टर कब काटा जायेगा. यहाँ मौसम अच्छा है, शीतल पवन लगभग दिन भर बहती रही. शाम हो गयी है, नीचे से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही हैं.

आज उन्हें यहाँ आये चौथा दिन है. अभी-अभी वह बच्चों के साथ नीचे टहलकर आई है. सभी ने मिलकर योगाभ्यास भी किया. जून को प्लास्टर के कारण अभी तक तो ज्यादा परेशानी नहीं हो रही है. बड़े भांजे को अगले हफ्ते नौकरी ज्वाइन करनी है. दो हफ्ते तक कंपनी का घर मिलेगा फिर अपने लिए वहीं आसपास कोई घर खोजेगा. आज भांजी भी नौकरी के लिए ऑन लाइन आवेदन पत्र भर रही है. कम से कम सौ जगह आवेदन करेगी तो दो-तीन जगह से जवाब मिलगा. नौकरी मिलना इतना आसान नहीं है. देश भर से बच्चे अपनी किस्मत आजमाने बंगलूरू आते हैं आजकल. नन्हा आज जल्दी घर आ रहा है. रसोइये ने लौकी व बड़ी की सब्जी बनाई है. जून द्वारा किसी बात पर टोके जाने पर उसे अपनी नकारात्मकता आज सुबह स्पष्ट दिखाई दी. पुराने संस्कार घाव की तरह होते हैं, जो हल्की सी चोट लगने से ताजा हो जाते हैं. साधना के द्वारा उन्हें पूरी तरह नष्ट करना होगा !

सुबह के साढ़े दस बजे हैं. इस समय घर में चहल-पहल है. भांजी घर वापस जाने के लिए तैयार है. भांजा अपना नियुक्ति पत्र लेने के लिए पोस्ट ऑफिस से होकर आया है. नन्हा भी काम पर जाने के लिए तैयार है. जून सुबह का सब कार्य निपटा कर सोफे पर अपनी निश्चित जगह पर बैठे हैं. रसोईघर से तरह-तरह के मसालों की ख़ुशबू घर में फ़ैल रही है. मोबाईल पर आचार्य सत्यजित सां ख्य दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं. यहाँ नेट की स्पीड काफी तेज है, बिना रुके ही यू ट्यूब पर वीडियो चलता है. नन्हे की मित्र दांत के डाक्टर के पास गयी है. उसकी जॉब पक्की हो गयी है. वह बहुत सन्तोषी है और सबका ध्यान रखने वाली है. उसके चाचा की कुछ माह पहले मृत्यु हो गयी, उसी के बारे में जो बातें उसने बतायीं, उससे पता चला उसे परमात्मा पर पूर्ण विश्वास है. आज मौसम अच्छा है, न ठंड न गर्मी. इसी बात के लिए तो बंगलूरू प्रसिद्ध है. दिन भर जैसा मौसम है, रात को भी वैसा ही रहता है.   


Friday, November 16, 2018

फूलों की पौध



शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वह ध्यान कक्ष में बैठी है. हल्की सी गंध आ रही है. अब पता नहीं यह गंध कहाँ से आती है, क्यों आती है ? यह कोई रोग है या अस्तित्त्व का प्रसाद...जैसे जो धुन सुनाई देती है वह कोई..सब कुछ एक रहस्य में डूबा हुआ है. आज गैराज से लेकर पीछे के गेट तक का रास्ता बन गया है, काफी टूट-फूट गया था. शायद कल माली कमल कुंड को ठीक करेगा, जिसमें आजकल पानी ठहरता नहीं है, शायद किनारे की दीवार में कोई दरार आ गयी है. नन्हे का फोन जो माह के प्रथम दिन खो गया था, आज मिल गया है. कल उसकी मित्र से बात की. उसने अपने घर में बता दिया है पर वहाँ से कोई जवाब नहीं आया है. आजकल वह नया जॉब भी खोज रही है. जून आज स्टार्टअप इंडिया की मीटिंग में भाग लेने गये हैं, वह कितने सरे कार्यों से जुड़े हुए हैं. उनको इस तरह काम करते देखकर बहुत अच्छा लगता है. आज बहुत दिनों बाद ‘श्रद्धा-सुमन’ ब्लॉग में पोस्ट प्रकाशित की. ‘सिया के राम’ में राम का महाप्रस्थान आज होने वाला है.! सुबह टहलने गयी, ज्ञान, भक्ति तथा कर्मयोग पर चिन्तन करते हुए प्रातः भ्रमण किया. परमात्मा उन्हें कितना प्रेम करता है. उसकी कृपा का अनुभव हर पल होता है ! एक सखी से बात की, छोले-भटूरे बना रही है, दही-बड़े भी जन्मदिन पर !

आज मृणाल ज्योति गयी. महीनों पहले जो स्वप्न देखा था, उसे साकार करने अर्थात टीचर्स के लिए एक वर्कशॉप करने का स्वप्न अंततः सम्पन्न हो गया. जिसका बीज उस दिन पड़ा था जब एक अध्यापक अपनी समस्या लेकर आया था. सभी ने उत्साह से भाग लिया. सुबह पौने नौ बजे वह गयी थी और दोपहर बाद चार बजे लौटी. वापसी में नर्सरी से फूलों की पौध भी ली. कैलेंडुला, कॉसमॉस, डहेलिया, स्टॉक और वरबीना के फूलों से उनका बगीचा अवश्य सुंदर लगेगा. माली कल सुबह लगाएगा. नन्हे से बात हुई, वह अगले हफ्ते जोधपुर व जयपुर जा रहा है, एक मित्र के विवाह में. अगले वर्ष वह भी विवाह बंधन में बंध जायेगा अगर अल्लाह ने चाहा तो..जो भी होगा अच्छा ही होगा. बाल दिवस पर दिगबोई जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए कुछ स्कूलों में बैज बांटने है. जब वे समाज के लिए कुछ काम करते हैं तो भीतर जिस शांति का अनुभव होता है, वह अनोखी है.

जून का आज शाम को लगभग चार बजे गोहाटी में छोटा सा एक्सीडेंट हो गया. जहाँ पुल समाप्त होता है, वह सड़क पार करने वाले थे, सामने आ रही बस काफी दूर थी, तभी पीछे से एक मोटरसाईकिल आ गयी और वह टकरा कर गिर गये. उनका चश्मा व फोन दोनों टूट गये. कान के पास चोट लगी, एक टांका लगा है तथा पैर में भी चोट आई है घुटने के नीचे. फ्रैक्चर नहीं है, वह किन्हीं अज्ञात लोगों की सहायता से एक क्लीनिक में पहुंचे, जहाँ प्राथमिक चिकित्सा दी गयी, फिर अस्पताल आये. याद नहीं पड़ता पहले कभी उन्हें इस तरह अस्पताल में रहना पड़ा हो. नन्हे से उनकी बात हुई है, वह कल गोहाटी आ रहा है. मना करने कर भी उसका मन नहीं मान रहा. अभी-अभी जून से बात हुई. डाक्टर साहब देखने आये हैं. उनके दो मित्र वहीं बैठे हैं जो रात को वहीं रहने वाले हैं. जीवन में जो भी परेशानी आती है वह कुछ न कुछ सिखाने के लिए ही आती है. उस दिन ग्रे रंग से बात शुरू हुई और उन्होंने ने गोहाटी में उसी रंग की पेंट सिलने दे दी. उसी को लेने गये थे जब यह दुर्घटना हुई. वैसे वह आवाज से ठीक लग रहे हैं. परसों घर आ जायेंगे. कुछ दिन आराम करेंगे तो ठीक हो जायेंगे, चश्मा नया बनवाना पड़ेगा.

Tuesday, October 10, 2017

लाल और काले शहतूत


कल सुबह एक स्वप्न देखा, वह गुलाम भारत के एक शहर में (वर्तमान पाकिस्तान) किसी शायर की बेटी है. एक कमरा है जिसका दरवाजा दाहिनी तरफ खुलता है तो घर के भीतर जाता है और बायीं तरफ का बाहर, जहाँ पिता खड़े हैं, उनके हाथ में कोई पुस्तक है. कमरे में पाँच-छह वर्ष का बालक( शायद उसका भाई) गेंद से खेल रहा है, तभी वह कमरे में आती है. उसके केश छोटे कटे हैं, चेहरा बिलकुल अबके जैसा ही है, लम्बी है, फ्रॉक पहने हुए है, आकर वह भी उस बच्चे के साथ खेलने लगती है. उम्र चौदह-पन्द्रह होगी. स्वप्न में देखते ही उसने खुद से कहा, अरे, यह तो वह है ! एक और स्वप्न में एक वृद्ध महिला किसी परिचिता के बारे में कुछ बता रही है, जो अशोभनीय है सो वह स्वयं से कहती है, क्या उसे गॉसिप करना भी भाता है  ! आज सुबह उठी तो फिर वही वाक्य याद आया, “उसके जीवन में सब झूठ है”. सत्य तो वही है जो सदा रहता है, जीवन तो प्रतिपल बदलता रहता है, फिर झूठ ही हुआ. आज बहुत दिनों बाद बगीचे में काम करवाया, एक वीडियो भी बनाया. बगिया में ठन्डक थी, सब कुछ धुला-धुला सा था, सफाई भी हो गयी और पौधों को सहारा भी मिल गया. शाम को स्कूल के वार्षिकोत्सव में जाना है, और कल देहली जाना है. फेसबुक पर आस्ट्रेलिया की तस्वीरें पोस्ट कीं आज भी. कोई नई कविता नहीं लिखी कई दिनों से, काव्य श्रंखला पर लिखने वाली कवयित्रियाँ रोज एक नयी कविता ले आ रही हैं. जीवन एक झूठ है एक भाव यह भी है कि उसने कई कविताएँ बाह्य आलम्बनों से प्रेरित होकर लिखी हैं, बहुत सी भीतरी से भी, पर बाहरी आलम्बन से रची कविता स्वतः स्फूर्त नहीं कही जा सकती. काव्य तो उसे ही कहा जा सकता है जो अंतर्मन की गहराई से स्वयं ही प्रकट हो. 

कल सुबह वे उठे तो वर्षा थमी हुई थी पर लॉन में व सड़क पर पिछली रात आये तूफान और ओलों की वर्षा के चिह्न स्पष्ट नजर आ रहे थे. वे सवा ग्यारह बजे दिल्ली जाने के लिए हवाईअड्डे के लिए रवाना हुए और शाम सवा सात बजे अस्पताल पहुँच गये. भाभी से पहले भाई से मिले, वह दुबले लग रहे थे. भाभी का चेहरा भी छोटा सा लग रहा था, अधर सफेद लग रहे थे, उन्हें देखकर मन रुआँसा हो गया. दिल की बीमारी के कारण उन्हें काफी दुःख झेलना पड़ा है. आज सुबह एंजियोग्राफी हो गयी है, सम्भवतः परसों आपरेशन होगा. यहाँ आज मौसम गर्म है. दोपहर दो बजे बड़ी भांजी अपनी बेटी को लेकर मिलने आएगी. उसकी बिटिया दुबली-पतली है, खूब गोरी और चंचल, बचपन में भांजी बिलकुल ऐसी लगती थी. छोटी बहन भी आई है, जो इस समय कहीं बाहर गयी है. जून अपने दफ्तर के काम से गये हैं, दोपहर तक लौटेंगे. परसों वापस लौटना है. कुछ देर पहले पिताजी व सभी भाई-बहनों, भाभियों से फोन पर बात की. शाम को फिर अस्पताल जाना है. वे मंझली भाभी के यहाँ ठहरे हैं, घर जैसी ही सुविधा है. मंझली भाभी के कंधों पर बहुत काम आ गया है, पर परिपक्वता का परिचय देते हुए वह सब संभाल रही है. बड़ी बहन के लिए पूरी तरह समर्पित. उसने उनके शीघ्र स्वास्थ्य के लिए भगवान से प्रार्थना की.


आज प्रातः भ्रमण के लिए गये तो पिछले गेट के बाहर ही शहतूत के पेड़ से पके हुए लाल व काले शहतूत गिरे देखे. कुछ वापसी में उठाये भी. कल शाम छोटा भाई भी अपनी बड़ी बेटी के साथ अस्पताल आया. मंझले भाई से अब उसकी खूब पटती है. भाभी पहले से ठीक लग रही थीं. सभी के भीतर सच्चा स्नेह देखकर मन संतुष्ट है. आज महरी नहीं आई तो किसी अन्य को बुलाया, नाम है मुस्कान, हंसमुख है. भाई ने कहा है वे लोग शाम को पाँच बजे के बाद ही अस्पताल आयें, वे जल्दी लौट भी आएंगे. भाभी जितना आराम करेंगी उतना ही अच्छा है.  

Thursday, May 18, 2017

स्कैवश की सब्जी


आज नन्हा आ रहा है, वर्षा सुबह से ही हो रही है. पौने दस बजने को हैं. उसे अस्पताल जाना है. पिताजी की पीठ में दर्द बढ़ गया है. चार-पांच चम्मच से ज्यादा दूध एक साथ नहीं पी पाते, बात करने में उन्हें दिक्कत हो रही है. आँखें कुछ कहना चाहती हैं पर उनमें देर तक देखने से एक शून्यता ही नजर आती है. ज्यादा देर आंख भी नहीं खोल पाते. दोनों बहनों को यहाँ आने के लिए जून ने कहा है, पता नहीं भविष्य में क्या छिपा है. सुबह आँख खुली उसके पूर्व ही नींद खुल गयी थी. अपना आप जिसे बड़े गर्व से पाला पोसा था था यानि अहंकार अपने त्याज्य रूप में सम्मुख आया, उसे भीतर की अग्नि में भस्म कर दिया. अब भीतर जो भी बचा है वही रखने योग्य है, वही पाने योग्य है, वही रखने योग्य है, वही है ही, उसके सिवा जो भी है वह अशोभनीय ही है, वास्तव में वह है ही नहीं. अच्छा हो या बुरा उस एक की सत्ता के सिवा जो भी है वह माया ही है. वह हर तरफ है, हरेक में है और स्वयं में भी है, उस एक की ही सत्ता है. जीवन रहते जिसे इस राज का पता चल जाये वही प्रेम का रस अनुभव कर सकता है. प्रेम जिसे सभी तलाश रहे हैं पर अहंकार जिसमें बाधा बन जाता है. अहंकार की आँख से उसका विकृत रूप ही दिखाई देता है, वह उन्हें जाने कितने-कितने उपायों से अपनी ओर बुलाता है. वे ज्ञान का अभिमान भरे उससे दूर ही रहते हैं.  

कल दोपहर समय से नन्हा पहुँच गया, वह भूल से किसी दीमापुर के यात्री का बैग ले आया था. कल एअरपोर्ट जाकर उसे अपना बैग लाना है. बंगाली सखी ने बताया उसकी  बिटिया ने अपना जीवनसाथी चुन लिया है. नन्हा रात को अस्पताल में रहा, सो रहा है इस समय. सुबह जून ने पिताजी को हरिओम कहा तो उसका जवाब दिया, इसका अर्थ हुआ वह सुन पा रहे हैं और समझ भी रहे हैं. लेडीज क्लब का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया जा रहा है, आज शाम को केक कटेगा और परसों शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा. उसका जाना संभव नहीं हो पायेगा. कल शाम उसे प्रेस जाना था, वापस आई तो नन्हे ने भोजन बना दिया था, आलू+करेले तथा आलू+स्कैवश की सब्जियां, उसने आटा भी सान दिया था. सब्जी काटना भी उसे आता है.


पिताजी आज पहले से बेहतर हैं, आम खाया तथा दाल का पानी पिया. नन्हा आज रात वहीं सो रहा है. वह बहुत समझदार हो गया है और मेहनती भी, खाना भी बहुत अच्छा बनाता है, उसका भविष्य उज्ज्वल है. आज बड़ी ननद की मंझली बेटी का विवाह है, सभी वहाँ पहुँच गये हैं. कल रात एक स्वप्न देखा, ( अभी तक स्वप्नों से मुक्ति नहीं हुई है) जिसने अहसास दिलाया कि भीतर अनंत ऊर्जा है, उन्हें उसका सदुपयोग करना है, वह दुधारी तलवार की तरह है, वही करुणा बन सकती है, वही कठोरता का बाना पहन सकती है. वही प्रेम का पुष्प बन सकती है और वही वासना का कीचड़ बन सकती है. वही शुद्धता, शुभता बन सकती है और वही कुटिलता, छल, पाखंड बन सकती है. परमात्मा कितना दयालु है, वह सभी को तारने के लिए उत्सुक है. उनके संस्कार व प्रमाद उन्हें बार-बार नीचे ले जाता है पर वह असीम धैर्यशाली है, प्रेमस्वरूप है, वह बार-बार मौका देता है. कांटे वे स्वयं चुनते हैं, वह तो पुष्प ही बाँट रहा है. आनन्द लुटा रहा है, वे अपनी झोली में कंकर पत्थर भरे बैठे हैं तो वह क्या करे, फिर भी वह थकता नहीं, लुटाये ही चले जाता है, असीम ऊर्जा का स्रोत है उसके पास !   

Tuesday, May 16, 2017

आम का मौसम


पिताजी पिछले कई हफ्तों से अस्वस्थ तो थे ही, अब उन्हें डिमेंशिया की समस्या भी हो गयी लगती है. समय का पता नहीं चलता उन्हें और अपने रोजमर्रा के काम करने में भी कठिनाई होती है. इस समय सो रहे हैं, दोपहर को उन्हें उठाया, पानी चाय, नाश्ता आदि दिया, दवा दी, फिर सो गये. प्रकृति  का यह नियम है जैसे एक चक्र पूरा हो रहा है. बूढ़ा फिर से बच्चा बन गया है, दीन-दुखिया से बेखबर..अपनी ही दुनिया में खोया हुआ. आज ‘मृणाल ज्योति’ की बीहू मंडली आने वाली है. पाँच बजे का समय दिया था पर अब तो साढ़े पांच हो गये हैं, किसी भी क्षण आते होंगे. जून आज दिल्ली गये हैं, दोपहर उनके जाने के बाद फिल्म देखी, ‘धूल का फूल’, नाम सुना था. पहले कभी देखी नहीं थी. महिलाओं पर अत्याचार न जाने कितने युगों से होते आये है. उन्हें इसके खिलाफ आवाज उठानी ही होगी, उसने भी उठायी थी अपने स्तर पर, आज आजादी का अनुभव भी होता है. कोयल के कूकने की आवाज आ रही है, आमों का मौसम है, कच्ची केरियों से पेड़ भरे हैं. उसने बाहर देखा, अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था, पर भारत में समय की कीमत कहाँ पहचानते हैं वे लोग !
सुबह शीतल थी, भ्रमण को गयी, लौटकर पिताजी को उठाया, सहायक को बुलाकर स्नान आदि कराया. नाश्ता दिया पर वे पचा नहीं सके, दोपहर तक वे अस्वस्थ ही रहे, उन्हें बेल का शरबत दिया जिसके बाद से वे ठीक रहे. जून के फोन आते रहे, दोनों ननदों के फोन भी आये. बच्चों की तरह हो गये हैं वे, फुसला कर खिलाना पड़ता है उन्हें.

पिताजी को पुनः अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल रात को उन्हें शुभरात्रि कहने के बाद से कई बार उनके कमरे में गयी, उनके पास जाकर आवाज दी पर उन्हें कुछ पता नहीं था. सुबह चार बजे के लगभग वह उठ गयी थी, टहलने गयी पर वापसी में एक विचार आया कहीं पिताजी उठ न गये हों, जल्दी-जल्दी लौटी तो वह वैसे ही आराम से सोये थे. धीरे-धीरे उनकी चेतना भीतर सिकुड़ती जा रही है, स्वाद का भी पता नहीं चलता और न ही प्राकृतिक वेगों का. कल से नैनी कितनी चादरें व वस्त्र धो चुकी है. वृद्धावस्था का यह काल शायद सभी को देखना पड़ता है. जून जब दिल्ली से वापस आये तो उनकी हालत देखकर तुरंत ही डाक्टर को फोन किया और उन्हें अस्पताल ले गये.

पिछले दो दिन उसके सिर में दर्द बना रहा, मन भी ठीक नहीं रहा, तन के स्वास्थ्य पर मन का स्वास्थ्य निर्भर करता है. आज सुबह प्राणायाम के बाद ध्यान में चाय का कप दो बार दिखा. पिछले दिनों दिन में दो बार चाय पी, अम्लता बढ़ गयी थी, सो कल से नहीं पी रही है, मन भी अपेक्षाकृत ठीक है. परसों नन्हा यहाँ आ रहा है. जून आज चौथे दिन भी अस्पताल में सोने गये हैं, कल से सहायक आ जायेगा जो कुछ दिनों से बाहर गया हुआ था. पिताजी का स्वास्थ्य सुधर रहा है, पर जब तक खुद चलने-फिरने लायक नहीं हो जाते घर नहीं आ पाएंगे. उसे अपना स्वास्थ्य भी पहले सा नहीं लग रहा है. उसके भीतर के भय और अन्य विकार भी स्पष्ट दिखने लगे हैं, जैसे कोई आपरेशन  चल रहा हो, सब कुछ निकाल कर स्वच्छ करना हो मन को ताकि परमात्मा अपनी पूरी गरिमा के साथ प्रकट हो सके.     


Tuesday, February 21, 2017

मन का विश्राम


कल शाम जून आ गये और जीवनधारा पूर्ववत् बह निकली है. आज दीदी की एक पोस्ट पढ़ी, अच्छी है. अभी कुछ देर में बच्चे पढ़ने आ जायेंगे, कल से एक नई छात्रा भी आएगी, उसने सोचा, देखें, कितना सीखती है. कल रात नन्हे से बात हुई. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर वह अपनी कम्पनी के सभी लोगों को लेकर कूर्ग जा रहा है. उसी ने सारा कार्यक्रम ठीक किया है, होटल, बस आदि सभी कुछ, जोश से भरा था वह, काश उसके मन में दान का भाव भी जागे ! आज फोन ठीक हो गया, कई ब्लॉग्स पर टिप्पणी लिखीं. शाम को एक सखी से मिलने जाना है, उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, स्वास्थ्य मन  के भावों पर बहुत निर्भर करता है. रोग भी उनकी नासमझी का ही परिणाम हैं, हर दुःख उनका ही बुलाया हुआ होता है .मन खाली रहे तो ज्यादा अच्छा है बजाय इसके कि व्यर्थ का चिन्तन चलता रहे. खाली रहेगा तो उस परमशक्ति से जुड़ा रहेगा..शक्ति से भरा रहेगा, लगातार भरता रहेगा...

आज जन्तर-मन्तर पर अन्ना हजारे का अनशन चल रहा है, एक दिन का सांकेतिक अनशन, संसद में लोकपाल बिल पर बहस चल रही है. मौसम अपेक्षाकृत ठंडा है, कल चंद्रग्रहण था. आज पूर्ण चन्द्र अपने पूरे सौन्दर्य के साथ खिला है. माँ को अस्पताल में रहते एक महीना हो गया है, डाक्टर कह रहे हैं, आपरेशन करना पड़ेगा, कल जून डिब्रूगढ़ जायेंगे. टीवी पर ओशोधारा आ रहा है. गुरू की स्मृति में जीना साधक के लिए बहुत आवश्यक है, सद्गुरू की कृपा से ही उसे भी निराकार का आभास हुआ है. कर्मों का बंधन गुरू से नाता जुड़े बिना नहीं खुलता. नाम से प्रीत होने पर संसार की चाह नहीं रहती, नाम ही उन्हें अपने अंतर आकाश में ले जाता है.  

कल माँ को डिब्रूगढ़ ले गये हैं. दोपहर एक बजे वह अस्पताल से लौटी, पिताजी और जून वहीं हैं. सुबह माली आया था, जब उसने कहा, आज वह पूर्व कहे अनुसार गमलों पर रंग नहीं करेगा तो एक क्षण के लिए भीतर क्रोध उठा, पर जरा भी नहीं भाया और तत्क्षण विलीन हो गया, यानि कि अभी भी अहंकार बना ही हुआ है. ध्यान साधना नियमित करनी होगी, अभी मंजिल बहुत दूर है लेकिन उसका पता तो चल गया है. जून ने कल दस बजे गाड़ी का प्रबंध किया है, वह भोजन बनाकर ले जाएगी, साथ ही कुछ जरूरत का सामान भी ले जाना है.

तीन दिन वहाँ रहकर जून माँ को वापस ला रहे हैं, पता नहीं उन्हें अभी यहाँ के अस्पताल में फिर कितने दिन रहना होगा. यह वर्ष खत्म होने को है, नये वर्ष के कार्ड्स भेजने हैं. कल क्रिसमस के लिए  कविता लिखी, आज टाइप की है, उसमें कुछ चित्र भी लगाने हैं, फिर वे सभी को भेजेंगे. आज छोटे भाई की बड़ी बिटिया का जन्मदिन है, और यहाँ भी एक मित्र का. जून आने वाले हैं, वह माँ-पिताजी के लिए दोपहर का भोजन ले जायेंगे. अभी-अभी उसने फोन उठाया कि भतीजी का नंबर भाभी से मांगे, पर जैसे ही फोन उठाया पहला नंबर उसी का था, यह चमत्कार ही तो है और कुछ देर पहले आग पर कढ़ी रखी थी, उबलकर गिरने ही वाली थी कि उसने बिना किसी कारण पीछे मुड़कर देखा. कोई है जो उसके साथ-साथ है. वह परमात्मा सदा उनके साथ है. भीतर कोई न रहे तभी वह आता है. वे कंकड़-पत्थर लिए रहते हैं और हीरे को अनदेखा करते रहते हैं, एक खेल चलता रहता है जीवनभर, कई बार तो सत्य आ आकर दूर चला जाता है, छिटक जाता है..


पिछले दस दिनों से डायरी नहीं खोली. यह वर्ष जाने को है. तीन दिन के बाद नया वर्ष आने वाला है, भीतर एक नया उत्साह और जोश जग रहा है. कुछ विशेष करना है इस नये साल में. परम जो कराए..उसके हाथ में स्वयं को सौंप दिया है, सौंपने वाला भी तो वही है..और कोई नाम सोच रही है अपने ब्लॉग के लिए..मन को जब विश्राम मिलता है तो भीतर ऊर्जा प्रकटती है उसे विसर्जन करना है, बाँटना है, लुटाना है, ऐसे ही भाव से युक्त या नवसृजन की बात करता हुआ नाम, वर्ष दर वर्ष विकास होता रहे मन का, बुद्धि व संस्कारों का का भी, चेतना का भी तभी मानव होने का अर्थ है अन्यथा वहीँ के वहीं रह गये तो जीवन कौड़ियों के मोल बेचने जैसा ही होगा. समाज के लिए और कुछ नहीं कर पायी तो शब्दों के माध्यम से प्रेरित करने का काम तो सहज ही हो सकता है. परमात्मा उससे यही कराना चाहते हैं. 

Wednesday, February 8, 2017

पहाड़ी पर घर


कल रात को एक और स्वप्न..मन न जाने कितने गड्ढे, कितने गहरे तल छिपाए है और अवचेतन मन न जाने कितना व्यर्थ भी अपने में समाये है. वासना और कामना, लोभ और अहंकार सभी के बीज भीतर हैं ही..यहाँ हर व्यक्ति अपने भीतर एक गहरा कुआँ समोए है और एक अनंत आकाश भी. वे जो अन्यों की तरफ ऊँगली उठाते हैं पहले अपने भीतर झाँक कर देखना चाहिए. एक मन जिसने जान लिया, सारे मन उसने जान लिए. यहाँ सभी एक ही कीचड़ से उपजे हैं और कमल बनने की सभी को छूट है. लोगों का आपस में मिलना अकारण नहीं है, न जाने कितने जन्मों में वे एक दूसरे के मान-अपमान का सुख-दुःख का कारण बने हैं. कितनी बार उन्होंने फूल भी उगाये हैं और कांटे भी. माँ की हालत बिगड़ती जा रही है, उनका मस्तिष्क अब साथ नहीं दे रहा है, पिताजी बहुत परेशान रहने लगे हैं.

पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. परसों सुबह एक सखी के यहाँ आयोजित धार्मिक उत्सव में भाग लेने वह मोरान गयी थी, शाम को लौटी, उसी दिन माँ बिस्तर से उठकर बाथरूम जाते समय चक्कर आने से गिर गयीं. उनके दाहिने कूल्हे में चोट लगी है. इस समय वह अस्पताल में हैं, जून और पापा भी उनके साथ हैं. बहुत दिनों बाद पूरे घर में वह अकेले ही है.

आज माँ का अस्पताल में दूसरा दिन है, न जाने कितने दिन, कितने हफ्ते या कितने महीने उन्हें अस्पताल में रहना होगा. जीवन की संध्या में यह दारुण दुःख उन्हें झेलना पड़ रहा है, कर्मों की ऐसी ही गति है. कल दिन भर उसका मन भी कुछ अस्त-व्यस्त सा रहा, कोई भी कार्य पूरे मन से नहीं कर पायी. आज सुबह से दिनचर्या नियमित हुई है. जून आज फील्ड गये हैं.

आज तीसरा दिन है. जून अभी कुछ देर में आने वाले हैं. अस्पताल में खाना ले जाना है. एक परिचिता  का फोन आया है, विश्व विकलांग दिवस पर उसे बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेना है. दो दिन बाद बाल दिवस है, शायद वह न जा पाए. सभी को फोन पर माँ के बारे में बताया. जीवन क्या मात्र मृत्यु की प्रतीक्षा है ? प्रतीक्षा जो केवल एक व्यक्ति ही नहीं करता, करते हैं उसके अपने भी (?) जून के एक मित्र की माँ पिछले पांच-छह महीनों से बिस्तर पर हैं. अब माँ ने भी बिस्तर पकड़ लिया है अगले दो-तीन महीनों के लिए, डाक्टर ने कहा है इतना समय तो हड्डी को जुड़ने में लगेगा. नूना खुद भी धीरे-धीरे बढती हुई उम्र का अनुभव देह के तौर पर करने लगी है. मन के तौर पर तो कोई स्वयं को बूढ़ा कभी महसूस नहीं करता. कहना कठिन है उम्र घटती है या बढ़ती है.

‘संडे स्कूल’ व ‘मृणाल ज्योति’ के बच्चों के साथ बालदिवस मनाया, जून कापी और पेंसिलें ले आए थे. मिठाई और केक भी. एक ही स्थिति में लेटे-लेटे माँ की परेशानी थोड़ा बढ़ गयी है. पिताजी का उत्साह पूर्ववत है, वह ज्यादातर समय अस्पताल में ही रहने लगे हैं. उसे अभी ‘विवेक चूड़ामणि’ का काव्यानुवाद आगे लिखना है. नवम्बर आधा बीत गया है, अभी तक सभी क्यारियों में फूल नहीं लगा पायी है. आज शाम को सत्संग है. उस सखी का फोन आया जो यहाँ से चली गयी है. काफी देर तक बात करती रही. वहाँ का जीवन यहाँ से बिलकुल अलग है. उनका घर एक पहाड़ी पर है, चढाई करके घर तक आना पड़ता है. पांचवीं मंजिल पर घर है और अभी तक लिफ्ट चलनी शुरू नहीं हुई है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते साँस फूल जाती है. बालकनी से सुंदर सूर्योदय दीखता है, ऊपर ठंड भी रहती है. नैनी दोपहर को एक ही बार आती है. कुछ काम खुद भी करने होते हैं. माँ को अस्पताल गये आज पूरा एक सप्ताह हो गया. ऐसे ही देखते-देखते समय बीत जायेगा और वह घर आ जाएँगी.

जून देहली गये हैं, नन्हा भी वहाँ किसी काम से आया था उससे भी मिले. एक सखी का फोन आया, उसने कहा माँ को ठीक से खाना चाहिए, उसे पता नहीं है किस स्थिति में वह हैं. उस दिन उसने अस्तित्त्व से उन्हें दुःख से मुक्त करने के लिए प्रार्थना की थी, उसे अभी तक पूरा होना बाकी है लेकिन यह दिखाकर ईश्वर उसके मन में वैराग्य दृढ़ कर रहे हैं, ओशो कहते हैं, जीवन के अनुभव ही काफी हैं किसी को वैरागी बनाने के लिए. सुबह से कई संतों के वचन सुने, अच्छा लगता है सुनना पर मनन् भी करना चाहिए मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं है.

    

Tuesday, May 24, 2016

सुखबोधानन्द जी का आगमन


जून आए और उसी शाम माँ को अस्पताल में भर्ती किया गया. आज चौथा दिन है. बारी-बारी से सभी अस्पताल जाते हैं. रात को नन्हा रहता है दादी के साथ. दिन में देर तक पिताजी. आज उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार नजर आ रहा है. कल क्लब में मीटिंग है, उसे दो कार्य करने हैं, पहला मृणाल ज्योति पर छोटा सा भाषण दूसरा हिंदी कविता पाठ का निर्णायक बनना. उसने सोचा वह मासिक डोनर मेम्बर बनने के लिए सदस्याओं से अपील करेगी. दान की महिमा पर भी कुछ कहेगी.  

नये महीने का आरम्भ हुए आठ दिन हो गये, और वह पहली बार लिख रही है. माँ अस्पताल से वापस आयीं पर दो दिन बाद फिर उन्हें जाना पड़ा. अभी तक वहीं पर हैं. टीवी पर एक सिख संत कह रहे हैं जिन्दगी की राह का आरम्भ गर्भ में होता है, मातापिता की वासना के साथ जब जीव की वासना मिल जाती है तब एक जीवन शुरू होता है. जन्म लेने के बाद जो जन्मदिन मनाते हैं वह वास्तविक नहीं है. कोई अपना आदि नहीं जानता. इसी तरह कोई नहीं जानता सृष्टि कब बनी, क्योंकि जब सृष्टि का निर्माण हुआ उसके पूर्व समय था ही नहीं. जो सूक्ष्म से स्थूल बनता है वही स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है. उस सूक्ष्म में प्रवेश करने के लिए सूक्ष्ममति चाहिए. मति स्थूल तब हो जाती है जब हर वक्त संसार के विचार ही मन में घूमते रहते हैं. सत्संग करते करते जब चेतन मन का दायरा बड़ा होने लगता है तब मति सूक्ष्म होने लगती है. जब मति सूक्ष्म हो जाती तब भीतर का ज्ञान प्रकट होता है.

आज शाम को क्लब में सुखबोधानन्द जी का कार्यक्रम है. उनके प्रवचन सीडी से सुने हैं पहले, एकाध बार टीवी पर भी सुना है. किताब पढ़ने का अवसर कभी न कभी मिल जायेगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनके लेख पढ़े हैं पर सामने सुनने का अवसर मिलेगा, अवश्य अच्छा लगेगा. जून एक बार घर आएंगे, नन्हे को अस्पताल व पापा को घर छोड़ देंगे. उनकी नई नैनी काम ठीक कर रही है, उसे आज एक हफ्ता हो गया है, सभी काम जान गयी है. घर जाने की जल्दी नहीं होती उसे, अभी विवाह नहीं हुआ, एक बार इस चक्कर में आ गई तो फटाफट काम खत्म करके भागने की फ़िक्र में रहेगी. पुरानी के साथ किस्मत ने जो किया उसका चले जाना ही ठीक था. पिछले महीने उसके अपाहिज पति का लम्बी बीमारी के बाद देहांत हो गया, दो बच्चे हैं, पांच वर्ष की बेटी दो वर्ष का पुत्र. ससुराल में रहकर ठीक एक महीने का शोक उसने मनाया पर उसके अगले ही दिन पड़ोसी के पुत्र के साथ कहीं चली गयी. बच्चे दादा-दादी के पास हैं. ममता को किस तरह भुला कर उसने यह कदम उठाया होगा. आस-पड़ोस के लोग आश्चर्य कर रहे हैं पर वह जानती रही होगी, उसके बिना भी बच्चे सुरक्षित हैं. रोज-रोज के कलह से तो अच्छा है दूर चले जाना. जीवन कितना विचित्र है, माँ जब ठीक थीं उसके बच्चों के साथ खेलती थीं, बीमार होने के बाद एक दिन कहने लगीं देखना यह चली जाएगी, उस वक्त सबने उनकी बात को मजाक में लिया था. 

Friday, May 20, 2016

हवनकुंड का प्रकाश


पहले-पहल इस बात का अनुभव हुआ जब विवाह के बाद आर्यसमाज परिवार में नियमित हवन करने लगी, अग्नि के सामने बैठे श्लोक उच्चारण करते-करते मन जब शांत हो जाता तो भीतर एक नये तत्व का जन्म होता हुआ लगता. बचपन में माँ-पिता को बृहस्पतिवार का व्रत करते देखा था, स्वयं भी कितने सोलह शुक्रवार किये, पर उससे कोई विशेष लाभ नहीं हुआ सिवाय स्वादिष्ट भोजन के जो व्रत के बाद मिलता था, लेकिन विवाह के बाद धर्म का वास्तविक रूप समझ में आया. चार बच्चे हुए सभी को अच्छे संस्कार दिए. सदा डाक्टर पति का साथ व सहयोग मिला. जीवन अपनी गति से चल रहा था कि मायके में हुई छोटे भाई की दुखद मृत्यु ने हिला कर रख दिया. भाई की उम्र ही क्या थी, उसका पुत्र अभी मात्र चार वर्ष का हुआ था. माता-पिता भी जवान बेटे की मौत से दुखी थे. उसे दुगना दुःख हुआ, भाई का व माता-पिता का. उसने अपना ध्यान रखना छोड़ दिया, किडनी की समस्या शुरू हो चुकी थी, भीतर ही भीतर वह जड़ पकड़ रही थी पर बाहर के दुःख में उस पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं थी. भाई की मृत्यु का दर्द अभी कम भी नहीं हुआ था कि पिता भी चल बसे. अब वह बिलकुल ही टूट गयी. माँ ने ही उसे हिम्मत बंधाई. माँ का दुःख उसके दुःख से बड़ा था पर वह बड़ी जीवट वाली स्त्री है. वह अपने बड़े पुत्र का परिवार देखकर जीने का अम्बल पा रही थी. वह सच्चाई को स्वीकार रही थी. जीवन अपनी रफ्तार से आगे चलता रहता है, जाने वालों के साथ थम  नहीं जाता.

अस्ताल के इस कमरे में लेटे-लेटे वह स्मृतियों में खो जाती है. कितने हफ्तों से यहाँ आ रही है, यहाँ सभी को पहचानने लगी है. बच्चे, बूढ़े, जवान सभी को यहाँ आते देखा है. मृत्यु को नजदीक से देखा है. एक दिन वह उसका भी द्वार खटखटाएगी, पर तब तो जी ले. मृत्यु से पहले क्या मरना, शरीर में जब तक प्राण हैं तब तक इस सुंदर सृष्टि को रचने वाले परमात्मा की शक्ति का अपमान क्यों करे. वही तो है जो धडकनें चला रहा है, वह जब चाहेगा तब विदा हो जाएगी और खत्म हो जाएगी एक कहानी जो बरसों पहले शुरू हुई थी. माँ की उम्र अभी सोलह भी पार नहीं हुई थी जब उसने बिटिया को जन्म दिया. बालिका माँ ने उसे कैसे पाला होगा, सुना है वह खूब रोती थी, दुबली भी थी. जाने कब देश में बालिका वधु की प्रथा खत्म होगी. माँ गोरी थी, वह सांवली तो बचपन में माँ रगड़-रगड़ कर नहलाती थी, पैर लाल हो जाते थे पर वह उन भाई-बहन को रुलाते हुए भी खूब साबुन मल-मल कर नहलाती. पिता सेना में थे, कभी-कभी आते तो बहुत दुलार करते. कभी वे सब साथ रहते, नये- नये शहरों में पढ़ाई हुई. असम, बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश कई प्रदेशों में बचपन बीता. पढ़ाई के लिए डांट भी खूब पडती थी पर स्नेह भी उतना ही मिलता था. बचपन में तैयार होकर चचेरे भाइयों को राखी बाँधने जाती थी, उनकी कोई बहन नहीं थी, सो पांच भाइयों की वह इकलौती बहन थी. बचपन कब बीता पता भी नहीं चला.    


  

Friday, September 5, 2014

कोहरे का जाल


आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. उस दिन जून उसे छोड़ने एयरपोर्ट गये थे. वह दिल्ली पहुंच गयी थी शाम साढ़े सात बजे, घर पहुंचते नौ बज गये. अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे ही भाई के साथ टैक्सी स्टैंड गयी. कोहरा घना था और स्टेशन तक के रास्ते में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, लग रहा था कोई स्वप्न चल रहा है. उड़ान के दौरान भी और ट्रेन में भी सारा वक्त मन में एक वही ख्याल मंडरा रहा था. कोहरे के कारण उनकी ट्रेन बहुत रुक-रुक कर चल रही थी. दोपहर बाद वे गन्तव्य पहुंचे, मंझला भाई लेने आया था पर उसकी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया, भागदौड़ में उसे भरवाने का वक्त ही नहीं मिला था, बस से वे अस्पताल पहुंचे. जहाँ शेष सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. थोड़ी देर में ही अस्पताल गयी, उनको ऑक्सीजन दी जा रही थी और भी कई नलियां उनके विभिन्न अंगों से जुडी थीं, देखकर उसकी आँखें भर आयीं. वह उसे देखकर पहले तो खुश हो गयी थीं, जिसे उन्होंने ताली बजकर भी दर्शाया पर उसके आँसूं देखकर दुखी हो गयीं. वह बोल नहीं सकती थीं. उन्हें इतनी पीड़ा सहते देख सभी दुखी हैं पर कोई कुछ नहीं कर सकता. उसके बाद वह चार दिन वहाँ और रही. एक बार माँ ने उसका लिखा संदेश पढ़ा और आशीर्वाद भी दिया. लिखना भी चाहा पर इस बार उनकी लिखाई ठीक नहीं रह गयी थी. एक दिन बाद वह वापस दिल्ली आ गयी और अगले दिन असम, जहाँ जून और नन्हा उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

कल रात भर उसे वही स्वप्न आते रहे. ऑक्सीजन, हीमोग्लोबिन, ICU, और डॉक्टर, अस्पताल शब्द कानों में गूँजते रहे. एक बार माँ को बोलते हुए भी सुना. वह ठीक होकर आ गयी हैं और किसी बारे में पिता के सवाल का जवाब दे रही हैं. कल शाम वे लाइब्रेरी भी गये और माँ की बीमारी पर जानकारी हासिल की. उन्होंने बहुत कष्ट सहा है इस रोग के कारण. ईश्वर ही अब उनका सहायक है. उसका सिर भारी है, मस्तक के दोनों ओर की नसें तन गयी हैं. कल शाम को जून को तनावमुक्त रहने का उपदेश दे रही थी पर स्वयं तनावमुक्त रहना कितना मुश्किल है. आज सुबह सुना विजयाराजे सिंधिया तेईस दिन ICU में रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं तो दिल धक से रह गया. माँ को भी अस्पताल में दो हफ्ते हो गये हैं. अभी-अभी छोटी बहन को फोन किया, शायद वह व्यस्त थी, फोन नहीं उठाया. जून भी उसे उदास देखकर परेशान हो गये हैं. उसे स्वयं को सामान्य रखने का प्रयास करना चाहिए, जिस बात पर उनका कोई वश नहीं है उसके बारे में चिन्तन करते रहने से क्या लाभ ? आज से संगीत का अभ्यास शुरू करेगी, मन को व्यस्त रखने से ही वह शांत रहेगा. सबसे बड़ा दुख संसार में है इच्छा, इच्छा पूरी हो जाये तो दूसरी उत्पन्न होगी, पूरी न हो तो दुःख देगी.

“कबिरा सब ते हम बुरे हम तज भलो सब कोई
जिन ऐसा करि देखिया मीत हमारा सोई”

मन को जितना धोते हैं उतना पता चलता है कि मैल की कितनी परतें चढ़ी हैं.


Saturday, August 16, 2014

स्कूल में मेला


लहरें सागर में जन्मती, रहती और नष्ट होती हैं पर मानवों को इसका भान नहीं होता, ऐसे ही वे ईश्वर में ही जन्मते, रहते और नष्ट होते हैं. उन्हें अपने अस्तित्त्व का भान अपने जिंदा रहने का प्रमाण मृत्यु के समय मिलता है. जीवन भर वे मृतकों के समान जीते रहते हैं, एक बेहोशी की हालत में, तभी उन्हें अपने भीतर रहने वाले ईश्वर के दर्शन नहीं होते. वे हर पल बाहर की ओर भाग रहे हैं, अपने आप से दूर होते जा रहे हैं, और फिर एकाएक मौत का बुलावा आ जाता है  तब मुड़कर देखने का भी वक्त नहीं होता. उन्हें समय रहते जागना होगा. जीवन में सन्यास घटित हो जाये तो अनासक्त होकर, अलिप्त होकर जीना आ जाये. जो भीतर जायेगा वह भी-तर जायेगा. मौन रहते हुए, वाणी का सदुपयोग करते हुए परिवार जनों से, परिचितों से व्यवहार करना होगा. मन के दरवाजे खोलकर, झाड़-बुहार कर उस पाहुने की प्रतीक्षा करनी होगी जो आने के लिए स्वयं ही प्रतीक्षा कर रहा है. क्रन्तिकारी सन्त की बातें हृदय पर गहरा असर छोडती हैं, बाबाजी ने भी उसी बात को आगे बढ़ाया, और कहा कि ईश्वर ही सबसे बड़ा सुह्रद है, परम हितैषी है, सदा , सर्वदा सबके साथ है, उसे कोई देखना नहीं चाहता इसीलिए देख नहीं पाता. मन पर माया का पर्दा है, जब मन विकार रहित होगा, निर्मल होगा तभी उसके दर्शन होंगे. उसे प्रतिक्षण अपने पर नजर रखनी होगी, वाणी पर संयम रखना होगा. सांसारिक वस्तुओं का आकर्षण धीरे-धीरे खत्म हो रहा है ऐसा लग तो रहा है, हर पल मन खुश रहता तो है, विवेक को जगाये रखना होगा. अपने कर्त्तव्यों का भली-भांति पालन कर सके, अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करते हुए सात्विक जीवन बिताये, न सुख-सुविधाओं का आग्रह रहे न ही प्रतिकूलताओं से भय लगे. हे ईश्वर अब यही प्रार्थना तुझसे है !  

अभी-अभी नन्हा अस्पताल से वापस आ गया है, उसे लगा था कि डाक्टर आज ही उसका प्लास्टर खोल देंगे पर उन्होंने दो दिन और रखने को कहा है. वह इसी कारण आज स्कूल भी नहीं गया. अज से नवरात्रि भी शुरू हो गयी है. अब साढ़े आठ होने को हैं, पिछले एक घंटे में उसने सन्त वाणी सुनी, नन्हे से साइंटिस्ट्स के बारे में पूछा, नैनी को पैसे दिए और इस वक्त मन में कहीं हल्की सी चुभन है, लेकिन जब उसका परम हितैषी उसके साथ है तो संशय कैसा, किसी भी परिस्थिति में कैसे भी रहे, वह सुहृद तो सदा-सर्वदा साथ रहता है. फिर यह तनाव क्यों ? आज क्रन्तिकारी सन्त का भाषण नहीं सुन पायी, क्या इसीलिए ? उनकी बातें झकझोर कर रख देती हैं और बाबा जी की बातें मरहम का काम करती हैं. कल मंझले भाई को पत्र लिखने का विचार मन में आया था पर विचार कार्यान्वित नहीं कर पाई. आज लिखेगी.

Yesterday they went to Digboi, tinsukiya then again Digboi. It was good to meet Sardarji’s family in digboi and the shopping spree in TSK. They purchased new curtains fur drawing room, new cushions and covers for bed room, new dresses for her and Nanha, dry fruits and other grocery items for their kitchen from a new shop, kaamdhenu. In Nanha’s school they enjoyed very much. They took idli and dosa with samber and chutney, drank coffee and watched children doing different types of jobs, selling things, playing games, selling tea and coffee with teachers helping them and vice verse.  Today jun is doing his office work, Nanha is watching TV and she is thinking what to do first- she has so many jobs to do-sewing the curtains, sewing the cushion covers, altering her new white dress, sewing fall to her new sari, arranging her wardrobe, arranging drawing room for puja, cutting the Olympics news and pasting them in file, writing new poem.

Today’s quotation is,  Ability is of little account without opportunity - Napoleon
 …and they all have golden opportunity- to live a life which is pure, blissful and simple. Today is the birth anniversary  of one great soul, in fact two great souls. Father of nation Bapu and  great leader Lal Bahadur Shastriji. Jun and Nanha are also at home. She has done all her morning chores. Jun suggested that they should go tsk to change Nanha’s shirt, which they bought for him but which he did not like. Jun has gone to deptt  for some job. They can go after lunch. One friend called to say that they will not go with them but want something from TSK for their sun’s birthday.


Thursday, September 19, 2013

जलेबी का प्रसाद


नन्हे को सर्दी लग गयी है, वह स्कूल नहीं जा रहा है, पर शाम को कम्प्यूटर क्लास अवश्य जाता है, दिन भर उसको व्यस्त रखना होता है, नूना के गले में भी हल्की खराश महसूस हो रही है. उसने देखा है कि नन्हे को कुछ होने पर उसके खुद के भीतर भी वही लक्षण दिखने लगते हैं, पर इतनी कमजोर नहीं होना है उसे, छोटी बहन को बहादुर बनने की शिक्षा देते हुए एक पत्र लिखा था परसों. नन्हा इस समय ब्लॉक्स से घर बना रहा है, कभी-कभी पूरा एक घंटा उसे लग जाता है, छोटे छोटे प्लास्टिक के ब्लॉक्स से इमारत बनाने में. वह उसकी एक किताब ‘हमारी पुस्तकें’ पढ़ रही थी, उसमें वेद, पुराण, उपनिषद, कथा सरित सागर, जातक कथाएं आदि के बारे में पढ़ा. कुल उपनिषद १०८ हैं, जिनमें से दस प्रमुख हैं, ईश, केन, मुण्डक, माण्डुक्य, तैतरीय, छान्दोग्य, कथा, प्रश्न, कैवल्य, एतरिय आदि.

नन्हे को जून अस्पताल ले गये थे, पर डॉक्टर से मिल नहीं पाए, रात भर की वर्षा के बाद हॉस्पिटल में पानी भर गया है, जिससे वे लोग कार से उतर ही नहीं सके, उसका स्कूल भी वर्षा के कारण बंद है. उसने महसूस किया नन्हे की अस्वस्थता के कारण वह कुछ परेशान हो गयी है. जो उसके चेहरे पर भी झलक रही है. दोपहर को जब वह सो गया, वह उपनिषद पढ़ती रही कुछ समझ में आया, कुछ नहीं, कल शाम को जितने अध्याय पढ़े, ज्यादा समझ पायी थी. सारी पुस्तक का सार निकाला जाये तो यह होगा कि- ‘आत्मा मानव के हृदय में विराजमान है, आत्मा ही ब्रह्म है, जिसका दर्शन मानव ध्यान द्वारा कर सकता है. इन्द्रियों को वश में करके, मन का निग्रह करके, सदाचरण करके, ॐ का उच्चारण करके, जप द्वारा ध्यान करके आत्मा को जाना सकता है. सारे उपनिषदों में भिन्न-भिन्न प्रकार से ब्रह्म की अखंड सत्ता का, एकमात्र शाश्वत ब्रह्म का वर्णन किया है’.
कुछ देर पहले वह छाता लेकर बाहर टहलने गयी क्रिसेंथमम के पौधे कुम्हला से गये हैं, उनमें खुरपी लगाई, मन थोड़ा शांत हुआ, वैसे अशांत कब और कैसे हुआ उसे पता ही नहीं चला, फिर कैसेट लगाकर व्यायाम किया, वर्षा के कारण टहलना बंद है. अज शाम उन्हें क्लब भी जाना है, नन्हे को क्विज़ में भाग लेना है. आज सुबह जब नींद खुली थी तो दूर से आती मद्धिम सी आवाज थी, नींद में कभी लग रहा था फोन बज रहा है कभी अलार्म. कल जन्माष्टमी की छुट्टी है,  शाम को वे राधा-कृष्ण मन्दिर की सजावट देखने जायेंगे.

कल वे कृष्ण मन्दिर देखने के बाद कालीबाड़ी भी गये, पता नहीं क्यों पर ईश्वर का निराकार रूप ही उसे वास्तविक लगता है, मूर्ति या फोटो देखकर मन में श्रद्धा नहीं होती. वहीं से वे उस सखी के यहाँ गये जो वस्त्रों पर पेंटिग सीख रही है, आजकल दीवान का कवर पेंट कर रही है, रंगशोख और चटख हैं. कल दोपहर बैकडोर पड़ोसी के यहाँ सिंथेसाइजर बजाया, उसने एक गाने की स्वरलिपि भी बताई. उसकी आवाज काफी तेज थी, काफी बड़ा भी था. नन्हे ने मन्दिर सजाया है और शाम को वह जलेबी का प्रसाद भी बनाने वाली है. आज शिक्षक दिवस भी है. संयोग ही है की उसके पास डॉ राधा कृष्णन की एक पुस्तक है, जो लाइब्रेरी से लायी थी.


कल शाम को ‘स्वामी रामतीर्थ’ के भाषण पढ़े और अभी कुछ देर पूर्व भी वही पढ़ रही थी. उनके शब्दों में ओज है और आत्मा को जगाने की शक्ति, कल से कई बार इन्ही शब्दों के प्रभाव के कारण मन को व्यर्थ के जोड़-तोड़ से बचा पायी है. उसे लगा, वे अपना कितना सारा वक्त यूँही व्यर्थ की बातों में बिता देते हैं और मन की ऊर्जा जिसे किसी अच्छे काम में लगाना चाहिए, इधर-उधर की बातों को सोचने में खर्च कर देते हैं. 

Friday, June 15, 2012

जन्मदिन का गीत


सुबह के सात बजे हैं. लगभग दो हफ्ते बाद वह डायरी लिख रही है. सुबह नन्हे का एक काम याद आ गया था. जून उसके लिये कमीजों का कपड़ा लाया था जब वह अस्पताल में थी. उसने आज कटिंग कर दी है बड़ी ननद सिलाई कर देगी. अभी कुछ देर पूर्व ही उसे दूध पिलाकर सुलाया था पर लगता है उठ गया है, कपड़े बदल दिये हैं, कुनमुना कर फिर सो गया. आज पहली बार वर्षा हो रही है, जब से वह दुबारा अस्पताल से आयी है. घर आने के बाद उसे बेबी जौंडिस हो गया था पुनः चार दिनों के लिये अस्पताल में रहना पड़ा. कल उन्होंने पहली बार उसकी फोटो उतारीं.
सुबह पांच बजे ही वह उठ गया था, उसके पापा भी साथ ही उठ जाते हैं, दोनों दोबारा सो गए और कितना उठाने पर भी नहीं उठ रहे थे, फिर जल्दी-जल्दी बिना नहाये-धोए चले गए हैं. मौसम सुहाना है, बादल हैं छितराए हुए, वर्षा समेटे बादल. छोटी बहन का जन्म दिन है उसे बधाई कार्ड भेजना है,कुछ पंक्तिया उसके मन में आ रही हैं-
बचपन की बीती सुधियाँ
याद दिलाने, कुछ बतलाने  
पुनः आया जन्मदिवस तुम्हारा
समेटे हुए कुछ नूतन स्वप्न
और छुपाये कई सौगातें !
तुम थीं कल नन्हीं सी गुड़िया
आज खड़ी हो जीवन पथ पर
विश्वास दिलाने, नई राह दिखाने
फिर आया शुभदिन
स्नेह सहित लो दुआ हमारी.....

  

Friday, March 16, 2012

एक नया मोड़



कई दिनों से उसने कुछ नहीं लिखा है, मन में कितने विचार उठते हैं. हर समय एक सवाल सा रहता है. आज वे डॉक्टर के पास गए थे. डॉक्टर ने जाँच की और बताया कि वह जो सोच रहे हैं, सही है. जिस तरह जाँच की गयी वह तरीका नूना को पसंद नहीं आया, वह परेशान हो गयी घर आकर भी काफ़ी देर तक परेशान रही, उसे उदास देखकर जून भी परेशान हुआ. अगले माह उन्हें घर  जाना है. ऐसे में यात्रा नहीं करनी चाहिए पर उसने सोचा देखा जायेगा. अस्पताल जाने से पूर्व वह जितनी खुश थी वापस आकर उसकी शतांश भी नहीं है. कल दीवाली है, जून आज अकेले तिनसुकिया जायेगा सब सामान लाने.