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Tuesday, October 10, 2017

लाल और काले शहतूत


कल सुबह एक स्वप्न देखा, वह गुलाम भारत के एक शहर में (वर्तमान पाकिस्तान) किसी शायर की बेटी है. एक कमरा है जिसका दरवाजा दाहिनी तरफ खुलता है तो घर के भीतर जाता है और बायीं तरफ का बाहर, जहाँ पिता खड़े हैं, उनके हाथ में कोई पुस्तक है. कमरे में पाँच-छह वर्ष का बालक( शायद उसका भाई) गेंद से खेल रहा है, तभी वह कमरे में आती है. उसके केश छोटे कटे हैं, चेहरा बिलकुल अबके जैसा ही है, लम्बी है, फ्रॉक पहने हुए है, आकर वह भी उस बच्चे के साथ खेलने लगती है. उम्र चौदह-पन्द्रह होगी. स्वप्न में देखते ही उसने खुद से कहा, अरे, यह तो वह है ! एक और स्वप्न में एक वृद्ध महिला किसी परिचिता के बारे में कुछ बता रही है, जो अशोभनीय है सो वह स्वयं से कहती है, क्या उसे गॉसिप करना भी भाता है  ! आज सुबह उठी तो फिर वही वाक्य याद आया, “उसके जीवन में सब झूठ है”. सत्य तो वही है जो सदा रहता है, जीवन तो प्रतिपल बदलता रहता है, फिर झूठ ही हुआ. आज बहुत दिनों बाद बगीचे में काम करवाया, एक वीडियो भी बनाया. बगिया में ठन्डक थी, सब कुछ धुला-धुला सा था, सफाई भी हो गयी और पौधों को सहारा भी मिल गया. शाम को स्कूल के वार्षिकोत्सव में जाना है, और कल देहली जाना है. फेसबुक पर आस्ट्रेलिया की तस्वीरें पोस्ट कीं आज भी. कोई नई कविता नहीं लिखी कई दिनों से, काव्य श्रंखला पर लिखने वाली कवयित्रियाँ रोज एक नयी कविता ले आ रही हैं. जीवन एक झूठ है एक भाव यह भी है कि उसने कई कविताएँ बाह्य आलम्बनों से प्रेरित होकर लिखी हैं, बहुत सी भीतरी से भी, पर बाहरी आलम्बन से रची कविता स्वतः स्फूर्त नहीं कही जा सकती. काव्य तो उसे ही कहा जा सकता है जो अंतर्मन की गहराई से स्वयं ही प्रकट हो. 

कल सुबह वे उठे तो वर्षा थमी हुई थी पर लॉन में व सड़क पर पिछली रात आये तूफान और ओलों की वर्षा के चिह्न स्पष्ट नजर आ रहे थे. वे सवा ग्यारह बजे दिल्ली जाने के लिए हवाईअड्डे के लिए रवाना हुए और शाम सवा सात बजे अस्पताल पहुँच गये. भाभी से पहले भाई से मिले, वह दुबले लग रहे थे. भाभी का चेहरा भी छोटा सा लग रहा था, अधर सफेद लग रहे थे, उन्हें देखकर मन रुआँसा हो गया. दिल की बीमारी के कारण उन्हें काफी दुःख झेलना पड़ा है. आज सुबह एंजियोग्राफी हो गयी है, सम्भवतः परसों आपरेशन होगा. यहाँ आज मौसम गर्म है. दोपहर दो बजे बड़ी भांजी अपनी बेटी को लेकर मिलने आएगी. उसकी बिटिया दुबली-पतली है, खूब गोरी और चंचल, बचपन में भांजी बिलकुल ऐसी लगती थी. छोटी बहन भी आई है, जो इस समय कहीं बाहर गयी है. जून अपने दफ्तर के काम से गये हैं, दोपहर तक लौटेंगे. परसों वापस लौटना है. कुछ देर पहले पिताजी व सभी भाई-बहनों, भाभियों से फोन पर बात की. शाम को फिर अस्पताल जाना है. वे मंझली भाभी के यहाँ ठहरे हैं, घर जैसी ही सुविधा है. मंझली भाभी के कंधों पर बहुत काम आ गया है, पर परिपक्वता का परिचय देते हुए वह सब संभाल रही है. बड़ी बहन के लिए पूरी तरह समर्पित. उसने उनके शीघ्र स्वास्थ्य के लिए भगवान से प्रार्थना की.


आज प्रातः भ्रमण के लिए गये तो पिछले गेट के बाहर ही शहतूत के पेड़ से पके हुए लाल व काले शहतूत गिरे देखे. कुछ वापसी में उठाये भी. कल शाम छोटा भाई भी अपनी बड़ी बेटी के साथ अस्पताल आया. मंझले भाई से अब उसकी खूब पटती है. भाभी पहले से ठीक लग रही थीं. सभी के भीतर सच्चा स्नेह देखकर मन संतुष्ट है. आज महरी नहीं आई तो किसी अन्य को बुलाया, नाम है मुस्कान, हंसमुख है. भाई ने कहा है वे लोग शाम को पाँच बजे के बाद ही अस्पताल आयें, वे जल्दी लौट भी आएंगे. भाभी जितना आराम करेंगी उतना ही अच्छा है.  

Monday, March 31, 2014

मोती और सीपियाँ


नन्हे के छमाही इम्तहान समाप्त हो गये, कल से फिर पढ़ाई शुरू हो गयी है. कल उसके स्कूल में Founder”s Day मनाया जाएगा. जून सदा की तरह खुशदिल हैं, स्नेह से भरे हुए, नन्हे और उसके लिए हमेशा तत्पर. वर्षा बदस्तूर जारी है, जिससे  मौसम  ठंडा रहता है. इतवार को उन्हने एक मित्र परिवार को बुलाया था, उनके आने की प्रतीक्षा थी, पर किसी कारण से वे नहीं आ पाए, उसे बुरा लगा पर उनसे कह नहीं सकती, शिष्टता का यही तकाजा है. धीरे-धीरे मन खुद ही भूल जायेगा. समाचारों में सुना, तमिलनाडु की तरह पश्चिम बंगाल और बिहार में भी राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग उठने लगी है. गुजरात में तूफान से तबाही मची है.

कल शाम वे Face off का cd लाये, फिल्म की कहानी कुछ अलग सी है, हीरो का चेहरा बदल कर विलेन का चेहरा लगा देते हैं और विलेन हीरो का चेहरा पा लेता है. आजकल वैसे भी तो यही हो रहा है, असली-नकली का भेद पाना बहुत मुश्किल है. उसे लगता है जीवन का एक-एक क्षण कीमती है जैसे माला का हर मोती, पूरे जोशोखरोश के साथ हर नये दिन का स्वागत करेगी जो उसके लिए कितने ही ख़ुशी के पल समेटे हो सकता है.

अभी-अभी आचार्य गोयनका जी का विपश्यना पर प्रवचन सुना, ‘विपश्यना’ साधना की पद्धति है जिसमें मानव अपने चित्त को गहराइयों तक शुद्ध व निर्मल बनता है, मानस में राग और द्वेष के संस्कार पत्थर पर पड़ी लकीरों की तरह गहरे हैं और मानव हर दिन उन्हें और गहरा बनाते जाते हैं. आचार्य कहते हैं साक्षी भाव से उन्हें देखना आ जाये तो जीने की कला आ गयी. लेकिन बुद्धि के स्तर पर इसे समझना एक बात है और अनुभति के स्तर पर उतारना बिलकुल दूसरी बात है. जिसमें ध्यान बहुत सहायक हो सकता है. किसी भी बात का असर मानस पर इतना गहरा न हो कि नींद ही उड़ जाये, कायस्थ होकर कोई इस बात को जितनी जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है.
कल शाम उन्होंने उस फिल्म का बाकी भाग देखा जो परसों शाम को लाये थे, साथ ही क्रीम, चॉकलेट और कोको पाउडर भी लाये थे, बिना सोचेसमझे खर्चा करने पर और यूँ ही दिशाहीन जीये चले जाने पर उस रात वह बहुत परेशान हो गयी थी, जून उसकी बात समझ गये थे और कल का दिन उन्होंने बहुत अच्छी तरह बिताया, शांति और समझदारी के साथ. नन्हे के अंक बहुत अच्छे नहीं आ रहे हैं, और उसे इस बात की फ़िक्र भी है यह अच्छी बात है. कल रात नूना ने वह स्पीच भी लिख ली जो कल की मीटिंग में उसे बोलनी है, कल उनके सत्र की अंतिम मीटिंग है. यकीनन वह सबको पसंद आनी चाहिए. कल भांजे-भांजी के लिए कम्प्यूटर पर बनाये कार्ड्स भेजे, भविष्य में वे कार्ड्स इसी पर बनाया करेंगे.

आज उसने टीवी पर उर्दू कवि कृष्ण अदीम का साक्षात्कार सुना, पहले उनका परिचय, फिर उस परिचय की पुष्टि स्वयं कवि के शब्दों में, फिर उनके संघर्ष का जिक्र किया गया, और आगे की बात कवि के शब्दों में. इसी तरह उनकी शायरी पर चर्चा हुई फिर उनके वर्तमान जीवन का विवरण भी दिया.
तू जो चाहे तो दर्द का मेरे दल्मा ? हो जाये
वरना मुश्किल है की मेरी मुश्किल आसां हो जाये
और
इक जरा सी दस्तक को खिड़कियाँ तरसती हैं
अब तुम्हारे कदमों को सीढ़ियाँ तरसती हैं

सल्तनत बहारों की इनको सौंप दीजे
महके-महके फूलों को तितलियाँ तरसती हैं

क्यों न हम दुआ माँगे दारें निसां ? से
कब से पहली बारिश को सीपियाँ तरसती हैं 

Sunday, January 13, 2013

प्रोफेसर पूरण सिंह- पंजाब के शायर



वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा विश्वबैंक से बजट सम्बन्धी पत्राचार को लेकर आज लोकसभा में हंगामा हुआ. रेलवे बजट संतुलित है. टीवी पर पंजाब के कवि, दार्शनिक, चिंतक, शायर के बारे में प्रोग्राम आ रहा है..अमृता प्रीतम उनके बारे में कितनी अच्छी भाषा में बता रही हैं. ‘पूरन सिंह’ धरती के मानस पुत्र थे, उनकी कविता मजदूर चंगे ! कितनी मार्मिक है कितनी सच्ची, १९३१ में उनका देहांत हो गया. प्रोफेसर पूर्ण सिंह की और भी कितनी कवितायें होंगी.. ऐसे ही भारत की अन्य भाषाओँ के भी कितने ही कवि होंगे जो अनोखी बात सीधी-सादी भाषा में कह जाते हैं. पंजाब के कवि की यह नज्म भी कितनी अच्छी है-

उत्तर की हवाओं के चुम्मन पी पीकर ...ओ फाख्ता !

और.. तू हमें छोड़कर कौन सी राह पर चल दिया पंजाब ?
मैं तो एक गीत हूँ हवा में कांपता हुआ..

सुरजीत कुमार का छायांकन कितना सुंदर है..लाल, नीले, पीले, गुलाबी, सलेटी आकाश के ये चित्र और नीले, लाल पानी में पड़ती हुई सूरज की छाया......झील का काँपता हुआ पीला पानी और सलेटी पहाड़..सब कुछ आँखों को मुग्ध कर रहे हैं...और दिल में कैसी हूक सी उठती है आँखें नम होने को आतुर और सीने पर जैसे कोई भार सा है..कितना महान शायर था वह, जिसने उसे पहली बार में ही अपना प्रशंसक बना लिया है. उसने भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं-

जैसा मन तूने मेरा बनाया है ओ खुदा !
वैसा उनका क्यों नहीं बनाया
जो छुरियाँ चलाते हैं दरख्तों के सीने पर
रूप बिगाड़ रहे हैं सलोनी धरती का
जो अमृत से पानियों में जहर घोलते हैं
ऊंचें पहाड़ों को बारूद से उड़ाते हैं
ये धरती, हवा, पानी, पहाड़ ही तो जीवन हैं..तेरा सच्चा रूप ओ खुदा !
फिर तू क्यों चुप है ?


कल वे क्लब गए थे पर सिर्फ आधे घंटे के लिए, जून ऑफिस से देर से आये थे और नन्हे ने टेबल्स में बहुत सी गलतियाँ की थीं. कल कोई खत नहीं आया, फोन भी नहीं मिला, शाम को जून ने कोशिश की थी.आज फिर कल की तरह मौसम खिला-खिला है, धूप अब तेज लगती है, बाहर देर तक बैठा नहीं जाता. आज उसने सूजी के लड्डू बनाये थे. कल रात उसने एक स्वप्न देखा-

कल रात स्वप्न में आकाश में उड़ता एक जहाज देखा
जिसमें पीछे-पीछे
आग की एक लपट भी थी
जाने वह जहाज की अपनी थी या
उसका पीछा कर रही थी
फिर आकाश की दसों दिशाओं में
रोशनियाँ प्रज्ज्वलित हो उठीं
युद्ध की दुन्दुभी बजने लगी
और पर कटे पंछी सा जहाज
धरती पर आ गिरा
वह उसके पास गयी
एक पुतला
झीने आवरण में लिपटा लेटा था
और पास ही एक छोटी बच्ची सिसक रही थी
रात्रि से सुबह, और सुबह से शाम हो गयी है और यह स्वप्न उसके पीछे-पीछे है, क्या स्वप्नों का कोई अर्थ होता है, यदि हाँ, तो क्या वह जहाज उसका तन था और बच्ची उसकी आत्मा ?