Showing posts with label शक्कर. Show all posts
Showing posts with label शक्कर. Show all posts

Wednesday, March 14, 2012

एक पत्र


इतवार को वे तिनसुकिया गए थे पूजा देखने, बहुत भीड़ थी. दुर्गापूजा के कितने सुंदर पंडाल सजाये गए थे. उससे पहले घर की सफाई की, जून ने छत व दीवारों की, नूना ने फर्श की. फिर नाश्ता बनाया और तैयार होकर निकले. एक फिल्म देखी, शाम को घर लौटे तो बहुत थकान थी.
जून को फिर से जाना पड़ा सात दिनों के लिये और एक बार फिर दिन में दो या तीन बार फोन पर मुलाकात का सिलसिला. नूना को वे दिन याद आये जब वे साथ थे, जैसे दूध में शक्कर, इस तरह घुल गए थे और अब यह अकेलापन उसे ज्यादा खल रहा था. जैसे सब कुछ होते हुए भी सब अधूरा अधूरा सा हो. उसने फोन पर बात की तो लगा जैसे कि कितने दिनों बाद उसकी आवाज सुन रही है. दिन में दूध और सेब खाकर रही पर शाम होते होते सर में दर्द होने लगा. अगले दिन सुबह सोकर उठी तो लगा सब ठीक था. दिन में वह उड़िया पड़ोसिन मिलने आयी थी बहुत बातें की, उसके पास एक खजाना है जैसे बातों का.
उसने एक पत्र लिखा जून को और कहा कि इस बार वह पिछली बार की तरह उदास नहीं है बल्कि नियमित दिनचर्या का पालन कर पा रही है. रात को मच्छरदानी लगाकर सोयी सो नींद भी अच्छी आयी. लाइब्रेरी गयी किताबें पढीं, क्रोशिया बनाया और उसका इंतजार किया फोन पर. और इसी तरह पूरा सप्ताह बीत गया.