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Tuesday, March 19, 2013

लटपटे नूडल्स



हैप्पी सेवेंथ...अभी कुछ देर पूर्व जून ने कहा, ठीक एक माह बाद आज के ही दिन उनके विवाह की वर्षगाँठ है. आज सुबह नन्हे के लिए ऊन की टोपी बनाने में लगी रही. कल शाम वह काफी देर तक पढ़ता रहा, घर जाने से उसका काफी कोर्स छूट गया था. आज जून धनिया व मूली के बीज लाए हैं, हरी मिर्च की पौध भी. शाम को सभी लगाने हैं. कल तीन खत लिखे, जो मन में आया, सभी  लिखती गयी, दीदी को भी, माँ-पिता को भी...कब तक कोई चेहरे पर मुखौटा लगाये रह सकता है? सितम्बर का न्यूज़ ट्रैक देखा, कुछ खास नहीं लगा, जुही चावला का इंटरव्यू है, पता नहीं ये सारी अभिनेत्रियाँ एक जैसी भाषा क्यों बोलती हैं, क्या बोल रही हैं शायद इंटरव्यूअर भी नहीं समझ पाती होंगी, लेकिन ‘केएसकेटी’ देखने का मन हो गया है इंटरव्यू सुनकर. नए साल के कार्ड भेजने हैं सभी को फुफेरी बहन को भी और मामी जी को भी.

  अभी-अभी उसने दैनिक व्यायाम किया, तन के साथ मन भी हल्का हो गया, कुछ देर बगीचे में भी काम किया था उसके पहले, गाजर के बीज डलवाए और फ्रेंच बीन्स तोड़े. गुलदाउदी पूरे शबाब में खिल रहा है और गेंदा भी. उन्होंने नया माली रखा है, पता नहीं यह भी कब तक टिकेगा. सुबह नन्हे के लिए नाश्ते में नूडल्स बनाने का प्रयास किया, पर ज्यादा गीले हो गए, मेसी टाइप, पर नन्हा इतना समझदार और प्यारा है कि उसने जरा भी मुंह नहीं बनाया और उसे ही खुशी से खा लिया. दोपहर को उसका स्कूल का चार्ट बनाकर रखेगी, रंग वह आकर भरेगा.

  कल दोपहर जून को जो पहले से ही उखड़े-उखड़े थे, उसने यूँ ही उदास कर दिया, उसने मन ही मन उनसे क्षमा मांगी. कल शाम को उसकी छात्रा ने उसे खुशी का अनुपम उपहार दिया, उसके कारण उसे हमेशा अनजानी, अनसोची खुशियाँ मिलती रही हैं, वह सचमुच प्रिया है. उसने सोचा उसे नए साल का कार्ड अवश्य भेजेगी. कल जब उसने बताया तो सन अठासी की पत्रिका निकल कर अपनी कविता पढ़ी-  
खोल दो मन के सब के दरवाजे, खुली हवाएं आने दो !
बहुत सुकून मिला पढ़कर, प्रिंसिपल साहब ने तारीफ की इसके भावों की.. उसने मन ही मन उसे धन्यवाद दिया. अभी कुछ देर पूर्व उसने एक-एक कर दो सखियों को फोन किया, सम्बन्ध अपनी सुविधानुसार निभाना चाहते हैं आजकल सभी लोग, दूसरों के लिए किसी स्नेह या आत्मीयता के कारण नहीं. रिश्ते अपनी जरूरत के अनुसार बनाये या बिगाड़े जाते हैं. लेकिन इस पर अफ़सोस करने की कोई बात नहीं क्योंकि यह कोई नई बात तो नहीं...अब तो मन इतना कठोर हो चुका है कि सब कुछ आसानी से सह लेता है. इससे तो अच्छा है दोस्त बनाएँ हम अपने विचारों को..किताबों को और फूलों को जो बदले में अनादर तो नहीं करते हमारे स्नेह का. उसने देखा, सवा दस हो चुके हैं, अभी कई कार्य शेष हैं, सो मन की पीड़ा इन्हीं पन्नों में छोड़कर अब शेष कार्यों में लगने चली गयी.

  आज से नन्हे की छमाही परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं. आज हिंदी का पेपर है. उसके लिए अंग्रेजी का पेपर बना कर रखेगी जो वह आकर हल करेगा. परसों उसकी नैनी लक्ष्मी चली जायेगी, फिर कितनी मुश्किल होगी..एक लाभ होगा उसकी कमर जो फैलती जा रही है थोड़ी तो कम होगी कुछ काम करने से. कल एक बच्ची के जन्मदिन की पार्टी में गए थे वे, इतने लोग थे कि बैठने की जगह नहीं मिल पा रही थी कुछ लोगों को. आज खतों का दिन भी है पर पिछले हफ्ते एक भी खत नहीं आया, सो अगले हफ्ते ही लिखेगी नए साल की शुभकामनाओं के साथ.

  अभी कुछ देर पूर्व पुरानी पड़ोसिन से बात की और अब इस बात पर पछता रही है कि व्यर्थ ही लेडीज क्लब के ‘मेहँदी’ कार्यक्रम की आलोचना की, सचमुच कितनी आसान होती है आलोचना लेकिन प्रशंसा करना भी उतना ही आसान है उसके लिए यदि बात उसके मन की हो, चलो, इस बात को यहीं छोड़ते हैं, उसने सोचा. शाम को क्लब जाना है, क्रिसमस ईव है, बचपन में कितने गीत गाते थे वे ईसामसीह के बारे में. आज भी कई दिन बाद लिख रही है, नन्हा पास ही बैठा है उसे काम दिया है, पर वह हर एक मिनट में कुछ पूछ लेता है. उसने सोचा इन छुट्टियों में उसे कोर्स की पुस्तकों के अलावा कुछ पढ़ाएगी, पर इधर-उधर के कामों में ही मन इतना थक जाता है कि...फिर भी कुछ समय तो निकालना ही चाहिए. कल जून वह कार्ड भी ले आए जो उस छात्रा को भेजना है. पिछले हफ्ते सिर्फ मंझले भाई का एक पत्र आया था. कभी वे दिन भी थे जब लिखने से सुकून मिलता था पर आज इस वक्त कुछ जम नहीं रहा है यूँ कलम चलाना, और ऐसा पहले भी हुआ है, हो सकता है पहले यही बेचैनी उसे भाती हो.






Sunday, November 4, 2012

ठंडा ठंडा संतरा



कल वह अपनी एक सहपाठिनी से एक किताब लायी थी, ‘मापन व मूल्यांकन’ स्पष्ट हो गया है, ‘टी स्कोर व जेड स्कोर’ भी बहुत अच्छी तरह समझाया है इस किताब में. कालेज गयी तो छात्राएँ परीक्षा की तिथियों के बारे में ही बात कर रही थीं, पहली मई से पन्द्रह तक परीक्षाएं हैं, हर पेपर के बीच में दो दिन का अंतराल है सिवाय मनोविज्ञान के पेपर के, टाइम टेबल  उसे तो याद भी हो गया है. ब्लैकबोर्ड पर लिख दिया उसने, और किसी टीचर ने कोई आपत्ति नहीं की, पर सिन्हा मैडम ने कहा ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्यों कि अभी तक ऑफिशियली डेट्स नहीं आयी हैं, सो मिटा दिया. आज मार्च का अंतिम दिन है, यानि प्रति पेपर के हिसाब से पांच दिन मिलेंगे, उसने सोचा, अब उसे पूरी व्यूह रचना करके जुट जाना चाहिए. अब लगभग सभी विषयों का कोर्स पूरा होने को है. नन्हा आजकल देर से सोता है, उसे सुलाते हुए उसे ही नींद आ जाती है सो रात को भी देर तक पढ़ नहीं पाती. और आज जल्दी उठ भी गया है, दोपहर को सोना उसे जरा नहीं भाता.

अप्रैल का पहला दिन बीत भी गया, कल दिन भर चार्ट बनाने में ही निकल गया, आज ले गयी थी जमा करने. अब दो-तीन दिन और जाना है, उसके बाद बीच-बीच में एकाध दिन, शायद उन्नीस अप्रैल को विदाई पार्टी होगी, वह भी कुछ कविता या ऐसा ही कुछ पढ़े, ऐसा मन में विचार आया है, उसने सोचा, लिखेंगे कभी मूड होने पर....अलविदा..आज रामनवमी की छुट्टी है, घर पर उतनी पढ़ाई कर नहीं पा रही है, बल्कि कालेज डे में ज्यादा उत्साह रहता है. याद करने का काम अभी तक शुरू नहीं हो पाया है, लगता है चार-पांच बार अच्छी तरह पढ़कर ही जाना होगा, रटना अब उससे हो नहीं पायेगा. ड्राइक्लीनर के यहाँ से साड़ी ले आयी है, कितनी अच्छी लग रही है कोटा चेक की यह साड़ी.

मिसेज सिन्हा भी बस..लडकियाँ उनकी रिस्पेक्ट नहीं करतीं, यही शिकायत करती हैं हमेशा, लेकिन लडकियाँ भी क्या करें..कालेज का कल अंतिम दिन हैं मन में कुछ सुगबुगा रहा है एक कविता...सभी टीचर्स के नाम और बीएड के नाम. सिन्हा मैडम ने पूछा कि कितने प्रतिशत नम्बर आएंगे, उसने साठ प्रतिशत कह दिए..इतने भी नहीं आये तो पढ़ाई किस काम की.

अप्रैल भी आधा बीत गया, जून आए थे, तीन दिन रहे और चले गए, उन्हें पहले दिल्ली फिर आस्ट्रेलिया जाना है. अगले महीने अठारह तारीख को आएंगे अब हमें ले जाने. आजकल गर्मी बढ़ गयी है, पिछले दो-तीन दिन से दोपहर में बिजली गायब हो जाती है, पंखा चलता भी है तो गर्म हवा फेंकता है, दिन भर पंखे की हवा में रहने से बदन कैसा आलस्य से भरा रहता है, मगर क्या करें ? परीक्षा में सिर्फ बारह दिन रह गए हैं, अभी तक सभी कुछ पढ़ा ही नहीं है, याद करना तो दूर, साठ प्रतिशत अंक लाना इतना आसान नहीं है.
आज उसने वह कविता पढ़ दी फेयरवैल पार्टी में. शाम को उसकी सहपाठिनी सीमा आयी थी, उसने ननद से कहा चाय के लिए, वह छोटी-छोटी दी कटोरियों में चना-मूड़ी भी लेकर आयी.

आज इतवार है, उसे जून की याद आ रही है, पिछले इतवार वह यहीं थे. आज दोपहर भर बिजली नहीं थी, गर्मी से ऑंखें और सिर भारी हो रहे हैं, दोपहर को खाना भी नहीं खाया गया, इससमय कुछ खाने का मन हो रहा है, उसने सोचा वह दूध पीकर आती है.

उसे ठंडा-ठंडा संतरा खाने का मन हो रहा है, पर कौन लाकर देगा, सुबह दूध पिया पर हजम नहीं हुआ. पता नहीं उसे क्या हुआ है. उसके साथ यह भी समस्या है की तबियत ठीक न हो किसी काम में मन नहीं लगता. उसने सोचा कि जून उसे दूर रहकर भी शुभकामना भेज रहे हैं, उसे अपने भीतर की हिम्मत जगानी होगी.