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Wednesday, February 24, 2021

पराशक्ति


कल दीपावली का उत्सव सोल्लास सम्पन्न हो गया। नन्हे ने सदा की तरह दिल खोलकर कर उत्सव व विशेष भोज का आयोजन किया। लगभग बाईस लोग आए थे। सभी ने घर की तारीफ की। दोपहर को वह उन्हें गो-कार्ट ले गया। ड्राइविंग सीखी हुई थी सो ज्यादा परेशानी नहीं हुई। वैसे भी वह गाड़ी उलटती नहीं है। रात को सोने में देर हुई. नन्हा व सोनू भी अपने मेहमानों को लेकर बारह बजे घर पहुँचे थे । आज दोपहर वे दोनों फिर आ गए थे। घर से ही काम किया। कल भाईदूज है, उम्मीद है भाइयों को टीका मिल गया होगा। इस समय रात्रि के साढ़े नौ बजे हैं, बाहर से लगातार पटाखों की आवाजें आ  रही हैं। 


आज यहाँ  आने के बाद पहली बार वे आश्रम गए, जहाँ जाने मात्र से ही भीतर एक अनोखा सुकून मिलता है। विशालाक्षी मंडप में बैठकर कितनी ही पुरानी सुखद स्मृतियाँ भी सजीव हो उठीं। गुरूजी वहाँ नहीं थे पर उनकी मोहक तस्वीर भी उनकी उपस्थिति का अहसास करा रही थी। उनकी आँखें अपनी ओर खींचती हुई सी लग रही थीं। आश्रम के सुंदर वातावरण की कई तस्वीरें भी उन्होंने उतारीं। कुछ देर भजन में भाग लिया और कुछ खरीदारी की। गुरुजी की बहन भानु दीदी की लिखी एक पुस्तक ‘पराशक्ति’ ली, जिसमें पुराणों में वर्णित देवियों के बारे में जानकारी है, अवश्य ही पठनीय होगी।  कल एक मित्र परिवार आ रहा है, उन्हें लेकर कल फिर वे यहाँ आएंगे। कुछ देर पहले पड़ोस से पटाखे फोड़ने की आवाजें आ रही थीं, सड़क पर कागजों का ढेर लग गया है, इतना वायु प्रदूषण होता है सो अलग। यहाँ आने के बाद पहली बार ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की। बाहर वर्षा आरंभ हो गई है। इस कमरे के बाहर खुला बरामदा है। काफी खुला-खुला घर है यह, आकाश भी कमरे से दिखाई देता है और इस मौसम में सुबह की धूप सीधी कमरे में आती है। जीवन फिर से पटरी पर आता दीख रहा है। घर काफी व्यवस्थित हो गया है। कार्पेट अभी तक बिछाए नहीं हैं, उसके बाद यकीनन और अच्छा लगेगा। किचन में बर्तन धोने की मशीन काफी उपयोगी सिद्ध हो रही है, कपड़े धोने की मशीन भी। 


कल दोपहर मित्र परिवार आया, पति-पत्नी और कालेज में पढ़ने वाली बिटिया।  आज सुबह नाश्ते के बाद वे लोग चले गए। समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। शाम को आश्रम गए। संध्या के समय भजन का कार्यक्रम चल रहा था, वे सब भी कुछ देर के लिए वहाँ बैठ गए और सम्मिलित हुए। बिटिया ने माँ से धीरे से पूछा, वे यहाँ क्यों बैठे हैं ? उसने सुन लिया, और मुस्कुरा दी। मंदिर में बैठना या भजन गाना सबके बस की बात नहीं है और युवाओं के लिए यह बहुत मुश्किल है, जिन्हें कभी बचपन से इससे परिचित न कराया गया हो। पाँच मिनट और बैठकर वे उठ गए और आश्रम के सुंदर प्रांगण में घूमते रहे।  वापसी में खाद खरीदी, जो कल सभी गमलों में डालनी है। मौसम आज सुहावना है, दोपहर बाद वर्षा की भी भविष्यवाणी है। आज सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती है। आज से  लद्दाख व जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है। कश्मीर में हिंसा की घटनाएं बंद नहीं हो रही हैं।  भारत में आज से अठ्ठाइस राज्य व नौ केंद्र शासित प्रदेश हैं। 


आज सुबह वे इस सोसाइटी में अंगूर की खेती देखने गए फिर पिछले गेट से गाँव की तरफ निकल गए। अंगूर के बगीचे के पास तीन फ़ौवारे हैं, पानी में पड़ती हुई रोशनी के कारण सूर्यास्त का दृश्य अनुपम लग रहा था।  एक किंगफिशर देखा तथा एक अन्य लाल व काला बड़ा सा पक्षी। आज से शाम को एक घंटे की योग साधना भी आरंभ की है. उसके बाद जब संध्या भ्रमण के लिए निकले तो बच्चों की एक बड़ी सी टोली देखी, उन्होंने हालोइन की ड्रेसेज पहनी हुई थीं। वे इधर से उधर दौड़ रहे थे। 


उस पुरानी डायरी में कुछ सुंदर सूक्तियाँ उसने लिखी थीं, उस समय तो उनका क्या अर्थ समझा होगा उसे ज्ञात नहीं पर आज वे उस आश्चर्य से भर देती हैं -


स्वयं के ब्रहमत्व की अस्वीकृति अज्ञान है। 


स्वयं कभी स्वयं से अलग नहीं, किन्तु पर में दृष्टि रहने के कारण स्वयं में ध्यान नहीं रहता। 


मन में जब विकार और विचार भरे हैं, तब निराकार नहीं। 


Thursday, May 21, 2020

दीवाली की उजास


आज पूरे नौ दिन बाद डायरी उठायी है. पिछली बार की जो एंट्री है, उसी दिन नन्हा व सोनू आये थे. उसके बाद दिन कैसे बीतते गए, समय का जैसे पता ही नहीं चला. उसी दिन शाम को वे ही उसे महिला क्लब की मीटिंग के लिए छोड़ने गए. अगले दिन उसे स्कूल जाना था. अगले दो दिन जून ने छुट्टी ली थी, उसी दिन उन्होंने दीपावली के विशेष भोज का आयोजन किया था. नन्हे ने छोले बनाये, और उसने ढेर सारे व्यंजन, आखिरी दीवाली थी सो जून ने विभाग के सभी अधिकारीयों को बुलाया था. भाईदूज के दिन वे अरुणाचल प्रदेश में एक सुंदर स्थान नामसाई घूमने गए, एक मोनेस्ट्री, नदी तट सन्तरे के बगीचे और सुंदर पहाड़ी रास्तों पर की गयी वह यात्रा भी अच्छी रही .एक दिन रहकर अगले दिन शाम को लौटे. उसके एक दिन बाद बच्चे वापस चले गए. पटाखे, स्नैक्स, तथा रौशनी की झालरें व ढेर सारी मिठाई लाकर उन्होंने असम में उनकी इस दीवाली को यादगार बना दिया है. अगली दीवाली बंगलूरू में होगी. दीपावली के बाद आज छठ का त्यौहार भी सम्पन्न हो गया. लगभग एक महीने बाद आज एओल के टीचर ने फॉलोअप करवाया. आज उनका जन्मदिन भी था. योग अभ्यास  के बाद उन्होंने ही मिठाई खिलाई. वह बहुत अच्छी तरह से व्यायाम व क्रिया कराते हैं, उन्हें उनका कृतज्ञ होना चाहिए. कल बाल दिवस है, वह क्लब की कुछ अन्य सदस्याओं के साथ मृणाल ज्योति जाएगी. उससे पहले टाइनी टॉटस भी जाना है, उस स्कूल में भी बुलाया है जहाँ वह योग सिखाने जाती है, पर समय निकालना कठिन होगा. कल दोपहर बच्चों के लिए कविता लिखी, नन्हे और सोनू का स्वभाव एक-दूसरे से कितना मिलता है, दोनों का दिल बहुत बड़ा है. ईश्वर उन्हें सदा इसी तरह खुश रखे. दीदी ने भी कविता पढ़कर लिखा है, ‘इसी तरह प्यार बना रहे’. जून आज दोपहर दीदी के यहाँ गए थे, कल अपने काम के बाद पिताजी से मिलने जाएँगे. कल मंझली भाभी का फोन आया, बगीचे में निकले सांप का वीडियो देखकर उन्हें आश्चर्य हो रहा था. परसों शाम को सर्प देखा था. दोपहर को नैनी की बेटियाँ आयीं, कहने लगीं, उन्हें बाल दिवस पर स्कूल में डांस करना है, वह मोबाइल पर गाना बजाकर उन्हें अभ्यास करा दे। उसे आश्चर्य हुआ, आजकल बच्चे सेल्फी ले ले ... जैसे गानों पर स्कूल में नृत्य करते हैं. 

कल बालदिवस के कार्यक्रम दोनों स्कूलों में ठीक रहे. आज देहरादून से दिल्ली आते समय जून के सहयात्री थे, बाबा रामदेव. जून ने उनके साथ तस्वीर भी खिंचवाई और वह भी बाबा के कहने पर, क्योंकि वह संकोच कर रहे थे. एयरहोस्टेस ने खींची तस्वीर. सुबह वह दीदी के यहाँ नाश्ते पर गए थे. मूली व गोभी के परांठे खिलाये उन्होंने. कल वह वापस आ रहे हैं. आज मौसम काफी ठंडा है, तमिलनाडु में आए समुद्री तूफान का असर है शायद. धूप में तेजी नहीं थी. बाहर से नैनी के भतीजे के रोने की आवाज आ रही है, अपनी शैतानियों के कारण उसकी काफी पिटाई होती है, पर वह सुधर नहीं रहा है. शिव सूत्र पुस्तक दो-तीन दिनों से पढ़नी आरंभ की है, सरल शब्दों में गूढ़ विषय को समझाया गया है. वेदांत, योग व शिव सूत्र के अनुसार जगत व परमात्मा की व्याख्या में थोड़ा अंतर है पर मूल बात वही है. 

Monday, October 15, 2018

लहर और बादल



आठ बजने को हैं. आज भी मौसम ठंडा ही रहा. बदली बनी रही. वे अभी-अभी बाहर टहल कर आये हैं. आकश पर सफेद बादलों के मध्य पूर्णिमा से एक दिन पूर्व का सुंदर चाँद चमक रहा था. कल यहाँ लक्ष्मी पूजा का उत्सव है, उत्तर भारत में दीपावली के दिन यह उत्सव होता है. यहाँ उस दिन काली की पूजा होती है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. बच्चों द्वारा रंगे कुछ सुंदर दीए खरीदे. कम्प्यूटर ठीक हो गया है, ब्लॉग पर नई पोस्ट प्रकाशित की. कल सुबह डिब्रूगढ़ डाक्टर के पास जाना है, जून के घुटने में दर्द है.
शनिवार व इतवार कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इस समय शाम के चार बजे हैं. जून एक दिन के लिए आज देहली गये हैं, देर शाम तक पहुंचेंगे, परसों लौटेंगे. परसों शाम उन्होंने यूरोप के सभी चित्र टीवी की बड़ी स्क्रीन पर दिखाए, भव्य इमारतें और सुंदर बगीचे. कल शाम को वह थोड़ा परेशान हो गये थे जब उसने कहा कि काजीरंगा जाने का समय वह केवल अपने लिए तय कर सकते हैं, अन्यों के लिए नहीं. बाद में उसे समझ में आ गया कि अपने-अपने संस्कारों के वशीभूत होकर वे क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं. उसके बाद उनके मध्य पुनः सकारात्मक ऊर्जा बहने लगी. ऊर्जा का आदान-प्रदान सहज होता रहे, यही तो साधना है. सुबह वे घर में ही कुछ देर टहले, डाक्टर ने उन्हें दो दिन आराम करने को कहा है, आज वह अपना घुटना आराम से मोड़ पा रहे थे. उनकी कम्पनी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कितना सहायक सिद्ध हुआ है, उसका मन कृतज्ञता से भर गया. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से ईमेल आया, टीचर्स की जानकारी थी. अब वे उनके लिए भली-प्रकार योजना बना सकते हैं. वे इस समय जहाँ खड़े हैं, वहाँ से उन्हें आगे लेकर जाना है. उसने क्लब की एक परिचित सदस्या को, जो असमिया लेखिका भी है, प्रेरणात्मक वक्तृता के लिए कहा है.
आज सुबह वह उठी तो आँखें खुलना ही नहीं चाहती थीं, कुछ देर के लिए ऐसे ही बैठ गयी, बाद में सुदर्शन क्रिया करते समय भी अनोखा अनुभव हुआ. शांति की अनुभूति इतनी स्पष्ट पहले कभी नहीं हुई थी. वह इस देह के भीतर प्रकाश रूप से रहने वाली एक ऊर्जा है जिसके पास तीन शक्तियाँ हैं, मन रूप से इच्छा शक्ति, बुद्धि रूप से ज्ञान शक्ति तथा संस्कार रूप से कर्म करने की शक्ति. यदि ज्ञान शुद्ध होगा, तो इच्छा भी शुद्ध जगेगी, और उसके अनुरूप कर्म भी पवित्र होंगे. उनके पूर्व के संस्कार जब जगते हैं और बुद्धि को ढक लेते हैं तब मन उनके अनुसार ही इच्छा करने लगता है. हर संस्कार भीतर एक संवेदना को जगाता है, उस संवेदना के आधार पर उनका मन विचार करता है. यदि संवेदना सुखद है तो वह उस वस्तु की मांग करने लगता है, यदि दुखद है तो द्वेष भाव जगाकर विपरीत विचार करता है. अपने संस्कारों के प्रति सजग होना होगा तथा नये संस्कार बनाते समय भी जागरूक होना होगा. वे स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं. वह ऊर्जा ही इस देह पुरी का शासन करने वाली देवी है, उसे स्वयं में संतुष्ट रहकर इस जगत में परमात्मा की दिव्य शक्ति को लुटाना है.
आज स्कूल जाने के लिए तैयार हुई पर ‘बंद’ के कारण नहीं जा सकी, बच्चे शायद उसकी प्रतीक्षा करते होंगे, सोचकर एक पल के लिए मन कैसा तो हो गया पर ज्ञान की एक पंक्ति पढ़ते ही स्मृति आ गयी और शांति का अनुभव हुआ. वे स्वयं को ही भूल जाते हैं और व्यर्थ के जंजाल में पड़ जाते हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है और वे उसे शब्दों में ढूँढ़ते हैं. करने को कितना कुछ है, दीपावली का उत्सव आने वाला है, एक सुंदर सी कविता लिखनी है.

सागर की गहराई में शांति है,
अचल स्थिरता है, हलचल नहीं..
लहरें जो निरंतर टकराती हैं तटों से,
उपजी हैं उसी शांति से..
भीतर उतरना होगा मन सागर के
आकाश की नीलिमा में भी बादल गरजते है,
टकराते हैं, उमड़ते-घुमड़ते आते हैं और खो जाते हैं !
आकाश बना रहता है अलिप्त.
पहचानना है लहर और बादल की तरह मन के द्वन्द्वों को
जो जीवन का पाठ पढ़ाते हैं.
लहर और बादल को मिटने का दर्द भी सहना होगा
अवसर में बदलना होगा चुनौतियों को
और पाना होगा लक्ष्य-शाश्वत सत्य !   

Tuesday, September 29, 2015

दीपों का उत्सव


कल दीपावली है, उन्होंने रात को दीवाली भोज का आयोजन करने का निश्चय किया है. छह-सात परिवारों को बुलाया है. आज छोटी दीवाली है, दोपहर को गुलाबजामुन बनाने का विचार है, कुछ देर के लिए क्लब भी जायेंगे. कल सुबह बच्चों को मिठाई बांटने तथा योग की कक्षा लेने भी जाना है, सो कल का दिन व्यस्तता में बीतने वाला है. आज जून को लंच पर घर आने में एक घंटे की देर हो गयी है, फोन भी नहीं किया, उसके शरीर पर भूख के लक्षण अथवा तो कहें समय पर भोजन न  मिलने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं. कल शाम को कई रिश्तेदारों से फोन पर बात हुई, त्योहार पर भीतर से जुड़ने की स्वाभाविक इच्छा जगती है. उत्सव मानव के जीवन में सरसता तो लाते ही हैं, उन्हें जोड़ते भी हैं. अभी-अभी उसने जून को फोन किया तो उन्होंने काट दिया, शायद किसी मीटिंग में हैं, और अब फोन आया, दस मिनट में आ रहे हैं.
खो जाता है छोटा मन
उत्सव घटता है
दुखों से मुक्ति का मिलता है प्रसाद
उजाले की प्रसाद युक्त आभा भर जाती है भीतर
कृतज्ञता और आनंद के मध्य में है वह
एक सौभाग्य है जिसका मिलना..
अंधकार में छिपे ढके
कुछ रह जाते हैं विहीन उससे
वंचित जीवन की एक बड़ी उपलब्धि से
खो देते हैं इस सुंदर संपदा को...   

दीपों का यह उत्सव अंतर्मुख होने के लिए है, पूरे वर्ष का लेखा-जोखा करने के लिए है. पाप और पुण्य की बैलेंस शीट बनाने के लिए है. पुण्य होने से जमा होता है और पाप से उधार होता है. क्रोध आदि पाप बाँधते हैं और प्रेम पुण्यशाली है. उन्हें देखना है कि किस तरह यह बैलेंस शीट ठीक रहे, नुकसान न हो, मुनाफा बढ़े. उनसे किसी को दुःख न हो, यदि हो भी गया तो तुरंत प्रतिक्रमण कर लें. यह जगत प्रतिध्वनित करने वाला कुआं है, उनके कर्मों के अनुसार ही उन्हें फल मिलते हैं. दीवाली पर वे यह तय करें कि सुख की दुकान खोलनी है. उनके जीवन में जो भी कोई आये उसे उनसे केवल सुख ही मिले..उनके जीवन का पूर्ण लाभ इस जगत को मिल सके, वे स्वयं को पूर्ण अभिव्यक्त कर सकें तभी उनका इस जगत में आना सार्थक होगा. उनका वास्तविक कर्त्तव्य क्या है ? धर्म क्या है ? यह गुरू ही बताते हैं. टीवी पर मुरारी बापू कह रहे हैं कि मानव जीवन पाकर भी जो भीतर की मुस्कान को जाग्रत नहीं कर सका वह पूर्ण जीया ही नहीं और वह धर्म भी धर्म नहीं जो सहज मुक्त रूप से हँसना नहीं सिखा देता.

पिछले हफ्ते मंगल को वे गोहाटी गये, माँ-पापा वापस चले गये हैं. उस दिन के बाद आज सोमवार को डायरी खोली है. इस समय सिर में हल्का दर्द है, सम्भवतः अपच के कारण. किसी ने ठीक ही कहा है, पहला सुख नीरोगी काया, उधर ससुराल में माँ को भी सिर में थोड़ी सी चोट लग गयी है वह गिर गयी थीं जब शाम को गली में टहलते समय भैंस ने उन्हें गिरा दिया. जीवन में सुख-दुःख एक क्रम से आते ही हैं. आज सुबह ध्यान करने बैठी तो कितने सारे विचार आ रहे थे, मन अपनी सत्ता बनाये रखना चाहता है. यात्रा के दौरान कई बार ऐसा लगा कि मन खाली हो गया है, कितनी शांति का अनुभव होता था तब, कल पिताजी से बात हुई, उनका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया. बड़ी बुआ व फुफेरी बहन का फोन नम्बर उन्होंने दिया, दोनों अस्वस्थ हैं, शाम को वह बात करेगी.

पुनः-पुनः वह असजग होती है और पुनः-पुनः सद्गुरु के वचन मन को नये विश्वास से भर देते हैं. वह फिर अज्ञात की ओर चल पड़ती है, वह परमशक्ति जो अपना अनुभव तो कराती है पर दिखाई नहीं देती. जगत दीखता है, मन दीखता है, विचार तथा भावनाएं दिखती हैं पर वे जहाँ से प्रकटे हैं वह स्रोत नहीं दीखता. ध्यान में वह उसी में स्थित होती है पर ध्यान भी तो ज्यादा गहरा नहीं हो पाता, यहाँ-वहाँ का कोई विचार आ ही जाता है. सद्गुरु से की गयी प्रार्थना ही मनोबल बढ़ाती है.  




Tuesday, June 9, 2015

पहली विदेश यात्रा


ध्यान उसे भाता है पर आजकल उसके लिए समय व स्थान निकाल पाना कठिन होता जा रहा है. आँख बंद करते ही कैसे प्रभु का प्रेम पूरे तन-मन को ढक लेता सा लगता है. सिर के ऊपरी बिंदु पर हलचल सी होती है नहीं तो सिहरन और लगता है कि कुछ रिस रहा है. धीरे-धीरे बढ़ रहा है भीतर...उतर रहा है उस प्रभु का नाम फिर पोर-पोर में भर जाता है, उसका ताप मोहक है, उसकी याद सांसों को भर लेती है. वह जैसे छा जाता है फिर बाहर की दुनिया का होश किसे रहता है. कल बहुत दिनों के बाद सत्संग में गयी, शायद उसी का परिणाम है अथवा तो दीपावली के आगमन का उल्लास. सुबह-सवेरे संगीत का अभ्यास भी मन-प्राण को प्रफ्फुलित कर देता है और सुबह प्राणायाम का अभ्यास भी किया था, बीच-बीच में ध्यान था अथवा तंद्रा जिसके कारण श्वास गहरी नहीं हो पा रही थी. आजकल मौसम भी सुहावना है, वर्षा के बाद का आकाश कितना निर्मल होता है. कल अमावस्या है, यह दीपकों का प्रकाश इसे पूर्णिमा में बदल देगा ! उनके भीतर भी दीपक जल रहे हैं, भीतर प्रकाश ही प्रकाश है. प्रकाश के इस सागर को उसने कितनी बार देखा है, उनके भीतर ही नगाड़े भी बज रहे हैं, कितनी बार जिसे सुना है, सोहम, हंसा का अंतर्नाद स्पष्ट सुना है जैसे कोई भीतर बैठकर जप कर रहा हो, उनकी आत्मा का संगीत है वह और आत्मा का प्रकाश. आत्मा तो परमात्मा का अंश है तो वह उसका ही प्रकाश हुआ. उन्हें रस पूर्ण करने वह परमात्मा ही धीरे से घट खोल देता है, अपने रस का घट जो पूर्ण है जो मधुमय है, जो सुखमय है, जो शक्ति देता है, ज्ञान देता है और स्फूर्ति देता है. जो सभी ऐश्वर्यों का दाता है !

आज दीपावली है, दीयों का त्योहार, उजाले का त्योहार, उनके भीतर का उजाला जगमगाने लगे तभी असली दीपावली है. जब तक भीतर अंधकार हो तो बाहर का प्रकाश उनकी मदद नहीं कर सकता. आज सुबह क्रिया के बाद उसे ज्योति के दर्शन हुए, कान्हा ने भी अपने नीलमणि रूप में दर्शन दिए. परमात्मा उन्हें उनकी सभी कमियों के साथ स्वीकारता है, वह उनसे प्रेम निभाता है, चाहे वे कितना ही बड़ा अपराध करें उसे प्रेम से पुकारें तो वह जवाब देता है. वे ही उसके प्रेम को भुला देते हैं, तब जीवन कांटों में उलझ जाता है, कैसा ताप जलाता है. उसका साथ हो तो सारा जगत अपना-आप ही लगता है. उनका मन आत्मा में स्थित रहे तो हर क्षण ही उत्सव का क्षण है ! उसने प्रार्थना की, ‘उनके तन का पोर-पोर मन का हर अणु परमात्मा के नाम से इस तरह ओत-प्रोत हो जाये कि जैसे पात्र पूरा भर जाने पर जल छलकने लगता है, वैसे ही उसके नाम का अमृत उनके अधरों व नेत्रों से स्वतः ही छलकने लगे’. चित्त जब तृप्त होगा उसके नाम से पूर्ण होगा तो भीतर के ताप अशुभ वासनाएं भी धुल जाएँगी. अपनी भूलों पर वेदना होती है तो सजगता बढ़ती है, दुःख सिखाता है, क्रोध, मोह, आलस्य ताप को बढ़ाते हैं. ज्ञान उन्हें मुक्त करने के लिए, यह ज्ञान कि वे साक्षी मात्र हैं, सुख-दुःख के भोगी नहीं हैं.

उन्हें यात्रा पर जाना है, पहली बार विदेश यात्रा पर साथ-साथ. जीवन का सफर उन्होंने साथ-साथ तय करने का निर्णय वर्षों पहले लिया था, और अब यह छोटा सा सफर अमेरिका, इंग्लैण्ड की यात्रा. जिन स्थानों को टीवी अथवा पत्रिकाओं में देखा था, उन स्थानों को स्वयं देखने का अनुभव यकीनन अच्छा होगा. वे अपने साथ बहुत कुछ ले जा रहे हैं लेकिन सबसे उत्तम जो उनके साथ जायेगा वह है, वह  सुमिरन जो कान्हा ने उसे दिया है. कभी भी खत्म न होने वाला एक ऐसा प्रिय कार्य है प्रभु का स्मरण कि वे संसार में कहीं भी रहें, वह उनके साथ रहेगा. सद्गुरु की सिखाई साधना की विधि, सद्शास्त्रों का ज्ञान तथा ध्यान भी उसके साथ जायेगा और यही उसकी यात्रा के सम्बल हैं. टिकट-पैसे आदि का सारा प्रबंध जून देखते ही हैं, उन्हें ही उसकी फिकर करनी है पर उसके लिए उस परम पिता ने यही कार्य सौंपा है. गुरु माँ कहती हैं मन प्यासा है, भूखा है, और कड़वा है, न जाने कितनी बार वे संतों के उपदेश सुनते हैं, शास्त्रों का पाठ करते हैं पर फिर भी मन का बर्तन भरता नहीं, मन सूक्ष्म है वह स्थूल से कैसे भर सकता है और जब तक वह कड़वा है तब तक सूक्ष्म का स्वाद भी कैसे पता चलेगा. उन्होंने मन में न जाने कितनी गाठें बांध ली हैं पहले उन्हें खोलना होगा तभी तो मन बहेगा उस अनंत यात्रा पर. उनका अज्ञान ही उसे दुखी बनाता है, अहम् मन को सूखा रख जाता है और मोह ही भूखा रख जाता है. मन वास्तव में कुछ है ही नहीं, कल्पनाओं का एक जाल है, जो उन्होंने बुन रखा है !


Friday, May 1, 2015

पुस्तक मेला


आज दीपावली का अवकाश है. जून डिब्रूगढ़ गये हैं. एक मित्र की नई कार आ रही है सेंट्रो. नन्हा सुबह कोचिंग गया वापसी में ‘बुक फेयर’ भी गया, दो बजे लौटा, उसे किताबें बहुत पसंद हैं. उन्हें देखते-देखते वह भोजन भी भूल गया. नूना का आज अमावस के कारण फलाहार था, तन और मन दोनों हल्के-हल्के हैं. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले वे उठे. क्रिया के बाद ध्यान में आज कृष्ण की झलक दिखाई दी..नीला तन...और... जैसे कोई पर्दे के पीछे से झांककर लुप्त हो जाये. उसकी आत्मा पर पड़ा आवरण झीना होता जा रहा है. प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है, आँखें बंद करते ही और कभी तो आँखें खुली रखकर भी. वस्तुएं अपना ठोसपना खोने लगती हैं यदि उन्हें एकटक कुछ क्षण के लिए देखे. पहले जिस पर क्रोध आता था अब वैसी ही घटना होने पर मन शांत रहता है. तेजपुर से aol की साधिका का कार्ड आया है, वह भी उन्हें नये वर्ष पर भेजेगी. कल सभी से बात हुई सिवाय छोटी बहन के, आज रात वे उसे फोन करेंगे. इस वर्ष नन्हे ने बिजली की चार नई लड़ियाँ घर को जगमगाने के लिए दीवाली पर लगाई हैं. कल उन्होंने दीपकों व प्रकाश की कई तस्वीरें भी उतारीं.

रस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती, भक्ति स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर वे निस्सार संसार में आसक्त होते हैं. जैसे धरती में सभी फल-फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है, वैसे ही उस परमात्मा में सभी सद्गुण ! महापुरुषों की महानता, माधुरी, ओज और ज्ञान सब उसी में है. संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उसमें है, तो यदि कोई उससे अपना संबंध जोड़े तो वह उसे मालामाल कर देता है. विकार स्वयं ही दूर भागते हैं, मन स्थिर होता है. धीरे-धीरे हृदय समाधिस्थ होता है. उसके रहते संसार का कोई दुःख उन्हें छू भी नहीं सकता. जब इस जगत से कुछ लेना ही नहीं हो, जो भी चाहिए भीतर मिलता हो तो व्यवहार रखने हेतु ही जगत के साथ संबंध रहता है. उसमें फंसने का भय नहीं होता..वहाँ तो बच के निकल जाने की कला आ जाती है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता..दिव्य आनंद साथ होता है और तब यह जीवन एक सुखद अनुभव बन जाता है.

टीवी पर ‘रामायण धारावाहिक’ में हनुमान ने जब राम से कहा कि आपके हाथ से पानी में छोड़े गये पत्थर डूब गये तो क्या हुआ, आप जिसे त्याग देंगे वह तो डूबने ही वाला है न ! ..और उसका मन भर आया, ईश्वर को वे भुला दें या ईश्वर उन्हें भुला दें दोनों ही स्थितियों में उनका कोई आश्रय नहीं. कल वह बहुत देर तक निराकार का ध्यान करने का असफल प्रयास करती रही पर मन कहीं का कहीं पहुंच जाता था, फिर कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान किया तो जैसे सब स्थिर हो गया. उसकी स्मृति ही मन को उल्लास से भर देती है, सिर्फ एक शांति बच रहती है या फिर एक पुलक, जो नृत्य करने के जैसी है, ‘नारद भक्ति सूत्र’ पढ़ते समय भी अच्छा अनुभव होता है. संतों, महात्माओं का अनुभव कितना सच्चा लगता है तब...मानव प्रेम किये बिना नहीं रह सकता और भौतिक जगत में ऐसा कुछ भी नहीं जो उसके प्रेम का प्रतिदान दे सके. उसका प्रेम अनंत है. उन्हें सीमित नहीं अपरिमित प्रेम चाहिए और उन्हें ऐसा प्रतिदान ईश्वर के सिवाय और कोई नहीं दे सकता. वह कितना स्पष्ट हो उठता है कभी-कभी कि विश्वास ही नहीं होता. लगता है जैसे कोई स्वप्न है...पर वह सदा उसके साथ है...सद्गुरु का ज्ञान रंग ला रहा है ! जय गुरुदेव !