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Monday, April 1, 2019

सफेद बैंगन



एक लंबा अन्तराल ! इतने दिनों में याद भी नहीं आया कि डायरी लेखन भी करने की वस्तु है. पौने ग्यारह बजे हैं. आज हवा बंद है. एक अजीब सी गंध भी है चारों तरफ, कटहल पक रहे हैं, जामुन पक चुके हैं, पिछले कई दिनों से वर्षा हो रही है, पत्ते सड़ गये हैं, सभी की मिली-जुली गंध है. कुछ देर पहले एक व्यक्ति आया, पूछ रहा था, क्या कटहल बेचने हैं ? उसके पूर्व तीन किशोर बालक आये थे, जामुन तोड़ने. कह रहे थे, बाजार में बेचेंगे. सौ रूपये प्रति किलो बिक रहे हैं. उसे याद आया पिछले वर्ष मृणाल ज्योति के एक अध्यापिका ने कहा था, वहाँ के बच्चों को पका कटहल खिलाने के लिए. उसे फोन करके कहा, वे लोग ले जा सकते हैं. आज भी सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखाना है, पिछले मंगलवार को भी वे आयीं थीं. आज सुबह दांत के डाक्टर के पास गयी, फिलिंग कराने. अभी तक दांया गाल पूरी तरह से होश में नहीं आया है. अभी भी दांत में हल्का दर्द महसूस हो रहा है, शायद आरसीटी करनी पड़े भविष्य में. पित्त बढ़ गया है ऐसा लग रहा है. सबसे पहला लक्षण है आँख में जलन, शरीर में इरीटेशन जैसा कुछ. सिर में भारीपन और भी एकाध लक्षण. कल शाम को जामुन खाए, फिर मूंगफली. रात्रि भोजन में सरसों वाली अरबी. भोजन ही रोग का मुख्य कारण है. कल जून को भी जाना है डेंटिस्ट के पास.

नन्हे का जन्मदिन आने वाला है. जून ने उपहार तो पहले ही भेज दिया है उसे, उसके लिए कुछ लिखना है. दोपहर के भोजन के बाद जून को जल्दी जाना था, वह भी विश्राम करना टाल गयी, कम्प्यूटर पर लिखने के बाद सुस्ती भगाने के लिए एक कप चाय बनाकर पी है. आज ही जून ने कहा दफ्तर में अब वह ग्रीन टी ही लेते हैं. उसने उन्हें समर्थन दिया. कल शाम योग कक्षा में आने वाली महिलाओं ने कहा, उन्हें भी कटहल व जामुन चाहिए. माली से कह तुड़वाकर रखे हैं उसने. सुबह-सुबह नैनी बगीचे से ढेर सारी सब्जियाँ लायी, सफेद बैंगन भी और एक बड़ा सा कद्दू भी, सिंड्रेला की कहानी के लिए सारा सामान !

कल फिर कुछ नहीं लिखा. अब से सुबह ही लिखेगी. दिन भर के कार्यों की सूची भी बन जाएगी. आज घी बनाना है. मृणाल ज्योति के स्टाफ की लिस्ट बनानी है. तीन बजे वहाँ मीटिंग में जाना है, उनके वार्षिक अधिवेशन के लिए भी कविता लिखनी है. शिक्षक दिवस पर दिए जाने वाले उपहारों की सूची बनानी है. टीचर्स वर्कशॉप के लिए रूपरेखा बनानी है. आकाश पर बादल बने हैं, लग रहा है वर्षा कभी भी हो सकती है. कल गुरु पूर्णिमा है, वे सभी आर्ट ऑफ़ लिविंग केंद्र जायेंगे.

गुरू पूर्णिमा की स्मृतियाँ सुखद हैं. कल दोपहर भर गुरूजी के लिए लिखी गयी कविताएँ पढ़ीं और गीत गतिरूप की सहायता से उन्हें ठीक किया. शाम को सेंटर में गुरूपुजा में भाग लिया. ज्ञान के वचन सुने, ऐश्वर्य, बल, सुन्दरता, ज्ञान, कला तथा यश बढ़ाने की इच्छा जिनमें होती है, वे मन की क्षिप्त अवस्था वाले होते हैं. सत्व के साथ रज तथा तम भी उनमें समान मात्र में होते हैं, वे पुरुषार्थी होते हैं, पर उनका मन चंचल होता है. तमोगुण की अधिकता होने पर मन की मूढ़ अवस्था होती है. अधर्म, अज्ञान तथा अवैराग्य की तरफ व्यक्ति प्रवृत्त होगा. सत्व गुण की अधिकता होने पर मन एकाग्र अवस्था में होता है. जब साधक सत्व गुण के भी पार चला जाता है, तब समाधि अवस्था को प्राप्त होता है. उनके संचित कर्म बहुत ज्यादा हैं. उनमें से कुछ कर्मों का फल ही उन्हें इस जन्म में मिलता है. प्रारब्ध कर्म जब तक चलते हैं, तब तक जीवन है, जो नये कर्म वे करते हैं उन्हें क्रियमाण कर्म कहते हैं. उनके प्रति ही साधक को सदा सजग रहना है.

Friday, September 9, 2016

सागर में नदियाँ


आज उसे अनुभव हुआ भीतर एक ज्वाला है जिसमें निरंतर हवन चल रहा है, कामनाओं की समिधा पड़ रही है, विचारों का धूना जल रहा है और हृदय ही वह हवन कुंड है जिसमें से प्रेम की सुगंधि चारों ओर फ़ैल रही है. भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं ज्ञानी का हृदय सागर की तरह होता है, जिसमें चारों और से नदियाँ आकर गिरती हैं. वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता. सत्व, रज और तम तीनों गुण उसके उर में समा जाते हैं. प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह तीनों का आगमन उसे मोहित नहीं करता. उसका हृदय उस भूमि की तरह होता है जहाँ सारा कूड़ा-करकट आकर खाद बन जाता है और फूल उगाता है..सुगन्धि फैलाता है, उस आकाश की तरह होता है जहाँ बादल, कुहरा, गर्जन-तर्जन, बिजली, वर्षा, ओले, सूरज सब होते हैं पर वह ज्यों का त्यों रहता है..तपता नहीं, गलता नहीं..अग्नि की तरह होता है जिसमें सारे विकार आकर जल जाते हैं और..उस जल की तरह जो सब कुछ पावन कर देता है..आज जून आने वाले हैं परसों छुट्टी है कृष्ण जन्माष्टमी की..पंजाबी दीदी को कविता भेजेगी !

कल शाम और फिर रात्रि से ही कुछ छूट गया सा लगता है, जो खो जाये वह था ही नहीं, पर जो एक बार मिले और कभी न खोये ऐसा भी कहीं होता है यह तो अनंत यात्रा है और अनंत अनुभवों से भरी. प्रकाश, प्रवृत्ति और और मोह तीनों के अनुभव होते ही रहेंगे. कल शाम वे मार्केट गये, छोटी ननद ने जो सूट भेजा, उसे सिलने दिया. अब उसकी कलम आगे बढने से इंकार कर रही है. संस्कार कितने गहरे होते हैं और मन कितना बलशाली..बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की वहाँ एक नहीं चलती. इस संस्कार को मिटना ही होगा, वह यदि इस क्षण निर्णय कर ले तो कौन है जो रोकेगा. उसका ही अंतर्मन, अवचेतन मन, अचेतन मन, पूर्व जन्म की स्मृतियाँ..लेकिन आत्मा ही एकमात्र सत्य है, ये सब अनित्य हैं, आत्मा के सातों गुणों को भीतर धारण करे तो सारा नकार क्षण भर में बह जायेगा. सद्गुरू की वाणी को याद करे तो जो वह हैं वही वह है, वही यह सारा जगत है, एक ही तत्व से यह सारा संसार बना है, प्रेम का जितना विस्तार हो उतना अच्छा है..सारा जगत उनका अपना हो जाये, प्रेम ही आत्मा में ले जाता है, प्रेम ही बहता हुआ दरिया है..प्रेम को रोका तो वह सड़ेगा...दुर्गन्ध देगा. सहज होकर सभी को स्वीकारना है तभी मुक्ति है. स्वयं को मुक्त करके वे औरों को भी मुक्त कर देते हैं. स्वयं को बाँध कर रोककर वे दूसरों के लिए भी बाधा खड़ी कर देते हैं. दूसरे को अपना सा जानकर कभी उनके मार्ग में बाधा न बनें, यह भी सेवा है..जियो और जीने दो’ का सिद्धांत यही तो कहता है. उनके कारण किसी का विकास न रुके, सहज ही ईश्वर का प्रेम उनके भीतर से बहता रहे..बहता रहे..  

आज दो दिनों बाद डायरी खोली है, परमात्मा अपनी उपस्थिति हर क्षण ही प्रकट करता है, पर वे सोये रहते हैं तो उसे देख नहीं पाते, वे यानि उनका विवेक...विवेक जगता है तो आत्मा का अनुभव करता है..जिसका अर्थ है जीवन के हर क्षेत्र में सजगता...हर श्वास में सजगता, हर पल जागरूक होकर जीना..वर्ष का नौंवा महीना शुरू हो चुका है. इस वर्ष के शेष रह गये कार्यों को करने का अभी भी वक्त है. परिवार में सभी के साथ संबंध मधुर हों..समाज में जो प्रतिबद्धताएं हैं वे निभती रहें और मन सदा समता में रहे. गुरूजी को आज यू ट्यूब पर सुना, उनेक कितने रूप हैं. ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’...एक व्यक्ति कितना विकास कर सकता है हजारों, लाखों ही नहीं यहाँ तो करोड़ों व्यक्ति उनसे सीख रहे हैं...परमात्मा उनके द्वारा स्वयं को व्यक्त कर रहा है. उन्हें स्वयं को हटाकर परमात्मा के लिए मार्ग छोड़ देना है...वह अनंत है..ज्ञान स्वरूप है..वह जीवन को सुगंध से भर देना चाहता है..प्रेम, शांति, ज्ञान और आनंद की सुगंध से..