Showing posts with label बूंद. Show all posts
Showing posts with label बूंद. Show all posts

Friday, July 18, 2014

तुलसी और सूर



आज कितने सुंदर वचन उसने सुने, “बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर से बिछड़ कर मन व इन्द्रियों के सीमित जल में आ जाती है तो छटपटाने लगती है” सागर की मछली को सागर के बिना चैन आ ही नहीं सकता. जीव का सम्बन्ध ईश्वर से वैसा ही है जैसा बूंद का सागर से, उसे याद आया बचपन में एक कविता पढ़ी थी, एक बूंद निकल पड़ती है यात्रा पर और मरुथल में गिर कर खो जाती है, कभी कोई बूंद नदी में गिर जाये तो पुनः सागर से मिल सकती है. आज भी धूप बहुत तेज है, सुबह के आठ बजे ही दोपहर का भास हो रहा है. कल जून ने उन दिनों को याद किया जब वे यहाँ नये-नये आये थे, वे कुछ देर के लिए पुराने वक्तों में लौट गये और अच्छा लगा सारी बातों को मन के पट पर फिर से घटित होते हुए देखना. कल एक सखी परिवार सहित यात्रा पर जा रही थी पर ‘भारत बंद’ के कारण ट्रेन  नहीं चली सो स्टेशन से वापस लौट आयी, शाम को उन्हें भोजन के लिए बुलाया, इस बंद से सबका नुकसान ही नुकसान होता है कोई लाभ तो नजर नहीं आता. अगले हफ्ते उन्हें भी जाना है, यात्रा से पहले जो आशंका पहले होती थी अब बिलकुल नहीं होती. कल उसके पैर में दर्द हुआ था, पर उसने स्वयं से कहा, दुःख-दर्द तो शरीर को है, वह तो इससे अलग है, और मुस्करा दी. थोड़ी ही देर में दर्द महसूस होना ही बंद हो गया. भगवद् कथा का असर लगता है, हो रहा है, ईश्वर हर क्षण उसके साथ है. जून को आज फील्ड जाना है, उसे लंच अकेले ही करना पड़ेगा.   

परसों सुबह ‘जागरण’ नहीं सुन पायी, ‘केबल’ नहीं आ रहा था, कल सुना पर इतवार की सुबह बेहद व्यस्त होती है, डायरी लिखने का समय नहीं मिलता. आज भी धूप तेज है, मौसम का ताप प्रकृति कैसे चुपचाप सह लेती है, मानव ही हैं जो शिकायत करते रहते हैं. गीता में सुख-दुःख, मान-अपमान के साथ-साथ ग्रीष्म-शीत का जिक्र भी किया गया है. मौसम भी आया है तो जायेगा ही. आज गोयनका जी ने धर्म की परिभाषा बताते हुए कहा, “जिसे धारण किया जा सके, जो कर्म से जाना जाये न कि कर्मकांडों से, वही धर्म है”. बाबाजी ने भागवद की कई कहानियाँ सुनायीं, सुनकर भागवद् का अध्ययन करने की प्रेरणा होती है. नन्हे का स्कूल गर्मी के अवकाश के लिए बंद हो चुका है. वह केक बनाने के लिए कह रहा है, बच्चों की फरमाइश भी बच्चों जैसी ही होती हैं.
“नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि नैतिकता के प्रति आस्था ही खत्म हो रही है. यदि चेतना का स्तर ऊंचा हो जाये तो मूल्यों की स्थापन अपने आप हो जाएगी.” आज किन्हीं जैन मुनि ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा. आज साढ़े सात बजे बिजली गुल हो गयी, सो बाबाजी से आज भेंट नहीं हुई. कल रात भी तीन बजे के लगभग बिजली गायब हुई थी कुछ देर के लिए. काफी देर तक नींद नहीं आयी, फिर आयी भी तो स्वप्नों भरी. गहरी शांत नींद उसे एसी में सोने से अक्सर नहीं आती, एक तो शोर दूसरे ताजी हवा नहीं आती, आज इस क्षण कैसी शीतल मंद बयार बह रही है.

आज भी कल सुबह की तरह मौसम शीतल है, पवन चेहरे को छूकर जाती है तो ठंडक का अहसास होता है. कल तक यदि ऐसा ही रहे तो उनकी यात्रा की सुखद शुरुआत होगी वरना तो...झुलसा देने वाली धूप में पसीना पोंछते वे रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे. अभी बाबाजी आने वाले हैं, अब संभवतः उनसे जून के दूसरे सप्ताह में ही मिलना हो, सो आज की पूरी बात वह ध्यान से सुनेगी. आज उन्होंने नारद की वह कथा सुनाई जिसमें उनका अहंकार तोड़ने के लिए भगवान विष्णु ने उन्हें वानर का चेहरा प्रदान किया था. साथ ही उन्होंने मन, बुद्धि आदि के विकारों को अपना न मानकर उन्हें दूर करने की बात कही, जब कोई उनसे एकाकार हो जाता है तो इलाज मुश्किल हो जाता है जैसे कोई डाक्टर या वकील अपना केस खुद नहीं देखते. ईश्वर से आग्रह करते हुए कि हृदय तो तुम्हारा घर है और तुम्हारे रहते हुए इसमें विकार रूपी चोर घुस जाएँ तो इसमें तुम्हारा भी अपयश होगा. तुलसी और सूर की भांति, “अब लौं नसानी अब न नसैहों”, अपने को शुद्ध करते जाना है. ईश्वर का नाम स्मरण आते ही मन कैसी करुणा से भर जाता है.