Showing posts with label चोट. Show all posts
Showing posts with label चोट. Show all posts

Friday, April 28, 2017

चीजलिंग का नाश्ता


आज सुबह एक स्वप्न देखा, पिछले दिनों भी कई अद्भुत स्वप्न देखे पर सुबह उठकर याद नहीं रहे, लिखा नहीं कुछ. कल देखा, एक विशाल नदी है, सागर जैसी. किनारे पर एक संकरी गली है, उसमें वह जाती है, एक गेंद जैसा हाथ में कुछ है, जो गिरकर दूर तक निकल जाता है. एक बच्चा उसे वहाँ से फेंक देता है जो नदी के किनारे के दलदल में गिर जाती है, वह उसे पकड़ने नदी में उतरती है गेंद को पकड़ते समय लहरों में आगे खींच ली जाती है. किनारे के लोग कहते हैं, डूब रही है, पर वह बड़े आराम से लहरों को पार करते-करते दूसरे किनारे पर पहुंच जाती है. आज पिताजी को डिब्रूगढ़ जाना था, वह लम्बी यात्रा से थक जाते हैं. आज दो सदस्याओं  के लिए लिखी विदाई कविताएँ टाइप कर लीं थीं. जून ने उनके लिए बहुत सुंदर कार्ड बनाये हैं.

पिछले दो दिन नहीं खोली डायरी. परसों से पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. दो दिन देशव्यापी बंद भी रहा. जून घर पर ही थे. सुबह वे टहलने नहीं गये, शाम को जाना है. फूलों का दर्शन भी करना है. गेस्ट हॉउस व क्लब में फूलों का मेला लगा है. सुबह उठे तो पिताजी बिस्तर पर नहीं थे, वे दोनों पानी पी रहे थे कि जोर की आवाज आई. जून दौडकर गए, बाथरूम का दरवाजा बंद था अंदर से उनकी आवाज आयी, गिर गये हैं, पर ठीक हैं, अभी दरवाजा खोलते हैं, पर दो-तीन मिनट बीत गये, फिर दुबारा पूछा तो बोले, खोलते हैं, रुको. दो-तीन मिनट और बीते तब दरवाजा खोला. उनके सिर पर बाएं ओर चोट लगी थी, हल्का गुलाबी रंग हो गया था, पर खून नहीं निकला था. उन्हें बिस्तर पर लिटाया. वे सो गये. कुछ देर बाद उन्हें उठने के लिए कहा तो मना करने लगे. फिर दर्द के कारण जब सिर को दबाया तो खून निकल आया. उन्हें अस्पताल ले गये, पट्टी बांध दी है और दवा भी दी है. अब नाश्ता करके बाहर बैठे हैं, धूप उन्हें अच्छी लग रही है. आजकल वह अपने को बहुत दुर्बल मानने लगे हैं, बात-बात पर उनकी आँखें नम हो जाती हैं. वृद्धावस्था व्यक्ति को विवश कर देती है. अभी फरवरी चल रहा है पर धूप में तेजी आ गयी है.

फिर तीन दिनों का अन्तराल. आज पिताजी का सी टी स्कैन हुआ. सोमवार को रिपोर्ट मिलेगी. जून कल दिल्ली जा रहे हैं, बुध को डाक्टर को मिलते हुए लौटेंगे. उनकी किडनी में शायद कुछ समस्या हुई है. उम्र ज्यादा होने पर शरीर के अंग अपनी कार्य क्षमता खो बैठते हैं. कल शाम बंगाली सखी की दीदी आयी थीं, उनके लिए एक कविता लिख भेजी है, उन्हें अच्छी लगी. जून सुबह से पिताजी के साथ ही थे अस्पताल में, अब दफ्तर गये हैं. बड़ी ननद की बड़ी बेटी ने पुत्र को जन्म दिया है. दुनिया इसी तरह चलती जा रही है. उसका अंतर परमात्मा के प्रेम से लबालब भरा हुआ है ! उसका साथ कितना मधुर है. जगत भी सुंदर है तो उसी के कारण, क्योंकि जो चेतना उसमें है वही सबमें है, सब उसी के कारण जीवंत हैं.


शाम के पौने पांच बजे हैं, अभी आकाश में सूरज का उजाला है, विदा लेते हुए सूरज का अंतिम उजाला. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, उन्हें मूड़ी व चीजलिंग गर्म करके दिए उसमें काला नमक व काली मिर्च डालकर, पसंद आये, पिछले दो दिनों से ब्लॉग पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया. लिखने की कोई वजह नजर नहीं आती, मन ध्यान में डूबा रहना चाहता है.

Monday, August 11, 2014

हाथ में प्लास्टर



हर रात नींद में जाते वक्त सभी संसार का त्याग करते हैं, सोये हुए व्यक्ति और मृत व्यक्ति में क्या अंतर है ? आज बाबा जी ने पूछा. रोज वह सुनती है कि संसार में सब कुछ अनिशचित है, परिवर्तनशील है, एक पल का भी भरोसा नहीं, कल इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया. नन्हा स्कूल से आया तो उसके दाहिने हाथ में दर्द था, बस स्टॉप पर एक लड़का उसके हाथ पर बैठ गया था, उन्हें उसके स्कूल जाना था सो दवा लगाकर वे चले गये. वापस लौटे तो उसके हाथ में सूजन थी और दर्द भी बहुत था. डाक्टर को फोन किया तो उसने आज सुबह एक्सरे करने की बात कही, एक्सरे में हल्का सा फ्रैक्चर है. सोमवार से उसकी छमाही परीक्षाएं हैं, दर्द में है फिर भी पढ़ रहा है. उसकी सहने की शक्ति नूना से कहीं अधिक है. कल सुबह वह परेशान थी तो सारा रूटीन गड़बड़ा गया था, आज सुबह नन्हे के साथ ही बीती. पिछले दो दिन दोपहर की पढ़ाई सिलाई के कारण नहीं कर पायी थी, पिछले दो दिनों की कविताएँ भी शेष हैं.

नन्हा हाथ के दर्द के बावजूद शांत भाव से पढ़ाई में व्यस्त है. पता नहीं सोमवार तक उसका हाथ ठीक हो भी जायेगा या नहीं, ईश्वर को जो मंजूर होगा वही होगा. वे अपनी अल्प बुद्धि का प्रयोग कहाँ तक करें. आज धूप बहुत तेज है, सुबह ही उनकी नैनी ने किचन खाली कर दिया था कि पुताई करने वाले मजदूर आएंगे. कल शाम को एक मित्र परिवार आया, नन्हे को शुभकामना कार्ड और चाकलेट दी उसे भी अच्छा लगा. उसका संगीत अभ्यास में पूरा मन नहीं लग पा रहा था, शायद गर्मी व उमस की वजह से अथवा ‘राग सोहनी’ के छोटा ख्याल की तानें बहुत कठिन हैं.

जो कुछ वह पढ़ती है, सुनती है उसका लाभ मन को सही-सही देखने के रूप में दीख रहा है. जब मन के विपरीत कोई कुछ कहता है तब कैसा विचलित हो जाता है, नसें तन जाती हैं और दुखद संवेगों का chain reaction शुरू हो जाता है. जैसे ही मन ने द्वेष जताया कि उसके विपरीत एक प्रतिक्रिया हुई और फिर उस के विरुद्ध एक और...अगर सजग नहीं रही तो कुछ ही देर में एक नया संस्कार जड़ पकड़ लेगा यदि सजग होकर देखा तो सब कुछ अपने आप विलीन होता जाता है. मन यदि गतिशील हो तो पानी की तरह है ठोस मन पर लकीर गहरी होगी ही. सभी को अपनी बात कहने का हक है, किसी को पसंद हो या न हो, उदार मन से सभी को स्वीकार करना और सुनना सीखना होगा. जून और नन्हा अस्पताल गये हैं, आज नन्हे को परमानेंट प्लास्टर लगाना पद सकता है, उसका दर्द अभी तक कम नहीं हुआ है. उसने बहादुरी से इस चोट का सामना किया है, किसी भी समय उन्होंने उसे उदास नहीं देखा.


पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. आजकल नन्हे के घर रहने के कारण समय कैसे बीत जाता है पता नहीं चलता. कल उसे चोट लगे पूरे आठ दिन हो गये. वे पहले की तरह सुबह जल्दी उठते हैं. जून आज ongc से आए अपने मेहमानों के साथ व्यस्त होंगे. कल शाम नन्हे ने पहली बार कहा कि वह अपने हाथ में लगे प्लास्टर के कारण परेशान हो गया है, सो उसने उसे व्यस्त रखने के लिए कुकिंग में साथ देने के लिए कहा. आज उन्होंने ‘अरबी दम’ बनायी. नन्हे को सारा सामान इक्कठा करने को कहा जो वह पहले भी किया करता था. अभी २-३ हफ्ते उसे और प्लास्टर के साथ रहना होगा. धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि एक हाथ से (वह भी बांया) काम करने पर असुविधा का सामना हर क्षण करना पड़ता है. नन्हा लेकिन अपने सारे काम कर लेता है सिवाय ब्रश पर पेस्ट लगाने के. उन्होंने घर पर किसी को कुछ नहीं बताया है, वे सभी लोग घबरा जायेंगे. एक बार तो फ्रैक्चर हुआ है, सुनकर ही कैसा भय लगता है, पर उन तीनो में से कोई भी भयभीत नहीं है. वे अपनी सामान्य जिन्दगी जी रहे हैं. नन्हा पढ़ाई, टीवी, व कम्प्यूटर में व्यस्त रहता है, शर्लक होम्स के किस्से उसे बहुत अच्छे लग रहे हैं. आज सुबह बड़ी ननद का फोन आया, बाकी कहीं से कोई पत्र या फोन नहीं आया है कई दिनों से. उसका भी अभी कहीं कोई पत्र भेजने का इरादा नहीं है. नन्हे का प्लास्टर खुलने के बाद ही लिखेगी. बाबाजी से रोज सुबह मिलना होता है. उस दिन रात को उसने उन्हें पुकारा था और स्वप्न में आकर उन्होंने जवाब भी दिया था. ध्यान करने का समय सुबह नहीं मिल पाता. नन्हे के स्कूल जाने के बाद ही सम्भवतः सम्भव होगा. शाम को अलबत्ता समय मिल सकता है या निकाला जा सकता है.  

Friday, March 15, 2013

1984-George Orwell



“Let all our passions and emotions go up unto Him. They are meant for Him, for if they miss their mark and go lower, they become vile and when they go straight to the mark, to the Lord, even the lowest of them becomes transfigured, He is the Beloved who is in this world more beautiful than Him? Let Him be the Beloved.”- Swami Vivekannd

  शनिवार को उनके लेडीज क्लब और दिगबोई लेडीज क्लब का सम्मिलित भोज था, बहुत सफल रहा. वह दिन उसकी यादों में एक अनोखे दिन की तरह सदा-सदा रहेगा. इतनी सारी महिलाओं के बीच, जिन्हें वे जानते भी नहीं लेकिन फिर भी एक अपनापन लग रहा था. अगली सभा में वह अवश्य कहेगी अपने इस अनुभव के बारे में. आज उसने दो खत लिखे, सुबह के सारे काम सम्पन्न हो जाने के बाद. कल शाम जून और उसने बगीचे में काफी देर काम किया. उसकी पड़ोसिन ने चायनीज गुलाब की दो कलमें दी थीं, उन्हें भी लगाया, उनके घर से आने तक उसमें नए पत्ते आ जायंगे शायद. कल रात उसने कई सपनों के मध्य एक मजेदार स्वप्न देखा, पिता को एक अरब रुपया मिलने का स्वप्न. 

  कल नन्हा स्कूल से आया तो उसके दोनों घुटनों में चोट लगी थी, शाम को दर्द काफी था. जून स्कूल जाने से पहले अस्पताल ले गए. जाना ही था क्योंकि आज सोशल साइंस का टेस्ट है, स्कूल जाते वक्त वह हँस रहा था. कल पड़ोस के बच्चे को भी किसी ने कान पर मार दिया था. शायद सभी बच्चे इसी तरह बड़े होते हैं. आज सुबह से हल्के बादल हैं इससे गर्मी कम है. कल रात गर्मी के कारण पहले नींद नहीं आ रही थी. उसने घड़ी की ओर देखा, आज सरदार जी की दूध की गाड़ी नहीं आयी, वे तिनसुकिया से रोज इसी समय तक आ जाते हैं. जून आज फील्ड गए हैं, देर से आएंगे, उसने सोचा कुछ देर के लिए तेलुगु सखी के यहाँ मिलने जायेगी.

 हाँ, आज से वह “उसे” ही सम्बोधित करके ही लिखेगी. उसी ने अभी उसे आवाज दी थी न, पर जब फोन उठाया तो कोई आवाज नहीं, क्या मौन ही उसकी आवाज है ? नन्हे को स्कूल में फिर चोट लग गयी उसी जगह पर वह बहादुर है, है न ? जैसे वह हमेशा उसकी सहायता करता है, वैसे ही उसकी भी करेगा और जून की भी. वह तो सब जानता है. आज जून सुबह फील्ड जाने के लिए जल्दी चले गए और देर से आएंगे, कल यूँही उसने उन्हें दुःख पहुँचाया, अब से वह सिर्फ उसी से शिकायत करेगी, इस जग के किसी भी प्राणी से नहीं, वह ही तो है जो उसकी वर्षों की बेवकूफियों को सहता आ रहा है...फिर भी अपना हाथ उसके सिर से नहीं हटाया है उसने...वह कोशिश करेगी कि कभी भी उसे न भूले, क्योंकि जब वह याद रहता है तो वह ओछा काम कर ही नहीं सकती. आज गगन में बदली छायी है, कल शाम को बादल नहीं थे, पर रात जाने कहाँ से आ गए, वर्षा होने लगी, उसने जो बीज डाले थे अब उसके ही हवाले हैं, चूँकि अब उसका हर काम उसे ही संवारना है, क्या ज्यादा बोझ नहीं डाल रही है उस पर..वह हँस रहा है..उसकी आँखों में आँसू भरकर वह हँसता है...oh God I love You ! I love You so much! वह व्यर्थ ही उससे डरती थी.

  आज सुबह लिख नहीं सकी, क्योंकि जाले साफ करवा रही थी, सारे कमरे अस्त-व्यस्त पड़े थे, फर्नीचर के पीछे एक महीने में कितनी गंदगी इकट्ठी हो जाती है. फिर जून आये, सुबह भी वेल गए थे, दोबारा गए हैं और वहीं से तिनसुकिया जायेंगे. उनसे नेप्थलीन बाल्स के लिए कहना है. वह सोच रही है इस बार हेयर कट कैसे करवाए, छोटे या बस ट्रिमिंग ही. घर जाने से पहले तिनसुकिया तो नहीं जा पायेगी, कोलकाता में ही करवाना होगा. इस समय धूप निकल आई है, धूप में धुले पौधे कितने सुंदर लग रहे हैं. सुबह नन्हे को फिर जल्दी-जल्दी कम करने के लिए कहा, उसने उसे रोका भी नहीं. George Orwel की किताब 1984 समाप्त कर दी, new speak, thought crime, good thing, Eurasia जैसे शब्द कुछ दिन याद रहेंगे फिर कहीं खो जायेंगे लेकिन लेखक की कल्पना शक्ति का लोहा मानना ही पड़ेगा.  

  डेढ़ बजे हैं दोपहर के, यूँ यह लिखने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि रात को डेढ़ बजे कभी लिखे यह नामुमकिन तो नहीं कठिन जरूर है. सिर में हल्का सा भारीपन है, उसका कहना जो नहीं मानती, मन को अखाड़ा बनाये रखने से तो दर्द होगा ही, अनेकानेक इच्छाएं जन्म लेती हैं, पूरी न होने पर उनको पूरा करने का प्रयास.. फिर असफल होने पर झुंझलाहट, इन सबका परिणाम है अशांत मन...जून देर से आये, खाना उसने अकेले ही खाया. पिछले कई दिनों से वह बहुत व्यस्त थे, जी.एम. उनके काम से खुश हैं, आज मीटिंग में पार्टी है इस खुशी में. कल उसकी एक परिचिता आयी थी परिवार के साथ, दो किताबें ले गयी है उसकी किताबों की अलमारी से. उसने सोचा, लिखना छोड़कर काम शुरू करेगी, ‘श्रम’ बेहतरीन उपाय है मन को स्थिरता देने का.









Thursday, March 15, 2012

लाल मिर्च


उस दिन नूना के पैर की अंगुली में चोट क्या लग गयी, जून ने उसे कहा, पलंग पर बैठ जाओ. वह खुद किचन में गया है, भोजन लाने. आज वह मोरान भी नहीं गया. उसे अकेला छोड़कर जाना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगता. दवा लगा कर पट्टी भी बांध दी है. उसका यह स्नेह देखकर कभी कभी उसे लगता है क्या वह इसके योग्य भी है. पर अगले ही पल वह सोचती है अगर वह न होती तो उसका प्रेम किस तरह प्रकट हो पाता. आज वे एक अच्छी सी श्वेत-श्याम फिल्म देखने गए, ‘दोस्ती’. गीत बहुत मधुर थे. मुहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज का तो कहना ही क्या. दोपहर को उनकी तेलुगु मित्र आयीं थीं, शाम को दक्षिण भारतीय भोजन का निमंत्रण देने. वे गए थे और दोसे के साथ लाल मिर्च के पाउडर की चटनी पहली बार देखी.
आज वह पिता से उपहार में मिले पार्कर पेन से लिख रही है, जब उन्होंने दिया तो उसने कहा इतना महंगा पेन, वे बोले, तुम भी तो महंगी हो, और वह उनका मुख देखती रह गयी कुछ न कह सकी. उसने सभी को पत्र भी लिखे. रेडियो पर गाना आ रहा है, 
जब शाम का आंचल लहराए
और सारा आलम सो जाये
तुम मुझसे मिलने शमा जलाये
ताजमहल में आ जाना

उन्होंने स्वेटर निकाल लिए हैं और स्नान भी गर्म पानी से शुरु कर  दिया है. कल वे डॉक्टर के पास भी गए थे. कुछ दिनों में पता चलेगा कि उनके जीवन में क्या कोई गुल खिलने वाला है. पिछले दिनों वे इस बात को लेकर भी कुछ परेशान थे पर अब नहीं हैं. वे दोनों तो इस दिन को लेकर कितने सपने भी देखते थे.