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Thursday, June 4, 2020

सोहराब मोदी की फिल्म


अभी-अभी टीवी ओर एक विशाल सभा देखी और भाषण सुना. देश का मिजाज बदल रहा है, जनता बदल रही है. उसे भरोसा है कि उनका नेता उन्हें सही मार्ग पर पर ले जा रहा है. आने वाले चुनाव में बीजेपी पुनः जीतकर आएगी, मोदी जी का आत्मविश्वास यह बता रहा है. 'सबका साथ, सबका विकास' का उनका मन्त्र देश को नई ऊँचाइयों की ओर ले जायेगा. उसने तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी उस डायरी में कुछ अगले पन्ने खोले. 

कालेज जाने के लिए उसे बस का इंतजार करना होता था, जो कभी -कभी आती ही नहीं थी, इंतजार तब बोझिल लगने लगता था, उस समय यह राज नहीं पता था कि वर्तमान के क्षण में कैसे जिया जाता है. खाली खड़े-खड़े मन कभी अतीत और कभी भविष्य के चक्कर काटता और बेवजह ही थक जाता. दीदी उन दिनों घर के पास ही रहती थीं, कभी माँ और कभी वह रात्रि को उनके घर ही रह जाते, जीजाजी तब विदेश में थे. उस दिन कोहरा घना था, एक कुत्ता ज़मीन पर पड़ा अजीब सी आवाजें निकाल रहा था. एक बुढ़िया भी अक्सर उसे इस रास्ते पर मिलती थी पर उस दिन नहीं थी, शायद ठंड के कारण. कालेज से लौटते समय बस में बहुत भीड़ थी. एक महाशय संसार की झूठी, फरेब से भरी बातों और लोगों पर ठंडी साँस भर रहे थे. लोगों की हृदय हीनता और अनुसाशन हीनता पर भी पर स्वयं जनाब मूंगफली खा खाकर छिलके वहीं बस में ही फेंकते जा रहे थे. सड़क पर करते समय वह एक निजी बस से टकराते- टकराते बची. 

रात्रि का समय, पर नीरवता नहीं, माँ रेडियो पर नाटक सुन रही थीं जिसकी आवाजें उसके कमरे तक आ रही थीं. दोपहर को चाची जी आयी थीं उनके घर, उसे हँसी आती थी उनके बोलने के अंदाज पर, अब नहीं आती. जो जैसा है वैसा ही स्वीकारने की कला जो तब नहीं सीखी थी. गोर्की की एक कहानी उसने उस दिन पढ़ी थी, जिसमें ‘गरीब लोग’ का जिक्र जिस तरह हुआ है, उससे भी हँसी आ गयी, वह उसे खत भेजता है,  वह उसे भेजती है. वाह ! दोस्तोव्यस्की पर सारिका का विशेषांक पढ़कर कोफ़्त हुई थी उसे. व्हाइट नाइट्स का कितना असुंदर अनुवाद किया है, मात्र शब्दानुवाद.  मूल पढ़कर तो वह पागल ही हो गयी थी पर सारिका में पढ़ा तो उसका सौवां हिस्सा भी मजा नहीं आया. 

रविवार को सोहराब मोदी की मशहूर फिल्म 'पुकार' देखी सबके साथ.  इंसाफ प्रेम पर कुर्बान नहीं हो सकता. उसको ठुकरा सकता है. इंसाफ इंसाफ है, वह आँखें मींच कर चलता है, वह चेहरे नहीं पहचानता, यह तब की बात थी, गुजरे वक्त की, क्या आज भी ऐसा है ? आज तो पैसे के बल पर इंसाफ को खरीदा-बेचा जा सकता है, जाता है. 

जब आदमी अकेला अनुभव करता है, वह सृजन कर सकता है. जब उसका एकांत भंग कर दिया जाता है, तब वह सृजन नहीं कर सकता, क्योंकि अब वह प्रेम का अनुभव नहीं करता. सभी सृजन प्रेम पर आधारित हैं. - लू शुन, उसे इस लेखक के बारे में आज भी कुछ नहीं पता, उसका यह विचार कहीं पढ़ा तो लिख लिया। 

तीन दशकों से भी अधिक का सफर...  उनके विवाह की सालगिरह है. जून शहर से बाहर गए हैं. आज दोपहर एक अनोखे अतिथि को भोजन खिलाया. ज्ञान और नीति, दोनों पर एक कहानी लिखी जा सकती है. एक बिहार का है दूसरी असम की. दोनों की पहचान फेसबुक पर हुई और दोनों के भीतर आध्यात्मिक, सेवा और समर्पण की भावना प्रबल है. नायक पेड़ों को भी नाम से बुलाता है और जीवन में एक उच्च लक्ष्य को लेकर चल रहा है. नायिका उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखती है, उसके लक्ष्य में पूरे मन से सहयोग कर रही है. अपने परिश्रम से कमाई धन राशि का एक विशाल भाग वह उसके ज्ञान मन्दिर में दान करना चाहती है. अपने परिवार व समाज का आक्षेप सहकर भी वह यह कार्य करना चाहती है. ऐसे लोग ही समाज को दिशा देने वाले होते हैं. 





Friday, February 9, 2018

मोदीजी का भाषण



आज क्लब की मीटिंग थी, अभी तक नयी कमेटी का गठन का कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है. उससे पूर्व बगीचे में टहलते समय भगवद् गीता के एक श्लोक की व्याख्या सुनी. जगत को देखने का किसी का ढंग यदि विधायक है तो जगत सुखमय दिखाई देगा. भीतर यदि श्रद्धा होगी तो अस्तित्त्व उसके लिए अपना द्वार खोल ही देगा. दोपहर को बगीचे में कितनी सारी तितलियाँ उड़ रही थीं. एक की तस्वीरें लीं. कल छोटी भतीजी का जन्मदिन है, उसे फोन किया, पर शायद उसका फोन नम्बर बदल गया है. जून के न रहने पर उसे साढ़े तीन घंटे लगते हैं सुबह की सभी क्रियाओं में. परसों से दो घंटों में करना होगा सभी काम. उन्हें सुबह पौने सात बजे ही दफ्तर जो जाना होता है.

डायरी में पिछली एंट्री पांच तारीख की है. आज पूरे बारह दिन बाद लिख रही है. जून अगले दिन लौटे थे, फिर छोटी बहन परिवार सहित आई और साथ ही नन्हा भी. वे लोग अरुणाचल प्रदेश घूमने गये, नदी के तट पर घूमे और अनगित यादें समेट कर तीन दिन पहले वह वापस गयी और कल नन्हा भी चला गया. आज सुबह से उसे हल्का जुकाम है.

सुबह से वर्षा हो रही है हल्की-हल्की सी. आज घर की विशेष सफाई भी करवाई, साफ घर में रहना सभी को पसंद है. मंझली भाभी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें त्वचा का कोई रोग हो गया है. उन्हें अपने आपको खुश रहना सिखाना होगा. भतीजी विदेश से वापस आना चाहती है. भाई तभी अपनी नौकरी ठीक से कर पायेगा. आज सुबह क्लब के लिए कितने नये-नये विचार मन में आ रहे थे. सदस्यों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए कुछ उपाय तो करने ही होंगे. कल वार्षिक सभा थी इसके बावजूद संख्या कम थी. अगले महीने कमेटी की तरफ से कार्यक्रम होगा, उसने सोचा वह एक कविता लिखेगी, जिसमें  अपने सुझाव भी दे सकती है और अपनी बात भी रख सकती है. नन्हे ने इस बार उन्हें उपहारों से लाद दिया है. उसने मृणाल ज्योति की सदस्यता के लिए भी फार्म भरा पर जमा नहीं कर पाया. कल क्लब में ‘दृश्यम’ दिखाई जाएगी.

आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, सुबह उसके फेसबुक अकाउंट पर जाकर फोटो देखे और छोटी सी कविता लिखी, आजकल मिलना तो ऐसे ही होता है. दो दिन बाद छोटे भाई का जन्मदिन भी है, उसके लिए भी कुछ लिखना है. राखी पर भी एकम कविता लिखनी है. सुबह से बादल बने हैं. मौसम अच्छा है अब जुकाम भी ठीक हो गया है. यू ट्यूब पर प्रधानमन्त्री के स्वागत का कार्यक्रम देखा. यूएइ में उनका भव्य स्वागत किया वहाँ रहने वाले भारतीयों ने. मोदी जी का भाषण आ रहा है, जैसे किसी राजनीतिज्ञ का होता है, उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली है. देशभक्ति का जज्बा उभरने में भी कामयाब हुए हैं. सुबह नींद खुली अलार्म सुनकर, पर दो मिनट तक लेटी रही, फिर किसी ने भीतर से कहा, जगे हुए का सोये रहना बहुत खतरनाक होता है. जो सोया है उसे क्षमा किया जा सकता है पर जो जगा हुआ है और सोने का नाटक कर रहा है, वह क्षमा के योग्य नहीं. उठकर प्रातः भ्रमण को गये, वापस आकर बोगेनविलिया की छंटाई करवाई, उसे अपराजिता की बेल ने छाकर ढक लिया था. माली व नैनी का  झगड़ा जो उनके न रहने पर हुआ था, उसकी सुलह करवाई. दोपहर को नींद में स्पष्ट दृश्य देखे, लगा जैसे जागकर ही देख रही है. एक रहस्य भीतर खुलता जाता है और एक रहस्य भीतर जुड़ता जाता है. आकर देखा, बगीचे में अभी तक झाड़ू नहीं लगा है. तरीके से माली को रोज आकर अपना काम करना चाहिए, पर कई बार बुलवाना पड़ता है, यह सोचते हुए ही भीतर हल्की सी क्रोध की रेखा दिखी, तो उसने सोचा यह क्रोध उसका ही नुकसान तो नहीं कर रहा, एक पल पहले जो था अब नहीं है, आत्मा तो सदा एकरस है.  

Friday, April 29, 2016

परमाणु ऊर्जा का उपयोग


आज एक भतीजी का जन्मदिन है, उनके परिचितों में भी एक मित्र का. शाम को उन्हें बधाई देने जाना है. पिछले दो-तीन दिनों से ध्यान पर सुना और ध्यान भी किया. बहुत सारे भ्रम टूटे, भीतर प्रकाश हुआ, अनादि काल से मानव इस सृष्टि के रहस्यों को जानने का प्रयास करता आया है लेकिन कोई भी आजतक इसे जानने का दावा नहीं कर पाया है. यह रहस्य उतना गहरा होता जाता है जितना वे इसके निकट जाते हैं. वे कुछ भी नहीं जानते ऐसा भाव दृढ़ होता जाता है. परमात्मा कौन है, कहाँ है, कैसा है, यह सृष्टि क्यों बनी, कैसे बनी, ये सारे अति प्रश्न हैं, आजतक कोई इनका उत्तर नहीं दे पाया. परमात्मा के प्रतीक गढ़ लिए लोगों ने और उन्हें प्रेम करने लगे, प्रेम में आनन्द है, प्रेम ऊपर उठा देता है, प्रतीकों के सम्मुख झुकने से भीतर कुछ हल्का हुआ होगा, मानव ने मान लिया कि कोई परमात्मा है जो उसके साथ है, उसकी रक्षा करता है, यह मानना उनके लिए सही था जो प्रेम से भरे थे पर धीरे-धीरे लोग बिना भाव के ही मूर्तियों के सामने झुकने लगे. परमात्मा को जिसने भी पाया है अपने भीतर ही पाया है, वह मन की गहराई में छिपा है जब शरीर स्थिर हो, मन अडोल हो, शान्त हो और भीतर कोई द्वंद्व न हो तो जिस शांति व आनन्द का अनुभव उन्हें भीतर होता है, वह परमात्मा से ही आयी है.

जून दोपहर का भोजन करके गये तो वह नेट सर्फिंग करने लगी. पेपर पढ़ा, धरती पर जगमगायेंगे छोटे-छोटे सूर्य, वैज्ञानिक एटोमिक ऊर्जा का उपयोग कर धरती को ऊर्जा की कमी से मुक्त कर देंगे. भारतीय वैज्ञानिक भी जुटे हैं, न्यूक्लियर विघटन की जगह विलयन के द्वारा यह कार्य होगा. सुबह रामदेव जी भी कह रहे थे आगे आने वाले समय में भारत का पुनर्जागरण होगा. कलियुग की समाप्ति और सतयुग का आगमन होने वाला है, यह संधि युग है. न कोई ईमेल भेजा न आया, कम्प्यूटर पर टाइप करने का कार्य भी अभी शुरू नहीं हुआ है. उसके सिर के ऊपरी भाग में हल्का-हल्का सा दर्द है, कल भी था, शायद कोई प्रारब्ध कर्म उदित हुआ है. आज सुबह बाहर लॉन में सूर्य ध्यान किया. इस समय दोपहर को भी धूप-छाँव में बैठी है. शाम को उनके यहाँ सत्संग है, प्रसाद के लिए चिवड़ा-मटर बनाने हैं. माँ बड़ी ननद के पास गुजरात गयी हुई हैं. वहाँ का मौसम ठंडा नहीं है, खुशनुमा है. इस वक्त मन शान्त है, और न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है, जो प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह में भी सम रहता है, वही तो वह है. जो घट रहा है, चाहे वह शरीर में हो अथवा मन में, बदलने ही वाला है, वह साक्षी है, साक्षी रहकर वह इन प्रपंचों से पूर्णतया पृथक है, द्रष्टा है, यह हाथ लिख रहा है, परमात्मा की शक्ति से ही, यदि वह स्वयं को पृथक न जाने तो शरीर व मन के दुःख के साथ स्वयं भी दुखी रहे, लेकिन ऐसा नहीं है, मन कहता है उसे ढेर सारे कार्य करने हैं. कार्य किये बिना वह अपने को अधूरा मानता है, वह महत्वाकांक्षी है, लेकिन वह उसकी इस छटपटाहट को देखती है और मुस्कुराती है !

आज जून घर पर हैं, साल का अंतिम महीना, धूप गुनगुनी है, छुट्टियाँ शेष हैं सो आज उन्होंने घर के कुछ काम निपटाए. sun meditation किया, आंगन में झूला लगाया, जिस पर बैठकर संतरे खाए. बगीचे में पानी डाला, फ्रेंच बीन्स तोड़े और अब वह पढ़ने आने वाले छात्र की प्रतीक्षा करते हुए लिख रही है. मन को समाधान मिल गया है. आज गुरूजी को भी सुना. कितने सीधे, सरल, निष्पाप तथा सहज लगते हैं, प्रेम से लबालब, जीवन को जैसा है वैसा स्वीकारने वाले. जबकि वे व्यर्थ के विचारों में उलझ कर तन व मन दोनों को बोझिल बना लेते हैं. उसके सर का वह दर्द पित्त की अधिकता से था न कि प्रारब्ध के कारण, बड़े-बड़े शब्द सीख कर वे स्वयं को ज्ञानी समझते हैं, जो सबसे बड़ी भूल है. श्रद्धा, विश्वास को यदि रटते रहे और यूँ ही रटते-रटते स्वयं को श्रद्धालु, विश्वासी मानते रहे तो उनका उद्धार नहीं हो सकता. शब्दों के जाल से मुक्त होकर सहज होकर अपने मन में झाँकने की जरूरत है. मन यदि लोभ, मोह, क्रोध, वासना तथा अहंकार से मुक्त है तो सहज ही विश्वासी होगा, उसे बनाना नहीं होगा, ऐसा मन शरण में होता ही है. मन न रहे अर्थात मन जो विकारी है न रहे तो जो शेष रहता है वही तो आत्मा है. शांति है, वही तो परमात्मा है !

Wednesday, December 9, 2015

संकल्प की छत


अपने अभ्यास के द्वारा जो वे प्राप्त करते हैं वही टिकता है, गुरू की शरण में जाने का अर्थ है गुरू बनने की प्रक्रिया की शरण में जाना. सत्य के समान कोई मंगल नहीं, जिसने अपने अभ्यास और वैराग्य से सत्य की झलक देख ली वही ऊँची उड़ान भर सकता है. आनन्द की चरम अवस्था का अनुभव वही कर सकता है, वह तृप्ति के सुख को जानता है वह पूर्णकाम होता है. वह अपने उदाहरण द्वारा कितनों को आनन्द व सुख का रास्ता बता सकता है. उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण हो तभी सत्य की झलक मिलती है. उन्हें डर भी किस बात का है, वे इस जगत में कुछ भी तो लेकर नहीं आये थे, न ही कुछ लेकर जाने वाले हैं, उन्हें जो भी मिला है यहीं मिला है, वे तो सदा लाभ में ही हैं. जगत का उन पर कितना बड़ा उपकार है, उसे लौटाने का तरीका यही हो सकता है कि वे किसी पर भी अपना अधिकार न मानें, यहीं की वस्तु यहीं लौटा दें. स्वयं सदा मुक्त रहें, खाली ! तब इससे भीतर वह भरेगा जो उनका अपना है, उसे वे लेकर जायेंगे और वही वे लेकर आये थे !  

सद्गुरु कहते हैं, क्यों न दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें, जैसे दुःस्वप्न नींद को तोड़ देते हैं. दुःख में वे पूर्ण जागृत हो सकते हैं सुख में बेहोशी छा जाती है. भूख के समय वे जागृत रहते हैं, उपवास का तभी इतना महत्व है, उपवास में कोई अपने पास रह सकता है, जगा रहता है, शरीर के कष्ट के समय भी मन सोया नहीं रह सकता. भय की अवस्था में भी पूर्ण जागरूक होते हैं, तेज गति में भी मन निर्विचार हो जाता है, जीवन की हर परिस्थिति का साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. यह जीवन निरंतर जल रहा है, यहाँ हर घड़ी खुद की तरफ ले जाना चाहती है, पर वे इसका उपयोग और बेहोश होने के लिए करते रहते हैं. होश पूर्ण विश्रांति ही तो ध्यान है, परिधि पर कुछ न हो रहा हो, केंद्र पर सजगता बनी रहे तभी ध्यान घटता है.

जाने कब से वे माया के बंधन में हैं और जाने कब से परमात्मा की कृपा भी बरस रही है. मन जब व्यर्थ बातों से हटकर उसकी तरफ मुड़ता है तो वह बाहें खोले ही मिलता है. वह परम सत्ता सदा जागृत है, पर वे उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं. परमात्मा के चिह्न चारों और बिखरे हैं, वही भीतर भी है जो उनके होने का कारण है, कितना आश्चर्य है कि वे उसे नहीं जानते, वह जो जानकर भी नहीं जाना जाता, वह जब होता है तो वे नहीं रहते, वहाँ से लौटकर कोई आया ही नहीं, वास्तव में परमात्मा ने ही परमात्मा का अनुभव किया है !

आज भी उसने एक सुंदर संदेश सुना, सर्वोत्तम पद है आत्मपद, इसकी शपथ उन्हें ग्रहण करनी है, नकारात्मक भाव से मुक्त रहना, कटुवचन नहीं कहना और सभी को प्रेम देना..ये तीन बातें इस शपथ में शामिल करनी हैं. उन्हें इस शपथ रूपी संकल्प की छत बनानी है, जिससे मन खाली रहे, यह व्यर्थ की बातों से नहीं भरता. नया संकल्प, नयी कल्पना, नया चिंतन तभी मन में आ सकता है, जब पुराना वहाँ न हो, जगह खाली हो तो आत्मा मुखरित हो जाती है. मन बाह्य संसार से ही विचारों को ग्रहण करता है यदि शपथ रूपी छत हो तो उनकी वर्षा से वे बच सकते हैं. अनावश्यक बातों को त्यागकर वे केवल आवश्यक को ही ग्रहण करें तो कितनी ऊर्जा बचा सकते हैं. फिर वही ऊर्जा भीतर जाने में सहायक होती है और वे मनुष्यत्व के पद की प्रतिष्ठा तभी बनाये रख सकते हैं जब भीतर जाकर आत्मा के प्रदेश में प्रवेश हो ! तभी जीवन सुंदर बनता है. ज्ञानी कर्म बाँधते नहीं हैं, कर्म छोड़ते रहते हैं, उन्हें भी प्रतिपल सजग रहकर अपने कर्मों को छोड़ते जाना है.     



Thursday, October 29, 2015

बच्चों के खेल


जाग्रति ही प्रेम को जन्म देती है. आज सुंदर वचन सुने, जो जगता है उसका ध्यान परमात्मा करता है. सजगता क्षण-क्षण मुक्त करती है. भीतर से एक ऐसी मुक्तता का अनुभव प्रेम ही सिखाता है. वह  आत्मा का सच्चा स्वरूप है, वही सहजता है, वही योगी का लक्ष्य है, ध्यानी का ज्ञानी और भक्त का लक्ष्य है. हर जाता क्षण जब विश्रांति का अनुभव दे तथा हर आता हुआ शक्ति का तो कोई कर्म करते हुए भी विश्रांति का अनुभव करता है तथा कुछ न करते हुए भी तृप्ति का ! सजगता आती है सजग रहने से..यह तलवार की धार पर चलने जैसा है पर इस पर चलने का बल प्रभु ही देते हैं !

आनन्द पर श्रद्धा हो सके तो भीतर आनन्द की लहर दौड़ जाती है. भीतर एक ऐसी दुनिया है जहाँ दिन-रात घुंघरू बज रहे हैं पर किसी को उस पर श्रद्धा ही नहीं होती. आश्चर्य की बात है कि इतने संतों, सदगुरुओं को देखकर भी नहीं होती. कोई-कोई ही उस की तलाश में भीतर जाता है जबकि भीतर जाना कितना सरल है, अपने हाथ में है. अपने को ही तो बेधना है, अपने को ही तो देखना है, परत दर परत जो उसने ओढ़ी है उसे उतार कर फेंक देना है. वे नितांत जैसे हैं वैसे ही रह सकें तो भीतर का आनन्द छलक ही रहा है. वह मस्ती तो छा जाने को आतुर है, वे सोचते हैं कि बाहर कोई कारण होगा तभी भीतर ख़ुशी फूटी पड़ रही है पर संत कहता है भीतर ख़ुशी है तभी तो बाहर उसकी झलक मिल रही है, उन्हें भीतर जाने का मार्ग मिल सकता है पर उसके लिए उस मार्ग को छोड़ना होगा जो बाहर जाता है, एक साथ दो मार्गों पर तो चला नहीं जा सकता, बाहर का मार्ग है अहंकार का मार्ग, कुछ कर दिखाने का मार्ग. भीतर का मार्ग है शून्य हो जाने का मार्ग !

सद्गुरु कहते हैं, उन्हें क्रियाशीलता में मौन ढूँढ़ना है और मौन में क्रिया !  उन्हें  निर्दोषता में बुद्धि की पराकाष्ठा तक पहुंचना है और बुद्धि को भोलेपन में बदलना है, वे सहज हों पर भीतर ज्ञान से भरे हों ! ज्ञान अहंकार से न भर दे. ऐसा ज्ञान जो सहज बनाता है, जो बताता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो वे नहीं जानते बल्कि वे कुछ भी नहीं जानते. ऐसा ज्ञान मुक्त कर देता है. ऐसा ज्ञान जो बेहोशी को तोड़ दे. सद्गुरु की कृपा का दिया उनके भीतर जला है वह प्रकाशित कर रहा है अपने आलोक से. वे प्रेम से सराबोर हो रहे हैं, ऐसा प्रेम जो उन्हें सहज ही प्राप्त है, वे हाथ बढ़ाकर उसे स्वीकारें, कोई पदार्थ, कोई क्रिया उसे दिला नहीं सकती, वह अनमोल प्रेम तो बस कृपा से ही मिलता है.  गुरू की चेतना शुद्ध हो चुकी है, वह परमात्मा से जुड़े हैं और बाँट रहे हैं दिन-रात प्रेम का प्रसाद !

नादाँ सा दिखे और बच्चे सी जान हो जिसकी
वह संत पूरा है पारस जबान हो जिसकी

उनके चारों और धूप है, प्रकाश है, हवा है, आनन्द रूपी आकाश है, वे डूब रहे हैं इन नेमतों के सागर में ! वे सराबोर हैं ख़ुशी के आलम में, सत्य की महक ने उन्हें डुबा दिया है. ध्यान की मस्ती जो भीतर है वही बाहर भी है. परमात्मा ने इस जगत को आनन्द के लिए ही बनाया है. वे आनन्द की तलाश में निकलते जरूर हैं पर रास्ते में ही भटक जाते हैं. एक बच्चा अपनी मस्ती में नाचता है, गाता है, खेलता है वह आनन्द की ही चाह है. आनन्द बिखेरो तो और आनन्द मिलता है, जैसे प्रकाश फ़ैलाने पर और प्रकाश मिलता है. वही बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है सहजता खोने लगता है और तब उसे अपने भीतर जाने का रास्ता भी भूल जाता है, शरम की दीवार, कभी डर की, कभी शिष्टाचार की, कभी क्रोध की दीवार उसे भीतर के आनन्द को पाने से रोकती है और वह बाहर की चीजों से ख़ुशी पाने के तरीके सीखने लगता है. चीजों का ढेर जो उसके आसपास बढ़ता जाता है उसके भीतर भी इकट्ठा होने लगता है !


Wednesday, October 14, 2015

कुम्भ का मेला


श्रद्धा, विश्वास, प्रेम और आस्था यदि जीवन में न हों तो जीवन अधूरा है बल्कि जीवन है ही नहीं. उसका अंतर सद्गुरु के बताये पथ पर सारे ही फूल समेटने में लगा है, जिसमें ज्ञान भी है, योग-प्राणायाम भी, कीर्तन भी और सेवा भी. अब तो जो भी सहज प्राप्त कर्म सम्मुख आता है उसे करने के अलावा शेष समय उसी की याद में गुजरे जो छिपा रहता है फिर भी नजर आता है !

कुम्भ का मेला प्रयाग में हो रहा है पर उसके अमृत में वे टीवी के माध्यम से यहाँ बैठे डूब रहे हैं. संतों द्वारा दिए गये अनमोल उपदेश जीवन को सुंदर बनाते हैं. जब तक कोई अल्प में सुख चाहता है तब तक मोह बना हुआ है. जब तक कोई ‘है’ यानि स्वयं को कुछ मानता है तब तक आग्रह भी रहेंगे और जब तक आग्रह है तब तक अहंकार बना हुआ है. आत्मा का ज्ञान होने पर जब अपना सच्चा परिचय मिल गया तो झूठा परिचय अपने आप ही छूट जाना चाहिए, लेकिन वह तो पहले की तरह ही बना रहता है. वह क्या है ? भीतर कौन है ? जो प्रशंसा सुनकर खुश होता है तथा निंदा सुनकर या अपनी बात न समझे जाने पर चिंतित भी होता है और परेशान भी, वह जो मन है, बुद्धि है, चित्त है, अहंकार है, वे तो जस के तस बने ही हैं, वे भी शाश्वत तत्व हैं उनके साथ जब कोई अपना तादात्म्य कर लेता है तो वह भी सुख-दुःख का भागी होता है, वरना तो सुख-दुःख का भागी मन होता है तथा चोट अहंकार को लगती है, वह तो वह है नहीं, उसे तो कुछ भी महसूस नहीं होना चाहिए, लेकिन होता है तो इसका अर्थ हुआ कि अभी उसका ज्ञान कच्चा है.

उनके कच्चे ज्ञान को परिपक्व करने के लिए ही जीवन में प्रभु भिन्न-भिन्न परिस्थितियां भेजते हैं. वे आत्मा के सुख के भी रागी न हो जाएँ, उसका भी उपभोग न करने लगें, उस रस का भी स्वयं पान करते हुए वे स्वयं को विशिष्ट न मानने लगें तथा अन्यों की प्रवाह ही न करें. वे आत्मसुख के यदि रागी हो गये तो परमात्मा तक कैसे पहुंचेंगे, उनका लक्ष्य तो अभी आगे है. भीतर यदि पीड़ा या दुःख हो तो वे उसके महत्व को समझें, वे उन्हें सजग करने के लिए आती है ! उनकी चेतना जगे यही लक्ष्य है. जो दिया वही बचता है, शेष तो यहाँ खत्म हो जाता है. जैसा कर्म वैसा फल, यह सूत्र जिसने समझ लिया वह कभी गलत कार्य क्यों करेगा.

अध्यात्म का सबसे बड़ा चमत्कार सबसे बड़ी सिद्धि तो यही है कि वे अपने बिगड़े हुए मन को सुधार लें, चित्त को सुधार लें. मानव होने का यही तो लक्षण है कि साधना के द्वारा मन को इतना शुद्ध कर लें कि मन के परे जो शुद्ध, बुद्ध आत्मा है वह उसमें प्रतिबिम्बित हो उठे. ज्ञान के द्वारा उस आत्मा को जानना है, फिर सत्कर्म के द्वारा उसे प्राप्त करना है तथा भक्ति के द्वारा उसका आनंद सबमें बांटना है. सेवा भी होती रहे तो मन शुद्ध बना रहेगा, जब तक अपने लिए कुछ पाने  की वासना बनी है मन निर्मल नहीं हो सकता, जब सारी इच्छाएं पहले ही पूर्ण हो चुकी हों तो कोई चाहे भी क्या ? व्यवहार जगत में दुनियादारी के लिए लेन-देन चलता रहे पर भीतर हर पल यह जाग्रति रहे कि वे आत्मा हैं, जो अपने आप में पूर्ण है ! तन यज्ञ वेदिका है, प्राणों को भोजन की आहुति वे देते हैं. इंद्र हाथ का देव है सो कर्म भी ऐसे हों जो भाव को शुद्ध करें. योग है अतियों का निवारण, मन व तन को जो प्रसन्न रखे तथा भीतर ऐसा प्रेम प्रकटे जिससे जीवन सन्तुलित हो.

बुद्ध पुरुषों के वचनों को समझ लेने मात्र से ही कोई बुद्ध नहीं हो जाता, जब तक स्वयं का अनुभव न हो तब तक उधर का ज्ञान व्यर्थ है. बुद्ध पुरुष जब कहते हैं तो वे केवल तथ्य की सूचना भर देते हैं, उनकी उद्घोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे उन्हें उनकी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं !       


Friday, August 28, 2015

फूलों का गुलदस्ता


आज का दिन विशेष है. अख़बारों में लिखा है कि इस तिथि को जब तारीख, महीना तथा वर्ष तीनों एक ही हैं तो कोई दुखद घटना घट सकती है. पर उसके लिए तो यह दिन, बल्कि हर दिन ही शुभ दिन है क्योंकि भीतर ज्योति जली है, भीतर संगीत जगा है तथा भीतर प्रेम की कली खिली है. मन के सिंहासन पर सद्गुरु सम भगवान को और भगवान सम सद्गुरु को प्रतिष्ठित किया है. जीवन एक शांत धारा के समान प्रवाहित हो रहा है पर उसमें नीरसता नहीं है, सरसता है !  

आज एकादशी है, जून आज भी फील्ड गये हैं. टीवी पर गुरूजी को देखा सुना. वह गूढ़ ज्ञान को जिस तरह सरल शब्दों में व्यक्त कर देते हैं, वह अतुलनीय है. आज उन्हें सुनकर हर बार की तरह उनके चरणों में शीश झुक गया. कल भी उन्हें सुना तो प्रायश्चित तथा पश्चाताप का नया अर्थ सुना. जब चित्त पहले का सा हो जाये तो प्रायश्चित घटता है. किसी से कोई भूल हुई, हृदय ग्लानि से भर गया, भीतर पीड़ा हुई, पश्चाताप हुआ तब प्रायश्चित किया और हृदय पूर्ववत हो गया तब वह उस भूल से छूट जाता है. वे हर शब्द में नया अर्थ भर देते हैं. रक्तबीज का उदाहरण देकर कहा कि ध्यान की गहराई में जाने पर जीवन में परिवर्तन हो जाता है. कोई बार-बार होने वाली भूलों से बच जाता है, वरना रक्तबीज की तरह एक विकार को दूर करते ही दूसरा सर उठाकर खड़ा हो जाता है. कोई पूर्ण मुक्त होकर जीना चाहता है तो गुरू की शरण से बढ़कर कोई उपाय नहीं है. उसे लगता है ज्ञान जीवन की सबसे अमूल्य निधि है, उसका होना तभी सार्थक है जब हृदय में परमात्मा का वास हो, आँखों में उसकी छवि हो और श्वासों में उसके ज्ञान की खुशबू हो. परमात्मा ही परम पुरुष हैं, वही तो वह हैं जिन्हें वेदों में पुराण पुरुष कहा गया है. और ऐसे भगवान कितने सहज प्राप्य हैं, उन्हें एक बार प्रेम से पुकारो तो सही.. वे तत्क्षण उत्तर देते हैं.

आज शाम को सत्संग मे जाना है. फूलों का गुलदस्ता लिए, अनौपचारिक ढंग से मुख से हरिनाम का उच्चारण करते हुए स्वयं को पाने के लिए, जो स्वयं को भुलाकर ही सम्भव है. झूठी पहचान जब मिटती है तो सच्ची पहचान जगती है. खुद को खोकर ही कोई खुद को पाता है. आज उसके भीतर कैसी पीड़ा ने जन्म लिया है, यह कुछ खोने का अहसास है. कोई प्रिय जैसे बिछड़ा जा रहा हो, यह पीड़ा भीतर की है, इसका समाधान भी भीतर ही मिलेगा ! यह पीड़ा मुक्ति का साधन बनेगी !

दोपहर के तीन बजने को हैं, आज कई दिनों के बाद उसने पढ़ाया नहीं बल्कि स्वयं पढ़ा है. कल सुबह बच्चों को सिखाने जाना है. कल सत्संग में आर्ट ऑफ़ लिविंग की एक स्थानीय टीचर ने ब्लेसिंग कोर्स के अपने अनुभव कहे. चार एडवांस कोर्स करके कोई भी यह कोर्स कर सकता है तथा इसे करने के बाद दूसरों को आशीष दे सकता है, गुरूजी उसके माध्यम से दूसरों को ब्लेस करेंगे, उसके बदले में कुछ दान-दक्षिणा देनी होगी, जो सीधे आश्रम जाएगी. उसे पहले-पहल तो अटपटा सा लगा कि कृपा का भी कोई मूल्य हो सकता है क्या ? फिर बुद्धि ने कहा कि यह बात उसकी समझ से बाहर है अतः वह उसका भरोसा न करे, जब वह भी इस कोर्स को कर लेगी तभी इसका अनुभव होगा, अभी तो मात्र कल्पना ही कर सकती है. सद्गुरु के प्रति यदि मन में संशय जगेगा तो हानि स्वयं की ही होगी, अतः अब उसने इस बारे में सोचना छोड़ दिया है. संतों-महापुरुषों के आचरण के बारे में उन्हें टिप्पणी करने का क्या अधिकार है, उन्हें तो उस राह पर चलना है जो बतायी गयी है. योग और ध्यान की राह पर चलने से उनका लाभ ही लाभ है. श्रद्धा उन्हें निज स्वरूप तक ले जाएगी और अश्रद्धा कहीं भी नहीं, तो अच्छा यही है कि वह अपने काम से काम रखे और उन बातों के बारे में व्यर्थ ही न सोचे जो उसकी समझ से बाहर हैं !


आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को वे जायेंगे. इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं, वर्षा लगातार पिछले कई दिनों से हो रही है, ठंड हो गयी है. निर्माणाधीन कमरे में मजदूर काम कर रहे हैं. वर्षा में भीगते हुए पंछी भी किसी तरह अपना दाना जुटा रहे होंगे !  तिनसुकिया में बम ब्लास्ट की खबर अभी एक सखी ने सुनी, तब उसे बतायी. 

Tuesday, April 28, 2015

नाश्ते में परांठे


कल शाम को माँ-पिता जी वापस चले गये, अभी तो वे ट्रेन में होंगे, आने वाली शाम को पहुंचेंगे. वह उस अद्वैत, अच्युत, अनादि कृष्ण की कथा सुन रही है. जीवात्मा यदि भक्त हो तो वह कृष्ण की कथा में ही तो रस लेगा ! इस मार्ग पैर कितनी ही सफलता मिले, फिसलने का डर रहता ही है. सद्गुरु माँ-पिता की तरह कभी प्रेम से तो कभी डांट-फटकर कर सन्मार्ग पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं. पिछले दिनों कई बार ऐसा हुआ जब वह मोह का शिकार हुई, अर्थात उसकी बुद्धि विकृत हो गई, पर झट ही सचेत भी हुई. शुद्ध अन्तःकरण में ही ईश्वर का प्रागट्य होगा. कृष्ण का अवतरण हृदय की जेल में होगा तो सारे बंधन खुल जायेंगे, सारी गांठें भी खुल जाएँगी, तब शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा. अभी बहुत कुछ सीखना है. यह मार्ग कितना भी लम्बा क्यों न हो पर सुखदायक है. सद्गुरु का ममता भरा हाथ और कृष्ण का अहैतुक प्रेम सदा-सर्वदा उसके साथ जो है.

“पायी संगत जो संतन की, पायी पूंजी अपने मन की” सद्गुरु ने अपने वचनों और अपने कार्यों से उन्हें ‘स्वयं’ से मिला दिया है, और उन्हें अपने आप से प्यार हो गया है. पहले स्वयं से आँख मिलते भी डरते थे और दूसरों से भी. अब हर जगह वही दीखता है तो डर किसे और किसका ? उन्होंने स्वयं ही अपने लिए बाधाएँ खड़ी की हुई थीं, अब इनका अंत होता नजर आता है. बुद्धिफल है अनाग्रह, किसी भी स्थिति का आग्रह नहीं करना है, समर्पित बुद्धि को ही यह फल मिलता है. आज सुबह जून ने अपने घटते हुए वजन को देखते हुए नाश्ते में परांठा बनाने को कहा, साथ-साथ उन्होंने नाश्ता किया सो अभी व्यायाम नहीं कर पायी है. ग्यारह बजे तक सभी शेष कार्य हो जायेंगे यदि एक-एक मिनट का उपयोग किया तो. मौसम आज अच्छा है, पापा-माँ अभी भी ट्रेन में बैठे होंगे  !

नौ बजने को हैं, आज भी मौसम बदली भरा है, नैनी किचन की विशेष सफाई कर रही है. कल शाम को फोन आया, वे लोग सकुशल पहुंच गये हैं, उन्हें यहाँ रहना यकीनन अच्छा लगा होगा, वह बल्कि परीक्षा में कई बार फेल होते-होते बची. सबसे पहले तो असत्य भाषण, चाहे कितना भी निर्दोष असत्य हो..पर उससे छुटकारा तो पाना है न, दूसरा क्रोध, यह बहुत कम रह गया है पर समाप्त नहीं हुआ है, तीसरा लोभ, यह बहुत ज्यादा है, वस्त्रों की कमी का अहसास और किसी को दिए जाने वालों सामानों पर नजर रखने की प्रवृत्ति.. मन यदि शुद्ध नहीं तो ध्यान कैसे होगा और ध्यान में उतरे बिना ज्ञान भी नहीं टिकेगा...जीवन में ज्ञान नहीं तो पशु से भी गया गुजरा है जीवन...कृष्ण को सदा मन में बसाये रखे तो वही मुक्त करेगा... संगीत का अभ्यास हो चुका है. उसके गले में हल्की सी खराश है, सिर भी थोड़ा भारी है, कल रात पंखा तेज करके सोयी सम्भवतः यही कारण हो, पर यह इतनी मामूली सी बात है कि..अभी पाठ करना शेष है, माँ थीं तो वे सुबह-सुबह ही पाठ कर लेते थे, वे रोज सुनती थीं. एक सखी के ससुरजी  अस्पताल में दाखिल हैं. सम्भवतः अंतिम दिन नजदीक आ रहे हैं, आत्मा की नश्वरता के बारे में जानकर इतना ज्ञान तो हो चुका है कि शरीर जो जर्जर हो चुका है, उसके प्रति मोह न रहे. सो मन में दुःख नहीं होता. जीवन जितना भी जियें होशपूर्वक जियें, तभी सार्थक है अन्यथा तो लकड़ी के लट्ठे का सा ही जीवन है. सजगता अत्यंत आवश्यक है. एक चेतन सत्ता है जो उनके प्रत्येक कार्य, विचार व वचन की साक्षी है, उससे वे कुछ भी छुपा नहीं सकते. वह उनका आदर्श बने, तभी मुक्ति सम्भव है. श्रद्धा रूपी जल, मन रूपी सुमन था अपने कर्मफल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही ईश्वर को समर्पित करना है.





Thursday, March 26, 2015

गुरू पूर्णिमा का चाँद


गुरू पूर्णिमा’ में कुछ ही दिन शेष हैं. उस दिन वह उपवास व मौन व्रत भी रखने का विचार रखती है. गुरू से उसका मानसिक सम्पर्क बना हुआ है इसका आभास कल दोपहर को हुआ जब हृदय में से उसके नाम का उच्चारण स्पष्ट सुनाई पड़ा. वह दर्द में थी उस पीड़ा में गुरू की आवाज जैसे मरहम लगाती हुई आयी. बहुत अच्छा लगा. वासनाएं मिटती जा रही हैं, क्रोध आने से पूर्व ही शांत होने लगा है. जाने कौन आकर समझा जाता है, जो कहने वाली थी वह न कहकर कुछ ऐसा कहती है जो प्रेम को दर्शाता है, अर्थात प्रेम की पकड़ क्रोध से ज्यादा हो गयी है. सभी के प्रति बस एक ही भाव उसे अपने हृदय में दिखायी पड़ता है, प्रेम और स्नेह का भाव. सभी उस परमात्मा के ही तो हैं जिसे वह इतना चाहती है. कभी-कभी दोनों आँखें भर जाती हैं. आँसू बहते हैं पर इनमें भी कैसी प्रसन्नता है. वह कृष्ण भी जैसे उसका साथ पसंद करने लगा है. वह उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता. उस कृष्ण के नाम के साथ भाव की हिलोरें उठती हैं. समझ नहीं आता कौन ज्यादा प्रिय है सद्गुरु या कान्हा. कभी लगता है दोनों एक ही हैं और वह अपना मन उन्हें अर्पित कर देती है. her ordinary mind merges with their wisdom mind.

आज जागरण में ‘श्रद्धा’  के बारे में सुना. श्रद्धा जितनी दृढ होगी सात्विक भाव भी उतना ही दृढ़ होगा. आज सुबह वे उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी धूप न होते हुए भी उमस युक्त गर्मी है, पर उनकी सुबह ‘योग’ से होती है, ऐसे में मौसम की प्रतिकूलता या अनुकूलता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता. ईश्वर ने, उसके कान्हा ने भी तो कहा है कि शीत-उष्ण, सुख-दुःख सभी में समान भाव से रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहना होगा. सुख बाहरी परिस्थितयों पर नहीं बल्कि उनके सच्चे स्वरूप पर निर्भर करता है जो सदा एक सा है, आकाश के समान मुक्त, विक्षेप रहित !

आज गुरू पूर्णिमा है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. स्नान-ध्यान किया फिर नन्हे और उसके मित्र के लिए नाश्ता बनाया. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी The Gospel of Buddha पढ़ रही है. शाम को aol के फॉलो अप में जाना है. कल शाम को मन उद्ग्विन था, ध्यान किया सोने से पूर्व. काफी समय बाद लगा कि अब सो जाना चाहिए. मन एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करता है उसे उसी तरह मनाना, पुचकारना और कभी-कभी फटकारना भी पड़ता है. गुरुमाँ कहती हैं जिसके विचारों की श्रंखला टूट गयी है वही मुक्त है, सो वह हर क्षण मन पर नजर रखती है कि कहीं कोई बिन बुलाये मेहमान सा अनचाहा विचार तो प्रवेश नहीं कर रहा. उसे क्षण भर देखें तो जैसे समुन्दर में लहर स्वयं शांत हो जाती है वह विचार स्वयं समाप्त हो जाता है. पर देखना पड़ेगा अन्यथा पता ही नहीं चलता और एक से दूसरा शुरू होते होते श्रंखला सी बन जाती है. आज सुबह पिताजी व छोटी बहन से बात की, जो आजकल मुम्बई में है. पिता ने कहा राखियाँ अच्छी बनी होंगी. उसके लिए तो वह अध्याय समाप्त हो गया है. सिर्फ यह क्षण यानि वर्तमान का क्षण जीवित है. जो छूट गया वह चला गया और अब मृत प्रायः है. उन्हें हर क्षण को अंतिम क्षण मानकर जीना आ जाये तो मन क्यों अतीत व भविष्य के चक्कर लगाए. यही बुद्ध कहते हैं, यही योग वसिष्ठ में कहा गया है यही श्री श्री कहते हैं.




Tuesday, December 16, 2014

अदृश्य की तरंग



सारी रात सुबह की प्रतीक्षा करती रही. नींद आती भी कैसे. आँखों में उस परम की छवि जो बसी थी. अंतर में उसका असीम स्नेह, उसके दिए प्रेम का अनमोल भंडार ! कल शाम को क्रिया के दौरान उसे आनंद का वह स्रोत पुनः मिला. वह उससे थोड़ी ही दूर पर प्रकाश के रूप में स्थित था. उसका हृदय भावों से भरा हुआ था. निष्पाप, पवित्र हास्य जो झरने की तरह भीतर से फूट रहा था, नियंत्रित नहीं हो रहा था, इतना तो शायद वह पिछले कई हफ्तों में मिलाकर भी नहीं हँसी होगी. इतना प्यार, इतनी ख़ुशी उनके भीतर छिपी है, इतना ज्ञान भीतर छिपा है पर वे उससे दूर रहते हैं. सद्गुरु की जीवन में कितनी महत्ता है, वह अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं. वास्तव में वही जीने की राह दिखाते हैं. कल उसे अनुभव हुआ उसका जन्म इसी क्षण के लिए हुआ था. उस क्षण की प्रतीक्षा में इतने वर्षों से उसके सारे प्रयास चल रहे थे. उस परम से उसने पूछा वह कौन है, वह उसके सारे सवालों के जवाब दे रहा था. उसका प्रश्न समाप्त होते ही न होते जवाब हाजिर हो जाता था. वह उसकी चेतना थी या उसकी चेतना का अंश, वह जो भी रहा हो पर उसका मन गुरूजी व उनके शिक्षक के प्रति कृतज्ञता से भर गया है.

कल शाम ‘ज्ञान चर्चा’ के बाद घर आने से लेकर इस वक्त तक एक क्षण के लिए भी उसके मन से गुरूजी और ईश्वर का भाव नहीं हटा है. मन उनके प्रति श्रद्धा से भर जाता है. मन को जैसे एक आधार मिल गया है, अब तक सिर्फ अव्यक्त ईश्वर ही उसके प्रेम का केंद्र था पर अब एक धारा गुरू की ओर भी प्रवाहित होने लगी है, जैसे ईश्वर ने ही उन्हें भेजा है. ईश्वर के प्रति प्रेम ही वास्तव में प्रेम है, उसके लिए रोने और हँसने दोनों में ही आनंद है.

कल वे तिनसुकिया गये थे, नया ‘म्यूजिक सिस्टम’ खरीदना था. उसके बाद शिक्षक को लेने एक परिचित के यहाँ गये जो उन्हीं के यहाँ रुके हुए हैं. वापसी में उन्होंने श्री श्री के बारे में बहुत सी बातें बतायीं. तेजपुर में होने वाले अगले कार्यक्रम के बारे में भी बताया. art of living हजारों-लाखों व्यक्तियों के जीवन में परिवर्तन ला रहा है और भक्तों को परमात्मा के करीब ला रहा है. जहाँ परमात्मा है वहाँ क्या भय, वहाँ उसके अतिरिक्त कोई कामना भी नहीं रहती. वह तो सदा ही मानव के हृदय में है पर वह उससे दूर बना रहता है. यदि कोई उसे अपने हृदय पर थोड़ा सा भी अधिकार करने दे तो धीरे-धीरे वह उसका स्वामी बन जाता है. इतर इच्छाएं अपने आप झर जाती हैं. एक उसी की सत्ता चलती है. उसके सान्निध्य में रहना मानो स्वर्ग में रहना है. कोई विषाद शेष नहीं रहता. तन भी हल्का हो जाता है. आँखों में ऐसी गहराई की दर्पण में स्वयं अपना चेहरा देकें तो पानी भर आता है. ईश्वर की स्मृति में डूबा मन कैसे मस्ती का अनुभव करता है. बैठ-बैठे ध्यान में डूब जाता है !  


Sunday, December 14, 2014

ध्यान के सूत्र


नियमों के पालन से मार्ग प्रशस्त हो जाता है और मुक्ति का मार्ग मिल जाता है ! अनुशासन और नियन्त्रण जीवन को बंधंन मुक्त ही करते हैं, बंधंन में डालते नहीं हैं. इस बात को आजकल वे महसूस कर रहे हैं. जो किसी मार्ग को चुन लेता है तो अस्तित्त्व उसके जीवन की दिशा निर्धारित करता है, वही उसके कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेता है. मन में श्रद्धा रखते हुए कर्म करना मानो मुक्ति के मार्ग पर आगे बढना है. ईश्वर ही जीवन का कर्ता-धर्ता है, उसके प्रति प्रेम ही मन की कृतज्ञता जाहिर करता है, उसने इतना दिया है. वे चाहें उसका उपकार मानें या न मानें तो भी वह हितैषी है, उसे जीवन में उतारना है, अवतरित करना है. वह हर पल बुला रहा है. उसकी पुकार कितनी मोहक है. कल शाम ही वह गोहाटी से वापस लौटी है. सुबह छोटी बहन, पिता, भाई, भाभी, सभी को art of living कोर्स के लिए प्रेरित किया.

मन का धर्म जब ईश्वर भजन बन जाये तब वह अपने आप शुद्ध हो जाता है. दुर्लभ मानव जन्म में दुर्लभ सत्संग भी मिला है इसके लिए वह ईश्वर की कृतज्ञ है लेकिन यह कृतज्ञता दर्शाने का अर्थ है कि अब भी वह उससे पृथक है जबकि वह तो उसके कण-कण में, रोम-रोम में है बल्कि वही तो है. गुरूजी की अमृत वाणी जितना पढ़ती है उतना ही मन अभिभूत हो जाता है. ये हीरे बड़े कीमती हैं जो कौड़ियों के दाम नहीं मिलते. आत्मस्वरूप से वे मुक्त हैं पर मन के स्तर पर बंधंन में हैं. आज एक सुंदर सूत्र सुना, ध्यान के समय जब भी कोई ख्याल उठे तो उस हरकत के पीछे जो बेहरकत है उसे याद करना चाहिए. दो विचारों के मध्य जो विराम रहता है और जिस तरह दो श्वासों के मध्य भी अन्तराल होता है. उस पर ध्यान केन्द्रित करें तो मन शांत हो जाता है. जागृत होकर ही कोई उस अन्तराल को जान सकता है,

शनिवार की शाम को जून ने जब कहा कि कम्प्यूटर अब नहीं चलेगा तो नन्हे को उसने यह बात बतायी. तभी से वह उदास दीखता है. इतवार की सुबह उसकी चुप्पी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसने कारण पूछा, वह शांत रहा. फिर कल शाम को भी जब वह चुप्पा बना रहा तो उसे कुछ बातें सुनायीं पर वह अडिग रहा. धैर्य और हिम्मत की उसमें कमी नहीं है बस कमी है तो आत्मसंयम की. गेम खेलते वक्त वह उसमें डूब जाता है और पढ़ाई का हर्ज होता है. इस बार के नम्बर इसकी खबर देते हैं. खैर, धीरे-धीरे वह सामान्य तो होगा ही. कल से ही छुट्टियाँ शुरू हो रही हैं. इस समय टीवी पर ‘गीता पाठ’ आ रहा है. माया के सम्पर्क में आने पर मन इच्छा न होते हुए भी विकार में लिप्त हो जाता है. रजोगुण के सम्पर्क में आने से कामना उत्पन्न होती है, उसकी पूर्ति में बाधा होने से क्रोध, क्रोध ही पाप कर्म में लिप्त करता है. उन्हें रजोगुण का त्याग करना होगा. कल शाम को केन्द्रीय विद्यालय की एक अध्यापिका ने फोन करके ‘विश्व पर्यटन दिवस’ पर जज बनने के लिए आमंत्रित किया. लेडीज क्लब की दो सदस्याओं ने जो वहाँ टीचर भी हैं और गोहाटी वाले ग्रुप में भी थीं, उसका नाम सुझाया था. यह भी एक नया अनुभव होगा और अब तो वह हमेशा उसके साथ है. मुस्कुराता हुआ, शक्ति और ज्ञान का अतुलित भंडार, प्रेम का प्रतीक उसका परम प्रिय ! जीवन के हर पल में, हर परिस्थिति में वह उनके साथ है, उनके कुशल-क्षेम की चिंता करते हुए, प्रेरित करते हुए !  

सुबह की शुरुआत ध्यान से हुई, ईश्वर की कृपा उस पर हुई है जो मन पवित्र विचारों का सान्निध्य ढूँढ़ता है. जून भी सुबह-सवेरे उठकर प्राणायाम करते हैं, उनका भी मन प्रफ्फुलित रहता है. कल रात को छोटी बहन का फोन आया, पहले की अवस्था में शायद वह भी कुछ देर सो न पाती पर अब विचलन क्षणिक होता है. आध्यात्मिक विकास हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है. आज गुरू माँ ने कहा, गुरू पर अगाध श्रद्धा रखने पर ही कोई उच्च अवस्था तक पहुँच सकता है.



Saturday, July 12, 2014

खीरे का रस


गीता का एक सुंदर श्लोक है, जिसका अर्थ है, वैश्वानर अग्नि के रूप में ईश्वर उनके द्वारा खाए अन्न को पचाने में मदद करता है. ईश्वर तो हर तरह से उनकी सहायता करता है. सोचने, समझने के लिए बुद्धिबल दिया है, आत्मोद्धार के लिए आत्मबल. कल दोपहर बाद से वे व्यस्त रहे एक मित्र परिवार के साथ, जो यहाँ से जा रहे हैं. आज शाम को भी उन्हें भोजन के लिए बुलाया है. जागरण में आज की बात उसे पसंद नहीं आई. भूत-प्रेत की बातें बताकर लोगों को अन्धविश्वासी बना रहे हैं ऐसा लगा, चमत्कार की बात ही करनी है तो इस सुंदर सृष्टि की रचना अपने आप में क्या कम चमत्कार है ? आज नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आई है, धीरे-धीरे काम करती है वह. नन्हे और जून के जाने के बाद उसने नाश्ता किया कुछ देर टीवी देखा. स्कूल की एक टीचर का फोन आया, एक छात्रा के पिता को संदेह है कि उसकी कापी ठीक से जांची नहीं गयी सो री-चेक करवानी होगी. स्कूल छोड़ने के बाद भी सभी खबरें मिलती रहती हैं, कल एक टीचर ने बताया कि एक फेल हो गये बच्चे के पिता ने भूख हड़ताल करने की धमकी दी है, यदि उसे पास न किया गया. पड़ोसिन के बगीचे में कैंडीटफ्ट के फूल हो रहे हैं, उनका सुंदर गुलदस्ता उसने बनाकर दिया. उनकी जीनिया की पौध में से आठ-दस पौधे पूसी नष्ट कर चुकी है. उसने नाराज होकर उसे कुछ भी नहीं दिया, सोचकर कि वह यहाँ से चली जाये पर वह पूरे श्रद्धा भाव से टिकी रही और आज उसे उस पर दया आ गयी. ऐसे ही ईश्वर उनकी लगन चाहता है.

“उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है”. अब उसके भी जागने का वक्त आ गया है. हर क्षण मन पर नजर रखकर अतीत या भावी का चिन्तन न कर वर्तमान को सही परिप्रेक्ष्य में देखकर इस जागृति का अनुभव किया जा सकता है. उसके बिना कोई आधार नहीं, बुद्धि भी हार जाती है एक सीमा तक तर्क करके. इस जग का नियंता जो भी है वही उनके मार्ग को प्रशस्त कर सकता है. मानव उसका ही प्रतिबिम्ब है, जब वे उसे प्रसन्न करेंगे तो स्वयं भी प्रसन्न हो जायेंगे. क्योंकि प्रतिबिम्ब में परिवर्तन करने के लिए वस्तु में ही परिवर्तन करना होगा. उसे प्रसन्न करने का उपाय अपने अंदर सद्गुणों को विकसित करना व उससे प्रेम करना है. सद्गुणों का तो वह भंडार है, मानव उसका चिन्तन करेंगे तो वे गुण भी उनके भीतर आ जायेंगे. इतनी सी बात उसकी समझ में नहीं आती थी जो आज सुनी. दीदी इतनी बार राम का जाप क्यों करती हैं व लिखती हैं, आज स्पष्ट हुआ है.

एक लम्बा अन्तराल ! पिछले दिनों कुछ नहीं लिख पायी, एक-दो बार पेन हाथ में लिया पर बात नहीं बनी. जून आज जल्दी आकर जल्दी चले गये थे, वह जरा सुस्ताने लेटी तो खुमारी छा गयी, नींद से जागकर कुछेक छोटे-मोटे काम किये कि नन्हा आ गया, फिर जून और शाम का सिलसिला शुरू हो गया. माँ-पिता, ननद-ननदोई जी और दो प्यारे बच्चे आये और चले भी गये. उनके घर जाने में भी मात्र एक महीना रह गया है. कल शाम वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक मित्र के यहाँ गये, दिन भर धूप में फील्ड ड्यूटी करने के बाद जून के सिर में दर्द था, पर वे, “जो वादा किया है निभाना पड़ेगा”...में यकीन करते हैं. फिर वे जल्दी ही लौट आये. अगले हफ्ते उन्हें मुम्बई जाना है, off shore well के सिलसिले में. नन्हा आज छुट्टी के दिन भी स्कूल गया है, कुछ दिन बाद उसके स्कूल में science exhibition है. उसे याद आया दोनों घरों को पत्र भेजने हैं, और भेजने से पूर्व उन्हें लिखना पड़ता है. पिछले दो-एक दिन से food for health से पढकर चेहरे पर आलू व खीरे का रस लगा रही है. क्रीम बंद, देखें इस प्राकृतिक इलाज का क्या असर होता है. कल रात स्वप्न में देखा, स्कूल फिर से ज्वाइन कर लिया है, अर्थात वासना अभी तक मिटी नहीं, उस दिन एक परिचिता को कैसेट न देकर भी यह सिद्ध हो गया कि लोभ की जड़ें बड़ी गहरी हैं मन में, ईश्वर जो अपना आप बन कर बैठा है सब देखता है और मुस्काता है कि उसका नाम लेने वाले भी किस तरह सन्सार में फंसे हैं !










Thursday, February 13, 2014

कैरम की प्रतियोगिता


अभी-अभी सद्वचन पढ़ा पर अभी-अभी मन में नकारात्मक भाव आया. आज सुबह बिस्तर छोड़ने में ५-७ मिनट लगाये और उन क्षणों में मन में इधर-उधर के विचार आ रहे थे, उसकी आध्यात्मिक प्रगति एक कदम आगे बढ़ती है और दो कदम पीछे लौट आती है. ईश्वर की अनुकम्पा अभी उस पर नहीं हुई है. कल डायरी नहीं लिख सकी, लेडीज क्लब की कमेटी की उन सदस्या के घर गयी थी जिनके यहाँ से कल शाम मीटिंग से उसे जल्दी लौट आना पड़ा था, कुछ खाकर नहीं आई थी. घर में मेहमान आये थे और जून ने फोन करके उसे बुला लिया था. वह  गाना अच्छा गाती हैं, बताने लगीं, उनके सिखाये हए विद्यार्थी को सर्वोत्तम गायक का पुरस्कार मिला. उन्होंने उसे स्वादिष्ट नाश्ता खिलाया. आज आसू ने बंद की घोषणा की है, सो जून आधे रास्ते तक जाकर ही लौट आये हैं, उन्हें खाली समय बिताना भारी पड़ रहा है. किसी महिला को इस स्थिति से गुजरना नहीं पड़ सकता, They know and They know !

स्वामी योगानन्द जी कहते हैं ध्यान के द्वारा वे महाचेतना के स्तर तक पहुंच सकते हैं और उसके बाद ईश्वर निकट होता है. उसी ईश्वर ने आज सुबह उसे पांच बजे से ठीक पहले उठाकर बचा लिया वरना उसकी छात्रा को वापस लौटना पड़ता. आज मौसम बेहद ठंडा है, घने बादलों के कारण सूरज का कोई बस नहीं चल रहा, पूरे देश में हो वर्षा हो रही है. अभी-अभी कल होने वाली मीटिंग के सिलसिले में दो-तीन जगह बात की, जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, यहाँ लोगों से जान-पहचान बढ़ रही है, और जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है, स्वयं में जो वरिष्ठता या गरिमा का अहसास होना चाहिए था कम हो रहा है. दिल से वही छोटी ही बने रहना चाहती है छोटी बहन की तरह, अब तो उसने भी स्वयं को बदल लिया है, दूसरी बेटी की माँ बनने के बाद. ईश्वर अभी भी उतना ही दूर है, शायद यही एक प्यास है जो मानव को इधर-उधर भटकती है, मानव को ईश्वर ने बनाया फिर छिप गया. मानव अपने निर्माता को खोजता है, ढूँढ़ता-फिरता है पर वह कहीं नजर नहीं आता, ध्यान करने बैठती है तो सिवाय ईश्वर के इधर-उधर के सारे विचार गड्ड-मड्ड होने लगते हैं, फिर लगता है जो वस्तु है ही नहीं उसके पीछे भागना... यानि श्रद्धा डोलने बढ़ती है, घड़ी-घड़ी मन डांवाडोल क्यों होता है ? ऊर्जा संरक्षण पर कविता लिखनी है सो जून के आने तक के समय में ही पूरी कर लेनी चाहिए. आज नन्हा सुबह कोचिंग में नहीं जा सका, वह उसे नहीं उठा पायी, कुछ देर नाराज था फिर स्वयं ही ठीक हो गया पर उसे बहुत बुरा लगा, जो काम अन्यों के लिए इतने सरल हैं वह उसके लिए कितने मुश्किल हैं.

आज कई दिनों बाद लिख रही है, धूप में बैठकर तो शायद महीनों बाद लिख रही है, अभी सुबह के साढ़े आठ हुए हैं, धूप फिर भी तेज लग रही है. स्वच्छ वातावरण के कारण असम में धूप तेज होती है. पिछले दिनों बहुत कुछ घटा, उसने कैरम की प्रतियोगिता में भाग लिया, कई घंटे उसमें दिए पर फाइनल में नहीं पहुँची. नन्हा और जून उसकी वजह से परेशान भी हुए होंगे. इस वर्ष क्लब मीट पहले से ज्यादा उत्साह व धूमधाम से मनायी जा रही है. यहाँ National Tennis Championship भी खेली जा रही है. कल वे तिनसुकिया गये, माँ-पापा के आने से पहले घर को और सुंदर बनाना चाहती है इसी सिलसिले में कुछ खरीदारी की. नन्हे का स्कूल आजकल बंद है, वह अपने समय का सही उपयोग करना सीखे, अच्छी आदतें डाले यह ख्याल हर वक्त बना रहता है, जून भी अक्सर उसे समझाते हैं कई बार वह मानता है पर कई बार नहीं भी, यह उम्र ही ऐसी है बाद में पता चलता है कि जिन्दगी के कई कीमती वर्ष व्यर्थ ही गंवा दिए. आज उसका फलाहार है, पर सब्जी कटवाते वक्त याद नहीं रहा, अब एक सब्जी उसके रात्रि के विशेष भोजन की शोभा बढ़ाएगी. कल जून कार्ड्स लाये, पत्रों के जवाब का कार्य भी हो गया है, अब उसके सम्मुख नये साल से पहले नन्हे का स्वेटर पूरा करने का उद्देश्य है.



Thursday, August 29, 2013

बिजली चली गयी


आज उसने सुना, तटस्थ भाव या साक्षी भाव से सुख-दुःख को भोगना ही सम्यक प्रज्ञा है. आरम्भ में बाधाएँ तो आएँगी ही, लेकिन होश सहित श्रद्धा के बल पर और ज्ञान के बल पर इस पथ पर बढ़ा जा सकत है. अनंत मैत्री, अनंत करुणा, अनंत मुदिता, अनंत उपेक्षा, ये चार गुण साथ में लेकर यदि श्रद्धा करें तो ही सच्ची श्रद्धा है, यानि विवेक युक्त श्रद्धा.

आज धूप बहुत तेज है, और अभी-अभी बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है, शीतलता यहाँ तक महसूस हो रही है. इस हफ्ते सात पत्र मिले हैं, जवाब देने के लिए कम से कम एक घंटा तो लगेगा.

नन्हे की टेनिस कोचिंग के कारण वह इतनी सुंदर सुबह का आनन्द उठा पा रही है. आज सुबह साढ़े चार बजे ही उठ गया और आधे घंटे में तैयार होकर नन्हा चला गया है. बादल जो कल शाम से बनने शुरू हुए थे, अभी भी है, रात भर बरस चुके हैं सो मौसम में ठंडक है. आज उसकी एक मित्र का जन्मदिन है, कल रात नींद आने तक कुछ पंक्तियाँ उसके लिए मन में गढ़ रही थी-

आँखें हंसती रहें लब मचलते रहें
गीत अधरों से यूँ ही झरते रहें

दुःख की छाया न ही गम अँधेरा कभी
कदम दर कदम फूल खिलते रहें

सुख में शामिल सदा दुःख में भी साथ हों
सिलसिले दोस्ती के यूँ चलते रहें

खुशनुमा ही रहे हर दिवस इस तरह
बरस दर बरस वह चहकते रहें

जिन्दगी का हर इक रुख हो रोशन सदा
दिल में चाहत के दीपक जलते रहें

हमसफर साया बन के सदा साथ हो
चाहे मौसम फिजां के बदलते रहें

आज सुना, “अनित्य के प्रति जो आकर्षण है उसे तोड़ने के लिए उसका दर्शन करते करते ही नित्य तक पहुंचा जा सकता है. देखना जानने की क्षमता पैदा करता है. नित्य अवस्था में न तो उत्पाद होता है न क्षय होता है. स्थूल से सूक्ष्म तक आने के बाद उसका भी अतिक्रमण हो जाये”.

कल आखिर विश्वास मत पारित हो गया और देवेगौडा सरकार ने संसद में पूर्णमत हासिल कर लिया यानि अब हमारी एक अदद सरकार है. आज फिर मौसम बेदर्द होकर तपन बरसा रहा है, वे लोग जो बंद कमरों में पंखों और कूलरों के सामने रहते हैं उन्हें शिकायत करने का क्या हक है, जब हजारों लाखों लोग खुले आसमान के नीचे अपनी रोज़ी कमाने को विवश हैं.

आज उसने सुना, ‘अनुभूतियों से सच्चाई जानना ही धर्म ध्यान है. अपने भीतर उठने वाले विकारों पर तुरंत रोक लगाना और उन्हें जड़ से उखाड़ कर फेंकने को ही उपशमन कहते हैं. दमन नहीं चाहिए. जो क्षण अविद्या में बीतता है, विकारों का संवर्धन होता ही जाता है. मानस में एक विकार जागा तो उसके फल के साथ उस विकार का बीज भी आता है, और अज्ञान के कारण हम उसे सींचते रहते हैं. हमारे विकारों के दो सेनापति हैं, राग और द्वेष जिन्हें खत्म करना है ताकि हम अपने शिव को मंगल को न कुचल डालें. ध्यान जब जागता है तो हमारे पुराने कर्मों का बल समाप्त होता जायेगा और मन करुणा से भर जाता है. पुराने समाप्त हो गये नये बनते नहीं यही तो मुक्त अवस्था है. लेकिन बुद्धि के बल पर इसे समझने से कोई लाभ नहीं, होश में रहकर ही आग का मुकाबला पानी से करते हैं. अंदर तक स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास करना होगा, अपने भीतर होने वाली संवेदनाओं के प्रति सजग रहने का अभ्यास नहीं किया तो स्वभाव वैसे का वैसा रहेगा. प्रज्ञ प्रत्यक्ष ज्ञान है”.

पिछले कई दिनों से मौसम बहुत गर्म है, पसीने से तर हैं वे लोग. कल रात बिजली चली गयी थी और इस समय भी वही हाल है, इस खिड़की के पास बैठकर कभी-कभी हवा का एक झोंका आकर गर्दन को छू जाता है. अभी जून को फोन किया तो वह कहने लगे आज दिन में करेंट जायेगा यह तो पता था पर कब आयेगा यह पता नहीं. देखें तब तक उनका क्या हाल होता है, ये नन्हे के शब्द हैं. कल रात वे एक मित्र के यहाँ सोये वहाँ बिजली थी, उनके घर की चाबी उनके पास थी. आज दोपहर को वे “एक बन्दर होटल के अंदर” देखने वाले थे और पीटीवी पर दायरे भी देखना  था पर अब बिजली के बिना सारे कार्यक्रम धरे रह गये हैं. पर उन्हें बिजली पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए, उन लोगों की तरफ देखना चाहिए जिन्हें ये सब सुविधाएँ नहीं मिलती हैं, या फिर बड़े शहरों में जहाँ बिजली अक्सर जाती ही रहती है.