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Tuesday, August 11, 2026

मडीवाला झील के किनारे

मडीवाला झील के किनारे

आज वे बहुत दिनों के बाद ‘गुरु पूजा’ में सम्मिलित हुए, बहुत अच्छा लगा। जैसा कि आर्ट ऑफ़ लिविंग में होता है, पहली बार मिलने पर भी सभी अपने परिवार की तरह मिले। एक बंगाली परिवार से मिलकर कुछ बातें कीं, उनका नन्हा पुत्र और सासुमाँ भी आयी थीं। कुछ अन्य बंगाली व हिन्दी भाषी परिवार भी थे।परसों शाम उनके यहाँ पूजा है, नन्हा व सोनू भी आयेंगे। पूजा के लिए आवश्यक सामान की लिस्ट उसे याद हो गई है। पाँच तरह के फल, नारियल, पान, सुपारी, एक नया रूमाल, थोड़े से अक्षत, अगरबत्ती आदि। लेकिन गुरु पूजा का अर्थ केवल गुरु का आभार प्रकट करना ही नहीं है, बल्कि उनकी उपस्थिति को महसूस करना है। प्रार्थना के क्षणों में कई बार उसने मानसिक गुरु पूजा की है, जहाँ कोई सामग्री नहीं होती, किंतु फिर भी सब कुछ होता है। वहाँ चरण भी वास्तविक होते हैं यदि भावना वास्तविक है; अंततः सभी कुछ तो वे मन के माध्यम से ही देखते हैं, जाग्रत हो या स्वप्न, मन ही सब कुछ दिखाता है। ध्यान में भी जो चित्र दिखते हैं, मन ही उनका सृजन करता है। आज भी ब्लॉग्स पर नई पोस्ट प्रकाशित की। पिछले कुछ महीनों में आँख के इलाज के कारण लेखन में जो ढीलापन आ गया था, अब वह दूर हो रहा है। लेखन का अभ्यास बना रहेगा तभी काम आगे बढ़ेगा। ‘बाल्मीकि रामायण’ में अभी तक अयोध्या कांड ही चल रहा है। जीवन रहते उसे इस कार्य को पूरा करना है। शाम को पापाजी से बात हुई, वह कुछ अकेलेपन का अनुभव कर रहे थे, ऐसा उन्होंने कहा, पर बातचीत में सामान्य दिखे। 

आज सुबह उठी तो नूना एक स्वप्न देख रही थी, विचित्र सा स्वप्न, फिर ध्यान किया तो समाधान मिला। आनन्दमय कोष के बारे में सुना, सुनते-सुनते ही मन ध्यानस्थ हो गया था। दोपहर को कुछ देर नवनीत पढ़ा।शाम को  भांजे ने उन्हें भोजन के लिए बुलाया था। वहाँ उसकी नव विवाहिता पत्नी की छोटी बहन व माँ भी आ गयीं; उसके चचेरा भाई भी,  जो इसी शहर में नौकरी करता है। नन्हा व सोनू भी कुछ देर के लिए आये। ढोकला व गोलगप्पे खाकर वे चले गये। सोनू की मौसेरी बहन ने उन्हें डिनर के लिए बुला रखा था। सभी ने अपने अपने कार्य तथा शौक़ के बारे में बताया। चाहे वे कई दिन बाद मिलें पर मिलने पर कोई न कोई पुराना सिरा हाथ में आ जाता है और लगने लगता है, जैसे कल ही मिले थे। बच्चों से मिलकर एक ऊर्जा का अहसास तो होता ही है, उनकी नयी गृहस्थी देखकर उसे अपना अतीत भी एक पल के लिए याद आ गया था। 

आज सुबह से मन भक्ति रस में सराबोर था। नन्हा व सोनू ग्यारह बजे आ गये थे। शाम को घर का वातावरण संगीतमय हो गया था। नन्हे और सोनू ने चने, पूरी व रायता बनाया, एक परिचिता सूजी का हलवा बनाकर लायी थीं। पूजा करने के लिए आश्रम से एक शिक्षक आये थे, उनके साथ एक असमिया सत्संगी भी, जिनकी छोटी सी बेटी ने कई अच्छे-अच्छे भजन गाये। उनका मित्र परिवार भी आया था, पहली बार उनके नाती को देखा। गुरु पूजा के बाद हुए भजन गायन के बाद सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। कल दोपहर को फिर एक विला में गुरु पूजा का आयोजन है। वे जाएँगे, कुछ और लोगों से परिचय बढ़ेगा। 

दोपहर को वे उनकी लेन में में एक शिक्षक के यहाँ गुरु पूजा में गये। गुरु पूर्णिमा पर मन-प्राण बहुत प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं। एक युवा साधिका से मिले, जिसने गुरु पूर्णिमा से पूर्व एक निश्चित संख्या में इन पूजाओं के आयोजन की ज़िम्मेदारी उठायी थी। उसी की प्रेरणा से यह काम हुआ है, गुरुजी ने उसे यह काम सौंपा है। शाम को आश्रम में भी गुरु पूजा उत्सव में शामिल होने का अवसर मिला। वर्षा के बावजूद अनेक लोग आये थे। एक सौ आठ शिक्षकों ने एक साथ पूजा में भाग लिया। उसके बाद वहीं प्रसाद ग्रहण किया। अन्नपूर्णा में आज विशेष भोजन बना था। पापाजी से बात हुई, छोटी भाभी लौट आयी है। उन्होंने ओशो द्वारा दिये प्रवचन ‘मौन की महत्ता’ के आधार पर कुछ बातें बतायीं। उनके अनुसार जैसे-जैसे भीतर का मौन बढ़ता जाता है, अहंकार व भय गिरने लगता है। सृजनात्मकता बढ़ती है और नयी संभावनाएँ पता चलती हैं। गुरु के शब्दों का काम भीतर के मौन को जगाना ही तो है। 

आज सुबह वे नन्हे यहाँ गये थे, उसके गेस्ट रूम  के लिए गीज़र पहुँचाना था। नन्हे ने मिलेट दोसा मँगवाया उनके नाश्ते के लिए, उनका रसोइया थोड़ा देर से आता है। वहाँ से वे बीटीएम स्थित मडीवाला झील तक गये, जो बैंगलुरु की बड़ी झीलों में से एक है। हवा ठंडी थी, सुबह की सैर के लिए अनेक लोग आये हुए थे। वे कुछ देर उसके किनारे टहलते रहे, पक्षियों की उड़ान भली लग रही थी, जो झील में स्थित एक द्वीप से उड़ते थे। उसके बाद बैंक का काम करना था। जून का हर कार्य योजना बद्ध तरीक़े से होता है, सुबह जल्दी निकलने के पीछे कारण था, ट्रैफ़िक नहीं मिलेगा, और क्योंकि सुबह टहलना नहीं हो पाया था, सो बैंक खुलने की प्रतीक्षा में वह काम भी हो गया। उन्होंने पड़ोसी की सहायता से, जो सीए हैं, इस बार का टैक्स भी जमा कर दिया है। शाम को फलों वाले बगीचे में कुछ तस्वीरें उतारीं, करौंदे के पेड़ लाल फलों से भर गये हैं, बहुत सुंदर लग रहे थे। दशकों पूर्व बचपन में सीतापुर में इसका पेड़ देखा था, तब के बाद यहीं आकर उसने करौंदे देखे हैं।  

आज दोपहर उसने छोटी बहन को फ़ोन किया तो वह क्लिनिक से घर आकर विश्राम कर रही थी।बड़ी भांजी ने फ़ोन उठाया। उससे बहुत सी बातें हुईं। वह अगले हफ़्ते  आस्ट्रेलिया जा रही है। कुछ महीनों में उसे कनाडा का पासपोर्ट मिल जाएगा। नूना को आश्चर्य होता है, कि कोई भारतीय कैसे अपना देश छोड़कर बाहर की नागरिकता ले लेता है। शायद उनके पास दोनों देशों की नागरिकता होती हो। आज सुबह वह उठी एक स्वप्न की याद बनी हुई थी, नन्हे को लेकर एक स्वप्न देखा था, लगा, जैसे वह कुछ उदास है। पर सब ठीक होगा, मन की तो आदत ही है तिल का ताड़ बनाने की।


Sunday, May 31, 2026

नंदी मंदिर के दर्शन

नंदी मंदिर के दर्शन


आज माँ की बाईसवीं पुण्यतिथि है, बड़े भाई ने कई तस्वीरें व्हाट्सएप ग्रुप में पोस्ट की हैं।     सुबह सामान्य थी, ध्यान, भ्रमण, प्राणायाम। प्रातः राश में शकरकंदी की खीर और अजवाइन का पराँठा खाकर वे आधा घंटा ड्राइव करके जून के पूर्व अधिकारी के घर राजराजेश्वरी पहुँचे। गृह स्वामिनी ने अदरक वाली चाय पिलायी, इसके बाद वे सब ‘शृंगगिरी श्री शनमुख स्वामी  मन्दिर’ जाने के लिए निकले।एक पहाड़ी पर स्थित यह विशाल मंदिर उन लोगों के घर से अधिक दूर नहीं है। इसके छह मुखों वाला गोपुरम न जाने कितनी बार वे चलती हुई कार से देखा करते थे। गोपुरम के ऊपर एक क्रिस्टल गुंबद है जो दिन में सूर्य के प्रकाश से तथा रात्रि में बिजली के प्रकाश से चमकता है।ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ नहीं चढ़नी पड़ीं, एक वैन वाला ऊपर ले गया। एक सौ तेइस फ़ीट ऊँचे मंदिर का प्रांगण ख़ाली था, अभी मुख्य कक्ष भी पर्दे से ढका था, आधे घंटे बाद खुलने वाला था। एक पुजारी ने बताया, कार्तिकेय भगवान का अलंकार हो रहा है, अर्थात शृंगार ! प्रतीक्षा करते हुए उन्होंने नीचे एक बड़े कक्ष में गणेश भगवान की मूर्तियों के विशाल संग्रह के दर्शन किए। पट खुलने के बाद आरती आरंभ हो गयी, भगवान मुरूगन के बहुत ही भव्य दर्शन हुए। तब तक और कई लोग आ चुके थे, वे पंक्ति में लगे थे।सबने स्वादिष्ट पोंगल या खिचड़ी का प्रसाद भी ग्रहण किया।वहाँ से वे सोलहवीं शताब्दी में निर्मित ‘बुल टेम्पल’ देखने गये, यह मंदिर भी बहुत  विशाल है। इसे बासवगुड़ी या नंदी मंदिर भी कहते हैं। यहाँ स्थापित नंदी की मूर्ति लगभग पंद्रह फीट ऊँची और बीस फीट लंबी है। गणेश मन्दिर भी इसी से सटा हुआ एक प्रसिद्ध मंदिर है। यहाँ गणेश की अठारह फीट ऊँची और सोलह फीट चौड़ी विशाल मूर्ति है, जिसे डोड्डा गणेश कहते हैं।यहाँ का बेन्ने अलंकार, मक्खन से शृंगार बहुत प्रसिद्ध है। तीन मंदिरों में दर्शन के बाद वे घर वापस आये। दोपहर के भोजन में ज्वार की स्वादिष्ट रोटी, बैंगन की सब्ज़ी, दाल व सलाद परोसा गया। दोपहर बाद वे अपने घर लौटे। मेजबान दीदी ने दही में डालकर सुखाई गयी मिर्चें, लहसुन की चटनी, अंकुरित सलाद और मीठी रोटी घर ले जाकर बाद में खाने के लिए दी।अपने बड़े पुत्र के परिवार के चित्र दिखाये। 


आज दोपहर बहुत दिनों के बाद उसे बहुत गहरी नींद आयी, घोड़े बेचकर सोने जैसी नींद। जब मन में कोई चाह न हो, कुछ जानने की इच्छा भी न हो, तब इच्छा शक्ति, क्रिया और ज्ञान शक्ति में मिलकर तीनों एक हो जाती हैं। वे अपने क्रेंद्र में आ जाते हैं। सत, रज, तम का ही तो खेल है सारा, सत अर्थात ज्ञान, रज अर्थात क्रिया और तम अर्थात इच्छा ! ज्ञान का अर्थ है, वे स्वयं को जान लें, तब आनंद वहीं बरस रहा है, कुछ पाना नहीं नहीं है, कुछ करना भी नहीं है, ऐसा करना जो किसी चाह से प्रेरित होकर किया जाये। ऐसे में सभी के भीतर वही एक परमात्मा दिखाई देता है तो किसी से कोई शिकायत भी नहीं रहती।अपने भीतर भी चैतन्य के दर्शन होते हैं तो अपनी कमियाँ भी सतह पर ही नज़र आती हैं, जो एक हवा के झोंके से उड़ जायें, बस इतनी ही। प्रकृति में निरंतर परिवर्तन हो रहा है, पर उसे देखने वाला अबदल है, अच्युत है, वही वे हैं और वही सामने वाला भी है। जैसे उनसे भूलें होती हैं, वैसे ही औरों से भी होती हैं, वे करते नहीं हैं। आज दोपहर बाद एओएल का अनुवाद कार्य किया। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्हें अब सुनने में थोड़ी तकलीफ़ होने लगी है। सुबहें अब भी ठंडी होती हैं, पर दोपहर को तेज धूप निकली थी। 


आज का इतवार मज़े-मज़े से बीता। सुबह की शांत शीतल फ़िज़ाँ में टहलना, खिड़की खोलकर ठंडी पर सुवासित हवा में धीमे-धीमे किसी अदृश्य लय पर श्वासों का अभ्यास और विज्ञान भैरव का श्रवण ! जून के हाथ की बनी अदरक वाली चाय, फिर बगिया से फूल चुनना, फूलों की तस्वीरें फ़ेसबुक पर पोस्ट करना और इत्मीनान से मानव कौल की किताब की पढ़ना। दोपहर बाद ओशो  की किताब पढ़ते-पढ़ते नींद की ऐसी झपकी लेना, जिसमें पूरा होश बना हुआ था।ऑडिबल पर देवदत्त पटनायक की आवाज़ में शिव-पुराण सुनना। महावीरी, हनुमान चालीसा की व्याख्या पढ़ना। टीवी पर एक लघु फ़िल्म देखना। नाश्ते में आलू पराँठा और लंच में ब्रोकोली राइस, दोनों जून के सौजन्य से, और सबसे अच्छी बात बीटिंग रीट्रिट देखना, वर्षा के बावजूद कार्यक्रम चलता रहा। 


आज नींद तीन बजे से पहले ही खुल गई थी। ऑडिबल पर शिव परिवार के बारे में सुना। मन कैसा ठहर गया है। उठकर ध्यान में बैठी तो पता ही नहीं चला चालीस मिनट से ज़्यादा पलक झपकते बीत गये। उनकी चेतना कितनी भव्य है, दिव्य और शांत, सुंदर भी, उस भाव का असर देर तक बना रहा। बाद में वे आश्रम गये, वहाँ के शिव मंदिर में पहली बार जल चढ़ाया, ध्यान के लिए बैठे, सब कुछ दैवीय प्रतीत हो रहा था। गुरुजी की आवाज़ में ॐ नम: शिवाय मंत्र ऐसे लग रहा था जैसे चेतना स्वयं ही स्वयं का नाम ले रही हो। गुरुजी इस धरा पर जीते जी ईश्वर स्वरूप हैं, उन्होंने अपने भीतर मन के पार जाकर उस अनंत के साथ एकत्व स्थापित कर लिया है। वह पूर्ण ज्ञान, पूर्ण क्रिया तथा पूर्ण भक्ति के साथ संयुक्त हैं। पूर्णता की अनुभूति करने की चाह भी भीतर पूर्ण ही जगाता है, इसलिए वह भिन्न-भिन्न अनुभवों से गुजरकर उसे अपने और निकट ला रहा है। नवनीत का नया अंक आज आ गया है। कुछ लेख पढ़े। डाइनिंग टेबल की कुर्सियों का कपड़ा आज बदल दिया गया, तथा गैराज में ग्राउटिंग का काम भी हुआ।एसी की सर्विसिंग भी हो गयी, तीनों एसी अब गर्मियों का सामना करने के लिए तैयार हैं।जून के रहते घर में कुछ भी काम पेंडिंग नहीं रह सकता। महीनों बाद आज उसने साइकिल चलायी। नन्हा और सोनू वापस आ गये हैं, वे कोलकाता में घूम घूमे। सोनू ने पोर्टर से उसके लिए सूट, एक बहुत सुंदर भगवदगीता, नेलोर गुड़ और संदेश भिजवाए हैं। पापाजी से बात हुई, कह रहे थे, अच्छी किताबें पढ़ते रहना चाहिए।  



Thursday, May 21, 2026

हर घर ध्यान

हर घर ध्यान


आज सुबह-सुबह वे एक परिचित दंपत्ति के साथ उनके घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित एक झील देखने गये, रास्ते में ढेर सारी बातें हुईं, इधर-उधर की।मौसम सुहाना था, सूर्योदय हो रहा था, अनेक तरह के पक्षी जल में क्रीड़ा कर रहे थे। निकट ही एक गाँव है, उसकी गलियों से गुजरते हुए, उनकी सरल जीवनशैली के कितने ही दृश्य दिखे। एक दो व्यक्तियों से उनके मित्रों की बातचीत भी हुई। वापसी में कुछ दूरी पर स्थित एक नयी झील भी देखी, जिसके बार में उन्हें जरा भी जानकारी नहीं थी, उसने झील के पानी में वृक्षों की छाया के सुंदर चित्र उतारे। आश्रम के सामने नये खुले रेस्तराँ ‘उडुपी’ में सुबह का नाश्ता किया।सबकी पसंद भिन्न थी, नूना ने इडली मंगायी, जून ने मसाला दोसा, उसकी सखी ने नीर दोसा और उनके पतिदेव ने पूरी सब्ज़ी। इस वर्ष की इस आख़िरी मुलाक़ात को वे यादगार बना लेना चाहते थे। वास्तव में उनकी दिनचर्या घर लौटकर शुरू हुई, जब नैनी आयी। घर की सफ़ाई, स्नान आदि। शाम को पापाजी से बात हुई, वहाँ ठंड काफ़ी बढ़ गई है, रात्रि का तापमान पाँच डिग्री तक चला जाता है। वह यह बताते हुए बहुत खुश हो रहे थे कि नार्वे से आये हुए दीदी के बच्चे उनसे मिलने गये थे। नूना के स्वास्थ्य के बारे में जानकर नन्हे ने कहा है, अगले हफ़्ते उन्हें सालाना मेडिकल टेस्ट करा कर उसकी रिपोर्ट डॉक्टर को दिखानी चाहिए। 


बैंगलुरु की एक प्रसिद्ध लैब में उन्होंने सभी आवश्यक टेस्ट कराये।रिपोर्ट दिखाने गये तो डाक्टर ने आश्वासन दिया, सब कुछ सामान्य है। बस ज़रूरत है, वे हल्का आहार लें, वजन कुछ कम करें और तेल-घी व चीनी का सेवन कम करें। नियम से व्यायाम करें।पानी अधिक पीना है और उसे नमक की मात्रा अधिक व जून को कम लेनी है। नये वर्ष में प्रवेश करने से पूर्व यह अच्छा ही है कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति एक बार फिर जागरूक हो जायें। आज “रामसेतु” फ़िल्म देखनी शुरू की है। फ़िल्म की कहानी रोचक है। एक नास्तिक पुरातत्वविद् ‘सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट’ के लिए अपनी रिपोर्ट देता है, जिसमें रामसेतु को तोड़ा जाना है, पर अनेक लोग नाराज़ हो जाते हैं। वह असलियत का पता लगाने के लिए समुद्र के भीतर जाकर खोज करता है, तब उसे ज्ञात होता है, यह पुल प्राकृतिक नहीं आदमी द्वारा बनाया गया है। इसके बाद वह इसे बचाने के लिए लग जाता है। श्रीलंका में फ़िल्माये दृश्य बहुत सुंदर हैं। रामायण से जुड़े कितने ही स्थान श्रीलंका में भी हैं। राम के अस्तित्त्व को नकारना असंभव है। राम उसी तरह शाश्वत हैं जैसे भारत भूमि ! आज भी एओएल का अनुवाद कार्य किया। आज़ादी के अमृत महोत्सव के अन्तर्गत भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग के साथ एक राष्ट्रव्यापी जान-जागरूकता अभियान चला रहा है, “हर घर ध्यान”। गुरुजी हर व्यक्ति को, विशेषकर युवाओं को ध्यान से जोड़ना चाहते हैं।कल सुबह उनके नये वर्ष के संदेश का अनुवाद करना है।


सुबह शीतल थी, वे दूर तक पैदल चले। कल की यात्रा के लिए तैयारी की। कल वे सब एक ‘ईको रिजार्ट’ जा रहे हैं। नये वर्ष का आरंभ वहीं से करेंगे। वजन कम करने के लिए जो परहेज़ आवश्यक हैं, वे करने आरम्भ कर दिये हैं। नये वर्ष को वे जब तक नया रहने देंगे, उत्साह बना रहेगा। आने वाले वर्ष के अन्तिम दिन तक इसे नया जानना है, उसके बाद ही तो यह पुराना होगा। किंतु होता क्या है कि फ़रवरी आते-आते ही यह पुराना हो जाता है, और जीवन उसी पुराने क्रम में लौट जाता है। उसके मन में कितने ही भाव उमड़ रहे हैं, नया उत्साह, नये इरादे, नये ढंग से जीने की आस, नये रास्ते, नये को अपनाने में कोई भय न हो, पुराने को त्यागना नहीं है पर उसमें कुछ नयापन भी जोड़ना है। भूलें भी करें तो नये ढंग की, गुरुजी कहते हैं, वही भूलें एक चक्र में घुमाती हैं। 


परसों वे सब आई मैक्स में अवतार सीरीज़ की दूसरी फ़िल्म ‘अवतार- द वे ऑफ़ वाटर’ देखने जा रहे हैं, नये वर्ष की उनकी पहली फ़िल्म। नन्हे ने कहा पहले की कहानी पढ़ लें, तो यह समझ में अच्छी तरह आएगी।उसने कहानी पढ़ी और पापाजी को ‘अवतार’ की पहली फ़िल्म का लिंक भेजा है, शायद वह देखें।वर्षों पहले उन्होंने यह अनोखी फ़िल्म देखी थी। जेम्स कैमरून की थ्री डी फ़िल्म। सुदूर भविष्य की कहानी है, धरती पर काफ़ी कुछ ख़त्म हो चुका है, पैंडोरा नाम के एक ग्रह पर मानवों का प्रवेश होता है, जो वहाँ से एक बहुमूल्य खनिज लाना चाहते हैं। वहाँ के मूल निवास नावी, जो दस फ़ीट लंबे और नीले रंग के हैं, गहराई से प्रकृति से जुड़े हैं। नावी लोगों से संपर्क के लिए वैज्ञानिक,एक इंसानी दिमाग़ को प्रयोगशाला में तैयार किए गये नावी अवतार में लगा देते हैं।जेक सुली वह अवतार है, जो पैंडोरा पर जाता है, और एक नावी महिला नेयतिरी से मिलता है। बाद में वह मानवों के ख़िलाफ़ वहाँ के निवासियों की तरफ़ से लड़ता है।  

 

Thursday, May 7, 2026

ग्रहों का प्रभाव



कल नन्हे का जन्मदिन था। दोपहर को साढ़े बजे वे लोग आये। सामूहिक लंच लाजवाब था। सोनू की मौसी भी आयी थीं।आज जीजा जी का पचहत्तरवाँ जन्मदिन है।दीदी व सभी बच्चों ने मिलकर शानदार उत्सव मनाया, कुछ देर पहले उनके वीडियो देखे। उन्हें जून के भेजे गुलाब मिल गये हैं। ईश्वर उन्हें दीर्घायु प्रदान करे।आज उसने गुरु पूर्णिमा पर लिखे एक लेख का हिन्दी में अनुवाद किया।पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सलाहकार सुधांशु त्रिवेदी को सुना। भारतीय संस्कृति के बारे में बहुत जानकारी है उन्हें।


आज गुरु पूर्णिमा है। गुरुजी द्वारा ‘स्पंद कारिका’ पर दी जाने वाली प्रवचन माला आज से शुरू हो रही है।उन्होंने बताया, स्पंदन एक दिव्य चेतन ऊर्जा है। यह ऊर्जा महसूस कर सकती है।ईश्वर उन्हें उनसे अधिक जानता है। जो इस सृष्टि का आधार है, उस शिव को महसूस किया जा सकता है। आत्मा बिना इंद्रियों के देख सकती है, सुन सकती है, छू सकती है। ये सभी शक्तियाँ निर्विशेष आत्मा में हैं।मन के भीतर जो विचार आते हैं, वे वहीं से आते हैं। जब विशेष ऊर्जा उस निर्विशेष ऊर्जा में समा जाती है, तो केवल वही शेष रहती है।यह चेतना सभी शक्तियों को धारण करती है। विषयों की स्मृति से इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इच्छाएँ भविष्य की ओर ले जाती हैं।जब कोई वर्तमान में होता है, तब अपने सच्चे स्वभाव के निकट होता है। जब जाग्रत व स्वप्न अवस्था में इच्छायें जगती हैं, तो व्यक्ति चेतना से दूर चला जाता है। हर इच्छा पूर्ण होने के बाद उसे वहीं लाकर छोड़ देती है। इच्छा सीमित की हो सकती है। 


‘स्पंद कारिका’ का अगला सत्र आरंभ हो गया है। गुरु जी कह रहे हैं, स्वभाव में टिकना ही साधना का लक्ष्य है। नम्रता व सरलता आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं।साधक को सबके साथ एकत्व का अनुभव करना है। जैसे तेल के साथ पानी नहीं मिलता, पर दूध के साथ पानी मिल जाता है; बच्चों के साथ सरलता से जुड़ा जा सकता है पर बड़े अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर लेते हैं।जब कोई ध्यान की गहराई में जाता है, उसे रिक्तता का अनुभव होता है। जब इच्छा का त्याग करता है तब क्षणिक शून्यता का अनुभव होता है, लेकिन उसके बाद आनंद मिलता है। जब कोई सामान्य चेतना के साथ एक हो जाता है, भीतर आनंद का अनुभव होता है। इस अवस्था में कोई अभाव नहीं रहता। समाधि कोई नीरस अवस्था नहीं है। वहाँ जाकर ज्ञात होता है अज्ञान जैसा कुछ भी नहीं है। शून्य से पहले ध्वनि का निर्माण हुआ फिर सृष्टि का।अंतिम स्वतंत्रता का अनुभव तभी होता है, जब कोई ज्ञान का सम्मान करता है, तब वह सजग और सरल हो जाता है।निर्दोष चेतना ही शिव है। 


आज शाम को वे कुछ ही दूरी पर स्थित ‘प्रकृति फार्म’ देखने गये। प्राकृतिक खेती के साथ यह की एक विशेषता है पालतू जानवरों को रखने की सुविधा, हरियाली से भरा हुआ यहाँ का वातावरण लोगों को सप्ताहांत बिताने के लिए आकर्षित करता है।दोपहर को नूना ने एओएल का अनुवाद कार्य किया। इस समय गुरुजी ‘स्पंद कारिका’ पर आगे बोल रहे हैं। प्रकृति प्रेममयी है।सर्दी का अनुभव तभी होता है, जब गर्मी का अनुभव कर चुके हैं। सर्दियों में वृक्ष पत्ते गिरा देते हैं, ताकि धूप का आनंद ले सकें, गर्मियों में धर लेते हैं ताकि तेज धूप से बचे रहें।विरोधी भावनाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। एक ही चेतना अनेक रूपों में प्रकट हो रही है। 


आज नन्हा व सोनू अकेले ही आये थे। इतवार की सुबह माली से बगीचे में काम कराते हुए बीती।दोपहर को लंच नन्हे और सोनू ने मिलकर बनाया। शाम की चाय के बाद वे चले गये। आज के सत्र में ध्यान करवाने के साथ गुरुजी ने नाड़ी विज्ञान, स्थान शुद्धि और ग्रहों के प्रभाव के बारे में भी कुछ जानकारी दी। यह भी कहा कि यदि कोई  किसी पूजा स्थल के पास जाये तो उसकी दोनों नाड़ियाँ चलने लगती हैं। उनके अनुसार किसी के मन के भाव उसकी श्वास में परिलक्षित होते हैं, इसी का आश्रय लेकर कुछ लोग दूसरों के मन के विचार पढ़ लेते हैं। सूर्य गेहूं से जुड़ा है और ह्रदय से, चंद्रमा मन से जुड़ा है और चावल से, मंगल मसूर दाल व रक्त से, बुध हरी मूँग और त्वचा से, बृहस्पति चना दाल और यकृत से, शुक्र चावल और किडनी से, शनि तिल, काली उड़द और दाँतों से, राहु सिर और तिल से, केतु निचले अंगों व जड़ वाली सब्ज़ियों से जुड़ा है।


गुरुजी ने आज कहा, पंछी हर दिन नया गीत नहीं गाते पर वे कभी ऊबते नहीं, उनके लिए हर दिन ही नहीं, हर पल नया है। आत्मा के बारे में बौद्धिक रूप से जानना पर्याप्त नहीं, अस्तित्त्वगत रूप से उसमें टिकना ध्यान है। अनुभव और अनुभवकर्ता जब एक हो जाते हैं, तभी ध्यान घटता है।द्रष्टा ही जब दृश्य बन जाये, तब जगत जैसा भी हो, भाता है। इस जगत में जो कुछ हो रहा है, वह परमात्मा की एक क्रीड़ा है।ज्ञानी ऐसे जीता है जैसे हो ही नहीं, जैसे सारी प्रकृति है, वह वैसे ही हो जाता है। जब किसी को पूर्ण तृप्ति का अनुभव होता है, तभी जीवनमुक्ति का अनुभव कर सकता है। प्रतिदिन की तरह आज भी गुरुजी ने ध्यान कराया। 


आज इस प्रवचन माला का अंतिम सत्र है। स्पंद का अर्थ है तरंग, यह सारा ब्रह्मांड तरंगों से भरा है। कुछ सामान्य तरंगें हैं, कुछ विशेष तरंगें हैं। वस्तुएँ और व्यक्ति विशेष तरंगें हैं। विशेष तरंगें, सामान्य तरंगों से  उत्पन्न होती हैं। अनंत जब सीमित होता है तब जीव बन जाता है। हरेक के भीतर सामान्य स्पंदन है, जो छिपा है।सामान्य स्पंदन न मुक्त है न बंधा है। प्रेम जीवन का स्रोत है।जब शिव अपना नेत्र खोलते हैं, तब सृष्टि का जन्म होता है। जब कोई सार्वभौम को सिर झुकाता है तो वह शिव से जुड़ता है। शिव और उसके मध्य कोई बाधा नहीं है। जो उसे अनुभव कर लेता है, वह समता को प्राप्त करता है। जगत में भिन्नता है पर सभी के भीतर जीवन शक्ति एक है, जो शिव है। पाँच इंद्रियों के द्वारा जीवन शक्ति ही जगत का अनुभव करती है। शिव एक होकर भी, सबका कारण होकर भी सबसे पृथक है। इसका अनुभव होते ही जीव स्थितप्रज्ञ हो जाता है।उस स्थिति में दो नहीं हैं, एक ही सत्ता है। जगत उस पर आरोपित अध्यास मात्र प्रतीत होता है। 


Friday, May 1, 2026

गुरु गीता

गुरु गीता


शाम को वे दूर तक टहलने गये। एक जगह मुर्गी के दड़बों के आगे से गुजरना पड़ा, एक विचित्र सी तेज गंध आ रही थी।घर आकर भी कुछ देर तक वह गंध जैसे साथ रह गई थी।आज ‘गुरु गीता’ सुनने का दूसरा सत्र है। भानु दीदी कह रही हैं, गुरु के नाम स्मरण मात्र से अनेक आशीर्वाद मिल सकते हैं।ईश्वर या गुरु से कुछ माँगना ऐसा ही है जैसे हाथ में मक्खन रखा है और कोई घी माँग रहा हो।शांति का सागर भीतर है, बस अपने मन का ध्यान रखना है। गुरु तत्त्व कण-कण में समाया है। व्यास मुनि ने स्कन्द पुराण में शिव-पार्वती के संवाद के रूप में गुरु गीता की रचना की है। जिसमें गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं है, ऐसा कहकर शिष्य की गुरु के प्रति निष्ठा को दृढ़ किया गया है। छोटी बहन को आश्रम में टीटीपी के लिए अनुमति मिल गई है। अगले महीने वह यहाँ आएगी।आज गुरु जी के बारे में लिखे एक लेख का अनुवाद किया।


आज गुरुजी का जन्मदिन है। इस विशेष दिन पर उनका संदेश है- 


कुछ भी आकर्षक नहीं है।

सब कुछ प्रकाशमान है क्योंकि सब कुछ आत्मा का है, और आत्मा से बना है।

ब्रह्मांड में आत्मा सबसे आकर्षक है। 


गुरुजी ने विशेष ध्यान भी कराया। सुंदर भजन गाये गये। आज मृणाल ज्योति स्कूल की एक पुरानी सदस्या का फ़ोन आया। अगले वर्ष स्कूल का रजत समारोह मनाया जाएगा। उसने पत्रिका के लिए एक लेख लिखने के लिए कहा है। नूना ने स्कूल की अध्यक्षा से भी बात की। उनके साथ बिताये कितने ही पल तथा कई घटनाएँ याद आने लगीं। 


आज सुबह उठने से पूर्व सुंदर स्वप्न देखे - सुंदर गायें, श्वेत बाघ और बुद्ध की प्रकाशित मूर्ति !परमात्मा से वार्तालाप और ध्यान का अनुभव ! पापाजी से बात हुई, वह ‘शांडिल्य भक्ति सूत्र’ पढ़ रहे हैं। जिसकी व्याख्या ओशो ने की है। उन्होंने बताया, प्रीति के कई रूप हैं, अपने से छोटों के प्रति प्रेम को स्नेह कहते हैं। समान उम्र के प्रति प्रेम को प्रीति तथा बड़ों के प्रति प्रेम को श्रद्धा या सम्मान कहते हैं। परमात्मा के प्रति प्रेम को भक्ति !! घर पर भतीजी और उसकी नन्ही बिटिया आये हुए हैं।शिशु बालिका की भी कई बातें उन्होंने बतायीं। आज भी दिन भर बादल बने रहे। मानसून इस बार यहाँ जल्दी आ गया है। सारे भारत में गर्मी का मौसम क़हर ढा रहा है, यहाँ अधिकतम तापमान २४ डिग्री रहता है। मई के महीने में ऐसा ही मौसम असम में मिलता था। उनके दायीं तरफ़ बनने वाला विशाल घर बनकर तैयार हो गया है, कल गृह प्रवेश की पूजा में जाना है। नन्हा और सोनू भी आयेंगे।  

उन्होंने अपनी दिनचर्या व ख़ान-पान में कुछ बदलाव किए हैं।शाम को सूप व आम का डिनर लिया। जून को सात्विक व हल्का भोजन लेने से शरीर में हल्कापन महसूस हो रहा है। दिन में दो बार ध्यान का अभ्यास, पुस्तक पढ़ने के साथ-साथ वह डायरी लेखन भी शुरू करने वाले हैं। आज बुद्ध पूर्णिमा है, भगवान बुद्ध के विषय में लिखी कविता उसने बहुत लोगों को भेजी। वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने की बात कही जा रही है। कल रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी। एक अच्छी बायोपिक देखी, ‘रश्मि राकेट’ !


दिन भर वर्षा का मौसम ही बना रहा। असम में बाढ़ का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। बैंगलुरु में भी सड़कों पर पानी जमा हो गया है। पानी की समस्या पर आधारित ‘टर्टल’ फ़िल्म में देखा था, रेगिस्तान में लोग पानी के लिए एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। यह जीवन ऐसा ही विरोधाभासी है। आर्ट ऑफ़ लिविंग से अनुवाद को-ऑर्डिनेटर का फ़ोन आया। कल रात को नौ बजे ज़ूम पर एक मीटिंग है, जिसमें नूना को अपने गुरु स्टोरी रखनी है। शाम को उन सभी बातों को याद किया और लिखा। एक शिक्षिका की कहानी सुनी थी, कितने आराम से वह सुना रही थी, उतनी ही सहजता से उसे भी अपनी बात रखनी होगी। 


शाम को गुरुजी द्वारा निर्देशित ध्यान गहरा हुआ। ज़ूम मीटिंग में एबीसी(आश्रम की प्रकाशन संस्था)की ‘हेड टू हार्ट’ सीरीज़ में पहली बार भाग लिया। आजकल गुरु स्टोरी सुनना भी शुरू किया है। अच्छा लग रहा है। गुरुजी अपने भक्तों की नज़रों में ईश्वर से कम नहीं। जिन्होंने उनका सान्निध्य पाया है, वह यह जानते हैं। उनके बार में सुनकर कितना रोमांच होता है। वाक़ई वे एक अवतार ही जान पड़ते हैं। कैसे लोगों के मन की बात जान लेते हैं, उनका ख़्याल रखते हैं। इतना प्रेम देते हैं कि लोग उनके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। वह उनके जीवन में वरदान बनकर आये हैं। वह कहते हैं, “साधकों को सेवा करनी चाहिए, ताकि वे अपने कर्मों को काट सकें। उन्हें पुण्य मिले और उनका मन शुद्ध हो, वे ध्यान के अधिकारी बनें, उन्हें समाधि का अनुभव हो। उनका जीवन सार्थक हो।जो दूसरों के कष्ट दूर करने की चाह रखता है, जो संसार के लिए जीता है, उसके योग-क्षेम का भर स्वयं परमात्मा उठाते हैं। वे स्वार्थ को त्याग कर यदि जगत के हित में काम करते हैं तो इसका परिणाम अंतर की शुद्धि के रूप में उन्हें ही मिलता है। जब कोई अपना सुख-दुख भूलकर अन्यों के सुख-दुख में शामिल होता है तब भीतर मुक्ति का अहसास होता है। जीवन वही जीवन है जो औरों के काम आये। उनके वचन, कर्म व विचार सदा हितकारी हों।” गुरुजी की बातें सुनने से मन नहीं भरता। वह उसे भी जानते हैं, ऐसा संयोजिका ने कहा। असम में एक शिक्षिका ने भी कहा था, गुरुजी को ज्ञात है कि सहज समाधि उनके यहाँ हो रहा है ! उसने गुरुजी के प्रति अपनी निष्ठा को पूर्ववत् नहीं बनाये रखा, ऐसा मानना भी उचित नहीं। वह उनमें और स्वयं में कोई भेद नहीं देखती, वह उन्हीं का भाग है ! ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ अथवा तो एक ही सत्ता से यह सारा जगत बना है !  


आज सुबह उन्होंने पूरे सत्तर मिनट भ्रमण किया; नये व सुंदर, हरे-भरे रास्ते पर! तस्वीरें भी खींचीं। आज दो बालिकाएँ हिन्दी पढ़ने आयीं। दोपहर बाद बाज़ार गये, आगामी यात्रा में जिनसे मिलेंगे, उनके लिए कुछ उपहार ख़रीदे। ‘पंचायत’ धारावाहिक का अंतिम अंक देखा।   



Wednesday, April 22, 2026

वर्डल - शब्दों का एक खेल


वर्डल - शब्दों का एक खेल 


आज का दिन बहुत व्यस्त रहा, फ़िटबिट २४,५२३ कदम दिखा रहा है और ३३ फ़्लोर भी। उनके मित्रगण साढ़े बारह बजे तक आ गये थे। उनके आने से पूर्व सभी कमरों की चादरें बदलीं। भोजन बनाया, जो उन्हें पसंद आया। शाम को उन्हें सोसाइटी (नापा) दिखायी, निकट स्थित एक झील भी, फिर सभी आश्रम गये। गुरुजी यहाँ नहीं हैं, इसलिए सत्संग नहीं हुआ। दोपहर को हुई कन्नड़ा क्लास में १२ वाक्य बनाने को दिये, पता नहीं वह कर पाएगी या नहीं ।  


आज वे मेहमानों के साथ पिरामिड वैली देखने गये। नीचे स्वागत कक्ष में कुछ देर ध्यान सिखाया गे, फिर ऊपर पिरामिड में बैठकर ध्यान किया। शरीर में ऊर्जा का प्रवाह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था। शाम को वर्षा हो गयी, मौसम सुहावना हो गया है। आज से सोसाइटी में नई एजेंसी ने काम करना शुरू कर दिया है, पर बहुत सारी दिक़्क़तें आ रही हैं। पुरानी टीम ने काम करने से मना कर दिया है। कुछ दिन तो लगेंगे, सब कुछ व्यवस्थित होने में। 


आज सुबह वे झील पर सूर्योदय देखने गये। मेहमानों को बहुत अच्छा लगा। दोपहर को नन्हा और सोनू आये थे, बाद में मित्र की बिटिया भी आयी। जून और उनकी टीम ने अति विरोध के कारण कमेटी भंग कर दी है।अब कल से उन्हें व्यर्थ के तनाव से नहीं गुजरना होगा।आज सोनू ने अपने दिल की बात कही। ईश्वर उसकी यह इच्छा पूर्ण करें। जीवन में कितनी भी उलझनें हों, आत्मा की निकटता से सब घुल जाती हैं। 


कल शाम वे नन्हे के घर गये थे। उसके एक मित्र के पिताजी से मिलने, उन्हें नूना ने अपनी लिखी पुस्तक व एक असमिया गमछा भेंट किया।दोनों बच्चे कुछ उदास लगे। उम्मीद है अब बादल छँट गये होंगे। 


आज सुबह दोनों से बात हुई, आपसी विश्वास और बातचीत से सब सुलझ जाता है। जून भी आजकल पुन: सामान्य हो गये हैं। उनसे मिलने हर दिन कोई न कोई आता है, शायद सभी को चिंता है कि इतना श्रम करने के बाद यह परिणाम नहीं आना चाहिए था। नूना को लगता है, जो भी हुआ, वैसा ही होना था, और उसी में सबकी भलाई है। आज निकट वाले गाँव से पहली बार कपड़े प्रेस करने वाला एक व्यक्ति घर से आकर कपड़े ले गया। सोसाइटी में आजकल शांति है। नई एजेंसी को शिकायत है, उन्हें काम करने न देकर अच्छा नहीं हुआ।कुछ लोग निहित स्वार्थ के कारण जरा सा भी परिवर्तन नहीं चाहते। पापा जी से बात हुई, यूक्रेन में चल रहे युद्ध में हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। वह भी चिंता व्यक्त कर रहे थे, पता नहीं पुतिन को कब सद्बुद्धि आयेगी। आज सुबह उन्होंने एक घंटे से अधिक ही पैदल यात्रा की, घर से घर तक की यात्रा, जीवन भी तो यही है। अव्यक्त से चलकर अव्यक्त हो जाने की यात्रा ! कल से छोटी बहन की भारत यात्रा आरम्भ हो रही है। ईश्वर उसे शक्ति दे और उसकी यात्रा निर्विघ्न संपन्न हो। आज नैनी ने दोनों सफ़ेद कार्पेट धो दिये हैं और अब सारे डोर मैट्स धोने वाली है। उसे काम करने में कोई कष्ट नहीं होता। दिन भर घर से बाहर ही रहती है, बहुत जीवट है उसमें। 


आज जून की इलेक्ट्रिक साइकिल तैयार हो गयी। शाम को वे दोनों साइकलिंग के लिए गये। नन्हे को अब रोज़ ही दफ़्तर जाना है। घर से काम करने की छूट अब नहीं रही। सुबह वे टहल कर आये तो दो दुबले-पतले से कुत्ते दिखे, शाम को एक मोटा-तगड़ा कुत्ता दिखा अपने मालिक के साथ, जिसे व्यायाम की ज़रूरत है। आदमियों की तरह कुत्ते भी अमीरी व ग़रीबी में पलते हैं।आज उसने ‘द टाइगर पॉज’ पुस्तक समाप्त कर दी। बहुत रोचक किताब है। गुरुजी के काम करने का तरीक़ा भी पता चलता है। उनका यह कहना कि कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं होता, सेवा करो। अपने शिष्यों पर कितना भरोसा है उन्हें। तमिलों ने श्रीलंका में बहुत कष्ट सहे हैं, लेकिन युद्ध से कभी किसी भी समस्या का हल नहीं निकला है। प्रभाकरण भी अंत में मारा गया, हज़ारों तमिलों को नर्क से भी भयानक स्थिति का अनुभव कराके।  


अभी-अभी वे रात्रि भ्रमण करके आये हैं, हवा चेहरे को छू रही थी, शीतलता लिए तेज हवा! जबकि गर्मियों का मौसम पूरे शबाब पर है, दिन में धूप काफ़ी तेज होती है। आज तिब्बतियन पुस्तक  में पढ़ा, नींद मृत्यु की झलक है, स्वप्न, मृत्यु के बाद की अवस्था की झलक और गहरी नींद समाधि की झलक है। यदि कोई नींद में प्रवेश करते समय स्वप्न में और गहरी नींद में भी सजग रह सके तो वह मृत्यु के क्षण में भी सजग रह सकता है। आजकल उसका ध्यान गहरा नहीं हो पा रहा है, भाव के ऊपर विचार हावी हो जाते हैं। रविवार को बच्चों से मिलने के बाद शायद मन ज़्यादा स्थिर हो।जून ने इतने दिनों की व्यस्तता के बाद अपने आपको अख़बार, शेयर आदि में व्यस्त रखना सीख लिया है। आज कन्नड़ा कक्षा हुई पर क्रिया के भेदों को याद रख पाना सरल नहीं है। जब तक वह बोलने का अभ्यास नहीं करेगी कठिनाई बनी ही रहेगी।


आज पहली बार ऑन लाइन शब्द पहेली खेल, ‘वर्डल’ खेला, कठिन लग रहा है, अभी अभ्यास नहीं है। इस खेल को पहली बार जॉश वार्डेल ने अपनी मित्र के लिए बनाया था, पर लोकप्रिय हो जाने के कारण न्यूयार्क टाइम्स ने इसे ख़रीद लिया है। शाम को दीदी से बात की, जब वे निकट के गाँव की सड़क पर घूमने गये थे। सड़क नयी बनी है। क्षितिज पर पहाड़ भी स्पष्ट दिख रहे थे, खेत ख़ाली थे। रास्ते में फूलों से लदे पेड़ भी देखे, बैंगनी व पीले, सफ़ेद बोगेनविलिया भी। गुरुजी को सुना, वह कल ही हरिद्वार से लौटे हैं। एक नया दिन उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, परमात्मा हर घड़ी, हर जगह उनके साथ है ! उसे पाने के लिए कुछ करना नहीं है, केवल विश्राम करना है, मन की अतल गहराई में विश्राम ! छोटा भाई कोलकाता के पास मायापुर में है। कल अष्टमी है, नन्हा व सोनू आयेंगे, वह काले चने, हलवा व तवा रोटी बनाएगी। 

  



Wednesday, August 13, 2025

संयम की साधना

संयम की साधना



आज ‘संयम’ का दूसरा दिन है। कल की तुलना में ध्यान सरलता से लगा और देर तक भी। भीतर जैसे कोई सिखा रहा था, योग की साधना आरंभ करने से पूर्व यम-नियम का ज्ञान आवश्यक  है। यम अर्थात वे मूल्य, जो समाज में जीने का तरीक़ा सिखाते हैं। जब तक मन में हिंसा की प्रवृत्ति किसी भी रूप में है, नकारात्मकता बनी रहेगी। हिंसा के प्रति आकर्षण ही है जो मनुष्य को हृदयहीन बनाता है. योग में स्थित होने के लिए अहिंसा पहला मूल्य है. दूसरों के दुख को देखकर उदासीन बने रहना भी हिंसा है. अन्यों के दुख को देखकर बुद्ध के मन में करुणा का जन्म होता है, वह करुणा तभी उपजती है जब अहंकार शून्य होकर कोई अपने को परिवर्तित कर लेता है. ऊर्जा एक ही है चाहे कोई उसे अहंकार के रूप में उपयोग करे अथवा अस्तित्त्व के प्रति स्वयं के समर्पण के रूप में. जब तक साधक को अपने लक्ष्य का ज्ञान नहीं हो पाता, वह आगे कैसे बढ़ सकता है?


साधक का साध्य परमात्मा है और यदि वह स्वयं को अन्यों से श्रेष्ठ मानता है, तो वह हिंसा कर ही रहा है। अन्यों को हेय दृष्टि से देखने पर उन्हें दुख होगा। साधक मन में ईश्वर को धारण करता है, यह भाव अहंकार बढ़ाता है। मन को परमात्मा के प्रति समर्पित करना है, यह भाव विनम्र बनाता है। पूर्ण समर्पण ही उसके योग्य बनाता है। अन्य की संपत्ति देखकर उसे पाने की इच्छा मन में जगी तो लोभ मिटा नहीं, अस्तेय सधा नहीं।ज़रूरत से अधिक वस्तुओं का संग्रह भी व्यर्थ है और ब्रह्म में विचरण नहीं किया तो मन व्यर्थ की चेष्टाओं में ही लगेगा। इसी प्रकार भीतर संतोष बना रहे तो मन सहज ही प्रसन्न रहेगा। भीतर-बाहर की स्वच्छता रहे, तभी यह संभव है।


विपरीत परिस्थतियों में मन की समता बनी रहे, इसके लिए ईश्वर पर अटूट श्रद्धा और आत्म निरीक्षण की कला भी आनी चाहिए। इसके बाद आता है आसन का अभ्यास, जिसमें बैठकर प्राणायाम करना है। सभी इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर मन में धारण करना, मन को बुद्धि में और बुद्धि को आत्मा में स्थित करके आत्मा को परमात्मा में लीन कर देना ही ध्यान है। जब  दीर्घ काल तक यह सहज ही होने लगे, तो यही समाधि है।समाधि का अभ्यास जब दृढ़ हो जाता है तो जागृत अवस्था में हर समय भीतर एक स्थिरता का अनुभव होता है। मन को टिकने के लिए एक आधार, एक केंद्र मिल जाता है। मन एकाग्र रहता है, ऊर्जा व्यर्थ नहीं जाती और मन सहज ही प्रसन्न रहता है। जब सुने हुए और देखे हुए के प्रति कोई आकर्षण शेष नहीं रहता, तब वैराग्य घटता है।आज गर्मी ज़्यादा है, किंतु दिन भर आभास ही नहीं हुआ। रात्रि भ्रमण के लिए निकले तो हवा बंद थी। आज सुबह देखा, पैशन फ़्रूट की बेल नीचे गिर गयी है। पड़ोस में बनने वाले मज़दूरों ने जो हरे रंग की शीट लगाई थी वह भी गिर गई है। शायद कल वे उसे ठीक करेंगे। 


आज स्वसंचालित कोर्स का तीसरा दिन है। आज सुबह का ध्यान इतना गहरा नहीं था पर दोपहर बाद का बहुत रसपूर्ण।वर्षों बाद बालकृष्ण की छवि का ध्यान किया, सुबह जो वाक्य भीतर सुना  था वह सही सिद्ध हुआ। परमात्मा को सब कुछ पहले से ही ज्ञात होता है। शाम को भी कुछ देर भाव-जगत में विचरण किया। वेदान्त का ध्यान कितना सपाट होता है, शून्य का अनुभव, बस स्वयं के होने का: पर कोई साथ हो, जो राह दिखाने वाला हो अथवा तो जिस पर दिल न्योछावर किया जा सके तो साधना में प्राण आ जाते हैं। मन कैसा ठहरा हुआ है। आज गुरुजी के ज्ञान के अनमोल वचनों का आधार लेकर कुछ लिखा, यह भी तो उनके ज्ञान का प्रचार-प्रसार ही होगा। वही सिखाने वाला है और वही सीखने वाला भी ! वहाँ दो होकर भी दो नहीं हैं !  

   

आज सुबह समय पर साधना आरंभ की। दोपहर तक सब समयानुसार हुआ, पर तीन बजे के बाद गुरुजी को लिखे पत्रों की डायरी पढ़ने के लिए उठा ली, सारा समय उसी को पढ़ने में बीत गया। लगभग बारह वर्षों तक अपनी साधना संबंधी समस्याएँ नूना उन्हें पत्र में लिखती थी, समाधान भी मिल जाता था।२०१७ के बाद कोई पत्र नहीं लिखा। नन्हे के विवाह में पुन: पूर्व संस्कारों का उदय हुआ था, कुछ दिनों तक स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। उसके बाद बैंगलोर आने का स्वप्न था मन में। यहाँ आकर गुरुजी के दर्शन होने लगे, सेवा कार्य भी शुरू हुआ। कोरोना काल में आश्रम जाना ही बंद हो गया।कवि सम्मेलन में भी उनसे मुलाक़ात हुई, पर अब उनसे दूरी नहीं लगती सो पत्र लिखने का ख़्याल भी नहीं अता। अपना आप, गुरु और परमात्मा तीनों एक ही हैं, यह भाव दृढ़ होता जाता है।शाम छह बजे के बाद से मौन खुल गया है, पर सिर में जैसे भारीपन लग रहा ही, शायद शब्दों का असर हो रहा है। बोलने में काफ़ी ऊर्जा ख़र्च होती है।     

  




Wednesday, July 16, 2025

नारियल के पेड़


आज उनके घर के पीछे वाली  ज़मीन की छोटी सी पट्टी पर और दायें-बायें दोनों तरफ़ के लॉन में कार्पेट घास लग गई है।पड़ोसियों के यहाँ भी घास लग गई है, अब हरियाली बढ़ गई है दोनों ओर।माली ने गुड़हल के पौधे भी लगा दिये हैं। जून नर्सरी से क्रोटन के भी चार पौधे  लाए हैं।शाम को वे पुन: बोटेनिका गये। भविष्य में यह बहुत सुंदर सोसाइटी बनेगी, अभी तो मात्र सड़कें बनीं हैं और दोनों तरफ़ फूलों की क्यारियाँ और वृक्ष लगे हैं। सूर्यास्त का सुंदर दृश्य भी दिखाई दे रहा था। दाहिनी तरफ़ की सड़क एक गाँव की तरफ़ जाती है। शाम को नन्हे ने फ़ोन किया, इतवार को वे लोग अपने एक मित्र परिवार से मिलने गये थे। श्रीमती जी का जन्मदिन था, उन्होंने फल खिलाए, बाद में चाय व टोस्ट। उसके दाँत में दर्द था, गाल फूला हुआ था, पर वह अपने पैतृक शहर में जाकर ही इलाज करवायेंगी, ऐसा तय किया था। सोनू ने उसे अपने डेंटिस्ट का नंबर दिया।पापाजी ने बताया, उन्होंने मोबाइल पर हिन्दी में टाइप करना सीख लिया है। आज अंततः दीदी-जीजाजी ने भी कोरोना का टीका लगवा लिया। अभी-अभी भांजी को उसकी बिटिया के लिए लिखी कविता भेजी, उसे अवश्य पसंद आएगी। सुबह वे टहलने गये तो हवा में ठंडक थी। मानसून का असर होने लगा है हवाओं में। 


एक और दिन काल के गर्त में समा गया।पूरा दिन कुछ न कुछ व्यस्तता बनी रही।नन्हा व सोनू सुबह-सुबह आ गये थे। कल उन्हें भी वैक्सीन लगनी है। नन्हे ने एक नया गेम भेजा था, उसे खोलकर सीखने का प्रयास किया, नया मॉडेम भी लगाना था।नाश्ते में जून ने दोसे के साथ केसरिया खीर भी बनायी थी।सवा नौ बजे वे चले गये, कोरोना की वजह से जीवन कितने बंधनों में बंध गया है।नूना ने लेखन कार्य आगे बढ़ाया। दोपहर को गुरुजी का गाइडेड ध्यान किया। शाम को अख़बार की पहेलियाँ हल कीं।पापा जी से रोज़ की बातचीत हुई। सांध्य भ्रमण, ध्यान, रात्रि भोजन और रात्रि भ्रमण। इस समय वह दिन का अंतिम कार्य कर रही है, डायरी लेखन। जीवन कितना सहज हो गया है, न ऊधो का लेना ना माधव का देना ! न टीवी पर समाचार सुने न ही अख़बार में हेडलाइन्स के अलावा कुछ ज़्यादा पढ़ा। कुछ किताबें मंदिर में रखी हैं, उनमें से एक-एक पन्ना सुबह-शाम पढ़ने के अलावा और कोई किताब भी नहीं पढ़ी।सेवा के नाम पर अनुवाद कार्य चल रहा है और ब्लॉग के माध्यम से थोड़ी बहुत साहित्य सेवा ! योग वसिष्ठ पढ़ते समय कैसी मस्ती का अनुभव होता है, गुरुजी के साथ ध्यान करते समय भी। वह कितना काम कर रहे हैं। उनकी पुस्तक पढ़ना भी एक सुखद अनुभव है। 


आज सुबह वे टहलकर आये तो जून ने कहा, ड्राइव पर चलते हैं। बादलों के कारण सूर्योदय के दर्शन नहीं हुए। ठंडी हवा का आनंद लिया, आम ख़रीदे, तस्वीरें उतारीं। शाम को जून ने एक जूम मीटिंग अटेंड की, जिसमें बताया गया, दुनिया को पूर्ववत होने में अभी काफ़ी समय लगेगा और स्थिति शायद कभी भी पूरी तरह नार्मल न हो।  भविष्य ही बताएगा कि आगे क्या होने वाला है।जून ने एक मित्र से बात की, उनके पुत्र का विवाह अगले महीने होने वाला है। 


आज सुबह नूना टहलकर आयी तो बिना किसी आलंबन के ध्यान किया। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे ईश्वर ने ही यह सब तय किया है। हर आत्मा के लिए एक निर्धारित काल होता है जब उसे पूर्ण सत्य का बोध हो। उसके जीवन में भी वह दिन कभी न कभी आएगा, पर तभी न जब उसके लिए प्रयास जारी रहेगा। 


आज शाम को टहलने गये तो गाँव की तरफ़ निकल गये, कई मज़दूर एक छोटी सी पहाड़ी को काट कर मिट्टी निकाल रहे थे। पहाड़ी पर नारियल के कुछ वृक्ष बचे थे, वे भी कुछ दिनों में उखाड़ कर फेंक दिये जाएँगे, जैसे अब तक न जाने कितने पेड़ काट दिये गये होंगे। ज़मीन को इस तरह काट कर मिट्टी को बेचा जाता है, यह पहली बार ही देखा। आज बहुत दिनों बाद जून के पुराने मित्र व भाभी जी से बात हुई। उनकी बातें बहुत मज़ेदार होती हैं। बनारस की रीतियों, पूजापाठ, त्योहारों के बारे में बहुत जानकारी है उन्हें। दिवाली तक के कितने ही उत्सवों को गिना गयीं, बाद में सोचा रिकॉर्ड क्यों नहीं कर ली उनकी बातें। बनारसी लहजे के कारण कुछ समझ में आया कुछ नहीं। अगले महीने होने वाले बेटे के विवाह में बुला रही थीं। घर में बँटवारे की बात भी चल रही है, इसका भी तनाव है उन्हें, और बड़ा बेटा अपनी पत्नी व पुत्र से अलग रहता है, इसकी भी चिंता है। फिर भी बहुत आराम से सारी बातें करती रहनों। बनारस के लोगों की यह ख़ासियत है। सुबह छत पर प्राणायाम के समय धुआँ आने लगा था। पड़ोस में जो घर बन रहा है, मज़दूर खाना बनाना शुरू कर रहे थे शायद, अब वे झोपड़ी छोड़कर आधे बने घर में ही रहने लगे हैं। दूसरी मंज़िल बननी आरंभ हो गई है। अभी कुछ महीने और लगेंगे, तब तक शोर और यह परेशानी झेलनी पड़ेगी।  


Thursday, May 2, 2024

गट्टे की सब्ज़ी

गट्टे की सब्ज़ी 


आज सुबह टहलने गये तो तापमान १६ डिग्री था, जैकेट पहनने का दिन, कभी-कभी २० या इक्कीस रहता है तो वे नहीं पहनते। समाचारों में सुना, दिल्ली का तापमान १ डिग्री हो गया है, यहाँ उसकी कल्पना करना भी कठिन है। इतनी ठंड में उन लोगों का क्या होता हिगा, जिनके पास पक्के घर नहीं है या घर ही नहीं हैं। आश्रम में अगले महीने एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए छोटी बहन ने फ़ेसबुक पर संदेश पोस्ट किया है। वहाँ प्रतिदिन सत्संग हो रहा है। गुरुजी ने विश्व में लाखों लोगों को योग के पथ से जोड़ा है, ऐसा कार्य ईश्वरीय कृपा  के बिना नहीं हो सकता। अभी-अभी जे कृष्णामूर्ति द्वारा ध्यान की सुंदर परिभाषा सुनते-सुनते ही मन ध्यानस्थ होने लगा। ‘देवों के देव’ में आज दधीचि मुनि के त्याग की गाथा सुनी। उसे लगता है, वे लोग समाज के लिए कुछ विशेष नहीं कर पा रहे हैं। परमात्मा ही उन्हें राह दिखाएगा, अर्थात उनका शुद्ध ‘मैं’, यानि वे ‘स्वयं’ ! हर किसी को अपना मार्ग स्वयं ही तो चुनना होता है। परमात्मा हर किसी के द्वारा स्वयं को ही अभिव्यक्त कर रहा है ! कोई कितना उसे प्रकट होने देगा, उतना ही उसका जीवन सुंदर होगा !! 


आज सुबह मौसम सुहावना था। अपने निर्धारित स्थान पर चौकीदार को छोड़ कर पूरे रास्ते भर कोई नहीं मिला। रात की रानी की सुगंध दूर से ही आने लगी थी, सम्पूर्ण क्यारी  छोटे-छोटे श्वेत फूलों से भर गई है।जो बल्ब के प्रकाश में दिखायी दे रही थी। सड़क पर अंधेरा था। नैनी आज जल्दी आ गई, कन्नड़ सिखाने में उसे आनंद आता है, वह धीरे-धीरे कुछ शब्द सीख रही है।नाश्ते के बाद वे सब्ज़ी ख़रीदने गये, बेबी कॉर्न, कुंदरू, अरबी, आँवले आदि कुछ नयी सब्ज़ियाँ मिलीं, जो पास की दुकान में नहीं मिलतीं। जून को अब ईवी चलाने में दिक्क्त नहीं होती। इतवार को ईवी कार रैली है, नन्हा उसमें जाने को कह रहा है। यह भी बताया, उसका पैथोलॉजिस्ट मित्र असम जाने वाला है, उसे मेडिकल कॉलेज में जॉब मिला गया है, वहाँ वह आगे पढ़ाई भी कर सकता है।ऐसे ही लोग अपने शोध कार्य और श्रम के द्वारा समाज के लिए नयी खोज कर पाते हैं, उनके परिश्रम का लाभ मानवता को मिलता है। असम की एक हिन्दी लेखिका पूनम पांडेय की किताब में कुछ कहानियाँ पढ़ी, जो असम के लोक जीवन पर आधारित हैं।कल किसानों से एक बार फिर सरकार की बात होने वाली है, शायद कुछ हल निकल आये। 


आज मॉर्निंग ग्लोरी का पहला फूल खिला रानी कलर का सुंदर फूल ! धीरे-धीरे सभी गमलों में फूल आयेंगे, और जब बेलें ऊपर चढ़ जायेंगी तब और भी सुंदर लगेंगे। भीतर कैसी गुनगुन सुनायी दे रही है। जब मन शांत हो तभी यह अखंड गूंज सुनायी देती है। छोटी ननद का फ़ोन आया, वह गट्टे की सब्ज़ी बना रही थी। ख़ुद उसे बनाये हुए बरसों हो गये हैं। बचपन में माँ के हाथों की बनी पकौड़े की सब्ज़ी भी खायी थी। उसके बाद कभी मौक़ा नहीं मिला, सोचती है, क्यों न एक दिन उसी तरह बनाकर बच्चों को खिलाए। शाम को गुरुजी को सुना, वह प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे, कितने सटीक और प्रभावशाली ढंग से वह प्रश्नों के उत्तर देते हैं। आज वे उन्हीं वृद्ध व्यक्ति से मिले, कह रहे थे, अगले हफ़्ते घर भी आयेंगे।सौ बरस के हो गये हैं, कहने लगे, “आदमी थक जाता है एक उम्र में, जीवन और मृत्यु अपने हाथ में तो है नहीं।” पता नहीं कुछ लोग लंबा क्यों जीते हैं और कुछ अल्पायु में ही कालग्रसित हो जाते हैं। सुबह छोटे भाई से बात हुई, कह रहा था, मृत्यु के रहस्य को छोड़कर जगत में कुछ जानने को नहीं रह गया है। वह ध्यान में गहरा उतरने लगा है। बहुत मस्त रहता है। दीदी ने उसके लिखे एक भजन के बारे में कहा है, वह अवश्य प्रसिद्ध होगा। उसकी एक सखी ने अपनी मधुर आवाज़ में उसे गाया था, जो व्हाट्सेप पर पोस्ट कर दिया था; सब को अच्छा लगा, भाई ने कहा है उसे अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करे।    


नौ बजने वाले हैं, जून ठीक नौ बजे बत्ती बंद करने को कहेंगे। उसके पूर्व ही आज का लेखा-जोखा लिख लेना है। सुबह आकाश पर बदली थी। आर्ट ऑफ़ लिविंग के फिटनेस चैलेंज का अंतिम दिन था। जून ने मॉर्निंग ग्लोरी के फूलों की तस्वीरें उतारीं। बाद में वे ढेर सारे फल लाए। काव्यालय की संस्थापिका ने एक अंग्रेज़ी कविता का अनुवाद पोस्ट किया, उसे अखरा तो उसने भी एक अनुवाद किया और उन्हें भेजा। जिसे उन्होंने फ़ेसबुक पर पोस्ट कर दिया। एक चित्र बनाना आरम्भ किया है। ‘ध्यान’ पर एक पुस्तक का  अध्ययन भी शुरू किया है। जीवन एक लय में आगे बढ़ रहा है, जैसे सुबह और शाम, वसंत और पतझड़ आते-जाते हैं, वैसे ही उनके दिन और रात कुछ नये-नये अनुभव देकर बीत जाते हैं।  इसी मधुर भाव में जीने का नाम जीवन है शायद !  


Monday, September 28, 2020

सरोजिनी नायडू की स्मृति

सुबह नींद खुली तो सबसे पहले जून ने जन्मदिन की बधाई दी, फिर दिन भर शुभकामनायें मिलती रहीं. फेसबुक, व्हाट्सएप और फोन पर, नैनी और उसके परिवार के बच्चों ने कार्ड्स बनाकर दिए, उसकी सास ने पीले फूलों का एक गुलदस्ता दिया जिसमें चम्पा के भी दो फूल थे तथा . उसकी देवरानी ने एक दिन पहले ही लाल गुलाब का फूल देकर शुभकामना दी थी, कहने लगी सबसे पहले मेरी बधाई मिले इसलिए एक दिन पहले ही दे रही है. छोटी ननद ने एओल का गीत गाकर बधाई दी. अकेले ही टहलने गयी, जून को तीन दिनों के लिए पोर्ट ब्लेयर जाना है, तैयारी में लगे थे. वापस आकर प्राणायाम करने बैठी. जून ने माली को बुलवाया था पर वह नहीं आया सो थोड़ा सा क्रोधित थे, उनके क्रोध का आभास स्पष्ट हो रहा था योग कक्ष में बैठे हुए भी,  तरंगों का प्रसारण कितनी शीघ्रता से होता है. उनके दफ्तर जाने के बाद ध्यान किया. शाम की पार्टी की तैयारी की. दो मित्र परिवार आने वाले हैं. वह बंगाली सखी फोन करेगी ऐसी तो उम्मीद नहीं थी पर उसने व्हाट्सएप पर शुभकामनायें दीं, अच्छा लगा. शाम की योग कक्षा में सभी कुछ न कुछ बनाकर लाये थे, उन्होंने भजन गाये और ढेर सारे व्यंजन खाये. एकादशी थी पर उसने प्याज का प्रयोग कर लिया अनजाने में, किसी ने कुछ कहा नहीं पर उन्हें ज्ञात तो अवश्य हो गया होगा, प्रेम सारे नियमों से ऊपर होता है. इस जगत में प्रेम से बढ़कर कोई पावन वस्तु नहीं और प्रेम में होना ही आनन्द में होना है ! अर्थात परमात्मा में होना है ! इन साधिकाओं के प्रेम का कोई हिसाब नहीं, सभी एक से बढ़कर एक हैं. एक की तबियत ठीक नहीं थी फिर भी आयी थी, एक ने माँ शारदा के वचनों की छोटी सी पुस्तक तथा फूल दिए. इन सबका प्रेम देखकर लगता है, गुरु कृपा का पार पाना मुश्किल है. 


आज सुबह छह बजे जून अंडमान की यात्रा के लिए रवाना हो गए. उधर नन्हा और सोनू भी बीजिंग पहुँच चुके हैं. कई दिनों बाद मृणाल ज्योति गयी. वाइस प्रिंसिपल अस्वस्थ होने के कारण छुट्टी पर थी, प्रिंसिपल भी घर के कामों में व्यस्त थीं, उनकी आया लम्बी छुट्टी पर गयी हुई है. बाकी कई जन मिले, बच्चों को योग कराया. घर से लाये शकरपारे खिलाये. टीचर्स को मिठाई दी. जन्मदिन पर मिला फूलों का गुलदस्ता एक बच्चे को दिया, वह बहुत खुश हुआ. वापसी में आज़ार के बैंगनी फूलों से लदे वृक्षों के चित्र लिए. कल सुबह भी कैमरा लेकर जाना है, पूरे कैम्पस में बीसियों पेड़ों पर ये पुष्प खिले हैं. गुलमोहर पर भी बहार आयी है. पीछे वाली पड़ोसिन के यहां भी जाएगी, चम्पा का वृक्ष देखने. उसे मानसून पर कुछ बातें नेट पर मिलीं, उन्हें रोचक ढंग से लिखना है. छोटी भांजी का फोन आया, उसके जन्मदिन की कविता लिखनी है और गायत्री योग साधिकाओं के लिए भी यहां से जाने से पूर्व कुछ लिखना है. बिजली चली गयी है, सुबह से ही आ जा रही थी. आज मंत्रीमण्डल का गठन भी हो गया, मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के लिए पुरे जोश के साथ काम करने के लिए तैयार है. 


अतीत के पृष्ठ - उस दिन उसने एक पत्र लिखा तो उसमें उस अनुभव के बारे में भी लिख दिया जो हुआ था कुछ देर पूर्व ! अद्भुत ! अनोखा ! शांत और प्रिय ! ईश्वर ने उसके प्रेम का प्रतिदान उपहार देकर दिया. शायद वह बिना किये ही ‘ध्यान’ का पहला अनुभव था, उस समय ‘ध्यान’ से वह अपरिचित थी. उसके बाद भी एक कविता सहज ही लिखे जाने का जो अनुभव हुआ वह भी कम रोचक नहीं, सरोजिनी नायडू की स्मृति उसे सदा आ जाती है ऐसे वक्त पर, और चौड़ा मस्तक भी. कुछ अरसा पहले वह छोटी बहन के साथ एक वृद्ध अध्यापक के पास अंग्रेजी पढ़ने जाती थी, वह उसकी दुविधा और चिंता कितनी अच्छी तरह समझते थे, तभी उन्होंने कहा था, तुम्हारा मस्तक चौड़ा है.  स्नेह का एक बोल मन को फूल सा हल्का मगर शक्ति में चट्टान सा दृढ बना देता है. उस दिन वह बेहद प्रसन्न थी, उत्साह से लबरेज उसका प्याला छलका जा रहा था, जैसे सारा जहाँ उसके लिए पूजा की वस्तु बन गया हो. अगला पेपर फ्लूइड डायनामिक्स का है, उसने सोचा मानसून कब आएगा. 


Thursday, September 24, 2020

विश्वनाथ मंदिर

 

दोपहर के ढाई बजे हैं, आज नेट नहीं चल रहा और हिंदी लिखने का सॉफ्टवेयर भी काम नहीं  कर रहा, सो लिखने का काम नहीं हो पाया. अब मकैनिक आया है, कम्प्यूटर चेक कर रहा है और एक अन्य व्यक्ति टेलीफोन ठीक कर रहा है. मौसम आज भी बदली भरा है. सुबह इतनी तेज बारिश हो रही थी कि वे टहलने नहीं जा पाए. उसने टीवी खोला तो पता चला आज प्रधानमंत्री का आगमन काशी में हुआ है. वह विश्वनाथ मन्दिर पहुँच चुके हैं, जिसकी बहुत मान्यता है. वह गर्भ गृह में पूजा-अर्चना के लिए बैठे हैं, अशोक द्विवेदी जी उन्हें आचमन करा रहे हैं. योगी जी पीछे हाथ जोड़कर खड़े हैं. वे सभी देश के विकास का संकल्प ले रहे हैं. भारत को विश्व पटल पर एक आदर्श देश के रूप में स्थापित होते हुए  देखने का संकल्प लिया जा रहा है. काशी को उन्होंने अपना चुनाव क्षेत्र चुना है तो इसके पीछे कोई कारण होना ही चाहिए. यह अति प्राचीन नगरी है, जहाँ शिव का अति प्राचीन मंदिर है. इसे आधुनिक काल के अनुरूप स्वच्छ व सुंदर बनाने का काम भी सरकार की तरफ से चल रहा है. उसे वे दिन याद आने लगे जब वे काशी में रहते थे और विश्वनाथ के दर्शन हेतु जाया करते थे. उस समय वहां बहुत भीड़, फूल-पत्तियों के ढेर और कीचड़ हुआ करता था. शायद अब जब उन्हें वहाँ जाने का अवसर मिले तो सब कुछ बदला हुआ होगा. 


रात्रि के पौने आठ बजे हैं. मौसम आज गर्म है, अब दिनोंदिन और गर्म होता जायेगा. जून ने उनके सामान को बंगलूरू ले जाने के लिए पैकर्स से बात करना आरंभ कर दिया है. वे कुछ गमले और पौधे भी ले जायेंगे. आज सन्ध्या योग कक्षा में सभी महिलाओं को उसने आश्रम से लायी गुरूजी की तस्वीर भेंट की. वे चने की मिठाई भी लाये थे, खिलाई. योग साधना करते समय सहज ही ध्यान लग रहा था, आज सुबह उठने से पूर्व कैसा विचित्र अनुभव हुआ, बिना हाथ उठाये वस्तु को उठाने का अनुभव. आँख बन्द किये हुए पढ़ने का अनुभव. सब कुछ कितना रहस्यमय है. जब से बैंगलोर से आयी है, एक विचित्र सी गंध का अनुभव होता है. जून को स्टोर से कोई दुर्गन्ध आ रही थी जबकि उसे उसका पता ही नहीं चल रहा था, जबकि फूलों की गन्ध अनुभव कर पा रही है. आज भूटान यात्रा का विवरण टाइप किया, आयल की हिंदी पत्रिका में छपने के लिए देना है. बहुत दिनों बाद एक कविता भी लिखी और एक अन्य पोस्ट. इतने दिनों बाद कम्प्यूटर पर काम करना अच्छा लग रहा है. 

आज शाम महिला क्लब की कमेटी की मीटिंग थी. इस बार ज्यादातर महिलाएं असमिया हैं, वे हिंदी या अंग्रेजी में नहीं बोल रही थीं. उसे याद आया भूतपूर्व प्रेजिडेंट के समय पर सभी भाषाओँ का समान प्रयोग होता था. वक्त के साथ हर चीज बदलती है. वैसे नई सेक्रेटरी ने बखूबी संचालन किया. अगले महीने की क्लब की मासिक मीटिंग के लिये कार्यक्रम की रूपरेखा बनानी थी. इस बार कमेटी के सदस्यों को भी भाग लेना है. तय हुआ सारा कार्यक्रम मानसून थीम पर आधारित होगा. उसके लिए यह अंतिम अवसर होगा. बरसात पर कितनी ही सुंदर कविताएं व मनोरंजक गीत मिल सकते हैं. दोपहर को एक कविता लिखी, बल्कि एक विशेष भाव दशा में लिखी गयी जैसे अपने आप ही, देर शाम तक वह भाव दशा रही, पर नींद में रह पायेगी, पता नहीं. 


उसने दशकों पुरानी डायरी खोली - उस दिन एक और पेपर देकर वापस आ रही थी. एक सखी ने पूछा, कैसा हुआ, कहना चाहिए था अच्छा नहीं हुआ पर स्वभाव वश कह दिया अच्छा ही हो गया, पर इतना तो तय है कि पेपर उतने में से ही आता है जितना वह पढ़ती है, बस कुछ चीजें वह सरसरी तौर पर पढ़ती है. लौटते समय बस मिल गयी थी. एक मुसलमान ग्रामीण की मूर्खता या अज्ञानता पर आश्चर्य हुआ थोड़ा सा, क्योंकि यह उसकी ही गलती नहीं उसके परिवेश तथा उसके आस-पास के लोगों की भी है. एक सात-आठ साल की बच्ची ने रोना शुरू कर दिया कि उसके बापू उसे बस में बैठाकर नीचे चले गए हैं. वह डर रही होगी कहीं वह छूट न जाएँ. शायद पहली बार बस में बैठी थी, पर कौन जानता है वह क्यों रो रही थी ? पर उसके रोने में एक लय थी, धीरे-धीरे बच्चों की मासूम आवाज़ में वह रोना लोगों को खल नहीं रहा था. एक अन्य छोटी सी बच्ची उसके पास बैठी थी, जिसकी माँ घूँघट निकाले थी, वह उसकी अंगुली पकड़ लेती थी कभी- कभी, पर इतनी देर में वह एक बार भी मुस्कुरायी नहीं. कितनी ही बार उसने नूना की ओर देखा होगा, पता नहीं बड़ी होकर क्या बनेगी !   


Sunday, August 16, 2020

गुलमोहर के फूल

 

दस बजने वाले हैं सुबह के. मौसम आज गर्म है. प्रातः भ्रमण के लिए गए तो हवा बंद थी, उमस भरा वातावरण. कल उन्हें यात्रा के लिए निकलना है, एक लंबी यात्रा. एक महीने के लिए वे घर से दूर रहेंगे, अपने नए घर को तैयार करने के लिए. पिछले कई दिनों से लेखन कार्य थम गया है, कम्प्यूटर में कुछ खराबी आ गयी थी, कल बनकर आया पर हिंदी टाइपिंग नहीं हो पा रही है. जून के घर आने पर ही सम्भव होगा. तकनीकी कार्यों में रूचि न लेने का ही यह नुकसान है. पैकिंग थोड़ी बहुत हो गयी है, शेष जाने तक चलती ही रहेगी. 

रात्रि के सवा ग्यारह बज चुके हैं. वे सवा तीन घन्टे पहले बंगलूरू पहुँच गए थे. सुबह से ही तैयारी में लगे थे. लॉन में ही कुछ देर टहले, फिर लघु योग साधना की. रुकते, उड़ते लगभग बारह घण्टों की  यात्रा आरामदेह थी, निर्विघ्न संपन्न हुई. एयरपोर्ट से घर आने में दो घण्टे का समय लगता है,  कार में तेज नींद आ रही थी. घर पर नन्हा और सोनू प्रतीक्षा कर रहे थे. भोजन तैयार था, पर आधा घन्टा कुशलता समाचार का आदान-प्रदान करने के बाद भोजन किया. अब नींद गायब हो गयी है. कल नए घर जाना है, जहाँ रँगाई का काम चल रहा है. 


दूसरा दिन बीतने को है. सुबह पांच बजे नींद खुल गयी. कुछ दूर पर स्थित एक बड़ी कालोनी में टहलने गए और वही पार्क में एक छोटे से मन्दिर के निकट बैठकर यू-ट्यूब  पर गुरूजी के सद्वचन सुनते हुए ही प्राणायाम किया. एक चबूतरे पर तीन काले पत्थरों पर नाग तथा शिव की आकृतियां खुदी हैं. नन्हे ने नाश्ता मंगाया. उन्होंने शुरुआत फलों से की, फिर दोसे का नाश्ता. नए घर में गए, वापसी में लन्च भी बाहर किया. वापस आकर मृणाल ज्योति का कुछ काम था, अब चार-पाँच महीने ही शेष हैं उसे इस संस्था के साथ काम करने का अवसर मिलेगा. रास्तों में गुलमोहर के पेड़ों पर लाल फूलों की बहार देखी. यहाँ के मौसम के अनुसार वृक्षों अर फूल जल्दी आते हैं, असम में देर से. 


दोपहर के साढ़े तीन बजे हैं. नन्हे का घर पांचवी मंजिल पर है. नीचे तरणताल से बच्चों के तैरने की आवाजें पिछले दो-तीन घण्टों से आ रही हैं. धूप तेज है, दोनों बिल्लियां बाहर बालकनी में आराम कर रही हैं. अभी-अभी छोटी बहन से बात की, बताया अस्पताल में पिछले दिनों उसने काफी लंबी-लंबी ड्यूटी की. इसी वर्ष वह बेटियों से मिलने कनाडा जाएगी. कल रात को नींद में ध्यान व स्थिरता का अनोखा अनुभव हुआ. उसके बाद जो भी शब्द मन में आया रहा था, वह स्पष्ट दिख रहा था. लाल शब्द लाल रंग में लिखा हुआ तथा कोई पशु-पक्षी उसी प्रकार से रचा जा रहा था. मन के भीतर सृष्टि रचने की कितनी क्षमता है. योग वसिष्ठ में ब्रह्म की सत्यता को विलक्षण ढंग से सिद्ध किया गया है. इन्द्रियों का सार मन, मन का सार बुद्धि, बुद्धि का सार चिदवलिका तथा चिदवलिका का सार शुद्ध सत है यानि शुद्ध चैतन्य से ही सब प्रकटा है. जैसे सागर से फेन, लहर, बुदबुदे व बर्फ पैदा होते हैं पर वे सागर के सिवा कुछ भी नहीं नहीं है. जगत अकारण है इसलिए वस्तुओं व घटनाओं के कारण को खोजने में कोई सार नहीं है.


और अब कालेज के अंतिम वर्ष की बात, उस दिन पिताजी ने दो पार्कर के पेन दिए थे, उसने कहा, ये तो बहुत महंगे हैं तो वह बोले कि वह महंगी नहीं है क्या ? सुनकर उसे बेहद ख़ुशी हुई. वह पिताजी से कैसे कहे कि यह बात.. यह बात.. उसे हमेशा याद दिलाएगी कि वह उससे प्रेम करते हैं और वह बहुत अच्छे हैं. वह सदा उनका आदर करेगी और उनका सम्मान ऊँचा करने का प्रयत्न ! थैंक यू .. मैनी मैनी थैंक्स. 


मन उदात्त भावों से भरा है. हल्की -हल्की मधुर बांसुरी की धुन मन के किन्हीं कोनों में सुनाई दे रही है. सोवियत नारी में वह नन्हे बच्चों की कहानी कितनी अद्भुत है, ऐसी कहानियां तो उसे जिंदगी का अहसास दिलाती हैं कि कहीं दूर, उनसे दूर किसी देश में बच्चे वैसा सोच जाते हैं जैसा सिर्फ उनके मन में होता है. .. और आरोग्य में वह लेख, युवावस्था, विचारों के बहाव का, साथ ही दृढ़ता का नाम है. खुदबखुद चेहरे पर छायी रहने वाली रौशनी का नाम है और दूसरों से प्यार करने, उन्हें दुःख न देने का. साथ ही दुनिया को एक रंगीन तोहफा समझना ! बेशकीमती तोहफा ! 


Wednesday, July 22, 2020

वसिष्ठ और राम



आज सुबह अप्पम बनाये नाश्ते में, जून के एक सहकर्मी आये थे दस बजे कुछ जानकारी लेने, उन्हें भी खिलाये. पसन्द आये उन्हें. उन्होंने अपने बाल्यकाल की बातें बतायीं, किस तरह उनके माता-पिता ने कृषि का काम करना सिखाया तथा भोजन बनाना भी. कक्षा पांच में थे तब दोसा बना लेते थे. अब भी वे घर पर खेती करते हैं, उनके लिए खुद की उगाई सब्जियां लाये थे. टीवी में रामदेव जी को देखकर नियमित योग अभ्यास भी करते हैं. जून ने भी उन्हें सहजन व नारियल तुड़वा कर दिए. कल माली ने बहुत सारे सहजन तोड़े थे, दो तीन अन्य परिवारों को भी बांटे। सुबह शिवानी को सुना, कितना ज्ञान उनके भीतर भर है सीधा परमात्मा से उतरता है ज्यों ! दोपहर को सब्जी-फल लेने वे तिनसुकिया गए. बीहू के कारण बहुत चहल-पहल थी. नन्हे-सोनू  से बात की कल वे लोग किसी मित्र के विवाह में राजस्थान जा रहे हैं. नए घर में रंगरोगन का काम शायद कल से शुरू होगा. दोनों के लिए उसने वस्त्र खरीदे, पहली बार एक साथ दोनों के लिए ! बड़े भांजे के विवाह की सालगिरह है आज, दीदी के यहां फोन किया, सभी आये हुए हैं, विदेश में रहने वाली भांजी भी आयी है. शनिवार को वे पुस्तकालय गए थे उसे याद करते हुए शाम को एक घन्टा पढ़ने में बिताया. पिताजी ने बताया वह आजकल योगवशिष्ठ व भागवद पढ़ रहे हैं, पर इन ग्रन्थों को नॉवल की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, नियमित एक या दो पृष्ठ का अध्ययन करना चाहिए. योग वसिष्ठ में राम ने हर अवस्था में मानव के दुखों का कैसा मार्मिक वर्णन किया है. कलात्मक भाषा में अहंकार, मोह व तृष्णा के दुष्परिणामों का वर्णन किया गया है. चित्त की अशुद्धि को दूर रखने के लिए मन को स्थिर रखना होगा. समता को भावना में टिके बिना आत्मपद में स्थित होना असंभव है. तेनाली रामा में मुल्ला नसरुद्दीन भी आ गए हैं आजकल, उन्हें त्रिदेव के दर्शन करने हैं !

मौसम आज सुहाना है. सुबह साढ़े तीन बजे ही उठ गयी, उससे पूर्व ही एक स्वप्न देखकर नींद खुल गयी थी. छोटे भाई को देखा और उसके पूर्व स्वर्गवासी सास-ससुर को भी, वे अस्पताल में हैं. मन पुरानी स्मृतियों को दोहराता है पर कुछ इशारे भी करते हैं ये स्वप्न. मन आकर्षक दृश्यों को दिखाता है ताकि अपनी उपस्थिति जताता रहे. अव्यक्त की अनुभूति अब कितनी स्पष्ट होती है, एक प्रकाश, एक शांति और एक चैन के रूप में ! सुबह प्रातः भ्रमण से लौटते समय पलाश के फूलों से लदे  लाल वृक्ष देखे, कल वे  मोबाईल लेकर जायेंगे  और उनकी तस्वीरें उतारेगें. पहली बार पूरे के पूरे वृक्ष फूलों के लद गए हैं.  दोपहर को अचानक तेज हवा चलने लगी और एक घण्टे  तक मूसलाधार वर्षा होती रही. योग सत्र में ध्यान किया व करवाया, गुरूजी का ज्ञान पत्र पढ़ा; यह देह भी एक युद्ध क्षेत्र है, ऐसा उन्होंने कहा. उन्हें अपने भोजन पर ध्यान देना है, एक वृद्ध व्यक्ति से सुना था, ‘कम खाओ और अधिक खाओ’ भोजन  ऐसा हो कि देह में सुस्ती न आने पाए स्फूर्ति बनी रहे. टीवी पर प्रधानमंत्री की उड़ीसा में की गयी विशाल रैली दिखाई जा रही है. विपक्षी उनकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा  रहे हैं और बीजेपी कांग्रेस के घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र कह रहे हैं. गंधराज खिल गए हैं अभी उनकी तस्वीर उतारी ! 

शायद कोई संदेश मिला था उस दिन जो उसने बरसों पहले लिखा होगा - 

आ सकती नहीं वह 
आ सकता वह 
आएगा 
या बन जायेगा पत्थर पर खुदा
उसने उठाया उसे बाँहों में 
हवा उठाती ज्यों चिन्दी को 
ज्यों उठाते हैं जल चढ़ाने सूर्य को 
नसीब एक भारी पत्थर 
वे बच्चे 
करते हैं कोशिश हटाने की 
पत्तों के बीच थिरकती किरणों से खेल 
बनना नहीं चाहती वह नाव 
उसे ला दो समुन्दर 
वह घुल जाये बह जाये उसी में 
हवा आती है गुजर जाती है 
जैसे दूसरे देश का वासी 
जैसे परछाईयाँ तेज बादल की 
घाटी पर रुकती नहीं चली जाती हैं !

Monday, July 20, 2020

समंदर की लहरें



कल शाम वे गेस्टहाउस गए, उस सखी की बिटिया का जन्मदिन था, जो अपना घर देखने आयी थी . उसके पूर्व दो माह बाद एओल टीचर द्वारा करायी सुदर्शन क्रिया में भाग लिया. क्रिया के बाद कुछ ज्ञान चर्चा भी हुई. सार निकला, वे अपना समय तथा ऊर्जा उन लोगों के सामने स्वयं को कुछ सिद्ध करने में लगा देते हैं जिन्हें उनकी जरा भी परवाह नहीं होती. वे अपना प्रेम उन पर लुटाते हैं जिन्हें प्रेम के बारे में केवल अपने हानि-लाभ ही ज्ञात होते हैं.  सरल और सहज रहकर यदि वे अपने काम से काम रखें तो जीवन कितना सुंदर होगा. परमात्मा अपनी कृपा दोनों हाथों से नहीं बल्कि हजार हाथों से लुटा रहा है, उनकी झोली इतनी छोटी है और मोह, कामना के इतने छिद्र हैं उसमें कि वे उसको पहचानें इसके पहले ही वह झर जाती है. वे जो वास्तव में हैं वही जगत के सम्मुख आये, कोई भी दम्भ या दिखावा उन्हें छू न जाये. जून आयकर के सिलसिले मेंआज डिब्रूगढ़ गए हैं. आज सुबह उसे पीठ में जकड़न सी  हुई,  दवा लगाकर हीटिंग पैड से सेंक किया. सो आज सुबह की साधना नहीं हुई, बाद में ध्यान किया कोई जैसे भीतर से पढ़ा रहा था. जगत से लिया हर सुख दुःख के साथ मिला हुआ होता है, जैसे कड़वी दवा पर मीठी परत होती है कुछ ऐसे ही. उन्हें आत्मानुभव बढ़ाते जाना है. जीवन में जो भी परिस्थिति आए उससे कुछ सीखकर आगे बढ़ जाना है यदि असजग रहे तो पत्थर की तरह वह पैरों में बंध जाती है और जितनी गति से वे पहले चल रहे थे उससे भी कम गति रह जाती है. दिन में दो बार और पीठ पर सेंक किया, दोपहर को हल्का भोजन सो अब सब ठीक है. कल उन्हें मतदान करने जाना है, हायर सेकेंडरी स्कूल में सेंटर है. आज सुबह सुना स्वामी अनुभवानंद जी कह रहे थे, परमात्मा से मांगने योग्य वस्तु क्या है ? उन्हें ऐसा दिल मिले जिसमें किसी भी प्राणी के लिए स्वप्न में भी कोई द्वेष या कटुता न हो, ऐसे दिल में ही परमात्मा बसते हैं. 

शाम के चार बजने वाले हैं. टीवी पर चुनाव समाचार आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा की खबरें आ रही हैं. आज सुबह वे वोट डालने गए. पिताजी से बात हुई, वे छोटी भाभी के साथ अठ्ठासी वर्ष की उम्र में भी पैदल चलकर मतदान करने गए.  उन्हें बहुत अच्छा लगी यह बात. आज बड़ी भाभी की चौथी पुण्यतिथि है, भाई ने बहुत सुंदर वीडियो उनकी स्मृति में बनाया है. उनकी बिटिया अगले हफ्ते आ रही है, अब वहीं रहकर जॉब करेगी. छोटे भाई से बात हुई, वह साधना में  अपने समय का सदुपयोग करता है. अब सिओल में पुरस्कार समारोह में मोदी जी का भाषण आ रहा है. इतने प्रभावशाली ढंग से वह भारत की बात कर रहे हैं. वह एक विश्व नेता हैं, सरे विश्व में उनकी बात सुनी जाती है. आज माली की पत्नी ने बताया उसकी बेटी को स्कूल में नृत्य में भाग लेना है, ड्रेस माला आदि खरीदने के लिए  पति ने पैसे नहीं दिये. उसे आवश्यक पैसे दिए और अपना अकाउंट खोलने को कहा, ताकि अपने लिए कुछ बचत कर सके.

पता नहीं वर्षों पूर्व उस दिन उस पन्ने पर क्यों लिखा होगा, 
‘समुन्दर ! तुम कितना बड़ा दर्द हो ! अपनी बाँहों, टांगों से सारा दर्द फेंकते किनारे को, लेकिन किनारा एक ही ठोकर से लौटा देता तुम्हारा दर्द तुम्हीं को !’ 
परीक्षाओं के कारण एक लाभ उसे अवश्य हुआ है कि पढ़ने के लिए एकांत मिल जाता है. न किसी के साथ किसी संबन्धी के घर जाना और न बाजार न फिल्म देखने. पर यह खुशफहमी जल्दी ही दूर हो गयी, भाभी की भाभी आयी और अगले ही दिन उनके साथ गयी ‘सत्ते पे सत्ता’ देखने, केवल उन्नीस दिन रह गए हैं परीक्षाओं को. कम से कम अब तो उसे पढ़ाई के प्रति गम्भीर हो जाना चाहिए. कुछ दिनों की पीड़ा जीवन भर के सुख का आधार बन जाएगी,  इसलिये सहो, जितना सम्भव हो सहो गणित के सवालों की तीखी धारों को अपने मस्तिष्क के तन्तुओं पर... उसे अब अचरज होता है क्या पढ़ाई पीड़ा लगती थी उसे. 


Wednesday, July 1, 2020

ट्रांसिडेंटल मैडिटेशन


जगत के प्रति राग-द्वेष जब कम हो जाता है तो उसकी स्मृति मन में नहीं आती. वह जैसे विलुप्त हो जाता है. ‘नई दृष्टि नई राह’ में अद्भुत ज्ञान सूत्र मिलते हैं. वे जितना-जितना समता में रहते हैं, आत्मा की शक्ति बढ़ती जाती है. शाम के पांच बजने वाले हैं. आज भजन का दिन है. सुबह गुरूजी को औरंगाबाद में कहते सुना, जीवन में गान, ध्यान और ज्ञान तीनों होने चाहिए. जून ने आज से मन्त्र जप शुरू किया है, ध्यान भी करेंगे और ज्ञान भी सुनेंगे. कुछ देर पूर्व वे लॉन में टहल रहे थे. ग्लैडियोली के फूल खिले हैं, डायन्थस, पॉपी आदि तो हैं. जरबेरा, गेंदा भी खूब खिल रहे हैं. सुबह सुबह को-ऑपरेटिव गयी, सभी ‘ज़ी न्यूज़’ पर मोदी का भाषण सुनने में तल्लीन थे. अभी टीवी पर सुना, मोदीजी कांग्रेस के खिलाफ बोल रहे हैं. चुनाव का वर्ष है, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगने व लगाने स्वाभाविक हैं. 

कल सुबह-सुबह जून को एयर पोर्ट जाना है. फ्लाइट दोपहर ढाई बजे है पर बंद( ताई अहोम द्वार) के कारण सुबह तीन बजे ही निकल जाना होगा. कल मोदी जी गोहाटी आ रहे हैं उनका विरोध करने के लिए ही इस बन्द का आयोजन किया गया है. जब कि वह एम्स की नींव रखेंगे, नुमालीगढ़ में बायो रिफाइनरी का शिलान्यास और ब्रह्मपुत्र पर एक सड़क पुल का भी. वह त्रिपुरा भी जा रहे हैं. वर्षों बाद भारत को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो देश के विकास के लिए दिन-रात एक कर रहा है. आज शाम को गुरूजी की किताब से कुछ वाक्य पढ़े तो सभी साधिकाओं के भीतर कोई न कोई विचार जाग उठा. वह ठीक कहते हैं , प्रेम जगत को गतिशील करता है. 

जून रात को दो बजे ही उठ गए, तीन बजे निकल गए. अभी भी एयरपोर्ट पर ही होंगे. प्रधानमंत्री कल पेट्रोटेक का उद्घाटन करेंगे, उस कार्यक्रम में भी शायद वह शामिल हो पाएं. इस समय चांगसारी में पीएम की रैली हो रही है. भीड़ बहुत ज्यादा है. उन्होंने कहा, कल गोहाटी से निकलने वाले अख़बारों में इसकी कोई खबर नहीं होगी, एक क्षण के लिए उनके स्वर में उदासी दिखी. पर अव वह असम के महापुरुषों को याद कर रहे हैं. उगते हुए सूरज की भूमि अरुणाचल में आज उनकी यात्रा हो रही है. हर राज्य की तरह यहाँ भी कई योजनाओं की घोषणा हुई. बीजेपी देश की संस्कृति को बढ़ावा देती है.. एक नए टीवी चैनल की भी शुरुआत हुई. ‘बच्चों की पढ़ाई, युवा को कमाई, वृद्धों को दवाई, किसान को सिंचाई, जन-जन की सुनवाई’ इस पंच धारा विकास को बढ़ावा देती है यह सरकार. कल सरस्वती पूजा है, नैनी ने आज सरस्वती माँ की तस्वीर को ढक कर रख दिया है. कल वह मृणाल ज्योति में पूजा के बाद दोपहर को खिचड़ी आदि का प्रसाद बनाकर घर पर भी पूजा करेगी. नन्हे से बात हुई, कल वे लोग नए घर जायेंगे.  

उस डायरी में पढ़ा, जाग्रत, स्वप्न और सुष्पति, तीन अवस्थाओं से ऊपर चौथी अवस्था में पहुँचना ध्यान है. मन को केंद्रित नहीं करना है न कोई प्रयत्न करना है, केवल मन्त्र को दोहराना है और शांत हो जाना है. उसे आश्चर्य हुआ,  कालेज में भी भावातीत ध्यान यानि ट्रांसिडेंटल मेडिटेशन की बात सुनी थी, पर तब इसका अर्थ जरा भी समझ नहीं आया होगा. अवश्य ही इसने अनजाने में नई दिशा और नई आशा प्रदान की होगी, इस पर चलने का समय अभी बहुत आगे था. 

उसे एक पत्र की प्रतीक्षा थी पर नहीं आया, सारी गड़बड़ डाक विभाग की है, है न ! वह सोचती है नम्रता बड़ी चीज है पर उसका स्वभाव ही ऐसा नहीं है. शायद अब पता नहीं क्यों मन पर एक किलो का बोझ लादा हुआ है, समाधान उपेक्षा से नहीं होगा, उतारना ही होगा, पर किस तरह यह स्पष्ट नहीं. (उस समय गुरु जो नहीं मिले थे) धर्मयुग में देश की वास्तविक आर्थिक स्थित पर लेख पढ़ा था दोपहर को, पढ़ती चली गयी. हे भगवान ! कितने कितने हथकंडे अपनाते हैं व्यापारी और सरकार का प्रोत्साहन ही उन्हें मिलता है. कंट्रोल का लाभ व्यापारियों को, नुकसान तो जनता को ही है. दिनमान भी पढ़नी है अभी. कालेज में एक सखी दिखी, एमजीआर उसने अनदेखा कर दिया, शायद जानबूझ कर, शायद वह समझती है उसके अनुत्तीर्ण हो जाने पर अब वह उसकी सखी नहीं है. एक अन्य सखी मिली बेहद खुश... नवविवाहिता का श्रृंगार नहीं पर स्वाभाविक प्रसन्नता जरूर दिखाई दी उसके चेहरे पर. अर अब यह की स्मृतियाँ मन में ही रहें, वहीं सुरक्षित हैं, कागज के पन्ने पर स्मृतियाँ नहीं रखी जा सकतीं.