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Sunday, July 13, 2025

नारंगी बादल


नूना का जन्मदिन था, सबसे पहले पापाजी का फ़ोन आया। वे लोग तैयार होकर प्रातः भ्रमण के लिए निकले ही थे कि बच्चे आ गये।सोनू ब्लूबेरी केक बनाकर लायी थी। नन्हे ने उसे एप्पल का डेस्क टॉप दिया, जिसका कीबोर्ड बहुत स्लीक है और स्क्रीन साढ़े तेइस इंच है।जून ने मैंगो शेक बनाया, ब्रोकोली राइस और बूँदी का रायता। दस बजे वे लोग चले गये। दोपहर व शाम को भी सभी भाई-बहनों व सखियों के फ़ोन आते रहे। फ़ेसबुक पर भी सौ से अधिक लोगों ने शुभकामना दी। नूना के प्रकृति प्रेम और साहित्य से लगाव का ही यह परिणाम है। इन लोगों में से कितनों से तो वह मिली भी नहीं, अधिकतर असम के हैं। आज सुबह आकाश पर नारंगी रंग के बादल थे, छत पर सूर्य नमस्कार करते हुए बाल सूर्य की किरणों को अंतर में भरना कितना सुखद है। टहलने जाने से पूर्व वह कुछ न कुछ लिखती है, बाद में वैसा एकांत नहीं मिलता न बाहरी न आंतरिक। भोर का समय जब पिछले दिन के सब उहापोह साफ़ हो चुके होते हैं, मन बिलकुल ख़ाली होता है, तब ही कुछ नया कहा जा सकता है, सोचा जा सकता है। जून आजकल अपने मोबाइल में ज़्यादा व्यस्त रहते हैं, उन्हें नये-नये व्यंजन बनाने का भी शौक़ है, आज ज्वार के आटे में सहजन के पत्ते डालकर रखे हैं। छोटी बहन का फ़ोन आया, उसकी छोटी बिटिया पालतू पूसी के जाने का दुख भुला नहीं पायी है, वह घर में अकेले नहीं रह पाती, किसी मॉल या रेस्तराँ में जाकर काम करती है या पढ़ती है। पापा जी ने व्हाट्सएप पर पढ़कर घर, मकान, होम, बंगला, हवेली, फ्लैट आदि की परिभाषाएँ बतायीं, सभी अच्छी थीं। घर या होम जहाँ हवन होता है, मकान में दीवारों के कान होते हैं, बंगला यानी पड़ोसी से दूरी, हवेली यानी हवादार, फ्लैट जो लोन लेकर ख़रीदा गया हो। 


आज नूना ने अपनी लिखी एक पुरानी कविता पढ़ी तो लगा उसकी काव्य क्षमता पहले से कम हो गई है।आज दीदी का जन्मदिन है, उन्हें कविता भेजी। नये कंप्यूटर पर लिखना आरंभ किया। छोटा भाई हफ़्तों हैदराबाद के एक होटल में रहकर आज घर पहुँच गया।सुबह टहलने गये तो रास्ते में रेत दिखी थी, गुलदाउदी की पौध लगाने के लिए अच्छी है, जब नूना ने जून से कहा तो वह कार ले आये। रेत लेने के बाद उन्होंने कहा, कुछ दूर तक होकर आते हैं। वैक्सीन की दूसरी डोज़ लगाने के बाद से नूना कहीं भी नहीं गई थी।सोसाइटी के मुख्य द्वार से थोड़ा ही आगे गये होगें तो सूर्योदय के दर्शन हुए, उसके साथ ही लाल फूलों से लदे  हुए गुलमोहर के पेड़ आकर्षित कर रहे थे।नाइस रोड तक जाकर वे वापस लौट आये।   


अभी कुछ देर पहले वे रात्रि भ्रमण से लौट कर आये हैं। आजकल सबसे पहले देखना होता है, कौन सी सड़क ख़ाली है, दायें, बायें या सामने वाली, कोरोना काल में लोगों से बचकर निकलना ही ठीक है। मास्क पहनने के बावजूद भी दूर से कोई दिख जाये तो सड़क बदल लेते हैं, ऐसा कई लोगों को करते भी देखा है। यह कैसा वक्त आया है कि आदमी, आदमी से डरने लगा है। आज अख़बार में एक चित्र देखा जिसमें सामूहिक अस्थि विसर्जन किया जा रहा है। लोग अपने मृत रिश्तेदारों की अस्थियाँ लेने आये ही नहीं तो सरकार को यह करना ही पड़ा। मन्त्रोच्चरण के साथ फूलों से उन्हे सजाकर यह रस्म की गई। 


नन्हे से बात हुई, इस बार वे लोग शनिवार को आयेंगे। सोनू ने बताया, उसे अपनी कंपनी में अब से ग्लोबल टीम में काम करना होगा।आज दोपहर तीन बजे से वर्षा शुरू हुई तो लगातार तीन घंटे होती रही। छह बजे वे टहलने गये, एक घर के सामने एंबुलेंस खड़ी देखी, शायद कोई मरीज़ घर लौटा हो या जाने वाला हो इलाज के लिए, उन्होंने रास्ता बदल लिया और कुछ पता नहीं किया। यदि सामान्य समय होता तो अवश्य ही वहाँ जाकर पूछ लेते। कर्नाटक में लॉक डाउन की अवधि और बढ़ा दी गई है। नन्हे ने लिखा, उसने सरेंडर का अभ्यास शुरू कर दिया है, ईश्वर उसे इस मार्ग पर आगे बढ़ने का साहस दे। नूना ने आज योग वशिष्ठ का कुछ अंश पढ़ा, उसमें चेतना का अद्भुत वर्णन है, पढ़ते-पढ़ते ही जैसे ध्यान लगने लगता है। 


विश्व पर्यावरण दिवस पर बच्चे आज गुड़हल के दो पौधे लाये, एक नारंगी व दूसरा गुलाबी रंग के फूलों का है। आज ही लॉन लगाने के लिए घास भी आ गई है। आज पड़ोसन ने निकट ही बनी एक नयी सोसाइटी बोटेनिका के बारे में बताया। वे देखने गये, हरियाली का एक सागर हो जैसे, साफ़-सुथरी सड़कें और फूलों के वृक्षों से सजी थी। उसी में से होकर एक सड़क निकट के एक गाँव में जाती है। वे दूर तक चलते गये, पहले कच्ची सड़क थी, फिर पक्की सड़क आ गई। शाम को पापा जी से बात हुई, उन्हें वृद्धावस्था में होने वाली परेशानियाँ हो रही हैं। वे बहुत नियम से रहते हैं पर तन-मन पर किसी का वश तो नहीं है। 


  


Tuesday, March 8, 2022

बदलियों के रंग

 

आज नौ बजे उन्होंने ग्यारह दीपक जलाए। आज के रामायण के अंक में राम का हनुमान से प्रथम मिलन दर्शाया गया है। रामायण और महाभारत देखने से दिन काफी भरा-भरा लगता है. मन में राम और कृष्ण का स्मरण बना रहता है. शाम को मास्क पाहन कर टहलने गयी तो शुरू में थोड़ी दिक़्क़त हुई पर बाद में अभ्यास हो गय। अभी आगे कई महीनों तक ऐसे ही चलेगी ज़िंदगी। कोरोना के ख़िलाफ़ इस युद्ध में हर भारतीय को अपना योगदान देना है। अमेरिका ने भारत से कोरोना के लिए दवा की मांग की है, जो भारत अवश्य ही भेज देगा. लगता है सरकार को लॉक डाउन की अवधि बढ़ानी पड़ेगी. आज जून ने भी एओएल को कुछ आर्थिक सहयोग दिया, वे लोग दिहाड़ी मज़दूरों को भोजन आदि बांट रहे हैं। 

 


इस समय यहाँ मूसलाधार वर्षा हो रही है, गर्जन-तर्जन के साथ, रह-रह कर बिजली चमकती है और बादलों की तेज गड़गड़ाहट सुनायी देती है। बंगलूरू में इस नए घर में यह उनकी पहली बारिश है, लगभग एक घंटा पहले आरंभ हुई। एक-एक करके सारी खिड़कियाँ बंद कीं। छत पर लकड़ी के झूले को बचाने के लिए जो शेड बनाया है, वह भी तेज बौछार से उसकी रक्षा  नहीं कर सका। दोपहर बाद ‘इंगलिश मीडियम’ देखी, सिनेमा हाल बंद हैं सो हॉट स्पॉट पर इसे रिलीज़ कर दिया गया है। शाम को पार्क में फूलों के सूखते हुए पौधों को देखा था, इंद्र देवता ने इतना पानी बरसा दिया कि धरती-पौधे सब तृप्त हो गये हैं। 


आज सुबह गैराज में एक कौए ने कबूतर पर हमला कर दिया। घर के अंदर से देखा तो उसे भगाया। कबूतर घायल था, कौए  ने उसके पंख नोच दिए थे। वह एक कोने में छिपने गया, उड़ नहीं पा रहा था, रास्ते में रक्त की बूँदें गिरती जा रही थीं, उसे पानी दिया पर पी नहीं सका। एक चौकीदार के द्वारा उसे डिस्पेंसरी भेजा। पता नहीं उसका क्या हुआ होगा. 


वर्षा के कारण बालकनी पर बनी शीशे की छत और सोलर पैनल अपने आप धुल गए हैं.  मौसम भी ठंडा हो गया है.आज शाम टहलने गए तो आकाश पर गुलाबी बादल थे, बिलकुल मसूर की दाल के रंग के बादल, जो नीले पृष्ठभूमि में बहुत आकर्षक लग रहे थे. रंगों का यह खेल प्रकृति के हर क्षेत्र में खेला जा रहा है. अनगिनत रंगों की तितलियाँ, मछलियां, पंछी, फूल और कीट, सर्प यहाँ तक कि जड़ पत्थरों को भी अनोखे रंगों से सजाया है प्रकृति ने, मानव इनकी ओर देखे तो सारा कष्ट भूल जाये पर उसके पास चाँद -तारों को निहारने का समय नहीं है, कुछ लोग बन्द कमरों में टीवी पर हिंसा और नफरत के खेल देखने में ही व्यस्त हैं. आज सुबह हरसिंगार के ढेर सारे फूल उठाये.  


रात्रि के नौ बजे हैं. हनुमान जी को जाम्बवान उनकी भूली हुई शक्तियों को याद दिला रहे हैं, बचपन में एक ऋषि ने उन्हें शाप दे दिया था, जिससे वे उन्हें भूल ही गए हैं. बाल्यावस्था में उन्हीं ने एक बार सूर्य का भक्षण किया था, यह भी उन्हें याद नहीं है. वे भी पूर्वकाल में कितनी ही बाधाओं को पार करके आएये हैं पर कोई नयी विपत्ति आने पर यह भूल जाते हैं. आज भी छिटपुट वर्षा हुई, शाम को आकाश सलेटी-काले बादलों से भरा था. हनुमान जी को अपना बल याद आ गया है और वे सागर पर जाने के लिए तैयार हो गए हैं. उन्हें राह में मैनाक पर्वत मिलता है, जिसे समुद्र देव ने कुछ देर विश्राम के लिए भेजा है. सागर भी राम के कुल का ऋणी है और मैनाक की रक्षा हनुमान के पिता ने  की थी. पहले लोग अपने प्रति की गयी भलाई को कितना याद रखते थे. 



Monday, October 15, 2018

लहर और बादल



आठ बजने को हैं. आज भी मौसम ठंडा ही रहा. बदली बनी रही. वे अभी-अभी बाहर टहल कर आये हैं. आकश पर सफेद बादलों के मध्य पूर्णिमा से एक दिन पूर्व का सुंदर चाँद चमक रहा था. कल यहाँ लक्ष्मी पूजा का उत्सव है, उत्तर भारत में दीपावली के दिन यह उत्सव होता है. यहाँ उस दिन काली की पूजा होती है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. बच्चों द्वारा रंगे कुछ सुंदर दीए खरीदे. कम्प्यूटर ठीक हो गया है, ब्लॉग पर नई पोस्ट प्रकाशित की. कल सुबह डिब्रूगढ़ डाक्टर के पास जाना है, जून के घुटने में दर्द है.
शनिवार व इतवार कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इस समय शाम के चार बजे हैं. जून एक दिन के लिए आज देहली गये हैं, देर शाम तक पहुंचेंगे, परसों लौटेंगे. परसों शाम उन्होंने यूरोप के सभी चित्र टीवी की बड़ी स्क्रीन पर दिखाए, भव्य इमारतें और सुंदर बगीचे. कल शाम को वह थोड़ा परेशान हो गये थे जब उसने कहा कि काजीरंगा जाने का समय वह केवल अपने लिए तय कर सकते हैं, अन्यों के लिए नहीं. बाद में उसे समझ में आ गया कि अपने-अपने संस्कारों के वशीभूत होकर वे क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं. उसके बाद उनके मध्य पुनः सकारात्मक ऊर्जा बहने लगी. ऊर्जा का आदान-प्रदान सहज होता रहे, यही तो साधना है. सुबह वे घर में ही कुछ देर टहले, डाक्टर ने उन्हें दो दिन आराम करने को कहा है, आज वह अपना घुटना आराम से मोड़ पा रहे थे. उनकी कम्पनी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कितना सहायक सिद्ध हुआ है, उसका मन कृतज्ञता से भर गया. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से ईमेल आया, टीचर्स की जानकारी थी. अब वे उनके लिए भली-प्रकार योजना बना सकते हैं. वे इस समय जहाँ खड़े हैं, वहाँ से उन्हें आगे लेकर जाना है. उसने क्लब की एक परिचित सदस्या को, जो असमिया लेखिका भी है, प्रेरणात्मक वक्तृता के लिए कहा है.
आज सुबह वह उठी तो आँखें खुलना ही नहीं चाहती थीं, कुछ देर के लिए ऐसे ही बैठ गयी, बाद में सुदर्शन क्रिया करते समय भी अनोखा अनुभव हुआ. शांति की अनुभूति इतनी स्पष्ट पहले कभी नहीं हुई थी. वह इस देह के भीतर प्रकाश रूप से रहने वाली एक ऊर्जा है जिसके पास तीन शक्तियाँ हैं, मन रूप से इच्छा शक्ति, बुद्धि रूप से ज्ञान शक्ति तथा संस्कार रूप से कर्म करने की शक्ति. यदि ज्ञान शुद्ध होगा, तो इच्छा भी शुद्ध जगेगी, और उसके अनुरूप कर्म भी पवित्र होंगे. उनके पूर्व के संस्कार जब जगते हैं और बुद्धि को ढक लेते हैं तब मन उनके अनुसार ही इच्छा करने लगता है. हर संस्कार भीतर एक संवेदना को जगाता है, उस संवेदना के आधार पर उनका मन विचार करता है. यदि संवेदना सुखद है तो वह उस वस्तु की मांग करने लगता है, यदि दुखद है तो द्वेष भाव जगाकर विपरीत विचार करता है. अपने संस्कारों के प्रति सजग होना होगा तथा नये संस्कार बनाते समय भी जागरूक होना होगा. वे स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं. वह ऊर्जा ही इस देह पुरी का शासन करने वाली देवी है, उसे स्वयं में संतुष्ट रहकर इस जगत में परमात्मा की दिव्य शक्ति को लुटाना है.
आज स्कूल जाने के लिए तैयार हुई पर ‘बंद’ के कारण नहीं जा सकी, बच्चे शायद उसकी प्रतीक्षा करते होंगे, सोचकर एक पल के लिए मन कैसा तो हो गया पर ज्ञान की एक पंक्ति पढ़ते ही स्मृति आ गयी और शांति का अनुभव हुआ. वे स्वयं को ही भूल जाते हैं और व्यर्थ के जंजाल में पड़ जाते हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है और वे उसे शब्दों में ढूँढ़ते हैं. करने को कितना कुछ है, दीपावली का उत्सव आने वाला है, एक सुंदर सी कविता लिखनी है.

सागर की गहराई में शांति है,
अचल स्थिरता है, हलचल नहीं..
लहरें जो निरंतर टकराती हैं तटों से,
उपजी हैं उसी शांति से..
भीतर उतरना होगा मन सागर के
आकाश की नीलिमा में भी बादल गरजते है,
टकराते हैं, उमड़ते-घुमड़ते आते हैं और खो जाते हैं !
आकाश बना रहता है अलिप्त.
पहचानना है लहर और बादल की तरह मन के द्वन्द्वों को
जो जीवन का पाठ पढ़ाते हैं.
लहर और बादल को मिटने का दर्द भी सहना होगा
अवसर में बदलना होगा चुनौतियों को
और पाना होगा लक्ष्य-शाश्वत सत्य !   

Monday, July 23, 2018

सादिया देहलवी की किताब



कल रात्रि व परसों भी अद्भुत अनुभव हुए. जैसे ही किसी वस्तु का विचार आया, वह वस्तु साकार हो उठी, दिखने लगी, रंग भी स्पष्ट थे. आज संगीत का सुंदर अनुभव हुआ. उनके भीतर कितने राज छिपे हैं. आज भी मूसलाधार वर्षा हो रही है. मौसम ठंडा हो गया है. शाम को एक जून के एक सहकर्मी आ रहे हैं, गोल-गप्पे खाने, अपनी नन्ही बिटिया के साथ. कल राम नवमी थी, शाम को ‘राम ध्यान’ करवाया. ध्यान ही सिखाता है कि उनका असली घर उनके होने में है. एक खास तरह से होने में, वे अपने वास्तविक स्वरूप को व्याप्त रहें उस तरह होने में ! उन्हें खुद पर भरोसा करना सीखना है और खुद से प्रेम करना भी. इसी तरह सभी के भीतर उस असीम सत्ता का अनुभव करना है, तब सभी आपस में जुड़े हैं.

अवकाश समाप्त हो गया है, किन्तु आज असम बंद के कारण स्कूल नहीं खुला. एक अध्यापिका पति की सेवा निवृत्ति के बाद यहाँ से जा रही है, उससे मिलने चली गयी. विद्यालय के पुस्तकालय के लिए उसने कुछ पुस्तकें दी हैं. वापसी में गेस्ट हॉउस के बगीचे में उगे सुंदर फूलों के चित्र उतारे, बंगाली सखी के घर भी गयी, वह हाल ही में विदेश घूम कर आई है. जून के एक सहकर्मी को खेलते समय कंधे में चोट लग गयी, एक महीने से प्लास्टर लगा था, अब पता चला आपरेशन करवाना पड़ेगा. छोटी सी भूल कभी-कभी कितने विकराल दुख का कारण बन जाती है.

आज भी दिन भर वर्षा होती रही. सुबह वे टहल कर आये ही थे कि बूँदें पड़नी शुरू हो गयीं, इसी तरह स्कूल में भी योगकक्षा के समय वर्षा रुकी रही, मैदान में बच्चे एकत्र हो सके. नैनी ने पूरे दस दिनों के बाद आज से काम पर आना शुरू कर दिया है. शाम को मालिन को उसका मेहनताना देने के लिए बुलवाने बाहर गयी तो देखा वह स्वयं ही आ गयी थी, विचार भी संदेशा पहुँचा देते हैं. पिछले कुछ दिनों से सूफिज्म पर ‘सादिया देहलवी’ की किताब पढ़नी शुरू की है, अच्छी लग रही है. आज एक महिला दर्जिन ने आकर एक प्रार्थना पत्र दिया, क्लब के एक प्रोजेक्ट में उसे सिलाई सिखाने का काम चाहिए, प्रेसिडेंट के आने पर उनके घर भिजवा देगी. नन्हे से उसने कहा, तो वह मान गया, कालेज के अनुभवों पर कुछ लिखेगा, पर उसे इसके लिए समय निकालना होगा.

आज भी वर्षा सुबह से थमी नहीं है, वे प्रातः भ्रमण के लिए भी नहीं जा पाए. प्राणायाम के बारे में सुना, नाश्ते के बाद छाता लेकर ट्रैक पर टहलने गयी. दोपहर को ओशो से ‘ताओ’ के बारे में सुना. क्लब की एक सदस्या से प्रतियोगिता के लिए हिंदी कविता लिखने के लिए कहा, तथा काव्य पाठ प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए भी. इस समय संध्या के पांच बजे हैं, वर्षा तेज हो गयी है, जून अभी तक नहीं आये हैं. उसका मन एक अजीब सी मस्ती में डूबा हुआ है, वर्षा पर दो कवितायें भी लिखीं, कल पोस्ट करेगी. बूंदों के रूप में परमात्मा की कृपा ही मानो बरस रही है ! प्रकृति रहस्यमयी है, न धरती कुछ करती हुई प्रतीत होती है न ही अम्बर और दोनों के मध्य जल की धाराएँ प्रवाहित होने लगती हैं. जल जो सागरों से उठा होगा चुपचाप जाने किन हवाओं ने उसे यहाँ तक पहुँचाया होगा और किन नदी-नालों से होता हुआ एक दिन पहुँच जायेगा सागरों तक पर मध्य में कितनों की तृषा शांत करेगा, कितनों की क्षुधा भी, धरती को उर्वरा बनाकर और पोखरों को जल से भरकर, जाने कैसा अनुबंध है धरती और अम्बर में, परमात्मा भी जनता है या...वही कर रहा है यह सब !

Wednesday, December 20, 2017

मन के बादल


सुबह के नौ बजे हैं, वह स्कूल जाने के लिए गाड़ी का इंतजार कर रही है. वर्षा का मौसम आज भी बना हुआ है. पूरे देश में गर्मी बढ़ती जा रही है. क्लब की सेक्रेटरी यहाँ से जा रही हैं, एक दिन माली को भेजने को कहा था. सुबह-सुबह माली चला गया तो उन्होंने कहा, नाश्ता कर रहे हैं, बाद में आना. सही है कोई सुबह बिना बताये माली को भेज दे तो यही जवाब मिलेगा. उसने सोचा वह स्वयं जाकर मिलेगी. जून का फोन भी सुबह आया.

आज का दिन भी बीतने को है. सुबह दस बजे के बाद ही स्कूल में कार्यक्रम आरम्भ हुआ, जो वक्तृता तैयार करके ले गयी थी उसमें से कुछ ही बोला. शेष योग के महत्व के बारे में उस क्षण स्वतः स्फूर्त ही कहा गया. कुल मिलाकर कार्यक्रम अच्छा रहा. एक बजे घर लौटी.  जून आज दोपहर बाद आ गये हैं, इस समय एक उच्च अधिकारी के विदाई समारोह में शामिल होने क्लब गये हैं. उनकी पत्नी के लिए उसने भी एक कविता लिखी है, जो लेडीज क्लब के कार्यक्रम में सुनाएगी. आज उसका जन्मदिन है, शाम को छोटी सी पार्टी की. उसके पहले बच्चों को बुलाकर जलपान कराया. बच्चों ने कुछ गाकर, कुछ अभिनय करके भी दिखाया. परिवार के लगभग सभी सदस्यों से फोन पर बात हुई. छोटी बहन ने कहा, वे लोग अगस्त में असम आयेंगे. दो दिन बाद दीदी का जन्मदिन है, उनके लिए कुछ लिखेगी.

आज भी दिन भर बादलों वाला मौसम बना रहा. ऐसे ही विचारों के बादलों में आत्मा का सूर्य छिपा रहता है. आत्मा को पाए बिना कहाँ मुक्ति है, विचारों का अँधेरा जो भीतर है, उसमें आत्मा ही नहीं छिपती, अज्ञान भी छिपा रहता है. उस अंधकार को मिटाए बिना स्वयं को जाना नहीं जा सकता. भीतर गये बिना करुणा और प्रेम का जन्म नहीं होता, मोह के झूठे सिक्के को ही वे प्रेम के नाम पर चलाये जाते हैं.


साल का पाँचवा महीना शुरू हो गया. नया माह और नया सप्ताह एक साथ ही आरम्भ हुए हैं. एक जंगली मुर्गी का बच्चा शोर मचाता हुआ लॉन में घूम रहा है, शायद अपनी माँ को खोज रहा है. कितनी आतुरता है उसकी ध्वनि में. दोपहर के साढ़े तीन बजे हैं. वर्षा थमी है. झूले पर बैठे हुए ठंडी हवा के झोंके सहला रहे हैं. जून को आज फिर से कंधे से नीचे तक दर्द हुआ, प्रारब्ध का खेल ही कहा जायेगा. बहुत सी बातें उनके वश में नहीं होतीं, लेकिन स्वयं को देह और मन से अलिप्त रखने का प्रयास तो वे कर ही सकते हैं. प्रसन्न रहने के लिए यही जरूरी है. आज दोपहर महीनों बाद असमिया सखी का फोन आया, उसकी बेटी को दसवीं में पचानवे प्रतिशत अंक मिले हैं. आज पूर्णिमा है, लेकिन बादलों के कारण चंद्रमा के दर्शन शायद ही हों, फिर भी वे मून लाइट मेडिटेशन तो करेंगे ही. कल की मीटिंग अच्छी रही, उच्च अधिकारी की पत्नी बहुत भावुक हो उठी थीं. उसने कविता पढ़ी. प्रेम का बंधन बहुत रुलाता है !    

Thursday, May 11, 2017

चेरी टमाटर


आज भी बादल बने हैं आकाश पर, ठंडी हवा बह रही है. पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. बुढ़ापा एक रोग है, उस पर कई रोग शरीर को लग जाते हैं. बुढ़ापा आने पर मृत्यु का भय भी सताता है और भी न जाने क्या-क्या घटता है मानव के मन के भीतर, पर जो अपने आप को जान लेता है, वह बच जाता है, जगत में कितने ही लोग ऐसे हुए हैं, जो जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझ कर मुक्त हो गये हैं.

पिछले तीन दिन व्यस्तता के कारण कुछ नहीं लिखा. दो दिन क्लब की कुछ सदस्याओं से मिलने गयी, उनकी विदाई के लिए कविता लिखने के लिए कुछ बातें जाननीं थीं. एक दिन होली थी, आज भी गगन पर बदली है. पिताजी अपेक्षाकृत बेहतर हैं. वृद्धा आंटी अभी तक अस्पताल में हैं. कल रात को एक अनोखा स्वप्न देखा. उसने एक छोटी कन्या का हाथ पकड़ा है, पर देखते-देखते वह घुटनों के बल चलती हुई दूर निकल जाती है पर उसका हाथ, हाथ में ही रह जाता है, घबरा कर उसे देखती है तो पता चलता है वह अधजला है, उसे छोड़ देती है और अगले ही पल शरीर से बाहर होने का अनुभव घटता है, देह से कुछ शोर करता हुआ बाहर निकलता है, घूमकर लौट आता है, पूरे वक्त होश बना हुआ था. कल की तरह पहले भी एक बार देह से बाहर का स्वप्न देखा था. परसों एक सुंदर रंगीन तितली को देखा था जिसे वह पकड़ना चाहती है. उसके रंग इतने चमकदार थे कि..कैसे अनोखे से स्वप्न..कुछ कहने कुछ बताने आते हैं पर रहस्य ज्यों का त्यों बना ही रहता है. आज क्लब में मीटिंग है, तीन महिलाओं के लिए तीन कविताएँ भी पढ़नी हैं. सभी तो यहाँ एक डोर से बंधे हैं..परमात्मा की डोर से..

अप्रैल का प्रथम दिन ! पिछले दो दिन फिर व्यस्त रही. शनिवार को घर में सफाई में, कल रात की पार्टी की तयारी में. अच्छा रहा कल रात्रि का आयोजन, सभी लोग आये थे, विवाहित और अविवाहित, तीन नन्हे बच्चे भी थे. अभी कुछ देर पहले मृणाल ज्योति स्कूल से आयी, उन्हें होली की मिठाई दी, रंग लगाया और योग-व्यायाम कराया. यकीनन उन्हें अच्छा लगा होगा, बगीचे के चेरी टमाटर भी ले गयी थी और एक लौकी भी. जून बाजार होकर आने वाले हैं, नैनी के बेटी के लिए एक स्कूल बैग, पानी की बोतल तथा एक कापी लेकर, आज ही उसका दाखिला थोड़ी दूर स्थित एक घर में चलने वाले स्कूल में कराया है.


पिताजी बाहर कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रहे थे. उसने जब कहा, थोड़ी देर लेट जाएँ तो कहने लगे, हाँ, परेशान हो रहे हैं वे. क्या कोई ऐसा भी समय आता है जब दुःख से बचने की भी जरूरत महसूस नहीं होती. कोई अपने दुखों से बच सकता है फिर भी नहीं बचता, कैसे विडम्बना है यह. मौसम आज भी बदली भरा है, ठंडा है, सुबह ढेर सा पानी पिया. होली के बाद से ही भोजन गरिष्ठ हो रहा था, मिठाई भी जिसमें शामिल थी, पानी तन की एक औषधि है, जैसे वायु एक औषधि है मन की, शायद अग्नि औषधि है आत्मा की ! इसी महीने एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखनी है एक ! 

Monday, April 24, 2017

सूरज का लाल गोला

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नये वर्ष का चौथा दिन ! कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस वक्त भी बादल बने हैं. जून आज मुम्बई गये हैं, कल कोचीन जायेंगे. वे यात्रा के नाम से बहुत प्रसन्न होते हैं, उन्हें नये-नये स्थान देखना भी भाता है और यात्रा की परेशानियाँ जरा भी परेशान नहीं करतीं. महर्षि अरविन्द पर लिखी एक पुस्तक बंगलूरू की उस दुकान से खरीदी थी, जहाँ किताबें ही किताबें पड़ी थीं, सीढियों पर भी किताबें. महान योगी थे वे. संस्कार में आजकल सद्गुरु का पतंजलि योगसूत्र पर बोला भाष्य प्रसारित हो रहा है. बहुत सी बातें स्पष्ट हो रही हैं. कितना कुछ जानने को है अभी, अनंत है वह परमात्मा..वे तो कुछ भी नहीं जानते..कई बार ऐसा लगता है जैसे पहले वह जो जानती थी अब उतना भी नहीं जानती. जीवन एक रहस्य है जो जाना नहीं जा सकता, जीया जा सकता है. शाम गहराती जा रही है, पांच भी नहीं बजे हैं अभी दस मिनट शेष हैं.

ठंड आज कुछ ज्यादा है, स्वेटर के भीतर त्वचा और त्वचा के भीतर हाड़ों को छूती हुई. सुबह आसमान पर बादल थे या कोहरा, सब श्वेत था मध्य में लालपन लिए नारंगी सूरज का गोला आकाश में ऊपर तो चढ़ आया था पर अभी तक बालसूर्य सा लग रहा था. उसे देखकर मन कैसा उल्लसित हो उठा, जैसे परमात्मा के माथे पर लगा टीका हो या..एक और उपमा उस वक्त ध्यान में आई थी पर अब मन से पुंछ गयी है. कई बार ऐसी सुंदर पंक्तियाँ मन में कौंध जाती हैं पर तब लिखने का साधन नहीं होता. एक सखी का फोन आया था, भावुक है, कलाकार है, पर बोलती कुछ ज्यादा है. कल क्लब के वार्षिक उत्सव की कला प्रदर्शनी में उसकी कृति भी लगायी जाएगी, उसे आमंत्रित किया है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की, बार-बार फोन कट जाता था, पर वह कोशिश करते रहे जब तक बात पूरी नहीं हो गयी, जबकि वह एक बार कट जाने के बाद दुबारा प्रयास नहीं करती, उनसे सीख लेनी चाहिए. कल एक परिचिता आयीं थीं, सेंट जेवियर्स स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी कुछ असमिया कविताओं का हिंदी अनुवाद उसे देखने के लिए देकर गयी हैं. भविष्य में हिन्दी में यह किताब छपेगी, जिसमें भूपेन हजारिका, मामोनी और अब्दुल कलाम के लिए लिखी कविताएँ हैं.


आज धूप चमचमाती हुई निकली है. कल बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी की मंगनी तय हो गयी है, लड़का बंगाली है. उसने सोचा उसकी बंगाली सखी को सुनकर अच्छा लगेगा. आज सुबह टहलने गयी तो आई पौड पर मृत्यु पर प्रवचन सुना, कितनी अद्भुत व्याख्या करते हैं सद्गुरु ! टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. परमात्मा का बखान करते-करते थकते ही नहीं, गाए ही चले जाते हैं. इलाहबाद में कुम्भ का मेला लगने वाला है, करोड़ों लोग आएंगे उस परमात्मा का गुणगान करने ही तो. परमात्मा घट-घट वासी है पर वह नित नूतन है, बासी नहीं है. कल रात छोटे भाई को सुंदर प्रवचन देते सुना, अद्भुत स्वप्न था वह. रात को ध्यान करते-करते सोयी थी. अभी उससे बात हुई, कल रात उसे भी स्वप्न आया कि वह किसी को समझा रहा है बहुत विस्तार से, आश्चर्य है और नहीं भी, परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं ! भाई ने कहा वह इस बारे में ज्यादा बात करेगा तो उसकी आँखों से अश्रुपात होने लगेगा, उसने कहा, उसका यह तबादला भी कृपा से हुआ है, वह अपने सद्गुरु से जुड़ा है और वह उसे दिशा दिखाते हैं. सचमुच उसका समर्पण कहीं ज्यादा है.

Tuesday, November 15, 2016

सूरज और बादल


अप्रैल का अंतिम दिन ! देखते-देखते नये वर्ष के चार माह गुजर गये और गुजर गया उनके जीवन का का भी एक और हिस्सा. एक दिन सारी सांसें गुजर जाएँगी और वे आकाश में स्थित होकर देखेंगे अपने ही तन को निस्पंद ! उससे पहले ही यदि संसार को कुछ देना है तो दे देना चाहिए कुछ और गीत कुछ और कविताएँ ! ! मार्च माह की कविताओं में भी उसकी कविता सातवें पायदान पर आयी हुई, ‘पिता’ नामकी कविता अभी अगले तीन हफ्ते तक कहीं प्रकाशित नहीं करनी है. आज जून ऑफिस में ही लंच लेने वाले हैं. मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है. उन्होंने काफी कलात्मक भाषा में विदाई भाषण लिखा है. नन्हा पिछली बार एक किताब लाया था जिसमें साईं बाबा के किसी भक्त ने उनके साथ घटे अपने अनुभवों को लिखा है, आज कुछ देर पढ़ी.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, गले में दर्द था परसों शाम से ही. आज काफी ठीक है, लेकिन नाक बंद है. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हुई है तभी जुकाम हुआ या फिर यह किसी कर्म का परिणाम है. यदि भीतर प्रश्न जिन्दा रहते हैं तो समय-समय पर नये विचार आते हैं. यदि समझा-बुझा कर मन को शांत कर दिया और भीतर तक पहुंचे नहीं तो मार्ग अवरुद्ध हो गया, उदासीन होकर बैठ जाने से रास्ता मिलता नहीं.

कल चार तारीख थी, बच्चों को पढ़ाते समय उसने तीन लिखी, उन्होंने भी नहीं बताया, जबकि वे स्कूल भी गये थे. सोये-सोये ही वे सारी उम्र गुजार देते हैं, आखिर कब होगा जागरण ? आज मौसम गर्म है. मई में यही स्वाभाविक ही है. गले में चुभन है सो चावल खाने का मन नहीं है. योग वशिष्ठ में पढ़ा कि जब भोजन पचता नहीं तब व्याधि होती है. तनाव होने से भोजन नहीं पचता. महीनों से भोजन के समय वातावरण बोझिल हो जाता है, माँ कुछ खाना नहीं चाहतीं तो कभी पिताजी झुंझला जाते हैं कभी जून. आत्मा है ऐसा भान हर समय बना नहीं रहता, रहे तो भी मन, बुद्धि, शरीर सब अपनी जगह हैं जो प्रकृति के अनुसार चलेंगे. आज उसे लग रहा है अवश्य ही साधना में कोई गहरी भूल हो रही है अभी तक परमात्मा की कृपा को पूर्ण रूप से अनुभव नहीं कर पायी है. अब भी लगता है कुछ नहीं जानती !

उस साधक की लिखी किताब पढ़कर काफी कुछ स्पष्ट होता जा रहा है, कितने सोये रहते हैं वे, आसक्ति, राग व द्वेष के शिकार होते हैं और सोचते हैं कि सब जानते हैं. अपने अज्ञान का ज्ञान होना ही वास्तव में ज्ञान की पहली सीढ़ी है. मन कैसा धुला-धुला सा लग रहा है, पर अभी भी कितनी परतें छुपी होंगी, दबी होंगी. सद्गुरू दूर रहकर भी शिष्य को सन्मार्ग पर लाने का कार्य करते रहते हैं. सद्गुरू का प्रेम अनंत है, वे उन्हें क्या प्रेम करेंगे, उनके पास एक बूंद भी नहीं जो है भी तो उसमें न जाने कितनी वासनाएं घुली-मिली हैं. परमात्मा को जो अर्पित होगा वह पावन होगा, पर परमात्मा कृपालु है, वह कोई भेद करना जनता ही नहीं, जो उसे पुकारे उसी पर कृपा लुटाता है !

तन स्वस्थ हो तो मन भी स्वस्थ रहता है. आज एक गर्मी भरा दिन है, बाहर धूप बहुत तेज है. चमचमाता हुआ सूर्य जैसे गुस्सा गया है, बादलों को चिढ़ा रहा है कि अब देखें वे उसे ढक के...उधर बादल भी जब मौका देखेंगे बदला लेगें ही. पिताजी बाहर बैठे हैं, अख़बार पढ़ चुके हैं, चुपचाप बैठे हैं, भीतर कमरे में अपनी कुर्सी पर माँ बैठी हैं जैसे उनकी दुनिया से बाकी दुनिया जुदा है, वैसे ही बाकी दुनिया से उनके बच्चों की दुनिया जुदा है. कल नन्हे को साईं बाबा की बात कही तो वह उन्हें जादूगर कह रहा था. भगवान से बड़ा कोई जादूगर है क्या ? परमात्मा की ओर जो ले जाये वह जादूगर कृष्ण भी तो था.. 


Tuesday, November 8, 2016

बीहू नृत्य


कल शाम को इतने वर्षों में उनके यहाँ ‘बीहू नृत्य’ का आयोजन हुआ. ‘मृणाल ज्योति’ के ग्रुप ने मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किया. कुछ देर के लिए उसने भी भाग लिया. जून ने पूरे मन से इसमें सहयोग दिया. पिताजी ने भी बहुत सहायता की. उनका कर्मठ स्वभाव देखकर बहुत आश्चर्य होता है. इस उम्र में भी उनमें युवाओं से बढ़कर उत्साह व ऊर्जा है. सुबह टहलने जाते हैं तो फूल उठा लाते हैं, बगीचे से आंवले ले आते हैं. जून ने कल भोजन परोसने का कार्य किया. मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल तथा उनके पति दोनों बहुत खुश लग रहे थे. नूना और जून को भी बहुत अच्छा लगा. उसका नया फोन एकाएक चलते-चलते बंद हो गया है. नन्हे का नंबर उसे याद नहीं है, लैंड लाइन से बात कर ले. वह वापस चला गया है. अब जून के आने पर ही बात होगी. आज कई दिनों के बाद व्यायाम करने बैठी तो देह साथ नहीं दे रही थी, एकाध दिन में ठीक हो जाएगी. आज हनुमान जयंती है, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा. कल से वैसाख का आरम्भ है. दस बजे हैं, बाहर धूप तेज है पर भीतर कितनी ठंडक है, ऐसे ही उनका मन बाहर कितना अशांत है पर भीतर कितन ठहरा हुआ है. वहाँ तक जाने का मार्ग जिसने खोज लिया वही चैन पा सकता है. पिछले दिनों कितना कुछ घटा, लेकिन भीतर कहीं यह विश्वास था कि सब ठीक है. नन्हा सूफिज्म पर पुस्तक ले गया है. इसका अर्थ है कि परमात्मा के प्रति उसके अंतर में आकर्षण तो जग ही चुका है, वह ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकता. उसका संग यदि सुधर जाये तो यह काम और जल्दी हो सकता है, लेकिन हर कार्य अपने समय पर ही होता है. आज चर्चामंच पर उसकी कविता पोस्ट हुई है, वह भी ‘उसी’ की याद दिलाती है. कई ब्लॉग पढ़े, एकाध अच्छे भी लगे, शब्दों का जाल ही हैं ज्यादातर तो, जो मौन को उपजा दें वही शब्द सार्थक हैं. गुरूजी को भी सुना, उन्होंने कहा धर्म व राजनीति दोनों में आध्यात्मिकता को बढ़ावा दिया जाए, सभी धर्मों के लोग एक दूसरे से परिचित हों. अभी कुछ देर में बच्चे पढ़ने के लिए आने वाले हैं. माँ जो अपनी कुर्सी से उठती नहीं हैं, भय के कारण पीछे के आंगन का दरवाजा बंद आयी हैं.  

दस बजे हैं सुबह के, रात से ही वर्षा की झड़ी लगी है. दिन में अंधकार छा गया है. सुबह बड़े भाई-भाभी से बात की, भतीजी ने डांस क्लास ज्वाइन की है, साथ ही नारायण कोचिंग भी. आजकल बच्चे सभी कुछ एक साथ करना चाहते हैं. उसने ब्लॉग पर बीहू की तस्वीरें डाली हैं. दीदी ने प्रतिक्रिया भेजी है, और वीडियो की फरमाइश की है. कल शाम को जून की बात नहीं मानी तो उदास हो गये. मानव अपने ही मन द्वारा छला जाता है..इस क्षण में उसके भीतर एक प्रतीक्षा है, भीतर बहुत कुछ है जो प्रकट होना चाहता है.

आज भी वही कल का सा समय है, पर अब बादल छंटने लगे हैं. आज वर्षा पर लिखी एक नई कविता ब्लॉग पर पोस्ट करनी है, यहाँ तो पावस का आरम्भ हो ही चुका है. कुछ देर पहले माँ पूछती हुई आयीं, खाना नहीं बनायी हो, आजकल वह ज्यादा बात नहीं करती हैं, पर आज उन्हें बात करते देखकर अच्छा लगा. जब उसने पूछा, आप खायेंगी, तो पहले कुछ नहीं बोलीं फिर अपना ही प्रश्न दोहराने लगीं, उसने अब थोड़ा ऊंची आवाज में जवाब दिया, पर अगले ही पल लगा पिताजी को अच्छा नहीं लगा होगा. फिर वही वाणी का दोष..या अधैर्य का संस्कार. आज सुबह का स्वप्न भी जगाने के लिए था, किसी बच्ची के जन्मदिन पर जून एक बहुत ही सामान्य सा स्कूल बैग लाये हैं. उसके सामने ही वह खोलती है और कहती है, इतना खराब गिफ्ट है, वह शरम के मारे कुछ बोल नहीं रही है फिर हाथ बढ़ाती है और नींद टूट जाती है. वर्षा हो रही थी सो टहलने नहीं गये वे, प्राणायाम किया, एक आचार्य को सुना, सत्यार्थ प्रकाश के बारे में वे बता रहे थे.        


Friday, July 29, 2016

सहज समाधि


शाम के सात बजे हैं, आजकल बादल जब देखो तब बरसने लगते हैं. इस समय भी सुबह से शायद दसवीं बार मूसलाधार वर्षा हो रही है. जून क्लब गये हैं, वहाँ stress managment पर कोई योग का कार्यक्रम है. उसकी बाईं आँख के निचले कोने पर हल्का सा दर्द हो रहा है, शायद कोई छोटा सा दाना निकला है. माँ बहुत कहने पर अब लेट गयी हैं, पहले दिन भर उन्हें लेटना पसंद था, अब घंटों बैठी रहती हैं. उनका व्यक्त्तित्व बिलकुल बदल गया है, लेकिन कई बातें पहले की तरह हैं पर हैं वे सारी की सारी नकारात्मक. अभी कुछ देर पूर्व सुना मुरारी बापू कह रहे थे, अहंकार, स्वार्थ और कपट गुरु कृपा से दूर रखते हैं. नूना कभी-कभी तेज स्वर में बोलने लगती है, यह अहंकार का ही रूप है. स्वार्थ थोड़ा भी नहीं है, ऐसा तो नहीं कह सकते, निज की मुक्ति की कामना तो है ही, कपट भी अक्सर झलक जाता है, अब चाहे भले के लिए ही बातों को वे जैसी हैं वैसी प्रकट न करके उन्हें मधुर करके सहज करके प्रस्तुत करती है, लेकिन उस छिपाव में किसी का अहित करने का भाव नहीं है और सबसे बड़ी बात कृपा का अनुभव हर क्षण होता है.

पिताजी लौट आए हैं. आज सुबह आकर उन्होंने स्टोर के खाली डिब्बों को भर दिया है. वे लाये हैं- आंवले का मुरब्बा, पेठे की केसरिया मिठाई, मावे का लड्डू, मूँगफली, चने, मिस्सा आटा, किशमिश, काजू, बादाम, हरे चने, ककड़ी, खजूर, बिस्किट, राजधानी ट्रेन में मिला सामान और भी एक वस्तु- अंजीर ! वह आठ दिनों के लिए बेटी के घर गये और उनका कितना काम करके आये हैं. सामने और पीछे के स्थान की सफाई, दोनों कूलर साफ करके इस्तेमाल के योग्य करवाए. ट्यूब लाइट साफ करवाई, घड़ा लाकर दिया और भी न जाने क्या-क्या. घर में एक जिम्मेदार बुजुर्ग के रहने से घर ठीकठाक चलता है, जहाँ पति-पत्नी दोनों काम पर जाने वाले हों वहाँ घर के कुछ काम छूट ही जाते हैं. कम्प्यूटर पर बैठकर कुछ लिखा नहीं आज. नेट पर नन्हे का साईट देखा, फेसबुक पर बड़े भांजे ने उसके जवाब दिया है उसके प्रश्न का. सारी सुबह पिताजी के लाये सामानों को व्यवस्थित करने में निकल गयी. दोपहर माली से बगीचे में काम करवाने में. अभी कुछ ही देर में जून आने वाले होंगे शाम का कार्यक्रम आरम्भ हो जायेगा, इसी तरह एक और दिन बीत जायेगा, इस जीवन का एक और दिन कम हो जायेगा. हजारों लोग इस समय यही बात सोच रहे होंगे, हजारों हँस रहे होंगे और न जाने कितने आत्मबोध को पा रहे होंगे..एक तरह से देखे तो सभी कुछ व्यर्थ है और दूसरी तरह से देखे तो सभी कुछ सार्थक है. यहाँ होना ही काफी नहीं है क्या ? हर कोई स्वयं को कुछ साबित करना चाहता है, हर कोई अपना विज्ञापन की रहा है, लेकिन अंततः तो वह तड़प आत्मा ही की है या कहें परमात्मा की..चेतना की..जो न जाने कितने-कितने रूपों में प्रकट होना चाह रही है, न जाने कितने चेहरे लगाकर एक ही सत्ता.
.सद्गुरु कहते हैं, साधक उनका काम करें और वे तो उनका काम कर ही रहे हैं. आज उसे एक सुनहरा मौका मिला है सद्गुरु का काम करने का. सुबह ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की एडवांस कोर्स टीचर से मिलने गयी, जो इटानगर से आयी हैं. दो दिन पहले ही गुरूजी ने उन्हें कहा कि यहाँ एडवांस कोर्स कराना है. उनकी कृपा यहाँ के लोगों पर कुछ विशेष ही बरस रही है. उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं या सही होगा कि सद्गुरु चाहते हैं कि उनके ‘सत्संग कक्ष’ में सहज समाधि कोर्स रखा जाये. उसने तत्क्षण ‘हाँ’ कह दी और अब कुछ लोग चाहियें जो कोर्स करें, उसने कई लोगों को फोन किये लगता है कुछ तो अवश्य ही राजी हो जायेंगे ! सद्गुरु की कृपा से अवश्य ही ‘सहज समाधि’ उनके घर में सम्पन्न होगा. कुछ वर्ष पूर्व वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी पर आज वह सम्भव है तो इसके पीछे परमात्मा की शक्ति ही काम कर रही है. उसकी कृपा कहें, प्रेम कहें या आनंद कहें, वह सब एक के ही नाम हैं. उनका सद्गुरु दुनिया में कहीं भी हो वह हर क्षण उनके साथ रहता है, रहा करता है, वह अनोखा है, अन्तर्यामी है और उस अनन्त गुणों को धारण करने वाले की नजर उन पर है, उसका हाथ उनके सिर पर है, उसकी दृष्टि उन पर पड़ी है, वह जीता-जगता परमेश्वर उन्हें अपनी झलक दिखाने खुद चलकर आया, प्यासा कुएं के पास जाता है पर यहाँ तो खुद कुआँ ही सामने खड़ा है, गंगा उनके द्वार आई है, सद्गुरु रूपी हीरा उन्हें सहज ही मिल गया है.

Wednesday, July 27, 2016

वृद्धावस्था के भय


कल शाम जो कविता लिखकर भेजी थी उसका जवाब आया है. उसके मन में जो यह उत्सुकता बनी रहती है यह भी तो अहंकार को पोषण करने का मार्ग है. कविता अच्छी लगी यह सुनकर भीतर जो तोष होता है वह क्या सात्विक है, यदि हो भी तो उसे उसके ऊपर उठना है. कविता लिखना ही उसका आनन्द है, उसके बाद उससे कुछ पाना प्रभु से दूर जाना है. जो आनंद परमात्मा से आया है और जो आत्मा का है वही साधक का हेतु है. मन को तृप्त करने का हर साधन अहंकार को बढ़ाता ही है. आज भी वर्षा की झड़ी लगी है, कल नन्हे ने बताया कि उसके ऑफिस बॉय की नाभि का आपरेशन हुआ. वे लोग उसे अपने घर पर रखने को भी तैयार थे. कितने भले हैं ये आज की नई पीढ़ी के बच्चे, वे सहज रूप से दयालु हैं. कोई विशेष आयोजन करके दूसरों का भला करने नहीं जाते. परिवार के बंधन से मुक्त होकर वे सारे समाज को अपना परिवार बना पाने में समर्थ हैं. भारत का हो या विश्व का भविष्य सुरक्षित है. लड़के-लड़कियाँ काम में जुटे हैं. उसकी पीढ़ी की महिलाएँ कितनी ऊर्जा व्यर्थ गंवाती हैं. दो बजने को हैं, अब दिन का तीसरा पहर शुरू होता है !  

दोपहर के ढाई बजे हैं. बादल बरस-बरस कर थक चुके हैं सो अब आराम कर रहे हैं अथवा तो जितना जल लाये थे, सब लुटा चुके हैं. अब थोड़ी देर में उनके साथी आते होंगे फिर से आकाश धरा का मिलन होगा.  कितनी ठंड हो गयी है. मार्च महीने का आज अंतिम दिन है, जून आज फील्ड गये थे, अभी कुछ देर पहले ही आये हैं. माँ सो रही हैं, सुबह पांच बजे उठी थीं, उसके बाद सीधे साढ़े बारह बजे ही लेटीं. उन्हें डर लगता है शायद आजकल जब-तब लेटने से, कहीं सब उन्हें छोड़कर  चले जाएँ. बुढ़ापा एक रोग है, कैसी-कैसी वृद्धावस्थाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं. उसकी भी उम्र बढ़ रही है, पर खुशवंतसिंह हैं जो चौरानवे वर्ष के होकर सक्रिय हैं, राजनेता भी काम करते हैं उम्र के अंतिम पड़ाव पर. आज सुबह फुर्सत थी सो फोन पर कई लोगों से बात की. दोनों पिताजी, फुफेरी बहन, चचेरा भाई, चाची जी, बड़ी बुआ के नाती और नतिनी, बड़े भाई, दीदी, मंझली भाभी..कुल दस लोगों से बात की. ओशो को सुना कुछ देर, बुद्ध वायवीय नहीं थे. उनके पैर धरा पर टिके थे पर मस्तिष्क आकाश को छूता था. उन्हें जड़ को नकारना नहीं है पर स्वयं को चेतन जानना जरूर है. वे चेतन हैं जो जड़ को चला रहे हैं, न कि जड़ जो चेतन का उपयोग अपने सुख के लिए कर रहे हैं. कितना सरल है अध्यात्म का ज्ञान, चेतन व जड़ के संयोग से जो तीसरा तत्व निकला वह है अहंकार. अब अहंकार यदि दुःख पाना चाहता है तो स्वयं को जड़ माने, सुख पाना चाहता है तो चेतन माने. हो रहा है उल्टा पाना है सुख मानते हैं जड़, मिटाना है दुःख पर मानते नहीं चेतन..यही तो मोह है माया है, मिथ्याभास है. सद्गुरु उसे वक्त-वक्त पर संदेश भेजते रहते हैं. आज उनकी तस्वीर देखी, बर्फ की दरार में कितने प्रसन्न होकर बैठे हैं, जैसे अपने घर में हों, सारी दुनिया ही तो उनका घर है !

अप्रैल आ चुका है, आज दूसरा दिन है. धूप निकली है. कई दिनों के बाद मौसम खुला है पर कह नहीं सकते कब तक, शाम होते न होते फिर बदली छा जाएगी और वर्षा रानी अपने ताम-झाम के साथ पुनः पधारेंगी. माँ से आज थोड़ी देर बात की. वह कहती हैं, उन्हें कई आवाजें सुनाई पडती हैं. रात को डरावने सपने आते हैं और अकेले रहने में डर लगता है. पिताजी के जाने के बाद से ऐसा हो यह बात नहीं है, उनके होने पर भी वह घबरा जाती थीं. इस समय धूप में बाहर बैठकर बाल संवार रही हैं. आज मेडिकल गाइड में dementia के बारे में पढ़ा, लक्षण मिलते हैं लेकिन इलाज कुछ नहीं है. बूढ़े होकर मृत्यु के मुख में जाने से पूर्व यह कैसा दुःख किसी-किसी को झेलना पड़ता है, सारे वृद्धों को तो ऐसा नहीं होता. मानसिक रूप से जो आशावादी रहा हो, जो सजग, जागरूक तथा सदा कुछ न कुछ सीखने को तैयार रहता हो ऐसे व्यक्ति को बुढ़ापे में दिमाग की ऐसी हालत से शायद नहीं गुजरना पड़ता होगा. उनका मन क्या है, कैसे काम करता है, वे उस पर कैसे नियन्त्रण रख सकते हैं, यह सब सीखना हर एक का कर्त्तव्य है. आज उसने लेडीज क्लब को दिए जाने वाले सुझावों की एक लम्बी फेहरिस्त मन ही मन बनायी. प्रौढ़ शिक्षा उसमें से एक थी. बच्चों व बड़ों के लिए योग शिविर लगाना दूसरी थी. मृणाल ज्योति के लिए नये-नये सहायक ढूँढना भी उसमें शामिल है. वैसे उसने कुछ लोगों को फोन किया था, पर किसी ने भी ‘हाँ’ नहीं कहा है. यहाँ सभी अपने-अपने जीवन में मस्त हैं. किसी के बारे में सोचने की फुर्सत ही किसके पास है. एक उसका मन है कि सदा यही सोचता है कैसे सबके पास पहुँच जाये, सबको स्नेह से भिगो दे, सबकी झकझोर कर जगा दे, देखो, दुनिया तुम्हारी अपनी है !


Monday, July 18, 2016

बादलों के पार


पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली, मेहमान आये और चले गये. बड़े भैया, दोनों-भाभियाँ व दोनों की बेटियां. सभी खुश थे. उन्होंने भी उनके साथ अच्छा समय गुजारा. कल का दिन ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के स्वामी मधुसूदन के नाम था. वह आजकल पदयात्रा के सिलसिले में यहाँ आए हुए हैं. आज उन्हें निमंत्रित किया था, उन्हें उसने अपनी किताबें दीं, इस समय नेट सर्फिंग कर रहे हैं. दोपहर को वे उनके साथ बच्चों की योग कक्षा में भी जायेंगे. गुरूजी तथा अपने जीवन के बारे में तथा अपनी दीक्षा के बारे में काफी कुछ उन्होंने बताया. गुरूजी से जो जुड़ जाता है, उसका जीवन बदल जाता है. कुछ दिनों पूर्व तक उसने उनका नाम भी नहीं सुना था पर आज से वे फेसबुक पर दिख सकते हैं. नन्हे से मात्र तीन वर्ष बड़े उसके बड़े पुत्र के समान ही हुए. कह रहे थे, गुरूजी सबको उसी तरह जानते हैं, जैसे वे अपने सिर के बालों को जानते हैं, जब किसी एक को खींचो तो दर्द होता है. उनके चारों ओर चेतना का महासमुद्र है, वे उसकी जानकारी में हैं.

कल रात बड़ी भाभी ने फोन पर कहा, जब वे हवाई जहाज से गोहाटी से दिल्ली जा रही थीं तो ऊपर नीला आकाश तथा नीचे श्वेत मेघ देखकर उन्हें उसकी स्मृति हो आयी, कि यदि वह इस स्वर्गिक दृश्य को देखती तो कविता लिखती. उसने उनसे कहा कल्पना में वह बादल देखकर भी कुछ लिख सकती है, सो प्रयत्न किया-
     
धरा से ऊपर, नीचे नभ से
तैरे हवा में यान हमारा,
श्वेत बादलों की शैया पर
ज्यों अटका हो एक सितारा !
निर्मल नील गगन का साया
श्वेत मेघ तिरते अम्बर में,
मानो बिखरी हो कपास शुभ्र
या बगुलों की पांत  उड़ी हो !
दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा,
ढका हुआ बादल से सब कुछ
देखो, कहीं न एक झरोखा  !
उठा धरा से पहुँचा नभ में
हम बादल के पार आ गए
छोड़ के भेदों की दुनिया
एक का ही आधार पा गए  !


Saturday, July 16, 2016

गीत का जन्म


आज ध्यान में किसी ने पूछा कि वह ईश्वर को क्यों पाना चाहती है, क्या इसके पीछे यश की कामना है ? ईश्वर को क्या यश का साधन बनाया जा सकता है ? संतों का यश भी तो चारों दिशाओं में फैलता है, पर वे तो परमात्मा ही हो जाते हैं. उसका मन कामनाओं से मुक्त नहीं हुआ है. जो कुछ भी उन्हें इस जीवन में प्राप्त होता है, सब कर्मफल है, फिर उसका उपयोग वे जिस तरह करें वे नये कर्म उनके भविष्य की दिशा निर्देशित करते हैं. आत्मा में रहकर परमात्मा की निकटता का अनुभव करके भी यदि कोई संसार ही पाना चाहता है तो उसे सीधे रास्ते से ही जाना चाहिए. सद्गुरु क्या आये उसका कल्याण कर गये. पल भर के उस हाथ के स्पर्श में पता नहीं क्या था कि उसकी साधना जो बैलगाड़ी की गति से चल रही थी, जेट की गति में आ गयी है. भीतर कितना बदलाव आ गया है. मन अब नन्हे शिशु की तरह निरीह तकता है. बुद्धि अपनी मनमानी नहीं कर पाती. सद्गुरु को कल उलेमा को सम्बोधित करते सुना वे इराक़ गये थे, शिया और सुन्नी में मेल कराने, कल वह सीडी भी देखे, जिनमें यहाँ के उनके कार्यक्रम की रिकार्डिंग है. ‘मेरी दिल्ली मेरी यमुना’ के बारे में नेट पर पढ़ा सुना था, कल उनके मुख से सुना, कैसे एक व्यक्ति आत्मा की शक्ति को जागृत करके परमात्मा के समकक्ष पहुँच सकता है. परमात्मा की तरह प्रेम का सागर बन सकता है. परमात्मा की तरह समता व द्रष्टा भाव में रह सकता है. सत+चित+आनंद की मूर्ति उसके सद्गुरु को कोटि-कोटि प्रणाम !


कल दोपहर कुछ देर के लिए वर्षा थमी थी, शाम होते-होते बादल फिर घिर आये और इस समय घना घटाकाश छाया है. कल रात एक स्वप्न देखा. पहाड़ी कच्चे रस्ते से किसी के साथ जा रही थी कि पैर फिसलता है और वह नीचे गहरी खाई में जा गिरती है पर भूमि स्पर्श से पूर्व ही जैसे कोई शक्ति उठा लेती है और हवा में तैराते हुए ऊपर ले जाती है. गिरते समय भार की कमी महसूस हो रही थी और गुरुत्व का स्पष्ट अनुभव हुआ था, ऐसे ही चढ़ते समय भी...कितना स्पष्ट अनुभव था. भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है उनके भक्त का पतन नहीं होता. पता नहीं वह भक्त है या नहीं लेकिन वह उनसे प्रेम करती है. आज स्नान के बाद मन नृत्य कर रहा था, भीतर शब्द फूट रहे थे, फिर कदम भी थिरकने लगे, कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं- सद्गुरु का हाथ हो, झुका हुआ माथ हो तो क्या कहने..सद्गुरु का ज्ञान हो, अंतर का ध्यान हो..सद्गुरु का संग हो, उतरे न रंग हो..सद्गुरु की वाणी हो, गा गा के सुनानी हो..सद्गुरु सा मीत हो, उसके ही गीत हों..वह अपना सा लगे, जग सपना सा लगे..इस भजन या गीत की धुन अपने आप ही भीतर से फूट रही थी, जीवन में यदि परमात्मा का प्रेम हो तो जीवन उत्सव बन जाता है, वरना दुःख, चिंता, ईर्ष्या, द्वेष, बेचैनी तथा उलझनों में फंसे ही रहते हैं..एक को पा लें तो सब मिल जाता है. एक खो जाये तो सब कुछ होते हुए भी इन्सान खाली ही रह जाता है, परम ही वह अनमोल खजाना है जिसे हर कोई ढूँढ़ता फिरता है, उससे कम में उसे तृप्ति मिल भी कैसे सकती है..मिलनी भी नहीं चाहिए..

Saturday, June 18, 2016

हरियाली और हवा की गुपचुप


अभी दो नहीं बजे हैं, आकाश बादलों से घिरा है, ठंड भी बढ़ गयी है. उसने लंच के बाद जून के जाने पर कम्प्यूटर ऑन किया. छोटी व बड़ी बहन के मेल थे. सद्गुरु का विस्डम संदेश भी था. दिनोंदिन जिसकी भाषा परिष्कृत होती जा रही है या वह ज्यादा गहराई से समझने लगी है, कितने कम शब्दों में कितना सटीक उत्तर वे देते हैं, अद्भुत है उनका ज्ञान, अद्भुत हैं वे ! परसों एक बुजुर्ग परिचिता का जन्मदिन है, उनके लिए कविता लिखी है. परसों ही सत्संग भी है, जून को उसका वहाँ जाना पसंद नहीं है और उनकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने का अर्थ है घर में अशांति का पदार्पण ! उसका मन (आश्चर्य है कि अभी तक वह बचा है) विद्रोह कर रहा है. आज सुबह सुना था इच्छा शक्ति उमा कुमारी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती, यही तो विडम्बना है. इच्छा से मुक्त होना हो तो उसे समर्पित कर देना चाहिए ! जहाँ कामना है वहाँ सुख नहीं, वहाँ आनंद नहीं, वह भी अपनी सत्संग में जाने की कामना ईश्वर को समर्पित करती है, आगे वही जानें !

दोपहर के दो बजे हैं. बगीचे में झूले पर वह बैठी है, धूप और छाँव दोनों ने जिस पर इस समय अपना अधिकार जमा रखा है. उसके पैर धूप में है शेष भाग छाया में है पर सिर की चोटी पर धूप की तपन का अनुभव हो रहा है, हल्की हवा भी बह रही है. सामने मैजंटा रंग के फूल खिले हैं बायीं ओर एक बड़े प्लास्टिक के गमले में साइकस जाति का एक पादप अपने पूरे गौरव के साथ उगा है. उसका सिर  थोडा भारी है और पेट भी, सम्भवतः वस्त्रों के कारण या सर्दियों की शुरुआत में पौष्टिक भोजन के कारण ! कल शाम को सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, वे संध्या भ्रमण के लिए निकले तो उसने सत्संग में जाने की बात कही, जून ने चुप्पी ओढ़ ली, उसने कहा, उन्हें उसकी जरा भी परवाह नहीं है. पर बाद में लगा यह ठीक नहीं था. उसके भीतर दो व्यक्तित्त्व हैं, एक पूर्ण तृप्त है, वह रहस्यमय है, वह होते हुए भी नहीं के बराबर है, एक दूसरा है जो जग में सबके साथ हिलमिल कर रहना चाहता है. वहाँ जाने अथवा न जाने से उसे कोई हानि या लाभ होगा ऐसा भी नहीं है. हानि-लाभ की अब कोई बात ही शेष नहीं रह गयी है. भजन गाते-गाते भाव में डूबना उसका सहज स्वभाव है, बस इतना ही. सो वह इस नीले आकाश के नीचे चमकते हुए प्रकाश में हरियाली और हवा की इस गुपचुप को सुनते हुए पंछियों के सुर में सुर मिलाकर अपने आप को जीवन की धारा में निर्विरोध बहने के लिए छोड़ देती है ! जो हो सो हो...एक तितली उसके वस्त्रों पर आकर बैठ गयी है, उस पर फूल बने हैं, वह शायद फूल की खोज में ही आई है और रस न मिलने पर भी कैसे आराम से बैठी है.

आज फिर वही कल का सा समय है, झूले पर धूप-छाँव का खेल चल रहा है, जैसे जीवन में प्यार और तकरार का खेल साथ-साथ चला करता है. जून के साथ उसका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. शाम को चार बजे मृणाल ज्योति जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए मीटिंग है. उसके बाद वे उन बुजुर्ग महिला से मिलने जायेंगे जिनका जन्मदिन है.


Sunday, April 24, 2016

नीलवर्णी शिव


सोलह दिनों की यात्रा के बाद परसों वे वापस लौट आये हैं. सुबह के दस बजे हैं, बच्चे पढ़ने आये हैं. मौसम सुहावना है, धूप खिली है, बगीचा साफ-सुथरा मिला. वापस आकर सभी परिवार जनों से बात भी हो गयी है. सभी परिपक्व हो रहे हैं उम्र के साथ-साथ, पर बड़ी भाभी अभी भी मन के जाल में कैद हैं, यहाँ उसकी एक सखी का भी वही हाल है. बड़ी बहन ने स्वयं को देह से अलग महसूस करना तो वर्षों पहले ही शुरू कर दिया था अब वह देह को बंधन मानने लगी हैं. देह से मुक्त होकर वह परमधाम में जाकर शांति का अनुभव करना चाहती हैं. देह की अपनी सीमाएं हैं पर देह के बिना आत्मा कुछ जान भी तो नहीं सकती. यदि आत्मा आनन्द है तो इस बात का ज्ञान उसे देह धारण करके ही होता है. ध्यान के द्वारा देह रहते भी यह सम्भव है. विदेह जनक को ऐसा ही अनुभव होता होगा. उसे हिंदी के लेख-कविताएँ एकत्र करने हैं, फोन किये हैं सम्भवतः इतवार तक कुछ बात बनेगी. सद्गुरु का एक सुंदर प्रवचन छोटी ननद से लायी है, बाबाजी का भी, ओशो के दो संगीतमय ध्यान के कैसेट भी. जून ने आज सुबह व्यायाम/ साधना आदि के बाद कहा, आज उन्हें कई हफ्तों के बाद अच्छा अनुभव हुआ. शाम को वे एक वृद्धा परिचिता को जन्मदिन की बधाई देने जायेंगे.

आज सुबह नींद देर से खुली, इतनी गहरी नींद थी कि अलार्म भी सुनाई नहीं दिया, दोनों में से किसी को भी नहीं. अभी तक यात्रा की थकान उतरी नहीं है. सुबह अभी पौने सात ही बजे थे, एक दक्षिण भारतीय सखी का फोन आया, उसकी माँ जो पिछले एक वर्ष से पुत्र के साथ विदेश में रह रही थी, देह सिधार गयी. भाई उनकी देह को भारत लाने का प्रयास कर रहा है. कल शाम को प्रेस गयी थी प्रूफ रीडिंग करने. ‘ध्यान’ पर लिखा लेख उसने तीसरी बार छपने को दिया है क्योंकि यह विषय है ही इतना महत्वपूर्ण !


आज सुबह अचानक वर्षा होने लगी है. बादल रात में एकत्र हुए होंगे. उस वक्त वे निद्रा में मग्न थे. कल रात कैसे अनोखे स्वप्न देखे. भगवान शंकर को देखा, नीला रंग, तन पर वही सब आभूषण जो चित्रों में दिखाई देते हैं. जादू, तिलिस्म तथा कंकाल को झपटते देखा. अजीब सा स्वप्न था पर उस वक्त कितना सहज लग रहा था. कल रात एओल का कार्यक्रम देखा था. गुरूजी को बहुत दिनों बाद देखा व सुना, फिर ‘कृष्णा’ देखा इसी का असर रहा होगा जो मन रहस्यों की दुनिया खो गया. यह जगत एक रहस्य ही तो है ! कल छोटी बहन से बात की, वह एक और मकान खरीद रही है, यानि तीसरा मकान और अपने काम से, जीवन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है. सच ही है लोग जीवन से कभी भी पूर्ण संतुष्ट कहाँ हो पाते हैं, वे जीवन का अर्थ समझे बिना ही जीवन जिए चले जाते हैं. ग्यारह बजने को हैं, जून कुछ देर में आने वाले होंगे उन्हें बाजार भी जाना था पर इस भीगे मौसम में शायद सम्भव नहीं हो सकेगा. उसका देवदिवाली पर लेख पूरा होने को है !