Friday, July 21, 2017

गणपति बप्पा मोरया


कल जून का जन्मदिन है. उनके लिए एक कविता लिखनी है. आजकल वह बहुत खुश रहते हैं. दफ्तर में काम भी ज्यादा है फिर भी नियमित भ्रमण, व्यायाम आदि तो है ही. अपने जूनियर्स के साथ उनका संबंध बहुत स्नेहजनक है. आवश्यकता पड़ने पर अनुशासित भी करते हैं, सभी की भावनाओं का ध्यान भी रखते हैं. शॉपिंग करने में भी उन्हें बड़ा आनंद आता है. आजकल पैसों के मामले में बहुत उदार हो गये हैं. टीवी पर हास्य के कार्यक्रम भी देखते हैं. सबको लड्डू खिलाकर पन्द्रह अगस्त मनाने और झंडा लगाने का उनका जज्बा भी देखने लायक है. सबसे बड़ी बात अब उन्हें क्रोध नहीं आता उन बातों पर जिन पर पहले आता था. एक उन्नत भविष्य की ओर वह बढ़ रहे हैं.

झमाझम वर्षा हो रही है. एक बार ऐसा हुआ सुबह जब काले बादलों ने आकाश को पूरा ढक लिया, कितना अँधेरा हो गया था जैसे मन कभी-कभी किसी बात में पूरा आसक्त हो जाता है और आत्मा का सूर्य खिन भी दिखाई नहीं देता. अभी जब जून दफ्तर से लौटे तो मोटी-मोटी बूँदें पड़ने लगीं. गेट से बरामदे तक आते-आते वह भीग गये थोड़ा सा. छम-छम बरसती बूंदों का संगीत कितना मधुर है. हरियाली ऐसे गहरे हरे रंग में रंग गयी है. शाम यूँ भी होने को है.पंछी अपने घर लौटने को थे पर अब दुबक कर शाखाओं में बैठ गये हैं. आज सुबह स्कूल गयी, एक अध्यापिका ने कहा, वह कक्षा नवीं व दसवीं के बच्चों को गणित पढ़ाये, पर गणित से नाता टूटे तो वर्षों हो गये हैं, कोर्स भी बदल गया होगा. योग सिखाना ही सबसे सरल है, शांति की राह पर ले जाना ही सबसे प्रिय कार्य है. शेष कार्य तो हो ही रहे हैं. कल बड़े भांजे का जन्मदिन है, उसके लिए छोटी सी कविता लिखी है, जून अभी आकर उसे सजा देगें, फोटो आदि डालकर.

आज असम बंद है. गोलाघाट में असम व नागालैंड के लोगों के मध्य हुए दंगों के बाद पुलिस के अत्याचार के खिलाफ एजीपी ने बंद का आवाहन किया है. सुबह जून दफ्तर गये पर लौट आना पड़ा. वर्षा अभी होकर रुकी है, सब कुछ धुला-धुला सा लग रहा है. आज ब्लॉगस पर तीन पोस्ट डालीं, किसी-किसी दिन लिखने की गति अपने आप बढ़ जाती है और किसी दिन एक ही पोस्ट मुश्किल से लिखी जाती है. शाम को मृणाल ज्योति की मीटिंग है, बंद के कारण स्कूल तक जाना सम्भव नहीं होगा, इसलिए सारी कमेटी उनके घर पर ही आ रही है. छोटे भाई का जन्मदिन भी आने वाला है, उसके लिए भी एक कविता लिखी.

फिर एक अन्तराल ! कई दिनों से कोई नई कविता भी नहीं उतरी है. कागज-कलम लेकर बैठना ही नहीं हुआ. घर में रंग-रोगन व सफाई का काम चल रहा था, सब कुछ फैला हुआ सा था, अब जाकर कुछ ठीक हुआ है. अब भी काफी कम शेष है. छोटे भाई के आने में दस दिन शेष हैं, तब तक तो सब निपट ही जायेगा. गणेश पूजा का उत्सव चल रहा है इन दिनों. आज गुरूजी ने और कल शिवानी ने गणपति का असली अर्थ बताया. मिट्टी से बनी देह या शरीर के मैल से बनी देह अहंकार से ग्रसित होती है, फिर ज्ञान उस अहंकार को मिटा देता है और ज्ञान स्वरूप ही बना देता है. गणपति का सिर बड़ा है अर्थात ज्ञान भरपूर है. सूंड से भारी काम भी करते हैं और एक सुई भी उठा सकते हैं, अर्थात कोमल व कठोर दोनों हैं. चूहे पर सवारी करते हैं अर्थात तर्क (काटने की शक्ति) पर शासन करते हैं.



Thursday, July 20, 2017

लिट्टी-चोखा


कल ईद थी. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आया. वे लोग यहाँ से जा रहे हैं, अपने घर से पौधे ले जाने को कहा था, उन्होंने लिट्टी-चोखा खाने का निमन्त्रण भी दिया है. जून ने गाड़ी भेजी है, अभी माली आएगा, उसे साथ लेकर जाना है. उनके लिए एक कटहल भी लिया है. इस समय भी धूप भी काफी तेज है, शाम के पांच बजने को हैं. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखी है. उसने एक कविता की पैरोडी बना दी, खुदा की बात इतनी आसानी से समझ में आती कहाँ है. उसे भी नहीं आती थी, अब भी आई है ऐसा नहीं लगता. खुदा उन्हें खाली कर देता है, बिलकुल ‘हॉलो एंड एम्प्टी’ ! सितम्बर में छोटा भाई परिवार सहित यहाँ आ रहा है, यकीनन वे दिन बहुत अच्छे होंगे ! परसों एक जन्मदिन पार्टी में जाना है, अभी उसे एक कविता ( यदि उसे कविता कहें तो) लिखनी है, मन हल्का है, खाली-खाली सा..सो परमात्मा का सत्य उसमें से वैसे ही बहेगा जैसे खाली बांसुरी से हवा !  

अगस्त का आरम्भ हो चुका है, आज सारे कैलेंडर बदलने हैं. दूधवाले, धोबी, माली, नैनी सभी का हिसाब चुकतू करना है, जन्मदिन के कैलेंडर में इस माह पड़ने वाले विशेष दिनों को भी देखना है, शरीर का भार लेने का एक कार्य और करते हैं वे हर माह के पहले दिन. सुबह वे आज समय पर उठे, पिछले कुछ दिनों से उसका पाचन कुछ ठीक नहीं था. इतने वर्षों उस पर जो जुल्म ढाए हैं, उनकी भरपाई करने का वक्त आ गया है. इन्सान अपने छोटे-से छोटे कृत्य से भी बच नहीं सकता. जितनी नकारात्मकता इस मन के द्वारा उपजी है, उसका भुगतान उन्हें हर हाल में करना होगा. अब समय आ गया है कि पूर्ण सकारात्मकता को अपनाया जाये, उससे कम रत्ती भर नहीं, हर रत्ती का जवाब देना होगा जो सदा बढ़कर ही मिलता है. नन्हे ने बताया, कल कर्नाटक बंद था.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल, कल कमेटी की पहली मीटिंग थी, एक सदस्या के साथ मिलकर उसने सभी के लिए स्नैक्स व रात्रि भोजन का इंतजाम किया. सब कुछ ठीक से हो गया. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को राखियाँ बांधी. जीवन एक धारावाहिक की तरह है, उसकी कहानी भी ऐसी ही है. कभी कुछ घटता है जो परेशान कर जाता है पर अपने स्वभाव में टिकते ही सब कुछ पूर्ववत् हो जाता है, बाहर न भी हो पर भीतर तो अवश्य. जो कुछ भी उन्हें निर्बल बनाता है वह त्याज्य है. सकारात्मकता में टिके रहने से हर क्षण नयेपन का अनुभव भी होता है. अभी-अभी नैनी की बच्चियां आई थीं, ईश्वर के प्रेम से परिपूर्ण, कितनी प्यारी मुस्कान है इन दोनों की ! उनके साथ जाकर फुहार में ही फूल चुने और तुलसी के चौरे पर सजाये. बहुत सी बातें वे बिन कहे ही समझ जाती हैं. प्रेम भी प्रेमी हृदय ही महसूस कर सकते हैं, संत या बच्चे ! सामने का दृश्य हरियाली का एक समुन्दर जैसा ही तो है, मौन है पर सब कुछ कहता और सब कुछ सुनता हुआ ! जीवन कितना सुंदर है और कितना अनोखा ! परमात्मा और जीवन एक ही तो हैं ! 

Wednesday, July 19, 2017

नूरपुर की रानी


अभी-अभी नैनी ने कौए और कबूतर के झगड़े की गाथा सुनाई. उसकी सास ने रोज की तरह कबूतरों के लिए कटोरी में पानी रखा और चावल के दाने बिखेरे. दो कौए आकर पानी पीने लगे. एक ने कटोरी ही चोंच से उलट दी, फिर चावल खाने आये कबूतरों को खदेड़ने लगे. बाद में एक बड़े कौए को बुलाकर लाये, शायद वह उनके नेता था. एक कबूतर की पूंछ पकड़कर उसे गोल-गोल घुमाने लगे और इस क्रिया में उसका एक पंख भी निकल गया. कौआ शनि देवता का रूप माना जाता है और कबूतर तो शिव का प्रिय पक्षी है. दोनों का यह झगड़ा फिर क्यों ! इन जीवों में भी कितना ज्ञान होता है. रात को दो अनोखे स्वप्न देखे, एक में वह आचार्य रजनीश से मिल रही है. वे अभी युवा हैं, वह कहती है, सर, आप कहाँ रहते हैं, उन्होंने इलाहाबाद का नाम लिया, इलाहबाद के किसी स्थान का. दूसरे में श्री श्री का सत्संग हो रहा है, आगे क्या करना है, इसके लिए वह उनसे मन्त्रणा कर रही है. गुरूजी से इतनी निकटता से बातचीत स्वप्न में ही सम्भव है, शायद भविष्य में कभी जागृत में भी सम्भव हो. भीतर कैसा तो अहोभाव भर गया है, परमात्मा की महक चारों और भरी है, धनक कण-कण में है, उसका स्पर्श हर शै पर है ! उसका सौन्दर्य अप्रतिम है. कितनी सुंदर सृष्टि रची है उसने, और पल-पल रच रहा है. उन्हें उसे कुरूप करने का कोई अधिकार नहीं है. उनका मन भी सुंदर होना चाहिए, विचार तथा भावनाएं भी. सभी कुछ एक सौन्दर्य का प्रकटीकरण करे, ऐसा होना चाहिए. बाहर माली की कैंची की आवाज सुनाई दे रही है, वह आज जल्दी आया गया है. उसने सोचा बगीचे में क्या-क्या काम और करवाए जिससे बगीचा और सुंदर लगे. जून कल आ रहे हैं, उन्होंने कोलकाता में कुछ सामान खरीदा है, उन्हें खरीदारी करने में बड़ा मजा आता है, जैसे उसे कविताएँ लिखने में ख़ुशी मिलती है.

कल कुछ नहीं लिखा, आज सुबह से मन स्थिर नहीं है. कोई पुराना कर्म अवश्य ही जागृत हुआ है. साक्षी में टिकना कोई ऐसी बात नहीं है कि एक बार यदि हो गया तो सदा के लिए हो गया. पल-पल  सजग रहना होगा. पूर्ण ज्ञान के बाद सम्भवतः वह सदा ही हो जाता हो, अप्रयास ही. कबीर तभी कहते हैं, साधो, सहज समाधि भली ! आज सुबह बाबा रामदेव जी की गंगोत्री यात्रा पर अच्छा सा कार्यक्रम देखा. वे साधु-संतों से भेंट करते हुए, अपने शिष्यों के साथ गंगोत्री से गोमुख की ओर जा रहे थे.  

आज धूप बेहद तेज है, पर पंखे के सामने बैठकर गर्मी का अहसास नहीं हो रहा है, यूँ भी मन यदि शीतल हो तो बाहर का ताप विशेष असर नहीं करता. बड़ी ननद का फोन आया, कल बेटी के ससुराल वालों के साथ बात हुई, पर कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है. कुछ देर ‘नूरपुर की रानी’ धारावाहिक देखा. नायिका नूरी कितनी अच्छी उर्दू बोलती है और बहुत संवेदनशील है. वह शहजादी बनकर अच्छे-अच्छे लिबास पहनती है तो उसे भी आज बहुत खूबसूरत लिबास मिले हैं. दो कुरते, जिनमें एक कुरता चिकन का है, और दो सूट के कपड़े, जिनपर कश्मीरी कढ़ाई है.

आज क्लब की वार्षिक मीटिंग है, नई कमेटी को जिम्मेदारी सौंपने का दिन, उसका काम अब कोई और संभालेगा. जुलाई भी समाप्त होने को है, नया वर्ष आता है और उसके जाने का वक्त भी आ जाता है. दोपहर को उठी तो सिर में दर्द था, आचार्य बालकृष्ण जी का तरीका अपनाया. दायीं नासिका को बंद करके बायीं नासिका से लम्बे श्वास लेना, दर्द काफी चला गया है, शायद पित्त बढ़ गया है. आजकल वे रोज ही आम खा रहे हैं. 

Sunday, July 16, 2017

फुटबाल का विश्वकप


कल से उसके बाँए कान में सुनाई देना कम हो गया है और एक आवाज भी आती है. शायद इन्फेक्शन है या पानी चला गया है, अथवा तो वैक्स है और या तो ज्यादा सुनने से कान की श्रवण शक्ति कम हो गयी है. उम्र के साथ-साथ भी शरीर में कई परिवर्तन होते हैं. आज इतवार है और जून ने लंच में विशेष पुलाव तो बनाया ही था, शाम को ब्लू बेरी, रोस्टेड आलमंड, डेट्स तथा बगीचे से तोड़ा ताजा भुना हुआ भुट्टा. कल सिनेमा हॉल में HSKD देखी, फिल्म उसे ज्यादा पसंद नहीं आयी. अमेरिकन कॉर्न खाए और चालीस रूपये कप वाली चाय पी, यानि कल दिन भर मस्ती की. शाम को सत्संग में गये. गुरू पूर्णिमा  उत्सव के कारण गुरू पूजा थी. आज ट्विटर पर गुरूजी का संदेश देखा, यू ट्यूब पर उनका कल का संदेश भी कुछ देर के लिए सुना था. अभी वे कुछ देर बैडमिंटन खेलेंगे फिर शेष भाग सुनेंगे. फुटबाल के विश्व कप के खेल समाप्त हो चुके हैं. जर्मनी जीत गया है, ब्राजील चौथे स्थान पर है. जून भी डायरी लिख रहे हैं. लिखने से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है. जीवन को एक दिशा मिलती है. वे वही हो जाते हैं जैसा सोचते हैं. चेतना जब परम के साथ जुड़ी होती है तब कोई दुःख कोई परेशानी उन्हें छू भी नहीं सकती.

आज भी वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण स्थगित करना पड़ा, शाम को यदि मौसम खुल गया तो जा सकते हैं. उनके बगीचे में अन्नानास लगा है पर जून ने बाजार से लाये अनानास की तस्वीर व्हाट्स ऐप के एक ग्रुप में डाल दी, सब लोग खुश हैं और अगले वर्ष यहाँ आने का प्रोग्राम बना रहे हैं. अभी कुछ देर पहले ही आँख-कान-गला विशेषज्ञ से मिलकर आ रही है. उनके केबिन के बाहर काफी लोग बैठे थे. जून ने फोन कर दिया था सो सबसे पहले उसे ही बुलाया. कान साफ किया और अब खुला-खुला लग रह है, कान में डालने की दवा भी दी है. उसका गला भी थोड़ा सा खराब है पर डाक्टर ने देखकर कुछ कहा नहीं है. दवा के काउंटर पर भी काफी भीड़ थी. जनसंख्या इतनी बढ़ रही है सो हर जगह भीड़ तो बढ़ेगी ही, धैर्य सिखाती है भीड़ भी. वहाँ बातूनी सखी मिली, उसे भी इन्फेक्शन था, एक कोर्स कर चुकी है पर ठीक नहीं हुआ. नैनी ने तुलसी लाकर दी, फिर गर्म पानी भी थर्मस में भर दिया है, वह बहुत ख्याल रखती है हर बात का. सलाद सजाने में उसका जवाब नहीं. आज भी वर्षा हो रही है, जून अभी आने वाले हैं. उन्हें भी उसका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगता होगा जैसे उसे लिखकर लगता है. आज सुबह उन्हें कुछ अच्छी बातें परमात्मा ने कहलवायीं इस मुख से, वे अवश्य ही उन्हें याद रख पाएंगे. उसका जीवन भी सद्मार्ग से विचलित न हो, ऐसी प्रार्थना उसने अपने लिए की.

आज सुबह फिर एक अनोखे स्वप्न ने जगाया. एक नई ब्याहता को उसके पति का नवजात शिशु थमाया जाता है, जिसकी माँ मर चुकी है. वह उसे स्तनपान कराती है और लो..उसके स्तनों में दुग्ध उतर आता है. वात्सल्य की गहरी भावना उसके मन में जगती है और यह चमत्कार घटता है. ऐसे ही परमात्मा की गोद में जब वे अबोध शिशु की तरह वे जाते हैं तो उसका असीम आनंद उन्हें सहज ही मिलने लगता है. वह वहाँ था ही, उसे प्रकट भर होना था. तभी संतजन परमात्मा को माँ के रूप में भजते हैं. माँ कहने का भाव तभी सिद्ध होगा जब वे अबोध शिशु बन जाएँ, जो वास्तविक भी है. क्या जानते हैं वे इस संसार के बारे में, उनकी जानकारी अल्प है और अज्ञान अनंत है. उससे पूर्व भी कुछ स्वप्न देखे. एक में लोभ की प्रवृत्ति स्पष्ट दिख रही थी. स्वप्नों की दुनिया भी कितनी विचित्र है. कल रात बिजली चली गयी थी. वे पहले पूजा रूम में गये, जहाँ पांच खिड़कियाँ हैं, फिर बिजली आने पर अपने कमरे में, पुनः वहाँ जाना पड़ा और फिर लौटे, नींद लेकिन आ ही गयी. परमात्मा की कृपा ही है गहरी निद्रा, लेकिन अभी भी उसे स्वप्न बहुत आते हैं. जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में भी तूरीया यानि चौथी अवस्था बनी रहे, ऐसी ही कामना साधक की होती है, पर वह अवस्था कामना से नहीं मिलती.

सुबह किस स्वप्न ने जगाया याद नहीं, वर्षा नहीं थी सो टहलने गये, आकाश गुलाबी था और हवा में हल्की सी ठंडक. दोपहर को वह बाजार गयी, राखी बनाने का सामान खरीदा. अगले महीने की दस तारीख को राखी है, उसे बच्चों के लिए ढेर सारी राखियाँ बनानी हैं. उन्हें भेजने की तैयारी भी करनी चाहिए. सुबह कविता लिखी ब्लॉग पर और दोपहर को व्हाट्सएप पर पढ़ी. छोटी बहन ने सुंदर भजन गाया. शाम को पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, उसके पुत्र की मंगनी की खबर देने के लिए, दिसम्बर में विवाह है. नन्हे ने बताया अगले तीन महीनों में उसकी कम्पनी में काम करने वालों की संख्या दुगनी हो जाएगी.  



Saturday, July 15, 2017

भात करेले की सब्जी


कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, एक तालाब में स्वयं को पौधों के रूप में या फूलों के रूप में उगे हुए ! ढेर सारे चेहरे पानी की सतह पर तैर रहे थे. किसी जन्म में शायद वह कमल रही हो. आज तक कितने ही स्वप्नों में पिछले कितने ही जन्मों की कहानी देखी है. कितना अद्भुत है यह जीवन, कितने राज छुपाये हुए. ध्यान में जो शांति महसूस होती है पता नहीं किस लोक से आती है. कभी-कभी जो आकृतियाँ दिखती हैं जाने वे कौन हैं ! कुछ भी नहीं जानते वे..सामने रखे मोगरा के फूलों से जो गंध आया रही है, वह माटी से उपजी है, इतनी कठोर भूमि और इतनी कोमल पंखुरी, फिर उससे भी सूक्ष्म गंध, और उससे भी सूक्ष्म उस गंध को स्पर्श को महसूस करने वाली नासिका पर आश्चर्यों का महा आश्चर्य, इस गंध को पहचानने वाला सूक्ष्म मन तथा इसका आनंद लेने वाली आत्मा..तो कृष्ण भोक्ता हैं, यह तो स्पष्ट हो गया. वही एक तत्व जो भोक्ता है वही तो प्रकृति के माध्यम से गंध बनकर बिखरा है. जीवन ऊर्जा जो अनगिनत रूपों में प्रकट हो रही है, स्वयं ही आनंदित भी हो रही है ! पर कैसे यह खेल चल रहा है, कौन जानता है !

कल फिर एक अनोखा स्वप्न देखा, मस्तिष्क को अपने सम्मुख देखा और उसमें जगह-जगह निशान बने थे गोल, छोटे-छोटे टुकड़े, जिन पर लिखा था अज्ञान और वह उसे वहाँ से काट कर निकाल रही थी ! उनके मस्तिष्क में ज्ञान व अज्ञान दोनों हैं. अज्ञान को दूर करना है यही बात स्वप्न बन कर आई. वास्तव में उन्हें ज्ञान को बढ़ाना है, अज्ञान अपने-आप चला जायेगा.


कल नन्हे का जन्मदिन है, जून कल आ रहे हैं. इस समय साढ़े पांच बजने को हैं. बाहर अभी धूप है. कुछ देर पहले बगीचे में काम करवाया. अभी एक कविता लिखनी है, नये-नये शब्दों से सजी सुंदर कविता. आजकल वह कुछ सुंदर शब्दों को देखती है और फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द अन्य शब्द जैसे अपने आप चले आते हैं, सामान्यतया भीतर अब मौन ही रहता है, एक सन्नाटा ! मधुरिम नीरवता ! हवा बह रही है, बाहर झूमते हुए वृक्ष अच्छे लग रहे हैं. कुछ देर में क्लब की एक सदस्या आने वाली है, इसी महीने क्लब की वार्षिक बैठक है, कुछ देर उसका काम करना है. एक अन्य सखी का फोन आया, अगले महीने किशोरियों के लिए होने वाला कार्यक्रम एक स्कूल में होगा. उसने अपनी सब्जी बाड़ी में उगे करेले और लोभिया की फलियाँ भी भिजवायीं. नूना ने भी भात करेले भिजवाये, जो जरा भी कड़वे नहीं होते, जो उसने असम में आकर ही देखे हैं. जामुन आज नहीं मिले, पिछले महीने भर से सुबह-सुबह वह रोज मीठे जामुन उठाकर लाती रही है, शाम को जिसका शरबत जून को बहुत भाता है. जून ने कल दोपहर की टिकट बुक करवायी हैं, कोई नई फिल्म आई है. वह उसके लिए वस्त्र भी लाये हैं. वे जीवन के रस को भरपूर निचोड़ लेना चाहते हैं. ढेर-सारी खाने-पीने की वस्तुएं भी लाये हैं, उसे बिना मांगे ही सब कुछ मिल जाता है, परमात्मा की कैसे कृपा है ! उस परमात्मा के लिए वह क्या कर सकती है सिवाय चंद शब्दों में उसकी महिमा बखान करने के !

Thursday, July 13, 2017

मनसा देवी का मंदिर


कुछ संस्कार इतने गहरे होते हैं कि मिटने का नाम ही नहीं लेते, आज सुबह प्राणायाम करने बैठी तो सहज ही ध्यान लग गया पर उठी तो किसी बात पर हल्की सी धूमिल रेखा मन पर छा गयी. द्रष्टा बन कर उसे देखा पर मन में एक संशय तो छा ही गया. कल रात छोटे भाई से बात हुई, उसे ध्यान व समाधि का अनुभव सदा होता रहता है. परमात्मा अकारण दयालु है, प्रेमिल है, आनंद स्वरूप है और सहज ही प्राप्य है ! वह वसंत है, हर पीड़ा का अंत है ! सद्गुरू, परमात्मा और आत्मा में कोई भेद नहीं ! भीतर से जो ज्ञान का पथ दिखलाता है, वही तो गुरू है !

आज स्कूल गयी, योग की कक्षा आखिरी कक्षा में होनी थी, चटाई की दीवार है उस कमरे की, शेष को बरामदे में खड़े होकर करना पड़ा, खैर, न से तो हाँ भली. अगले हफ्ते से स्कूल में छमाही परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं, इसके बाद स्कूल बंद हो जायेगा, फिर अगस्त में खुलेगा, यानि अब हर सोमवार को जल्दी-जल्दी काम निपटा कर स्कूल नहीं जाना है. शाम को भांजियों को लेकर क्लब जाना है, बच्चों का वार्षिक सम्मेलन चल रहा है इन दिनों. मौसम गर्म है आज भी, दिल्ली का तापमान कल अड़तालीस डिग्री था, अब तक का सबसे अधिक ! कल मेहमान वापस जा रहे हैं. जैसे वह उन्हें लिवाने गयी थी, कल उन्हें छोड़ने भी जा रही है. वे ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर पहुंच जाएँ और बड़ी भांजी के जीवन में सब कुछ पहले का सा ठीक हो जाये तभी माना जायेगा कि उनका यहाँ आना सफल रहा. परमात्मा उनके साथ है और वह उन्हें सही मार्ग दिखायेगा. ज्ञान हो जाने के बाद पुराने कर्मों का क्षय होता है, नये कर्म नहीं बंधते. आज मृणाल ज्योति में एक कार्यक्रम है. विकलांग व्यक्तियों को सरकार की ओर से व्हील चेयर व साइकिल वितरित किये जायेंगे. उसे जाना है.

आज पूरे छह दिनों के बाद डायरी खोली है. उस दिन मेहमानों को छोड़ने गयी, कल उनके लिए कविता लिखी. हर कविता के अवतरण का एक समय होता है, उससे पहले वह आती ही नहीं, जबकि विद्यमान तो रहती ही है. माली से कह कटहल व नारियल तुड़वाकर एक सखी के यहाँ भिजवाने हैं. दो मालियों में से एक काम छोड़कर जा रहा है, उसने लाइन में किसे के साथ झगड़ा कर लिया है, उसे अपने क्रोध पर नियन्त्रण नहीं है. उसे गमले रंगने के लिए कहा था, अभी तक उसने शुरू नहीं किये हैं. कुछ लोग दीर्घसूत्री होते हैं, काम को टालने वाले, जैसे उसने भी अभी तक आत्मा को जानने का काम पूरा नहीं किया है. यह एक अंतहीन यात्रा है. गुरू के बिना मार्ग नहीं मिलता. कदम-कदम पर सहायता चाहिए. सब कुछ ज्ञात होते हुए भी मन पुरानी लकीरों पर पल भर के लिए ही सही चलता तो है. पर अब उसे देखने वाला मौजूद है. आत्मा वे स्वयं हैं, खुद को जानने के लिए तो खुद को ही होश बनाये रखना होगा !

आज महादेव देखा. वे स्वयं को पृथक समझते हैं, यही द्वंद्व है. ‘मनसा’ शिव की मानस पुत्री है और स्वयं को देवी बना हुआ देखना चाहती है, स्वयं की पूजा करवाना चाहती है. पार्वती स्वयं ही दूसरा रूप धारण कर शिव से विवाह करना चाहती है. उनका मन भी आत्मा से पृथक अपनी सत्ता जमाना चाहता है और व्यर्थ ही बंधता है. मनसा और पार्वती शिव को नहीं जानती, मन कितना ही प्रयास करे आत्मा को नहीं जान सकता. आत्मा ही आत्मा को जान सकती है. आज मंगलवार है, शाम को बच्चे आयेंगे. अभी प्रसाद बनाना है.  



Wednesday, July 12, 2017

किताबों वाला घर


जून का महीना भी कल आरम्भ हो गया. मौसम काफी गर्म है. आज स्कूल गयी थी, करेंट नहीं था, बच्चों को पसीना बहाते हुए व्यायाम/आसन कराए. छोटे बच्चे बहुत आनंद लेते हैं. एओल की टीचर का फोन आया, वह कल से आने वाली थीं, पर अब लडकियों को वहीं बुलाया है. कल से वे जाएँगी. शाम के सवा चार बजे हैं, बाहर धूप इतनी तेज है जैसे भरी दोपहर हो. ब्लॉग पर उसकी कहानी अब अध्यात्म की ओर बढ़ रही है. एक वर्ष पहले से ही भूमिका बननी शुरू हो गयी थी, तभी क्रिया के दौरान वह अनुभव हुआ. सद्गुरू तक उसकी प्रार्थना पहुंच ही गयी थी. कितना विचित्र है परमात्मा का यह चक्र, यह व्यवस्था कितनी अबूझ है. वह परम कितना दूर है पर कितना निकट...जीवन कितना अद्भुत है, यदि वे जाग जाएँ तो हर पल उसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं. स्वप्न की धारा जो भीतर चलती रहती है, जिसने उनकी नींद को भी निर्दोष नहीं रहने दिया और उनके जागरण को भी, उसे रोकना ही साधना का लक्ष्य है. वह धारा उनके नियन्त्रण से बाहर हो गयी है क्योंकि वे इतने कमजोर हो गये हैं. पहले उन्हें जानना होगा किस तरह वे मन से पृथक हैं, जैसे आकाश बादलों के पार है, वैसे ही वे भी मन के पार हैं. स्वयं के मुक्त स्थान में स्थित होते ही वे मन के पार चले जाते हैं. जब वे उस स्रोत से जुड़ जाते हैं, उत्साह से भर जाते हैं, ऊर्जा से भर जाते हैं. उन्हें परमात्मा से जुड़कर पहले शक्तिशाली बनना है फिर इस धारा पर उनका नियन्त्रण होगा !

वही दोपहर की बेला है, पंछियों की आवाज के अतिरिक्त मौन की गूंज ही है जो सुनाई दे रही है. दोनों बहनें सो रही हैं, वे आज सुबह योग की कक्षा में गयी थीं, पहला दिन था, उन्हें आनंद नहीं आया. बच्चे तो बच्चे ही हैं, अब कल वे जाएँगी या नहीं, यह उन पर निर्भर करता है. आज सुबह भीतर जो भय जगा लेडीज क्लब के दफ्तर में चल रहे खिडकियों पर जाली लगाने वाले काम को लेकर, क्रोध के रूप में प्रकट हुआ नैनी की एक भूल के कारण उसके ऊपर, जो आज अचानक ही जल्दी आ गयी थी. एक ही ऊर्जा तो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है. सुबह ध्यान किया, केवल शुद्ध चेतना में रहने का अभ्यास, स्वप्न की जो श्रृंखला जो भीतर चलती रहती थी अब खंडित होने लगी है, विचार वे स्वयं ही बनाते हैं और स्वयं ही उनसे पीड़ित होते हैं, सुबह इसका कितना स्पष्ट अनुभव हुआ. परमात्मा कितनी कृपा करता है जो पहले उन्हें प्रेम से भर देता है, वे तो उसे बाद में प्रेम कर पाते हैं. सद्गुरू को आज टीवी पर देखा, fb पर रोज ही देखती है. आज शाम उन्हें क्लब ले जाना है, आज क्लब का स्थापना दिवस है.

टीवी पर आज गुरूजी अपने कार्य के आरम्भिक दिनों के बारे में बता रहे हैं. हर इन्सान को अपना मार्ग स्वयं चुनना होता है और यदि वह सच्चे हृदय से प्रार्थना करे तो ईश्वर स्वयं उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं. उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर ही कुछ करना होता है. आज उसे क्लब की कुछ सदस्याओं के साथ मोरान ब्लाइंड स्कूल जाना है. सेक्रेटरी का फोन आया, उनके साथ इस वर्ष उसकी कई यात्रायें हो रही हैं, कितना कुछ सीखने को भी मिला है.

आज नन्हे के बचपन के मित्र, असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन था, उसने फोन किया. एक अन्य सखी से बात हुई, उन्होंने पोहा बनाने का अच्छा तरीका बताया, भांजियों ने वैसा ही बनाया. दोनों निकट ही बंगाली की दुकान पर भी गयीं, फल खरीदे और अपने लिए मैगी भी. दोनों बहुत शांत व समझदार हैं, अपने काम से काम रखने वालीं. क्लब की एक सदस्या सदा के लिए जा रही हैं, उनके पति रिटायर हो गये हैं, किताबों से भरा था उनका घर, ड्राइंग रूम में बड़ी सी आलमारी तो भरी ही थी, छोटी-छोटी शेल्फ पर भी ढेरों किताबें सजी थीं. उनके पति लेखक हैं, वे स्वयं भी लिखती हैं. वर्षों से बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विद्यालय चला रही हैं. उसने सोचा उनके लिए भी एक कविता लिखेगी. आज फेसबुक पर अस्सी वर्षीय एक महिला को सालसा नृत्य करते देखा, कमाल का नृत्य था, बच्चों की तरह वे घूम रही थीं.  देह, मन के अधीन रहे तो वे उसे अपनी इच्छा से प्रयोग कर सकते हैं. तमस और जड़ता से भरी देह मन पर हावी हो जाती है. जून आजकल बहुत व्यस्त रहते हैं, कल उन्हें दिल्ली जाना है. नन्हे के दफ्तर में एक प्रतियोगिता होनी थी, अच्छी ही होगी. वह अपनी टीम का हेड हो गया है अब. जे कृष्णमूर्ति की जो किताब वह वर्षों पहले बोस्टन से लायी थी, मिल नहीं रही थी, उस दिन मिल गयी, पढ़ना शुरू किया है.  


Tuesday, July 11, 2017

हरियाली का गीत


वर्षा आज भी लगतार हो रही है. पिछले तीन दिनों से वर्षा के कारण प्रातः या सांय भ्रमण नहीं हुआ, आज वर्षा थमने पर जाना ही होगा.  पेड़-पौधे और घास गहरी तृप्ति का अनुभव कर रहे हैं. हरियाली एकाएक बढ़ गयी है. आकाश बादलों से घिरा है. वायुदेव मंदगति से पेड़ों को झुला रहे हैं. बूंदों की टिपटिप और पंछियों के स्वर दोपहर को संगीतमय कर रहे हैं. अभी कुछ देर पूर्व ही उसने चाय पी और आकाश को निहारते हुए कुछ प्रकाश बिन्दुओं को हवा में तैरते देखा. सम्भवतः ये जीवात्माएं हैं जो उनके चारों ओर एक और आयाम में रहती हैं. कभी-कभी प्रकृति अपने रहस्य खोल देती है. एक धुआं सा कभी-कभी धरा से उठता दिखाई देता है, कभी गगन से बरसता हुआ..परमात्मा अपनी उपस्थिति से उन्हें भर देना चाहता है. उसका अंतर उसके लिए खाली है, वहाँ और कोई नहीं है, वही है, वैसे भी वहाँ क्या था, सिवाय अहंकार से उपजी पीड़ा के. वे व्यर्थ ही स्वयं को ढोए चले जाते हैं. शायद नहीं निश्चय हो गया है अब, मन जिसे वे कहते हैं केवल उनकी मूर्खता का दूसरा नाम है, अज्ञानवश वे देख ही नहीं पाते. सतोगुण को तमस व रजस ढक लेता है और उनकी दृष्टि ही दूषित हो जाती है. अपना भला-बुरा भी सोचने की क्षमता नहीं रहती. प्रारब्धवश जो भी सुख-दुःख मिलते हैं, उनमें उनका क्या योगदान है, अहंकार करने जैसा तो यहाँ कुछ भी नहीं है. 

दोपहर को उस छात्र को फोन किया जो बैठे-बैठे सो जाता था, वे लोग तीन दिन बाद जा रहे हैं, उसके पिताजी रिटायर हो गये हैं. कल सामान चला जायेगा. उसके लिए कविता लिखी, जून प्रिंट करके लाये, वह कोओपरेटिव गयी, एक मग और एक चाकलेट ली, उसकी माँ बहुत खुश हुईं, वर्षों पहले उन्होंने उसे संगीत सिखाया था. आज भी लगातार वर्षा हो रही है. शाम को किशोरियों के लिए महिला क्लब का एक कार्यक्रम था, उनकी शारीरिक व अन्य समस्याओं के बारे में कुछ जानकारी दी गयी. लेडीज क्लब ने अच्छी पहल की है. यहाँ की लडकियों को एक मंच दिया है जहाँ वे अपनी समस्यायें कह सकती हैं. कल ही खबर सुनी थी कि एक लड़की ने आत्महत्या कर ली. महिलाओं के प्रति अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं. डिब्रूगढ़ में एक लेडी डाक्टर की हत्या वार्डबॉय ने कर दी. टीवी पर मोदी जी का इंटरव्यू आ रहा है. नन्हा कल अपने एक मित्र की शादी में जा रहा है. एक दिन उसकी शादी में भी सभी मित्र आयेंगे.

पांच दिनों का अन्तराल. आज चुनाव के परिमाण आ गये हैं. बीजेपी ने ऐतिहासिक विजय हासिल की है. टीवी पर सुबह से एक ही चर्चा है. मौसम अब अपेक्षाकृत गर्म है. पिछले दिनों छोटी ननद, बहन के पास गयी, फोन किया तो पता चला मंझली भांजी घर आ गयी है ससुराल छोड़कर. वे सभी बहुत परेशान हैं. उन्होंने छोटी व मंझली दोनों भांजियों को यहाँ आने को कहा है. एक महीना वे उनके साथ रहेंगी. परसों नन्हा भी आ रहा है. अगला एक महीना व्यस्त रहने वाला है. जीवन में कुछ परिवर्तन हो तो अच्छा लगता है.

आज दोनों बहनें आ गयी हैं, वह उन्हें लेने एयरपोर्ट गयी थी, दोनों खुश लग रही हैं. नन्हा भी आ गया है, उसने ‘श्रद्धा सुमन’ ब्लॉग में लेबल ठीक करने में उसकी सहायता की.  उसके एक मित्र के विवाह में उन्हें जोरहाट जाना था, वापस आकर भी दो-तीन दिन हो गये हैं.

इस समय वर्षा हो रही है, वह बाहर के बरामदे में बैठी है. दोनों लड़कियाँ अपने कमरे में हैं. बड़ी किताब पढ़ रही है, छोटी फोन पर व्यस्त है, मौसम की कारगुजारी देखने का उनके पास वक्त नहीं है. बड़ी की समस्या सुलझती नजर नहीं आ रही है. वह अपने आप को जरा भी बदलना नहीं चाहती पर वह नहीं जानती ऐसा करके वह अपना ही नुकसान कर रही है. वे सभी किस तरह माया के पाश में जकड़े हुए हैं. उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर से बात की शायद वह कुछ सुझाव दें, अगले हफ्ते वह आएँगी. गुरूजी के ज्ञान से बड़ी के जीवन में कुछ परिवर्तन तो आएगा ही. नन्हा वापस चला गया है.

आज उसका जन्मदिन है, सुबह से ही बधाई संदेश आ रहे हैं. सुबह वे मृणाल ज्योति गये, भाजिंयों ने बच्चों को नृत्य के कुछ स्टेप्स सिखाये, उन्हें अच्छा लगा. सभी को मिठाई व नमकीन वितरित किया. अभी कुछ देर में शाम के मेहमान आयेंगे, उसने जून का लाया फूलों वाला टॉप और लंबा स्कर्ट पहना है. मौसम आज अच्छा है.  

Monday, July 10, 2017

देवों के देव


अप्रैल का अंतिम दिन ! आज शाम को घर पर मेहमान आ रहे हैं, एक नन्हा होशियार बच्चा नानू, उसकी माँ और नानी-नाना, एक पुरानी सखी और उसके पतिदेव. भोजन तैयार है, रोटी और चावल तभी बनेंगे. लोभिया, आलू-मुँगौड़ी, सॉस पनीर, भिन्डी, आम की चटनी, रायता, सलाद व मीठे में फिरनी व संदेश. आज की शाम सचमुच बहुत अच्छी रहेगी. कल मई दिवस का अवकाश है या कहें अम्बेडकर जयंती का अवकाश जो बीहू के अवकाश के कारण तब नहीं मिला था. वे तिनसुकिया जाने वाले हैं. उसे जूता खरीदना है और जून को टीशर्ट.

सुबह कोयल की मधुर आवाज से नींद खुली, कमरे के पीछे बाहर आम पेड़ पर रहती है शायद. गुरूजी को भी सुना, बहुत भावपूर्ण संबोधन था उनका. आत्मा को जानने की प्रेरणा दे रहे थे. ज्ञान-प्रवाह में सुना, तन्मात्रा भी समुदाय है, परमात्मा सूक्ष्मतम है, उसका कोई समुदाय नहीं है, वह अकेला है. मई दिवस के कारण नन्हे की भी आज छुट्टी है. छोटी बहन ने आज से फिर जॉब आरम्भ की है. दीदी नार्वे में हैं. छोटी, व मंझली भाभियाँ व्हाट्सएप पर सम्पर्क में हैं. मोबाइल ने सबको करीब ला दिया है. दोपहर को क्लब की एक सदस्य के घर गयी, साहित्यिक प्रतियोगिता के लिए आये लेखों, कविताओं आदि को फ़ाइल में लगाया, नाम हटाये तथा उन्हें क्रमांक दिए. शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर के घर गये, उनकी माँ का कुछ दिन पहले देहांत हुआ था. नर्सरी से पाँच पौधे भी लायी.

सुबह उठी तो लगा भीतर कोई कुछ कह रहा है, बहुत धीमी थी उसकी आवाज पर बहुत स्पष्ट...मन आजकल कितना ठहरा रहता है. कोई उपस्थिति ख़ुशबू बनकर फैली रहती है. टहलने गये तो मध्य से ही आना पड़ा, वर्षा शुरू हो गयी जो अब जाकर थमी है. दिन भर फुहार पड़ती रही. अभी-अभी आकाश में चाँद व एक तारा दिखा. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को बच्चों को सूर्य नमस्कार कराया. ओशो को सुना, आर्ट ऑफ़ लिविंग रेडियो पर भजन सुने. इस तरह एक और दिन, मिल गया था जो उपहार में, बीत गया. परमात्मा की कृपा का अनुभव अब अलग से नहीं होता. हर श्वास उसी की दी हुई है, हर कोई उसी की वजह से है. उसी की लीला खेली जा रही है. पिताजी से बात हुई, नन्हे से भी.

आज सुबह से लगातार वर्ष हो रही है. न सुबह का भ्रमण हुआ न ही शाम को बाहर जा सके, हाँ आधा घंटा जरूर ड्राइव वे पर छाता लगाये टहले. यू ट्यूब पर ‘भारत एक खोज’ में स्वामी विवेकानन्द पर एक एपिसोड देखा. नया फोन तो कमाल का है. इसमें बहुत कुछ कर सकते हैं, देख सकते हैं. सुबह टीवी पर महादेव में इतना डूब गयी थी कि स्वीपर ने आकर कहा, कोई आया है तो समझ ही नहीं पायी. उसने कहा भी कुछ धीरे से, सांकेतिक भाषा में था, पर सजग रहना चाहिए था. दोपहर लिखने में बीती. ‘ध्यान’ का विचार सुबह आया था पर अब जब मन हर समय एक सुमिरन में रहता ही है, अलग से ध्यान करने का मन नहीं होता, इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है, गुरू की कितनी आवश्यकता है साधक को. मनमानी साधना उन्हें मंजिल तक कैसे पहुंचा सकती है, कभी लगता है मंजिल पर ही हैं वे, परमात्मा तो यहीं है, अभी है फिर गुरू की चेतावनी याद आती है कि जिसने सोचा वह पहुंच गया वह भटक गया, यहाँ जो एक बार चल देता है, वह चलता ही रहता है. परमात्मा का कोई अंत नहीं, उसे कोई जान नहीं सकता, उसकी कृपा का अनुभव भर कर सकता है. उसका प्रेम अनुभव कर सकता है, उसके प्रति कृतज्ञता के भाव से भर सकता है ! वह परमात्मा उनका अपना है !    


Thursday, July 6, 2017

सूर्य नमस्कार



आज सुबह उस सखी का फोन आया जो बोलना शुरू करती है तो रुकने का नाम ही नहीं लेती. परसों भी आया था, खुश थी, अपने पिता के आगमन के बारे में बताया था. वह यहाँ आ रहे थे पर कल रात्रि ट्रेन में ही उनकी तबियत बिगड़ गयी और रास्ते में एक स्टेशन पर उन्हें उतारना पड़ा, अस्पताल में उन्होंने देह त्याग दी. उसका भाई जो खुद एक डाक्टर है, वही उन्हें ला रहा था. बताते हुए वह बहुत रो रही थी. कुछ दिनों में दुःख हल्का हो जायेगा और उसका मन इस कमी को सहने की क्षमता प्राप्त कर लेगा. उससे मिलकर आई तो स्वयं का मन भी भर आया था, कुछ शब्द एक कविता के रूप में कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उतर आये.

सुबह अलार्म बजा, दो मिनट बाद ही एक दृश्य दिखा, गेट पर कार खड़ी है. फौरन उठ गयी याद आया शोकग्रस्त परिवार से मिलने जाना है. परमात्मा की कृपा का अनुभव किस-किस तरह होता है, वे समझ नहीं पाते. उस सखी की दोनों भाभियाँ आ गयी हैं, एक नेपाली है दूसरी राजस्थानी, जबकि वह बंगाली है. शाम को जब दुबारा गयी, उसके पिता को ले जाया जा रहा था. वापस आकर कुछ देर साहित्य अमृत पढ़ा, अब गहराई से पढ़ने की आदत तो है नहीं. कुछ कविताएँ अवश्य दिल को छू गयीं. मनसा, वाचा, कर्मणा एक हो जाये कोई तो जीवन खिल उठता है. वे मन से जो विचार करते हैं, वे वाणी में उतरते-उतरते कुछ तो परिवर्तित हो ही जाते हैं और कर्म में परिणत होंगे या नहीं यह भी नहीं जानते हैं. उसका अंतर सृजन की एक असीम सम्भावना है, भीतर गहरे में कोई है जो प्रकटना चाहता है. शब्दों की कमी है, पढ़ना चाहिए तभी नये-नये शब्द मिलेंगे.

आज बहुत दिनों बाद कलम उठायी है. यात्रा से आये चार दिन हो गये हैं. घर व्यवस्थित हो गया है. कल बहुत दिनी बाद स्कूल जाना है, सूर्य नमस्कार सिखाना है. बनारस में एक आयुर्वैदिक पंचकर्म केंद्र में गये. सीखा कि बालों और तन पर नियमित तेल लगाना आयुर्वेद के अनुसार बहुत लाभदायक है. टीवी पर राजनीतिक समाचार आ रहे हैं. सभी नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. सभी जीतना चाहते हैं. देश की चिंता किसी को है ऐसा उनकी बातों से नहीं लगता. आजकल मौसम अच्छा है, शाम को बगीचे में ठंडी घास पर नंगे पांव चलता बहुत भाता है. मनुष्य को खुश रहने के लिए कितना कम चाहिए. कितनी मुक्ति है उसके पास, वह व्यर्थ ही बंधन खोजता है फिर स्वयं ही दुखी होता है. आज पिताजी से बात की, उन्हें नन्हे के विवाह की फ़िक्र है, उसकी बात की तो उन्होंने पूछा.

शाम को अचानक वर्षा होने लगी, मूसलाधार वर्षा ! अभी भी हो रही है. टीवी पर आनंदी चुनाव के लिए प्रचार कर रही है. पूरे देश में चुनावी माहौल है. सुबह समय पर उठी पर साधना ठीक से नहीं हुई, कल रात साढ़े बारह बजे के लगभग नींद खुल गयी, एक पुराना संस्कार जग उठा था. कितने दृढ़ होते हैं संस्कार, पत्थर पर लकीर जैसे, साक्षी भाव से उन्हें देखने पर भी कभी न कभी वे सर उठा ही लेते हैं. मन की सफाई तो ध्यान से ही होती है.



Wednesday, July 5, 2017

बच्चों के योगआसन


आज होली है, वे द्रष्टा बने हुए हैं. उन्हें तो होली हंस बनना है. कंकर-पत्थर को नहीं चुनना है. रतन को चुनना है, ज्ञान रतन है, मन को इन रतनों से भरना है. जीवन में फिर इनका उपयोग करना है. उनका कोई भी कृत्य बिना फल दिए नहीं जाता. स्वयं सुनना है और स्वयं को सुनाना भी है, सुनकर ही वे स्वयं को बदल सकते हैं, जो स्वयं को समझा सकता है वही अन्यों को भी समझा सकता है. जो भी लिखने में आता है, वह स्वप्न जैसा है और जो सत्य है वह लिखने में नहीं आ सकता. पवित्रता, दिव्यता और सत्यता परमात्मा के गुण हैं, उनको धारण करके ही उन्हें काम करना है. मन पवित्र हो, बुद्धि, दिव्य हो और आत्मा सत्य हो तभी वे परमात्मा को स्वयं के द्वारा प्रकट होने दे सकने में सक्षम होंगे. आज एओल के दो टीचर (पति-पत्नी) आये थे, कल से बच्चों का कोर्स होगा. अगले तीन दिन शामें व्यस्त रहेंगी. आज सम्भवतः इस वर्ष की हिंदी की अंतिम कक्षा हुई, अब कुछ दिनों तक तो वह दोपहर को अपना अन्य कार्य कर सकती है.  

 आज स्कूल में प्रिंसिपल ने कहा, वार्षिक उत्सव के लिए बच्चों का योग का भी एक कार्यक्रम तैयार करना है. अगले हफ्ते से कक्षा एक से छोटे बच्चों को भी योग सिखाना है, उन्हें एनिमल पोज तथा उनकी चाल सिखाना ठीक रहेगा. उसके बाद असेम्बली कन्डक्ट करनी है. उसने सोचा है, शुरुआत श्लोक से करेगी फिर धर्म सम्बन्धित कुछ जानकारी, उसके बाद योग अंत में राष्ट्रीय गान. कुछ देर बाद जून आने वाले हैं, बाद में उसे श्री श्री योगा कोर्स में भी जाना है. पिछले तीन दिनों का अनुभव अच्छा रहा, कितना अच्छा उसे शब्दों में कहना कठिन है. देह के प्रति सजगता और बढ़ी है, मन के प्रति और स्वयं के प्रति भी. एक स्थिरता का अनुभव हो रहा है. अस्तित्त्व उसके साथ हर पल है. हर जगह, हर श्वास में, हर धड़कन में, वही साक्षी है, वही दृष्टा है, वही अनुमन्ता है, भोक्ता है, अर्थात मन, बुद्धि तथा देह आदि उसी के लिए हैं. उनकी इन्द्रियों के भोग की सीमा है पर माँग अनंत है, अनंत की चाह अनंत से ही मिट सकती है.

आज कोर्स का अंतिम दिन था. एक अनोखा अनुभव हुआ. शाम्भवी मुद्रा करते समय आज्ञा चक्र पर, सुंदर दृश्य दिखे, चमकदार रंग और फूल जैसी आकृति फिर अचानक ही तन में विभिन्न गतियाँ होने लगीं. कभी आगे-पीछे, कभी दायें-बांये फिर गोल-गोल तेजी से घूमने लगा. सारी आवाजें जैसे कहीं दूर घट रही हों. काफी देर तक बैठ रही, फिर एक ऐसा विचार आया जिससे सारा ध्यान टूट गया, कपड़े धोने का विचार. फिर आँख स्वतः ही खुल गयी. कोर्स के टीचर को उसने ‘श्रद्धा सुमन’ पुस्तिका की एक प्रति भेंट की है, वह अवश्य पढ़ेंगे. आज बंगाली सखी अपने बेटी के विवाह का कार्ड देने आयी.


Tuesday, July 4, 2017

बोगेनविलिया का पेड़



सदा खुश रहने के लिए बुद्धि को स्वच्छ रखना है. बुद्धि स्वच्छ हो तो उनके कृत्य भी स्वच्छ हो जाते हैं. बुद्धि को स्वच्छ रखने के लिए ‘मेरे’ के भाव का  का त्याग करना है. यहाँ सब कुछ मिला हुआ है, पहले देह फिर परिवार तथा फिर वस्तुएं ! सब कुछ परमात्मा का ही है. जितना-जितना उनका मोह घटेगा, प्रेम बढ़ता जायेगा. वे जब यह स्वीकार करना सीख जाते हैं, तब सारा फ़िक्र परमात्मा को दे देते हैं. आज टीवी पर सुंदर प्रेरणादायक वचन सुने, कोई दक्षिण भारत के संत थे-

Bring powerful completion in yourself and then every day, when you wake up, looks like Shiva is creating new world. When we are complete everything radiates completion, whatever we touch. When one is incomplete inside he or she cannot see the incompletion around him. We can change from karmic life to Avatar life. Move yourself to more and more of completion. Yoga gives us energy and little more we need we should from food. First rest should come from completion and little more from sleep. Prana is the greatest healer and completion is greatest rest.

शाम के सात बजे हैं. नैनी आज बगीचे से हरे प्याज लायी थी, उसी की रोटी बनाने का निश्चय किया है. आज दोपहर को बरामदे के सामने ही लॉन में लगा बोगेविलिया का पेड़ तेज हवा के कारण गिर गया. पहली बार गिरा तो वह घर के अंदर थी. माली को बुलवाकर खड़ा करने को कहा. एक घंटे बाद बाहर गयी तो एक बांस के सहारे खड़ा था. वह अक्सर वहीं बैठकर चाय पीती है. दोपहर को रोज की तरह वहाँ जाकर बैठी तो कुछ ही देर में पेड़ फिर गिर गया. वह उसके नीचे चाय के कप सहित दब गयी. मगर ‘जाको राखे साईंया मार सके न कोई’, न चाय के कप को कुछ हुआ न ही उसे. थोड़े से प्रयास से बाहर निकल आई. बाद में पुनः उसे अच्छी तरह से खड़ा किया गया. बहुत दिनों बाद आज पौधों में पानी भी खुद दिया. शाम को बच्चे भी आये, अब अगले बुधवार को आएंगे.

कल शाम को गुरूपूजा है उनके घर में, उसकी तैयारी शुरू कर दी है. फोन पर सभी को निमन्त्रण दिए. जून ने नये फोन खरीदे हैं उन दोनों के लिए, उन्हें जल्दी हो रही है कि नया सिम एक्टिवेट हो जाये. जिसे एक काम में जल्दी हो उसे हर काम में जल्दी होती है. उन्होंने दो दिनों से भगवद्गीता सुनना शुरू किया है. गुरूजी का छह सीडी का सेट है. जून भी सुन रहे हैं, पर उन्हें अभी संसार से मोहभंग नहीं हुआ है, सो बहुत दिल उसमें नहीं लगाते हैं. हरेक को अपनी गति से ही यात्रा करनी होती है. हरेक का मार्ग भी अलग होता है. आज टीवी पर गुरूजी को कहते सुना था, हरेक को शीघ्र विकास के लिए अपने जीवन में एक दिन पागलखाने में, एक दिन स्कूल में, एक दिन कोर्ट में तथा एक दिन अस्पताल में बिताना चाहिए. वह स्कूल तथा अस्पताल तो जा सकती है पर बाकी दो में जाना मुश्किल है. कल बहुत दिनों या कहें वर्षों बाद मामीजी से फोन पर बात की. परसों होली है, पर उन्हें इस वर्ष होली नहीं मनानी है. जैसे राखी मनाने का उत्साह नहीं था वैसे ही होली मनाने का भी भी मन ही नहीं है. पिताजी के बिना जैसे सब त्योहार अपनी आभा खो चुके हैं.



Monday, July 3, 2017

आत्मा की ज्योति


बेहोशी में जो भी बीतता है, वह बेहोशी को मजबूत करता है. होश में जो भी बीतता है वह होश को मजबूत करता है. वे जागकर देखें तो हरेक कृत्य पूजा हो जाता है. उनका हर क्षण सार्थक हो जाता है. आज बहुत दिनों बाद एक सखी से बात हुई, वही जो अपनी परेशानी तो बताती है पर कोई भी सुझाव देने पर उसे न मानने में अपनी मजबूरी भी झट बता देती है, तब उसे लगता है जैसे वह अपनी तकलीफ में भी खुश ही है. नन्हे से बात नहीं हो पायी, शायद वह काफी व्यस्त है. सुबह पिकेटिंग थी, ड्राइवर ड्यूटी पर नहीं आये, वह स्कूल भी नहीं जा पायी. जून इस समय नन्हे की मित्र के घर पर होंगे दिल्ली में.
किसी पक्षी की आवाज आ रही है, जो रात्रि को बोलता है अक्सर. आज सोने में कुछ देर हो गयी है, रात्रि के पौने दस बजे हैं, जून कल आ जायेंगे, फिर सब कुछ समय पर होगा. वैसे तो कल महिला क्लब कमेटी की मीटिंग उनके घर में है, देर हो सकती है. सुबह उठी तो कुछ देर यूँही आँख बंद करके बैठ गयी, एक उपस्थिति का अनुभव इतने करीब होता है कि अब ध्यान करना भी नहीं होता. ओशो को सुना, मन को साक्षी होकर देखना आ जाये तो सारा दुःख समाप्त हो जाता है. मन नहीं रहता तभी साक्षी का अनुभव होता है. आज शाम को भी भीतर कुछ घटा, जब एक सखी ने ‘नारायण हरि ॐ’ भजन गाया, वह बहुत अच्छा गाती है. मीटिंग ठीक से हो गयी, इस महीने अभी तक मृणाल ज्योति नहीं जा पाई है, जब भी जाने में देर हो जाये तो जैसे कोई टोकता है भीतर से.

आत्मा की ज्योति पर पहरे लगे हैं
ख्वाहिशों की सेना के
जो अधूरी हों तो धुआं देती हैं
पूरी हों तो छिपा देती हैं  

इतवार को उनके लॉन में आसपास के सर्वेन्ट्स के लिए ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘नव चेतना शिविर’ होने वाला है. एओल की टीचर से बात की तो वह काफी उत्साहित जान पड़ीं. यकीनन वे सभी को सद्गुरू का ज्ञान बता पाएंगी. सद्गुरु कहते हैं, जिससे भौतिक तौर पर कल्याण हो और मोक्ष भी मिले वही धर्म है. भक्ति, युक्ति, मुक्ति और प्राप्ति धर्म के अंग हैं. साधना ही वह चार्जर है जिससे आत्मा की बैटरी परमात्मा से जुड़ी रखनी है, विश्वास रूपी सिम कार्ड लगाना है और रेंज के भीतर रहना कृपा का पात्र बनना है. तब परमात्मा से कनेक्शन बना रहेगा. सरलता, सहजता ही सिद्धावस्था है. संत को कोई पराया नहीं लगता, वह स्वयं पूर्ण है और दूसरों को आशीर्वाद देता है. सुख-दुःख में सम रहना आ जाये और सबके साथ समान भाव से व्यवहार हो तो जानना चाहिए, भीतर प्रेम जगा है. सबको अपना देखने की कला ही ‘जीवन जीने की कला’ है. ध्यान, सेवा और सत्संग तब जीने का अंग बन जाते हैं.
काशी में इसी महीने गुरूजी आ रहे हैं, यहाँ भी आने की बात तो है. परमात्मा ही सदगुरुओं के रूप में धरती पर आते हैं. सुबह रामदेव जी के प्रेरणात्मक वचन सुने तो मन जैसे तृप्त और आनंदित हो गया. उनके जीवन में कितनी खुशियाँ भर गयी हैं ज्ञान के आलोक से जो संतों का दिया हुआ है. नन्हे ने कहा है, दशहरे पर वे सब मैसूर जा सकते हैं, सेलम भी जा सकते हैं एक दिन.   


Friday, June 30, 2017

चित्र कथाओं का संसार


परसों सुबह-सुबह एक अजीब स्वप्न देखा. एक कुत्ता उसके सामने बैठा है और बातें ही नहीं कर रहा, एक से एक फ़िल्मी गीत गा रहा है. नींद खुली उससे पहले उसने गाया, धीरे से जाना बगियन में, ओ..भंवरे धीरे से जाना..बिलकुल किशोर कुमार के स्टाइल में. कितनी बार उसने अन्य योनियों को देखा है स्वप्नों में. पिछले दिनों एक बार माँ-पिताजी को देखा था स्वप्न में, आजकल उनकी बात चल रही है, ब्लॉग में, शायद इसी कारण.

आज उन्होंने जनरल हेल्थ चेकप करवाया है, कल सुबह रिपोर्ट मिल जाएगी. एक उम्र के बाद इस तरह की जाँच करवाते रहना चाहिए, कितनी बार सुनने को मिलता है, फलां को गठिया है, किसी को दिल की बीमारी है, समय रहते उन्हें पता ही नहीं चल पाता. उसे भी पैरों में हल्की जकड़न सी महसूस हुई, हल्का खिंचाव सा, बढती हुई उम्र का तकाजा है या कुछ और बात है, पर मन वैसे ही है प्रफ्फुलित और कुसुमित ! कल लाइब्रेरी से चार चित्रकथाएं लायी, बुद्ध, टैगोर, शिव और भगवद् गीता, कितने सुंदर चित्रों और कथानक के साथ ये पुस्तकें तैयार की गयी हैं. आज असम बंद है, राहुल गाँधी गोहाटी में आये हैं, सम्भवतः उन्हीं के विरोध में. एक व्यक्ति ने कल गोहाटी में राजनितिक विरोध के चलते स्वयं को जला लिया, लोग किस सीमा तक चले जाते हैं. कल स्कूल में बच्चों को शिव का भजन अच्छा लगा, उन्हें बहुत कुछ सिखाया जा सकता है. उसे लगता है आर्ट एक्सेल कोर्स की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. वे वैसे भी जुलाई-अगस्त में बैंगलोर जाने की बात सोच रहे हैं. उसे हर विरोध के लिए तैयार होना होगा. हर विरोध अंततः मान ही लिया जाता है अर्थात समाप्त हो जाता है.

परसों मीटिंग में कवयित्री सम्मेलन का आयोजन अच्छा रहा. कल शाम वे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर गये, शिवरात्रि उत्सव मनाया गया वहाँ. आज सुबह उसने एओएल की एक टीचर को फोन किया, वह सोच रही है सर्वेंट लाइन के सभी वयस्कों के लिए एक कोर्स कराए. बच्चों को तो वह सिखा देती है पर बड़ों को भी जानकारी होनी चाहिए. उन्होंने एक अन्य टीचर से बात करने को कहा है. कल शाम जून के एक कनिष्ठ सहकर्मी के यहाँ गये वे. घर अच्छा लगा, ज्यादा सामान नहीं है, साफ-सुथरा सा. गृह स्वामिनी ने झटपट आलू-पूरी व पकोड़े बनवाये, कस्टर्ड शायद बना रखा था. उसे यह सब खाने का अभ्यास नहीं है, पर शिष्टता वश कुछ खाया.

मार्च का प्रथम दिन..देखते-देखते जैसे गर्मी का मौसम भी आ गया है, कमरे में गर्मी का अहसास हो रहा है. अभी से पंखा चलाकर बैठना पड़ रहा है. आज गर्मी की सब्जियों के बीज भी लाये, माली ने भिन्डी के बीज भिगोकर रखने को कहा. जून के दफ्तर में वाहन कल से ठीक से नहीं चल रहे हैं. कुछ लोगों ने कंपनी में नौकरी न मिलने पर शिकायत दर्ज कराने के रूप में वाहनों पर पत्थर मारने शुरू कर दिए थे. सोमवार तक सम्भवतः हालात ठीक हो जायेंगे. जून का दिल्ली से फोन आया, वह आज  ही गये हैं, नन्हे से बात हुई, वह लौकी की सब्जी बना रहा था, फुल्के बनाने वाला था. कितना अच्छा है कि वह भोजन बनाने के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है.   


Thursday, June 29, 2017

स्वप्नों का संसार


परसों सुबह पुनः दो स्वप्न देखे, एक में कोई व्यक्ति बाँह में सूई के द्वारा कुछ डाल रहा है, कई लोग हैं, उनमें से एक वह भी है ऐसा कुछ भास हुआ, दुसरे में मृत्यु का अनुभव हुआ, अब दूसरा स्वप्न जरा भी याद नहीं है, पर यह ज्ञात हुआ था कि इस तरह मृत्यु हुई थी. पिछले जन्मों की स्मृतियाँ भी हो सकती हैं ये. परमात्मा ही जानता है. आज सुबह एक स्वप्न में समय बता रही थी कि किसी ने कहा, दस पैंतालीस नहीं दस तिरालिस और नींद खुल गयी. उनके घर का नम्बर तक उसे पता है, उनकी चेतना से कुछ भी छिपा नहीं है, आखिर वह स्वयं ही तो हैं !

फिर छह दिनों का अंतराल, कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह स्नानगृह में है. एक ऊर्जा गले तक चढ़ती है, थोडा भय लगता है पर वह स्वयं को तैयार कर लेती है, पुनः एक ऊर्जा चढ़ती है और उसके बाद होश नहीं रहता, फिर अचानक एक सुंदर चित्र दीखता है, फिर तो एक के बाद एक चित्रों की श्रृंखला शुरू हो जाती है. रंगीन चित्र थे, कला कृतियाँ थीं, जैसे कोई टीवी देख रहा हो. स्वप्न उनके मन में छिपी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं. ध्यान का गहन अनुभव जागृत में नहीं हुआ सो स्वप्न में कुछ हो गया !

कल रात्रि कोई स्वप्न नहीं देखा, ध्यान की स्मृति आती रही. परमात्मा उस पर अवश्य ही नजर रखे हैं. अभी कुछ देर पूर्व सद्गुरू को बहुत दिनों बाद पत्र लिखा. उन्हें अपने प्रति ईमानदार होना चाहिए, साधना का यह पहला सूत्र है. भीतर जो कुछ भी चल रहा है उसका साफ-साफ पता होना चाहिए. अतीत में जो भी हुआ वह स्वप्न मात्र है. संस्कारों के वश होकर जो भी किया उसको अब बदल नहीं सकते पर अब जो हर क्षण हो रहा है वह होश में रह कर हो. क्लब की पत्रिका छप कर आ गयी है. एक लेख की लेखिका के नाम के आगे भूल से डॉ लिखा गया है, उनसे बात की, पहले तो वह कुछ नाराज दिखीं फिर संतुष्ट हो गयीं. अगले हफ्ते क्लब की मीटिंग में कवियत्री सम्मेलन का आयोजन करना है. सुबह नैनी ने कुछ माँगा तो उसने ले लेने को कह दिया, उसे शायद अच्छा लगा हो, अपने आप ही कुछ काम कर दिए, बिना कहे ही. उसके ससुर के झगड़े से घर के सभी लोग परेशान हो गये हैं. उसे उनके प्रति सहानुभूति होती है. मन के भीतर न जाने कितने संस्कार दबे पड़े हैं, खुद को भी आश्चर्य होता है. परमात्मा हरेक के हृदय में है. वह उसे हर तरह के बंधन से मुक्त देखना चाहते हैं. अहंकार की हल्की सी छाया भी न रहे. मन बिलकुल सपाट नीले आकाश सा हो जाये निरभ्र..निर्मल..तभी तो होगा उसका पदार्पण !

कल शाम को गुरु माँ का अद्भुत प्रवचन सुना. सभी जगे हुए एक ही बात कहते हैं. उनके भीतर जब चैतन्य की शिखा अखंड जलने लगती है, कोई भी घटना उसे कंपाती नहीं, वह स्वयं भी मन, बुद्धि के रूप में व्यर्थ ही नहीं चुकती, तब ही भीतर अखंड प्रेम का साम्राज्य छा जाता है. वही सत्य है, वह अबदल है, सारे द्वंद्व तभी समाप्त हो जाते हैं जब सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, सारी चाहें गिर जाती हैं. प्रकृति का खेल समाप्त हो जाता है, आत्मा निसंग हो जाती है, कैवल्य का अनुभव घटता है. द्रष्टा भाव में जो टिक जाता है उसके लिए जगत का क्रिया कलाप एक खेल सा ही जान पड़ता है. रात्रि को फिर कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं पड़ता. सारे स्वप्न अधूरी इच्छाओं के कारण ही जगते हैं.


Wednesday, June 28, 2017

या देवी सर्वभूतेषु


परसों रात्रि एक स्वपन देखा जिसमें एक छोटा बच्चा जो चाय की दुकान पर काम करता है, झिड़कियां खा रहा है, लगा किसी जन्म में वह ही तो नहीं थी यह, इसीलिए उसे ऐसे बच्चों की तरफ सहज प्रेम झलकता प्रतीत होता है अपने भीतर. एक दिन और एक स्वप्न में एक लडकी को स्वयं अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारते देखा था. उन्होंने कितने जन्मों में न जाने कितनी गलतियाँ की हैं. हर गलती स्वयं को  कष्ट देना ही तो है. कल रात्रि का स्वप्न अद्भुत था, सुंदर रंग और आकृतियाँ तो दिखी हीं, एक श्वेत वसना देवी का आशीर्वाद भी मिला. देवी की आकृति हिली, उसका मुख खुला और हाथ से एक श्वेत ही दंड निकला, जिससे उससे निकलती ऊर्जा ने स्पर्श किया और भीतर कैसा तो अनुभव हुआ. कल वसंत पंचमी पर अपने घर को मिलाकर पांच स्थानों पर देवी सरस्वती के दर्शन किये. एक स्कूल में तो मूर्ति बहुत सुंदर थी और मृणाल ज्योति में मुस्कुराती हुई प्रतीत हुई, सम्भवतः इसी कारण वह स्वप्न देखा. दृष्टा ही दृश्य बन जाता है, इसका अनुभव अब दृढ़ होने लगा है. वे ही अपने सुख-दुःख के निर्माता हैं, यह ज्ञान मुक्त करने वाला है,. इसीलिए दृष्टा भाव को इतना महत्व दिया गया है.

वह आत्मा है, यह देह उसका घर है, मन व बुद्धि उसके साधन हैं, यह बात अब कितनी स्पष्ट दिखने लगी है. ऊर्जा का अहसास हर क्षण बना रहता है. कल शाम जून को भी इसका परिचय कराने का प्रयास किया, पर कोई जब तक अपने भीतर से ही न चाहे, बाहर से कोई भी किसी को कुछ बता नहीं सकता. सद्गुरू ऐसा कर सकते हैं पर उन्हीं के लिए जो इसके इच्छुक हैं. हरेक ही अवश्य एक न एक दिन अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा. आज बादल हैं आकाश पर, सुबह जब वे टहलने गये वातावरण इतना सुखद था कि चालीस मिनट जैसे चार मिनटों में बीत गये. सुबह आकाश सात्विक होता है, धरती भी रात्रि विश्राम के बाद शांत होती है और जीव प्रसन्नता से भरे. स्नान करके जब तुलसी व सूर्य भगवान को जल चढ़ाने गयी तो बादल थे, आकाश को निहारते समय वृक्षों व टहनियों के पीछे ऊर्जा की श्वेत आकृतियाँ भी दीख पड़ीं, बादलों के मध्य भी प्रकाश की झलक थी.

सद्गुरू कहते हैं, मूलतः सब पूर्ण हैं, सभी को अपने उसी स्वभाव को पाना है. अंतर की पूर्णता के क्षेत्र में अनुभव किया हर विचार सत्य हो जाता है. पूर्णता ही नित्य सत्संग है, जो भी उन्हें प्राप्त करना है, वह पूर्णता के विकास से मिल जाता है. जब अभावों के भूत सताने लगें, जब विचार अधूरे हों तब उसी की शरण में जाना है जो पूर्ण है. परमात्मा हर जगह है, हर समय है, वही सब रूपों में प्रकट हो रहा है. वास्तविक संपदा वैराग्य और भक्ति है.