Monday, April 24, 2017

सूरज का लाल गोला

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नये वर्ष का चौथा दिन ! कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस वक्त भी बादल बने हैं. जून आज मुम्बई गये हैं, कल कोचीन जायेंगे. वे यात्रा के नाम से बहुत प्रसन्न होते हैं, उन्हें नये-नये स्थान देखना भी भाता है और यात्रा की परेशानियाँ जरा भी परेशान नहीं करतीं. महर्षि अरविन्द पर लिखी एक पुस्तक बंगलूरू की उस दुकान से खरीदी थी, जहाँ किताबें ही किताबें पड़ी थीं, सीढियों पर भी किताबें. महान योगी थे वे. संस्कार में आजकल सद्गुरु का पतंजलि योगसूत्र पर बोला भाष्य प्रसारित हो रहा है. बहुत सी बातें स्पष्ट हो रही हैं. कितना कुछ जानने को है अभी, अनंत है वह परमात्मा..वे तो कुछ भी नहीं जानते..कई बार ऐसा लगता है जैसे पहले वह जो जानती थी अब उतना भी नहीं जानती. जीवन एक रहस्य है जो जाना नहीं जा सकता, जीया जा सकता है. शाम गहराती जा रही है, पांच भी नहीं बजे हैं अभी दस मिनट शेष हैं.

ठंड आज कुछ ज्यादा है, स्वेटर के भीतर त्वचा और त्वचा के भीतर हाड़ों को छूती हुई. सुबह आसमान पर बादल थे या कोहरा, सब श्वेत था मध्य में लालपन लिए नारंगी सूरज का गोला आकाश में ऊपर तो चढ़ आया था पर अभी तक बालसूर्य सा लग रहा था. उसे देखकर मन कैसा उल्लसित हो उठा, जैसे परमात्मा के माथे पर लगा टीका हो या..एक और उपमा उस वक्त ध्यान में आई थी पर अब मन से पुंछ गयी है. कई बार ऐसी सुंदर पंक्तियाँ मन में कौंध जाती हैं पर तब लिखने का साधन नहीं होता. एक सखी का फोन आया था, भावुक है, कलाकार है, पर बोलती कुछ ज्यादा है. कल क्लब के वार्षिक उत्सव की कला प्रदर्शनी में उसकी कृति भी लगायी जाएगी, उसे आमंत्रित किया है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की, बार-बार फोन कट जाता था, पर वह कोशिश करते रहे जब तक बात पूरी नहीं हो गयी, जबकि वह एक बार कट जाने के बाद दुबारा प्रयास नहीं करती, उनसे सीख लेनी चाहिए. कल एक परिचिता आयीं थीं, सेंट जेवियर्स स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी कुछ असमिया कविताओं का हिंदी अनुवाद उसे देखने के लिए देकर गयी हैं. भविष्य में हिन्दी में यह किताब छपेगी, जिसमें भूपेन हजारिका, मामोनी और अब्दुल कलाम के लिए लिखी कविताएँ हैं.


आज धूप चमचमाती हुई निकली है. कल बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी की मंगनी तय हो गयी है, लड़का बंगाली है. उसने सोचा उसकी बंगाली सखी को सुनकर अच्छा लगेगा. आज सुबह टहलने गयी तो आई पौड पर मृत्यु पर प्रवचन सुना, कितनी अद्भुत व्याख्या करते हैं सद्गुरु ! टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. परमात्मा का बखान करते-करते थकते ही नहीं, गाए ही चले जाते हैं. इलाहबाद में कुम्भ का मेला लगने वाला है, करोड़ों लोग आएंगे उस परमात्मा का गुणगान करने ही तो. परमात्मा घट-घट वासी है पर वह नित नूतन है, बासी नहीं है. कल रात छोटे भाई को सुंदर प्रवचन देते सुना, अद्भुत स्वप्न था वह. रात को ध्यान करते-करते सोयी थी. अभी उससे बात हुई, कल रात उसे भी स्वप्न आया कि वह किसी को समझा रहा है बहुत विस्तार से, आश्चर्य है और नहीं भी, परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं ! भाई ने कहा वह इस बारे में ज्यादा बात करेगा तो उसकी आँखों से अश्रुपात होने लगेगा, उसने कहा, उसका यह तबादला भी कृपा से हुआ है, वह अपने सद्गुरु से जुड़ा है और वह उसे दिशा दिखाते हैं. सचमुच उसका समर्पण कहीं ज्यादा है.

Saturday, April 22, 2017

जीवन और मृत्यु

दिसम्बर का तीसरा सप्ताह और वर्षा होने के आसार...ठंड बढ़ाने का पूरा सरंजाम प्रकृति ने कर दिया है. आज सविता देव नहीं दिख रहे हैं, सूर्य विकास की प्रेरणा देता है, अपनी ओर बुलाता है. परमात्मा भी उन्हें अपनी ओर खींचता है, प्रेरणा देता है. वह उन्हें खुद सा बनाना चाहता है पर प्रयास उन्हें करना होगा. हाथ उठाना होगा, वह तो हाथ थामने को तैयार ही है. बादलों के कारण टीवी पर प्रसारण भी अटक रहा है. क्रिसमस और देव दीवाली पर उसे कविता व आलेख लिखने हैं. सभी को आभार के छोटे छोटे संदेश लिखने हैं जिनसे यात्रा वे मिले हैं. नये वर्ष के लिए नई कविता भी..जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए भी, पर जाते-जाते यह वर्ष कैसी दुखद घटना से सारे देश को हिला गया है. सुबह उठकर समाचारों में जब उस वीभत्स घटना के बारे में सुना तो मन कैसा भारी हो गया था. कुछ शब्द अपने आप ही निकल पड़े.

नारी की पूजा करने वाला
यह देश..
आज शर्मसार है !
जैसे चढ़ाया गया हो
किसी को
क्रूस पर
व्यर्थ न जाये
उसका भी बलिदान
मांग रही है इंसाफ
जिसके लहू की एक-एक बूंद

कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नन्हा नृत्य कर रहा है. दोनों पैरों को बहुत तेजी से तरंगित कर रहा है और अंत में नटराज की सुंदर मुद्रा में खड़ा हो जाता है, मंत्रमुग्ध करने वाला अद्भुत रूप था उसका..और भी कई स्वप्न देखे पर यही याद है. दीदी ने एक शुभ समाचार दिया, छोटी भांजी की पुनः मंगनी हो गयी और अब वह आस्ट्रेलिया में रहेगी अपने मंगेतर के साथ, जो स्वयं भी तलाकशुदा है. दोनों के जीवन में पुनः प्रेम का फूल खिलेगा.

दामिनी की अंततः मृत्यु हो गयी. सोलह दिसम्बर की रात से वह मौत से लड़ रही थी, जिन्दगी हार गयी, मौत जीत गयी, शायद उसका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता बना जाये. सरकार को जागना ही होगा आये दिन होने वाली ये घटनाएँ अब अनदेखी नहीं की जा सकतीं. महिलाओं को आतंक के वातावरण में जीने के लिए अब विवश नहीं किया जा सकता, उन्हें वस्तु की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. नारी के व्यक्तित्त्व को पनपने का मौका मिलेगा तो वह भी सबल बनेगी. अख़बार में महिलाओं के उत्पीड़न के समाचार पढ़कर मन कितना बेचैन हो जाता है.

कैसे कहें नये वर्ष की शुभकामनायें
जबकि सामने बिछी है जाते हुए वर्ष की
खून से लथपथ देह
पिछले वर्ष भी तो यही कहा था
पर नहीं रुका आतंक नहीं थमा मौत का तूफान
लील गया निर्दोष स्कूली बच्चों को
कभी राजधानी की सड़कों पर
अस्मत मासूमों की
इतना बेरहम हो गया है इन्सान
लाठियों, जुलूसों और विद्रोह की भाषा
बोलनी पड़ती है अपनों के खिलाफ..

नहीं तो कैसे मांगे इंसाफ और किससे ..?

Friday, April 21, 2017

विशालाक्षी मंडप


आज हफ्तों बाद लिख रही है. कितना कुछ है मन में जो अनकहा रह गया है. जून के मित्र की पुत्री के विवाह में सम्मिलित होने गये थे वे बनारस. विवाह सारनाथ में था, रात देर से लौटे, पर बिना ब्याह देखे, बारात देर से आयी. जून इस बार अपने एक पुराने मित्र से लगभग तीस वर्षों बाद मिले. ‘गंगा महोत्सव’ देखा और ‘देव दीपावली’ में हजारों दीपकों का प्रकाश, गंगा का तट जैसे दिव्य आलोक से भर गया था. कितना पैदल चलना पड़ा था, हजारों की भीड़ घाट की ओर जा रही थी. मुख्य आयोजन स्थल गंगा के पानी में ऊंचे मचान पर बना था, आरती का मंच अलग था. पिताजी बनारस में रह गये और व बैंगलोर चले गये.

बैंगलोर में नन्हे का घर, वह बहुत परिपक्व लग रहा था इस बार, खुश व शांत भी. उनका बहुत ध्यान रखा. नया बेड लाया, और भी कई सामान, अलमारी का एक खाना भी उसने खाली करके रखा था, जैसे वह करती है और बचपन से वह देखता आ रहा है. अपने मित्रों का भी बहुत ध्यान रखता है. उसे इतनी अच्छी तरह से भोजन परोसते देखना भी अच्छा लगा, चाय बनाना भी सीख गया है पर चाय पत्ती कुछ ज्यादा डालता है. उसने बताया एक बार घर में चोर आ गया था तो दौड़ कर उसने उसका पीछा किया, वहीं एक फिल्म भी देखी, ‘लाइफ ऑफ़ पाई’ बहुत पहले किताब पढ़ी थी. प्रकृति के मोहक व भयानक रूप के बहुत सुंदर दृश्य थे. नन्हे को याद था कि उसने उसे यह कहानी सुनाई थी.

उसके बाद आश्रम में बिताये दिन. बुहारी लगाने की सेवा और वह चमत्कार. गुरूजी के न होने पर भी उनकी उपस्थति का अहसास. आश्रम के कुत्तों का स्नेह प्रदर्शन, कोर्स के दौरान आश्रुओं की बाढ़ व नृत्य की छटा..सब कुछ कितना अद्भुत था तब. उस दिन सुबह उठे तो मन में उत्साह था, आज आश्रम जाना है. दोपहर को टैक्सी बुलाई थी. रास्ते में अपना निर्माणाधीन घर देखा. आम के एक पेड़ पर अम्बियाँ लगी थीं, सर्दियों में आम देखकर मन अचरज से भर गया. आश्रम पहुंचे और रजिस्ट्रेशन कराया. उन्हें बुद्धा में रहना था. कमरे में दो अन्य जन थे. एक महिला भूटान से आई थीं केवल आश्रम देखने, वैसे वे लोग लायंस क्लब के वार्षिकोत्सव में भाग लेने आये थे. भूटान में आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रति जानकारी ज्यादा नहीं हैं इसके लिए भी चिंतित लगीं. दूसरी गुजरात की एक नौकरीपेशा युवती थी, जो अकेलेपन के अपने भय से मुक्त होने के लिए यह कोर्स कर रही थी. जून भी उसी बिल्डिंग में दूसरे कमरे में थे. अगले दिन सुबह तैयार होकर वे महावीर हॉल पहुँच गये. छह बजे से व्यायाम की कक्षा शुरू हुई.  योग शिक्षक संजयजी थे, हंसमुख व प्राणवान व्यक्ति..पता ही नहीं चला, कैसे समय बीत गया. सेवा काल में विशालाक्षी मंडप में उसने झाडू लगाया, जैसे अपने घर की सफाई कर रही है ऐसा ही भाव मन में उठ रहा था. कुछ वर्षों बाद वे जब बैंगलोर में रहेंगे, तब भी वह इसी तरह आश्रम में आकर सेवा का कार्य करेगी, ऐसे विचार भी मन को आनंदित कर रहे थे. दिन में कोर्स चलता रहा. ध्यान, संगीत, वीडियो और मध्य में विश्राम. प्रकृति के सान्निध्य में कुछ पल, वे दूर तक घूमने गये, आश्रम के बाहर राधा कुञ्ज है उसे देखा फिर सुमेरु मंडप भी. पंचकर्म के स्थल के पास एक झील है, उसके भी दर्शन किये. शाम को अँधेरा होते ही विशालाक्षी मंडप रौशनी में जगमगा उठा था. वे सामने लॉन में बैठकर उसकी शोभा निहारते रहे, हर दिन ऐसा ही हुआ, दो दिन दो कुत्ते पास आकर बैठ गये, स्नेह जताते हुए, बिलकुल निकट, उनकी आँखों में जैसे कोई कुछ कह रहा था, आत्मा की भाषा क्या होती है तभी जाना. फिर वापसी में गोहाटी में एक सखी के साथ बिताये वे पल. पिताजी ट्रेन से वहीं आ गये थे, फिर वे सभी मिलकर घर लौट आये, यह सभी कुछ स्मृति पटल पर अंकित हो गया है.


Tuesday, April 18, 2017

सुबह की सैर


आज सुबह टहलने गयी तो पैरों में अचानक ताकत भर गयी थी. कुछ देर दौड़ कर बाकी वक्त तेज चाल से भ्रमण पूर्ण किया. घर आकर विश्राम किया, मन खाली था. जहाँ कुछ भी नहीं रहता, सारे अनुभव चुक जाते हैं, वहीं कैवल्य है, वहीं निर्वाण है. सारे अनुभव मन को ही होते हैं. मन एक मदारी है, वह ढेर से खेल दिखाए चले जाता है, लुभाए चले जाता है. लेकिन जहाँ कुछ भी नहीं रहता, दूसरा कोई रहता ही नहीं, मुक्ति है. गुरूजी कहते हैं, अच्छे से अच्छा अनुभव भी बाहर ही है. वहाँ द्वैत है, अब कुछ देखना नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना नहीं, बस होना है..सहज अपने आप में पूर्ण..मौन ! इस मौन के बाद जो शब्द उठेंगे वह जीवन को उत्सव बना देगें..अर्थात जीवन को उत्सव बना देखने की कामना तो भीतर है ही..कैसा चतुर है मन..एक ही कामना में सब कुछ मांग लेता है और फिर अलग हो जाता है..

आज का भ्रमणकाल कल से अलग था. हरियाली, फूलों की लाली, मनहर मनभावन सुख वाली. नवम्बर की सुबह कितनी सुहानी होती है. आकाश पर रंगों की अनोखी चित्रकारी, वातावरण में हल्की सी ठंडक..पंछियों का कलरव और हवा इतनी हल्की सी..भीतर कोई प्रेरणादायक वचन बोलने लगा. बहुत सारे संशय दूर हो गये. उन्हें साक्षी भाव रहना है, पूर्व संस्कार वश यदि कोई विकार जगता है तो साक्षी भाव में रहने के कारण उसका कोई असर नहीं होता. कैसी अनोखी शांति है इस ज्ञान में. शाम को मीटिंग है, कल एक सखी का जन्मदिन है. सभी कुछ कितना सरल है. वे अपनी पूर्व धारणाओं और पूर्वाग्रहों के कारण जटिल बना लेते हैं. जीवन एक गुलाब की तरह जीना चाहिए या एक संत की तरह..निर्लिप्त..सदा मुक्त !

आज बदली है, ठंडी हवा भी बह रही है. कल आखिर कसाब को फांसी हो गयी. उसकी कहानी इस जन्म की तो खत्म हो गयी, लेकिन अगले जन्म में उसे जाना ही होगा. सुबह साढ़े तीन बजे ही नींद खुल गयी, उठी नहीं, एक स्वप्न चलने लगा. नन्हे को देखा, कल रात माँ, पुत्र के मिलन के जो डायलाग सुने थे, वे भी कहे, सुने, तभी भीतर विचार आया God loves fun वह परमात्मा उन्हें नाटक करते देखकर कितना हँसता न होगा ! सुबह वे साथ ही घूमने गये, बातचीत हुई ज्यादा, घूमना हुआ कम, वापस आये तो माली आ गया था.





Monday, April 17, 2017

पितरों का लोक


कल शाम उलझन भरी थी, परमात्मा ही उस रूप में आया था. “जब जैसा तब वैसा रे”. अंदर की ताकत पैदा करनी है, बाहर कर्म करना है. उन्हें अपने पात्र को बड़ा बनाना है. कृपा की वर्षा प्रतिपल हो रही है, वे धन्यभागी हैं, कृपा हासिल करने का कोई अंत नहीं है. आज सुबह पौने चार बजे नींद खुल गयी, ‘यजुर्वेद’ का स्वाध्याय चल रहा है आजकल ‘ज्ञान प्रवाह’ में. परमात्मा की स्तुति सुनते-सुनते प्रातःकालीन कर्म करते हुए टहलने गयी तो मन में वही चिन्तन चल रहा था. लौटकर सूर्य देवता के सम्मुख ध्यान किया. अद्भुत दृश्य था, देखते-देखते बादलों के पीछे से नारंगी सूरज ऊपर उठने लगा और अचानक हवा चलने लगी. पेड़ झूमने लगे, सारा दृश्य स्वर्गिक प्रतीत हो रहा था. प्रकृति इतनी  सुंदर है, आज से पूर्व कहाँ ज्ञात था. परमात्मा चुपचाप अपना काम किये जाता है. मिट्टी से खुशबुएँ उगाता है, रंग बिखेरता है आकाश से. परमात्मा की महिमा सोचने लगो तो बुद्धि चकराने लगती है, उसमें तो बस डूबा जा सकता है, उसे तो बस महसूस किया जा सकता है. वह तो अपने भीतर जगाया जा सकता है, बल्कि यह भी वही करवाता है. आज सुबह टीवी पर ‘महादेव’ धारावाहिक देखा, फिर टिकट सेल करने निकली, दो बिके, शाम को फिर जाना है, इस तरह एक बुक खत्म करनी है, बल्कि हो ही गयी है. सभी महिलाओं ने कितने प्यार से बात की, सभी के दिल एक ही तो हैं, एक के यहाँ सुंदर पक्षी देखे, एक के यहाँ दरवाजे पर लगाने के लिए करटेन रोप का तरीका देखा. लोगों से उसे मिलना-जुलना है इसलिए ही परमात्मा ने उसे मुक्त किया है, अब समय है उसके पास !

उसने आज सुना सद्गुरु कह रहे थे, ‘श्रद्धा से किया जाने वाला कृत्य ही श्राद्ध है. शरीर जो सगुण है जब अनंत चेतना में समा जाता है तो सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर में वासना रह जाती है. ब्रह्मांड में रहते हैं तो पिंड की आशा रहती है पिंड में रहते हैं तो ब्रहमांड की. शरीर की वासना को पूर्ण करने के लिए ही पिंडदान किया जाता है. इसका अर्थ है उन्हें पुनः देह मिल जाये. मृतक को यदि लगे कि वह जल रहा है तो उसे दस दिन तक जल व तिल अर्पित करते हैं. उनकी पसंद की वस्तुएं भी देते हैं, बिना नमक के देते हैं, आत्मा को सुगंध मिलती है तो वह तृप्त हो जाती है. तृप्त करना ही तर्पण है. भाव यदि शुद्ध हो तभी लाभ होता है. पितरों से प्रार्थना करके सूक्ष्म जगत से उनसे संपदा व स्वास्थ्य भी मांगते हैं. उस लोक में पितरों का मार्ग सुगम हो इसकी प्रार्थना भी करते हैं और उनके द्वारा तृप्ति मिले इसकी कामना भी. जिन्हें देह नहीं मिली ऐसे पितृ भी होंगे, जिन्हें देह नहीं चाहिए ऐसे भी, दोनों के लिए प्रार्थना करनी है. कुछ ऐसे होंगे जिन्हें देह मिल गयी होगी उनके नये जीवन के लिए प्रार्थना करनी है.’ कितनी अनोखी है भारतीय संस्कृति ! उसने मन ही मन सद्गुरू को इस सुंदर ज्ञान के लिए प्रणाम किया और पितरों से प्रार्थना भी की.


आज दीपावली है, सुबह जल्दी उठे वे, रोज के सभी कार्य निपटा कर नर्सरी से फूलों के पौधे लाये, अब हरसिंगार के नीचे बैठे हैं, हवा बह रही है. कौन है जो इस शीतल पवन को डुला रहा है, कौन सी शक्ति है ? वृक्ष के नीचे कितना सुकून मिलता है इसका आभास आजकल होने लगा है. कल बाल दिवस है, वे मृणाल ज्योति स्कूल जायेंगे. बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार लेकर.

Friday, April 7, 2017

केसरिया बदलियाँ


परमात्मा हर पल उनके मन का द्वार खटखटाता है, वे कभी खोलते ही नहीं, वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है. वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है. चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है. जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी न करें, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है, चेतना एक ही है.  उन्हें अपने ‘होने’ की सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है. वे अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले. जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें. वे किस निमित्त हैं, वे किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में उनका भी योगदान हो, उनके पास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, वे उसके सहचर बन जाएँ. सन्नाटे में भी जो उनके साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो उनके निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है. आज सुबह चार बजे उठी, अकेले ही टहलने गयी, बाहर बगीचे में ध्यान किया, सूर्य की रौशनी में आकश और पेड़ किस अद्भुत तरीके से चमचमा रहे थे !

परमात्मा स्वयं को कितने रूपों में प्रकट कर रहा है, मानव देख नहीं पाता, आश्चर्य है, सुंदर वृक्ष, हरी घास, चहकते पंछी, उगता हुआ सूर्य, प्रातःकालीन शीतल सुगन्धित पवन सभी कुछ उसी की याद दिलाते हैं. उनके भीतर का आकाश अनंत शांति व निस्तब्धता भी उसी की याद दिलाते हैं. सारा जगत एक अलौकिक शांति से भर गया लगता है. इस जगत की हर शै उसी की लीला में सहभागी है. वे मानव ही स्वयं को पृथक मानकर उससे अलग हो जाते हैं !

आज से नया माली काम पर आ रहा है, अमर सिंह, जो सारे पंजाबी लोगों को एक ही मानता है, जैसे उन्हें सारे जापानी एक जैसे लगते हैं. सुबह सूर्य का लाल गोला दिखा पर बीस मिनट बाद ही दृश्य बदल गया, कोहरा आ गया, सूरज श्वेत हो गया था. अभी तक धूप नहीं निकली है, परमात्मा उसे रात को जगाने आता है, पर नींद और स्वप्न की दुनिया में मन कैसे खो जाता है. आज शाम को क्लब की मीटिंग है. बाएं तरफ की पड़ोसिन को-ओर्डीनेटर है, उसे फोन करके न आ पाने के लिए कहेगी.

जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा. ऐसी समाधि जिसे चाहिए जो सहज हो. समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं. समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है. जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया. कितने सुंदर शब्द उसने सुने आज सुबह..आज तीसरा दिन था, सूर्य देवता को अपना रूप बदलते हुए देखा. परसों चमचमाता हुआ बाल सूर्य देखा, कल कोहरे के पीछे श्वेत सूर्य और आज बादलों के पीछे छुपा सूर्य. अभी तक धूप में तेजी नहीं आई है !

एक नन्हे से बीज में जीवित रहने की प्रबल इच्छा होती है, कितनी बाधाएं पार करके वह अंकुरित होता है, पनपता है, वह मिटने को तैयार है तभी वह ‘होता’ है. आज सुबह चार बजे से पहले उठी. सूर्य देवता ने आज नया रूप धरा था. सलेटी बादलों में सुनहरी व केसरिया किरणों का जाल झांक रहा था. प्रकृति का रूप कितना मोहक है, उसके पीछे छिपे उस अव्यक्त चेतन के ही तो कारण, इस सुन्दरता को निहारने वाला भी तो वही चेतन है, वही इस अपार सौन्दर्य को जन्म देने वाला है और वही इसका चितेरा भी ! कल शाम मृणाल ज्योति से फोन आया, आज एक मीटिंग में जाना है. ॐ की ध्वनि आ रही है, पता नहीं कहाँ से अक्सर यह ध्वनि उसे सुनाई देती है, गम्भीर स्वरों में कोई ॐ कहता है !   



Thursday, April 6, 2017

नवम्बर की धूप


पिछली तीन रात्रियों को ठीक एक बजकर सैंतालीस मिनट पर कोई उसे उठा देता है. उसके बाद भीतर से कोई कहता है जीवन अब बदल जायेगा. पूर्ववत् नहीं रहेगा. एक ख़ुशबू की परत, चारों ओर लिपटी रहती है. उनके भीतर कितने खजाने हैं, रंगों, खुशबुओं और संगीत के खज़ाने ! उसका मन एक अनोखी शांति से भर गया है, मन उसका नहीं रहा इसलिए कोई अदृश्य सत्ता ही अब सूत्रधार है. परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, वह मृणाल ज्योति की डोनेशन बुक लेकर जाएगी.

कल रात एक स्वप्न देखा, एक कार में वह बैठी है और उसे कुछ ही दूर जाना है पर उस कार में न स्टीरियंग है न ब्रेक. वह निर्धारित स्थान से आगे चली जाती है, सड़क आ गयी है जिस पर सामने से तेज गति से आते वाहन हैं. उसे डर लगता है पर गाड़ी बिना टकराए मुड़ कर किनारे से निकल जाती है.

कल रात कोई स्वप्न नहीं देखा, देखा भी हो तो स्मरण नहीं है. सुबह ठीक चार बजे किसी ने उठा दिया. वह कोई जो उसके भीतर रहता है, वह उसे एक पल को भी नहीं भूलता, वही वह है अब, तो स्वयं को कोई कैसे भूल सकता है. हरसिंगार के वृक्ष के नीचे की छाया में उसकी ही अनुभूति है, उसकी ही ख़ुशबू है जो चारों ओर से घेरे हुए है. सूखे पत्तों की आवाज में भी वही है, हवा की सरसराहट में भी वही, सामने हरी घास पर बिखरी धूप में उसकी ही चमक है, फूलों के रंगों में, शीतल हवा के स्पर्श में वही तो है, अब शरद काल आ गया है, आकाश नीला है और वृक्ष कितने हरे, एक सन्नाटा बिखरा है चारों ओर जो उसकी ही खबर दे रहा है. आज स्वास्थ्य पहले से बेहतर है. वह आने वाला है इसलिए ही देह को तपाकर स्वच्छ किया प्रकृति ने, फिर भीतर के सारे विकारों को निकाल बाहर किया. तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. अब कुछ करना शेष नहीं है, घर का मालिक आ गया है, अब जो भी वह कराएगा, वही होगा !

हरसिंगार के पत्तों से छनकर धूप के नन्हे-नन्हे गोले उसकी डायरी पर बन रहे हैं. यानि परमात्मा के हाथों से बनी कला ! उसके फूल अभी तक गिर रहे हैं, जो एकाध डाली पर अटके रह गये थे. हवा आज भी शीतल है और सड़क पर स्थित खम्भे का बल्ब आज भी कर्मचारी लगा रहे हैं, एक बल्ब के लिए पूरी की पूरी टीम आई है. पिताजी का मनोरंजन हो रहा है. उसने बोगेनविलिया के गमले धूप में रखवा दिए हैं. इस वर्ष उनमें अवश्य अच्छे फूल आएंगे. कल सिर्फ एक टिकट शेष रही, वह भी बिक जायेगी. आज की दो पोस्ट उसने सुबह ही लिख दी हैं, जून ने कहा, नौ बजे से दो बजे तक बिजली नहीं रहेगी.


नवम्बर की गुनगुनी धूप तन को सहलाती है. बाल सूर्य की किरणों की आभा में जब तृण की नोकें चमचमाती हैं, वृक्षों की डालियाँ एक अनोखी आभा से भर जाती हैं. फूलों की सुगंध रह-रह कर नासापुटों में भर जाती है. बोगेनविलिया की डालों से टपकती टप-टप ओस की बूंदें अंतर भिगाती हैं, झरते हुए फूलों की कतार सी जमीन पर बिछ जाती हैं. जीवन को उसकी सुन्दरता का अहसास जो कराती है, अम्बर की वह नीलिमा स्वप्नलोक लिए जाती है. खगों की कूजन ज्यों लोरी सुनाती है ! पत्तों की सरसराहट.. ज्यों पवन पायल छनकाती है. गुलाबी रंगत कलिका की.. भीतर मिलन का अहसास जगाती है. हर शै कुदरत की उसकी याद दिलाती है. इतनी सुंदर थी यह दुनिया क्या पहले भी..उससे इश्क के बाद नजर जो आती है. दूब घास की हरी नोक भी यहाँ सुख सरिता बहाती है, सड़क पर जाते हुए हरकारे की आवाज भी भीतर कैसी हूक जगाती है. बगीचे में करते माली की खुरपी की ध्वनि जैसे सृष्टि का संदेश सुनाती है. रचा जा रहा है हर पल इस जहाँ में चुपचाप ओ मालिक, यह बात आज समझ में आती है. 

Wednesday, April 5, 2017

नन्ही चिड़िया


परसों नवरात्र का अंतिम दिन था. वह अस्पताल में थी. टीवी पर माँ दुर्गा की सुंदर मूर्तियों के दर्शन किये थे. कमरे के बाहर लगातार पानी गिर रहा था, उसी का शोर नींद आने में बाधा डाल रहा था. लेकिन भीतर रंगों व ध्वनियों का एक अनोखा संसार है, वहाँ जड़-चेतन का कोई भेद नहीं है, परमात्मा वहीँ है, वहाँ सौन्दर्य है. रात को देखा, वह गहन गुफाओं से गुजरती है, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर सहजता से बढ़ती जाती है. सुंदर दृश्य भी थे और अँधेरे भी, दिव्य लोक भी थे और सामान्य जन भी. कभी सामान्य जीवन के कितने ही दृश्य दिखे, बड़ी फैक्ट्रियां और लोग, अब ठीक से याद नहीं आता. जब तक यह हुआ, शरीर का सुख-दुःख कुछ भी याद नहीं रहा. याद रहा तो पानी का स्पर्श, पानी में सहज तैरकर या उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचना.

कल रात्रि अस्पताल के कमरा नम्बर पांच व बेड नम्बर एक सौ अट्ठारह पर पड़े हुए भीतर कविताएँ फूटतीं देखीं. रंगों का सुंदर मुजस्मा था. शब्द नहीं हैं जिसे कहने को, हीरों, मोतियों, माणिकों के अद्भुत सुंदर रंगीन नजारे, फूलों की नदियाँ, खिलते हुए सहस्रदल कमल और चमकता प्रकाश, तारे, सुंदर ध्वनियाँ, रुनझुन सी आवाजें..ऐसा अद्भुत फूलों का उपवन, खिलते हुए बैंगनी, गुलाबी, लाल, नारंगी, पीले रंगों वाले फूल, जाने कौन खिला रहा था. परमात्मा उनके भीतर है, वह इतना सुंदर है सुना था, पढ़ा था, संतों की वाणी सुनी थी, वह जैसे सच बन कर प्रकट हो रही थी. एक तरफ इतना अपार आत्मिक आनंद, दूसरी तरफ दैहिक कष्ट. इस जीवन का एक-एक पल रहस्यों से भरा हुआ है. चार दिन अस्पताल में रहने की बाद आज घर लौटी है. अभी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है. इतनी सारी दवाएं भीतर गयी हैं, देह को सामान्य होने में वक्त तो लगेगा. जब तक देह साथ दे तभी तक जीवन है. पिताजी की आवाज दूसरे कमरे से आ रही है, वह उठ गये हैं. जून दफ्तर गये हैं. उसके कारण सभी परेशान हैं. इन्सान की जीवन यात्रा सुख-दुःख के दो तटों के मध्य बहती है, द्वन्द्वों से युक्त है यह जीवन. जहाँ से सुख मिला है, दुःख मिलेगा ही. कई दिनों बाद लिख रही है, अपने ही हाथों को अजीब लग रहा है. पेन से लिखना वैसे भी कम हो गया है. टाइप ही करती है. शाम तक या कल तक वह भी शुरू कर देगी.

कल रात एक अद्भुत स्वप्न देखा. वह कहीं जा रही है, लेकिन चलना उसका नहीं हो रहा. मार्ग स्वयं ही चल रहा है, एक व्यक्ति उसे परेशान करना चाहता है तो एक नजर से ही वह दूर चला जाता है. सामने विशाल आकाश पर सुंदर बेल-बूटे बने हैं, बचपन में एक स्वप्न में आकाश में बड़े राजमहल व हाथी देखे थे, वैसा ही स्वप्न था लगभग. आगे जाते ही एक वाहन में सवार चार व्यक्ति उसे सुनसान सड़क पर अकेले देखकर चिढ़ाने के मूड में आ जाते हैं, वह उन पर चिल्लाती है फिर गर्दन हिलाती है, एक लड़की वैसा ही करने लगती है तो वे सभी वैसा ही करते हैं और सम्मोहित होकर वहीं गिर जाते हैं. आगे जाती है तो दूर से कोई पुकार लगाता हुआ आता है. उसके हाथ जुड़े हैं, मानो वह उसका इंतजार ही कर रहा था. देखती है वह एक चिड़िया थी, नन्ही सी, जिसके तन पर घाव थे, वह एक हाथ में लेकर उस पर दूसरा हाथ फेरती है और कहती है वह ठीक हो जाएगी, चिड़िया मानवी भाषा में उससे बात करती है. यह स्वप्न बताता है अहंकार पहला व्यक्ति था, चार विकार चारों व्यक्ति थे और घायल चिड़िया उसका मन, जिसे उसे स्वस्थ करना था. लगता है अब उसके जीवन में बड़ा परिवर्तन होने वाला है. कुछ बदलाव पहले ही शुरू हो गये हैं. जून उसका बहुत ध्यान रख रहे हैं, शारीरिक दुर्बलता का अहसास कभी-कभी होता है पर मानसिक शक्ति अनंत गुणा बढ़ गयी है. परमात्मा उसके पोर-पोर में समा गया है, वही तो है, उसके सिवा कुछ है भी कहाँ ? वह परमात्मा ही ‘वह’ बनकर बैठा है, अब जब वही है तो वही रहे..अब उसके सिवा यहाँ कोई नहीं है. जो उससे मिलने आएगा वह खाली ही जायेगा, क्योंकि यहाँ ‘अहम्’ नहीं है अब ‘त्वम्’ ही है.  



Monday, April 3, 2017

विश्वकर्मा पूजा


दोपहर के तीन बजे हैं, कितना सन्नाटा है चारों ओर. सुबह तेज वर्षा होती रही घंटों तक पर अब मौसम खुल गया है. नैनी शायद कहीं गयी है, घर पर ताला लगा है, वरना बर्तनों की आवाजें या उसके बच्चों की आवाजें गूंज रही होतीं. जून को कल रात राग-द्वेष के बारे में बताया, पता नहीं कितना समझ में आया. जब तक कोई बात अपने ही भीतर से न उपजे समझ में नहीं आती, उसके साथ तो ऐसा ही होता है, शास्त्रों में लिखी बातें कितने दिनों बाद जब वैसी की वैसी भीतर से आती हैं तो लगता है, अच्छा ! तो यह अर्थ था. बहुत दिनों से कोई कविता नहीं लिखी है. मन होता है कुछ लिखे दिल की गहराई से ..कल पिताजी व छोटे भाई से बात हुई, उसका ब्लॉग पढ़ा उन्होंने. तीन सखियों से भी फोन पर हाल-चाल लिया. एक का जन्मदिन आने वाला है, जिसकी माँ आजकल यहाँ आयी हुई हैं. उसके साथ हुए वार्तालाप के आधार पर कुछ लिखेगी.

आज जून के दफ्तर जाना है, विश्वकर्मा पूजा के उपलक्ष में वहीं दोपहर को भोज भी है. यहीं आकर उन्हें इस पूजा के बार में संज्ञान हुआ. परसों गणेश पूजा है, दो तीन जगह पंडाल लगेंगे, वे लोग बीहू ताली में अवश्य पूजा देखने जाते हैं, जो दक्षिण भारतीय आयोजित करते हैं. उसकी उड़िया सखी के यहाँ भी बड़ा आयोजन होता है. जून के दफ्तर में कुछ समस्याएं चल रही हैं. एक तो ड्राइवर की समस्या है, जो अब तक आया ही नहीं, वैसे आज के दिन यहाँ ड्राइवरों को पीने का एक बहाना भी मिल जाता है. पूजा का अर्थ यहाँ मस्तीभरा आलम और प्रीतिभोज है. आज भी पानी बरस रहा है.

 कुछ देर पूर्व एक कविता पोस्ट की. जून ने अपनी डायरी का एक पन्ना दिखाया जिसमें नूना का जिक्र  था. उसकी डायरी में जून का जिक्र कितना हुआ था उन वर्षों में शायद इसी कारण...या वैसे ही..अच्छा लगा. अगले हफ्ते उन्हें गोवा जाना है. उसने भारत के इस छोटे से प्रदेश के बारे में कितना सुना और पढ़ा है. वर्षों पहले एक बार वे इस राज्य की यात्रा कर भी चुके हैं.

आज हफ्तों बाद डायरी लिख रही है. यात्रा अच्छी रही, ब्लॉग पर लिखने के लिए यात्रा विवरण भी वह प्रतिदिन डायरी में नोट करती रही. वापस आकर कुछ दिन घर को व्यवस्थित करने में लग गये. कुछ दिन यूँ ही निकल गये, अब जब भीतर कोई है नहीं तो कोरे कागज ही रहेंगे न आज की गाथा कहने के लिए..जब कोई सचमुच खो जाता है तो ‘वह’ सचमुच आ जाता है. यहाँ शायद की कोई गुंजाईश नहीं..जब वह एक बार आ जाता है तो बस आ ही जाता है...

कई दिनों के बाद वह आज झूले पर बैठी है. हवा मंद है पर शीतल है. एक झींगुर मधुर गा रहा है. गुड़हल, गुलाब और मुसंडा खिले हैं. जून दिल्ली में हैं, कल लौटेंगे. आज दीदी-जीजाजी की शादी की वर्षगांठ है, वे पिताजी व भाई-भाभी से मिलने घर आये हैं, रात भी रुकेंगे. उसने सोचा एक न एक दिन वे यहाँ भी आयेंगे उनके अगले बड़े घर में. आज स्टोर की सफाई की, दीवाली का समय आने वाला है, सफाई का समय. घर से पुराना सामान निकलने का समय जो वे इस्तेमाल नहीं करते. आज सुबह अच्छा अनुभव हुआ, अब शब्दों में नहीं समाता, अब कविता में भी नहीं आता..अब तो जैसे वह रग-रग में समा गया है, उसे अलग से देखे ऐसा सम्भव नहीं है. गोवा का लेख पिछले दो दिन नहीं लिख पाई, आज लिखेगी.




Friday, March 31, 2017

गोकुल और नवनीत


सितम्बर शुरू हो गया, बादल पूरे अगस्त बरसते रहे, देखे, इस महीने क्या होता है. बादलों का मौसम कृष्ण की याद दिला देता है, उनका जन्म भी ऐसे ही मौसम में हुआ था और उनका रंग भी शायद इसीलिए..सुबह कृष्ण लीला का स्मरण करते ही आँखों में भी बादल घिर आये..अद्भुत हैं कृष्ण !  जैसे उसे कह रहे हों, मैं हूँ न ! वह अपने मन को गोकुल बना सकती है तो कृष्ण उसमें बसने को सदा तत्पर हैं. वह अर्जुन की तरह यदि उनकी शरण में जा सकती है तो उन्होंने उसकी कुशल-क्षेम का वचन दे ही दिया है, वह अपने को सुपात्र बना लेती है तो कृष्ण उसमें रहे नवनीत को ग्रहण करने ही वाले हैं. शुद्ध, सात्विक भोजन खाने से मन व तन दोनों हल्के रहते हैं, इसका अनुभव हो रहा है. कल इतवार शाम को बंगाली सखी की माँ आएँगी उनके यहाँ. उसने सोचा है उनकी पसंद की कुछ वस्तुएं बनाएगी, वह इतनी उम्र में भी कितना ध्यान रखती हैं अपने वस्त्रों व मेकअप का, खूब बातें करती हैं और छोटी लड़कियों की तरह चहकती हैं, यही उनकी सेहत का राज है.

सुबह उठे वे तो ठंडी हवा बह रही थी, उसके बाद वर्षा शुरू हुई जो रुकने का नाम नहीं ले रही है. कपड़े धोकर नैनी बाहर ही छोड़ गयी थी, वह उठी उन्हें फ़ैलाने के लिए पर पिताजी ने पहले ही फैला दिए थे, उन्हें अपने लायक किसी न किसी काम की  तलाश रहती है, कोई भी मौका नहीं चूकते. आज वे बोले, शरबत की जगह चाय पियेंगे, मौसम ठंडा हो गया है.

शिक्षक दिवस है आज ! दो छात्रायें उसके लिए पेन तथा कार्ड लायी है और एक की माँ ने भी एक उपहार भिजवाया है. वह खुद मृणाल ज्योति गयी थी. टीचर्स को उपहार दिए, मिठाई खिलाई. जून आज दिल्ली गये हैं, तीन दिन बाद लौटेंगे. उसे कुछ काम तो करने हैं, कुछ लिखना है और साक्षी बने रहना है हर कृत्य में. कर्ता भाव से कुछ भी नहीं करना है. पिताजी को फोन करना है, भीतर कैसी अनोखी शांति है. स्वचेतना खो जाने पर केवल चैतन्य मात्र रह जाने पर ही ऐसी शांति का अनुभव होता है !

अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया था, उसके जूते का नम्बर पूछ रहे थे, वह इतनी दूर रहकर भी उसका इतना ध्यान रखते हैं. आज दीदी से बात हुई, वे लोग नार्वे में मन्दिर गये थे, भारतीय जहाँ भी रहते हैं, मन्दिर का निर्माण कर ही लेते हैं. एक वरिष्ठ ब्लॉगर महोदया जी का मेल आया था कल, ‘नारी विमर्श’ पर कुछ लिखने को कहा था अपनी समझ से. कभी-कभी भीतर कुछ लिखने का मन होता है, पर उस वक्त कागज-कलम साथ नहीं होते, वक्त गुजर जाता है. जब कागज-कलम लेकर बैठे तो कुछ भी नहीं लिखा जाता है. कल रात एक सुंदर पंक्ति जहन में आई थी. बहुत बार दोहराई कि याद रहेगी पर अब उसका निशान भी शेष नहीं है. मन के आकाश में उड़ते हुए बादल सी कोई लाइन आयी और खो गयी..वे व्यर्थ ही अपना होने का दावा करते हैं विचारों को ! कल शाम आलोचना में कुछ पढ़ा, आज नेट पर और फिर एक लम्बी कविता जैसी कुछ लिख दी. उन्होंने जवाब भी दिया, शानदार ! शायद उदंती में छपने के लिए भेजें. वर्षा जारी है !



Thursday, March 30, 2017

नीली आँखें


आकाश में सुबह से बदली बनी है. जून अभी तक घर नहीं आए हैं. हवा बह रही है. वह बाहर झूले पर बैठी है. आज शाम वे कई हफ्तों बाद ध्यान-कक्ष में ही सत्संग करने वाले हैं, तैयारी हो गयी है. प्रसद रूप भोजन भी बन गया है. आज नेट नहीं चला, सो कोई पोस्ट नहीं डाल पायी. नई कविता भी नहीं लिखी है, अन्य कवियों की कविताएँ पढ़ रही है, सभी के भीतर कितने सुंदर भाव उठते हैं, सभी तो एक ही चेतना का अंश हैं. अब अपना-पराया कुछ भी महसूस नहीं होता. खुद लिखे, ऐसा भी मन नहीं होता. जो हो रहा है, वही हो..जो परमात्मा चाहे वही हो !

बापू कहते हैं, सूधे मन से, सूधे वचन से तथा सूधी करतूती से उर में प्रेम का जन्म होता है. प्रेम में कोई नियम नहीं होता. “हरि देखा सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होए मैं जाना” हृदय में यदि प्रेम प्रकट हो तो ही परमात्मा प्रकट होता है, पर वे उसको पहचान नहीं पाते. भीतर इतने अशुभ संस्कार रहते हैं कि वे उसे महत्व ही नहीं देते. प्रेम जब निरंतर बढ़ता ही रहे तो ही वह परमात्मा उनके अनुकूल होगा अर्थात वह उसे पहचान पाते हैं. प्रेम को निरंतर बढ़ना ही चाहिए, नित-नित बढ़े वही प्रेम है ! अकबर ने अपने नवरत्नों से एक बार पूछा था, अल्लाह की जाति क्या है, रंग क्या है, अंग कैसा है, जवाब मिला इश्क अल्लाह की जाति है, इश्क अल्लाह का रंग और वह इश्क से ही बना है ! उनकी कथा आ रही है, “सब सोच विमोचन चित्रकूट, कलि हरण करण कल्याण कूट”. कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. छोटी बहन का परिवार है, जून और वह है. एक उपकरण बनाया है दोनों के पतियों ने, वे उसे दोनों ओर से पकड़े बैठे हैं और वह फोटो खींच रही है. तभी अचानक जून का चेहरा गोरा हो जाता है, नीली आँखें, उसकी इस बात पर कि यह तो फ्रेंच है, छोटी बहन के पतिदेव कह उठते हैं मैं जर्मन हूँ, उसका भी चेहरा बदल जाता है. जरूर किसी पूर्व जन्म का स्वप्न होगा.

बायीं आँख में उपर की पलक के पास हल्का दर्द है, जून ने फोन किया वे उसे डाक्टर के पास ले जाने आयेंगे अभी कुछ देर में. आज धूप तेज है, मौसम हर रोज अपना मिजाज बदलता है. अगले महीने वे उसे गोवा ले जायेंगे, वे एक हफ्ता वहाँ रहेंगे. अब लगता है भीतर परम विश्राम मिला है. तन की अवस्था कैसी भी हो मन सदा एकरस बना रहता है. परमात्मा जैसे अपनी याद खुद दिलाता रहता है. जून को पिछले चार-पांच दिनों से सर्दी लगी है. एक दिन उनके भी जीवन में ध्यान आये, ऐसी ही प्रार्थना उसकी प्रभु से है, नन्हे को भी ऐसा ही विश्राम प्राप्त हो. जीवन का परम लक्ष्य यही है, एक ऐसी अनवरत शांति और आनंद का स्रोत उनके भीतर है, जो उनका अपना है, उस तक उनकी पहुंच हो.

अगस्त का अंतिम दिन ! मौसम सुहाना है, वर्षा के कारण सभी कुछ स्वच्छ और आकाश में पूर्णिमा का चाँद बहुत बड़ा सा ! अभी कुछ देर पहले वे लॉन में टहलकर वापस कमरे में आये हैं. जून की तबियत बेहतर है. नन्हा आजकल बहुत व्यस्त चल रहा है. कल बड़े भांजे को भी हॉस्टल शिफ्ट करना है, उसके घर में ही ठहरा है. नूना का मन शांत है, अब अपने घर का पता मिल गया है, एक पल लगता है उसमें जाने में ! 

Tuesday, March 28, 2017

जल, जंगल और जमीन


टीवी पर हिरोशिमा में बापू की कथा का प्रसारण हो रहा है. हवा की तरह हल्का, फूल की तरह महकता हुआ और पानी की तरह बहता हुआ मन कथा सुनकर ही होता है, लेकिन कथा के पूर्व ही कोई वक्ता बोल रहे हैं, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे. बोलने का भी एक आकर्षण होता है. सत्य का रथ, प्रेम के पथ पर, करुणा के मनोरथ के साथ चलता रहे यही तो बापू चाहते हैं. जून अहमदाबाद में हैं, सुबह उनका फोन आया था. नन्हा इतवार को तमिलनाडु गया था, फुफेरी बहन व जीजाजी से मिलने. बाइक पर यात्रा करना उसे मेडिटेशन जैसा लगता है, पूरे होश में रहना पड़ता है, नितांत अकेले अपने साथ ! साढ़े दस बजे हैं, आज वे भोजन देर से करेंगे, वह एक घंटा कम्प्यूटर पर बैठकर आज की पोस्ट लिखेगी.

जी-टीवी पर दिल्ली के रामलीला मैदान से बाबा रामदेव का काला धन लाने के लिए दिया गया भाषण प्रसारित हो रहा है. देश में कितना तेल, कितना कोयला आदि प्राकृतिक संपदा के रूप में पड़ा है, जल, जंगल, जमीन की जो लूट मची है, उस पर बोल रहे हैं. काला धन कितना है, इसका तो पता नहीं, पर लाखों करोड़ों में है. जनता को सजग करना ही उनका उद्देश्य है.

अज जून का जन्मदिन है, उसका मन भी खिला है. कल दिन भर एक अजीब सा भाव छाया था. छोटी बहन की सासुमाँ ने देह त्याग दी. रामदेव जी का आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर था. कल दोपहर भर टीवी पर वही देखती रही. आज बहुत दिनों बाद एक परिचिता का फोन आया, उनके पुत्र का विवाह किसी कारण से टूट गया है, उस अनुभव से उबर रही थीं, अब मन कुछ ठहरा है. क्लब की प्रेसिडेंट के बारे में उनसे कुछ बातें पूछीं. उनके लिए कविता लिखनी है. वह एक अच्छी अध्यक्षा साबित हुई हैं. मिलनसार हैं, अच्छी लीडर हैं, मैनेजर हैं और सुलभ हैं. सब कोई उनसे बात कर सकते हैं. अहंकार नहीं है. सामाजिक कार्यों के प्रति उत्साह है, समाज सेवा का जज्बा है. दादी, नानी बन चुकी हैं. सास की अच्छी बहू हैं, अच्छी माँ हैं, स्वास्थ्य व सौन्दर्य के प्रति सजग हैं, इस उम्र में भी युवा दिखती हैं. ऊँचा कद है, वस्त्र शालीन हैं और एक गरिमा है उनमें. इतना सब तो काफी है उनके बारे में लिखने के लिए. आज मौसम सुहाना है, कल दिन भर बेहद गर्मी थी. कल बंगाली सखी की बिटिया को अचानक देखकर बहुत ख़ुशी हुई, वह पहले से ज्यादा मुखर हो गयी है और थोड़ी मोटी भी. नौकरी करने लगी है.

बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण जी को जमानत मिल गयी है. उनके आन्दोलन से पूर्व ही उन्हें फर्जी डिग्री व फर्जी पासपोर्ट के कारण जेल में रखा गया था. बाबा पूरी निर्भयता की साथ प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को शासन की कमियों की तरफ आकर्षित कर रहे हैं. देश के हालात इस समय नाजुक बने हुए हैं. सारे विश्व में ही मंदी के कारण परेशानी है फिर भी युद्द्धों पर व्यर्थ पैसे खर्च किये जा रहे हैं. इन्सान अपने स्वार्थ के कारण दुःख पा रहा है.   

तुम मेरे साथ होते हो, कोई दूसरा नहीं होता ! बापू की कथा आ रही है राजस्थान के नाथद्वारा से. विरह ही प्रेम है. किसी के जाने के बाद जो सन्नाटा हो जाता है, उसमें कितनी पीड़ा है, जो इस सन्नाटे को सहता है, वही प्रेम को अनुभव कर ही सकता है. एक शून्य प्रकट होता है जीवन में तभी प्रेम प्रकटता है. उनका कोई क्रियाकलाप ऐसा न हो जो प्रेमास्पद के प्रतिकूल हो. 

Monday, March 27, 2017

चाँद और सूरज


परमात्मा के खेल निराले हैं. वह कितना-कितना चाहता है कि वे उसके पथ पर चलें. वह उन्हें कई मार्गों से शुद्ध करता है, कभी सुख देकर कभी दुःख देकर. इतने वर्षों से जो संस्कार उसके भीतर था, जिसके कारण उसका तन अस्वस्थ हुआ, मन अस्वस्थ हुआ, वह संस्कार अंततः कल रात्रि उसे मिटता हुआ प्रतीत हुआ है. अहंकार की जो काली छाया उसके और परमात्मा के मध्य अभी तक पड़ी हुई थी; आज वह गिर गयी लगती है, वह छाया ही थी. अहंकार लगता है ठोस पर कुछ होता नहीं है, परमात्मा लगता है सूक्ष्म पर होता है ठोस..वह उनका सच्चा हितैषी है, सुहृद है, वह उनका सद्गुरू है. मन अब रंच मात्र भी नकारात्मकता स्वीकार नहीं कर पाता. जीवन कितने-कितने रंग दिखाता है, जब शुभ नहीं टिका तब अशुभ कैसे टिकेगा.

यह सृष्टि एक गीत है
आकाश गंगाएँ छंद है जिसकी
झिलमिलाते तारे अलंकार
और चाँद-सूरज दो अंतरे
मुक्ति आधार है जिसकी
नये शब्द खोजने होंगे
नई इबारत लिखनी होगी
उसका गुणगान करने के लिए
जो पुरातन है
जब नहीं थी सृष्टि
जो उससे भी पूर्व था..

भीतर कैसा ठहराव छा गया है. जैसे कोई ज्वर उतर गया हो. अब कोई दौड़ नहीं है. न कुछ पाना है, न ही करना है, जीवन जो देगा उसे स्वीकारना है. भीतर कोई जाग गया है. सदा एकरस सत्ता है, जो पूर्ण तृप्त है. सारे संस्कार नष्ट हो गये लगते हैं. अब कोई कोना खुद से छिपा नहीं रह गया है भीतर का. मन को उसकी गहराई तक जाकर खंगाल लिया है, सारे कोने साफ कर लिए हैं, कहीं कोई दुराव नहीं है, अब नहीं कुछ सिद्ध करना है. जून कल बाहर जा रहे हैं, पांच दिन बाद लौटेंगे. अभी कुछ देर पहले ही पुरानी डायरी के कुछ अंश लिखे, उसका यह संस्कार तब भी कितना दृढ था, पर अंततः अब इससे मुक्ति हुई लगती है. उसकी साधना शायद इसी के लिए थी. परमात्मा उन्हें कितना आनंद कितनी शांति देना चाहता है. वे अज्ञानवश अपने व उसके बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं. उनका सारा नकार अपनी ही जड़ों पर चोट करने जैसा है. एक ही सत्ता से सारा जगत बना है. अन्य पर किया क्रोध स्वयं पर ही लौटता है. लौटता भी है और स्वयं से ही होकर जाता भी है. हर हाल में अपना ही नुकसान होता है. इसी तरह दूसरे को दी ख़ुशी भी खुद से होकर गुजरती है और लौट कर भी खुद तक ही आती है. जब तक मन को खुद की खबर नहीं थी तब तक वह बाहर ही ख़ुशी खोजता था, अब भीतर ही सब कुछ मिल गया है, कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है. असजगता के कारण वे अपने जीवन का बहुत सा कीमती समय नष्ट कर देते हैं.

एक शिशु जैसा छोड़ दिया है
स्वयं को निसर्ग के हाथों
अब खो गये हैं सारे लक्ष्य, सारा ज्ञान
खाली है मन, शून्य उतर आया है भीतर
और बाहर परमात्मा हर तरफ बाहें फैलाएं..
न कुछ करना है
न जानना है
न पाना है
बस एक निर्दोष फूल सा खिले रहना है
अस्तित्त्व के चरणों में !

   

Saturday, March 25, 2017

नीला आकाश सफेद बादल


कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह वे बाजार गये, जून उसके लिए कोलकाता से एक साड़ी और एक कुर्ती लाये हैं, वह उसे सजे-धजे देखना चाहते हैं. उनका प्रेम उसके लिए अपरिमित है. वे लोग दिसम्बर में बंगलुरू जा रहे हैं, तब यह वस्त्र काम आयेंगे. सद्गुरू के लिए भी वह इस बार एक सुंदर भेंट लेकर जाएगी, कोई बहुत ही सुंदर वस्त्र ! आज पिताजी का अख़बार नहीं आया है, टीवी भी नहीं चलाया है, बैठ-बैठे जाने क्या सोचते रहते हैं. उसका ध्यान पहले से बेहतर हुआ है. कल सुबह कितना विचित्र स्वप्न देखा था और कल रात को भी एक सुंदर मन्दिर देखा, विशाल मन्दिर है लेकिन मुख्य मूर्ति के नीचे लिखा है किसी अभिनेत्री का नाम लेकर कि वह फिर आ रही है. कल के स्वप्न में ऊंची छत पर रखा गोबर की खाद का एक ड्रम नीचे गिर जाता है और सड़क पर जाकर देखा तो वहाँ से गायब है, अर्थात कूड़ा-करकट दिमाग से विदा हो गया है, फिर जो शेष बचा उसका दर्शन हुआ. वह अपने घर के द्वार पर है, ध्यानस्थ, भीतर सारा आकाश और सुंदर बगीचा देख रही है. हरे-हरे पेड़ जो आकाश तक ऊंचे हैं. नीला व सफेद बादलों वाला आकाश है. वह उड़ सकती है, मन के सोचने मात्र से पल में जहाँ-तहाँ विचरण कर रही है, शायद ऐसे ही स्वर्ग का दर्शन ध्यान में ऋषियों ने किया होगा. स्वप्न ही तो था वह, टूट गया तो सब तिरोहित हो गया, लेकिन अपने आप में टिकने की कला तो स्वप्न नहीं है, वही तो सत्य है. मन भी तो चेतना में उठी लहर ही है पर पागल यह नहीं समझता कि क्रोध करेगा तो खुद पर ही करेगा, यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं ! दूसरे को दूसरा समझना ही तो सबसे मूल हिंसा है.

सद्गुरू ने आज अष्टावक्र की कथा कही. ध्यान अच्छा रहा, अनंतता का अनुभव हुआ. अभी-अभी क्लब की एक सदस्या से बात की, जो पति के रिटायरमेंट के बाद जा रही हैं. उनका जन्म जोरहाट में हुआ, गणित, सांख्यिकी व अर्थशास्त्र में बीएससी की डिग्री ली. गोहाटी से एमएससी की सांख्यिकी में. एमबीए भी करना चाहा पर विवाह हो गया, फिर बेटी मुन्मा का जन्म हुआ, फिर बेटा भार्गव. टीचर का जॉब किया. बचपन से ही गणित में तेज हैं, पति को भी मदद करती हैं. नृत्य का भी शौक है. इन सब बातों को आधार बनाकर वह उनके लिए विदाई कविता लिखेगी, जो क्लब में पढ़ी जाएगी.

कल रात स्वप्न में दीदी व छोटी भांजी को देखा. कल क्लब में कविता सबको अच्छी लगी. एक महिला ने नृत्य किया व एक ने गायन भी. आज का दिन कुछ अलग लग रहा है, मन बेवजह अपने-आप में नहीं है. इसका अर्थ है, संस्कार सोये पड़े रहते हैं, मिटते नहीं हैं. अभी बहुत मार्ग तय करना है, भीतर नया संस्कार डालना है, जो घट रहा है उसका साक्षी मात्र रहना है. कोई भी विकार देह पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहता है. जो कुछ भी शारीरिक कष्ट उसे हो रहा है वह इन्हीं विकारों के कारण है. मन को स्वच्छ करना होगा, अपने ही हाथों अपना नुकसान करना ठीक नहीं है. जीवन को विशाल दृष्टिकोण से देखना होगा, परिपक्वता लानी होगी. इन्सान वृद्ध होने को आये पर अपने संस्कारों से छुटकारा नहीं पाता. उसे इस सत्य को औरों के साथ भी घटता हुआ देखना होगा. सभी अपनी-अपनी सीमाओं में कैद हैं, उसी में दुःख है.

कीचड़ में कमल उगता है, आज यह कहावत अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई. ध्यान से पूर्व मन जैसे कीचड़ में सना था पर ध्यान के बाद फूल सा पावन हो गया है. परमात्मा उसके साथ हैं हर पल, यह भाव दृढ़तर हो गया है, न जाने किन अशुभ कर्मों का फल था वह सब जो अब बहुत पीछे छूट गया है. अब तो प्रकाश है, संगीत है और गीत हैं जो बाहर आने को बेचैन हैं. भीतर कितना सुंदर संसार है, अनंत प्रेम से भरा, वे बाहर ही ठोकरें खाते रहते हैं. जब-जब एकांत मिलता है, उसकी साधना बलवती होती है लेकिन व्यस्तता बढ़ने के बाद मन संसार में ही उलझ कर रह जाता है. इस बार ऐसा नहीं होने देगी. परमात्मा ने उसके जीवन की डोर अपने हाथों में थामी है, वह उसे कभी भी गिरने नहीं देंगे.




Friday, March 24, 2017

पंछी और कलियाँ


नन्हे की मित्र के लिए उसने कविता लिखी थी, उसका जवाब आया है, उसने दिल को छूने वाला जवाब लिखा है. कल दिन भर वह ठीक रही पर रात बेचैनी से भरी थी. आश्चर्य होता है खुद पर, कहाँ सोचा था कभी कि डायरी के पन्नों पर अपनी हेल्थ रिपोर्ट लिखेगी एक दिन, लेकिन इसकी नींव रख दी गयी थी वर्षों पहले, जन्मते ही सम्भवतः..उनके सारे रोग नए नहीं होते, उनका आयोजन पहले ही शुरू हो चुका होता है.

आज नन्हे का जन्मदिन है, उसे फोन किया तो नहीं उठाया, शायद रात को जगता रहा हो, सुबह ही सोया हो. उसके लिए बधाई के फोन आये. मोरारीबापू साऊथ अफ्रीका पहुंचा गये हैं, उनकी कथा आ रही है टीवी पर. जून आज कोलकाता गये हैं. दिसम्बर में वे बंगलूरू आश्रम जायेंगे, इस बात को सोचने से ही कैसी पुलक उठती है. आज तन और मन दोनों हल्के हैं. सारे रोगों का कारण प्रज्ञापराध है. उनका तन कितना बहुमूल्य है, इसे स्वच्छ व स्वस्थ रखना कितना आवश्यक है. यह ज्यादा कुछ मांग भी नहीं करता, लगातार काम करता रहता है. ‘कम खाओ और गम खाओ’, यह नियम अपनाना होगा यदि भविष्य में भी स्वस्थ रहना है. आज ध्यान में अच्छा अनुभव हुआ, जून जब घर पर रहते हैं उसका ध्यान गहरा नहीं हो पाता. अब उनके आने पर भी सजग रहना होगा ! परसों वे आ जायेंगे.

कुछ देर में उसे एक परिचिता के साथ मृणाल ज्योति जाना है. जब कहीं जाना हो तो प्रतीक्षाकाल में कार के हॉर्न की आवाजें ज्यादा ही सुनाई देने लगती हैं, वैसे जिनकी ओर ध्यान भी नहीं जाता. ‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन’ कितना जबर्दस्त है. आज ही उसने चाहा कि माली ग्यारह बजे से पहले आये, सो आ गया है. इस तरह तो उनका भाग्य उनके ही हाथों में है. वे जो चाहते हैं, वैसा ही सोचना आरम्भ कर दें तो प्रकृति उसका इंतजाम करने लगती है. आज सद्गुरू ने अपने जीवन के कुछ प्रसंग बताये. इक्कीस वर्ष की अवस्था तक वे दुनिया के सारे सुख-आराम देख चुके थे, विदेशों में घूम चुके थे. एक विश्व प्रसिद्ध संस्था के उत्तराधिकारी बन सकते थे, पर वे लौट आये और सेवा का मार्ग चुना. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की स्थापना की. अद्भुत है उनकी कहानी. ऐसे लोग दुनिया में विरले होते हैं, जो करोड़ों लोगों तक पहुंच पाते हैं, सभी उनसे प्रेम करते हैं.


जून आज आ रहे हैं. उनकी पसंद की ड्रेस पहनी है. प्रेम क्या होता है, इसका पता ईश्वर से प्रेम करने के बाद ही चलता है. इसीलिए संत-महात्मा युगों-युगों से उन्हें प्रभु की ओर चलने का मार्ग बताते आये हैं. परमात्मा उनके प्रेम का प्रतिदान अनंत गुणा देता है. एक बूंद जो सागर से बिछुड़ी थी, कितनी छोटी  थी और जब पुनः सागर में जा मिली तो अनंत गुणा जल उसे मिल गया. उनकी चेतना इस देह में कितनी नन्ही सी लगती है, एक चिंगारी हो जैसे या सूर्य की एक किरण और जब वह चिंगारी किसी तरह पुनः आग में गिर जाये तो...या सूर्य की किरण पुनः सूर्य में पहुंच जाये तो..कितना प्रकाश न भर जायेगा उसके भीतर; लेकिन एक बात यह भी है कि सूर्य स्वयं जाकर कलियों को खिला नहीं सकता, वह अपने हाथ बना लेता है किरणों को, जो आहिस्ता से सहलाती हैं और किरणें खिल जाती हैं; ऐसे ही अनंत परमात्मा स्वयं आकर सोए हुओं को कैसे जगायेगा, मानव उसका तेज सह ही नहीं पायेगा, वह संतों को अपना हाथ बना लेता है जो आहिस्ता से आकर जगाते हैं. कलियों के लिए किरणें संत से कम नहीं..पंछियों के लिए भी...ऊपर से तुर्रा यह कि फूल के भीतर जो भोजन बनता है वह भी सूर्य के बिना सम्भव नहीं. सूर्य उसके भीतर सदा ही है, पर वह जानता नहीं, मानव के भीतर भी परमात्मा के कारण ही चेतना है, पर वह जानता नहीं, वास्तव में स्वयं को ही जगाने आता है वह क्योंकि उसे स्वयं का अनुभव करना हो तो मन का आश्रय लेना होगा, उसके पास तो मन है नहीं..तो भक्त का मन भगवान ले लेता है और बदले में स्वयं को दे देता है, अदला-बदली हो जाती है और प्रेम का यह खेल गुपचुप चलता ही रहता है !      

Thursday, March 23, 2017

प्रोटीन बिस्किट


आज सुबह इस बात का अर्थ स्पष्ट हुआ कि यह जगत एक नाटक है, एक लीला है और उन्हें इसमें कुशलता से अपना पात्र निभाना है. जिस समय जो भी भूमिका मिले, उसे पूरी ईमानदारी से निभाते चलें तो कोई दुःख छू भी नहीं सकता, वे जो नहीं हैं, वह बनने का प्रयत्न करते रहते हैं और जो हैं उससे चूक जाते हैं, व्यर्थ के कर्मों का बंधन बांध लेते हैं. आज भी मौसम वर्षा का है, पंखे से ठंडी हवा आ रही है. इस समय उसका रोल एक लेखिका का है, एक कविता लिखेगी, इन्हीं भावों पर आधारित. कल से एक नई किताब पढनी शुरू की है, अच्छी लग रही है रूमी की कहानी. उसकी अपनी कहानी भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है.

आज सुना, शक्ति जब ऊपर के केन्द्रों में जाती है तो साधक के देखने की शक्ति बढ़ जाती है, लेकिन सत्य इन सबके पार है, वह देखने वाला है. ऊर्जा का सदुपयोग हो सदा इसके लिए सजग रहना है. कल नन्हा आ रहा है अपने दो मित्रों के साथ, जिनमें से एक लड़की है. उसने सोचा, देखे, ऊंट किस करवट बैठता है. बंगलूरू में ट्रैफिक ज्यादा है, प्रदूषण है हर तरह का. जिंदगी एक चुनौती है, जिसे उठाना ही होगा. वक्त ही बतायेगा कि भविष्य में क्या लिखा है.

मेहमान चले गये. आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. पिछले दिनों ब्लॉग पर पोस्ट डालने के अलावा कुछ नहीं लिखा. आज मौसम का मिजाज गर्म है. इस समय सुबह के दस बजे हैं. पिताजी अपने कमरे में बैठे हैं, टीवी बंद है, अख़बार पढ़ चुके हैं. नन्हे का संदेश आया है, सवा नौ बजे, ऑफिस जा रहा था. आज अपेक्षाकृत स्वस्थ है नूना, पिछले दो दिन तबियत ढीली-ढाली सी थी, लेकिन भीतर आत्मा का दीपक ज्यों का त्यों जलता रहा, शक्ति भी बनी रही. अभी कुछ देर पूर्व ग्लूकोज का एक गिलास पिया, मुँह का स्वाद अभी भी बिगड़ा हुआ है. एकाध दिन में सामान्य हो ही जायेगा, लेकिन यह अस्वस्थता उसे बहुत बड़ा पाठ पढ़ा कर गयी है. नन्हे के कारण भी कई पाठ पढ़ने को मिले हैं. वे अपने बनाये पूर्वाग्रहों के जाल में इस कदर जकड़े रहते हैं कि जरा सा भी विपरीत होने पर उसमें कसमसाने लगते हैं. समाज में हर तरह के लोग हैं, आदिकाल से होते आये हैं. हरेक अपनी तरह से जीता है. समाज कुछ नियम बनाता है जिन्हें पालन करना होता है, लेकिन अपनी जीवनचर्या के लिए किसी को नीचा देखना व्यर्थ है. यह खुद को नीचा गिराने जैसा है. हरेक स्वतंत्र है और अक्सर वे जिन बातों के लिए अन्यों को दोष देते हैं, जरूरत पड़ने पर खुद भी वही कर रहे होते हैं. अपने लिए एक कसौटी व दूसरों के लिए दूसरी कसौटी यही तो दम्भ है. इस तरह तो इस जगत में कोई भी दोषी नहीं है, यहाँ पूर्ण न्याय है. परमात्मा हरेक के भीतर है यदि व्यक्ति उसकी ओर नजर उठाकर देखे तो सारे प्रश्न गिर जाते हैं, भीतर समाधान मिल जाता है किसी के प्रति कोई राग-द्वेष नहीं रहता. जीवन एक सहज धारा की तरह बहने लगता है !
आज गुरु पूर्णिमा है, नैनी ने एक पुत्र को जन्म दिया है. उसे आश्चर्य हुआ. दो-दो बार तो संयोग नहीं हो सकता. उसकी बिटिया का जन्म गुरूजी के जन्मदिन पर हुआ, माँ ने उसका नाम मीरा रखा था. बेटे का जन्म गुरु पूर्णिमा के दिन, उसकी भक्ति भावना अवश्य सद्गुरु तक पहुंच गयी है.  

कल कुछ नहीं लिखा. स्वस्थ नहीं थी. आज सुबह अस्पताल गयी थी, शाम तक रिपोर्ट मिल जाएगी, सब कुछ सामान्य ही होगा. भोजन के प्रति जो दृढ आसक्ति थी, उसे छुड़ाने के लिए ही यह सब प्रकृति द्वारा रचा गया है. ‘शिव’ वह नई आत्मा जो नैनी के गर्भ से जन्मी है, अच्छा भाग्य लायी है. इतने शुभ दिन उसका जन्मना और इतनी सरलता से माँ को कष्ट दिए बिना धरती पर आना भी यही बताता है. उसके प्रति सहज ही स्नेह उमड़ता है, नवजात शिशु कितना निष्पाप होता है.

कल शाम बेहद तेज वर्षा हुई, मूसलाधार वर्षा. जून को आने में देर हुई, उसे लगा वह डाक्टर से उसकी मेडिकल रिपोर्ट डिस्कस कर रहे होंगे. लिवर में कुछ वृद्धि मिली है उसकी पाचन संबंधी सारी परेशानियां उसी के कारण हो रही हैं. अगले एक महीने तक दवा खानी है. देह में अतिरिक्त गर्मी के कारण ऐसा होता है. पर इन सब बातों के बावजूद उसकी भीतरी ऊर्जा वैसी ही है. परमात्मा की कृपा रूप जो कष्ट मिला है, उसने जीवन को एक नई दिशा दी है. व्यर्थ को छूट ही जाना चाहिए. जून उसके लिए प्रोटिनेक्स और प्रोटीन बिस्किट ले आए हैं. प्रोटीन से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ेगी, गुरूजी कहते हैं देह का सम्मान करो. उसने अपने लिवर को न जाने कितनी बार जलाया है. क्रोध, ईर्ष्या और भय के कारण, आज उससे क्षमा मांगी, उसे स्नेह भेजा, आगे ऐसा न करने का वचन भी देना चाहिए. परमात्मा उसके जीवन से सभी अवांछित बातों को हटाता जा रहा है. उससे परमात्मा को कोई काम होगा भविष्य में तभी तो वह उसे तैयार कर रहा है. इस वक्त भी जो कुछ उससे हो रहा है, वह उसी का है.