Thursday, May 25, 2017

अंत और आरम्भ


सुबह-सवेरे खबर मिली, बड़ी भांजी के यहाँ बिटिया का जन्म हुआ है. नार्मल नहीं हुआ यही एक बात अच्छी नहीं है. दीदी अभी वहाँ नहीं गयी हैं, दो दिन उनके बाद बेटे-बहू आ रहे हैं, पर उसे लगता है उन्हें जाना चाहिए, खैर..आज एक परिचिता का फोन भी आया, वह अपनी बेटी को आस्ट्रेलिया छोड़कर आई हैं. वहाँ सभी काम खुद करने होते हैं, अभी विवाह को एक ही वर्ष हुआ है. दो महीने के बच्चे को छोड़कर वह आ गयी हैं, इस भरोसे कि बिटिया की सास पहुंच जाएँगी, पर स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानी के चलते वह अभी जा नहीं पाएंगी.

कल मामीजी की आर्मी डाक्टर नतिनी अपने पांच वर्ष के पुत्र के साथ आ रही है, पिछले दो वर्ष से यहीं असम के किसी स्थान में पोस्टेड थी, जब जाने का समय निकट आया तो उसने सोचा एक बार मिलकर ही जाये. बड़ी ननद का फोन आया, अगले हफ्ते वे आ रही हैं. जो भी होगा अच्छा ही होगा, जागे हुए के लिए सब शुभ है, हर घड़ी, हर पल शुभ के सिवाय कुछ है ही नहीं. पिताजी की तबियत पूर्ववत् बनी हुई हैं, आज वे नींद में कुछ बोल रहे थे. पहले कहा, ‘नहीं लगा’, फिर कहा, ‘अच्छा हुआ’. आज भी बगीचे में कुछ काम करवाया, इतने बड़े बगीचे में कुछ न कुछ काम निकलता ही रहता है.

मेहमान सुबह-सवेरे पहुंच गयी, वे अभी उठे ही थे. उसका पुत्र बहत ऊर्जावान है, जैसे कि आजकल पांच वर्ष के बच्चे होते हैं. स्वयं भी बहुत बातें करती है. पति से तलाक का केस चल रहा है, कितने आराम से सारी बातें बता रही थी, जैसे किसी और के बारे में हों. जीवन में कितना कुछ घट जाता है जिस पर किसी का बस नहीं होता. वे अस्पताल भी गये पर पिताजी ने आँखें नहीं खोलीं. कल रात एक बहुत अजीब सा स्वप्न देखा, एक नवजात शिशु कन्या को देखा जो उसकी हमशक्ल थी, वह उसकी बेटी थी, वह ही थी या उसकी आत्मा थी. उसका सुंदर चेहरा और काले केश चेहरे के भाव, आँखों का रंग सब कुछ कितना स्पष्ट था स्वप्न में. उसे उसने जन्माया था पर कितने अलग ढंग से, वह श्वेत आवरण से ढकी थी जैसे कोई प्लास्टर लगा हो. ढकी थी कई वस्त्रों से, फिर उसे अनावृत किया. अद्भुत स्वप्न था वह. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, उसकी कृपा ही भीतर उजाला बनकर छा रही है.    

तीन दिनों का अन्तराल.. जिस दिन वे आए थे, उसके अगले दिन मेहमानों को लेकर रोज गार्डन गयी, शाम को पार्क व काली बाड़ी भी. उसी रात को पिताजी की साँस उखड़ने लगी, जो सुबह से ही तेज चल रही थी. एक जीवन का अंत करीब आ गया था, एक नये जीवन की शुरूआत होने वाली थी. रात को बारह बजे जून अस्पताल से लौटे. अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. दोपहर दो बजे लौटे. शाम तक लोग आते रहे, कल सुबह भी कुछ लोग आये, कल शाम को भी. आज छत पर काम करने वाले मजदूर आ गये हैं. नैनी किचन में काम कर रही है, सफाई कर्मचारी अपना कम कर रहा है, जीवन पहले सा चल रहा है पर एक चेतना अपना रूप बदल चुकी है, एक लहर सागर में समा गयी है एक नई लहर बनकर थिरकने के लिए. जून ने सभी कार्ड्स लिखे, वे लेकर ड्राइवर देने गया है. परसों क्रिया है. मंझला भाई आ रहा है, दोनों ननदें भी कल आ रही हैं. उसके मस्तिष्क में कई उदार कल्पनाएँ आ रही हैं, एक बच्चों का स्कूल खोलने की, एक बड़ों की क्लास लेने की, एक सत्संग करने की, एक मृणाल ज्योति के लिए एक स्कालर शिप देने की, जिसमें कुशाग्र विद्यार्थी को चुना जायेगा. पिताजी के नाम से होगी यह स्कालर शिप. लेडीज क्लब में एक नया प्रोजेक्ट भी खोलना है, योग और ध्यान का, जिसका नाम होगा आह्लाद ! जिसमें वे सप्ताह में एक दिन योग कक्षा चलाएंगे.


Wednesday, May 24, 2017

बड़ा सा घर


नये घर में उनका तीसरा दिन है. परसों दोपहर बाद वे सभी सामान लेकर यहाँ आ गये थे. पिछले दस दिनों से यानि बुद्ध पूर्णिमा के दिन से उन्होंने शिफ्टिंग का काम शुरू किया. उसी दिन से डायरी के पन्ने कोरे हैं. पहले दिन पूजा का कमरा यानि योग का कमरा ठीक किया. दूसरे दिन किताबें लाये, तीसरे दिन पिताजी के कमरे का सामान. एक दिन छुट्टी की, फिर पांचवें, छठे, सातवें दिन अन्य सामान और अंत में आठवें दिन शेष सारा सामान. अभी तक घर में कुछ न कुछ काम निकल ही आ रहा है, कोई बाथरूम लीक हो रहा था, कोई ट्यूब लाइट काम नहीं कर रही थी. धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. आश्चर्य है कि उन्हें एक बार भी वह घर याद नहीं आया, ऐसा लग रहा है जैसे वे इसी घर की प्रतीक्षा कर रहे थे. यह उनके स्वप्नों का घर था, बाहर का लॉन इतना बड़ा है कि आराम से एक विवाह की पार्टी हो सकती है. उनके गमले जो वहाँ सिमटे सकुचाये से थे, यहाँ खिल के अपना वैभव दिखा पा रहे हैं, उनके साज-सज्जा के सामान यहाँ कितनी मुखरता से अपना सौन्दर्य प्रदर्शित कर रहे हैं. इतना बड़ा और इतना सुंदर घर उसे ईश्वर की कृपा का अनुभव करा रहा है. इस घर में यह बाहर का बरामदा बैठने के लिए अच्छी जगह है, ऊपर पंखा भी है, सामने ‘नाइन ओ क्लॉक’ के फूल खिले हैं. कुछ ही दिनों में सामने की लंबी क्यारी में लगे जीनिया के फूल खिल जायेंगे. पिताजी अभी तक अस्पताल में ही हैं, उनका स्वास्थ्य सुधर नहीं रहा है, अब दोनों ननदों के आने की प्रतीक्षा है. लगभग दो हफ्तों बाद वे दोनों आ रही हैं, सम्भवतः उन्हें देखकर उनकी तबियत में कुछ सुधार आये.
कल शाम एक मित्र परिवार आया पहली बार इस घर में. नयी नैनी ने पहले दो गिलास शरबत बनाया फिर दो कप लाल चाय. रोज सुबह भी वह नींबू वाली ग्रीन चाय का एक कप लाती है उसके लिए. आज मौसम अच्छा है भीगा-भीगा सा, महादेव का अंतिम भाग आने वाला है. आज बहुत दिनों बाद वह विद्यार्थी आया अपनी नई साईकिल पर, आखिर वह समर्थ हुआ अपने आप कहीं जाने में. सुबह कितनी ठंडी थी, रात भर वर्षा होती रही. सुबह हरी घास पर टहलते हुए कई सारे स्नेल जीव बाहर किये, नन्हे पौधों को खा लेते हैं ये, आज बगीचे में मिट्टी डाली जा रही है. हेज के किनारे जमीन काफी नीची हो गयी थी. सद्गुरू कहते है, जीवन के अंत में यही पूछा जायेगा कितना ज्ञान प्राप्त किया और कितना प्रेम बांटा...उसके भीतर प्रेम का जो सहज स्रोत था वह आजकल शांत पड़ा है. प्रेम का स्वरूप बदल गया है, वह मौन में ही प्रवाहित होता है. दो महीने हो गये हैं उसे मृणाल ज्योति गये हुए, पिछले दिनों सेवा की भावना जैसे भीतर सिकुड़ गयी थी. पिताजी को इस हालत में देखकर भी कुछ न कर सकने का भाव अजीब सा है. विचित्र है मानव मन, अहंकार भी कितने-कितने रूपों में सम्मुख आता है. उसे कार की आवाज आयी, लगता है जून आ गये.
कल रात तेज वर्षा हुई, बगीचे में हेज के किनारे पानी भर गया है. इस समय धूप निकली है. जून अस्पताल गये हैं पिताजी के लिए दही और दाल के पानी का भोजन लेकर. आजकल उनका यही आहार है. मानव अपने अंतिम काल में कितना बेबस व निरीह हो जाता है, वे पूरी तरह से सोच और समझ तो रहे हैं पर बोल नहीं पाते. डाक्टरों की सहायता से उनके अंतिम समय को कुछ आरामदेह बनाया जा  सकता है, पर कष्ट से उन्हें मुक्ति नहीं दिला सकते. कल शाम जून ने नन्हे से होने वाली दुल्हन के लिए चेन खरीदने के लिए कहा, उसे थोड़ा नहीं काफी अजीब लगा. उसे अपने मन पर कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है, कब कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा, उसे खुद भी पता नहीं चलता. यह मन नामकी वस्तु दुनिया में सबसे अजूबी है. आज सुबह की साधना में काफी देर मन टिक गया, कितना कुछ दिख रहा था, मन ही रूप धरकर आ रहा था, पर वह साक्षी बनकर देख रही थी. पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है, भविष्य नामकी कोई वस्तु होती भी है या सिर्फ कल्पना ही है, हर क्षण जो उनसे मिलता है, वह तो वर्तमान ही बनकर मिलता है. कल जो बीत गया वह भी और कल जो आएगा वह भी.   


Monday, May 22, 2017

कविता और नृत्य


नन्हा आज चला गया, अभी तो रास्ते में ही होगा, रात तक घर पहुंचेगा. पिताजी को उसके आने से काफी अच्छा लगा, उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. उन्हें भी उसके रहने से अस्पताल की ड्यूटी में कुछ राहत मिली. सहायक की अनुपस्थिति में भी जून को रात को वहाँ नहीं सोना पड़ा. इस बार वह काफी शांत लगा. आज से सहायक सोयेगा जब तक उसका कोई अन्य काम नहीं निकल आता.
आज मौसम अच्छा है, मन भी सुवासित है, ऊर्जा का प्रस्फुरण हो रहा है. ऊर्जा का ही खेल है यह जगत. हर पल उनके भीतर से ऊर्जा का संचरण हो रहा है, सकारात्मक भी और नकारात्मक भी...जैसी ऊर्जा वे भीतर निर्मित करते हैं, वैसी ही बाहर भेजते हैं और वही उन्हें पुनः मिलती है. एक चक्र का निर्माण होता है. वे सद्भावनाएँ भेजते हैं तो वही उन्हें मिलती हैं. भीतर कठोर हो जाते हैं तो वही कठोरता कई गुनी होकर उन्हें मिलती है..ऊर्जा का अनंत भंडार उनके चारों और फैला हुआ है, वे चाहे जितनी ऊर्जा उसमें से ले लें. वह कभी समाप्त होने वाली नहीं है..प्रेम अनंत है..आनन्द अनंत है..शांति अनंत है..सुख अनंत है...और ज्ञान अनंत है...लुटा रहा है वह खुले दिल से..जितना भर ले कोई अपनी झोली में..जीवन एक अनमोल उपहार है जो परमात्मा ने स्वयं को व्यक्त करने के लिए उन्हें दिया है. वह प्रकट हो रहा है नृत्य की किसी मुद्रा में..चित्र में..कविता में और प्रकृति के हजार-हजार रूपों में..वह..
आज फिर ‘वर्षा’ रानी अपना जौहर दिखाने आयी है. कल दिन भर पिताजी लगभग सोये ही रहे, आज सुबह-सुबह जगे थे, नाश्ता भी किया, उनका नया घर तैयार हो रहा है. अगले महीने उन्हें वहाँ जाना है, जून का कनाडा का कार्यक्रम स्थगित होने जा रहा है, सम्भवतः उन्हीं दिनों वे शिफ्ट करेंगे. कल रात कोई स्वप्न देखा हो, याद नहीं आता पर वे तो दिन भर ही न जाने कितने स्वप्न देखते हैं, याद नहीं आता पर वे तो दिन भर में ही न जाने कितने स्वप्न देखते रहते हैं. ‘समाधि’ के अतिरिक्त शेष स्वप्न ही तो है. एक ही सत्ता है जो प्रतिबिम्बित हो रही है भिन्न-भिन्न रूपों में. ‘महादेव’ में पार्वती को समाधि का अनुभव होने वाला है. सद्गुरू की कृपा से उसे भी इसी जन्म में समाधि का अनुभव अवश्य होगा. नैनी की बिटिया यहीं पास में खेल रही है, पूछ रही है कि आप क्या कर रही है !
पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, आज अभी अस्पताल जाना है, पिताजी पहले से काफी ठीक हैं, उठकर बैठे भी, कहा, पोते की शादी देखनी है, इन्सान की जिजीविषा कितनी प्रबल है, वह हर कठिनाई को पार कर जीना चाहती है, कल नन्हे को कहा तो है कि वह तैयार हो तो जल्दी ही मंगनी की रस्म हो सके. कौन जानता है, भविष्य में क्या लिखा है ? परमात्मा हर वक्त उनके साथ है, बल्कि वही तो है..
पौने तीन बजे हैं, मौसम अच्छा है, ठंडी हवा बह रही है, अभी कुछ देर पहले उसका एक विद्यार्थी पढ़कर गया है. कह रहा था, बहुत दिनों से पापा से मार नहीं खायी, मार खाकर ऊर्जा आती है, अजीब बच्चा है, उसकी लिखाई खराब है, थोडा आलसी है, उसकी माँ ने ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ऐसा बना दिया है, और इधर उसका मन भी ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ही दिक् कर रहा है. पुराने संस्कार ढीठ बच्चे की तरह होते हैं, कहना ही नहीं मानते, उसे व्यस्त रहकर उनकी उपेक्षा रखनी है और कुछ नहीं हटाने से वे और भी जिद्दी हो सकते हैं. साक्षी भाव से उन्हें देखना भर है, अच्छा ! ऐसा भी होता है, कहकर आश्चर्य व्यक्त करना है..आज पुस्तकालय भी जाना है, बंगाली सखी को अपनी बेटी की किताबें पुस्तकालय में देनी हैं. आज फिर बिजली नहीं है. कल से वे अपने नये घर में कुछ सामान शिफ्ट कर रहे हैं.   


Friday, May 19, 2017

वर्षा और धूप


कल भांजी की शादी भी हो गयी. आज से उसका नया जीवन आरम्भ हो रहा है. कल रात एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह ‘सत्यनारायण’ की कथा करने वाली है, पिताजी, माँ भी हैं, उन्हीं का घर है, कोई नया स्थान है, नया घर है. अभी ड्राइंग रूम में मेज पर प्रसाद का सामान ढककर रखा है, नीचे फर्श पर झाड़ू लगाकर वे चादर आदि बिछाते हैं, तभी लोग आने शुरू हो जाते हैं, वे सोफे पर ही बैठ जाते हैं और पहले ही प्रसाद खाना शुरू कर देते हैं. फिर स्वप्न आगे बढ़ता है तो लोग बैठ गये हैं, वह पढ़ना शुरू करती है. कथा की पुस्तक की जगह एक कॉपी है जिसमें कुछ श्लोक है, उनका अर्थ भी लिखा है, शरुआत एक कहानी से करना चाहती है पर लोग कहते हैं, नहीं , यह तो कथा नहीं है. वह आगे पढ़ती है, जो लिखा है वह अस्पष्ट सा है, कुछ बोलती है पर लोग संतुष्ट नहीं होते, तभी हाथ में एक सांप आ जाता है, लम्बा, चमकदार सांप, जिसका तन वह सहलाती है और उसके सिर पर हाथ फेरती है. वह डंक निकालता है, कोई पूछता है, यह काटता नहीं तो वह कहती है इसमें जहर नहीं है. तभी लोग उठने लगते हैं, हॉल लगभग खाली हो गया है, पर उसके भीतर न कोई लज्जा है, न ग्लानि, न पीड़ा, सहज आनन्द है भीतर, तभी अलार्म बजता है और नींद खुल जाती है. शिवशंकर ने गले में सर्प धारण किया है, वही सर्प उसके हाथों में कैसा पालतू बना हुआ था. यह स्वप्न इशारा करता है उसी विकार की ओर जिससे वह मुक्त होना चाहती है. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है. कल छोटे भाई ने जिस आनंद की बात कही उसी में आज मन डूबता-उतराता है, किसी अदृश्य की झलक पायी है शायद..वह कितना महान है, उस जैसे जीव पर भी उसकी कृपा बरसती है. जिसे कुछ भी नहीं पता. आज सुबह से वर्षा हो रही है. उसकी कृपा ही इन बून्दों  के रूप में बरस रही है. जीवन एक अनमोल उपहार प्रतीत होता है परमात्मा का, जिसका होना ही उसके होने का प्रमाण है ! वही तो है !

आज गुरूजी का जन्मदिन है, सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी जिस कारण टीवी पर कोई प्रसारण नहीं आ पा रहा था. सीडी लगाकर अमृत वचन सुने. आज नैनी की बिटिया का भी जन्मदिन है और छोटी भांजी का भी. दोनों को शुभकामनायें दीं. वर्षा अब थम गयी है, हल्की धूप भी नजर आ रही है. अभी कुछ देर बाद अस्पताल जाना है, कल नर्सिंग डे था, टाफीस् रखी हैं पर्स में, सम्भव हुआ तो सिस्टर्स को देगी. घर से पिताजी का फोन आया, नन्हे से बात करना चाहते थे, बिजली का बिल जमा करने जा रहे थे. अपने को स्वस्थ रखने में वह सफल हुए हैं. छोटी ननद का फोन आया, बड़ी का स्वास्थ्य परसों बिगड़ गया था, वह बेटी के विवाह में बहुत थक गयी है. जहाँ वे ठहरे हैं, विवाहस्थल वहाँ से काफी दूर है. उसकी कल की रात भी स्वप्न लेकर आई, अस्तित्त्व उसे सचेत करने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता और वह हमेशा चूक जाती है. कल रात जून जल्दी सो गये, आजकल वह पिताजी की देखभाल बहुत प्रेम से कर रहे हैं, उनके दिमाग में एक ही बात है. पिताजी का स्वास्थ्य पहले से बेहतर है, ऐसा उन्होंने बताया. जिजीविषा ही है जो मानव को बड़े रोगों से लड़ने में सहायता देती है, हो सकता है उनके भीतर की इच्छा शक्ति इस रोग से उन्हें मुक्त कर दे और वे एक बार नये घर भी जा सकें और यात्रा पर भी. ईश्वर की कृपा अनंत है..कल रात उसे दो बार अनुभव हुआ जैसे मुँह से श्वास छोड़ रही है, जैसे पिताजी अक्सर करते हैं. सभी ऐसा करते होंगे नींद में. वे खुद को सोते हुए कहाँ देख पाते हैं, वे दूसरों के निर्णायक बहुत जल्दी बन जाते हैं. उनके वश में कुछ भी तो नहीं है, परमात्मा की बनाई इस सृष्टि में सब कुछ अपने आप घटित हो रहा है. उन्हें उसकी स्मृति से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. मन को शून्य में समाहित करना होगा, सत्य ही उनका एकमात्र आश्रय हो..उससे कभी च्युत न हों वे..

Thursday, May 18, 2017

स्कैवश की सब्जी


आज नन्हा आ रहा है, वर्षा सुबह से ही हो रही है. पौने दस बजने को हैं. उसे अस्पताल जाना है. पिताजी की पीठ में दर्द बढ़ गया है. चार-पांच चम्मच से ज्यादा दूध एक साथ नहीं पी पाते, बात करने में उन्हें दिक्कत हो रही है. आँखें कुछ कहना चाहती हैं पर उनमें देर तक देखने से एक शून्यता ही नजर आती है. ज्यादा देर आंख भी नहीं खोल पाते. दोनों बहनों को यहाँ आने के लिए जून ने कहा है, पता नहीं भविष्य में क्या छिपा है. सुबह आँख खुली उसके पूर्व ही नींद खुल गयी थी. अपना आप जिसे बड़े गर्व से पाला पोसा था था यानि अहंकार अपने त्याज्य रूप में सम्मुख आया, उसे भीतर की अग्नि में भस्म कर दिया. अब भीतर जो भी बचा है वही रखने योग्य है, वही पाने योग्य है, वही रखने योग्य है, वही है ही, उसके सिवा जो भी है वह अशोभनीय ही है, वास्तव में वह है ही नहीं. अच्छा हो या बुरा उस एक की सत्ता के सिवा जो भी है वह माया ही है. वह हर तरफ है, हरेक में है और स्वयं में भी है, उस एक की ही सत्ता है. जीवन रहते जिसे इस राज का पता चल जाये वही प्रेम का रस अनुभव कर सकता है. प्रेम जिसे सभी तलाश रहे हैं पर अहंकार जिसमें बाधा बन जाता है. अहंकार की आँख से उसका विकृत रूप ही दिखाई देता है, वह उन्हें जाने कितने-कितने उपायों से अपनी ओर बुलाता है. वे ज्ञान का अभिमान भरे उससे दूर ही रहते हैं.  

कल दोपहर समय से नन्हा पहुँच गया, वह भूल से किसी दीमापुर के यात्री का बैग ले आया था. कल एअरपोर्ट जाकर उसे अपना बैग लाना है. बंगाली सखी ने बताया उसकी  बिटिया ने अपना जीवनसाथी चुन लिया है. नन्हा रात को अस्पताल में रहा, सो रहा है इस समय. सुबह जून ने पिताजी को हरिओम कहा तो उसका जवाब दिया, इसका अर्थ हुआ वह सुन पा रहे हैं और समझ भी रहे हैं. लेडीज क्लब का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया जा रहा है, आज शाम को केक कटेगा और परसों शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा. उसका जाना संभव नहीं हो पायेगा. कल शाम उसे प्रेस जाना था, वापस आई तो नन्हे ने भोजन बना दिया था, आलू+करेले तथा आलू+स्कैवश की सब्जियां, उसने आटा भी सान दिया था. सब्जी काटना भी उसे आता है.


पिताजी आज पहले से बेहतर हैं, आम खाया तथा दाल का पानी पिया. नन्हा आज रात वहीं सो रहा है. वह बहुत समझदार हो गया है और मेहनती भी, खाना भी बहुत अच्छा बनाता है, उसका भविष्य उज्ज्वल है. आज बड़ी ननद की मंझली बेटी का विवाह है, सभी वहाँ पहुँच गये हैं. कल रात एक स्वप्न देखा, ( अभी तक स्वप्नों से मुक्ति नहीं हुई है) जिसने अहसास दिलाया कि भीतर अनंत ऊर्जा है, उन्हें उसका सदुपयोग करना है, वह दुधारी तलवार की तरह है, वही करुणा बन सकती है, वही कठोरता का बाना पहन सकती है. वही प्रेम का पुष्प बन सकती है और वही वासना का कीचड़ बन सकती है. वही शुद्धता, शुभता बन सकती है और वही कुटिलता, छल, पाखंड बन सकती है. परमात्मा कितना दयालु है, वह सभी को तारने के लिए उत्सुक है. उनके संस्कार व प्रमाद उन्हें बार-बार नीचे ले जाता है पर वह असीम धैर्यशाली है, प्रेमस्वरूप है, वह बार-बार मौका देता है. कांटे वे स्वयं चुनते हैं, वह तो पुष्प ही बाँट रहा है. आनन्द लुटा रहा है, वे अपनी झोली में कंकर पत्थर भरे बैठे हैं तो वह क्या करे, फिर भी वह थकता नहीं, लुटाये ही चले जाता है, असीम ऊर्जा का स्रोत है उसके पास !   

Tuesday, May 16, 2017

आम का मौसम


पिताजी पिछले कई हफ्तों से अस्वस्थ तो थे ही, अब उन्हें डिमेंशिया की समस्या भी हो गयी लगती है. समय का पता नहीं चलता उन्हें और अपने रोजमर्रा के काम करने में भी कठिनाई होती है. इस समय सो रहे हैं, दोपहर को उन्हें उठाया, पानी चाय, नाश्ता आदि दिया, दवा दी, फिर सो गये. प्रकृति  का यह नियम है जैसे एक चक्र पूरा हो रहा है. बूढ़ा फिर से बच्चा बन गया है, दीन-दुखिया से बेखबर..अपनी ही दुनिया में खोया हुआ. आज ‘मृणाल ज्योति’ की बीहू मंडली आने वाली है. पाँच बजे का समय दिया था पर अब तो साढ़े पांच हो गये हैं, किसी भी क्षण आते होंगे. जून आज दिल्ली गये हैं, दोपहर उनके जाने के बाद फिल्म देखी, ‘धूल का फूल’, नाम सुना था. पहले कभी देखी नहीं थी. महिलाओं पर अत्याचार न जाने कितने युगों से होते आये है. उन्हें इसके खिलाफ आवाज उठानी ही होगी, उसने भी उठायी थी अपने स्तर पर, आज आजादी का अनुभव भी होता है. कोयल के कूकने की आवाज आ रही है, आमों का मौसम है, कच्ची केरियों से पेड़ भरे हैं. उसने बाहर देखा, अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था, पर भारत में समय की कीमत कहाँ पहचानते हैं वे लोग !
सुबह शीतल थी, भ्रमण को गयी, लौटकर पिताजी को उठाया, सहायक को बुलाकर स्नान आदि कराया. नाश्ता दिया पर वे पचा नहीं सके, दोपहर तक वे अस्वस्थ ही रहे, उन्हें बेल का शरबत दिया जिसके बाद से वे ठीक रहे. जून के फोन आते रहे, दोनों ननदों के फोन भी आये. बच्चों की तरह हो गये हैं वे, फुसला कर खिलाना पड़ता है उन्हें.

पिताजी को पुनः अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल रात को उन्हें शुभरात्रि कहने के बाद से कई बार उनके कमरे में गयी, उनके पास जाकर आवाज दी पर उन्हें कुछ पता नहीं था. सुबह चार बजे के लगभग वह उठ गयी थी, टहलने गयी पर वापसी में एक विचार आया कहीं पिताजी उठ न गये हों, जल्दी-जल्दी लौटी तो वह वैसे ही आराम से सोये थे. धीरे-धीरे उनकी चेतना भीतर सिकुड़ती जा रही है, स्वाद का भी पता नहीं चलता और न ही प्राकृतिक वेगों का. कल से नैनी कितनी चादरें व वस्त्र धो चुकी है. वृद्धावस्था का यह काल शायद सभी को देखना पड़ता है. जून जब दिल्ली से वापस आये तो उनकी हालत देखकर तुरंत ही डाक्टर को फोन किया और उन्हें अस्पताल ले गये.

पिछले दो दिन उसके सिर में दर्द बना रहा, मन भी ठीक नहीं रहा, तन के स्वास्थ्य पर मन का स्वास्थ्य निर्भर करता है. आज सुबह प्राणायाम के बाद ध्यान में चाय का कप दो बार दिखा. पिछले दिनों दिन में दो बार चाय पी, अम्लता बढ़ गयी थी, सो कल से नहीं पी रही है, मन भी अपेक्षाकृत ठीक है. परसों नन्हा यहाँ आ रहा है. जून आज चौथे दिन भी अस्पताल में सोने गये हैं, कल से सहायक आ जायेगा जो कुछ दिनों से बाहर गया हुआ था. पिताजी का स्वास्थ्य सुधर रहा है, पर जब तक खुद चलने-फिरने लायक नहीं हो जाते घर नहीं आ पाएंगे. उसे अपना स्वास्थ्य भी पहले सा नहीं लग रहा है. उसके भीतर के भय और अन्य विकार भी स्पष्ट दिखने लगे हैं, जैसे कोई आपरेशन  चल रहा हो, सब कुछ निकाल कर स्वच्छ करना हो मन को ताकि परमात्मा अपनी पूरी गरिमा के साथ प्रकट हो सके.     


Monday, May 15, 2017

महर्षि दधीचि की कथा


आज पिताजी उठकर बैठे व व्हीलचेयर पर बैठकर बाहर घूमने गये, वह घर आने को भी कह रहे हैं. जब जून ने उनसे यात्रा पर जाने के बारे में पूछा तो कहने लगे, जायेंगे. उनके मन में आशा जगी है, ठीक होकर पुनः जीवन को गले लगाने की. मानव में जिजीविषा कितनी प्रबल होती है, यही भावना मृत्यु को सामने देखकर भी उससे पार जाने की चाह जगाती है. प्रकृति द्वारा प्रदत्त है यह जीने की आकांक्षा ! हृदय जोड़ने वाला तत्व है भावना, मानव भावना से ही जीता है लेकिन उसकी भावना एक सीमित दायरे में ही घूमती है.

आज भी मेघ महाराज पूरे ताम-झाम के साथ आये हैं. सद्गुरू स्वप्नों के बारे में बता रहे हैं. कल रात स्वप्न में बहुत सुंदर पीले व लाल रंग के फूल देखे, इतने चमकदार रंग थे उन फूलों के ! गुरूजी कह रहे हैं साधक को जब यह आभास हो जाये, उसे कुछ भी ज्ञान नहीं है, तब जानना चाहिए कि कुछ ज्ञान है. ज्ञान का अभिमान बताता है कि ज्ञान हुआ ही नहीं. मानव जीवन की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपने अनुभव से कुछ सीखता नहीं, एक ही भूल को बार-बार दोहराए चला जाता है. अभी कुछ देर में महादेव आने वाले हैं, शिव पार्वती को अष्टांग योग सिखा रहे हैं. जागरण, स्वप्न व सुषुप्ति के अतिरिक्त एक चौथी अवस्था भी है. जो स्वयं को उस अवस्था में रखना जान लेता है, वह ऊर्जा से भर जाता है. आभा युक्त, प्रकाश युक्त, दिव्य ऊर्जा से जो भर जाता है उसे कैसा अहंकार. स्वयं को तुच्छ के साथ जोड़कर देखे कोई तो तुच्छ ही रहेगा, स्वयं को नीचे गिराना क्या ठीक है ? आज अस्पताल में पिताजी थोड़ी देर चले, उन्हें घर जाने के लिए ठीक होना है. वह एक बार उनसे मिलने सुबह गयी थी फिर शाम को वे दोनों गये.

आज रामनवमी है. सुबह वर्षा हो रही थी. आज नैनी ने अपने पति से झगड़ा कर लिया अभी तक काम पर नहीं आई है. यह उसे जिव्हा से सताती है तो वह इसे शारीरिक कष्ट देता है. दोनों एक से बढ़कर एक हैं. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, इसी हफ्ते वे घर आ जायेंगे. आज सुबह अकर्ता भाव का कितना अनूठा अनुभव हुआ, सब कुछ अपने आप हो रहा है, ‘वे’ कुछ भी नहीं करते, ‘वे’ जो वास्तव में हैं. सुबह चार बजे नींद खुली, उससे पूर्व एक स्वप्न देख रही थी. एक अंग्रेज परिवार है. उसकी किशोरी कन्या चुप रहती है, पिता को इस बात का दुःख है, फिर अचानक एक दिन वह बात करती है तो प्रेरणादायक विचार उसके मुख से निकलते हैं !

पिताजी आज घर लौट आये हैं, नहा-धोकर अपने कमरे में लेटे हैं, बारह दिन वे अस्पताल में रहे, ईश्वर उन्हें स्वास्थ्य प्रदान करे ! आज सुबह ‘महादेव’ में महर्षि दधीचि की कथा देखी, बचपन में ‘हमारे पूर्वज’ में उनके बारे में पढ़ा था. आजकल बच्चों को वे कथाएं नहीं पढ़ाई जातीं. कितने युगों के साक्षी थे वह महर्षि. वे भी न जाने कितनी बार आये हैं इस दुनिया में. कल रात स्वप्न में फिर गुरूमाँ को देखा, कई बार पहले भी देख चुकी है. वे तीन नन्हे बच्चों की देखभाल कर रही थीं, बच्चे उनके नहीं थे. छोटी ननद का फोन आया, छोटा भतीजा गिरकर अपन घुटनों पर चोट लगा बैठा है.
परमात्मा अभी है, यहीं है, कितनी बार संतों के मुख से यह बात सुनी है. आज इसका अनुभव हुआ, होता ही आ रहा है कई बार, अब पक्का होता जा रहा है, जीवन एक खेल ही तो लगता है, इस अनुभव के बाद. अभी न जाने इस खेल में कितने मोड़ आने शेष हैं. कल जून ने कन्या के पिता को अपने आने की सूचना दी. जीवन की यात्रा में कोई साथ हो तो यात्रा कितनी सुखद हो जाती है, दो होकर भी एक और एक होकर भी दो..अद्वैत का अनुभव पहले इसी तरह होता है, फिर धीरे-धीरे वह प्रेम सारे अस्तित्त्व को घेर लेता है. पिताजी बाहर बैठे हैं. वह चुप ही रहते हैं ज्यादातर, शायद बोलने में ऊर्जा को व्यर्थ करना नहीं चाहते. कल स्टोर की सफाई की, गर्मियों के वस्त्र निकले, अब छह महीनों के बाद पुनः सर्दियों के वस्त्र बाहर निकलेंगे, मौसम का यह चक्र इसी तरह चलता रहता है.

   

Friday, May 12, 2017

बचपन की बेफिक्री


पिताजी की कमजोरी बढ़ती जा रही है, अब वे अपने आप उठने-बैठने में भी असमर्थता महसूस करने लगे हैं. स्नान के लिए भी उनके पास शक्ति नहीं थी आज, एक सहायक रख लिया है उनके लिए. उसी ने सहायता की. नाश्ता भी ठीक से नहीं खाया. इस जगत से प्रयाण कैसे धीरे-धीरे होता है. अचानक कोई नहीं जाता. जन्मते ही मृत्यु भी साथ हो लेती है. टीवी पर वर्षा के कारण कोई सिगनल नहीं आ रहा है. उसने एक सीडी लगाकर सुना, संत कह रहे थे, जिस कर्म और उसके फल में आसक्ति न हो तो वह कर्म भक्ति में बदल जाता है. कठिन काम करने से काम करने की योग्यता भी बढ़ती है. अभी-अभी नन्हे की एक मित्र व उसकी माँ से बात की. दो महीने बाद वे उन लोगों से मिलेंगे. जून अभी तक नहीं आये हैं, बादलों के कारण शाम जल्दी हो गयी है. छह बजे उसे क्लब जाना है, पत्रिका के लिए फोटोग्राफी होनी है. उसने सोचा अपना कैमरा भी ले जाएगी. बड़ी भांजी ने वसंत ऋत का सुंदर फोटो शूट किया है.

अज चैत्र नवरात्रि का पहला दिन है. चेट्टी चाँद भी आज है. रात कोई स्वप्न नहीं आया, आया भी हो याद नहीं है. दो दिन पूर्व का अजीब सा स्वप्न अब भी पहेली बनकर मन में बना हुआ है. माँ भी थीं उसमें, नन्हा छोटा था तब, उसके शरीर से अनवरत जलधार निकल रही है, जैसे शिव से गंगा की धारा, पर माँ कहती हैं, इसमें हवा भी है, जिसकी गंध अच्छी नहीं है, पर वह रुकता ही नहीं. वह समझदार है और कल तो उसने विवाह के लिए हाँ भी कह दिया, देखें अब लड़की के पिताजी कब तक नम्र पड़ते हैं. कल वे नये घर में नहीं जा सके, आज जून की मीटिंग है, वह अकेले ही जाएगी. वहाँ काम शुरू हो गया है. बड़ी भाभी का आपरेशन ठीक हो गया, अभी भी अस्पताल में हैं, समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई ऐसा भाई ने कहा. उन्हें अपने भीतर की शक्ति जगानी होगी.

पिताजी को आज अस्पताल ले जाना ही पड़ा. कल रात को जून चौंक कर उठ गये. उन्हें लगा जैसे पिताजी ने आवाज दी है, पर वे उस वक्त सोये थे. उनकी कमजोरी बहुत बढ़ गयी है. भोजन भी बहुत कम खाते हैं, बैठे-बैठे सो जाते हैं, नहाना भी नहीं चाहते. दो कदम चलना भी मुश्किल हो गया है उनके लिए. अब तो इतनी भी शक्ति नहीं है भीतर कि अपनी समस्या कह सकें, या आँसू ही बहा सकें. उसी कमरा नम्बर चार में उन्हें जगह मिली है जहाँ एक वर्ष पूर्व माँ रही थीं. जून उन्हें भोजन खिला के आयेंगे. वह सुबह मिलकर आई. नैनी की बिटिया गाना गा रही है झूम-झूम कर, यह उम्र कितनी बेफिक्र होती है.
सुबह के साढ़े सात बजे हैं, उस समय वर्षा हो रही थी जब जून सुबह बहुत जल्दी ही अस्पताल चले गये, पिताजी की देखभाल के लिए जो सहायक रखा है, उसे सुबह रिलीज करना था. उसने बताया रात को उन्हें नींद नहीं आ रही थी, तीन बजे वे दोनों सोये. परमात्मा मानव को शोधित करने के लिए ही दुःख देता है, पिताजी का दुःख उन्हें भी तपाकर शुद्ध कर रहा है. आत्मा के निकट हो जाना जिसने जीते जी सीखा हो, वही तो मृत्यु को सामने देखकर भी प्रसन्न रहता है.  


कल भी भीतर क्रोध का धुआं उठा, एक क्षण को ही सही, अब याद भी नहीं क्यों ? बाहर कारण कुछ भी रहा हो, उसे केवल भीतर देखना है. आज शाम को फिर ऐसा हुआ, लगता है कोई कर्म जगा है. मन की न जाने कितनी परतें हैं, किस जगह से क्या उठेगा, पता नहीं चलता. ध्यान आजकल नहीं हो पा रह है. पिछले चार दिनों से पिताजी अस्पताल में हैं, घर से अस्पताल जाते-जाते जून भी परेशान हैं. उन्हें कष्ट में देखकर मन भी द्रवित होता होगा. ऊपर से कितना भी कहें कि एक न एक दिन सबके साथ ऐसा होता है, पर अपने सामने किसी को धीरे-धीरे जाते देखना बहुत कष्टदायी है. उसका अंतर भी इस समय दुःख से भरा है, खुद भी आश्चर्य हो रहा है, सदा आनन्द से ओत-प्रोत रहने वाला मन क्यों ऐसा अनुभव कर रहा है, पर उसे तो इस दुःख को भी साक्षी होकर देखना है. जीवन रहस्यमय है. वे मन को कितना भी जानने का दावा करें, वह अथाह है. आत्मा द्रष्टा है, वे उससे जरा नीचे उतरे तो दुःख के शिकार होने ही वाले हैं. इसलिए तो कृष्ण को अच्युत कहते हैं. वह कभी अपने दृष्टाभाव से च्युत नहीं होते, जब वे स्वयं को मन, बुद्धि या अहंकार मानते हैं या कोई धारणा मानते हैं तो नीचे ही उतर आते हैं. आत्मा सदा सर्वदा एकरस है. व्यवहार करते समय उन्हें नीचे उतरना पड़ता है पर तब भी स्वयं को द्रष्टा मानना है. एक अभिनय ही तो करना है, अभिनय को सच्चा मानने से ही पीड़ा होती है. कल रात भी स्वप्न में दो हाथी देखे, एक बड़ा एक छोटा, नन्हे को भी देखा, पता नहीं काले मोटे जानवर और उसे एक साथ क्यों देखती है. कुछ भी तो पता नहीं है उसे..सिवाय उस एक के जो सदा हजार आँखों से उस पर नजर रखे है. परमात्मा और सद्गुरू का साथ न हो तो संवेदनशील व्यक्ति का इस जगत में रहना कितना कठिन है .  

नये घर का लॉन


शाम के साढ़े छह बजे हैं. जून अभी कुछ देर पूर्व डिब्रूगढ़ से पिताजी को इंजेक्शन लगवा कर आये हैं. वे बहुत थक गये हैं, तीन-चार बार कह चुके हैं कि उनके लिए रोटी न बनाई जाये. वह चाहते हैं कि सब उनके साथ सहानुभूति दिखाएँ, उनके दुःख को समझें और उन्हें मनाएं, पर उन दोनों को ही यह कला नहीं आती. जून तो चार घंटे से उनके साथ ही थे, आते ही कम्प्यूटर पर अपना नया मॉडेम लगाकर बैठ गये हैं. वह कुछ देर पहले टहल कर आई थी, भोजन बना रही थी जब वे आये. गर्मी भी एकाएक बढ़ गयी है. उनका दुःख कम करने के लिए वह क्या कहे उसे समझ नहीं आता. वैसे भी जरूरत से ज्यादा बोलना उसे अच्छा नहीं लगता. पिताजी लेट गये हैं चुपचाप. आज सुबह कैसा अजीब सा स्वप्न देखा था. नन्हा और वह छत पर हैं, एक किनारे जंगल जैसा खुला क्षेत्र है, अचानक काले-काले और ठिगने जानवर छत पर कूद-कूद कर आने लगते हैं. हाथी जैसे या गैंडे जैसे हैं वे. वह नन्हे को बचकर भागने के लिए कहती है. छत के बीच में सीढ़ियाँ हैं, जब खुद उसे जाना होता है तब एक को पैर से कुचल कर वह आगे सीढ़ियों की तरफ जाती है, तभी नींद खुल जाती है. कल रात नन्हे से बात नहीं हो पायी थी. सुबह यह स्वप्न देखने के बाद उससे बात की तो कहने लगा, एक जानवर से तो पीछा छूट गया अब और जानवर आ गये. वह समझदार है, स्वयं को सम्भाल लेगा. आज दोनों भाँजियों से भी बात हुई, वे दोनों इसी वर्ष माँ बनने वाली हैं, एक जून में एक अगस्त में. रेल से देखे दृश्यों पर उसने जो कविता लिखी थी, उस पर कई कमेन्ट आये हैं. बहुत दिनों से ‘बाल्मीकि रामायण’ की पोस्ट नहीं लिखी.

अभी कुछ देर पूर्व ही जून का फोन आया, उन्हें बड़ा घर मिल गया है. आज दोपहर बाद ही वे देखने जायेंगे, अगले छह वर्ष उन्हें उस घर में बिताने होंगे. कल शाम ही क्लब की एक सदस्या का फोन आया, उसे अगले वर्ष की क्लब की कमेटी में रहना होगा. अच्छा है उसने सोचा, बड़े घर में मीटिंग करने में आसानी होगी. एक भतीजी को भी आना है और ममेरी बहन की बेटी को भी, दोनों नये घर में आएँगी, नन्हे को भी आना है और उसके एक मित्र को भी, वे भी उस घर में कुछ दिन रह सकेंगे. इस घर से उनका बोरिया-बिस्तर अब उठने वाला है. आज सुबह भी कैसा अजीब स्वप्न देखा, पिताजी का क्रोध..क्या यह उसके ही मन की आवाज थी. वे उनका ज्यादा ध्यान नहीं रख रहे इसलिए शायद वे क्रोधित हों, ऐसा उसे लगा होगा. पिताजी का मूड खिल गया है नये घर में जाने की बात सुनकर, अब कुछ दिन वे अपनी अस्वस्थता भूले रहेंगे. जीवन एक नयी करवट लेगा. उसे इस लेन की महिलाओं को चाय पर बुलाना था, वह बात भी अब पूरी हो जाएगी.

पिताजी कल शाम से ही कमजोरी महसूस कर रहे हैं. आज का अख़बार उन्होंने छुआ भी नहीं. जून ने शिलांग से ड्राइवर को फोन कर दिया, सो उसने नये घर में लॉन मोअर पहुंचा दिया है, वहाँ लॉन की सफाई का काम शुरू हो गया है. कल शाम जून आकर देखेंगे, क्या-क्या काम करवाना है. आज सुबह नींद खुली, अभी उठती है, सोचकर पल भर को आँख बंद की तो स्वप्न लोक में पहुंच गया मन, सुंदर लाल रंग के फूलों से भरा कोना. एक बेंच पर बॉलीवुड के एक हीरो बैठे हैं, जून भी हैं. मन कितने ख्वाब बुनता है, छल करता है. प्रकृति की गहराई में जो अबदल छिपा है, उस पर टिकने से मन खो जाता है !   


Thursday, May 11, 2017

चेरी टमाटर


आज भी बादल बने हैं आकाश पर, ठंडी हवा बह रही है. पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. बुढ़ापा एक रोग है, उस पर कई रोग शरीर को लग जाते हैं. बुढ़ापा आने पर मृत्यु का भय भी सताता है और भी न जाने क्या-क्या घटता है मानव के मन के भीतर, पर जो अपने आप को जान लेता है, वह बच जाता है, जगत में कितने ही लोग ऐसे हुए हैं, जो जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझ कर मुक्त हो गये हैं.

पिछले तीन दिन व्यस्तता के कारण कुछ नहीं लिखा. दो दिन क्लब की कुछ सदस्याओं से मिलने गयी, उनकी विदाई के लिए कविता लिखने के लिए कुछ बातें जाननीं थीं. एक दिन होली थी, आज भी गगन पर बदली है. पिताजी अपेक्षाकृत बेहतर हैं. वृद्धा आंटी अभी तक अस्पताल में हैं. कल रात को एक अनोखा स्वप्न देखा. उसने एक छोटी कन्या का हाथ पकड़ा है, पर देखते-देखते वह घुटनों के बल चलती हुई दूर निकल जाती है पर उसका हाथ, हाथ में ही रह जाता है, घबरा कर उसे देखती है तो पता चलता है वह अधजला है, उसे छोड़ देती है और अगले ही पल शरीर से बाहर होने का अनुभव घटता है, देह से कुछ शोर करता हुआ बाहर निकलता है, घूमकर लौट आता है, पूरे वक्त होश बना हुआ था. कल की तरह पहले भी एक बार देह से बाहर का स्वप्न देखा था. परसों एक सुंदर रंगीन तितली को देखा था जिसे वह पकड़ना चाहती है. उसके रंग इतने चमकदार थे कि..कैसे अनोखे से स्वप्न..कुछ कहने कुछ बताने आते हैं पर रहस्य ज्यों का त्यों बना ही रहता है. आज क्लब में मीटिंग है, तीन महिलाओं के लिए तीन कविताएँ भी पढ़नी हैं. सभी तो यहाँ एक डोर से बंधे हैं..परमात्मा की डोर से..

अप्रैल का प्रथम दिन ! पिछले दो दिन फिर व्यस्त रही. शनिवार को घर में सफाई में, कल रात की पार्टी की तयारी में. अच्छा रहा कल रात्रि का आयोजन, सभी लोग आये थे, विवाहित और अविवाहित, तीन नन्हे बच्चे भी थे. अभी कुछ देर पहले मृणाल ज्योति स्कूल से आयी, उन्हें होली की मिठाई दी, रंग लगाया और योग-व्यायाम कराया. यकीनन उन्हें अच्छा लगा होगा, बगीचे के चेरी टमाटर भी ले गयी थी और एक लौकी भी. जून बाजार होकर आने वाले हैं, नैनी के बेटी के लिए एक स्कूल बैग, पानी की बोतल तथा एक कापी लेकर, आज ही उसका दाखिला थोड़ी दूर स्थित एक घर में चलने वाले स्कूल में कराया है.


पिताजी बाहर कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रहे थे. उसने जब कहा, थोड़ी देर लेट जाएँ तो कहने लगे, हाँ, परेशान हो रहे हैं वे. क्या कोई ऐसा भी समय आता है जब दुःख से बचने की भी जरूरत महसूस नहीं होती. कोई अपने दुखों से बच सकता है फिर भी नहीं बचता, कैसे विडम्बना है यह. मौसम आज भी बदली भरा है, ठंडा है, सुबह ढेर सा पानी पिया. होली के बाद से ही भोजन गरिष्ठ हो रहा था, मिठाई भी जिसमें शामिल थी, पानी तन की एक औषधि है, जैसे वायु एक औषधि है मन की, शायद अग्नि औषधि है आत्मा की ! इसी महीने एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखनी है एक ! 

Wednesday, May 10, 2017

जीवन की शाम


आँगन में आम के पेड़ से पंछियों की आवाजें निरंतर आ रही हैं. हवा दरवाजे को धकेल कर बंद कर रही है. प्रकृति निरंतर क्रियाशील है. कल शाम से उसे देह में एक हल्कापन महसूस हो रहा है, जैसे भार ही न हो और चलते समय एक तिरछापन सा लगता है, शायद यह वहम् ही हो. मन हल्का हो तो तन भी हल्का हो जाता है. पिताजी आज अपेक्षाकृत ठीक हैं. आज होली पर पहली कविता ब्लॉग पर पोस्ट की. हर कोई अपनी अहमियत किसी न किसी तरह जताना चाहता है, हर कोई उसी परमात्मा का अंश जो है, हर कोई पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता है, परमात्मा का भक्त भी पूर्ण स्वतंत्र है. परमात्मा उनके कितने करीब है, उनसे भी ज्यादा करीब..श्वासों की श्वास में वह है..सुक्षमातिसूक्ष्म.. जून आज देर से आयें शायद, उनके पूर्व अधिकारी आये हैं, शाम को उन्हें भोजन पर भी बुलाया है. पिताजी बाहर बरामदे में बैठे हैं, जून की प्रतीक्षा करते हुए, चटनी के लिए धनिया व पुदीना तोड़ लाये हैं बगीचे से.

कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. अतिथि अकेले ही आये, भोजन बच गया. आज सुबह वास्तविक अलार्म बजने से पहले ही मन में अलार्म की घंटी की आवाज सुनाई दी, जगाने के लिए अस्तित्त्व कितने उपाय करता है, कभी ऐसे स्वप्न भेजता है कि उठे बिना कोई रह ही नहीं सकता. कल शाम जून और पिताजी को योग वशिष्ठ पढ़कर पढ़कर सुनाया तो वे प्रसन्न हुये आत्मा के बारे में जानकर. अभी-अभी दो सखियों को होली के लिए निमंत्रित किया. गुझिया के लिए तिनसुकिया से खोया भी लाना है. शनिवार को जून ने एक कुर्ती का ऑर्डर किया था नेट से, आज पहुंच गयी, बहुत सुंदर एप्लिक का काम है उस पर. मौसम बहुत अच्छा है आज, हल्के बादल हैं और ठंडी सी हवा भी बह रही है. शायद कुछ दूर वर्षा हुई है. परमात्मा नये-नये रूपों में प्रकट हो रहा है. डायरी के पन्नों पर चमकते हुए प्रकाश कणों के रूप में, फिर श्वेत धुएं सा कोई बादल तैरता हुआ सा दीखता है, हाथ के चारों ओर नीले रंग की आभा के रूप में, सब कुछ कितना सुंदर लग रहा है, हवा, धरा, गगन और परमात्मा.. कल रात स्वप्न में ठोस वस्तु को देखते-देखते आकर बदलते देखा, स्वप्न कितने विचित्र अनुभव कराते हैं.  

कल शाम जून ने कहा शुक्रवार को वे कुछ सहकर्मियों को खाने पर बुलाना चाहते हैं, जबकि उसे होली पर या उसके बाद ही ऐसा करने का मन था, सो अपने मन की बात कही, कारण क्या था वह उसे स्वयं भी पता नहीं था, पर भीतर से यही आवाज आ रही थी कि शुक्रवार को ठीक नहीं रहेगा. आज सुबह जब जून को फोन आया कि उस दिन उन्हें बाहर जाना है तो बात स्पष्ट हो गयी, कोई अंतः प्रेरणा थी शायद. पिताजी की गर्दन में दर्द है, गर्म पानी की बोतल से सेंक करते-करते सो गये हैं, भोजन के लिए आवाज देने पर उठे नहीं. जून उनके लिए दर्द कम करने की दवा ले आये हैं. आजकल वे बैठे-बैठे भी सो जाते हैं, धीरे-धीरे चलते हैं और ज्यादा वक्त लेटे रहते हैं, शांत हो गये हैं. जीवन धीरे-धीरे सिमट रहा है, उन्हें देखकर ऐसा ही लगता है. टीवी देखना कम कर दिया है. दोपहर को जून के एक मित्र आये थे खाने पर, सदा की तरह देर से आये, जल्दी-जल्दी खाकर चले गये. इन्सान का स्वभाव बदलता कहाँ है, जैसे उसका मन..जो हल्की सी कसक, एक हल्का सा स्पंदन बना ही लेता है, लेकिन सद्गुरू कहते हैं पता तब ही चलता है जब कोई उसके पार हो जाता है. सूक्ष्म स्पंदन भी जब नहीं रहते, तब वह अचल, स्थिर सत्ता स्वयं को प्रकट करती है, वह स्वयं ही स्वयं को देख सकती है. आज ठंड काफी है, जून के आने के बाद वे भ्रमण के लिए जायेंगे. 

Monday, May 8, 2017

धर्मयुग का विशेषांक


कल रात अनोखा स्वप्न देखा. एक बिल्ली और उसका बच्चा..उसके पहले नन्हे को बचपन में देखा, उसे किसी बात पर डांट लगायी थी उसने. मन ग्लानि से भर गया, किस कदर मूर्खता से भरा कृत्य था यह. बहुत देर तक अपने इसी प्रकार के कृत्यों के लिए क्षमा मांगी. भीतर जैसे कुछ धुल-पुंछ गया हो. उनके जीवन की जड़ें न जाने कहाँ तक फैली हुई हैं..शायद पिछले जन्मों तक..वे अपने इर्द-गिर्द कितने ही कर्मों का जाल बना लेते हैं. उसने सोचा, आज सुबह से ऐसा कोई कृत्य तो नहीं किया जिसका परिणाम बाद में भोगना पड़े..जो भी किया सब समर्पण कर देना है. पल-पल उसी को समर्पित करते जाना है, तब कोई भी कर्म नहीं बंधेगा. परमात्मा सत रूप में जड़ में भी है, चित रूप में चेतन में है और आनंद रूप में सद्गुरु में है.  
कल जून आ गये, घर जैसे भर गया है. उनके न रहने पर मन कैसा शांत हो गया है, ऐसा प्रतीत होता था. शायद वह विरह ही था, परमात्मा ही तो उनके स्वजनों के रूप में उनके पास रहता है. पहले माता-पिता सन्तान के लिए देव स्वरूप होते हैं फिर आत्मीयजन, लेकिन इसकी खबर ही नहीं हो पाती अक्सर तो.. उसका गला पूर्ण रूप से ठीक नहीं है, लेकिन भीतर उत्साह का निर्झर फूट रहा है. आज महीनों बाद संगीत का भी अभ्यास किया. गान, ज्ञान और ध्यान तीनों जीवन को सुंदर बनाते हैं. सद्गुरु की प्रिय बहन की आवाज में मधुर देवी स्तुति सुनी. आज ‘महादेव’ में देखा लक्ष्मी भी नारायण से कहती हैं, उनके सिवा नारायण के हृदय में किसी अन्य का चिन्तन तो नहीं होता न ! हृदय तो आखिर एक ही है न.. महादेव का पुनर्विवाह भी दिखाया जायेगा, वे सनातन प्रेमी हैं, पुरुष और प्रकृति दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं, आत्मा व परमात्मा की तरह ! पति-पत्नी कितने पवित्र बंधन में बंधे होते हैं, एकदूसरे के लिए ही मानो उनका जीवन होता है, जीवन को सरस बनाते हैं ये रिश्ते, लेकिन आत्मबोध हो जाने के बाद ही कोई इन रिश्तों की अहमियत समझ सकता है. पिताजी का स्वास्थ्य बेहतर है. कल उन्हें पहला इंजेक्शन भी लग गया. वे सौ वर्ष जियें, उनके साथ बैंगलोर चलें, ऐसी वह शुभेच्छा करती है, उनमें जीवन के प्रति असीम उत्साह है, ऐसे व्यक्ति से मृत्यु भी दूर भाग जाएगी.
पिछले तीन दिन फिर नहीं लिख सकी. शुक्रवार को ‘बंद’ था, जून घर पर ही थे, उसके बाद सप्ताह का अंत ! दोपहर के पौने तीन बजे हैं, वह लॉन में फूलों के पास पोखरी के निकट बैठी है. नन्हे-नन्हे गुलाबी फूल भी खिले हैं जो तीन पत्ते वाली खट्टी घास में अपने आप ही उग आये हैं. चिड़ियों की मधुर आवाजें वातावरण को सरस बना रही हैं. न जाने कौन से पंछी अपना कलरव गुंजा कर जाने क्या कह रहे हैं. प्रकृति में हर क्षण कुछ घट रहा है पर एक गहन रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है यह. अभी-अभी नासापुटों में एक मदमस्त करने वाली सुगंध भर गयी है, हवा का कोई झोंका उसे अपने साथ लिए आया है. उसने एक गीत लिखा. सुबह चार बजे नींद खिली पर कुछ पल नहीं उठी तो एक स्वप्न देखा, एक छोटा बच्चा रो रहा है, शायद वह नन्हा था, उसे चुप कराने का प्रयास करती है तो नींद खुल जाती है, उनकी आत्मा कितनी सजग है, वह हर पल उन्हें जगाये रखना चाहती है.

पिताजी का स्वास्थ्य लगता है आज ठीक नहीं है, आज उन्होंने अपना पसंदीदा कार्य, दूध लेना व गर्म करना नहीं किया. वह बगीचे से पालक तोड़कर लाये हैं. आज नेट नहीं चला, सो उसने पढ़ने के लिए बाईस वर्ष पुराना धर्मयुग का एक विशेषांक निकाला है. दीदी व छोटी बहन से बात हुई, छोटी बहन के यहाँ आज रात्रि भोज है, देर रात तक चलने वाला. वे लोग नया बिजनेस भी शुरू कर रहे हैं. एक कम्पनी का को-ओपरेटिव स्टोर चलाएंगे, तीन परिवार मिलकर. शाम को अस्पताल जाना है, वृद्धा आंटी कुछ दिनों से अस्पताल में हैं, कल रात बेड से गिर गयीं, शायद सिर में चोट लगी है. बुढ़ापे में कितने कष्ट झेलने पड़ते हैं, इन्सान विवश हो जाता है.   

Friday, April 28, 2017

चीजलिंग का नाश्ता


आज सुबह एक स्वप्न देखा, पिछले दिनों भी कई अद्भुत स्वप्न देखे पर सुबह उठकर याद नहीं रहे, लिखा नहीं कुछ. कल देखा, एक विशाल नदी है, सागर जैसी. किनारे पर एक संकरी गली है, उसमें वह जाती है, एक गेंद जैसा हाथ में कुछ है, जो गिरकर दूर तक निकल जाता है. एक बच्चा उसे वहाँ से फेंक देता है जो नदी के किनारे के दलदल में गिर जाती है, वह उसे पकड़ने नदी में उतरती है गेंद को पकड़ते समय लहरों में आगे खींच ली जाती है. किनारे के लोग कहते हैं, डूब रही है, पर वह बड़े आराम से लहरों को पार करते-करते दूसरे किनारे पर पहुंच जाती है. आज पिताजी को डिब्रूगढ़ जाना था, वह लम्बी यात्रा से थक जाते हैं. आज दो सदस्याओं  के लिए लिखी विदाई कविताएँ टाइप कर लीं थीं. जून ने उनके लिए बहुत सुंदर कार्ड बनाये हैं.

पिछले दो दिन नहीं खोली डायरी. परसों से पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. दो दिन देशव्यापी बंद भी रहा. जून घर पर ही थे. सुबह वे टहलने नहीं गये, शाम को जाना है. फूलों का दर्शन भी करना है. गेस्ट हॉउस व क्लब में फूलों का मेला लगा है. सुबह उठे तो पिताजी बिस्तर पर नहीं थे, वे दोनों पानी पी रहे थे कि जोर की आवाज आई. जून दौडकर गए, बाथरूम का दरवाजा बंद था अंदर से उनकी आवाज आयी, गिर गये हैं, पर ठीक हैं, अभी दरवाजा खोलते हैं, पर दो-तीन मिनट बीत गये, फिर दुबारा पूछा तो बोले, खोलते हैं, रुको. दो-तीन मिनट और बीते तब दरवाजा खोला. उनके सिर पर बाएं ओर चोट लगी थी, हल्का गुलाबी रंग हो गया था, पर खून नहीं निकला था. उन्हें बिस्तर पर लिटाया. वे सो गये. कुछ देर बाद उन्हें उठने के लिए कहा तो मना करने लगे. फिर दर्द के कारण जब सिर को दबाया तो खून निकल आया. उन्हें अस्पताल ले गये, पट्टी बांध दी है और दवा भी दी है. अब नाश्ता करके बाहर बैठे हैं, धूप उन्हें अच्छी लग रही है. आजकल वह अपने को बहुत दुर्बल मानने लगे हैं, बात-बात पर उनकी आँखें नम हो जाती हैं. वृद्धावस्था व्यक्ति को विवश कर देती है. अभी फरवरी चल रहा है पर धूप में तेजी आ गयी है.

फिर तीन दिनों का अन्तराल. आज पिताजी का सी टी स्कैन हुआ. सोमवार को रिपोर्ट मिलेगी. जून कल दिल्ली जा रहे हैं, बुध को डाक्टर को मिलते हुए लौटेंगे. उनकी किडनी में शायद कुछ समस्या हुई है. उम्र ज्यादा होने पर शरीर के अंग अपनी कार्य क्षमता खो बैठते हैं. कल शाम बंगाली सखी की दीदी आयी थीं, उनके लिए एक कविता लिख भेजी है, उन्हें अच्छी लगी. जून सुबह से पिताजी के साथ ही थे अस्पताल में, अब दफ्तर गये हैं. बड़ी ननद की बड़ी बेटी ने पुत्र को जन्म दिया है. दुनिया इसी तरह चलती जा रही है. उसका अंतर परमात्मा के प्रेम से लबालब भरा हुआ है ! उसका साथ कितना मधुर है. जगत भी सुंदर है तो उसी के कारण, क्योंकि जो चेतना उसमें है वही सबमें है, सब उसी के कारण जीवंत हैं.


शाम के पौने पांच बजे हैं, अभी आकाश में सूरज का उजाला है, विदा लेते हुए सूरज का अंतिम उजाला. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, उन्हें मूड़ी व चीजलिंग गर्म करके दिए उसमें काला नमक व काली मिर्च डालकर, पसंद आये, पिछले दो दिनों से ब्लॉग पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया. लिखने की कोई वजह नजर नहीं आती, मन ध्यान में डूबा रहना चाहता है.

Thursday, April 27, 2017

पीला गुड़हल


आज शाम को क्लब में मीटिंग है. खुद से परिचय जितना गाढ़ा होता जाता है, पता चलता है वे मालिक हैं पर नौकरों की भूमिका निभाते रहते हैं. मन व बुद्धि उनकी सुविधा के लिए ही तो हैं पर वे वही बन जाते हैं. जल जैसे स्वच्छता करने के लिए है, पर जल यदि गंदा हो तो सफाई नहीं कर पाता है, वैसे ही मन तो जगत में प्रेम, शांति व आनन्द बिखेरने के लिए हैं पर जो मन क्रोध बिखेरता है वह तो वतावरण को दूषित कर देता है. परमात्मा की निकटता का यही तो अर्थ है कि उनका मन परमात्मा के गुणों को ही प्रोजेक्ट करे न कि अहंकार के साथियों को जो दुःख, क्रोध, ईर्ष्या आदि हैं. इस समय दोपहर के दो बजे हैं. पिताजी सो रहे हैं, उनकी पीठ में दर्द है. आज सुबह अस्पताल गये थे सेंक लिया व ट्रेक्शन भी. आज बिजली नहीं है. हल्की हवा चल रही है. अब धूप तीखी हो गयी है. उसमें बैठा नहीं जाता. जरबेरा व गुलाब अपनी मस्ती में खिले हैं. कंचन में भी तीन-चार फूल आ गये हैं.

आज जून पिताजी को लेकर तिनसुकिया गये हैं, एकाध घंटे में वापस आएंगे. सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह विदेश में रहने वाली अपनी विवाहिता पुत्री को लेकर दोपहर बाद आयेंगी. सुबह वह एक सखी के होनहार पुत्र से मिलने गयी, उसने दो परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, उसे NASA की तरफ से बुलावा आया है. कल टीवी के कार्यक्रम वाह ! क्या बात है ! में एक कर्नल ने शानदार प्रस्तुति सुनी. लोगों के नामों को लेकर उसने एक लम्बी कविता बनाई और हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया. जीवन कितने विभिन्न रंगों से मिलकर बना है.
आज वह पीले गुड़हल का एक पौधा लायी है. शाम को एक शादी में जाना है, नन्हे के बचपन का मित्र. जून के दफ्तर में एक कर्मचारी की माँ का देहांत हो गया था, उनके यहाँ भी जाना है. विरोधी तत्व कैसे जीवन में साथ-साथ चलते हैं. द्वन्द्वों के पार हुए बिना मुक्ति नहीं है. आज हिंदी में शमशेर बहादुर सिंह का लिखा पाठ पढ़ाया, थोडा क्लिष्ट है.

आज वेलेंटाईन डे है. जून कल उसके लिए एक ड्रेस तथा एक जूता लाये हैं, ढेर सारे फल भी, रसभरी, बेर, अनार, अमरूद और सेब...इस समय ग्यारह बजे हैं, पिताजी बाहर माली को कुछ काम बता रहे हैं. अब उनका स्वस्थ्य कुछ ठीक है. उनमें दृढ़ इच्छा शक्ति है, दया है, दूसरों का दुःख समझते हैं, कुछ भावुक हैं, हृदय प्रेम से भरा है, बात-बात पर आंसू निकल आते हैं और वह स्वयं कैसी होना चाहती  है, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना, जो सदा परमात्मा का सान्निध्य चाहती है. निज स्वभाव से जो खुशबू फैलती है, वह शाश्वत है, जो पद, यश या धन के कारण प्रसिद्ध होता है तो कारण हट जाने पर वह स्वयं को दुर्बल मान सकता है, लेकिन स्वभाव में टिका व्यक्ति सदा ही प्रसन्न रहता है और उसके जीवन से ही ऐसी सुगंध निकलती है कि आस-पास का वातावरण सुवासित हो जाता है. कल उसे सरस्वती पूजा के लिए स्कूल जाना है. जून कर भेज देंगे, अब उन्हें  भी कार मिल गयी है. नन्हे ने ‘अनुगूँज’ शब्द का अर्थ दो-तीन पंक्तियों में अंग्रेजी भाषा में लिखकर भेजा है, बहुत अच्छा लिखा है, लेडिज क्लब की पत्रिका का यह नाम नूना ने चुना था. संपादिका को भेज दिया है. आजकल शाम को वह ‘योग वशिष्ठ’ पढ़ती है, शायद इसी का असर हो, पिताजी आस्था देखने लगे हैं.


उसे लगा मृणाल ज्योति में की सरस्वती पूजा उसके जीवन की पहली सच्ची पूजा थी, आज सुबह चढ़ाया प्रसाद भी शायद पहला प्रसाद था जो वास्तव में ईश्वर को अर्पित करके मिला था. दोपहर को बंगाली सखी के यहाँ गयी वहाँ भी पूजा का आयोजन किया गया था. उसका फूलों का बगीचा बहुत सुंदर है. उन्हें भी इस वर्ष बड़ा घर मिल जायेगा फिर वे भी ढेर सारे फूल उगायेंगे. दोपहर बाद रोज गार्डन गयी, अपने आप में डूबने का सबसे अच्छा तरीका है टहलना ! 

Wednesday, April 26, 2017

तीन गुलाब


आज दोनों बहनों से बात हुई, छोटी बहन दुबई जा रही थी, उसके पतिदेव को ओमान जाना था. इसी महीने उसके विवाह की वर्षगांठ है. बाईस वर्ष हो गये उनके विवाह को, कार्ड भेजा है. बड़ी के यहाँ खूब वर्षा हो रही है. उन्होंने कहा, उसके जीवन की कहानी पढ़कर उनकी उसके बारे में जो धारणा थी वह टूट रही है. वे अपनी कल्पना से ही किसी के बार में धारणाएं बना लेते हैं, सत्य का उससे कोई संबंध नहीं होता, उसने सोचा उन्हें एक पत्र लिखेगी. जून आज लंच पर नहीं आये, सुबह सात बजे गये थे शाम सात बजे ही आएंगे. सुबह कहा, वह जीत गये, कल उन्होंने ऑफिशियल पार्टी में जूस पीया. अब सत्संग का असर हो रहा है, गुरू का रंग चढ़ रहा है. सुबह साधना भी करते हैं. आसक्ति ही दुःख का कारण है. आसक्ति से प्रमाद होता है, प्रमाद से मद, मद से अहंकार और अहंकार दुःख का भोजन है. आसक्ति मिटने के लिए भीतर का आनन्द मिलना ही एकमात्र शर्त है. आसक्ति के कारण ही कामना उपजती है, कामना यदि पूरी हुई तो लोभ पैदा होगा और न हुई तो क्रोध. परमात्मा से मिलने में रुकावट कामना ही तो है. प्रेम के जिस धागे में यह जगत पिरोया हुआ है, उसे ही परमात्मा को प्रकट करने में सहायक बनाना है. आज क्लब की एक सदस्या से मिलने गयी, उनके लिए विदाई कविता लिखनी है.

अभी–अभी पड़ोस में रहने वाले ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर से मिलने गयी, आने वाले मंगलवार को गुरुपूजा करवानी है. कुछ लोगों को निमन्त्रण भी देना है. आज ठंड फिर बढ़ गयी है, उत्तर भारत में भी कड़ाके की ठंड पड़ रही है. उसे लगता है वे कुछ नहीं होकर अर्थात खाली होकर ही पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं. जीवन की यात्रा में उस परम का अनुभव ही एकमात्र सार्थक अनुभव है, पर उसके लिए मन को छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठाना होगा. अप्रमत्त, अप्रमादी बने बिना साधना में प्रगति नहीं हो सकती. कर्मठ, कर्मशील ही भीतर का राज्य पा सकते हैं. जून आज दिल्ली गये हैं, शाम का वक्त है, उसके पास दो घंटे हैं, कुछ पढ़-लिख कर ध्यान करने वाली है.

कल शाम मन ठहर ही नहीं रहा था, देर तक पढ़ती रही फिर टीवी देखा. वे जो भी चाहते हैं उसका विपरीत साथ चला ही आता है, बिन बुलाये मेहमान की तरह. वे प्रेम तो चाहते हैं पर घृणा को जो साथ ही चली आती है, दबा लेते हैं, वही विकार बनकर प्रकट होती है. इसलिए बुद्ध कहते हैं, इच्छा ही दुःख का कारण है. सम्मान की आशा रखने वाले को अपमान के लिए तैयार रहना ही चाहिए. जीवन दो पर टिका है. महाजीवन दो के पार है. पिताजी ने स्वीपर को सफाई के सिलसिले में कोई बात कहनी चाही तो उसने उन्हें टोक दिया, बाद में लगा ऐसा नहीं करना चाहिए थे. उन्हें बात करने के लिए कोई तो चाहिए. उसका काम तो दिनभर मौन रहकर भी चल जाता है. शब्दों को लिखकर ही जो काम हो जाता है, फिर बोलने से सब गलत हो जाता है. कल गणतन्त्र दिवस है, एक छोटी सी कविता लिखी. सकारात्मक भावनाओं की ज्यादा जरूरत है आज वैसे ही वातावरण इतना बोझिल है..गुलाब के तीन बड़े से फूल खिले हैं, अपनी शान में झूम रहे हैं, वैसे हवा तो नहीं चल रही है, पर अदृश्य गति है उनकी जो दिख रही है. पिताजी ने पूरे बगीचे में पानी डाला है, साफ-सुथरा बगीचा अच्छा लग रहा है. काल चक्र निरंतर बढ़ रहा है, उन्हें उसके साथ चलना है. धर्म की धुरी को पकड़ अर्थात अपने भीतर उस एक शांत सत्ता को पकड़ कर उन्हें इस परिवर्तनशील संसार में विहार करना है. जीवन हर जगह है, परमात्मा कण-कण में है, उसका अनुभव करते हुए निर्भार होकर निष्काम कर्म करना है.  

आज पंचायत के चुनावों के कारण अवकाश है. पिताजी का स्वास्थ्य अब उतना ठीक नहीं है. बड़ी ननद की बेटी की शादी मई में होनी तय हुई है पर वे जा नहीं पाएंगे, ऐसा कह रहे हैं. कल शाम माँ के बारे में बहुत सारी बातें उन्होंने बतायीं, जिन्हें वे रिकार्ड करेंगे.

Tuesday, April 25, 2017

कुम्भ का मेला


कल नहीं लिखा, सुबह स्कूल गयी, दोपहर को नेट और ट्यूशन, शाम को भ्रमण और सत्संग, फिर बालिका वधू और समाचार, दिन निकल गया. बीच-बीच में पिताजी से सम्मुख, जून और नन्हे से फोन से बातचीत. आज इस समय शाम के साढ़े सात बजे हैं, जून दोपहर बाद लौट आये हैं. सदा की तरह उसके लिए एक उपहार लाये हैं, सिल्क का सूट ..बहुत सुंदर है और बहुत महंगा भी ! नन्हे ने कहा, उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, वह परिपक्व है, जल्दी हो गया है, हर आगे वाली पीढ़ी पहले से ज्यादा समझदार होती है. वह अपने जीवन पर नजर डालती है तो साफ लगता है, उसकी दृष्टि ही साफ नहीं थी, बुद्धि परिपक्व नहीं थी, परमात्मा ने उसे धीरे-धीरे अपनी ओर आकर्षित किया.
बाहर लॉन में झूले पर बैठकर गर्म जैकेट और कॉट्स वुल के वस्त्रों के बावजूद सुरमई शाम की ठन्डक को महसूस करते हुए लिखना एक अनोखा अनुभव है. सामने साईकस का विशाल पेड़ है, गमले में है पर पत्ते कितने बड़े हो गये हैं, जिनमें मकड़ी ने अपना घर बना लिया है. सुबह ओस के कारण श्वेत रुई से बना प्रतीत होता है. आकाश का रंग सलेटी है, बादल हैं या कोहरा, कुछ समझ में नहीं आता. लोहे के झूले का स्पर्श ठंडा लग रहा है पर गालों को छूती शीतलता भली लग रही है. अभी कुछ देर में वे सांध्य भ्रमण के लिए जायेंगे. सुबह ‘महादेव’ देखा, गणेश का चरित्र कितना अच्छा दिखाया है तभी वे प्रथम पूज्य हैं.
वर्षों पूर्व जो सफर आरम्भ हुआ था अनजाने ही, अब वह पूर्णता की और जाता प्रतीत होता है. हर सवाल का जवाब भीतर ही है, बाहर नहीं है, बाहर आते ही सब कुछ असत्य हो जाता है. पौने आठ बजे हैं, जून और पिताजी टीवी पर अपनी-अपनी पसंद के कार्यक्रम देख रहे हैं. उसे इस क्षण कुछ देखने की चाहत नहीं है. आज सुबह परमात्मा शब्दों के रूप में बरसा. महाकुम्भ पर लेख पूर्ण हो गया, भेज दिया है. परमात्मा परम प्रसाद है, रसपूर्ण है. सुबह के घने कोहरे के बाद अब धूप निकल आई है.
आज मकर संक्रांति है, सुबह से उत्सव का माहौल ! उन्होंने प्रातःराश में चिवड़ा, गुड़ व दही ग्रहण किया साथ में आलूगोभी की सब्जी. टीवी पर कुम्भ के मेले में लोगों द्वारा स्नान करने के चित्र देखे. भीतर से प्रेरणा उठी उन्हें भी एक बार कुम्भ जाना चाहिए. जून ने कहा यदि वे दिल्ली गये तो उसे ले जा सकते हैं. नाश्ते के बाद वह मृणाल ज्योति के बच्चों द्वारा बनाये नये वर्ष के कार्ड्स बांटने गयी. पहले एक उड़िया सखी के यहाँ, वह स्नान कर रही थी, पतिदेव आये, धोती पहने हुए पूजा के वस्त्रों में, फिर एक बिहारी सखी के यहाँ गयी, वह पूजा कर रही थी. उसके पतिदेव सिल्क का कुरता पहने हुए थे, तिल का लड्डू खिलाया. असमिया परिचिता के यहाँ तिल व मूंगफली का एक लड्डू मिला, उनके यहाँ भी बीहू का नाश्ता लॉन में सजा था. एक अन्य उड़िया परिचिता घंटी वाले मन्दिर के बाहर बैठे लोगों के लिए भोजन  ले जाने की तैयारी में लगी थी, उसका लॉन बहुत सुंदर था, कमल की कलियां भी थीं. उसके एक छात्र की माँ ने चावल की खीर परोसी, जो गुड़ डालकर बनाई थी. वह चने की दाल, पूरी व खीर का नाश्ता कई लोगों को करा चुकी थीं. उनके यहाँ तीन सर्वेंट परिवार हैं. सभी लोग इस दिन दान-पुन्य करते हैं. एक अन्य सखी के यहाँ भी कई बच्चे थे. वह अपने भाई के पुत्र को नहलाकर तैयार कर रही थी, वे लोग यात्रा पर जाने वाले थे. एक अन्य परिचिता ने अदरक व तेज पत्ता डालकर लाल चाय पिलाई. लोग कितने प्यार से मिलते हैं, स्वागत करते हैं, एक महिला घर पर नहीं मिलीं, उनके पतिदेव ने कहा, आइये आंटी जी, क्या वह इतनी बुजुर्ग लगने लगी है. एक अन्य परिचिता पूजा करके उठी थीं, उन्हें शाम को सत्संग में आने के लिए कहा. दो अन्य को संदेश भेजे हैं, दोनों क्लब गयी होंगी, आज के दिन क्लब में भी विशेष भोज होता है. जून दफ्तर गये हैं. कल शाम वे जून के बॉस के परिवार को पहली बार बुला रहे हैं, पहले बाहर आग जलाएंगे, फिर भीतर रात्रि भोज.

बीहू का अवकाश समाप्त हो गया. कल दोपहर वे नदी किनारे गये, पानी में लहरों के हिलने पर डूबते सूर्य का पतिबिम्ब अनोखी छटा प्रस्तुत कर रहा था. कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. सुबह वह नर्सरी गयी थी. गेंदे, कैंडीटफ्ट व पिटुनिया के पौधे लाने. मार्च तक फूल आ जायेंगे उनमें.  

Monday, April 24, 2017

सूरज का लाल गोला

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नये वर्ष का चौथा दिन ! कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस वक्त भी बादल बने हैं. जून आज मुम्बई गये हैं, कल कोचीन जायेंगे. वे यात्रा के नाम से बहुत प्रसन्न होते हैं, उन्हें नये-नये स्थान देखना भी भाता है और यात्रा की परेशानियाँ जरा भी परेशान नहीं करतीं. महर्षि अरविन्द पर लिखी एक पुस्तक बंगलूरू की उस दुकान से खरीदी थी, जहाँ किताबें ही किताबें पड़ी थीं, सीढियों पर भी किताबें. महान योगी थे वे. संस्कार में आजकल सद्गुरु का पतंजलि योगसूत्र पर बोला भाष्य प्रसारित हो रहा है. बहुत सी बातें स्पष्ट हो रही हैं. कितना कुछ जानने को है अभी, अनंत है वह परमात्मा..वे तो कुछ भी नहीं जानते..कई बार ऐसा लगता है जैसे पहले वह जो जानती थी अब उतना भी नहीं जानती. जीवन एक रहस्य है जो जाना नहीं जा सकता, जीया जा सकता है. शाम गहराती जा रही है, पांच भी नहीं बजे हैं अभी दस मिनट शेष हैं.

ठंड आज कुछ ज्यादा है, स्वेटर के भीतर त्वचा और त्वचा के भीतर हाड़ों को छूती हुई. सुबह आसमान पर बादल थे या कोहरा, सब श्वेत था मध्य में लालपन लिए नारंगी सूरज का गोला आकाश में ऊपर तो चढ़ आया था पर अभी तक बालसूर्य सा लग रहा था. उसे देखकर मन कैसा उल्लसित हो उठा, जैसे परमात्मा के माथे पर लगा टीका हो या..एक और उपमा उस वक्त ध्यान में आई थी पर अब मन से पुंछ गयी है. कई बार ऐसी सुंदर पंक्तियाँ मन में कौंध जाती हैं पर तब लिखने का साधन नहीं होता. एक सखी का फोन आया था, भावुक है, कलाकार है, पर बोलती कुछ ज्यादा है. कल क्लब के वार्षिक उत्सव की कला प्रदर्शनी में उसकी कृति भी लगायी जाएगी, उसे आमंत्रित किया है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की, बार-बार फोन कट जाता था, पर वह कोशिश करते रहे जब तक बात पूरी नहीं हो गयी, जबकि वह एक बार कट जाने के बाद दुबारा प्रयास नहीं करती, उनसे सीख लेनी चाहिए. कल एक परिचिता आयीं थीं, सेंट जेवियर्स स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी कुछ असमिया कविताओं का हिंदी अनुवाद उसे देखने के लिए देकर गयी हैं. भविष्य में हिन्दी में यह किताब छपेगी, जिसमें भूपेन हजारिका, मामोनी और अब्दुल कलाम के लिए लिखी कविताएँ हैं.


आज धूप चमचमाती हुई निकली है. कल बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी की मंगनी तय हो गयी है, लड़का बंगाली है. उसने सोचा उसकी बंगाली सखी को सुनकर अच्छा लगेगा. आज सुबह टहलने गयी तो आई पौड पर मृत्यु पर प्रवचन सुना, कितनी अद्भुत व्याख्या करते हैं सद्गुरु ! टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. परमात्मा का बखान करते-करते थकते ही नहीं, गाए ही चले जाते हैं. इलाहबाद में कुम्भ का मेला लगने वाला है, करोड़ों लोग आएंगे उस परमात्मा का गुणगान करने ही तो. परमात्मा घट-घट वासी है पर वह नित नूतन है, बासी नहीं है. कल रात छोटे भाई को सुंदर प्रवचन देते सुना, अद्भुत स्वप्न था वह. रात को ध्यान करते-करते सोयी थी. अभी उससे बात हुई, कल रात उसे भी स्वप्न आया कि वह किसी को समझा रहा है बहुत विस्तार से, आश्चर्य है और नहीं भी, परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं ! भाई ने कहा वह इस बारे में ज्यादा बात करेगा तो उसकी आँखों से अश्रुपात होने लगेगा, उसने कहा, उसका यह तबादला भी कृपा से हुआ है, वह अपने सद्गुरु से जुड़ा है और वह उसे दिशा दिखाते हैं. सचमुच उसका समर्पण कहीं ज्यादा है.