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Saturday, May 2, 2026

इचिगो इची

इचिगो इची

आज भी नूना ने गुरु स्टोरीज़ सुनीं। जितना सुनो, उनके प्रति श्रद्धा बढ़ती जाती है, उनके शिष्यों के प्रति भी; जो उनके प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। गुरुजी एक माँ की तरह उनका ध्यान रखते हैं। उसका मन भी उनके प्रति भक्ति से भर गया है। अहंकार गल रहा है, निःस्वार्थ होने का, अपने से अधिक औरों को महत्व देने का भाव जग रहा है। मानव होने का अर्थ यही है कि वे अपने स्वरूप को जानें और एक बार जान लेंगे तो औरों को भी उस आनंद के मार्ग पर लायें। परमात्मा उनके लिए इतना आयोजन कर रहा है, नाना प्रकार के फल, फूल, सूरज, चाँद, हवा, जीवन, श्वासें उसने दी हैं। उसके प्रति कृतज्ञता का भाव जगाते हुए उन्हें पूर्ण आनंद का अनुभव करना है। पूर्ण आनंद में होने पर वे नम्र हो जाते हैं। इस दुनिया में उनके छोटे मन के सिवा सभी तो परमात्मा का रूप हैं, जब  वे किसी का ध्यान रखते हैं तो एक तरह से अपनी आत्मा का ही विस्तार करते हैं। वे स्वयं का ही फैलाव तो इस जगत में देखते हैं। वे जो स्वयं ही हैं, उसका ध्यान क्या रखना, क्योंकि जिस विशाल मन से वे अन्यों का ध्यान रखते हैं, वही उनकी भी देख-रेख करता है। 


अभी कुछ देर पहले नन्हा वापस गया है।आज सुबह उन्होंने नयी मिक्सी लगायी थी। बॉश की मिक्सी वह ले गया है। नन्हे की मिक्सी उसका कुक ले जायेगा, जैसे उनकी पुरानी मिक्सी नैनी ले गई थी।जून ने छोटी बहन का किट तैयार करने में मदद की, जो वह आश्रम ले जाएगी। आजकल गुरु स्टोरीज़ सुनते रहने से मन कैसा हल्का-हल्का सा बना रहता है। संसार का मालिक जब उनका अपना है तो कैसी चिंता और कैसा भय ! गुरुजी के साथ रहने वाले लोग कितने समर्पित हैं। शाम को पाँच बजे पापाजी जून के फ़ोन की प्रतीक्षा करते हैं, आज भी उनसे ‘शांडिल्य भक्ति सूत्रों’ पर चर्चा हुई।  


आज एक वरिष्ठ ब्लॉगर ने उसके ब्लॉग के बारे में उससे कुछ जानकारी माँगी है। ब्लॉग का लिंक, कब बना, उद्देश्य क्या है, विधा और किसी एक पोस्ट का लिंक भेजने को कहा है। उसे लगता है, ब्लॉग बनाने का उद्देश्य रचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना व अनुभवों को सबके साथ बाँटना है। ब्लॉग का नाम “मन पाये विश्राम जहाँ” ही इसकी गवाही देता है। उसकी आध्यात्मिक यात्रा ही उसके लेखन की कहानी है। शेष तीनों ब्लॉग्स में भी वही है और ‘कुछ रिश्ते मीठे से में’ जो कविताएँ हैं, वे प्रेम का प्रस्फुटन ही तो हैं ! इसलिए उद्देश्य तो यही हुआ, भीतर जो आनंद पाया है, जो उल्लास, उमंग है, उसे फैलाना है। कविता इसका सशक्त माध्यम है। जब गुरु जीवन में आते हैं, जीवन को एक दिशा मिलती है। वर्षों पहले नन्हे ने ही उसका ब्लॉग से परिचय कराया, उसने ही ब्लॉग बना दिया था। धीरे-धीरे पाठक मिले, अन्य रचनाकारों से परिचय हुआ। कल सुबह सात बजे उसे सुदर्शन क्रिया के लिए जाना है। 


उसने ये सारी बातें लिखकर भेज दी हैं। आर्ट ऑफ़ लिविंग के शिक्षकों की कहानी सुनकर ही यह प्रेरणा मन में जगी कि उन अनुभवों को कागज पर लिख ले। ‘काव्यालय’ के संपादक को गुरुजी के दो वीडियो भेजे हैं, अवश्य ही उन्हें पसंद आयेंगे। मृणाल ज्योति की एक शिक्षिका से बात हुई, उसने कहा, संस्था के साथ अपने संबंध को याद करते हुए उसे लेख लिखना चाहिए।स्कूल का फ़ेसबुक पेज देखा, अच्छ लगा की वहाँ बहुत सी नई गतिविधियाँ चल रही हैं। आज मँझले भाई ने मेस में सभी को विदाई भोज में बुलाया, दो दिन बाद वह सेवा निवृत्त हो रहा है।   


सुबह वे टहलने गये तो हवा शीतल थी, आभामय भोर का तारा दूर से दिखाई दे रहा था। नौ बजे नन्हा व सोनू आ गये, समधी-समधिन भी आये थे। उसे आई-पैड व दो किताबें जन्मदिन के लिए उपहार स्वरूप मिलीं। दोनों प्रसिद्ध जापानी किताबों का हिंदी में अनुवाद है। दो घंटे ड्राइव करके नन्हा सभी को ‘मुरूगन इडली’ की एक शाखा में ले गया।यह तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध रेस्तराँ का नाम है, जहाँ स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय भोजन मिलता है। 


आज सुबह वे पैदल ही निकट स्थित एक गाँव की झील देखने गये। गाँव की भोर की एक झलक मिल गई। मुर्ग़े, बत्तख़ें, कुत्ते, गायें तो देखी हीं, एक ऊँघती हुई महिला घर से निकली। झील में तैरती हुई मुर्ग़ाबियाँ और कई अन्य पक्षी थे।उसके बाद वे आगे बढ़ते गये, झील के साफ़ पानी की तस्वीरें उतारीं। घर लौटे तो एक-एक कर सभी के, जन्मदिन की बधाई के फ़ोन आने शुरू हुए। नाश्ते के बाद मिठाई देने वृद्धाश्रम गये। वहाँ के संचालक व एक निवासी से कुछ देर बात की।उसके बाद आश्रम में राधा कुंज, झील व शिव मंदिर के दर्शन किए। अन्नपूर्णा में बहुत दिनों बाद प्रसाद ग्रहण किया। झील के निकट एक मंडप में दोपहर का ध्यान किया। शाम को पड़ोसी परिवार को बुलाया था। 


कल मई का अंतिम दिन था। आज शाम वे आम के बगीचे में टहलने गये। हरे-भरे वृक्षों पर कई आकारों व रंगों के आम लगे हैं। प्रकृति में कितनी जातियाँ, प्रजातियाँ हैं, सभी साथ रहती हैं। जापानी पुस्तक ‘इचिगो इगी’ का हिंदी अनुवाद अच्छा लग रहा है। इसका अर्थ है, “एक बार-एक मुलाक़ात’, अर्थात हर किसी से हम एक तरह से एक ही बार मिलते हैं। किसी भी पल को जीने का अवसर जीवन में एक बार ही मिलता है, इसलिए वर्तमान में जीना चाहिए। पापाजी को भी इन जापानी किताबों के बारे में बताया। 


आज दीदी का जन्मदिन है, उनके लिए कविता भेजी, सदा की तरह तरबूज़ काट कर मनाया उन्होंने।शाम से ही बादल बनाने शुरू हो गये थे, वे रात्रि भ्रमण के लिए जायें, उससे पहले ही बरसने भी शुरू हो गये। आज “रेत समाधि” किताब आ गई। 


शाम को एओएल का अनुवाद कार्य किया। नन्हा कल बाहर खाने के लिए कह रहा है, पर उसने उन्हें घर आने के लिए कहा है। मीनू भी लिखा है, रेत समाधि से प्रेरित होकर, बहुत ही रोचक पुस्तक है, अपने आप में अनोखी !कल सुबह सात बजे उनके यहाँ पहली बार आर्ट ऑफ़ लिविंग का फ़ॉलो अप होने वाला है। गुरुजी की कृपा का एक और प्रसाद ! वह अभी भी अमेरिका में हैं, जुलाई में आयेंगे। तब वह एक कोर्स करेगी उनके साथ पार्ट २ कोर्स। आज सुबह कुछ देर के लिए मन कैसा तो उखड़ गया था, शायद वर्षों बाद ऐसा अनुभव हुआ, फिर दीदी से बात की और मन बदल गया।कल क्लब में एओएल की तरफ़ से नेचुरोपैथी कैंप लग रहा है।    


आज पूरा दिन व्यस्तता बनी रही। सुबह सवा चार बजे नींद खुली। टहल कर आये तो छह बज चुके थे। पौने सात बजे आर्ट ऑफ़ लिविंग की शिक्षिका आ गयीं।दो और लोग आये। क्रिया के बाद मन अपूर्व शांति का अनुभव कर रहा था, जिससे बाहर आने का जरा भी मन नहीं था। नाश्ते के बाद लंच की तैयारी की। नन्हा-सोनू और समधी-समधिन बारह बजे तक आ गये थे। उससे पहले वह प्राकृतिक चिकित्सा शिविर में गई। पैर के तलुओं में रिफलेक्सोलॉजी करवायी। कान में कुछ बीज लगाये हैं, उनका क्या असर होगा, पता नहीं। शेष चिकित्सा अस्पताल जाकर होगी। नन्हा आज आई पैड के लिए की बोर्ड और पेंसिल भी ले आया है। उसने ‘प्रोक्रिएट’ पर चित्र बनाना सिखाया, अभ्यास तो उसे ही करना है। शाम को छह बजे वे आश्रम पहुँचे। सात बजे छोटी बहन पहुँची। उसे जो कमरा मिला है उसमें तीन अन्य महिलाएँ भी रहेंगी। आश्रम में उसके साथ रात्रि भोजन करके नौ बजे वे वापस आये। 


Tuesday, June 9, 2020

अतीत और वर्तमान


वर्तमान के इस छोटे से क्षण में अनंत छिपा है, जिसने इस राज को जान लिया, वह मुक्त है. मन सदा अतीत में ले जाता है, या भविष्य की कल्पना में, वर्तमान में आते ही वह मिट जाता है. उसे टिकने के लिए कोई आधार चाहिए, वर्तमान का क्षण इतना छोटा है कि उसमें कोई शब्द नहीं ठहर सकता, मन शब्द के सहारे ही जीवित रहता है. उस पुरानी डायरी में पढ़ा, वह फिर कड़वा बोली, कितनी बार कहा है खुद को, अपने तुर्श मिजाज को बदले, उसे पछताना पड़ेगा. जितना कम बोलेगी उतना सही बोलेगी, जितना ज्यादा बोलेगी उतना गलत बोलेगी. जहाँ जानकारी न हो या कोई मतलब न हो वहाँ रहकर चल रहे वार्तालाप में भाग लेने की क्या जरूरत है, अन्य की बातों में दखल देने में क्या तुक है ? कालेज में जब एक खाली पीरियड था, वह कुछ लिख रही थी, उसके हाथों और आँखों की गतिविधियों को देखकर एक छात्रा ने अनुमान लगा लिया कि वह उनके बारे में कुछ लिख रही है. उसने कालेज के कार्यक्रम में कविता पाठ किया है सो इतना तो वे जानती हैं कि उसे लिखने का शौक है. वह उसके निकट आकर वही सब कहने लगी जो पहले भी दो छात्राएं कह चुकी हैं, फिर यह कि मैथमैटिशियन हैं, दिमाग चढ़ा हुआ है. वह चुपचाप सुनती रही. मन में एक नाम कौंध गया, उसका नाम लेते ही उसकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाती हैं, क्या जादू है उसके नाम में या उसके नाम के प्रति उसकी आस्था में. आस्था सिर्फ नाम में है उसमें नहीं पर यह कौन मानेगा ? वह कविता उसने एक छात्रा को दे दी, पता नहीं उसे कैसी लगेगी. अपनी एक प्रिय सखी को देती तो प्रतिक्रिया उसके अनुकूल होती, वह तो मिली नहीं जिसके लिए लिखी थी. कोई एक ऐसा वाक्य लिखने का मन होता है जिसमें उसकी सारी भावनाएं समा जाएँ और वह वाक्य सुकून भी दे - तुम्हारी आँखें हर वक्त मुस्कुराती क्यों हैं ? 

मन ही वह राक्षस है जिसका दमन करके पुरुष  अवतारी कहलाये, मन ही वह मार है जिसका सामना बुद्ध ने किया. मन के अनुसार नहीं चलना है, उसको उसका सही स्थान दिखाना है. एक साधक यदि मनमुख होकर जीता है और अपने विवेक का अनादर करता है तो उसे साधक कहलाने का अधिकार नहीं है. मन को मारना आत्मा को जगाना है. कल रात्रि पुनः वही स्वप्न देखा, ‘वह कौन है’ इसका उत्तर जिसमें मिला. स्वप्न शुरू होता है तो वह एक पार्टी में है, जून की कोई ऑफिशियल पार्टी है. साथ में बड़ा भांजा भी है. उसके पास एक बैज है जिसे वह लगाना चाहती है, पर वह जून का है और वह लगाना नहीं चाहते. फिर अचानक वर्षा होने लगती है. वह उठ जाती है. और बाहर निकल आती है. कुछ दूरी पर ही कुछ महिलाएं बैठी हैं, जहाँ जाना है पर रास्ता कच्चा है और ढलान है. वह उतरती है तो कुछ पत्थर भी गिरने लगते हैं, पर सुरक्षित पहुँच जाती है. वर्ष संभवतः रुक गयी है, आगे चल पड़ती है, आगे रास्ता चौड़ा है और सुनसान है. काफी दूर निकल जाने के बाद लौटने का मन होता है तो सड़क पर आते वाहन दिखते हैं, बड़े-बड़े वाहन गुजर जाते हैं फिर एक बड़े से रथ पर कृष्ण और अर्जुन की मूर्ति दिखाई देती है. एक दूसरे विशाल रथ में केवल कृष्ण की. फिर आवाज आती है, माँ, माँ, माँ, माँ  और नींद खुल जाती है. माँ की ध्वनि इतनी तीव्र और स्पष्ट थी, मधुर थी. वह किस  की आवाज थी, वर्षों पहले भी किसी ने माँ कहकर उसे जगाया था. यशोदा का अर्थ है दूसरों को यश देना, जो उसे अच्छा लगता है. 

कालेज से लौटने पर पहला काम जो उसने किया वह था पुनः जून के उस पत्र को पढ़ना, जो बहुत प्रतीक्षा के बाद मिला था. हर बार पढ़ने पर नया लगता, उसने कहा है, फालतू बातें मत सोचा करे ! मन लगाकर पढ़े, यही तो उससे होता नहीं. प्रयत्न करेगी.  स्टीवेन्सन की उस कहानी के पात्र की तरह वह किन्हीं अदृश्य हाथों द्वारा संचालित होती है. डायरी में पेज के ऊपर लिखा आज का वाक्य है ‘निष्क्रियता मनुष्य के लिए अभिशाप है’ अभी नजर गयी उस पर, वह भी उसे समझा रहा है. आज सुबह कालेज जाते समय दो छोटे बच्चों की बातें कानों में पड़ गयीं, आपकी नाक कितनी लम्बी है, आपके बाल कितने घुंघराले हैं ! और वह बच्चियां .. आओ दीदी, झूल लो, फिर वह छोटी लड़की... यह लड़की हँसती जा रही है. बस में भिखारी बच्चा उसके घुटने को छूकर पैसे मांगने लगा ... यह सब बच्चे उसे कभी -कभी बहुत उदास कभी बहुत खुश नजर आते हैं. उसे बच्चों को देखकर लगता है, अभी स्पंदन है, धरती जीवित है... जीवन है ... सारिका का स्मृति विशेषांक मिला, पूरा तो नहीं पढ़ा है पर जितना पढ़ा बहुत अच्छा लगा. काफी दिनों बाद सारिका का साहित्यिक, आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक रूप देखने को मिला. 



Wednesday, May 6, 2015

अवतारों की कथाएं


आज सुबह सुबह बाइबिल की घटनाओं से जुड़ा एक स्वप्न देखा, वह प्रभु को पुकार रही है, जैसे प्रेरित पुकारते थे और वह सारे कष्टों को हर लेता है. कैसा अद्भुत आनंद है ईश्वर में जो निरंतर झरता ही रहता है. उसके कानों में एक झींगुर के गीत सी एक ध्वनि हमेशा गूँजती रहती है. कभी-कभी चिड़ियों के कूजने की आवाज भी और यह हर पल उसे उसकी याद दिलाती है. आज टीवी पर श्रीश्री को भी देखा, सुना. अवतारों की जो कथा उन्होंने उस दिन आरम्भ की थी, आज पूर्ण कर दी. राम अवतार में ईश्वर ने मर्यादा का पालन करना सिखाया तो कृष्ण अवतार में उत्सव मनाना. फिर बुद्ध अवतार में मौन रहकर प्रज्ञा की खोज. कल्कि अवतार यानि वर्तमान में रहते हुए हृदय से परायेपन की भावना का नाश करना. साधना के द्वारा जब हृदय में इतना प्रेम जग जाये कि कोई दूसरा लगे ही नहीं, सभी अपने ही लगें तो समझना चाहिए कि हृदय में कल्कि अवतार हुआ है. सारे अवतार मानव के भीतर भी होते हैं. उन्होंने कितने सरल शब्दों में बताया, कृष्ण संतों के हृदय रूपी नवनीत को चुराते हैं. बाबाजी ने आज बहुत हँसाया, वह इतनी अच्छी राजस्थानी भाषा बोलते हैं. मस्ती से छलकती हुई उनकी वाणी सुनकर ईश्वर की निकटता का अहसास होता है. देहभाव से मुक्त कर वह आत्मभाव में स्थित कर देते हैं. संतों के गुणों का बखान नहीं किया जा सकता, वे सोये हुए ज्ञान को जागृत करते हैं, सत्संग प्रदान करते हैं, जो बहुमूल्य है !

आज भी सद्गुरु के वचन सुने. मन जो इधर-उधर बिखरा हुआ है उसे युक्तिपूर्वक हटाकर एक केंद्र पर लाना ही ध्यान है. ईश्वर की कृपा सहज, स्वाभाविक रूप से सदा प्राप्त होती ही रहती है जैसे सूरज की धूप, तो उसके लिए मन को सहज रूप से ध्यान में लगाना है. इसमें कोई जोर जबरदस्ती नहीं चलती. मन वर्तमान में रहे तो यह अपने आप होता है. आज का वर्तमान ही कल का भूत बनने वाला है और भविष्य तो वर्तमान पर निर्भर है ही. भक्ति पूजा, आराधना और समर्पण सहज कार्य हो जाएँ तो समझना चाहिए की ज्ञान फलित हो रहा है. मन में क्या चल रहा है इस पर नजर रखना भी सहज होना चाहिए.  

आज साधना के तीसरे और चौथे सोपानों – षट सम्पत्ति तथा मुमुक्षत्व के बारे में सुना. मन बेचैन न हो प्रसन्न रहे तो शम की सम्पत्ति पास है. दम अर्थात इन्द्रियों का निग्रह. कुछ मनचाहा हो या अनचाहा, उसे सहन करने की क्षमता का नाम ही श्रद्धा है. ज्ञान को पाने की इच्छा, पाने की सम्भावना ही श्रद्धा है. देह से दिन-रात तरंगें उठती रहती हैं. यह समता में हों तो समाधान है. तरंगे ग्रहण भी की जाती हैं, यह आदान-प्रदान समता में हो तो तृप्ति का अनुभव होता है. किसी भी कार्य में खुश रहने की क्षमता ही उपरति है. उपरति होने से कोई संवेदनशील होता है. वह समष्टि का प्रिय है, और यह समष्टि चाहती है कि वह प्रसन्न रहे. जीवन का अंतिम ध्येय क्या है, इसे जानना ही, जानने की इच्छा ही मुमुक्षत्व है. जब सब कुछ बंधन लगता है, तभी मुक्ति की चाह होती है. आजादी की प्यास ही मुमुक्षत्व है. पूर्ण तृप्ति की प्यास ही मुमुक्षत्व है. नित्य की तृप्ति अनित्य से कैसे हो सकती है !  


Saturday, July 12, 2014

खीरे का रस


गीता का एक सुंदर श्लोक है, जिसका अर्थ है, वैश्वानर अग्नि के रूप में ईश्वर उनके द्वारा खाए अन्न को पचाने में मदद करता है. ईश्वर तो हर तरह से उनकी सहायता करता है. सोचने, समझने के लिए बुद्धिबल दिया है, आत्मोद्धार के लिए आत्मबल. कल दोपहर बाद से वे व्यस्त रहे एक मित्र परिवार के साथ, जो यहाँ से जा रहे हैं. आज शाम को भी उन्हें भोजन के लिए बुलाया है. जागरण में आज की बात उसे पसंद नहीं आई. भूत-प्रेत की बातें बताकर लोगों को अन्धविश्वासी बना रहे हैं ऐसा लगा, चमत्कार की बात ही करनी है तो इस सुंदर सृष्टि की रचना अपने आप में क्या कम चमत्कार है ? आज नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आई है, धीरे-धीरे काम करती है वह. नन्हे और जून के जाने के बाद उसने नाश्ता किया कुछ देर टीवी देखा. स्कूल की एक टीचर का फोन आया, एक छात्रा के पिता को संदेह है कि उसकी कापी ठीक से जांची नहीं गयी सो री-चेक करवानी होगी. स्कूल छोड़ने के बाद भी सभी खबरें मिलती रहती हैं, कल एक टीचर ने बताया कि एक फेल हो गये बच्चे के पिता ने भूख हड़ताल करने की धमकी दी है, यदि उसे पास न किया गया. पड़ोसिन के बगीचे में कैंडीटफ्ट के फूल हो रहे हैं, उनका सुंदर गुलदस्ता उसने बनाकर दिया. उनकी जीनिया की पौध में से आठ-दस पौधे पूसी नष्ट कर चुकी है. उसने नाराज होकर उसे कुछ भी नहीं दिया, सोचकर कि वह यहाँ से चली जाये पर वह पूरे श्रद्धा भाव से टिकी रही और आज उसे उस पर दया आ गयी. ऐसे ही ईश्वर उनकी लगन चाहता है.

“उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है”. अब उसके भी जागने का वक्त आ गया है. हर क्षण मन पर नजर रखकर अतीत या भावी का चिन्तन न कर वर्तमान को सही परिप्रेक्ष्य में देखकर इस जागृति का अनुभव किया जा सकता है. उसके बिना कोई आधार नहीं, बुद्धि भी हार जाती है एक सीमा तक तर्क करके. इस जग का नियंता जो भी है वही उनके मार्ग को प्रशस्त कर सकता है. मानव उसका ही प्रतिबिम्ब है, जब वे उसे प्रसन्न करेंगे तो स्वयं भी प्रसन्न हो जायेंगे. क्योंकि प्रतिबिम्ब में परिवर्तन करने के लिए वस्तु में ही परिवर्तन करना होगा. उसे प्रसन्न करने का उपाय अपने अंदर सद्गुणों को विकसित करना व उससे प्रेम करना है. सद्गुणों का तो वह भंडार है, मानव उसका चिन्तन करेंगे तो वे गुण भी उनके भीतर आ जायेंगे. इतनी सी बात उसकी समझ में नहीं आती थी जो आज सुनी. दीदी इतनी बार राम का जाप क्यों करती हैं व लिखती हैं, आज स्पष्ट हुआ है.

एक लम्बा अन्तराल ! पिछले दिनों कुछ नहीं लिख पायी, एक-दो बार पेन हाथ में लिया पर बात नहीं बनी. जून आज जल्दी आकर जल्दी चले गये थे, वह जरा सुस्ताने लेटी तो खुमारी छा गयी, नींद से जागकर कुछेक छोटे-मोटे काम किये कि नन्हा आ गया, फिर जून और शाम का सिलसिला शुरू हो गया. माँ-पिता, ननद-ननदोई जी और दो प्यारे बच्चे आये और चले भी गये. उनके घर जाने में भी मात्र एक महीना रह गया है. कल शाम वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक मित्र के यहाँ गये, दिन भर धूप में फील्ड ड्यूटी करने के बाद जून के सिर में दर्द था, पर वे, “जो वादा किया है निभाना पड़ेगा”...में यकीन करते हैं. फिर वे जल्दी ही लौट आये. अगले हफ्ते उन्हें मुम्बई जाना है, off shore well के सिलसिले में. नन्हा आज छुट्टी के दिन भी स्कूल गया है, कुछ दिन बाद उसके स्कूल में science exhibition है. उसे याद आया दोनों घरों को पत्र भेजने हैं, और भेजने से पूर्व उन्हें लिखना पड़ता है. पिछले दो-एक दिन से food for health से पढकर चेहरे पर आलू व खीरे का रस लगा रही है. क्रीम बंद, देखें इस प्राकृतिक इलाज का क्या असर होता है. कल रात स्वप्न में देखा, स्कूल फिर से ज्वाइन कर लिया है, अर्थात वासना अभी तक मिटी नहीं, उस दिन एक परिचिता को कैसेट न देकर भी यह सिद्ध हो गया कि लोभ की जड़ें बड़ी गहरी हैं मन में, ईश्वर जो अपना आप बन कर बैठा है सब देखता है और मुस्काता है कि उसका नाम लेने वाले भी किस तरह सन्सार में फंसे हैं !