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Friday, July 11, 2025

चीटियों की क़तार




आज संस्कार पर गुरु माँ को सुना,  कह रही थीं, मानव शरीर में अरबों कोशिकाएँ और जीवाणु रहते हैं। उन्हें कुल मिलाकर एक ‘मैं’ का निर्माण होता है, इसी प्रकार अरबों जीवों को मिलकर ईश्वर का। जैसे ‘मैं’ उन जीवाणुओं के जोड़ से कहीं अधिक है, ईश्वर भी सब जीवों के जोड़ से अधिक है। आज जून की, छोटी बहन से बात हुई, भांजे ने इन्फ़ोसिस का जॉब छोड़ दिया है और डेलॉयट में काम कर रहा है। उसे आश्चर्य होता है, आजकल बच्चे हर दो साल के बाद कंपनी बदल लेते हैं, उनमें कंपनी के प्रति अपनेपन का भाव पैदा भी नहीं होता होगा। शायद वे मोह-माया से ऊपर उठ चुके हैं अथवा तो अधिक माया का मोह उन्हें ऐसा करने पर विवश करता है। इस दुनिया में चमत्कार भी होते हैं। यदि इस शब्द का अस्तित्त्व है तो इसको अर्थवान भी होना होगा। कितने ही संत, महात्मा व अवतारी पुरुष चमत्कार करते हैं।आज एक स्वामी जी के मुख से सुना, एक महिला और उनकी पुत्री ने उन्हें आकर धन्यवाद दिया, यह कहकर कि उन्होंने पुत्री के एक असाध्य रोग का इलाज बताया था। स्वामी जी ने कहा, मैंने उन दोनों को पहली बार देखा था, पर उनकी श्रद्धा और विनम्रता देखकर उनपर अविश्वास नहीं कर सका, शायद परमात्मा ने ही कोई लीला रची होगी। शाम को पापा जी से बात हुई, वह आजकल ओशो का शांडिल्य सूत्र पढ़ रहे हैं।जून ने उनके लिए ग्रीन टी और बिस्किट भेजे हैं।नूना ने उनके लिए लिखी सारी कविताओं का एक संकलन बनाया है, ‘पितृ दिवस’ पर उन्हें भेजने का विचार है।  


शाम को भोजन के बाद नूना किचन में गई तो नन्हे का ध्यान आया, तभी फ़ोन की घंटी बजी।उसे पंद्रह मिनट का समय मिला था, सो फ़ोन कर लिया।काफ़ी व्यस्त चल रहा है, दिन भर कॉल्स चलती हैं। कह रहा था, सोनू और वह दोनों लंच पर मिलते हैं फिर सीधा रात्रि भोजन पर। घर से काम करने पर व्यस्तता अधिक बढ़ गई है। इतवार की सुबह छह बजे आयेंगे, नौ बजे वापिस चले जाएँगे, क्योंकि दस बजे के बाद बाहर नहीं रह सकते।


कर्नाटक में एक दिन में तीस से पैंतीस हज़ार कोरोना के केस मिल रहे हैं आजकल। कोरोना के साथ ब्लैक फ़ंगस का प्रकोप भी बढ़ रहा है। ताउते के साथ याम तूफ़ान भी आने वाला है। प्राकृतिक आपदाएँ अब जल्दी-जल्दी आने लगी हैं। इज़राइल और फ़िलस्तीन में युद्ध जारी है, शायद इस बार निर्णायक हो, पर यह भी एक कल्पना ही है।कोई भी युद्ध निर्णायक नहीं होता, भविष्य में इसके सुलगने के आसार बने ही रहते हैं। आज एक पोस्ट प्रकाशित की, एक कविता, जो दोपहर को घट रही अनुभूति के दौरान लिखी थी।ऐसा आजतक चार-पाँच बार हो चुका है या आठ-दस बार, इससे अधिक नहीं। कोई घेरे रहता है और भीतर कुछ महसूस होता है, जिसे शब्दों में ढालकर भी नहीं ढाला जा सकता। दीदी आजकल  स्पोकन अंग्रेज़ी का अभ्यास सीख रही हैं।आजकल हैरी पॉटर पढ़ रही हैं।पापा जी से आज अध्यात्म चर्चा हुई। उनकी बातचीत का कुछ अंश रिकॉर्ड भी किया।अहंकार का परित्याग करके ही मानव आत्मा का अनुभव कर सकता है, जो यह सुख पा लेता है उसे अहंकार सताये ऐसा होना संभव नहीं है। 


जून से एक ऑन लाइन कोर्स करने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया, जीवन की धारा जिस गति में चल रही है, वह उसी में संतुष्ट हैं। वे सभी अपने अपने कम्फ़र्ट जोन में सुरक्षित रहते हैं और सोचते हैं, यही जीवन है। नूना को जीवन से कोई शिकायत नहीं है, जो जैसा है, वैसा ही स्वीकार्य है। नन्हे और सोनू ने अगले महीने आने वाले उसके जन्मदिन के लिए एक सुंदर उपहार भेजा है, अल्मूनियम की एक केतली, जिसे रंगों से सजाना है, नूना ने सोचा, कल से ही रंगना आरंभ करेगी। छोटी बहन का फ़ोन आया, उसे आजकल कभी अठारह घंटे, कभी चौबीस घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है। कोरोना के कारण मरीज़ अधिक हैं। तीन वर्ष पूरा होने के बाद प्रैक्टिस जारी रखने के लिए एक परीक्षा भी देनी है। उनकी पालतू बिल्ली भी बीमार हो गई है।उसके बचने के आसार नज़र नहीं आते।  


आज सुबह टहलते समय सड़क पर चीटियों की बहुत लंबी क़तार देखी, वीडियो बनाया, अनोखा दृश्य था। एक टिटहरी दीवार पर बैठकर अपना गीत गा रही थी। पेड़ों पर आम भी अब काफ़ी बड़े हो गये हैं, पकने को तैयार। 


आज का दिन भी पूर्णता को प्राप्त होने को है। सुबह सुहानी थी, वॉकिंग मैडिटेशन किया फिर छत पर साधना। जून आजकल गर्मी व मच्छर के डर से नीचे कमरे में योगासन करते हैं, पर वहाँ हवा भी चलती है और मच्छर भी नहीं होते, ख़ैर, पसंद अपनी अपनी ! जीवन के इतने वर्ष बीत जाने पर नूना को यह समझ में आया है कि हरेक आत्मा को अपनी तरह से जीने की स्वतंत्रता है और कोई किसी को बदलने का प्रयास न करे, क्योंकि संस्कारों का परिवर्तन अपने ही हाथों में होता है, किसी और के प्रभाव में आकर किया परिवर्तन स्थायी नहीं होता। 


बाहर किसी ने आग जलायी, धुआँ ही धुआँ हो गया है, एसी के द्वारा कमरे तक उसकी गंध आ गई है।देवों के देव में पार्वती के मन की अस्थिरता को दिखाया गया। प्रकृति में विक्षोभ होना स्वाभाविक है, सत, रज और तम से बनी है। यास तूफ़ान से कई राज्यों में नुक़सान हुआ है। 


Tuesday, March 29, 2022

उलूक शावक



आज सुबह तेज वर्षा हुई। दोपहर को मॉडेम बदलने मकैनिक आया, लगभग एक महीने बाद इंटर्नेट काम करने लगा है। जून ने नन्हे से घर के वाई फ़ाई सिस्टम के बारे में बात की, मॉडेम ख़राब होने के कारण घर की बत्तियाँ और फ़ैन आदि गूगल होम से नहीं चल रहे थे।इस  गूगल होम ने भी कितना आरम्पसंद बना दिया है लोगों को। आज दोपहर को नीतू सिंह के बचपन की ‘दो कलियाँ’ फ़िल्म देखी, वर्षों पूर्व  इसके बारे में सुना था, पर कभी देखने का मौक़ा नहीं मिला। उत्तर रामायण में दिखाया गया कि लव-कुश का जन्म हो चुका है और राम भी राज-काज में रुचि दिखा रहे हैं। शाम को वर्षा थमी तो टहलने गये, सड़कें  धुलीं हुई थीं और पेड़ कुछ ज़्यादा हरे लग रहे थे। प्रकृति का कुछ पलों का संग-साथ मन को सुकून से भर देता है, परमात्मा की पहली झलक साधक को कुदरत में ही मिलती है। 


आज सुबह समाचार मिला कि ऋषिकपूर का  देहांत हो गया है। उनके लिए श्रद्धांजलि  स्वरूप कुछ लिखा। दो वर्ष पूर्व हुए मस्तिष्क के एक असामान्य रोग के कारण प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता इरफ़ान का भी कल ही देहांत हुआ था। दोनों कलाकारों को चाहने वाले लाखों  की संख्या में होंगे, सभी उदास हैं।जीवन के साथ मरण भी जुड़ा है और हर किसी को एक न दिन विदा होना है, हर मृत्यु उसे इस बात को और गहराई से याद दिला जाती है।  विश्व भर में कोरोना के मरीज़ भी बत्तीस लाख हो गए हैं। दो लाख से अधिक लोग अपनी जान गँवा बैठे हैं। मरने वालों में अधिकतर या तो वृद्ध हैं या रोगी। पूरे विश्व में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अनेक कष्टों का सामना करते हुए जीवन को किसी तरह बचा भर पा रहे हैं; जिनकी रोज़ी-रोटी छिन गयी है। यह प्रलय से कम विषम स्थिति नहीं है। आधुनिक काल की प्रलयंकारी स्थिति शायद वायरस ही ला सकते हैं। आज दो पुराने मित्र परिवारों से वीडियो कॉल पर देर तक बात हुई। ज़ाहिर है कोरोना की भी बातें हुईं, एक ने कहा बाहर से आने वाले किसी भी सामान के साथ वायरस घर में आ सकता है।अभी तक तो उनकी सोसाइटी में कोई केस नहीं आया है। 


आज मज़दूर दिवस पर एक रचना ब्लॉग पर प्रकाशित की। टीवी पर ‘सारा आकाश’ देखी, इसके बारे में भी काफ़ी सुना था दशकों पूर्व।सरकार ने लॉक डाउन की अवधि बढ़ा दी है। अमेरिका में मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। भारत में कुल अड़तीस हज़ार मरीज़ हैं। अब मरीज़ों की संख्या में वृद्धि शीघ्रता से हो रही है। जून ने नन्हे से कहा कि शाम को वह उसके यहाँ जाने वाले थे, तो वह चुप ही रहा। कोरोना का भय इतना ज़्यादा है कि वह नहीं चाहता वे कहीं बाहर निकलें, सभी लोग न कहीं आना चाहते हैं न किसी को बुलाना ही चाहते हैं। आज प्रातः काल भ्रमण के समय छोटा सा उलूक शावक दिखा, कल उसकी माँ या पिता  यानि  एक बड़ा उलूक देखा था। ढेर सारे बगुले भी देखे, आदमी सड़कों पर नहीं निकल रहे हैं तो पक्षी निर्भीक होकर घूम रहे हैं। आज महाभारत में कृष्ण का अर्जुन को गीता उपदेश आरम्भ हो गया है और रामायण में लव-कुश राम को अपना परिचय दे देते हैं। कल रामायण का अंतिम एपिसोड आएगा। उसके बाद श्रीकृष्ण धारावाहिक प्रसारित किया जाएगा। राम और कृष्ण जैसे भारत के कण-कण  में बसे हैं, उन्हें याद किए बिना कोई दिन पूरा नहीं होता।  


जून को भी आर्ट ऑफ़  लिविंग में एक सेवा का काम मिल गया है। वह कम्प्यूटर पर ज़ूम इंस्टाल कर रहे हैं। विभिन्न परियोजनाओं के लिए फ़ंडिंग करने वाले संयोजकों को ढूँढना है। उसके पहले प्रोजेक्ट योजना बनानी हैं, उन्होंने काम शुरू कर दिया है। उसका अनुवाद कार्य भी चल रहा है, सेवा का छोटा सा कार्य भी संतुष्टि की भावना को दृढ़ करता है। आज सुबह गाँव से नैनी ढेर सारे आँवले लेकर आयी, हरे, ताजे, बड़े आकार के, कुछ का अचार बनाया है। कल भुट्टे व कुम्हड़ा लायी थी, गाँव के निकट रहने से ताजी सब्ज़ियाँ मिल जाती हैं। आज इसी सोसाइटी में उगे तीन नारियल भी ख़रीदे।   


रात्रि के नौ बजे हैं, आज शाम वे लगभग दो महीने बाद मुख्य  गेट से बाहर निकले। दायीं ओर कुछ दूरी पर सब्ज़ी की दो नयी दुकानें देखीं। लोग सामान्य दिनों की तरह आ-जा रहे थे। सड़कों पर चहल-पहल थी, पर पता नहीं इसका परिणाम पता नहीं क्या होगा। दिल्ली में भी दुकानें खुल गयी हैं , कुछ विशेष दुकानों के आगे लोगों को लम्बी-लम्बी क़तारें लगी हैं। आज सुबह गाड़ी धोने वाले के साथ एक माली आया, गमलों में निराई कराके सूखा गोबर डलवाया, बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी कह रहा था आज से दुकानें खुल गयी हैं। शायद वह भी वहीं जाएगा, लोग पैसा देकर विष ख़रीदते हैं, आदत ही तो है। आज शाम से थोड़ा पहले भुवन शोम फ़िल्म देखी कुछ देर, बहुत अच्छी लगी, प्रिंट पुराना है पर अभिनय अनोखा। आज से दूरदर्शन पर ‘उपनिषद गंगा’ भी दिखाया जा रहा है।


Friday, March 18, 2022

पीली मूँग



आज शाम साढ़े  पाँच बजे ही वर्षा आरंभ हो गयी। घर के दायीं तरफ़ बने गोदाम की टिन की छत पर बूँदों की बहुत तेज आवाज़ होती है, जैसे ओले गिर रहे हों। वर्षा रुकी तो वे जैकेट पहनकर टहलने गए, तेज हवा बह रही थी, हवा में ठंडक भी थी। बायीं तरफ़ की पड़ोसिन वर्षा में ही छाता लेकर टहलने निकल पड़ी थीं, उनका कहना है कि शाम को एक तय समय ही उन्हें मिलता है, यदि वह बीत गया तो बाद में व्यस्तता के कारण टहलना छूट जाता है। कल उसने ब्लॉग पर व फ़ेसबुक पर नींद पर एक कविता लिखी थी, कइयों को भायी है, शायद नींद ना आना सबकी समस्या है।संभवतः अवचेतन मन में कोरोना का भय परेशान कर रहा हो। आज जून ने सिंधी दाल बनायी पीली मूँग की, बनाते समय कितनी बार माँ को याद किया, बचपन सदा किसी न किसी रूप में हरेक के साथ चलता है। शायद सरकार लॉक डाउन की अवधि को बढ़ाने वाली है, कई राज्यों ने पहले ही ऐसा कर दिया है। सरकारें काफ़ी सहायता भी प्रदान कर रही हैं, ताकि काम न होने पर भी निर्धन, मज़दूर आदि अपना जीवन ठीक से चला सकें। कितने लोगों का व्यापार ठप्प हो गया है । टैक्सी ड्राइवर, होटल सभी जगह किसी की कमाई नहीं हो रही। सभी स्कूल शायद सितम्बर तक बंद रहेंगे। अमेरिका को भारत क्लोरोकविन भेज रहा है, इस समय सभी को सभी की मदद करनी है। 


आज हफ़्तों बाद वे रात्रि के भोजन के बाद बाहर टहलने निकले। चौकीदार के अलावा कोई नहीं था, जबकि शाम को इक्का-दुक्का लोग थे। यदि यह महामारी न हुई होती तो आजकल वे गुजरात में होते।इंडिगो ने कहा है कि अगले वर्ष तक वे कभी भी टिकट का इस्तेमाल कर सकते हैं। सुबह घर की साप्ताहिक सफ़ाई की, तीनों बरामदे, सभी कमरे, किचन, गैराज, सभी स्नानघर, पूरे तीन घंटे लग गए। बर्तन और कपड़े तो मशीन से धुल जाते हैं। महामारी ने एक काम तो अच्छा किया है, सभी को घर का काम करना सिखा दिया है। खाना बनाने से कपड़े धोना, झाड़ू-पोछा तक सब कुछ।सभी आत्मनिर्भर बनें यह तो अच्छा ही है। नाश्ते में कुछ देर हो गयी पर अब जून भी जल्दी नहीं मचाते, आराम से अख़बार पढ़ते रहते हैं। सभी जगह तालाबंदी है, सभी एक सी समस्या का सामना कर रहे हैं, इसलिए जैसे दुनिया एक अदृश्य सूत्र में बंधकर  कुछ निकट आ गयी है। मोदी जी ने अपने सम्बोधन में कहा, तीन मई तक तालाबंदी बढ़ा दी गयी है। ज़्यादातर राज्यों ने इसका स्वागत किया है। अभी भारत में कोरोना के ग्यारह हज़ार मरीज़ हैं। छोटी बहन से बात हुई, उनके अस्पताल को विशेष कोरोना अस्पताल में बदल दिया गया है, कल उसका कोरोना टेस्ट भी हुआ। 


शाम को एक दुखद घटना सुनने को मिली, इसी सोसाइटी में एक युवक की मृत्यु हो गयी, कहा गया कि उसने  आत्महत्या कर ली, पिता दुबई में रहते हैं, माँ से उसका किसी बात पर झगड़ा हुआ था, वह ऊपर के फ़्लोर पर रहता था और माँ नीचे।  कितना अजीब लगता है सुनकर कि इस आपद काल में भी लोग इतने नादान हो सकते हैं। शायद वह बीमार रहा हो, पता नहीं उसे दवा भी मिली हो या नहीं। नन्हे और सोनू से नियमित फ़ोन पर बात होती है, एक ही शहर में रहने के बावजूद पिछले एक महीने से मिलना नहीं हुआ है। आज सुबह नींद खुलने से पहले एक मधुर घंटी की ध्वनि सुनायी दी, कौन था जो इतने प्रेम से जगा रहा था। दो तीन दिन पहले भी एक आवाज़ सुनकर नींद खुली थी जिसका स्रोत नज़र नहीं आया। परमात्मा के पास हज़ार साधन हैं, वह कुछ भी कर सकता है ! रामायण में राम-रावण युद्ध आरम्भ हो गया है। आज दीदी ने फ़ोन किया उनके यहाँ महरी ने आना शुरू कर दिया है, अख़बार भी आने लगा है। 


Wednesday, March 31, 2021

रात की रानी

वर्ष का अंतिम महीना शुरू हो गया है। दिसंबर का पहला दिन पर बंगलूरू में ठंड का कुछ पता नहीं चल रहा है, यहाँ मौसम सुहावना है। आज दोपहर को पहले सोनू आयी, फिर नन्हा। वह दो दिनों से घर से बाहर था, अपने मित्र की बैचलर पार्टी में गया था। आजकल यह नयी  प्रथा चली है। दोपहर को सबने मिलकर वे फ़ोटो चुने जो फैमिली ट्री में लगाने वाले हैं। नन्हे के विवाह में यह उपहार मिला था, बड़े से पेड़ में कई फ्रेम हैं जिसमें पूरे परिवार के फ़ोटो लगाए ज्या सकते हैं। सीढ़ियों के साथ वाली दीवार पर वे इसे लगाएंगे। 


शाम को वे टहलने गए, रात की रानी के फूल अभी खिले नहीं थे. मुख्य सड़क के डिवाइडर पर काफी दूर तक लगे हैं इसके पौधे, जो फूलों से लदे हुए हैं। देर शाम को या बहुत भोर में उनकी खुशबू दूर से ही आने लगती है। वापस आकर भोजन बनाया, बच्चों ने कहा, उन्हें अभी भूख नहीं है, सो भोजन पैक करके दिया। एक नया स्टार्ट अप शुरू हुआ है यहाँ,'बाउंस' जिसमें किराये पर स्कूटर मिलते हैं तथा उन्हें पार्क करके किसी भी स्थान पर रख सकते हैं। वे कार से उन्हें उस स्थान पर ले गए जहाँ स्कूटर खड़ा था, पर उसपर कोई हेलमेट नहीं था। यहाँ बिना हेलमेट के द्विपहिया वाहन चलना जुर्म है, सो 'उबर' से टैक्सी बुलाई और उन्हें छोड़कर वे वापस आ गए । सुबह सोलर पैनल लगाने का काम आरंभ हुआ। कल सुबह दीदी-जीजा जी का शुभ प्रभात का संदेश आया, जिसे देखकर  उनके दिल खिल गए। दिल से दिल का रिश्ता इतना गहरा होता है कि ऊपर की थोड़ी सी नाराजगी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। शाम को पिताजी का फोन भी आया, वर्षों से वे हर इतवार को उनसे बात करते आ रहे हैं, सुबह व्यस्तता के कारण नहीं कर पाए थे। पिताजी कितना भी कहें कि मोह-माया से दूर हैं, पर उनकी आवाज से ऐसा नहीं लग रहा था। ईश्वर उन्हें दीर्घायु दे व स्वास्थ्य ठीक रहे उनका। रिश्तों के न दिखने वाले धागे बहुत मजबूत होते हैं। इनका सम्मान करना होगा। सभी परिवारजनों के प्रति मन में जब कभी भी अतीत में कोई शिकायत या तल्खी पनपी हो, उसके लिए उसने ईश्वर से तथा उन सभी की शुद्धात्मा से हृदय से क्षमा मांगी। परमात्मा उनके हर भाव, हर विचार पर नजर रखे हुए हैं। उन्हें उनके हर कर्म का हिसाब चुकता करना ही होता है। उसका मन शुद्ध रहे, उसमें कोई कपट न हो , किसी के प्रति कोई संदेह न उठे। क्योंकि उसका हर भाव अंतत: उसके प्रति ही होगा। हर भाव की जिम्मेदारी स्वयं को ही लेनी होगी, क्योंकी यहाँ  सिवाय एक के दूसरा है ही नहीं ! एक ही चेतना भिन्न -भिन्न रूपों में स्वयं को प्रकट कर रही है !


आज का दिन मिल-जुला रहा, हल्की बूँदाबाँदी में छाता लेकर वे टहलने गए। जून डाक्टर से मिलने गए तब तक उसने सफाई करवायी। उनकी नैनी बेहद हँसमुख है और दिल लगाकर काम करती है, इसी तरह दूसरी शाम वाली नैनी भी ठीकठाक है। दोपहर को ब्लॉग पर लिखा पर पूरा नहीं कर पाई। बीच में ही मन को वर्तमान में रखने के लिए एक संदेश देना पड़ा। एक कविता जैसी बन गई, कवि की स्वयं को दी गयी सीख औरों के भी काम आ जाती है। दो सखियों ने कमेन्ट लिखा है। मन की तो आदत है गड़े मुर्दे उखाड़ने की, वह एक छाया मात्र ही तो है। अहंकार भी तो छाया है, वे जो वास्तव में हैं, वहाँ न कोई मित्र है न शत्रु, वहाँ एक के सिवाय दूजा कोई भी नहीं है। उन्हें आत्मा के उस सिंहासन पर विराजमान होना है। यहाँ पर घर के बने पकवान आदि बेचने के लिए एक ग्रुप बना हुआ है, कल कोई पड्डू बेच रहा है। शनिवार को भी एक के यहाँ से कुछ खाद्य पदार्थ लाए थे, उन महिला से बात हुई, एक ही पुत्र है जो इंजीनियरिंग कर रहा है। योग कक्षा में कुछ उपकरणों की सहायता वे नए-नए आसन सीख रहे हैं। अकार, उकार तथा मकार का उच्चारण किया शवासन में लेटकर, बहुत अच्छा अनुभव था। आज फिटबिट में देखा दिन भर में अठारह हजार कदम हो गए ।    


आज भतीजी का जन्मदिन है, बड़े भैया की बिटिया का, उसने  कविता लिखी, सभी को भेजी, पर भतीजी के सिवाय किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सब जैसे बहुत व्यस्त हो गए हैं, भाव की सरिता नहीं बहती मन में या बहने ही नहीं देते। कल शाम जून भी थोड़ा नाराज हुए, पर सुबह गुरु माँ को सुना तब उनका मन शांत हुआ। सुबह नाश्ते के बाद वे पीछे गाँव के मंदिर को देखने गए, पर वह सुबह छह बजे खुलता है और शाम को भी उसी समय। आते समय जंगली फूलों की तस्वीरें उतारीं। 


उसने कालेज के दिनों की डायरी के पन्नों पर तीन महापुरुषों के उनके द्वारा लिखे सन्देश पढ़े, जो उन्हीं से मिलकर उसने तीन वर्षों में प्राप्त किये थे. उसे याद है पहली बार छोटे भाई के साथ बनारस में राजघाट में वह दादा धर्माधिकारी से मिलने गयी थी. कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने लिखा था- 


“बने बनाये राजमार्ग छोड़ो, नयी पगडंडियाँ बनाओ, यह तरुणाई की विशेषता है." 


मिर्जापुर में एक सन्त पथिक जी आये थे, जो उनके घर के निकट ही ठहरे थे. उन्होंने उसकी डायरी में लिखा-

“सेवा की पूर्णता तथा दोषों के त्याग की पूर्णता और निष्काम भाव से प्रेम की पूर्णता में ही जीवन की पूर्णता है.” 


सहारनपुर में स्वामी शिवानन्द के एक शिष्य योग सिखाने आये थे, उन्होंने भी एक सुंदर संदेश लिखकर दिया था- 

“ अपने ‘स्व’ को जानो. स्त्री का भूषण लज्जा, शील और पवित्रता है, उससे पृथक न हों ! अपने आंतरिक सौंदर्य को प्रस्फुटित करो. वह सौंदर्य कभी नहीं मुरझाये इसके लिए जाग्रत रहना. सदा ‘स्व’ में स्थित रहें. ईश्वर की अहैतुकी कृपा का वरदान आपको आंतरिक शांति, आनंद एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष प्रदान करे. यही प्रार्थना है.”


उस समय इन शब्दों का क्या अर्थ उसने ग्रहण किया होगा अब याद नहीं है, लेकिन आज इनकी महिमा पूर्ण रूप से स्पष्ट हो रही है. 

  

 

Sunday, October 4, 2020

जीन का इतिहास

 

आज ईद का अवकाश है. वे नाश्ते की मेज पर बैठे थे कि एक सखी का फोन आया, भूटान के बारे में जानकारी लेने के लिए, संयोग की बात है कि पिछले वर्ष आज ही के दिन वे भूटान गए थे. कितनी ही स्मृतियाँ लौट आयीं. जीवन की तरह यात्रा में भी हर तरह की बातें होती हैं, कुछ सुखद और कुछ दुखद भी.  एक ऐसी बात भी याद आयी जिसे अपने संस्कारों के कारण उसने शिकायत की थी. मन की प्रतिक्रिया से एक रचना का जन्म हुआ. इस जगत में सभी अपने-अपने संस्कार से बंधे हैं. जब तक वे मन से ऊपर उठकर जीना नहीं सीख जाते दुःख से छुटकारा नहीं है, अथवा तो उन्हें जीवन के वास्तविक दुखों का सामना नहीं करना पड़ा है सो काल्पनिक दुखों का निर्माण कर लेते हैं. जून भी वृक्षारोपण के कार्यक्रम में गए थे, पेड़ लगाने के बाद एक सुंदर रेशमी गमछा पहनाया गया उन्हें. हजारों बल्कि लाखों की संख्या में वृक्ष लगाए गए होंगे इस अवसर पर पूरे देश और विश्व में.शाम को योग कक्षा में एक साधिका ने वृक्षों को समर्पित एक व्यक्ति के अद्भुत कार्यों की बात बताई. उन्होंने भजन गाये और प्रसाद वितरण किया, सभी कुछ न कुछ लेकर आयी थीं.  समाचारों में सुना इस वर्ष के अंत तक जम्मू-कश्मीर व लेह में चुनाव कराये जायेंगे.   


सुबह के ध्यान में भगवान राम, सीता व लक्ष्मण के सुंदर विग्रहों का दर्शन हुआ, अद्भुत था वह दर्शन, मणि-माणिक से सजे सुंदर रंगीन चित्र के समान पल भर के लिए आये और विलीन हो गए . मन की गहराई में कितने खजाने छुपे हैं, जिनका उन्हें खुद ही भान नहीं है. इस समय टीवी पर तेनाली रामा आ रहा है, मानव के छह रिपु काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मत्सर राजा कृष्णदेवराय को पराजित करने के लिए तत्पर हैं. अब देखना है कि इस युद्ध में रामा कैसे राजा को बचाता है. जेनेटिक्स पर सिद्धार्थ मुखर्जी की लिखी किताब आगे पढ़ी, द जीन- एन इंटिमेट हिस्ट्री. बहुत रोचक ढंग से लिखी गयी है, जीन का विज्ञान भी बहुत पुराना है और इसमें नित नए अविष्कार हो रहे हैं. सौ वर्षों पूर्व कितना अन्धविश्वास था समाज में, इसकी जानकारी भी मिल रही है. विज्ञान ने या कहें समय ने मानव को ज्यादा संवेदनशील बनाया है. बहुत दिनों बाद फेसबुक पर नजर दौड़ाई, बड़ी भांजी का स्टेटस देखा तो उदासी की खबर दे रहा था, उससे व्हाट्सएप पर बात की. हमारे कर्मठ प्रधानमंत्री मालदीव और श्रीलंका की यात्रा पर गए हैं. वायुसेना का एक विमान ए एन 32 पिछले तीन दिनों से लापता है, उसमें 13 यात्री थे, उसने मन ही मन उनके सकुशल रहने की प्रार्थना की. 


आज शाम को अचानक तेज हवा चलने लगी, आकाश काला हो गया और देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी, पर एक घंटे बाद सब थम गया. प्रकृति की लीला को कौन समझ सकता है. आज ‘श्रद्धा सुम’न ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद लिखा. काव्यालय पर भवानी प्रसाद मिश्र की एक और कविता आयी है, उन्होंने मृत्यु का स्वागत सहजता से किया. आज सुबह ध्यान में एक दुबला -पतला बच्चा दिखा, मन भी विचित्रता से भरा है. कल रात स्वप्न में नन्हे को देखा, वह चाइना से असम आ गया है. 


और अब अतीत के पन्नों से - उस दिन की सूक्ति में लिखा था, गरीब लोग प्रेम और सहानुभूति के भूखे होते हैं. यह  पढ़कर ही सम्भवतः उसने लिखा था, यदि कोई जानता होगा तो उस दिन फिर एक दिव्य संदेश उसे प्राप्त होगा. जिस प्रकाश से आवृत होने की बात कुछ दिन पूर्व  लिखी थी, प्रकाश का वह पुंज छितरा गया था जब अगले दिन का पेपर अच्छा नहीं हुआ, किन्तु उसकी आवश्यकता तो सदा ही रहती है. आज इस क्षण से वह पुंज उसका मार्गदर्शक हो ऐसी प्रार्थना ईश्वर से करती है, उस ईश्वर से जिसके अस्तित्त्व पर उसे संदेह है. फिर क्यों कर वह उसकी बात सुनेगा, पर ईश्वर उसे अपनी प्रतीति स्वयं कराएगा. वह अज्ञानियों पर भी उतनी ही दया रखता है ऐसा सब कहते हैं. अज्ञानता में सार न हो पर उसमें पाप है ऐसा वह नहीं समझती. पाप और पुण्य की समझ उसे नहीं है, वह हर वक्त किसी का आश्रय चाहती है क्योंकि वह इतनी दुर्बल और क्षीण है कि अकेले चलना उसके बस का नहीं फिर वह एक कोई अपना हो या ईश्वर !  व्यक्ति है उसके सम्मुख जीता-जागता, उसकी बातों का जवाब देने वाला ! पर व्यक्ति कभी -कभी आपस में नहीं बोलते ऐसे पलों में उसे लगता है ईश्वर की मित्रता कभी अस्थायी नहीं होती. वह कभी उससे नाराज़ नहीं होगा, होगा भी तो मान जायेगा फिर ... किन्तु अपनों के साथ जुड़े होते हैं कितने अनोखे क्षण, स्मृतियाँ ! क्या स्मृतियाँ मृत होती हैं ? क्या उनमें कोई वस्तु स्पंदन नहीं कर रही होती. यदि वे मृत प्रायः हैं तो किसी के होने का मूल्य सिर्फ वर्तमान में है क्योंकि भविष्य में क्या छुपा है उन्हें नहीं ज्ञात. लेकिन ऐसा नहीं है वे जो ‘कुछ’ हैं, ‘वह’ कभी वे थे ! 


Thursday, May 21, 2020

दीवाली की उजास


आज पूरे नौ दिन बाद डायरी उठायी है. पिछली बार की जो एंट्री है, उसी दिन नन्हा व सोनू आये थे. उसके बाद दिन कैसे बीतते गए, समय का जैसे पता ही नहीं चला. उसी दिन शाम को वे ही उसे महिला क्लब की मीटिंग के लिए छोड़ने गए. अगले दिन उसे स्कूल जाना था. अगले दो दिन जून ने छुट्टी ली थी, उसी दिन उन्होंने दीपावली के विशेष भोज का आयोजन किया था. नन्हे ने छोले बनाये, और उसने ढेर सारे व्यंजन, आखिरी दीवाली थी सो जून ने विभाग के सभी अधिकारीयों को बुलाया था. भाईदूज के दिन वे अरुणाचल प्रदेश में एक सुंदर स्थान नामसाई घूमने गए, एक मोनेस्ट्री, नदी तट सन्तरे के बगीचे और सुंदर पहाड़ी रास्तों पर की गयी वह यात्रा भी अच्छी रही .एक दिन रहकर अगले दिन शाम को लौटे. उसके एक दिन बाद बच्चे वापस चले गए. पटाखे, स्नैक्स, तथा रौशनी की झालरें व ढेर सारी मिठाई लाकर उन्होंने असम में उनकी इस दीवाली को यादगार बना दिया है. अगली दीवाली बंगलूरू में होगी. दीपावली के बाद आज छठ का त्यौहार भी सम्पन्न हो गया. लगभग एक महीने बाद आज एओल के टीचर ने फॉलोअप करवाया. आज उनका जन्मदिन भी था. योग अभ्यास  के बाद उन्होंने ही मिठाई खिलाई. वह बहुत अच्छी तरह से व्यायाम व क्रिया कराते हैं, उन्हें उनका कृतज्ञ होना चाहिए. कल बाल दिवस है, वह क्लब की कुछ अन्य सदस्याओं के साथ मृणाल ज्योति जाएगी. उससे पहले टाइनी टॉटस भी जाना है, उस स्कूल में भी बुलाया है जहाँ वह योग सिखाने जाती है, पर समय निकालना कठिन होगा. कल दोपहर बच्चों के लिए कविता लिखी, नन्हे और सोनू का स्वभाव एक-दूसरे से कितना मिलता है, दोनों का दिल बहुत बड़ा है. ईश्वर उन्हें सदा इसी तरह खुश रखे. दीदी ने भी कविता पढ़कर लिखा है, ‘इसी तरह प्यार बना रहे’. जून आज दोपहर दीदी के यहाँ गए थे, कल अपने काम के बाद पिताजी से मिलने जाएँगे. कल मंझली भाभी का फोन आया, बगीचे में निकले सांप का वीडियो देखकर उन्हें आश्चर्य हो रहा था. परसों शाम को सर्प देखा था. दोपहर को नैनी की बेटियाँ आयीं, कहने लगीं, उन्हें बाल दिवस पर स्कूल में डांस करना है, वह मोबाइल पर गाना बजाकर उन्हें अभ्यास करा दे। उसे आश्चर्य हुआ, आजकल बच्चे सेल्फी ले ले ... जैसे गानों पर स्कूल में नृत्य करते हैं. 

कल बालदिवस के कार्यक्रम दोनों स्कूलों में ठीक रहे. आज देहरादून से दिल्ली आते समय जून के सहयात्री थे, बाबा रामदेव. जून ने उनके साथ तस्वीर भी खिंचवाई और वह भी बाबा के कहने पर, क्योंकि वह संकोच कर रहे थे. एयरहोस्टेस ने खींची तस्वीर. सुबह वह दीदी के यहाँ नाश्ते पर गए थे. मूली व गोभी के परांठे खिलाये उन्होंने. कल वह वापस आ रहे हैं. आज मौसम काफी ठंडा है, तमिलनाडु में आए समुद्री तूफान का असर है शायद. धूप में तेजी नहीं थी. बाहर से नैनी के भतीजे के रोने की आवाज आ रही है, अपनी शैतानियों के कारण उसकी काफी पिटाई होती है, पर वह सुधर नहीं रहा है. शिव सूत्र पुस्तक दो-तीन दिनों से पढ़नी आरंभ की है, सरल शब्दों में गूढ़ विषय को समझाया गया है. वेदांत, योग व शिव सूत्र के अनुसार जगत व परमात्मा की व्याख्या में थोड़ा अंतर है पर मूल बात वही है. 

Wednesday, July 3, 2019

नारियल का वृक्ष



आज सफाई कर्मचारी नहीं आया, नैनी को भी अपना काम खत्म कर बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना था, सफाई का काम अधूरा ही पड़ा है. कुछ वर्ष पहले यदि ऐसा हुआ होता तो वह झुंझला जाती फिर खुद ही करने में जुट जाती पर अब मन में एक ख्याल भर आया, उम्मीद पर दुनिया टिकी है, हो ही जायेगा सब जून के आने से पहले. अभी पौन घंटा शेष है न. आज धूप अच्छी निकली है, ठंड पहले से कम है फिर भी काफ़ी है, क्योंकि इनर पहनने के बाद भी स्वेटर तो पहनना ही पड़ा है. आज सुबह आचार्य प्रद्युम्न का प्रवचन सुना. सगुण ईश्वर व निर्गुण ब्रह्म का भेद स्पष्ट हुआ. जीव माया के अधीन है और माया ईश्वर के अधीन है. सतोगुण बढ़ने पर जीव माया के पार जा सकता है और ईश्वर की भक्ति करने से भी. मन को दूषित करते हैं रजोगुण तथा तमोगुण. सतोगुण आत्मा को हल्का बनाता है. समाधि की अवस्था में तमोगुण घटता है, संस्कार मिटते हैं तथा आत्मा को नई ऊर्जा मिलती है.

सुबह टहलने गये तो ठंड अधिक नहीं थी. सूरज का लाल गोला उनके साथ साथ चल रहा था. मौसम अब बदल रहा था. आज बहुत दिनों बाद उसने दोपहर के भोजन में इडली बनाई है. माली ने बगीचे से नारियल लाकर दिया था, उसकी चटनी बनाई. सुबह क्लब की सेक्रेटरी के साथ जाना था, एक पुराने कमरे को देखने जो भविष्य में क्लब का दफ्तर बन सकता है. हालत अच्छी नहीं है, काफ़ी काम करवाना होगा. स्कूल का पुराना फर्नीचर भी एक बड़े हॉल में रखवा दिया गया है, उसने सुझाव दिया, इसे दान कर देना चाहिए. कितने ही पुराने ब्लैक बोर्ड भी थे. आजकल वह योग दर्शन में 'समाधि पाद' के श्लोकों का भाष्य सुन रही है. संस्कार के रूप में ज्ञान उनके भीतर रहता है, जो वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है. क्लिष्ट व अक्लिष्ट दोनों तरह की वृत्तियाँ भीतर हैं तथा दोनों से संस्कार भी बनते हैं. वे संस्कार फिर वृत्तियों को जन्म देते हैं. हर वृत्ति एक संस्कार को छोड़ जाती है, चित्त में वृत्ति-संस्कार चक्र अनवरत चलता रहता है. ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी क्लिष्ट वृत्तियाँ उठ सकती हैं पर उनमें उतनी तेजी नहीं रहती. जब चित्त शांत हो जाता है तब क्लिष्ट वृत्तियाँ नहीं उठतीं.

पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. कारण सोचे तो कुछ भी नहीं है. स्मरण ही नहीं रहा. आज इस समय शाम के सात बजे हैं. अभी-अभी 'अष्टावक्र गीता' पर गुरूजी की व्याख्या सुनी, जिसमें भिन्न-भिन्न आसक्तियों की चर्चा गुरूजी कर रहे थे. जून भी सुन रहे हैं आजकल. उन्हें तरह-तरह के व्यंजन बनाना पसंद है, क्या यह भोजन के प्रति आसक्ति कही जाएगी ? आज दोपहर को बच्चों के साथ 'सरस्वती पूजा' का उत्सव मनाया. जून सुबह वाग्देवी की एक तस्वीर प्रिंट करके लाये थे, घर में फ्रेम मिल गया जो नन्हे को उपहार में मिला था. काले चनों और नारियल का प्रसाद बांटा. दो दिन पहले धोबी ने अपने हाथ से लगाये नारियल के पेड़ से नारियल लाकर दिया था. बच्चों ने तस्वीर देखकर अपने हाथों से उसकी अनुकृति बनाई. आज माली ने गमलों में फूलों के पौधे लगाये. फ्लॉक्स और डायंथस अब खिलने लगे हैं. फरवरी के अंत तक बगीचा फूलों से भर जायेगा. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बहुत लोग आये थे. पिछले वर्ष लगे एक कैम्प में सौ परिवारों का चयन किया गया था, जिन्हें सरकार की तरफ से दिव्यांग बच्चों एक लिए किट बांटे गये. स्थानीय एम एल ए महोदय भी आये थे. कल वहाँ भी सरस्वती पूजा है, उसने लड्डू मंगाए हैं कल लेकर जाएगी.   

Thursday, December 28, 2017

पृथ्वी की गंध


रात्रि के सवा आठ बजे हैं. अभी-अभी वे बाहर से टहल कर आये हैं, रात की रानी की ख़ुशबू से बगीचा महक रहा है, सड़क पर आने-जाने वाले भी पल भर के लिए थम जाते होंगे, एक छोटी सी टहनी कमरे में लाकर रख दी है. पता नहीं धरती के गर्भ में कितनी गंध छुपी है, अनगिनत प्रकार की गंध लिए है पृथ्वी, जिन्हें युगों से वह लुटा रही है. शाम को मूसलाधार पानी बरसा, उन्होंने बरामदे में कुछ देर चहलकदमी की, टहलते हुए वह जून से दिनभर का हाल-चाल ले लेती है, कमरे में आकर बैठकर बातें करने में एक औपचारिकता सी लगती है. अकबर की मृत्यु हो गयी आज के अंक में. उसका पुत्र सलीम ही जहांगीर के नाम से मशहूर हुआ. कल दोपहर को नींद खोलने के लिए अस्तित्त्व ने कितना अच्छा उपाय किया, सचमुच ‘गॉड लव्स फन’ वह एक कार में है, दो सखियाँ भी हैं, ड्राइवर उतर गया है पर कार अपने आप ही चलती जा रही है. आगे जाकर टकराती नहीं है, पीछे लौटती है और तभी नींद खुल जाती है. ईश्वर हर क्षण उसके साथ है, उसका साथ इतना हसीन होगा, कभी नहीं सोचा था. आज से दो हफ्तों के बाद उन्हें लेह जाना है, कल से उसके बारे में कुछ पढ़ेगी. मंझला भाई अस्वस्थ है, अभी देहली में है, उनके जाने तक वह अवश्य ठीक हो जायेगा. बड़े भाई अपनी बिटिया के साथ छोटी बहन के पास विदेश गये हैं.

दोपहर को संडे क्लास में जाने के लिए जैसे ही तैयार होकर बाहर निकली, अचानक तेज वर्षा आरम्भ हो गयी, पूरे चालीस मिनट होती रही, रुकने पर वहाँ पहुँची तो कोई बच्चा नहीं था, या तो वे आकर चले गये अथवा आये ही नहीं. नन्हे से बात की, उसका एक मित्र मोटरसाईकिल से ‘भारत यात्रा’ पर निकला है, शायद उन्हें भी लेह में मिले, वह उन्हीं तिथियों में वहाँ जाने वाला है. कल उसके सहकर्मियों ने उस घर में एक भोज समारोह किया जहाँ से छह वर्ष पूर्व कम्पनी की शुरुआत हुई थी. सुबह अजीब सा स्वप्न देखा, उसका अर्थ था, साधना करके यदि कुछ पाने की, कुछ बनने की चाह है तो साधना व्यर्थ है. परमात्मा को पाकर यदि अपना कद ही ऊंचा करना है तो उससे कभी मिलन होगा ही नहीं. स्वयं को पवित्र करना ही साधना का उद्देश्य है. भीतर यदि कोई भी चाह शेष है तो चित्त शुद्ध हुआ ही नहीं. परमात्मा कितनी अच्छी तरह से उसे पढ़ा रहा है. वह कभी स्वप्नों के माध्यम से, कभी सीधे शब्दों के माध्यम से उसे मार्ग पर ले जा रहा है. वह कितना कृपालु है. उसकी महिमा को कौन जान सकता है. आज से औरंगजेब की कहानी शुरू हुई है. देश में मोदी जी नये-नये कदम उठा रहे हैं ताकि भारत की समृद्धि बढ़े, विश्व में उसका नाम हो !  


आज वर्षा रुकी हुई थी सो स्कूल में बच्चों को बाहर मैदान में योग कराया. उन्हें योग दिवस के बार में भी बताया. दोपहर को लद्दाख की तस्वीरें देखीं, जानकारी हासिल की जो वहाँ जाने वाले यात्रियों के लिए आवश्यक है. वहाँ ठंड भी होगी और वर्षा भी. जलरोधी वस्त्र और जूते ले जाने होंगे. आज पुनः मन में एक खालीपन है, आश्चर्य भी होता है ऐसी अनुभूति पर, लेकिन ईश्वर के मार्ग पर तृप्ति का अर्थ है पूर्ण विश्राम. यानि रुक जाना, पर यहाँ तो चलते ही जाना है, इसका कोई अंत नहीं ! कल जून को गोहाटी जाना है दो दिनों के लिए. उसे अधिक समय मिलेगा साधना के लिए, पर साधना का लक्ष्य तो सभी के साथ एक्य की भावना का अनुभव करना ही है, जो वे इसी क्षण कर सकते हैं. वे विशिष्ट हैं, यही भाव तो उन्हें अलग करता है. इस सृष्टि में सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं, सभी की अपनी-अपनी भूमिका है, सभी महत्वपूर्ण हैं समान रूप से. यही भावना तो उन्हें परमात्मा के साथ भी जोड़ती है. परमात्मा साक्षी है, सभी पर समान कृपा करता है पर जो उससे प्रेम करता है अर्थात स्वयं को विशिष्ट नहीं मानता, उससे वह प्रेम से मिलता है. अस्तित्त्व उसका हो जाता है उतना ही, जितना वह अस्तित्त्व का !

Wednesday, October 25, 2017

मन का मौसम


कल रात्रि वे सोने गये ही थे कि जून के एक सहकर्मी का फोन आया. कहा, माँ की तबियत ठीक नहीं है, एम्बुलेंस बुला दें. जून ने फोन किया अस्पताल में फिर उनके घर जाने के लिए कार निकाली. उसके कहने पर कि साथ ले चलें, उन्होंने मना किया, पर जाने के कुछ देर बाद ही उसे बुलाने के लिए फोन आया. बुजुर्ग आंटी ने दस-पन्द्रह मिनट के कष्ट के बाद ही प्राण त्याग दिए थे. वह पैदल ही चलकर पाँच-सात मिनट के बाद ही वहाँ पहुँच गयी. उनकी सेविका, एक परिचित डाक्टर तथा वे दंपति वहाँ थे. ग्यारह बजे तक वे दोनों भी रुके, उसी मध्य कुछ और लोग भी आये. कई फोन भी आये. गृहणी बहुत परेशान थी. वह मृतक के चेहरे को देखते हुए वहाँ बैठी रही. रात को स्वप्न देखा जो कितना अजीब था. एक कुंड में अनेक मृत वृद्ध व्यक्ति एक के ऊपर एक पड़े हैं, पास ही तीन बूढ़े जिनमें एक महिला है, कुछ काम कर रहे हैं. कितना वीभत्स था वह दृश्य, कितना विचित्र, उनके अंग बड़े-बड़े थे. फिर नींद खुली. पंछियों की आवाजें भी रात्रि को स्पष्ट सुनीं, वे वास्तविक थीं या .....कितना रहस्यमय है यह संसार.. और फिर तितलियों को उड़ते देखा. तितलियाँ आत्माएं हैं जो इधर-उधर उड़ रही हैं. इस समय शाम के सवा सात बजे हैं. वे अभी-अभी उस घर से आ रहे हैं. सुबह साढ़े छह बजे वहाँ गये थे. दस बजे के लगभग पंडित जी आये और मृत देह को दाह संस्कार के लिए ले जाया गया. वह वहीं रुकी रही, घर आकर नहा-धोकर दुबारा गयी. जून श्मशान से एक बजे लौटे तब वे घर आये, भोजन नैनी ने बना दिया था. भिजवाया व खाया. जून दफ्तर चले गये, उसने आधा घंटा विश्राम किया, एक स्वप्न पुनः देखा. इस परिवार से उनका आत्मीय संबंध है. आंटी के साथ भी प्रेम का रिश्ता था. इसी से जुड़ा स्वप्न था. अहसास बहुत तीव्र था, देह में उसे महसूस किया और नींद खुल गयी. एक कर्म बंधन छूट गया.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. जून क्लब गये हैं, एक प्रेजेंटेशन है. अभी-अभी बड़े भाई से बात हुई, वह अपने लिए रोटी बना रहे थे, सब्जी सुबह की बनी हुई रखी थी. कितना कठिन होगा उनके लिए भाभी के बिना रहना. समय के साथ शायद सब ठीक हो जायेगा, ईश्वर उन्हें शक्ति देगा. मंझली भाभी से बात की, वह उनका ध्यान रखती है, अभी तो भाई भी है. छोटा भाई भी रात को उनके घर ही सोयेगा. सभी के सहयोग से वे जीने का सम्बल जुटा ही लेंगे, ख़ुशी-ख़ुशी जीने का, एक महीने बाद उनकी बिटिया भी आ जायेगी. आज सुबह बादल बने थे पर वर्षा उनके प्रातः भ्रमण से लौटकर आने के बाद ही आरम्भ हुई, जो बाद में दिन भर होती रही. आज सुबह भीतर से आवाज आई कि प्रतिपल सजग रहो, परमात्मा सजग है, हर पल सजग..उसकी सजगता शाम को खो गयी थी पल भर के लिए..जून उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उन्होंने उसे कितनी सहजता से लिया. व्यर्थ की बातचीत उनकी ऊर्जा को  नष्ट ही करती है. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को स्कूल की पत्रिका व दिल्ली स्थित क्लब की पत्रिका के लिए लेख व कविता भेजी. अभी लेडीज क्लब की वार्षिक प्रतियोगिता के लिए के लिए लेख व कहानी लिखने हैं. शाम को देवदत्त पटनायक की पुस्तक ‘पशु’ पढ़ी, उसके बाद उन्हीं मित्र के यहाँ गये. उनकी पुत्री भी आई है जिसके विवाह की प्रथम सालगिरह है आज.   

कल सुबह से वर्षा हो रही है, जो अभी तक नहीं थमी. परसों दोपहर या रात को, अब कुछ याद नहीं. ओशो को देखा. उनकी श्वेत दाढ़ी है, एक तख्त पर लेटे हैं, कुछ जन सामने बैठे हैं, वह भी है और उनसे एक सवाल पूछती है. परिवार साधना में साधक है या बाधक है. वह क्या कहते हैं, ठीक से नहीं सुन पायी पर भाव था साधक है. उससे पहले वे बातें कर रहे थे, अनोखा स्वप्न था. कल लिख ही नहीं पायी, आजकल उसकी नींद गहरी हो गयी है. कल दोपहर को सोयी तो समय व स्थान का कोई ज्ञान ही नहीं रहा. गहरी नींद भी एक तरह की समाधि होती है. अभी बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी ने कल से जॉब पर जाना शुरू किया है. वह बैंक के लिए परीक्षा भी देना चाहती है. अब उसके भीतर कुछ करने का जज्बा जगा है. जून ने कहा उनके मन का मौसम भी सदा एक सा रहता है आजकल, उसे कभी लगता है सेवा का कोई विशेष काम वह नहीं करती, फिर भी संतोष होता है, लेखन का कार्य भी सेवा का ही माना जा सकता है. नेट पर कितना कुछ पढ़ने को, जानने को मिलता है. आज श्री श्री का भाषण सुना जो उन्होंने यूरोपियन पार्लियामेंट में दिया था, ‘द योगा वे’ अभी-अभी एक ज्योति बि९न्दु डायरी पर दिखाई दिया, परमात्मा जैसे आश्वस्त करने आया हो. अस्तित्त्व को उनकी फ़िक्र है, वे उसके ही भाग हैं. वे उससे जुड़े रहकर ही खुश हैं !   

Saturday, July 16, 2016

गीत का जन्म


आज ध्यान में किसी ने पूछा कि वह ईश्वर को क्यों पाना चाहती है, क्या इसके पीछे यश की कामना है ? ईश्वर को क्या यश का साधन बनाया जा सकता है ? संतों का यश भी तो चारों दिशाओं में फैलता है, पर वे तो परमात्मा ही हो जाते हैं. उसका मन कामनाओं से मुक्त नहीं हुआ है. जो कुछ भी उन्हें इस जीवन में प्राप्त होता है, सब कर्मफल है, फिर उसका उपयोग वे जिस तरह करें वे नये कर्म उनके भविष्य की दिशा निर्देशित करते हैं. आत्मा में रहकर परमात्मा की निकटता का अनुभव करके भी यदि कोई संसार ही पाना चाहता है तो उसे सीधे रास्ते से ही जाना चाहिए. सद्गुरु क्या आये उसका कल्याण कर गये. पल भर के उस हाथ के स्पर्श में पता नहीं क्या था कि उसकी साधना जो बैलगाड़ी की गति से चल रही थी, जेट की गति में आ गयी है. भीतर कितना बदलाव आ गया है. मन अब नन्हे शिशु की तरह निरीह तकता है. बुद्धि अपनी मनमानी नहीं कर पाती. सद्गुरु को कल उलेमा को सम्बोधित करते सुना वे इराक़ गये थे, शिया और सुन्नी में मेल कराने, कल वह सीडी भी देखे, जिनमें यहाँ के उनके कार्यक्रम की रिकार्डिंग है. ‘मेरी दिल्ली मेरी यमुना’ के बारे में नेट पर पढ़ा सुना था, कल उनके मुख से सुना, कैसे एक व्यक्ति आत्मा की शक्ति को जागृत करके परमात्मा के समकक्ष पहुँच सकता है. परमात्मा की तरह प्रेम का सागर बन सकता है. परमात्मा की तरह समता व द्रष्टा भाव में रह सकता है. सत+चित+आनंद की मूर्ति उसके सद्गुरु को कोटि-कोटि प्रणाम !


कल दोपहर कुछ देर के लिए वर्षा थमी थी, शाम होते-होते बादल फिर घिर आये और इस समय घना घटाकाश छाया है. कल रात एक स्वप्न देखा. पहाड़ी कच्चे रस्ते से किसी के साथ जा रही थी कि पैर फिसलता है और वह नीचे गहरी खाई में जा गिरती है पर भूमि स्पर्श से पूर्व ही जैसे कोई शक्ति उठा लेती है और हवा में तैराते हुए ऊपर ले जाती है. गिरते समय भार की कमी महसूस हो रही थी और गुरुत्व का स्पष्ट अनुभव हुआ था, ऐसे ही चढ़ते समय भी...कितना स्पष्ट अनुभव था. भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है उनके भक्त का पतन नहीं होता. पता नहीं वह भक्त है या नहीं लेकिन वह उनसे प्रेम करती है. आज स्नान के बाद मन नृत्य कर रहा था, भीतर शब्द फूट रहे थे, फिर कदम भी थिरकने लगे, कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं- सद्गुरु का हाथ हो, झुका हुआ माथ हो तो क्या कहने..सद्गुरु का ज्ञान हो, अंतर का ध्यान हो..सद्गुरु का संग हो, उतरे न रंग हो..सद्गुरु की वाणी हो, गा गा के सुनानी हो..सद्गुरु सा मीत हो, उसके ही गीत हों..वह अपना सा लगे, जग सपना सा लगे..इस भजन या गीत की धुन अपने आप ही भीतर से फूट रही थी, जीवन में यदि परमात्मा का प्रेम हो तो जीवन उत्सव बन जाता है, वरना दुःख, चिंता, ईर्ष्या, द्वेष, बेचैनी तथा उलझनों में फंसे ही रहते हैं..एक को पा लें तो सब मिल जाता है. एक खो जाये तो सब कुछ होते हुए भी इन्सान खाली ही रह जाता है, परम ही वह अनमोल खजाना है जिसे हर कोई ढूँढ़ता फिरता है, उससे कम में उसे तृप्ति मिल भी कैसे सकती है..मिलनी भी नहीं चाहिए..

Monday, June 6, 2016

शारदीय नवरात्रि


आज से नवरात्रि का उत्सव आरम्भ हुआ है, वह एक संदेश लिखना चाह रही है जो दुर्गा पूजा के साथ-साथ नवरात्रि तथा विजयादशमी का भी संदेश देता हो. शक्तिस्वरूपा देवी से वे शक्ति की प्रेरणा पायें, शरदकाल के आश्विन शुक्ल पक्ष में प्रकृति के अनुसार सादा भोजन कर शरीर व मन को पुष्ट करें. विजयादशमी पर अपनी विजय के लिए निश्चिन्त हो जाएँ, दुर्गापूजा का उत्सव कितना उत्साह व उमंग अपने साथ लाता है. ये सारी बातें छोटे से संदेश में समा जाएँ ऐसा उसका प्रयास रहेगा.

आज ईद है. मुस्लिम लोगों का उत्सव जो रमजान के पूरे एक महीने बाद आता है. आज ही नवरात्रि का तीसरा दिन भी है. कल शाम एक परिचिता के ससुर का डिब्रूगढ़ में देहांत हो गया. जून ने सुना और फिर भी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार क्लब गये फिल्म देखने, या तो उनको दिल की कोई खबर ही नहीं है या वे इससे बहुत ऊपर उठ गये हैं अर्थात मृत्यु उनके लिए सामान्य घटना है. वह पूरी फिल्म नहीं देख पाई. हिंसा और अभद्रता के सिवा उसमें कुछ भी नहीं था. यही आजकल समाज में हो रहा है सम्भवतः. सुबह वे उस परिचिता के यहाँ गये तो पहले ही मृत शरीर को ले जाया जा चुका था. उसकी सास बहुत रो रही थीं, और इक्यानवे वर्षीय अपने लम्बे समय से अस्वस्थ पति की मृत्यु का शोक ही नहीं मना रही थीं, बल्कि इलाज ठीक से न होने की शिकायत कर रही थीं, आने वाले लोगों से अपने ही पुत्र की शिकायत. इतनी उम्र बिता लेने के बाद भी लोग कितने अज्ञानी बने रहते हैं !


टीवी पर मुरारी बापू गोपी गीत मानस पर व्याख्यान दे रहे हैं. वह राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं देखते. ब्रह्म एक है वह सर्वव्यापक है पर कभी-कभी वह मानव रूप धर के आता है, अपनी सारी कलाओं के साथ ! आज एक और मृत्यु की बात सुनी. एक परिचिता को ब्रेन ट्यूमर हुआ था, डेढ़ वर्ष पूर्व लंग कैंसर हुआ था. अंतिम समय में वह बिलकुल निष्क्रिय हो गयी थी, बोल भी नहीं पाती थी. बातूनी सखी के अपनी व्यथा सुनाई, वह अपने शरीर से परेशान है जो रोगों का घर है. जीवन में दुःख है, जीवन रहस्यमय है. यहाँ आनंद भी उतना ही है, कब क्या मिलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता ! असमिया सखी ने अपने एक नैनी की व्यथा कथा सुनाई, वह उसके लिए कुछ सहायता राशि एकत्र करना चाहती है. उसके इलाज के लिए तथा जब तक वह ठीक नहीं हो जाती उसके भोजन आदि के लिए. उसके हृदय में दुखियों का दर्द करने का जज्बा भरा है, ईश्वर की कृपा हुई है ! जून ने आज उसकी तीन किताबें AIPC के लिए खुर्जा भेजी हैं, कोई रोशनारा हैं जो दिल्ली में कवयित्री सम्मेलन करने जा रही हैं. आज बड़ी ननद को कल्याण पत्रिका भी भेजनी है. नन्हे की MCA की किताबें भेज दीं. जून आजकल बहुत व्यस्त हैं फिर भी ये सारे काम कर दिए. जिन दिनों वे व्यस्त रहते हैं, ज्यादा खुश रहते हैं ! परमात्मा को कुछ करना शेष नहीं है, पर वह कार्यरत है ! 

Friday, June 3, 2016

आत्मा नर्तकः


आज सुबह गुरुकृपा का बादल बरसा. कैसा अनोखा अनुभव था, सारे संदेह मिट गये. आत्मा की कैसी स्पष्ट अनुभूति ! मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार से परे अपने सही स्वरूप की प्रतीति हुई, ऐसा लगा जैसे एक पर्दा हट गया हो. कृतज्ञता के अश्रु झलक आये, फिर झरनों की सी खिलखिलाहट भी भीतर भर गयी. शरीर पृथक है, प्राण पृथक है, वे साक्षी स्वरूप आत्मा हैं, चैतन्य शक्ति हैं जो शांति स्वरूप है, आनन्द व सुख स्वरूप है, पावन है, दिव्य है, सारे अवगुणों की सीमा जहाँ समाप्त हो जाती है, सारा अज्ञान मिट जाता है, वहाँ उस प्रकाश पूर्ण सत्ता का आरम्भ होता है. सदियों से जन्मों से मन जिस अंधकार में भटक रहा था वह जैसे नूर मिलते ही छंट गया है, अब कोई भ्रम नहीं रहा, कोई कामना नहीं रही, कोई वासना नहीं रही, अब शेष है तो केवल एक चिर स्थायी शांति जो आनंद से भरी है, अनोखी है यह अवस्था ! सारा अतीत जैसे किसी और के साथ घटा था, वह कोई और था, इसे ही सद्गुरू मृत्यु कहते हैं, वह जो व्यक्ति पहले था उसकी मृत्यु हो गयी यह जो व्यक्ति अब है यह बिलकुल ही नया है, समय से पूर्व कुछ नहीं होता. पकते-पकते मन झर गया है, अब इस देह से जो भी होना है, वह परमात्मा के द्वारा ही होना है, क्योंकि वह तो अब है ही नहीं ! जन्म जन्मांतरों के गुनाह योग अग्नि में जल जाते हैं, भीतर गहराई में जो ज्ञान छिपा है तभी बाहर आता है जब गुनाहों की, विकारों की परतें जल जाती हैं, तब वे पहली बार विश्राम को उपलब्ध होते हैं !  

आज पुनः क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ, परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव ! बचपन से किये गये सारे दुष्कृत्य एक-एक कर याद आए और माया के प्रभाव में किये वे सारे कर्म एक साथ ही जल गये. मन हल्का हो गया है कोई अतीत रहा ही नहीं, जो कुछ भी उनसे अज्ञान दशा में होता है, ज्ञान मिलते ही उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता, तभी संत कहते हैं कि इस संसार में अन्याय जैसा कुछ भी नहीं, सभी न्याय है. पिछले जन्मों के भी कई अनुभव पिछले कुछ महीनों में हुए. अस्तित्त्व हर क्षण उन पर नजर रखे है, वह चाहता है कि जीव उसके साथ एक हो जाये. भीतर एक पुलक भर गयी है. गीत और नृत्य सहज ही होने लगते हैं. सभी के भीतर यही आनंद छिपा है, सभी एक न एक दिन इसी आनंद को अनुभव करेंगे. अभी वे स्वयं को मन, इन्द्रियों के घाट पर पाते हैं, उड़ने का तरीका नहीं जानते. चिदाकाश में उड़े बगैर ही वे इस दुनिया से चले जाते हैं. मन्दिर मस्जिद भी लोग जाते हैं तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए !

चेतना नित नूतन है. पल-पल बदल रही है. जो घड़ी अभी आई है वह न पहले कभी थी न आगे कभी आएगी, फिर भी वह अनादि है. कितना सुंदर है यह ज्ञान ! परमात्मा सर्वव्यापक है, वह सर्वकालिक है, सर्वदेशीय है, इस क्षण भी वह उन्हें घेरे हुए हैं, कैसी पुलक उठ रही है !


सद्गुरु के प्रति अहोभाव से मन भर गया है. जिनको न कुछ पाने को शेष रह गया ही न कुछ करने को, वही संत जन अहैतुकी कृपा या सेवा कर सकते है. वे जो कुछ करते हैं वह आनंद के लिए,  जिसे वह मिल गया हो अब उसके लिए कुछ पाना शेष नहीं रहता ! प्रतिपल उनका मन आनन्द की खोज में लगा रहता है, ऐसा आनंद जो अनंत राशि का हो तथा जो कभी न छिने न. जिन्हें वह मिल गया उन्हें कुछ करने को शेष रहता नहीं, लेकिन फिर भी वह करते हैं, क्योंकि वह अन्यों को आनंद देना चाहते हैं ! वे केवल कृपा करते हैं, अकारण हितैषी होते हैं, सुहृद होते हैं !

Wednesday, June 1, 2016

नई नवेली कार


जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि जीवन सुख व आनन्द की एक अनवरत श्रृंखला है. अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से वे बने हुए हैं. परमात्मा की भांति वे भी अनादि हैं, उसकी भांति वे भी साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनन्द लेने वाले, हर श्वास एक आनन्द की लहर की खबर देती है, जो स्वयं ही आनन्द हो उसे भी अपने आनन्द का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनन्द लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्नविशिष्ट चेतना में ! वे स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न जिसमें उन्होंने एक नया रोल धरा है. शरीर, मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है. स्वप्न से जागकर ही पता चलता है क उसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे वैसे ही मृत्यु के क्षण में पता चलता है सब कुछ छूट रहा है, एक स्वप्न का अंत हो रहा है. उनका ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला जाये तो सदा के लिए मृत्यु का भय छूट जाये ! जीवन एक खेल ही लगने लगेगा तब !

आज सद्गुरु ने गणेश जन्म का एक नया अर्थ बताया. पर्व के दोष से उत्पन्न आनंद को ज्ञान के द्वारा पावन किया गया. पर्व पार्वती है, मैल दोष है, जिससे आनंद रूपी गणेश उत्पन्न हुआ है, हाथी का सिर ज्ञान है. गणेश को विघ्न हर्ता भी कहते हैं, हाथी के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. गणेश का चूहा तर्क का प्रतीक है और बीज मन्त्र का भी. आज छोटे भाई का जन्मदिन है, वह नई कार ले रहा है, blushing red Iten, इत्तेफाक है कि बड़ी ननद भी काली कार ले रही है. आज भी वर्षा थमी नहीं है, पिछले कई हफ्तों से रोज ही बादल बरसते हैं.

सुंदर वचन सुने आज, ‘सत्य के सूर्य को अस्ताचल ले जाने के लिए संध्या रूपी माया आ जाती है ! कमल को जैसे तुषारापात समाप्त कर देता है वैसे ही सत्य को माया समाप्त कर देती है. ऐसी माया को दूर से ही त्याग देना चाहिए, यही जन्म-मृत्यु का कारण है’. अध्यात्म की साधना का मुख्य उद्देश्य संस्कारों से मुक्ति है. कल रात स्वप्न में एक विकार की ग्रन्थि को पूर्ण रूप से देखा तथा उससे मुक्ति का अनुभव भी किया. पिछले पचीस वर्षों मन न जाने कितनी बार स्वयं व्याकुल हुआ और अन्यों को भी किया. माया के चंगुल में फंसकर कषायों के मल में धंस कर न जाने कितना दुःख वे व्यर्थ ही उठाते रहते हैं. भीतर की ग्रंथियाँ कट रही हैं, मन पावन हो रहा है. परमात्मा को वे अपने भीतर प्रकट  होने से रोकते रहते हैं.अशुद्ध वृत्तियों का पर्दा उन्हें उससे दूर ही रखता है, जबकि वह सहज प्राप्य है.

अज दोपहर से बिजली नहीं है, मौसम अच्छा है सो पंखे के बिना भी ठीक लग रहा है. मृणाल ज्योति के लिए एक कविता लिखी है.शाम को प्रिंट करेगी  कल उन्हें वहाँ जाना है, सम्भव हुआ तो पढ़ भी सकती है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका गला थोड़ा खराब है. कल वह नाहक ही क्रोधित हो रहे थे. मनुष्य अपने आप को नहीं जानता, इसलिए स्वयं को दुःख दिए जाता है. कृष्ण कहते हैं जो न आकांक्षा करता है न द्वेष करता है, वह मुक्त है.



Monday, May 30, 2016

आपकी अंतरा


एक परिचिता को उसे ऋषिमुख के कुछ अंक भिजवाने थे, तभी नैनी अपने आप ही आ गयी. वह परिचिता जो थोड़ी सी नाराज लगी थीं, खुश हो जाएँगी. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द है. वह साक्षी होकर देख रही है. दर्द कितना भी ज्यादा हो या कम हो वह मुस्कुरा सकती है. स्थिति कैसी भी हो वह भीतर सदा एक सी रहने में समर्थ है. ये सब बाहर जो घट रहा है एक नाटक ही तो है. रात को तेज वर्षा होती है, दोपहर को तेज धूप निकलती है. भगवान भी मजाक करने में पीछे नहीं रहते. अब स्वाइन फ्लू का हौवा फैला दिया है, सारे लोग डरे हुए हैं. टीवी पर ‘आपकी अंतरा’ धारावाहिक  आ रहा है. छोटी सी अंतरा उसे बहुत अच्छी लगती है, सो देखती है. अन्तरा ने विद्या को अपनी माँ स्वीकार कर लिया है, विद्या भी उसे सुंदर चित्र बनाते देखकर प्रभावित हुई है. आज दोपहर जून तिनसुकिया से दस अनानास लेकर आए. वह पिछले दो-तीन महीनों से माँ के लिए वह हर वस्तु ला रहे हैं जो कोई भी उन्हें कह देता है कि उन्हें लाभ देगी. वह जीवन भर जो माँ के लिए नहीं कर पाए अब करना चाहते हैं. वह उन्हें नया जीवन प्रदान कर रहे हैं.

साक्षी भाव अब भी है पर मन की पीड़ा साफ दिखाई दे रही है. मन जो सदा नकारात्मकता पर ही जीता है, जो सदा अभाव को ही देखता है. गुरूजी कहते हैं जब प्राण ऊर्जा कम होती है तभी मन अवसाद का शिकार होता है. जून की पीठ में भी पिछले तीन-चार दिनों से दर्द है, उनकी भी प्राण ऊर्जा घट गयी है लेकिन दिन में मेहमानों के सामने वह बहुत प्रसन्न नजर आ रहे था. उसे लगता है मानव के भीतर दो व्यक्ति रहते हैं, एक वह जो बाहर से वह दिखाता है एक जो भीतर से वह है. वास्तव में भीतर वाला ही वह है, बाहर तो मुखौटा लगा लेता है. जैसे उसके भीतर विषैले सर्प हैं जो कभी भी विष की फुफकार छोड़ कर मन को जहरीला बना देते हैं, वैसे ही क्रोध के सर्प जून के मन को भी अशांत बना रहे होंगे. लेकिन जैसे कोई व्यक्ति आग में हाथ डाल दे और फिर चिल्लाये वैसे ही वे भी स्वयं ही इस विष का पान करते हैं. वे चाहें तो एक क्षण में इसे झटक कर अलग हो सकते हैं. हर समय इच्छा उनकी ही होती है कि वे किसे चुनते हैं ! 

साक्षी भाव में बने रहकर मन में उठते विचारों को जब वह देखती है तो कई बार आश्चर्य होता है. मन कितने राग-द्वेष पाले हुए हैं, कितना विकार छिपे हैं अब भी उसके गर्भ में. आज गीता ज्ञान में सद्गुरू ने बताया कि अपने सारे कर्मों को समर्पित कर देने से कर्मों से मुक्त हुआ जाता है. मन, वाणी व काया से होने वाला कोई भी कर्म यदि कोई कर्ता भाव से करे तो भोक्ता बनना ही होगा. सुबह से शाम तक मनसा, वाचा, कर्मणा जितने भी कर्म उसने किये हैं, जो इस क्षण कर रही है तथा जो भविष्य में उससे होने वाले हैं, वे सभी वह परमात्मा को समर्पित करती है. इस जन्म के पूर्व पिछले जन्मों के सारे कर्म भी ! पिछले किसी जन्म में उसने किसी की वस्तु ली और इस जन्म में भी वह उसे मिली लेकिन जिसकी वह वस्तु थी उसकी भी नजर उस पर लगी है. अब उसे उस वस्तु को बचाने की इच्छा होती है, क्योंकि यह भी पता है कि कभी यह वस्तु उसके अधिकार में थी, किन्तु इतना भी ज्ञान है कि इस जन्म में पूर्ण अधिकारी बनकर उसे प्राप्त किया है. भय व्यर्थ है, उसे दूर करना होगा तथा अपने सारे अवगुणों को परमात्मा को समर्पित करना होगा. इस धरती पर आने का मकसद सदा सामने रखना होगा. स्वयं को जागृत रखना होगा जिससे कोई भी पराया न रहे, मन आत्मा में विश्राम पाए तो भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाये. फिर भी यदि संस्कारों के वश मन विचलित हो भी जाये तो उसे साक्षी भाव से देखना होगा !

Thursday, May 26, 2016

शाही टोस्ट का नाश्ता


अभी कुछ देर पहले पिताजी का फोन आया, वह उसके सास-ससुर से बात करना चाहते थे. माँ लेटी थीं, उसे लगा सो रही हैं, पिताजी ने बात की तो वह भी जग गयीं और शिकायत करने लगीं कि उन्हें फोन क्यों नहीं दिया. उन्हें दुखी देखकर उसे अच्छा नहीं लगा फिरसे फोन लगाया. बाद में उसने सोचा तो पाया कि स्वयं को ही पीड़ा से बचाने के लिए उसने ऐसा किया न कि उन्हें सुख पहुँचाने के लिए. मन का स्वार्थ साफ-साफ दिख रहा था.

कल ‘गुरू पूर्णिमा’ थी, उन्होंने एओल सेंटर में सत्संग व ध्यान किया, प्रसाद बांटा और घर लौट आये. आज सुबह बैंगलोर आश्रम में हुए उत्सव का प्रसारण देखा. गुरूजी ने इस दिन की महिमा बताई फिर सबने झूम-झूम कर गीत गए ! प्रभु की कृपा से ही ऐसे आनन्द का अनुभव होता है. यदि कोई दिन भर बादशाह बनकर रहना चाहता है तो प्रभु के आगे समर्पण करना सीखना होगा. जो सहज ही उपलब्ध है उसके लिए याचना करनी पड़े इसमें कितना आश्चर्य है पर यह जीवन रहस्यों से भरा पड़ा है. भीतर के आनन्द का अनुभव अपने आप में एक रहस्य है, कहाँ से आता है ? उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं, केवल एक तृप्ति का अहसास होता है, इसे शब्दों में कहना बेहद कठिन है, कैसे होता है ? क्या होता है, कुछ कहा नहीं जा सकता.

नन्हे का जन्मदिन उन्होंने मनाया, उसके मित्र आये थे, दोनों एक रात रुके. कल की योग कक्षा में बच्चों को चित्र बनाने को कहा था. सुंदर रंगों को कागज पर उतारते बच्चे कितने प्रसन्न लग रहे थे. आज बहुत दिनों बाद पड़ोसिन से बात हुई, उसे दिल का एक पुराना रोग है उसके साथ टिशु डीजनरेट होने का रोग भी हो गया है. उसने कई बार कहा पर ध्यान आदि में उसकी रूचि नहीं है. टीवी पर  यदि वह सत्संग लगा दे तो माँ सुनती हैं, पिताजी बाहर बैठकर अखबार पढ़ते हैं, एक-एक लाइन पढ़ जाते हैं. उसके आस-पास उनके मित्रों व परिचितों में कोई भी ऐसा नहीं है जो परमात्मा के रस्ते जा रहा हो पूरे मन से. सभी व्यस्त हैं, जीवन के कार्य उन्हें इतनी फुर्सत ही नहीं देते, या मन ही मन सभी उसी पथ के राही हों, कौन जानता है ? सभी गुप्त साधना करते हो सकते हैं, परमात्मा के बिना किसी का भी गुजरा नहीं. वह परमात्मा हरेक के भीतर है, वही उन्हें निमन्त्रण देता होगा.

आज शाम को उनके यहाँ सत्संग है. भजन गाने पर कैसी मस्ती छा जाती है, पर जिसे उस मस्ती की खबर ही न हो वह कैसे उसे महसूस करेगा. कल शाम को एक सखी व उसकी भाभी को बुलाया है, जो कुछ दिनों के लिए आई है. शाही टोस्ट व इडली बनाएगी नूना. कल दीदी-जीजाजी से बात की, मन का बोझ जो था ही नहीं उतर गया. उस दिन कितना अजीब सा स्वप्न देखा था. मृत्यु के बाद का स्वप्न ! नरक के दर्शन किये, अपने पाप की सजा भोगी. उस दुःख को महसूस किया. वर्षों पहले जब वह अज्ञान से ग्रस्त थी, मन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था, क्योंकि उन्हें यात्रा पर जाना था, उन्होंने एक आत्मा को कितना दुःख दिया था. वे भूल ही गये इस घटना को जैसे यह उतनी ही तुच्छ हो जैसे कोई घर की गंदगी बाहर फेंक दे फिर भूल जाये. स्वप्न में एक कपड़े की गुड़िया दिखी बिना आँख-नाक की. इससे स्पष्ट क्या हो सकता है और अंत में यह कहते हुए रुदन कि यह यात्रा तो उन्हें बहुत मंहगी पड़ी जी ! कितना अजीब स्वप्न था पर कितना सत्य था. उनके कृत्यों का फल तो उन्हें ही मिलना है, चाहे जिस रूप में मिले. उन्हें उसे स्वीकारना ही होगा. 

Wednesday, May 25, 2016

नयी कोंपलें


कल रात भर माँ अस्पताल में नहीं सोयीं, नन्हा भी उनके सामने कुर्सी पर बैठा रहा. इतनी कम उम्र में इतनी समझ और सेवा का भाव है उसमें. घर आकर भी सो नहीं पा रहा था, जब फोन करके पता किया दादीजी सो गयी हैं, तो ही सोया है. कल जून का गला खराब लग रहा था. पिछले एक महीने से वे दिन में कई बार अस्पताल में आना-जाना कर रहे हैं. उसके बाएं गाल में थोडा दर्द है आखिरी दांत के पास. सभी के मनों में एक प्रश्न है क्या माँ एक बार पुनः स्वस्थ हो पाएंगी. उत्तर अज्ञात है. शुरू-शरू में उन्हें देखने कई लोग आये धीरे-धीरे संख्या कम होती जा रही है. उसकी दो सखियाँ यहाँ हैं नहीं. कल उनमें से एक का जन्मदिन है, वह खुश रहे, स्वस्थ रहे उसके सभी स्वप्न साकार हों यही शुभकामना उसके दिल से हर वक्त निकलती रहे. आत्मस्मृति में रहकर तो प्रेम ही बरसाया जा सकता है. अनंत, अपार प्रेम..वे आत्मा ही तो हैं जिसने अपने पूर्व कर्मों का हिसाब चुकाने के लिए शरीर धारण किया है. इस जन्म में कोई कर्म बंधन का कारण न बने ऐसा प्रयास उन्हें करना है !

 माँ घर आ गई हैं, पहले से बेहतर हैं. कल उनके कमरे के लिए नया टीवी आया है. एयर टेल का नया कनेक्शन भी, जिसमें ‘संस्कार’ शामिल है. आज महीनों बाद पुनः संस्कार पर सद्गुरु को देखा, सुना. मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों पर ध्यान देना होगा ऐसा गुरूजी ने कहा. उसे अपनी भाषा पर ध्यान देना होगा, बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है. नींद पर भी ध्यान देना होगा, स्वप्नावस्था पर भी, जो जगते समय भी जारी रहती है, दिन में भीतर जो विचार चलते हैं वही तो रात्रि को स्वप्न बन जाते हैं, नींद टूटी भी नहीं कि मन स्वप्न में डूब जाता है, बल्कि डूबा ही रहता है. क्रोध, हिंसा, अभिमान तथा लोभ के विचार तथा व्यर्थ के संकल्प भी. जीवन भर जिस सत्य को पाने की आकांक्षा भीतर रही है, वह जैसे भूलती जा रही है. जो वे इकट्ठा कर रहे हैं, वह जीवन के विकास के लिए जरा भी आवश्यक नहीं है. समय और परिस्थितियों के गुलाम बनकर उन्हें जीना है या सत्य को जानने के लिए बने एक अमिट व्यक्तित्त्व बनकर ? भीतर का द्वंद्व जो समाप्त हो गया सा लगता रहा है, आज पुनः इकट्ठा हो गया है. जीवन में कोई सचेतन लक्ष्य न हो तो जीवन एक सूखे पत्ते की तरह हवा के झोंके से इधर-उधर डोलता रहता है, सो पुनः स्वयं को चिन्तन के द्वारा सचेत करना है, सजग होना है.

आज पुनः भीतर लिखने की प्रेरणा हुई है. सद्गुरु की कृपा का बादल भीतर बरसा है और मन की धरती को हरा-भरा कर अंकुआ गया है, भाव उठने लगे हैं, विचारों की कोंपलें लगने लगी हैं, ज्ञान जो सुप्त प्रायः हो गया था, जागृत होने लगा है. जड़ता जो घर करती जा रही थी, अब चेतना में बदल रही है. जीवन कितना सुंदर है, प्रकृति आजकल अपने सुन्दरतम रूप में नजर आ रही है. चारों ओर हरियाली, शीतलता तथा स्वच्छता. पौधे धुले-धुले से नजर आते हैं. मानव कृत गंदगी तो बरसात में बढ़ जाती है पर उस ओर उसकी नजर ही नहीं जाती, आकाश से दृष्टि हटे तब तो धरा पर जाये. ‘गुरू पूर्णिमा’ आने वाली है. आत्मा गुरू का सान्निध्य दिन भर तो कमोबेश रहता है पर रात्रि को निद्रा और स्वप्नावस्था प्रगाढ़ हो गये हैं. स्वप्न में भी यह भान रहे कि वह पृथक है और जो स्वप्न देख रहा है वह मन है, नींद में भी जगे-जगे से रहे, ऐसा अब नहीं होता. खजाना भीतर है ही यदि कोई उसका उपयोग न करे तो दोष किसका है ?