Monday, May 30, 2016

आपकी अंतरा


एक परिचिता को उसे ऋषिमुख के कुछ अंक भिजवाने थे, तभी नैनी अपने आप ही आ गयी. वह परिचिता जो थोड़ी सी नाराज लगी थीं, खुश हो जाएँगी. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द है. वह साक्षी होकर देख रही है. दर्द कितना भी ज्यादा हो या कम हो वह मुस्कुरा सकती है. स्थिति कैसी भी हो वह भीतर सदा एक सी रहने में समर्थ है. ये सब बाहर जो घट रहा है एक नाटक ही तो है. रात को तेज वर्षा होती है, दोपहर को तेज धूप निकलती है. भगवान भी मजाक करने में पीछे नहीं रहते. अब स्वाइन फ्लू का हौवा फैला दिया है, सारे लोग डरे हुए हैं. टीवी पर ‘आपकी अंतरा’ धारावाहिक  आ रहा है. छोटी सी अंतरा उसे बहुत अच्छी लगती है, सो देखती है. अन्तरा ने विद्या को अपनी माँ स्वीकार कर लिया है, विद्या भी उसे सुंदर चित्र बनाते देखकर प्रभावित हुई है. आज दोपहर जून तिनसुकिया से दस अनानास लेकर आए. वह पिछले दो-तीन महीनों से माँ के लिए वह हर वस्तु ला रहे हैं जो कोई भी उन्हें कह देता है कि उन्हें लाभ देगी. वह जीवन भर जो माँ के लिए नहीं कर पाए अब करना चाहते हैं. वह उन्हें नया जीवन प्रदान कर रहे हैं.

साक्षी भाव अब भी है पर मन की पीड़ा साफ दिखाई दे रही है. मन जो सदा नकारात्मकता पर ही जीता है, जो सदा अभाव को ही देखता है. गुरूजी कहते हैं जब प्राण ऊर्जा कम होती है तभी मन अवसाद का शिकार होता है. जून की पीठ में भी पिछले तीन-चार दिनों से दर्द है, उनकी भी प्राण ऊर्जा घट गयी है लेकिन दिन में मेहमानों के सामने वह बहुत प्रसन्न नजर आ रहे था. उसे लगता है मानव के भीतर दो व्यक्ति रहते हैं, एक वह जो बाहर से वह दिखाता है एक जो भीतर से वह है. वास्तव में भीतर वाला ही वह है, बाहर तो मुखौटा लगा लेता है. जैसे उसके भीतर विषैले सर्प हैं जो कभी भी विष की फुफकार छोड़ कर मन को जहरीला बना देते हैं, वैसे ही क्रोध के सर्प जून के मन को भी अशांत बना रहे होंगे. लेकिन जैसे कोई व्यक्ति आग में हाथ डाल दे और फिर चिल्लाये वैसे ही वे भी स्वयं ही इस विष का पान करते हैं. वे चाहें तो एक क्षण में इसे झटक कर अलग हो सकते हैं. हर समय इच्छा उनकी ही होती है कि वे किसे चुनते हैं ! 

साक्षी भाव में बने रहकर मन में उठते विचारों को जब वह देखती है तो कई बार आश्चर्य होता है. मन कितने राग-द्वेष पाले हुए हैं, कितना विकार छिपे हैं अब भी उसके गर्भ में. आज गीता ज्ञान में सद्गुरू ने बताया कि अपने सारे कर्मों को समर्पित कर देने से कर्मों से मुक्त हुआ जाता है. मन, वाणी व काया से होने वाला कोई भी कर्म यदि कोई कर्ता भाव से करे तो भोक्ता बनना ही होगा. सुबह से शाम तक मनसा, वाचा, कर्मणा जितने भी कर्म उसने किये हैं, जो इस क्षण कर रही है तथा जो भविष्य में उससे होने वाले हैं, वे सभी वह परमात्मा को समर्पित करती है. इस जन्म के पूर्व पिछले जन्मों के सारे कर्म भी ! पिछले किसी जन्म में उसने किसी की वस्तु ली और इस जन्म में भी वह उसे मिली लेकिन जिसकी वह वस्तु थी उसकी भी नजर उस पर लगी है. अब उसे उस वस्तु को बचाने की इच्छा होती है, क्योंकि यह भी पता है कि कभी यह वस्तु उसके अधिकार में थी, किन्तु इतना भी ज्ञान है कि इस जन्म में पूर्ण अधिकारी बनकर उसे प्राप्त किया है. भय व्यर्थ है, उसे दूर करना होगा तथा अपने सारे अवगुणों को परमात्मा को समर्पित करना होगा. इस धरती पर आने का मकसद सदा सामने रखना होगा. स्वयं को जागृत रखना होगा जिससे कोई भी पराया न रहे, मन आत्मा में विश्राम पाए तो भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाये. फिर भी यदि संस्कारों के वश मन विचलित हो भी जाये तो उसे साक्षी भाव से देखना होगा !

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !


Thursday, May 26, 2016

शाही टोस्ट का नाश्ता


अभी कुछ देर पहले पिताजी का फोन आया, वह उसके सास-ससुर से बात करना चाहते थे. माँ लेटी थीं, उसे लगा सो रही हैं, पिताजी ने बात की तो वह भी जग गयीं और शिकायत करने लगीं कि उन्हें फोन क्यों नहीं दिया. उन्हें दुखी देखकर उसे अच्छा नहीं लगा फिरसे फोन लगाया. बाद में उसने सोचा तो पाया कि स्वयं को ही पीड़ा से बचाने के लिए उसने ऐसा किया न कि उन्हें सुख पहुँचाने के लिए. मन का स्वार्थ साफ-साफ दिख रहा था.

कल ‘गुरू पूर्णिमा’ थी, उन्होंने एओल सेंटर में सत्संग व ध्यान किया, प्रसाद बांटा और घर लौट आये. आज सुबह बैंगलोर आश्रम में हुए उत्सव का प्रसारण देखा. गुरूजी ने इस दिन की महिमा बताई फिर सबने झूम-झूम कर गीत गए ! प्रभु की कृपा से ही ऐसे आनन्द का अनुभव होता है. यदि कोई दिन भर बादशाह बनकर रहना चाहता है तो प्रभु के आगे समर्पण करना सीखना होगा. जो सहज ही उपलब्ध है उसके लिए याचना करनी पड़े इसमें कितना आश्चर्य है पर यह जीवन रहस्यों से भरा पड़ा है. भीतर के आनन्द का अनुभव अपने आप में एक रहस्य है, कहाँ से आता है ? उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं, केवल एक तृप्ति का अहसास होता है, इसे शब्दों में कहना बेहद कठिन है, कैसे होता है ? क्या होता है, कुछ कहा नहीं जा सकता.

नन्हे का जन्मदिन उन्होंने मनाया, उसके मित्र आये थे, दोनों एक रात रुके. कल की योग कक्षा में बच्चों को चित्र बनाने को कहा था. सुंदर रंगों को कागज पर उतारते बच्चे कितने प्रसन्न लग रहे थे. आज बहुत दिनों बाद पड़ोसिन से बात हुई, उसे दिल का एक पुराना रोग है उसके साथ टिशु डीजनरेट होने का रोग भी हो गया है. उसने कई बार कहा पर ध्यान आदि में उसकी रूचि नहीं है. टीवी पर  यदि वह सत्संग लगा दे तो माँ सुनती हैं, पिताजी बाहर बैठकर अखबार पढ़ते हैं, एक-एक लाइन पढ़ जाते हैं. उसके आस-पास उनके मित्रों व परिचितों में कोई भी ऐसा नहीं है जो परमात्मा के रस्ते जा रहा हो पूरे मन से. सभी व्यस्त हैं, जीवन के कार्य उन्हें इतनी फुर्सत ही नहीं देते, या मन ही मन सभी उसी पथ के राही हों, कौन जानता है ? सभी गुप्त साधना करते हो सकते हैं, परमात्मा के बिना किसी का भी गुजरा नहीं. वह परमात्मा हरेक के भीतर है, वही उन्हें निमन्त्रण देता होगा.

आज शाम को उनके यहाँ सत्संग है. भजन गाने पर कैसी मस्ती छा जाती है, पर जिसे उस मस्ती की खबर ही न हो वह कैसे उसे महसूस करेगा. कल शाम को एक सखी व उसकी भाभी को बुलाया है, जो कुछ दिनों के लिए आई है. शाही टोस्ट व इडली बनाएगी नूना. कल दीदी-जीजाजी से बात की, मन का बोझ जो था ही नहीं उतर गया. उस दिन कितना अजीब सा स्वप्न देखा था. मृत्यु के बाद का स्वप्न ! नरक के दर्शन किये, अपने पाप की सजा भोगी. उस दुःख को महसूस किया. वर्षों पहले जब वह अज्ञान से ग्रस्त थी, मन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था, क्योंकि उन्हें यात्रा पर जाना था, उन्होंने एक आत्मा को कितना दुःख दिया था. वे भूल ही गये इस घटना को जैसे यह उतनी ही तुच्छ हो जैसे कोई घर की गंदगी बाहर फेंक दे फिर भूल जाये. स्वप्न में एक कपड़े की गुड़िया दिखी बिना आँख-नाक की. इससे स्पष्ट क्या हो सकता है और अंत में यह कहते हुए रुदन कि यह यात्रा तो उन्हें बहुत मंहगी पड़ी जी ! कितना अजीब स्वप्न था पर कितना सत्य था. उनके कृत्यों का फल तो उन्हें ही मिलना है, चाहे जिस रूप में मिले. उन्हें उसे स्वीकारना ही होगा. 

Wednesday, May 25, 2016

नयी कोंपलें


कल रात भर माँ अस्पताल में नहीं सोयीं, नन्हा भी उनके सामने कुर्सी पर बैठा रहा. इतनी कम उम्र में इतनी समझ और सेवा का भाव है उसमें. घर आकर भी सो नहीं पा रहा था, जब फोन करके पता किया दादीजी सो गयी हैं, तो ही सोया है. कल जून का गला खराब लग रहा था. पिछले एक महीने से वे दिन में कई बार अस्पताल में आना-जाना कर रहे हैं. उसके बाएं गाल में थोडा दर्द है आखिरी दांत के पास. सभी के मनों में एक प्रश्न है क्या माँ एक बार पुनः स्वस्थ हो पाएंगी. उत्तर अज्ञात है. शुरू-शरू में उन्हें देखने कई लोग आये धीरे-धीरे संख्या कम होती जा रही है. उसकी दो सखियाँ यहाँ हैं नहीं. कल उनमें से एक का जन्मदिन है, वह खुश रहे, स्वस्थ रहे उसके सभी स्वप्न साकार हों यही शुभकामना उसके दिल से हर वक्त निकलती रहे. आत्मस्मृति में रहकर तो प्रेम ही बरसाया जा सकता है. अनंत, अपार प्रेम..वे आत्मा ही तो हैं जिसने अपने पूर्व कर्मों का हिसाब चुकाने के लिए शरीर धारण किया है. इस जन्म में कोई कर्म बंधन का कारण न बने ऐसा प्रयास उन्हें करना है !

 माँ घर आ गई हैं, पहले से बेहतर हैं. कल उनके कमरे के लिए नया टीवी आया है. एयर टेल का नया कनेक्शन भी, जिसमें ‘संस्कार’ शामिल है. आज महीनों बाद पुनः संस्कार पर सद्गुरु को देखा, सुना. मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों पर ध्यान देना होगा ऐसा गुरूजी ने कहा. उसे अपनी भाषा पर ध्यान देना होगा, बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है. नींद पर भी ध्यान देना होगा, स्वप्नावस्था पर भी, जो जगते समय भी जारी रहती है, दिन में भीतर जो विचार चलते हैं वही तो रात्रि को स्वप्न बन जाते हैं, नींद टूटी भी नहीं कि मन स्वप्न में डूब जाता है, बल्कि डूबा ही रहता है. क्रोध, हिंसा, अभिमान तथा लोभ के विचार तथा व्यर्थ के संकल्प भी. जीवन भर जिस सत्य को पाने की आकांक्षा भीतर रही है, वह जैसे भूलती जा रही है. जो वे इकट्ठा कर रहे हैं, वह जीवन के विकास के लिए जरा भी आवश्यक नहीं है. समय और परिस्थितियों के गुलाम बनकर उन्हें जीना है या सत्य को जानने के लिए बने एक अमिट व्यक्तित्त्व बनकर ? भीतर का द्वंद्व जो समाप्त हो गया सा लगता रहा है, आज पुनः इकट्ठा हो गया है. जीवन में कोई सचेतन लक्ष्य न हो तो जीवन एक सूखे पत्ते की तरह हवा के झोंके से इधर-उधर डोलता रहता है, सो पुनः स्वयं को चिन्तन के द्वारा सचेत करना है, सजग होना है.

आज पुनः भीतर लिखने की प्रेरणा हुई है. सद्गुरु की कृपा का बादल भीतर बरसा है और मन की धरती को हरा-भरा कर अंकुआ गया है, भाव उठने लगे हैं, विचारों की कोंपलें लगने लगी हैं, ज्ञान जो सुप्त प्रायः हो गया था, जागृत होने लगा है. जड़ता जो घर करती जा रही थी, अब चेतना में बदल रही है. जीवन कितना सुंदर है, प्रकृति आजकल अपने सुन्दरतम रूप में नजर आ रही है. चारों ओर हरियाली, शीतलता तथा स्वच्छता. पौधे धुले-धुले से नजर आते हैं. मानव कृत गंदगी तो बरसात में बढ़ जाती है पर उस ओर उसकी नजर ही नहीं जाती, आकाश से दृष्टि हटे तब तो धरा पर जाये. ‘गुरू पूर्णिमा’ आने वाली है. आत्मा गुरू का सान्निध्य दिन भर तो कमोबेश रहता है पर रात्रि को निद्रा और स्वप्नावस्था प्रगाढ़ हो गये हैं. स्वप्न में भी यह भान रहे कि वह पृथक है और जो स्वप्न देख रहा है वह मन है, नींद में भी जगे-जगे से रहे, ऐसा अब नहीं होता. खजाना भीतर है ही यदि कोई उसका उपयोग न करे तो दोष किसका है ? 

Tuesday, May 24, 2016

सुखबोधानन्द जी का आगमन


जून आए और उसी शाम माँ को अस्पताल में भर्ती किया गया. आज चौथा दिन है. बारी-बारी से सभी अस्पताल जाते हैं. रात को नन्हा रहता है दादी के साथ. दिन में देर तक पिताजी. आज उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार नजर आ रहा है. कल क्लब में मीटिंग है, उसे दो कार्य करने हैं, पहला मृणाल ज्योति पर छोटा सा भाषण दूसरा हिंदी कविता पाठ का निर्णायक बनना. उसने सोचा वह मासिक डोनर मेम्बर बनने के लिए सदस्याओं से अपील करेगी. दान की महिमा पर भी कुछ कहेगी.  

नये महीने का आरम्भ हुए आठ दिन हो गये, और वह पहली बार लिख रही है. माँ अस्पताल से वापस आयीं पर दो दिन बाद फिर उन्हें जाना पड़ा. अभी तक वहीं पर हैं. टीवी पर एक सिख संत कह रहे हैं जिन्दगी की राह का आरम्भ गर्भ में होता है, मातापिता की वासना के साथ जब जीव की वासना मिल जाती है तब एक जीवन शुरू होता है. जन्म लेने के बाद जो जन्मदिन मनाते हैं वह वास्तविक नहीं है. कोई अपना आदि नहीं जानता. इसी तरह कोई नहीं जानता सृष्टि कब बनी, क्योंकि जब सृष्टि का निर्माण हुआ उसके पूर्व समय था ही नहीं. जो सूक्ष्म से स्थूल बनता है वही स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है. उस सूक्ष्म में प्रवेश करने के लिए सूक्ष्ममति चाहिए. मति स्थूल तब हो जाती है जब हर वक्त संसार के विचार ही मन में घूमते रहते हैं. सत्संग करते करते जब चेतन मन का दायरा बड़ा होने लगता है तब मति सूक्ष्म होने लगती है. जब मति सूक्ष्म हो जाती तब भीतर का ज्ञान प्रकट होता है.

आज शाम को क्लब में सुखबोधानन्द जी का कार्यक्रम है. उनके प्रवचन सीडी से सुने हैं पहले, एकाध बार टीवी पर भी सुना है. किताब पढ़ने का अवसर कभी न कभी मिल जायेगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनके लेख पढ़े हैं पर सामने सुनने का अवसर मिलेगा, अवश्य अच्छा लगेगा. जून एक बार घर आएंगे, नन्हे को अस्पताल व पापा को घर छोड़ देंगे. उनकी नई नैनी काम ठीक कर रही है, उसे आज एक हफ्ता हो गया है, सभी काम जान गयी है. घर जाने की जल्दी नहीं होती उसे, अभी विवाह नहीं हुआ, एक बार इस चक्कर में आ गई तो फटाफट काम खत्म करके भागने की फ़िक्र में रहेगी. पुरानी के साथ किस्मत ने जो किया उसका चले जाना ही ठीक था. पिछले महीने उसके अपाहिज पति का लम्बी बीमारी के बाद देहांत हो गया, दो बच्चे हैं, पांच वर्ष की बेटी दो वर्ष का पुत्र. ससुराल में रहकर ठीक एक महीने का शोक उसने मनाया पर उसके अगले ही दिन पड़ोसी के पुत्र के साथ कहीं चली गयी. बच्चे दादा-दादी के पास हैं. ममता को किस तरह भुला कर उसने यह कदम उठाया होगा. आस-पड़ोस के लोग आश्चर्य कर रहे हैं पर वह जानती रही होगी, उसके बिना भी बच्चे सुरक्षित हैं. रोज-रोज के कलह से तो अच्छा है दूर चले जाना. जीवन कितना विचित्र है, माँ जब ठीक थीं उसके बच्चों के साथ खेलती थीं, बीमार होने के बाद एक दिन कहने लगीं देखना यह चली जाएगी, उस वक्त सबने उनकी बात को मजाक में लिया था. 

Monday, May 23, 2016

द सीक्रेट - रोंडा बर्न की किताब

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मई का महीना आरम्भ हुए दो हफ्ते होने को हैं. आज पहली बार डायरी खोली है. कितना कुछ हुआ, हो रहा है और होने वाला है, भीतर भी और बाहर भी ! परहेज न करने के कारण सर्दी-जुकाम हो गया. सेहत बनाने के चक्कर में एक बार पुनः सेहत का बिगाड़ कर लिया. दो बार मृणाल ज्योति जाना हुआ, उनकी समस्याओं से रूबरू हुई. उन्हें आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है, उनका सेंटर जहाँ पर है वह स्थान बहुत नीची जगह पर है. मैदान बनवाने के लिए अथवा निर्माण कार्य करने से पहले जमीन को मिट्टी से भरवाना पड़ता है, जिसमें बहुत खर्च आता है. उनके पास बच्चों को लाने व छोड़ने के लिए एक वैन है जो पुरानी हो गयी है और उसके रख-रखाव पर काफी खर्चा आ रहा है, कोई बाऊँड्री वाल नहीं है, जिसे बनवाने के लिए फंड चाहिए. बूंद –बूंद से सागर बनता है, अगर वह क्लब में सहायता के लिए अपील करे तो कुछ लोग मदद करने के लिए आगे आ सकते हैं.

संतजन कहते हैं सभी मंजिल पर पहुंच सकें, इसलिए देह रूपी वाहन मिला है, जीवन की लालसा उन्हें इस वाहन में बैठे रहने पर विवश करती है. क्योंकि वे मंजिल तक पहुंच नहीं पाते, मृत्यु से भय लगता है. जिसे मंजिल का पता चल गया वह मृत्यु से नहीं डरता, असली जीवन इस ज्ञान के बाद ही शुरू होता है ! भय मुक्त मन ही अस्तित्त्व के प्रति प्रेम से भर जाता है और ऐसा मन ही परमात्मा के प्रति समर्पित हो सकता है ! लेकिन मानव इस सत्य से अनभिज्ञ रहता है और सारा जीवन गुजार देता है ! मृत्यु उसे डराती है और वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है. अविद्या, अशिक्षा व अज्ञान सबसे बड़े रोग हैं, स्कूली व कालेज की शिक्षा नहीं बल्कि जीवन की शिक्षा ! जो सद्गुरु देते हैं, लेकिन वे सद्गुरु के द्वार तक ही नहीं पहुंच पाते. गुरु परमशान्ति का द्वार है लेकिन उस शांति का अनुभव बिरले ही कर पाते हैं.

पिछले हफ्ते सास-ससुर यहाँ आये तब उन्हें माँ की बीमारी के बारे में ठीक से पता चला. वृद्धावस्था की कारण वह भूलने की बीमारी से ग्रसित हो गयी हैं. उन्हें दिन का, समय का, महीने का कोई बोध नहीं रह गया है. आई थीं, शारीरिक रूप से माँ स्वस्थ हो रही हैं पर मानसिक रूप से अस्वस्थ ही हैं, वृद्धावस्था अपने आप में एक रोग है. वह स्वयं भी तो उसी की ओर कदम बढ़ा रही है, आँखों की शक्ति घट रही है, मन सदा विचारों से भरा रहता है. पिछले कई दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं. जून बाहर गये हैं, अभी तीन दिन और हैं उन्हें लौटने में, समय की कमी नहीं है. कल लाइब्रेरी से दो किताबें लायी. पहली The Secret  दूसरी पुस्तक बराक ओबामा पर है. इस बार कई अच्छी पुस्तकें आई हैं. 

एक दिन और बीत गया, माँ की बीमारी घटती नजर नहीं आती. सम्भवतः उन्हें मतिभ्रम हो गया है. हर बात में शिकायत करना स्वभाव बन गया है, सहन शक्ति बिलकुल खत्म हो गयी है. पिताजी कितने उपाय करके उन्हें समझाते हैं पर कोई असर होता नजर नहीं आता. इस समय रात के साढ़े नौ बजे हैं. परसों दोपहर जून आ रहे हैं, सबके लिए कुछ न कुछ ला रहे हैं.

खट्टी-मीठी इमली


विवाह के लिए सासु माँ देखने आयीं तो माँ को कहकर गयीं, उसे रात को क्रीम लगाकर सोना है, रंग निखर जायेगा. बहुत प्रेम करने वाला पति मिला. दोनों का भरा बदन, दरमयाना कद, सब कहते थे, जोड़ी बहुत अच्छी लगती है. समय का पहिया घूमता गया. परिवार बढ़ा. पहले दो बेटियां, फिर दो पुत्र. सभी पढ़ाई में अच्छे निकले. सास ने अंतिम श्वास ली तो घर जैसे बिना साये के हो गया. ससुर का हाथ अभी सिर पर था. तभी वह दुर्घटना घटी जिसके बाद उसका तन रोगी हो गया. इस बीमारी में भी बड़ी बेटी का विवाह धूमधाम से करवाया. अपने विवाह की रजत जयंती पर घर में जागरण करवाया. रिश्तेदार जो भी मिलने आते, उसकी जिजीविषा देखकर प्रसन्न होते थे. उसके सामने वे दुखी नहीं हो पाते थे. उसकी पीठ पीछे सहानुभूति दिखाते होंगे.

आज जाने क्यों रह-रह कर पुरानी बातें याद आ रही हैं. मृत्यु की घड़ी शायद निकट आ रही है. बचपन में वह ‘क’ को ‘ट’ कहती थी. सभी चचेरे ममेरे भाई-बहन खूब चिढ़ाते थे. उन दिनों इमली उसे बहुत पसंद थी, जेबखर्च के पैसों से खट्टी-मीठी लाल इमली खरीदा करती थी. याद आते ही मुंह में पानी भर आया है. आलू की भुजिया और लाल मिर्च डाल कर बनाया पुलाव उसकी खासियत थी. नया नाम देने वाले बड़े भाई को भी ये वस्तुएँ पसंद थीं. हाई स्कूल में पहली बार वह पास नहीं हो पायी थी. गृह विज्ञान लेकर फिर परीक्षा दी और अच्छे अंकों से पास हुई. काश ! वह बचपन फिर से लौट आता ! आज वे सारी बातें स्वप्नवत् जान पडती हैं. उसके जीवन का सफर खत्म होने को है. यह शमा बुझने को है. परिवार के लिए उसके मन में असीम प्रेम और शुभकामनायें हैं. उसकी इस बीमारी ने उन्हें आपस में एक-दूसरे के नजदीक ला दिया है, सभी उसकी हिम्मत की दाद देते हैं, शायद उनका प्रेम ही है जो उसे इस दर्द में भी मुस्कुराने का साहस दिए जाता है.

इस जन्म में किसी को जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं उन पर तो उसका कोई वश नहीं होता लेकिन समता में रहकर वह भविष्य को तो बेहतर बना ही सकता है. जो भी कोई फोन करके उससे उसकी बीमारी का हाल पूछता था उससे वह हंसते हुए ही बात करती थी, ताकि किसी को दुःख न हो, तथा अगले जन्म के लिए कर्म बंधन न बने. सत्संग में सुना ज्ञान कितना उपयोगी सिद्ध हुआ है. मृत्यु के लिए वह तैयार है और तैयार है नये सफर की शुरुआत के लिए !

नूना ने बहन के लिए लेख लिखा तो मन जैसे हल्का हो गया. जब से उसे समाचार मिला था सिर में दर्द होने लगा था. रात भर सो नहीं सकी, किसी करवट चैन नहीं था. जैसे उसका स्वयं पर वश नहीं रहा था, जैसे किसी ने उसे आविष्ट कर लिया हो. मृत्यु के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्त्व तो रहता है न, शायद वह उससे मिलने आई थी. सुबह भी प्राणायाम आदि कुछ नहीं कर पाई. धीरे-धीरे हालत सामान्य हुई. हो सकता है यह उसका वहम् हो पर यदि ऐसा हुआ भी तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. उसके बचपन की कितनी यादें मन में ताजा हो गयीं. तभी सोचा था एक कहानी लिखेगी उसके जीवन के बारे में. तभी मन में सारी स्मृतियाँ सजीव हो उठी थीं, जैसे कोई अलबम के पन्ने पलट कर उस काल में ले गया हो. जब वह मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही होगी तो उसके मन में भी तो जीवन कौंध गया होगा !  वे सभी एक स्रोत से आये हैं. पंचतत्वों से वे सभी बने हैं. सभी उनके अपने हैं. सभी का भला वे चाहते हैं. उनके जीवन में जो भी घट रहा है, वह उनके ही कर्मों का प्रतिफल है ! शेखसादी ने कहा है वह ज्योतिषी नहीं हैं पर इतना बता सकते हैं कि वह बदबख्त है जो दूसरों की हानि चाहता है क्योंकि वह उसकी ही झोली में पड़ने वाली है. इसीलिए संत कहते हैं – कर नेक अमल और हरि सिमर ! उत्पात न कर, उत्पात न कर ! 

Friday, May 20, 2016

हवनकुंड का प्रकाश


पहले-पहल इस बात का अनुभव हुआ जब विवाह के बाद आर्यसमाज परिवार में नियमित हवन करने लगी, अग्नि के सामने बैठे श्लोक उच्चारण करते-करते मन जब शांत हो जाता तो भीतर एक नये तत्व का जन्म होता हुआ लगता. बचपन में माँ-पिता को बृहस्पतिवार का व्रत करते देखा था, स्वयं भी कितने सोलह शुक्रवार किये, पर उससे कोई विशेष लाभ नहीं हुआ सिवाय स्वादिष्ट भोजन के जो व्रत के बाद मिलता था, लेकिन विवाह के बाद धर्म का वास्तविक रूप समझ में आया. चार बच्चे हुए सभी को अच्छे संस्कार दिए. सदा डाक्टर पति का साथ व सहयोग मिला. जीवन अपनी गति से चल रहा था कि मायके में हुई छोटे भाई की दुखद मृत्यु ने हिला कर रख दिया. भाई की उम्र ही क्या थी, उसका पुत्र अभी मात्र चार वर्ष का हुआ था. माता-पिता भी जवान बेटे की मौत से दुखी थे. उसे दुगना दुःख हुआ, भाई का व माता-पिता का. उसने अपना ध्यान रखना छोड़ दिया, किडनी की समस्या शुरू हो चुकी थी, भीतर ही भीतर वह जड़ पकड़ रही थी पर बाहर के दुःख में उस पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं थी. भाई की मृत्यु का दर्द अभी कम भी नहीं हुआ था कि पिता भी चल बसे. अब वह बिलकुल ही टूट गयी. माँ ने ही उसे हिम्मत बंधाई. माँ का दुःख उसके दुःख से बड़ा था पर वह बड़ी जीवट वाली स्त्री है. वह अपने बड़े पुत्र का परिवार देखकर जीने का अम्बल पा रही थी. वह सच्चाई को स्वीकार रही थी. जीवन अपनी रफ्तार से आगे चलता रहता है, जाने वालों के साथ थम  नहीं जाता.

अस्ताल के इस कमरे में लेटे-लेटे वह स्मृतियों में खो जाती है. कितने हफ्तों से यहाँ आ रही है, यहाँ सभी को पहचानने लगी है. बच्चे, बूढ़े, जवान सभी को यहाँ आते देखा है. मृत्यु को नजदीक से देखा है. एक दिन वह उसका भी द्वार खटखटाएगी, पर तब तो जी ले. मृत्यु से पहले क्या मरना, शरीर में जब तक प्राण हैं तब तक इस सुंदर सृष्टि को रचने वाले परमात्मा की शक्ति का अपमान क्यों करे. वही तो है जो धडकनें चला रहा है, वह जब चाहेगा तब विदा हो जाएगी और खत्म हो जाएगी एक कहानी जो बरसों पहले शुरू हुई थी. माँ की उम्र अभी सोलह भी पार नहीं हुई थी जब उसने बिटिया को जन्म दिया. बालिका माँ ने उसे कैसे पाला होगा, सुना है वह खूब रोती थी, दुबली भी थी. जाने कब देश में बालिका वधु की प्रथा खत्म होगी. माँ गोरी थी, वह सांवली तो बचपन में माँ रगड़-रगड़ कर नहलाती थी, पैर लाल हो जाते थे पर वह उन भाई-बहन को रुलाते हुए भी खूब साबुन मल-मल कर नहलाती. पिता सेना में थे, कभी-कभी आते तो बहुत दुलार करते. कभी वे सब साथ रहते, नये- नये शहरों में पढ़ाई हुई. असम, बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश कई प्रदेशों में बचपन बीता. पढ़ाई के लिए डांट भी खूब पडती थी पर स्नेह भी उतना ही मिलता था. बचपन में तैयार होकर चचेरे भाइयों को राखी बाँधने जाती थी, उनकी कोई बहन नहीं थी, सो पांच भाइयों की वह इकलौती बहन थी. बचपन कब बीता पता भी नहीं चला.    


  

Thursday, May 19, 2016

गुरुद्वारे में अरदास


आज रामनवमी है, सभी को शुभकामनायें भेजीं. टीवी पर ‘गुरुवाणी एजुकेशन’ कार्यक्रम आ रहा है. एक रात स्वप्न में स्वयं को गुरुद्वारे में अरदास सुनते हुए पाया, पिछले किसी जन्म में जरूर वह सिख धर्म से जुड़ी रही होगी. गुरुवाणी दिल की गहराई में किसी तार को झंकृत करती है. पिछले दिनों एक सिख गुरु को सुनने का अवसर भी मिला. कल शाम सत्संग में ध्यान कराया, एक साधक को अच्छा लगा. परमात्मा जो चाहता है वैसा वह कर सके, अहंकार न रहे, यही तो सद्गुरु की शिक्षा है. आज रामदेवजी ने अपनी दीक्षा के पन्द्रहवें साल के उपलक्ष्य में अद्भुत उपहार व संदेश देश को दिया. वेदों की ऋचाएं आस्था भजन के माध्यम से प्रतिदिन सुनने को मिलेंगी तथा भजन भी जब कोई चाहे सुन सकता है.

‘मानस नवमी’ को केंद्र बनाकर मुरारी बापू भीलवाड़ा में कथा कर रहे हैं. ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ परमात्मा और सद्गुरु में पुष्प सुरभि जैसा नाता है. सुरति रूप में जो गुरू है वही प्रकाश रूप में, ज्ञान रूप में परमात्मा है. जब राम वनवास में गये तो भील-किरात आदि को लगा कि उनके घर में नौ प्रकार की निधियाँ आ गयी हैं. नील, शंख, मुकुंद, नंद, खर्व, पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप आदि नौ निधियां तो पुरानी हैं पर उनके घर नई निधियां आई हैं. व्यक्ति के विवेक के प्रकाश को नवीन अर्थ दे वह सद्गुरु है ! विवेक के प्रकाश को अपने जीवन में ढाल ले वही संत है ! विवेक के प्रकाश को नवीन लिपि में ढाल दे वही सद्साहित्य है. सौन्दर्य भी एक निधि है, भावना, निष्ठा, मर्यादा तथा शील में भी एक सौन्दर्य है. शक्ति, आत्मबल, मनोबल, बुद्धिबल जो सेतु बनाये, विभाजित न कर सके, वह भी एक निधि है. करुणा भी एक निधि है, किसी के भीतर प्रेम हो तो मानना चाहिए कि उसके पास एक खजाना है.

उसकी फुफेरी बहन जो कई वर्षों से अस्वस्थ थी, देह के बंधन से मुक्त हो गयी. नूना के मन में स्मृतियों का एक सैलाब उमड़ आया. मन को उनसे मुक्त करने के लिए तथा मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप उसने बहन की तरफ से एक आलेख लिखना शुरू किया.

अस्पताल के इस कमरे की दीवारें, छत तथा पर्दे उसकी सूनी दृष्टि से भली-भांति परिचित हैं, जब डाक्टर या नर्स आती है तो उसकी मुस्कान उन्हें चकित कर जाती है. देह का रंग काला हो गया हो पर मन में अब भी उमंग का अनुभव करती है. पिछले पांच वर्षों से भीषण व्यथा सहने के बावजूद भी जीने की इच्छा खत्म नहीं हुई है. फिर मृत्यु क्या माँगने से आती है, जन्म व मृत्यु एक ऐसा रहस्य है जो बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी नहीं जान सके. देह तो ढांचा मात्र है, भीतर जो आत्मा है वह तो कभी रुग्ण नहीं होती. कभी जर्जर नहीं होती. लोग केवल बाहरी शरीर देखते हैं, नहीं देखते वह भीतर की चेतना जो सदा एक सी रहती है. मन में दुःख होता है जब शरीर में सूइयाँ चुभोई जा रही हों. जब हफ्ते में दो बार रक्त बदला जा रहा हो, उस समय भी कोई है जो इस घटना को देखता रहता है साक्षी भाव से. जो शक्ति प्रदान किये जाता है.  


  

Monday, May 16, 2016

होली की पावन ज्वाला


ध्यान का फल ज्ञान है. कोई जगत में लगाये या परमात्मा में.. संसार में जिसका ज्ञान मिल जाता है, वहाँ से ध्यान हट जाता है क्योंकि ध्यान ज्ञान बन गया है. पदार्थ में जोड़ा ध्यान व्याकुलता को जन्म देता है, क्योंकि जब एक पदार्थ का ज्ञान मिल जाता है, दूसरे को जानने की चाह जग जाती है, पर इतने बड़े जगत में कितना कुछ अनजाना है. अपनी इस व्याकुलता को भूलने के लिए मानव क्या-क्या नहीं करता. वह अपने आप को इतर कामों में लगाकर उस प्रश्न से बचना चाहता है जो उसे व्याकुल कर रहा है. वह जगत को दोनों हाथों से बटोर कर अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है पर वह भी नहीं कर पाता क्योंकि जगत में सभी कुछ नश्वर है, वह तब भी जगता नहीं बल्कि नींद के उपाय किये जाता है. जब तक कोई मांग है तब तक भीतर की स्थिरता को अनुभव नहीं किया जा सकता. संसार भीतर का प्रतिबिम्ब है. परमात्मा सदा रहस्य बना रहता है. वह हर कदम पर आश्चर्य उत्पन्न होने की स्थिति पैदा कर देता है ! परमात्मा में यदि कोई ध्यान लगाये तो वह ज्ञान होने के बाद भी नहीं हटता क्योंकि परमात्मा का ज्ञान कभी पूरा नहीं होता.

आज भी सुंदर वचन सुने. ध्यान बाहर की तरफ जाए तो केंद्र अहंकार है, ध्यान भीतर जाये तो केंद्र निरंकार है. बाहर जाना सरल है, भीतर जाना कठिन है. अहंकार कानून की पकड़ में नहीं आता, केवल गुरु की शरण में आता है और परमात्मा की पकड़ में आता है. अधूरे मन की पहचान है अशांति तथा चिंता, पूर्ण मन की पहचान है पूर्ण से जुड़ना ! हर सुख की अपनी उमर है, आनंद अमर है. तात्कालिक भय तथा असुरक्षा की भावना जब किसी को घेर लेती है तो बुद्धि काम करना बंद कर देती है. उसे लगता है, खतरा है, पर आत्मा को भय हो ही नहीं सकता, वह अभय, निर्भय तथा अजर, अमर है. भय के पीछे मोह है, मोह के पीछे अज्ञान, अज्ञान ही उन्हें बाहर की घटनाओं से प्रभावित करता है, जबकि बाहर की घटनाओं का मन के विचारों से कोई संबंध नहीं है, वे संबंध जोड़ लेते हैं ! पुराने संस्कारों के कारण अथवा प्रारब्ध के कारण भी मन भय जगाता है, जो बीज पहले बोये थे उनके फल आने लगें तो भी मन विचलित होता है. ज्ञान के बिना इनसे मुक्ति का कोई उपाय नहीं.  

कल होली है, रंगों वाली आज होलिका दहन है. पिछले वर्ष भर में जितने भी मन मैले हुए, कटुता जगी, उन सब अशुद्धियों को जलाकर शुद्ध हो जाने का पर्व ! बीती हुई बातों को भुलाकर बिलकुल नये व्यक्ति की तरह जगत का, लोगों का स्वागत करना होली का त्यौहार सिखाता है ! पिछले हफ्ते वह सत्संग में होली की कविता लेकर गयी थी. जैसे खर-पतवार खेत में अपने आप बिना उगाये उग जाते हैं तथा वे फसल को भी खराब करते हैं वैसे ही मन में व्यर्थ के विचार सद्विचारों को भी प्रभावित करते हैं. इस समय टीवी पर रामकथा आ रही है. टीवी के माध्यम से लाखों व्यक्ति उसकी तरह ज्ञान प्राप्त करते हैं. बापू कह रहे हैं केवल स्मरण मात्र से भी समाधि की अवस्था का अनुभव किया जा सकता है. स्मरण उनकी साधना में आई बाधाओं को दूर करता है. पवित्र मन ही जप करता है और जप करने वाला मन ही पवित्र होता है. भीतर टटोलें तो उनके पास कुछ भी नहीं हैं, जो भी है वह परमात्मा का है. संसार की गति का कारण वह परमात्मा है जो गति नहीं करता.

  

   

Friday, May 13, 2016

कली और फूल


भीतर परमात्मा पल रहा है, जिसके अंतर में एक बार भी परमात्मा के लिए प्रेम जगा है मानो उसने उसे धारण कर लिया. अब जब तक परमात्मा बाहर प्रकट नहीं हो सकेगा वह चैन से नहीं बैठ सकता. दुःख इसलिए नहीं है कि कोई परमात्मा से दूर है, वरन् इसलिए कि वह भीतर ही है और वह उसे खिलने नहीं दे पा रहे. कली जो फूल बनना चाहती है पर बन नहीं पाती, कितनी पीड़ा झेलती होगी. वे भी जो अहंकार, मान, मोह, लोभ, और कामनाओं द्वारा दंश खाते हैं, इसलिए कि आनन्द, शांति, प्रेम और सुख जो भीतर ही है पर ढक गया है. लेकिन एक गर्भिणी स्त्री जिस तरह अपने बच्चे की रक्षा करती है वैसे ही उन्हें अपने भीतर उस ज्योति की रक्षा करनी है. एक न एक दिन उसे जन्म देना ही है. उनकी चाल-ढाल, रहन-सहन, खान-पान ऐसा होना चाहिए मानो एक कोमल, निष्पाप शिशु उनके साथ-साथ जगता सोता है. उनकी भाषा उनके विचार ऐसे हों कि उसे चोट न पहुंचे क्योंकि उसका निवास तो मन में है. भीतर जो कभी-कभी असीम शांति का अनुभव होता है वह उसी की कृपा है और वह परमात्मा उन्हें चुपचाप देखा करता है. उनके एक-एक पल की खबर रखता है. वह स्वयं बाहर आना चाहता है, पर उनकी तैयारी ही नहीं है. उसका तेज सह पाने की तैयारी तो होनी ही चाहिए. वह भीतर से पुकार लगाता है, कभी वे सुनते हैं कभी दुनिया के शोरगुल में वह आवाज छुप जाती है.  

जून आजकल कुछ चिंतन में लगे हैं. क्रोध उनके स्वभाव में था, पर अब वह इससे मुक्त होना चाहते हैं. वह अपने मन के विचारों को संयित करना चाहते हैं. वह ध्यान करना सीख रहे हैं. अंततः यही एक मार्ग है. हर संवेदनशील व्यक्ति को एक न एक दिन खुद को पहचानने की यात्रा शुरू करनी होगी. सद्गुरु उन्हें भीतर जाने को कहते हैं. भीतर जाकर ही ज्ञान होता है कि बाहर कुछ भी पकड़ने को नहीं है. दूसरे से सुख मिल सकता है ऐसी कामना ही व्यर्थ है, दूसरे से न कभी कुछ मिला है न मिलेगा. यह जानना ही भीतर के खजाने से परिचय करा देता है. प्रेम ही एकमात्र दौलत है जो उनके पास है. उसे जितना बांटें वह बढ़ता ही जाता है. यह संसार जो पहले कारागार लगता था अब वह सुंदर आश्रय स्थल बन जाता है.

आज उसने सुंदर वचन सुने, तन मिट्टी से बना है, मन ज्योति से बना है. मन को भरना इस संसार से सम्भव नहीं हो सकता. वह विराट चाहता है. अनंत ही उसकी प्यास बुझा सकता है. मन जब मूलरूप को पहचान लेता है, घर लौट आता है तो उसका आचरण, उसका बाहरी दुनिया से सम्पर्क का तौर-तरीका ही बदल जाता है. प्रेम, शांति और अपनापन वह परमात्मा से पाता है, सो बाहर लुटाता है, जितना वह लुटाता है उतना-उतना परमात्मा इसे भरता ही जाता है. स्वयं की पहचान उसे सभी मानवों से जोड़ती है सभी जैसे उसी के भाग हैं, कोई पृथक नहीं, सभी का भला ही उसकी एकमात्र चाह रह जाती है. उसके जीवन में मानो फूल ही फूल खिल जाते हैं !

सद्गुरु कहते हैं, कीचड़ में कमल की सम्भावना है, पैर रहें जमीन पर सिर रहे आकाश में तो उनके भीतर एक सुंदर कमल खिलता है. उन्होंने यदि सद्गुरु के ज्ञान के बीज को अपने हृदय में धारण किया, सींचा और पलना की तो भीतर एक कमल खिलता है ! जागना उनके हाथ में है, प्रेम उनके भीतर है अगर अपनी पीड़ा से अभी तक घबरा नहीं गये तो बात और है लेकिन यदि भीतर का खालीपन खलने लगा है तो खिलने दें कमल को !


पुराने संस्कारों से छुटकारा पाना कितना कठिन होता है, लेकिन भीतर प्रेम जगाना जरा भी कठिन नहीं, प्रेम की बाढ़ भीतर आ जाये तो सारे विकार बह जाते हैं. इस दुनिया में प्रेम की भाषा पढने वाले कोई बिरले ही होते हैं. सच्चा प्रेम हो, जैसे सद्गुरु का.. उसे तो हर कोई पढ़ लेता है. वह तो प्रेम ही हो गये हैं और वे अपने छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति में खोये रहकर थोडा बहुत प्रेम जो भीतर पाते हैं उसे भी बांटने से डरते हैं. वे प्रेम भी करते हैं तो पात्र देखकर, छानबीन करके. वह तो प्रेम नहीं हुआ सौदा हो गया. लेकिन.. उन्हें अपनी आजादी तो कायम रखनी होगी. यह बात दिखाती है कि अभी अहंकार बचा हुआ है. 

दिल का रास्ता


तुम जमाने की राह से आए
वरना सीधा था दिल का रास्ता”

नजरें झुकाईं और नमन हो गया, पलक झपकने से भी कम समय में दिल में बैठे परमात्मा से मुलाकात हो सकती है पर उनकी आदत है लम्बे रास्तों से चलकर आने की. वे किताबें पढ़ते हैं, ध्यान की नई-नई विधियाँ सीखते हैं. पूजा-अर्चना करते हैं और न जाने क्या-क्या करते रहते हैं. परमात्मा उस सारे वक्त उन्हें देखता रहता है, वे उसके सामने से गुजर जाते हैं, बार-बार उसे अनदेखा कर उसी को खोजने का दम भरते हैं. वे प्रेम को छोड़कर ईर्ष्या को चुनते हैं ! प्रशंसा को छोड़ निंदा को चुनते हैं. सहानुभूति को छोड़ क्रोध को चुनते हैं, शांति को छोड़ शोर को चुनते हैं, वे एकांत को छोड़ भीड़ को चुनते हैं, सहजता को छोड़ दिखावे को चुनते हैं ! वह सब करते हैं जो परमात्मा से दूर ले जाता है और उम्मीद करते हैं कि उनका पाठ, जप-तप परमात्मा के निकट ले जायेगा, ये तो ऊपरी वस्तुएं हैं. परमात्मा को जिस मन से पाना है जहाँ उसका आगमन होना है, उस मन में सब नकारात्मक है, ‘नहीं’ है, निषेध है, उसमें स्वार्थ है, नकार है तो वहाँ वह कैस आएगा, जो सबसे बड़ी ‘हाँ’ है, जो है, जो वास्तविक है, सत्य है, प्रेम है, शांति है, आनंद है. उनका चुनाव ही भटकाता है. जीवन हर कदम पर उन्हें निमन्त्रण देता है, झूमने का, गाने का और प्रसन्नता बिखराने का, सहज होकर रहने का, पर वे उसे गंवाने की कसम खा कर बैठे हैं !

पिछले दिनों मन बिखरा-बिखरा सा रहा, अभी नया-नया केन्द्रित हुआ है, थोड़ी सी प्रवृत्ति उसे हिला देती है. मन को पहचानना उसकी आदतों को जानना कितना कठिन है, कभी-कभी लगता है सब कुछ हाथ पर रखे आंवले की भांति  स्पष्ट है पर जब आशा के विपरीत कुछ घट जाता है तो भीतर कैसा द्वंद्व मच जाता है. जब उसके मन की यह हालत है तो जून के मन की क्या होती होगी, वह कल्पना ही कर सकती है. मृणाल ज्योति गयी थी, उन्होंने बच्चों के कुछ फोटो खींचने को कहा, जो उससे नहीं हो सका, सो दुबारा आने की बात कह कर लौट आई, पर दुबारा इतनी जल्दी जाना सम्भव नहीं था. सो मन पर जैसे कोई बोझ था. सेवा का कार्य भी पीड़ा का कारण बन सकता है, आश्चर्य हुआ. जागृति भी हुई कि सेवा का कार्य जब तक आनंद का सुख का कारण बना रहेगा तब तक दुःख की गुंजाइश बनी ही रहेगी. सेवा भी अनासक्त होकर करनी है ऐसे कि उसमें कर्ताभाव ही न रहे. सेवा से अहंकार की पुष्टि होती हो तो न करना ही ठीक होगा. अहंकार न जाने कितने रूपों में भीतर छिपा रहता है. स्वयं को शुद्ध चैतन्य जानना ही शांति का एकमात्र उपाय है. मन तब केन्द्रित रहता है, उसकी धारा एक ओर बहती है, मन अनुशासित रहता है. तमोगुण से मुक्त हुआ मन रजोगुण से भी मुक्त हो रहा है पर सतोगुण की अदृश्य जंजीरें उसे बांधे हुए हैं ! अभी उन्हें भी तोड़ना है कुछ न होना ही साधक का लक्ष्य है, दुःख से पूर्ण मुक्ति तभी सम्भव है. परमात्मा के प्रति प्रेम तो गौण हो जाता है सभी दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.


Wednesday, May 11, 2016

मेले में स्टाल


कल मृणाल ज्योति जाना है. वहाँ एग्जीक्यूटिव मीटिंग है. नये वर्ष से उसने वहाँ नियमित जाना आरम्भ किया है. पूरी जानकारी लेनी है यदि उनके लिए कोई सार्थक काम करना है. एक सखी भी उसके साथ जाने वाली है. पड़ोसिन सखी ने बास्केटबाल का नेट भिजवाया है, शायद वहाँ बच्चों के काम आ सके. जून को उसने मिठाई लाने को कहा है, क्लब की सेक्रेटरी को गाड़ी के लिए. एक छोटे से कार्य के लिए कितने लोगों का सहयोग चाहिए होता है. यह संसार एक संयुक्त इकाई की तरह कार्य करता है. यह माया नहीं है, क्षण भंगुर अवश्य है. इसका उपयोग अपने विकास के लिए करना ही उनका उद्देश्य होना चाहिए. वे इसमें फंसे नहीं, इससे कुछ पाने की आशा भी न करें. लोभ मिटाना है, मोह, मान, क्रोध और स्वार्थ के फंदों को काटना है. तभी वे अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकेंगे. यह जगत एक विद्यालय है, यहाँ उन्हें अपनी शक्तियों का विकास करना है. यहाँ पर एक चौराहा उन्हें हर कदम पर मिलता है, वे चाहें तो नीचे गिरें, चाहें तो ऊपर जाएँ, चाहें तो दाएँ या बाएँ जाएँ. इस दुनिया में वे क्यों आये हैं यह स्पष्ट हो जाये तो वे उस पथ पर चल सकते हैं जो उन्हें लक्ष्य की ओर ले जाये. मानव के भीतर अपार सम्भावनाएं हैं, वह देवता भी हो सकता है और यदि सोया रहे तो पशु भी हो सकता है. उसे सद्गुरु का ज्ञान मिला है, उसका उपयोग करते हुए अपने भीतर को शुद्धतम करते जाना है. शुद्ध मन ही खाली मन है, वहीँ फिर ईश्वर अपनी शक्तियों को भरने का काम शुरू करता है !
आज सुबह आचार्य रामदेव जी का ओजस्वी वक्तृत्व सुना, भीतर जोश भर गया है. शब्दों में ताकत होती है. तेजस्वी विचार उन्हें तेज से भर देते हैं. भीतर जो शक्ति ध्यान से जगी है, उसका उपयोग करने का अब वक्त आ गया है. व्यक्तिगत साधना से साधक पहले आत्मा फिर परमात्मा को पहचानता है. इस जगत की वास्तविकता का जब ज्ञान होता है तो पता चलता है यह सारा जगत एक ही सत्ता का विस्तार है. हरेक के भीतर उसी की ज्योति है, उसी का प्रकाश है. वे उससे पृथक नहीं हैं, वे किसी से भी पृथक नहीं हैं, एक ही सत्ता भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई दे रही है. वही सत्ता उसकी छात्रा के रूप में अपनी अज्ञता को दिखा रही है, वही सत्ता रामदेव जी के रूप में अपनी विद्वता दिखा रही है ! और वही सत्ता वह है ! सद्गुरु के रूप में वही सत्ता अपने पूरे ऐश्वर्य के साथ प्रकट हुई है. इतना ज्ञान जिसे हो जाये उसे न मृत्यु का डर रहता है न अपमान का, न मान की चिंता रहती है न अन्य कोई लोभ ! ऐसा व्यक्ति तो जीवन मुक्त हो जाता है. उन सभी के भीतर इसकी सम्भावना है, वे सभी बुद्ध हो सकते हैं, उन सभी के भीतर अकूत शक्ति है पर उन्हें इसका पता ही नहीं है. एक असीम खजाना उनके भीतर है पर वे भिखारी की तरह व्यवहार करते हैं. वे चाहें तो सारे ब्रह्मांड को अपने इशारे पर चला सकते हैं, जब वे उस सत्ता के साथ स्वयं को जोड़ लेते हैं. जब उसके हाथों में स्वयं को सौंप देते हैं, तब वह उनके द्वारा काम लेने लगता है. वे अपने भीतर की शक्तियों को सुलाए रखते हैं, शेर के वंशज होकर गीदड़ की भांति व्यवहार करते हैं, अमृत पुत्र हैं पर मरने से डरते हैं, जब बाबा जैसे लोग जगाते हैं तब उन्हें चेत होता है !
अगले हफ्ते fete है, उन्हें भी एक स्टाल लगाना है. एक मेज पर किताबें, कैसेट्स, सीडी और दूसरे पर खाने का सामान. अभी तक कुछ तैयारी नहीं की है, समय आने पर अर्थात दो-तीन दिन पहले ही शुरू कर देनी होगी.   


गॉस्पेल ऑफ़ बुद्धा


नये वर्ष में वह पहली बार लाइब्रेरी गयी थी कल. Gospel of Buddha लायी है. बुद्ध कहते हैं आत्मा नहीं है, कोई ऐसी शाश्वत सत्ता भीतर नहीं है. मन है, विचार हैं, भावनाएं हैं ये सब प्रतिपल बदल रहे हैं, एक नदी के प्रवाह की तरह, लेकिन इस प्रवाह को कौन देखता है ? मन क्या स्वयं को देख पाने में सक्षम है, विचारों से परे जो देह व मन को देखता है वह क्या है ? उसे मन कहें या आत्मा क्या फर्क पड़ता है, शब्दों के पार जहाँ केवल शून्य है, कैसी शांति है, जहाँ नाद है, संगीत की लहरियां हैं. जहाँ न जीने की चाह है न मरने की परवाह है. जब कोई विराट शून्य में खड़ा हो जाता है तो दृष्टि अपने पर लौटती है.

आज क्लब की मीटिंग में उसे ‘मृणाल ज्योति’ पर बोलना है. यह बाधाग्रस्त बच्चों के पुनर्वास के लिए समर्पित एक संस्था है जो १९९९ में मात्र दो बच्चों को लेकर शुरू की गयी थी. ऐसे बच्चे जो पूर्ण समर्थ नहीं हैं, मंदबुद्धि हैं अथवा सुनने में अक्षम हैं. उनकी देखभाल शिक्षा तथा उनके इलाज के लिए मृणाल ज्योति जैसे संस्थाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वह हिंदी में अपने विचार सुचारू रूप से रख सकती है. सभी महिलाएं उस जैसी ही तो होंगी प्रेम से भरी, किन्तु थोड़ी सी नर्वस. उनमें आत्मविश्वास की कमी का कारण है आत्मा की कमी. आत्मा जितनी जितनी प्रखर होती जाएगी अर्थात स्वार्थ जितना-जितना कम होता जायेगा या अहंकार जितना-जितना शून्य होता जायेगा, आत्मा उतनी-उतनी उजागर होती जाएगी. उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि वे स्वयं को कभी खो ही नहीं सकते और पाने के लिए सब कुछ है क्योंकि आत्मा अनंत है जितना पा लें प्यास बढ़ती ही जाती है.


आज सुबह एक फोन आया. ध्यान में थी सो घंटी जैसे कहीं दूर बजती रही पर उठाने का मन नहीं हुआ. मन धीरे-धीरे उपराम होता जा रहा है, मरता जा रहा है. भीतर प्रकाश बढ़ता जा रहा है. लक्ष्य कुछ-कुछ दीखने लगा है. हर सुबह सद्गुरु से एक सूत्र मिलता है. कितना सुंदर, सरल और सीधा है उनका जीवन, इसकी पवित्रता देखकर आँखों में जल भर आता है, इतना निर्दोष और इतना पावन है उनका सहज स्वभाव. कितना पूर्ण और कितना तृप्ति से भरा है उनका खाली मन, ऐसा मन जो माँगता नहीं, चाहता नहीं, देने की भी चाह नहीं, कुछ करने की भी चाह नहीं. सहज जो होता रहे वही  पर्याप्त है ! करने वाला यदि बचा रहे, देने वाला और देखने वाला जब तक बचा रहे, तब तक भीतर कुछ न कुछ उथल-पुथल मची रहती है. अब कोई है नहीं भीतर, मौन है, सन्नाटा है, जो है बस है, होना नहीं है. कल सुबह एक परिचिता के पास गयी थी उसके इक्कीस वर्ष के भतीजे ने आत्मघात कर कर लिया. उसने प्रार्थना की, उसकी आत्मा को शांति का अनुभव हो वह सही मार्ग पा जाये ! 

Tuesday, May 10, 2016

वाणी का वरदान


संत कहते हैं, पत्थर, वनस्पति, पशुओं की दुनिया को पार कर वे मानव बने हैं. मानव के पास मन है, वाणी है ! वाणी से ही मनुष्य की पहचान होती है. परमात्मा भी शब्द के माध्यम से प्रकट हुआ है. इस शब्द को जब कोई भीतर सुनता है तो मानो परमात्मा के द्वार पर ही पहुंच गया है. संगीतमयी वह धुन अनवरत भीतर गूँज रही है. बाहर का संगीत भी भीतर से ही उपजा है. भीतर अमृत के झरने बह रहे हैं. मनुष्य का जन्म इसी को सुनने के लिए हुआ है. मनुष्य परमात्मा से ही जन्मता है, उसमें ही जीता है व विलीन होता है, लेकिन वह जानता नहीं. वह सोचता है जैसे सांसारिक वस्तुएं बाहर से मिली हैं वैसे ही परमात्मा भी बाहर कहीं मिलेगा. हर मानव एक खजाना अपने भीतर छुपाये है. अभी वह सोया है, स्वप्न में भिखारी हो गया है ! अभी मन का एक हिस्सा जगा है नौ भाग सोया है. जागा हुआ एक भाग हार जाता है नौ भाग जीत जाते हैं. जप करके अपने मन को जगाया जा सकता है. मानव का मन विकसित हुआ है तभी विज्ञान इतना आगे बढ़ा है किन्तु उसका अचेतन मन अभी भी पाशविक वृत्तियों का शिकार बना है. भक्त अपने मन के भीतर परमात्मा को प्रकट करता है. अनगढ़ा मन भगवान नहीं है, जैसे-जैसे मन जगता जायेगा परमात्मा प्रकट होता जायेगा ! जैसे एक संगतराश अनगढ़ पत्थर में से एक सुंदर मूर्ति को गढ़ता है वैसे ही भक्त या साधक अपने मन में से एक प्रकाशपूर्ण ज्योतिस्वरूप परमात्मा को गढ़ता है. मन को मथ कर वह अमृत कुम्भ प्रकट करता है.

शरीर का सुख प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने करने पर निर्भर करता है पर मन की शांति बाहरी पदार्थों पर निर्भर नहीं कर सकती ! मन तो तभी आनंदित होता है जब वह स्वयं को परमात्मा के अनुकूल बना लेता है, अर्थात अपने स्वभाव में टिकता है. निज स्वभाव में रहना मानो धर्म को धारण करना है. मन ही जीवन का आधार है, मन के स्वास्थ्य पर ही तन का स्वास्थ्य टिका है. मन की पवित्रता पर ही आत्मा की सबलता निर्भर करती है. मन यदि शांत है तो कर्म भी पुण्यशाली होंगे, स्थिर है तो संबंध भी दृढ़ होंगे, समता में है तो उसकी शक्तियों का उपयोग जगत के लाभ के लिए होगा और परमात्मा को उसके माध्यम से प्रकट होने का अवसर मिलेगा. परमात्मा को उन हाथों की तलाश है जो उसका काम करें, उन पावों की तलाश है जो उसके पाँव बनें !


आज मौसम बहुत ठंडा है, परमात्मा का जहाँ वास हो वह स्थान बहुत मनोरम हो जाता है. टीवी पर राम कथा आ रही है, कई बार सुनी है पर हर बार नई लगती है. वह रसपूर्ण परमात्मा भी तो नित नूतन रस बरसाता है. वह अनंत है, अपार है ! जिस दिन कोई आँख उठाकर परमात्मा को देखता है तो अपने को ही देखना होता है. बुद्धि जब थक कर चुप हो जाती है तो भीतर की शांति प्रकट होती है. एकांत में उसके पास एक गहन शांति के अलावा कोई दूसरा नहीं होता, भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाती है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो शांति कहीं छिप जाती है. परमात्मा एकछत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई अन्य नहीं रह सकता. ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समायें’   

Monday, May 2, 2016

योग गुरू बाबा रामदेव


परसों शाम जून ने कहा कि उनके जीवन का लक्ष्य है मन को विचारों से मुक्त करना, जगा हुआ व्यक्ति अपने साथ जागरण की खबर लिए चलता है. रामदेव जी को रोज-रोज सुनने का इतना तो असर होना ही था. परमात्मा ने उनके लिए कितना सुंदर आयोजन किया है, नया वर्ष आने में मात्र दो दिन शेष रह गये हैं, एक कविता लिखनी है जो वह सभी को भेजने वाली है. एक परिचिता की बेटी ने पुत्र को जन्म दिया है, उसके लिए भी एक कविता लिखनी है !

आज वर्ष का अंतिम से पूर्व का दिन है, कल दोपहर लिखी कविता कई जगह भेजी, आज भी भेजनी है. नये वर्ष में वे अपने जीवन में कई परिवर्तन करने वाले हैं. वे नियमित लिखकर अपने मानसिक, शारीरिक व आत्मिक स्वास्थ्य का जायजा लेंगे. एक वर्ष में उन्होंने कितनी उन्नति की, क्या-क्या उपयोग किया, क्या दिया, सभी की सूची बनायेंगे. नये वर्ष में हर रविवार को सुबह वे टहलने जायेंगे, बगीचे को और सुंदर बनायेंगे. उनके सारे संकल्प पूर्ण हों, केवल संकल्प मात्र न रह जाएँ इसका भी पूरा ध्यान रखेंगे. वह एक नई किताब भी लिखेगी तथा यहाँ के स्कूलों की लाइब्रेरी में अपनी किताब भी भिजवायेगी. नये वर्ष में बहुत कुछ नया होगा.


साल का अंतिम दिन ! आज सुबह वे जल्दी उठे, धूप आज भी खिली है, सुबह बदली का आभास हुआ था. कल दोपहर उनके बगीचे में सहभोज का आयोजन है. नये साल का पहला दिन सभी मित्रों के साथ मिलकर मनाया जाये तभी अच्छा है न कि अपने-अपने घरों में बैठकर. आज ध्यान को तीक्ष्ण तलवार बनाकर मन के विचारों का भेदन किया, मन कितना हल्का-हल्का सा लग रहा है. यह तो जादू है, बिलकुल चमत्कार हो जैसे. जून को गुरू का महत्व भी एक दिन समझ में आ ही जायेगा, तब वे दोनों मिलकर वे सब कार्य करेंगे जो सद्गुरू चाहते हैं. आने वाला वर्ष बहुत महत्वपूर्ण होने वाला है. उसे सुंदर भविष्य दिखाई दे रहा है. सेवा, सत्संग, साधना और स्वाध्याय करते हुए अपने जीवन को सुंदर बनाने का भविष्य ! सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क के इन्तहां और भी हैं ! अब जीवन के नये-नये रंग सद्गुरू की कृपा से दिखाई दे रहे हैं जैसे आँखों के आगे से कोई पर्दा हटा दे. वे कूप मंडूक की तरह अपने छोटे से जीवन में ही डोलते रहते हैं, लेकिन जीवन तो अनंत है, असीम है, आत्मा की तरह सुंदर है, शिव है और सत्य है, परमात्मा की तरह ! आने वाले वर्ष की ढेरों बधाई !

Sunday, May 1, 2016

झाऊ के वन


मुहब्बत का दिया मद्धम न होगा
उजालों का परचम कभी खम न होगा
अगर अश्कों से दामन नम न होगा
बिछड़ने का हमें क्या गम न होगा
तेरा जलवा यकीनन कम न होगा
मेरी आँखों में लेकिन दम न होगा

ये शेर उसके दिल की हालत की कितनी सही बयानी करते हैं. उसकी आंख्ने भले सूख गयी थीं पर भीतर तड़प थी, ‘उसका’ जलवा तो पहले सा कायम था, वह तो सृष्टि के अस्तित्त्व में आने से पहले भी था और बाद में भी रहेगा. उनकी आँखों में वह शक्ति नहीं होती कि वे उसे देख सकें. वह तो हर क्षण उन्हें संदेश भेजता रहता है. चौबीसों घंटे वह उसके पास ही रहता है. वह उसकी हाजिरी को नजर अंदाज कर जाती थी. आज सुबह अनोखा अनुभव हुआ, अनुभव होना कठिन नहीं पर उसमें टिकना कठिन है. कभी प्रमाद कभी प्रारब्ध उन्हें भटका देता है. साधक के भीतर प्रेम नदिया की धारा की तरह कभी-कभी गुफाओं में छिप जाता है.

आज क्रिसमस है, यानि बड़ा दिन. ईसामसीह का जन्मदिवस. दुनिया के लगभग सभी हिस्सों में लोग इस त्यौहार को मना रहे हैं. उनका भी मन उल्लास से भरा है. सुबह सभी को sms भेजे, कुछ ने जवाब भी दिए. जून का अवकाश है, वे शाम से थोड़ा पहले दिन रहते लम्बी ड्राइव पर जायेंगे. कल शाम क्लब में विशेष सज्जा की गयी थी. एक सखी के यहाँ विवाह की वर्षगांठ की पार्टी भी थी. आज वे अपने मित्रों, संबंधियों की सूची भी बनाने वाले हैं, जिन्हें नये वर्ष के शुभकामना संदेश व कार्ड्स भेजने वाले हैं. कल वे निकट ही स्थित पक्षी विहार जा रहे हैं. आजकल मौसम बहुत अच्छा है. धूप, नीला आकाश, फूल और सूखी हरी घास ! टीवी पर एक व्यक्ति पानी में बड़े, मोटे सर्प के साथ तैर रहा है, खेल रहा है, वे व्यर्थ ही डरते रहते हैं. डर उनके मन की उपज है. प्रकृति के निकट रहकर ही वे अपने सहज रूप में आ सकते हैं. मनुष्यों के निकट वे बनावटी व्यवहार करते हैं.


आज वे ‘डिब्रू सैखोवा नेशनल पार्क’ देखने गये. सुबह साढ़े आठ बजे वे निकले और साढ़े नौ बजे पहुंच गये. बनश्री नामका छोटा सा रिजोर्ट रंगीन वस्त्र की झंडियों से सजा हुआ था, आर्मी की एक यूनिट ने उसे शाम तक के लिए लिया हुआ था वे हीरक जयंती मना रहे थे, उन्होंने एक नाव किराये पर ली और डिब्रू नदी के नील स्वच्छ जल में निकल पड़े. हवा ठंडी थी और आकाश नीला था. नाविक एक बूढ़ा व्यक्ति था उसका सहायक एक छोटा बच्चा था. वे उन्हें नदी के दूसरे किनारे पर ले गये, जहाँ हरियाली के मध्य में जगह-जगह श्वेत रेत बिछी थी, जो सुबह की रौशनी में चमचमा रही थी. वे चलते रहे और काफी दूर चलने के बाद झाऊ वन आये, जिसे पार करने के बाद पुनः रेतीले स्थान, जिन्हें पार करने के बाद फिर से वन मिले जहाँ नीचे हरी घास उगी थी. वे कुछ देर के लिए वहाँ बैठ गये, साथ लायी लेमन टी, कॉफ़ी बिस्किट और नमकीन खाकर तरोताजा हो गये. गायों का एक झुण्ड और कुछ भैंसें वहाँ घास चर रही थीं और सफेद बगुले उनके साथी बने साथ साथ चल रहे थे. विशाल नीले गगन के नीचे और कोई मनुष्य उस समय वहाँ नहीं था. उन्होंने विभिन्न प्रकार के पक्षियों को भी आते व जाते समय देखा. वापसी में तिनसुकिया में दोपहर का भोजन करके वे तीन बजे घर लौट आये.