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Wednesday, May 26, 2021

पिरामिड वैली

 

नव वर्ष का नौवां दिन भी बीत गया। अभी तक  लेखन कार्य आरंभ नहीं हुआ है। भगवान बुद्ध की पुस्तक पढ़ने में ही सारा समय चला जाता है। वह ध्यान पर बहुत जोर देते हैं और शील के पालन पर भी। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अलोभ और अक्रोध पर, साथ ही प्रज्ञा पर भी। अनुभव करके स्वयं जानने को कहते हैं न कि किसी की बात पर भरोसा करके ! जगत परिवर्तनशील है, सब कुछ नश्वर है, वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है और संबंधों के पीछे भी, भीतर की शांति और आनंद को यदि स्थिर रखना है तो अपने भीतर ही उसका अथाह स्रोत खोजना होगा। शांति और आनंद से मन को भरकर ही करुणा के पुष्प खिलाए जा सकते हैं ! किसीके पास यदि स्वयं ही प्रेम नहीं है तो वे किसी अन्य को दे कैसे सकते हैं ! पहले मन को सभी इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से ऊपर ले जाकर खाली करना होगा। यशेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेष्णा और जीवेषणा से ऊपर उठकर भीतर के आनंद को पहले स्वयं अनुभव करना होगा फिर उसे बाहर वितरित करना होगा। जगत में कितना दुख है, दुख का कारण अज्ञान है, अज्ञान को दूर करने का उपाय ध्यान है, ध्यान से ही दुख और शोक के पार जाया जा सकता है। अहंकार को मिटाकर ही कोई इस पथ का यात्री बनता है । धरती, पवन, अनल और जल की तरह धैर्यवान, सहनशील, परोपकारी और पावन बनकर ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों के जीवन को सुख की राह पर ला दिया था। उसे भी उसी पथ का राही बनना है। 


आज शाम आश्रम में गुरूजी को सुना, उन्होंने पहले कन्नड़ में बोला फिर अंग्रेजी व हिंदी में। उनके जवाब कितने सटीक होते हैंऔर कितने मजेदार भी, सभी को संतुष्ट करने वाले ! खुले प्रांगण में था कार्यक्रम, हजारों लोग रहे होंगे, जिन्हें गुरुजी के सान्निध्य ने आनंदित किया। । पहले भजनों का दौर चला फिर प्रश्नोत्तर का। अष्टावक्र गीता का एक श्लोक पढ़ा गया, जिसकी व्याख्या की गुरुजी ने। उन्होंने कहा, जब तक अहंकार है तब तक ही झिझक होती है, जब अहंकार नहीं रहता साधक बालवत बन जाता है। आराम बहुत हो गया, उसे अब ब्लॉग पर लिखना आरंभ करना ही होगा, भीतर से कोई बार-बार कह रहा है। नाश्ते के बाद का समय इसी काम के लिए रखा जा सकता है और दोपहर को भोजन के बाद के विश्राम के बाद का समय भी।  यदि जरूरत पड़ी तो समय और भी निकाला जा सकता है। जीवन जैसे दौड़ता ही जा रहा है, समय जो बीत गया वापस नहीं आता ! दोपहर को निकट स्थित खेत से वे सब्जी लाए व चीकू भी जिसे यहाँ सपोटा कहते हैं और बहुतायत में होता है। कल नन्हा व सोनू आए थे, व भांजा भी, वे सब पिरामिड वैली गए थे, जो बहुत सुंदर स्थान है। हरियाली और छोटी पहाड़ियों से घिरा यह विशाल स्थान सुकून से भर देने वाला है।यहाँ  दुनिया का सबसे बड़ा और दस मंजिल इमारत जितना ऊँचा पिरामिड नुमा ध्यान कक्ष है। जब वे कक्ष में पहुँचे तो कुछ लोग वहाँ पहले से ही बैठे थे, पर इतनी गहन शांति थी कि आपनी श्वास की आवाज भी सुनाई दे रही थी। कुछ देर सब उसी मौन में रहे फिर बाहर आकर फूलों के सुंदर बगीचों में।  यहाँ पर दूर-दूर से आकर लोग रहते हैं व ध्यान शिविरों में भाग लेते हैं। कल बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर एक कविता लिखी। 


आज भी वे आश्रम गए थे,आश्रम का वातावरण बहुत आनंददायक होता है। सफलता की परिभाषा बताते हुए गुरुजी ने कहा, जो व्यक्ति हर स्थिति में अपने मन की समता को बनाए रख सकता है वही सफल है।उन्होंने आज ध्यान भी कराया। कर्ताभाव जब खो जाता है तब ही ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो अप्रयास घटता है। जब भीतर कोई इच्छा नहीं रहती तब ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो सहज अवस्था का अनुभव कराए। जब न राग रहे न द्वेष, न कोई अपना न पराया, न भूत का पश्चाताप न भविष्य की आकांक्षा, तब ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो मुक्ति का स्वाद देता है, जो शांति प्रदाता है। आर्जव, क्षमा, दया, संतोष और सत्य जब जीवन में घुलमिल जाते हैं तब ध्यान घटता है।  मुक्ति की चाह ही व्यक्ति को परमात्मा से मिलने की चाह की ओर ले जाती है। बंधन मन को दुख के सिवाय कुछ नहीं देता, आदतों का बंधन, कर्म का बंधन, अहंकार का बंधन, इच्छाओं का बंधन, अहंकार का बंधन, घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, संदेह तथा दंभ जैसे विकारों का बंधन ! मानव के मन को कितनी बेड़ियों ने जकड़ रखा है, जो उसे दुख देती हैं पर सुख का भुलावा भी देती हैं। उसके पास आत्मा का अनंत सुख तो है नहीं, सो उसी छोटे से सुख से काम चलाना चाहता है, यह भुलाकर कि बड़ा सा दुख भी पीछे खड़ा है। स्वर्ग के लोभ में लोग नरक को चुन लेते हैं। फूलों के साथ काँटे भी मिल जाते हैं, मित्र ही शत्रु बन जाते हैं एक दिन और देह माटी बन जाती है। मृत्यु के द्वार से कोई नहीं बचता, एक दिन तो सभी को यहाँ से चले ही जाना है ! जहाँ जाना है वहाँ रहना जो सीख लेता है वह ध्यान में ही है ! आज आश्रम में रहने वाले  हाथी को भी देखा, सजा -सजाया हाथी बहुत अच्छा लग रहा था। मस्तक पर तिलक था, गले में घुंघरू थे और माला भी। कई बार गुरूजी उसे अपने हाथों से उसका आहार खिलाते हैं। वे आश्रम के मानव संसाधन विभाग की अध्यक्ष से भी मिले, अपनी रुचि बताते हुए एक ईमेल लिखने को कहा है। आश्रम के कैफे में पुस्तकों के रैक  को साफ करके किताबें ठीक से लगाईं, ऐसा ही लगा जैसे अपने घर को ही सहेज रहे हैं। आश्रम उनके घर जैसा ही है और आगे बनने भी वाला है, जब वे यहाँ नियमित काम करना शुरू कर देंगे। आज असमिया सखी का फोन आया वे लोग इसी माह आएंगे।


Tuesday, May 18, 2021

ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स

नए वर्ष में पहली बार डायरी खोली है। मन में एक गहरी शांति है और कुछ भी लिखने जैसा नहीं लग रहा है। ‘कविता’ भी कई दिनों से नहीं लिखी। बुद्ध के बारे में दोपहर को पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ‘ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स’ में गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है. इसमें बुद्धि के जीवन के अस्सी वर्षों को गांव के एक भैंस चराने वाले लड़के स्वस्ति, जो बाद में उनका शिष्य बन जाता है, के माध्यम से और आंशिक रूप से स्वयं बुद्ध के माध्यम से दर्शाया गया है. जीवन के कितने गहरे सत्यों का अनुभव बुद्ध ने किया था, बच्चे उनके प्रथम शिष्य थे। बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है, क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं, वे सीधे आत्मा से ही अनुभव करते हैं। बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है; चीजें निरंतर बदल रही हैं। ध्यान की गहराई में जब तन, मन, भावना और विचार सब कुछ स्पष्ट दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता। सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं। इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है। प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है। वर्तमान में टिकना ही जागरण है, वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है। जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है। अतीत जा चुका वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है, इसमें पूरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्तव्य है। ऊर्जा का संरक्षण तब ही संभव है।  


सम्यक वाणी साधक के लिए अति आवश्यक है, उतनी ही जितना सम्यक कर्म, सम्यक विचार और सम्यक ध्यान। भोजन भी साधक को समुचित मात्रा में लेना चाहिए, ऐसा भोजन जो सुपाच्य हो और हल्का हो। आज सुबह का ध्यान अत्यंत प्रभावशाली था, चीजें कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। समझ जैसे  भीतर से स्वत: ही बह रही थी। मानव के भीतर कितनी समझ है और कितनी शांति, एक स्थिरता भरा अनंत आकाश है भीतर ! इसमें टिके रहना ही तो ध्यान है। 


आज भी ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा। कल से प्रारंभ करना है। आर्ट ऑफ लिविंग के एप में गुरुजी की लिखी कई किताबें हैं, वीडियो भी हैं, एक पूरा खजाना है। कल वे आश्रम जाएंगे। गुरुजी एक सप्ताह के लिए आश्रम में रहेंगे। वे स्वयं सेवक का कोर्स भी करने वाले हैं। आज भी दोपहर बाद बुद्ध की पुस्तक पढ़ी, कितनी अच्छी किताब है यह, उल्हास नगर की यात्रा के दौरान मासी के यहाँ यह किताब देखी थी, फिर यहाँ आकर मँगवाई। उसे उनका कृतज्ञ होना चाहिए। बुद्ध कहते हैं सभी कुछ आपस में जुड़ा है और नश्वर है। चीजें जैसी हैं वैसी ही उन्हें देखना आ जाए तो कहीं कोई तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, नकारात्मकता नहीं टिक सकती। स्वयं में टिककर ही वे आत्मा की शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं। जो मुक्ति का वरण करता है उसे संसार का आकर्षण नहीं लुभाता। वह तट पर बैठे व्यक्ति की भांति लहरों का आना जाना देखता रहता है और स्वयं में तृप्त रहता है. 


आज गुरूजी को देखा, सुना. वर्षों पहले उन्हें टीवी में नियम से सुनती थी. कैसा सौभाग्य है कि उनके आश्रम में उनको सुनने का अवसर मिल रहा है. वह सरल शब्दों में सभी प्रश्नों के कितने सुंदर उत्तर देते हैं. सत्य में प्रतिष्ठित व्यक्ति कैसा होता है और सिद्ध कौन होता है, आत्म अनुभव कैसा होता है, ऐसे और इसी तरह के प्रश्नों के उत्तर कितनी सहजता से वह दे रहे थे. हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओँ पर उनकी गहरी पकड़ है और परमात्मा से अभिन्न हैं वह ! आज बुद्ध की किताब आगे पढ़ी, मैत्री और करुणा का कितना सुंदर वर्णन किया है और प्रेम का भी, हृदय कितनी गहरी विश्रांति का अनुभव कर रहा है. संसार के हर जीव के प्रति प्रेम का भाव मन में उदित हो रहा है, सभी तो अपने ही हैं, एक ही हैं, शाम को एक पुरानी सखी का फोन आया, कितना आश्चर्य है कि दोपहर को उसका स्मरण हो आया था और अंतर में प्रेम था. जून के प्रति भी भीतर कितना स्नेह प्रकटा था, उनका स्वभाव बहुत अच्छा है, शाम से उनका व्यवहार भी कितना प्रेमिल लग रहा है. गुरूजी की बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है कि सभी एक ही चेतना से बने हैं ! कल विवाह की सालगिरह है , उससे भी पूर्व से वे एक-दूसरे से परिचित हैं, यानि साथ पुराना है.  


भगवान बुद्ध ने बच्चों को भी ध्यान सिखाया था. उनकी शिक्षा और समझ कितनी लाभप्रद है और कितनी गहरी. वे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझाते हैं, जीवन की नश्वरता और जगत के मिथ्या होने को भी, जैसे गुरूजी कहते हैं, अब तक का उनका जीवन एक स्वप्न से ज्यादा क्या है ? इतने वर्ष बीत गए कुछ वर्ष और हैं, यह देह एक दिन नष्ट हो जाएगी, उनके पहले कितने लोग चले गए, अब उनकी कोई खबर नहीं, वे भी एक दिन हवा हो जायेंगे तो क्यों न इसी क्षण स्वयं के कुछ न होने को स्वीकार कर लें. जीवन एक खेल से ज्यादा क्या है, कृष्ण की लीला या राम की लीला ... आज वे आश्रम गए थे. एच आर विभाग आज भी बन्द था, परसों भी देर हो जाने से कोई नहीं मिला था. कल जून के एक पुराने मित्र परिवार सहित आये, अपने साथ सुंदर सफेद बेला और लाल गुलाब के फूलों की मालाएं लेकर आये थे, एक-दूसरे को पहनने को कहा, तस्वीरें भी खींचीं. शाम को नन्हा व सोनू आये, गुलदाउदी के फूलों का एक गुलदस्ता, खजूर व मिठाई लाये.  लेखन कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है, जो पुस्तक पढ़ रही है, उसके खत्म होने पर ही लिखना हो पायेगा. 

 

Tuesday, December 3, 2019

हरसिंगार के फूल


दोपहर के तीन बजे हैं. आज का दिन भी वर्षा से आरम्भ हुआ, प्रातः भ्रमण के बाद जैसे ही घर पहुँची, बूँदें पड़ने लगीं, पर दिन चढ़ते-चढ़ते धूप निकल आयी. आज धारावाहिक का अंतिम भाग भी देख लिया. बुद्ध के अनोखे जीवन की गाथा पढ़ -सुनकर कौन प्रभावित नहीं होगा. वे अपार आशावादी थे जबकि कुछ लोग उन्हें दुखवादी कहते हैं. वह मानव को उसके मूल स्वरूप का अनुभव करना चाहते थे. वह उन्हें मानसिक रोगों के चक्र से बाहर निकलना चाहते थे. बुद्ध कहते हैं हर दिन को कृतज्ञ होकर जिन चाहिए. कोई न कोई सत्कर्म करना चाहिए. परमात्मा ने जो ज्ञान, प्रेम और शक्ति मानव को दी है, उसका वितरण करना चाहिए. भीतर के आनंद को जो स्वयं में पा लेता है, वह अन्यों को भी उसे पाने का मार्ग बता सकता है. बुद्ध होने की क्षमता हरेक के भीतर है. सदमार्ग पर चलना ही धर्म का पालन करना है, जिसके द्वारा वह बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है. मन की बिखरी हुई शक्तियों को एक्टर करना ही संघ की शरण में जाना है. वे जब अपने केंद्र में स्थित होते हैं तो सारी शक्ति एक पुंज के रूप में प्राप्त होती है, जो किसी कार्य को सजगता पूर्वक करने के लिए अनिवार्य है. आज भी सदगुरू को सुना, कर्म व पुनर्जन्म पर उनकी व्याख्या अत्यंत मनोरम व सरल है. जग की प्रत्येक वस्तु में चार बातें होती हैं, धर्म, प्रेम, कर्म तथा ज्ञान. उनमें भी ये चार बातें हैं, प्रेम से वे घिरे हैं, वह उन्हें चारों ओर से स्पर्श कर रहा है, इसी प्रकार ज्ञान वह अविनाशी सत्ता है जो जानने की क्षमता है. जानना है. हर वस्तु अपने नियत धर्म के अनुसार कर्म करती है, जैसे अग्नि का धर्म है जलाना  और प्रकाश देना. उनके पूर्व कर्मों का फल उन्हें अब मिल रहा है और वर्तमान के कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा. जून कल शाम को अपने गन्तव्य पर पहुँच गए. सोनू का फोन आया, बैंगलोर में एक स्टार्टअप कम्पनी छोटे-छोटे प्लॉट लोगों को सब्जी उगने के लिए दे रहे हैं, जिसमें हर महीने दो हजार रूपये देकर ऑर्गैनिक सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती हैं. उनके माली ही काम करेंगे, बस अपनी पसंद बतानी है और यदि मन हो तो बीच-बीच में जाकर देख सकते हैं कुछ काम भी कर सकते हैं.  महिला क्लब की साहित्यिक प्रतियोगिता होने वाली है, पर सलाहकार होने के नाते क्या उसे उसमें भाग लेना चाहिए, शायद नहीं, शेष लोगों को भी मौका मिलना चाहिए. हिंदी में बेहद कम प्रतियोगी होते हैं, इसलिए हर बार उसे कहा ही जाता है.

सामने हरा-भरा बगीचा है. बोगेनविलिया के फूल शाखाओं पर शीतल हवा में झूम रहे हैं. कुछ देर पहले हवा चलने लगी थी जैसे आंधी आने वाली हो. उत्तर भारत में पिछले दिनों अंधी-तूफान में कारण कितनी हानि हुई. बुद्ध ऐसी आंधी-तूफान में छह वर्षों तक तप करते रहे. अद्भुत थी उनकी आत्मशक्ति ! राजा के पुत्र होकर सन्यासी की भांति बेघर होकर रहना और भिक्षा मांगकर गुजारा करना कितना कठिन रहा होगा. उनके आकर्षण से खिंचे कितने ही युवा उस कल में सन्यासी बन गए. हिंसा का जीवन त्याग दिया. भारत में सैनिकों के प्रति श्रद्धा घट गयी और कालांतर में इसका परिणाम हुआ विदेशी राजाओं का आक्रमण, लेकिन बुद्ध के काल में जो हिंसा व्यर्थ ही होती थी, वह रुक गयी. आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट प्रकाशित की. बुद्ध पूर्णिमा के दिन अंतिम पोस्ट की थी. उनके प्रति श्रद्धा तो थी पर वे इतने महान हैं, इसका अनुभव नहीं किया था. अद्भुत थी उनकी करुणा, उसका हजारवां अंश भी यदि उसमें आ जाये तो जीवन सफल हो जायेगा. ऐसा लगता है जैसे वह कुछ भी नहीं जानती. जीवन और यह सृष्टि अनंत रहस्यों से भरी है, इसे जाना नहीं जा सकता, कोई बुद्ध होकर ही, इसके साथ एक होकर ही इसको थोड़ा-बहुत जान सकता है. सामने गमले में लाल सुर्ख एक गुलाब खिला है, जिस पर उसका ध्यान बरबस चला जाता है. बुद्ध के निर्वाण के समय उन पर फूलों की वर्षा आरम्भ हो गयी थी, जिस वृक्ष के नीचे वे लेटे थे, उसके फूलों का मौसम भी नहीं था तब. वनस्पति में भी जीवन है, चेतना है, ज्ञान है. जिस वर्ष वे इस घर में रहने आये थे, उस पुराने घर में हरसिंगार ने असमय फूल उगाये थे. प्रातःकाल भ्रमण के लिए जाते समय निकलते ही एक काली तितली सम्मुख आ गयी थी. कल सुबह उसे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर जाना है, वहां से किसी स्कूल में, गुरूजी के जन्मदिन पर सेवा कार्य के लिए. आज उनके लिए एक कविता लिखी. एक कविता आस्ट्रेलिया निवासी छोटी भांजी के लिए भी जिसका जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है. उसने बताया वहाँ ठंड पड़नी शुरू हो गयी है, जब भारत में ठिठुरती सर्दियां होती हैं, वहां तेज गर्मी होती है. जून ने उस स्थान की तस्वीरें भेजी हैं, जहाँ वह ठहरे हैं, बहुत सुंदर स्थान है. उन्होंने सुंदर फूलों के चित्र और एक मोर का चित्र भी भेजा है. अगली बार वह अवश्य जाना चाहेगी, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है ! पिताजी से बात करे ऐसा मन हो रहा है, इस वर्ष उनसे मिलना होगा या नहीं, पता नहीं !

आज सुबह हल्की फुहार पड़ रही थी, वातावरण शांत था. सदगुरू को सुना,  चेतना में अपार शक्ति है. देह को स्वस्थ करने का सामर्थ्य भी है. यदि मन टिक हो तो चेतना अपना काम कर सकती है, वरना विचारों का विक्षेप उसे अभिव्यक्त होने से रोकता है. ध्यान मन को स्थिर रखने का, निर्मल रखने का उपाय ही तो है. सुबह वह आर्ट ऑफ़ लिविंग के अन्य सदस्यों के साथ एक स्कूल में गयी, बच्चों से बातें किन, उन्हें योग कराया, कुछ सामान वितरित किया, दो घण्टे वहां बिताकर वे वापस लौटे. जैन धर्म के बारे में कुछ जानकारी हासिल करने के लिए महावीर स्वामी पर एक फिल्म देखी. इस समय रात्रि के सवा नौ बजे हैं मन आज किसी अनोखे लोक में भ्रमण कर रहा है. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अहसास इतना सघन है कि लगता है उसे हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है. भीतर एक मधुर सी झंकार जैसी आवाज सुनाई दे रही है, किसी पंछी की आवाज या चिड़िया की, जाने कहाँ से. शाम को एक घंटा ध्यान किया शायद उसी का परिणाम है, वैसे परम् कार्य-कारण से परे है, अकारण दयालु है ! शाम को नन्हे और जून से बात हुई, वे लोग इस स्थान पर गए थे, जहाँ नन्हे ने बारह क्यारियां किराए पर ली हैं, जहाँ से उन्हें ताज़ी सब्जियां मिला करेंगी. 

Saturday, November 30, 2019

मुक्ति बोध



आज सुबह तेज वर्षा हुई, उसी वर्षा में वे मृणाल ज्योति गए. बच्चों को योग कराया और क्लब की सदस्याओं द्वारा दिया सामान सौंपा. एक अध्यापिका ने कुछ पैसे मांगे थे, वे भी उसे दिए, वर्ष के अंत तक धीरे-धीरे करके लौटा देगी, ऐसा उसने कहा है. पिछले चार दिनों से मन बुद्ध के साथ है. वह बुद्ध के जीवन पर आधारित धारावाहिक देख रही है, जो बुद्ध पूर्णिमा के दिन देखना आरम्भ किया था. उस दिन उनके निर्वाण का दृश्य देखा था. उनके उपदेश हृदय को छू गए थे, फिर जन्म से लेकर उनके बुद्ध बनने तक का संघर्ष देखा. कितने महान थे वे, कितने करुणावान और कितने बड़े तपस्वी किन्तु देवदत्त उन्हें कभी समझ नहीं पाया. उन्हें मरवाने के कितने षड्यन्त्र किये उसने. यशोधरा का त्याग भी अनुपम है, उसने बुद्ध के हृदय को समझ था. स्वयं में स्थित होकर ही कोई सुखों-दुखों के पार जा सकता है. मानव के शुभ कर्म एक दिन मुक्ति पथ पर ले जाते हैं और दुष्कर्म बन्धन की ओर. जिसे बुद्ध निर्वाण कहते हैं उसे ही ऋषि मोक्ष कहते हैं, जहां पूर्ण शांति है, जहां जाकर मन खो जाता है. जो सारे द्वंद्वों से अतीत है. जून आज पाँच दिनों के लिए बाहर गए हैं. अभी कुछ देर बाद नैनी व उसके साथ की महिलाएं आएँगी योग कक्षा के लिए, शाम के योग सत्र को एक घन्टा पहले खिसका दिया है क्योंकि शाम को मीटिंग है, फ्रिज को कल रात से बन्द किया है, भीतर की सारी बर्फ पिघल जाएगी तब वह अपना काम करना शुरू कर देगा. मानव का मन भी कभी कभी नकारात्मकता के कारण जम जाता है, फिर उसे साधना के द्वारा पिघलाया जाता है, पहले सा खुशनुमा हो जाता है, प्रेम की ऊष्मा जो भीतर दबी हुई थी, फिर झलकने लगती है. उसके सर के दाहिने भाग में ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने के कारण तनाव महसूस हो रहा है, विश्राम देने से वह ठीक हो जायेगा. पिछले कई दिनों से नियमित लेखन नहीं हुआ. अब समझ-बुझ कर, जागकर लिखना होगा. इस समय मौसम सुहाना है, भीतर एक सहजता का अनुभव हो रहा है, ध्यान के बाद की सहजता ! भीतर के उस अछूते केंद्र का पता उसे भी मिल गया है, वर्षों पूर्व उसकी झलक मिली थी, पर उसमें हर पल स्थित रहने के लिए सजगता बहुत जरूरी है. 

शाम के साढ़े चार बजे हैं. मन बुद्धमय हो गया है. उनकी मंजुल मूर्ति तथा सुंदर देशना भीतर तक छू जाती है. उनके उपदेश सरल हैं और अनुभव से उपजे हैं. वे सिद्धांत की बात नहीं कहते, व्यावहारिक ज्ञान देते हैं वे कहते हैं, सन्देह अति विकट शत्रु है, वह मानव को पतन की ले जाता है. ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, अग्नि के समान जलाते हैं और अहिंसा व करुणा आनंद को उपजाते हैं. बुद्ध शीलाचरण की बात करते हैं, फिर ध्यान का मन्त्र सिखाते हैं, जिससे विवेक का जन्म होता है, तथा शील का पालन सहज ही होने लगता है. ध्यान की गहराई में जो ज्ञान मिलता है, वही सच्चा ज्ञान है जिसके प्राप्त होने के बाद शील का पालन प्रयास पूर्वक नहीं करना पड़ता, लेकिन आरम्भ में तो पुरुषार्थ करना होगा, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा. शम, दम, तप, सन्तोष व ईश्वर प्राणिधान का पालन भी करना होगा. आज सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, दुःस्वप्न ही कह सकते हैं अथवा तो पूर्व के किये अशुद्ध कर्मों का फल देने वाला स्वप्न ! बुआ जी को देखा, उनका मुख बिलकुल अलग था. उनकी पुत्री का विवाह हो रहा है. वह रसोईघर में है पर शौच का पालन नहीं किया. अतीत के कितने ही विकर्मों का स्मरण हो आया. वह जगी तो भीतर प्रार्थना चल रही थी. उनका अवचेतन मन नींद में भी सक्रिय रहता है. उठकर टहलने गयी, वर्षा के बाद सब कुछ साफ-सुथरा था, मौसम शीतल था. सद्गुरु को सुना जो कह रहे थे, यदि अपने घर वापस लौटना है तो पहले पूरी तरह थक जाओ, जैसे बुद्ध कहते हैं, अपने भीतर सुख के केंद्र को खोजना है तो जीवन में दुःख है इसे अनुभव करना होगा. भीतर जाकर पता चलता है, परम् आनंद व प्रेम का स्रोत भीतर ही है . आज भी बुद्ध के जीवन की गाथा देखी-सुनी. अब कुछ ही अंक रह गए हैं. मगध, कपिलवस्तु, कौशल आदि राज्यों में ही बुद्ध विहार करते थे, पर उनका धर्म पूरे विश्व में फ़ैल गया जैसे सदगुरू का सन्देश पूरे विश्व में अपनाया जा रहा है. इसी महीने उनका जन्मदिन है, उस दिन वे दोपहर को श्रमदान करेंगे  और शाम को गुरुपूजा में सम्मिलित होंगे. जून आज तमिलनाडु जा रहे हैं, वह जो पौधे ले गए थे, नन्हे ने गमलों में लगा दिए हैं. 

Thursday, January 25, 2018

गुरुद्वारे में कड़ाह प्रसाद


आज लेह में उनका अंतिम दिन है. कल रात भी स्वप्न में कितने ही दृश्य दिखे, लद्दाख में देखे स्थानों के भी और अन्य भी. स्वप्न अलग थे पर जगते हुए इन दृश्यों को देखना एक अलग अनुभव है. चेतना जैसे ज्यादा मुखर हो गयी है. प्रकाश भी बहुत तीव्र है यहाँ. तेज धूप निकलती है जो ग्लेशियर्स को पिघला रही है. नहरों-नालों में जल का तेज बहाव शुरू हो गया है, जो खेतों को सींचने में काम आयेगा. यहाँ मुख्यतः वर्ष के तीन-चार महीने ही खेती की जाती है. कल शाम वे लेह पैलेस तथा शांति स्तूप देखने गये. लेह महल बहुत पुराना है, यह नौ मंजिला इमारत सत्रहवीं शतब्दी में राजा सेंग्गे नामग्याल द्वारा बनवायी गयी थी, अब इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया है. इसे बनाने में मुख्यतः लकड़ी का प्रयोग हुआ है. 
शांति स्तूप जापान के सहयोग से एक पहाड़ी पर बना एक अनोखा स्मारक है जिसमें नीचे बुद्ध मन्दिर है तथा ऊपर भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति, तथा निर्वाण के दृश्यों को मूर्तिकला के माध्यम से दर्शाया गया है. यह १९८५ में पूरा हुआ और दलाई लामा के हाथों इसका उद्घाटन हुआ.
आज की यात्रा का मुख्य आकर्षण था मेगनेटिक हिललिकिर  अलची के गोम्पा तथा पत्थर साहेब गुरुद्वारे में दोपहर का लंगर. सुबह नौ बजे नाश्ता करके वे दोरजी की इनोवा में निकले तथा सिंधु व झंस्कर नदी के संगम स्थल पर पहुंचे. दोनों नदियों के जल का रंग भिन्न था यह स्पष्ट दीख रहा था. गर्मी के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और पर्वतों की ढलानों से मिट्टी के साथ पानी तेज गति से बह रहा है, सो मटमैला होने के बावजूद दो रंगों का था. वहाँ रिवर-राफ्टिंग के लिए भी साजो-सामान रखा था. 
मैग्नेटिक हिल पहुंचने पर कार अपने आप ऊंचाई पर चढ़ने लगी, ऐसा प्रतीत हुआ. लिकिर गोम्पा में भावी बुद्ध की विशाल स्वर्ण प्रतिमा है जिसे जापान की सहायता से बनाया गया है. मन्दिर में अद्भुत चित्रकला के माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन के मुख्य पड़ावों जन्म, ज्ञान प्राप्ति, दानवों पर विजय तथा निर्वाण को दर्शाया गया है. उन दस अर्हतों के भी चित्र वहाँ थे जिन्होंने बुद्द्ध की शिक्षाओं को संकलित किया था. 
लेह के पश्चिम में ७० किमी दूर स्थित अल्ची एक हजार वर्ष पुरानी मॉनेस्ट्री है, जहाँ मुख्य द्वार तक पहुंचने का मार्ग घुमावदार, शांत व शीतल है, संकरे मार्ग में दोनों और दुकाने लगी थीं. कई विदेशी यात्री वहाँ दिखे जो इतिहास में काफी रूचि दिखा रहे थे. 
पत्थर साहब गुरुद्वारा भी बहुत भव्य है जो सेना द्वारा संचालित किया जाता है. इसका महत्व इस बात से बढ़ जाता है कि गुरु नानक देव अपनी तिब्बत यात्रा के दौरान यहाँ ठहरे थे. कहा जाता है कि एक दानव के उनके ध्यान को भंग करने के लिए एक चट्टान उनकी तरफ फेंकी पर उन्हें कोई नुकसान पहुंचाए बिना पत्थर की वह चट्टान वहाँ रुक गयी, जिसे आज तक पूजा जाता है. वहाँ उन्होंने कड़ाह प्रसाद तथा भोजन का प्रसाद ग्रहण किया. लेह शहर में स्थित एक स्थल दातुन साहब के बारे में भी एक पुस्तक में पढ़ा था, जहाँ गुरु नानक ने सोलहवीं शताब्दी में एक वृक्ष लगाया था.

इस समय संध्या होने में अभी कुछ समय है. तेज हवा के कारण पेड़ों की टहनियाँ आपस में व टिन के शेड से टकरा रही हैं, जिसके कारण आवाज पैदा हो रही है. धूप सात बजे तक कम होगी तब वे सांध्य भ्रमण के लिए जायेंगे तथा बाद में आज उतारे फोटो देखेंगे. सामान की पैकिंग लगभग हो चुकी है. कल सुबह आठ बजे की उड़ान से उन्हें दिल्ली जाना है और परसों इस वक्त असम में अपने घर में होंगे.                                                                  

Thursday, January 18, 2018

लेह के मठ


शाम के पौने आठ बजे बजे हैं. आज की यात्रा पूर्ण हो चुकी है. सुबह पांच बजे नींद खुल गयी, रात को हवा में ऑक्सीजन की कमी का अहसास हुआ सो एक खिड़की खोल दी थी, बाहर हवा तेज थी, उसकी आवाज आती रही. सुबह उठे तो ठंड बढ़ गयी थी. भाई को प्रातः भ्रमण के लिए तैयार देखकर वे भी उसके साथ टहलने गये, यह गेस्ट हाउस हवाई अड्डे के पीछे स्थित है, काफी साफ-सुथरा है और नया बना है. बाहर निकलते ही चारों ओर सलेटी, मटमैले, काले, धूसर पहाड़ और उनके पीछे बर्फ से ढकी चोटियाँ नजर आती हैं. पर्वतों पर विभिन्न आकृतियों के अंकित होने का भ्रम होता है. एक घंटे के भ्रमण काल में हमने चार उड़ानों को हवाई पट्टी पर उतरते देखा, पहाड़ के पीछे से आता हुआ जहाज जब पलों में आगे आकर एक निश्चित स्थान से नीचे उतरता है तो यह दृश्य दर्शनीय होता है. नहा-धोकर ठीक साढ़े आठ बजे ग्लास हॉउस के रूप में बने भोजन कक्ष में गये, कुक ने तिकोन पराठों के साथ पनीर की भुज्जी बनाई थी. एक लोकल ड्राइवर दोरजी की इको वैन उन्हें साठ किमी दूर ‘हेमिस गोम्पा’ में ले गयी. रास्ता विभिन्न दृश्यों को समेटे था. सरसों के छोटे खेत भी दिखे तथा मनाली रोड पर घने वृक्ष भी. जगह-जगह श्वेत शांति स्तूप बने थे. मॉनेस्ट्री एक विशाल चट्टान पर बनी है तथा छह सौ वर्ष पुरानी है. मुख्य हॉल में बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा है तथा दोनों और बैठने के लिए लकड़ी की बेंच तथा मेजें हैं. कुछ देर वहाँ बैठकर ध्यान भी किया, तभी वहाँ बैठा एक लामा शायद तिब्बती या लद्दाखी भाषा में मंत्रजाप करने लगा, वातावरण और भी प्रभावशाली हो गया. दीवारों पर आकर्षक रंगों में विभिन्न दृश्य अंकित किये गये हैं जिसमें भगवान बुद्ध व देवी तारा के चित्र हैं, अवलोकेश्वर के चित्र भी अंकित हैं. कला यहाँ इतनी सहजता से प्रस्तुत की गयी है कि विस्मयकारी प्रतीत होती है. प्रकृति ने जिस तरह अपना खजाना यहाँ लुटाया है उसी के अनुपात में बौद्ध लामाओं ने मठों को सजाया है. मन्दिर के बाहर जंगली गुलाब की एक झाड़ी थी जो फूलों से लदालद भरी थी. मार्ग में भी ऐसी कई झाड़ियाँ दिखीं. एक श्वेत-श्याम पक्षी भी दिखा जो बाद में पता चला मैगपाई था.                     
हेमिस के बाद वे थिकसे मठ’ देखने गये जो दूर से ही अपनी वास्तुकला के कारण आकर्षित कर रहा था. विशाल चट्टान पर बना छह सौ वर्ष पुराना यह मठ अपने में महान इतिहास व वंश परंपरा छिपाए है. यहाँ बुद्ध की विशाल प्रतिमा है जो पद्मासन में बैठे हैं तथा दोनों हाथों को विशेष ढंग से बनाया गया है. मन्दिर के कक्ष में प्रवेश करते ही कमल की पंखुड़ियों के आकार में उनकी सुन्दर अँगुलियों के दर्शन होते हैं, फिर ऊपर देखें तो चेहरा और नीचे देखने पर पैर नजर आते हैं. एक लामा सामने बैठकर एक बड़े वाद्य से लयबद्ध ध्वनि निकाल रहा था. कुछ देर हम वहाँ रुके फिर नीचे उतरकर संग्रहालय में गये. स्मृति चिह्नों की दुकान से कुछ खरीदारी की.
इसके बाद शे पैलेस’ देखने गये. वहाँ काफी चढ़ाई थी. लद्दाख का राज परिवार पहले यहाँ रहा करता था. यहाँ भी एक सुंदर बुद्ध मन्दिर है. बुद्ध की प्रतिमा इतनी ही विशाल थी पर उसे सुंदर वस्त्रों से ढका हुआ था. सभी बौद्ध मठों में रंगीन रेशमी वस्त्रों का बहुत उपयोग होता है. रंगों से इन्हें बहुत प्रेम है, यहाँ के पहाड़ बेरंग हैं शायद इसीलिए.
सिन्धु नदी के घाट’ पर पहुंच कर मन इतिहास की कई घटनाओं का स्मरण करने लगा. इसी नदी के कारण इस देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा और यहाँ के निवासी हिन्दू कहलाये. इसे पार कर कितने ही आक्रमणकारी भारत आये. नदी का बहाव तेज था तथा पानी ठंडा. जल का हाथ से स्पर्श किया उसमें उतरने का सवाल ही नहीं था. सिन्धु घाट दर्शन स्थल पर हर वर्ष उत्सव का आयोजन होता है. दलाई लामा या अन्य कोई लामा आते हैं तो यहीं पर उनका कार्यक्रम व उत्सव भी होता है.
वे गेस्ट हॉउस पहुंचे तो सवा दो बजे थे. भोजन कर कुछ देर आराम किया. शाम को पांच बजे चाय पीकर पुनः ड्राइवर को बुलाया. दोरजी शांत स्वभाव का लद्धाखी ड्राइवर है. यहाँ के लोग बौद्ध धर्म को मानने के कारण काफी शांत व प्रसन्न नजर आते हैं, वे मिलन सार हैं, एक जगह एक वृद्ध महिला के साथ, दूसरी जगह एक बच्चे के साथ तथा स्कूल में एक गाइड लड़की के साथ तस्वीर ली, सभी ने ख़ुशी-ख़ुशी हामी भरी. शाम को वे स्पितुक मठ देखने गये उसी के ऊपर काली माँ का मन्दिर था. काफी सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर पहुंचे तो मठ बंद मिला, मन्दिर तक जाने के लिए पुनः चढ़ाई करनी थी, पर मन्दिर का शीतल, शांत वातावरण देखते ही सारी थकान पल भर में ही दूर हो गयी. सभी मूर्तियों के चेहरे रेशमी वस्त्रों से ढके थे पर जितने भी भाग दिखाई दे रहे थे. आश्चर्य जनक थे. काली माँ का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था. यमराज और भैरवी की मूर्तियां भी वहाँ थीं.
मन्दिर से उतरकर वे हॉल ऑफ़ फेम’ देखने गये जो सेना द्वारा बनाया गया एक आधुनिक संग्रहालय है. यहाँ विभिन्न युद्धों में भाग लेने वाले सेना के जवानों के चित्र हैं, लद्दाख का नक्शा  है, हथियार हैं. बच्चों के लिए एक एडवेंचर पार्क है. संग्रहालय में काफी समय बिताया. यहाँ के पौधों, पशुओं, पक्षियों के बारे में, यहाँ के लोगों के वस्त्रों, रहन-सहन की जानकारी भी यहाँ मिलती है.  पास ही एक कॉफ़ी शॉप थी. कुछ देर वहाँ बिताकर वे गेस्ट हॉउस लौट आये. रात होते होते हवा काफी तेज चलने लगी. कई तरह की आवाजें आ रही थीं जब सोने गये, काफी देर तक नींद नहीं आई, एयरपोर्ट पर उस दिन सुना था ऊंचाई के कारण होने वाली परेशानियों में नींद न आना भी एक समस्या है. 


Monday, September 11, 2017

मंगल मैत्री


एक रात्रि स्वप्न में स्वयं को किसी दुःख से छुड़ाने के लिए रोकर पुकार लगाते सुना, फिर अपने ही मुँह से एक धातु का उपकरण निकालकर हाथ में रखा, स्पष्ट था कि पीड़ा का कारण यही था. तब जैसे किसी ने कान में फुसफुसा कर कहा, अपने आप को स्वयं ही क्यों दुखी बनाती हो? फिर नींद खुल गयी.

एक स्वप्न में देखा, उठना चाहती है पर आँखें हैं कि खुलने का नाम नहीं लेतीं, बंद आँखों से ही चल पड़ती है तो सामने दीवार आ जाती है, दिशा बदल कर सड़क पर आ जाती है और आँखें खोलने में समर्थ हो जाती है. एक स्वप्न में खुद को निरंतर ७८६ को उच्चारित करते हुए पाया. एक और स्वप्न में भगवान शंकर का जयकार करते हुए. ये सारे स्वप्न यही तो बता रहे थे कि न जाने कितने बार यह चक्र घूम चुका है अब कहीं तो इसे रुकना होगा. कभी-कभी ऐसे व्यर्थ के विचार भी आते कि हँसी आती, पर जो-जो भीतर रिकार्ड किया है वह तो निकलेगा ही, सारी साधना समता भाव बनाये रखने की है. कोई भी अनुभव कितना भी सुंदर क्यों न हो समाप्त हो जाता है, पर भीतर की समता एक चट्टान की तरह अडिग रहती है.

अंतिम दिन का पाठ भी अतुलनीय था, जिसमें मंगल मैत्री सिखायी गयी. प्रतिदिन सुबह व शाम की साधना के बाद सारे विश्व के लिए मंगल कामना करने को कहा गया जिससे सारे पुण्य केवल स्वयं की शुद्धि के लिए समाप्त न हो जाएँ सब दिशाओं में उन्हें प्रसारित करना होगा. सबके मंगल में ही अपना मंगल छिपा है, भगवान बुद्ध की यह मंगल भावना कितनी पावन है. धरा पर यदि कोई जगा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए, उस तरह, जिस तरह यह वास्तव में है ! जो दिखायी नहीं देता, वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखायी देता है. ‘शील, समाधि और प्रज्ञा’ भगवान बुद्ध के बताये इस मार्ग पर चलकर न जाने कितने लोग दुखों से मुक्ति का अनुभव कर चुके हैं, और अनेक भविष्य में भी करते रहेंगे. 

कल यात्रा विवरण पूरा हुआ. इस समय दोपहर का पौने एक बजा है. बाहर के बरामदे में बैठकर लिखने का सुअवसर हफ्तों बाद मिला है. लॉन में फूल खिले हैं, धूप पसरी है और अवश्य तितलियाँ भी होंगी. अभी तक सुबह के वक्त हवा में ठंड का अहसास होता है. उसके गले में खराश है. पिछले दिनों दिनचर्या तथा भोजन के बदलाव और मन के आपरेशन के कारण, अथवा पता नहीं क्या है इसके पीछे. उसका मन या कहे ‘मन’ न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल वे नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. उनसे जो भी गलत हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल होना ही पड़ेगा. अतीत में जो विकार जगाये तथा जिन्हें अचेतन मन की परतों में दब जाने दिया, साधना के द्वारा वे उभर कर ऊपर आते हैं तो देह पर ही प्रकट होते हैं. परमात्मा हर क्षण उनके साथ है, वह हर भाव, विचार तथा कृत्य का साक्षी है, वह अकारण दयालु है, कृपा का सागर है. उसकी उपस्थिति का अनुभव होने के बाद राग-द्वेष व मोह के बंधन नहीं बाँधते. ऐसे व्यक्ति के लिए अब न कोई अपना है न ही पराया. न ही मूढ़ता उसे भाती है. देह में होने वाले स्पंदन तथा अनुभूतियाँ उसका स्मरण करा देती हैं. 

Monday, February 6, 2017

'बोधगया' में बोध गया


परसों रात एक स्वप्न देखा. कितना जीवंत था, लग रहा था जागकर ही देख रही है. ध्वनि इतनी स्पष्ट थी जैसे जागते में होती है. गाना इतना स्पष्ट था और शब्द भी याद थे. कल फिर एक स्वप्न देखा, ये सारे स्वप्न उसके अवचेतन की खबर रखते हैं, देते हैं. उसने अपने अवचेतन के विचारों का प्रक्षेपण जगत पर किया है और तभी जगत उसे वैसा ही दीखता है. उसने पिछले जन्म में या जन्मों में जो कुछ किया है उसका भय भी अवचेतन में विद्यमान है कि कहीं उसके साथ भी वैसा न हो. उन्हें ध्यान में दबे हुए भावों की निर्जरा करनी है ताकि मुक्त हो सकें. स्वयं को जगत के सामने अच्छा दिखाने की कामना, साधना का फल भी भौतिक जगत में नाम तथा यश के रूप में पाने की कामना अहंकार के ही सूक्ष्म रूप हैं. आत्मा में स्थिति हर क्षण नहीं रहती अन्यथा इतनी भूलें नहीं होतीं. आज पिताजी सुबह से बाहर ही बैठे हैं, सारे संबंधों में सूक्ष्म हिंसा छिपी है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है उनका माँ से संबंध. एक-दूसरे को जितनी तरह से हो सकता है परेशान करने के उपाय खोजना ही जैसे लक्ष्य हो, उसके बावजूद वे कैसे इतने उत्साहित रहते हैं, आश्चर्य होता है.

कल पुनः उसने स्वप्न में बाबा रामदेव को देखा, वे उनके घर आए हैं और किसी कार्यक्रम की तैयारी कर रहे हैं, उसका नाम लेकर एक बैग लाने को कहते हैं. बाद में एक स्वप्न वह पुनः पुनः देख रही थी, हर बार पूर्व की कमी को दूर करके, यानि वे अपने स्वप्न स्वयं ही गढ़ते हैं. ध्यान में आज एक सुंदर मोती की माला दिखी..मन कितना रहस्यमय है..चेतना में कितने रहस्य छिपे हैं, साक्षी जो भीतर बैठा है कुछ विचार नहीं करता मात्र द्रष्टा है किन्तु उसके होने मात्र से ही मन, बुद्धि अपना कार्य करते हैं. आज शनिवार है, बाहर से बच्चों की आवाजें आ रही हैं और उसके भीतर अनहद का स्वर फूट रहा है, कितना स्पष्ट सुनाई दे रहा है, यह सुनने वाला भी वही है. टीवी पर सारनाथ में दिया बापू का प्रवचन आ रहा है. भीतर जब तक बोध भी टिका है, तब भी बाधा है. बोध भी जाना चाहिए, ‘बोधगया’ ..इसी का प्रतीक है. भोगों की लालसा, आलस्य, प्रमाद, तम ये सब साधना में विघ्न हैं. आलस्य कुशल कर्म में उत्साह को तोड़ता है, जो विषय नहीं चाहिए उसमें लगना प्रमाद है. विषाद व कमजोरी भी भी विघ्न हैं. कुशल प्रवृत्ति में निरंतर उत्साह बना रहे, यह बुद्ध की एषणा है. कितना अद्भुत ज्ञान है यह !

आज भीतर एक गहरा सन्नाटा है, साक्षी भाव उदित हुआ है, कोई कर्ता नहीं दिखाई पड़ता. नाश्ता ले कर बाहर बगीचे में गई, ठंड शुरू हो गयी है. धूप भली लगती है तन को. वहाँ बैठकर लग रहा था जैसे वह भी अन्य पेड़-पौधों की तरह एक जीव है, देह व आत्मा के बीच का जो सेतु था, जो अहंकार था, वह क्षीण हुआ है शायद गिर ही गया है, इतनी गहन शांति है भीतर, कुछ भी करने का भाव नहीं रह गया है, सब कुछ हो रहा है. सद्गुरू के सम्मुख होती तो वह पहचान लेते..वह कहते यह भी एक अनुभव है, आज से पूर्व न जाने कितने अनुभव आए, एक से बढ़कर एक, सारे खो गये..यह कब तक टिकेगा. वे इतने बड़े महारथी हैं कि सारे अनुभवों को पचा गये..डकार तक नहीं लेते वे. जो करने योग्य है वह प्रकृति करवाए ही जा रही है, पहले डर था कि यदि वे ही नहीं रहे तो उनका काम कैसे चलेगा ! परसों एक सखी का जन्मदिन है उसके लिए अंतिम कविता लिखनी है ! वे लोग यहाँ से जाने वाले हैं.

‘उसने देखते ही मुझको दुआओं से भर दिया
मैंने तो अभी सजदे में सर झुकाया भी नहीं था’


साक्षी भाव कितना मधुर है. कितने अनुभव हुए उसे आजतक लेकिन सब आकर जाने के लिए. यह टिकेगा ऐसा लगता है. भीतर एक शीतलता का अनुभव होता है, जैसे बाहर का मौसम है ठंडा सा, भीतर एक सन्नाटा है जो मिटने वाला नहीं है ऐसा लगता है. उन्हें आज विशेष बच्चों के स्कूल जाना है. जब तक गाड़ी आती है उसे पाठ कर लेना चाहिए.

Wednesday, July 27, 2016

वृद्धावस्था के भय


कल शाम जो कविता लिखकर भेजी थी उसका जवाब आया है. उसके मन में जो यह उत्सुकता बनी रहती है यह भी तो अहंकार को पोषण करने का मार्ग है. कविता अच्छी लगी यह सुनकर भीतर जो तोष होता है वह क्या सात्विक है, यदि हो भी तो उसे उसके ऊपर उठना है. कविता लिखना ही उसका आनन्द है, उसके बाद उससे कुछ पाना प्रभु से दूर जाना है. जो आनंद परमात्मा से आया है और जो आत्मा का है वही साधक का हेतु है. मन को तृप्त करने का हर साधन अहंकार को बढ़ाता ही है. आज भी वर्षा की झड़ी लगी है, कल नन्हे ने बताया कि उसके ऑफिस बॉय की नाभि का आपरेशन हुआ. वे लोग उसे अपने घर पर रखने को भी तैयार थे. कितने भले हैं ये आज की नई पीढ़ी के बच्चे, वे सहज रूप से दयालु हैं. कोई विशेष आयोजन करके दूसरों का भला करने नहीं जाते. परिवार के बंधन से मुक्त होकर वे सारे समाज को अपना परिवार बना पाने में समर्थ हैं. भारत का हो या विश्व का भविष्य सुरक्षित है. लड़के-लड़कियाँ काम में जुटे हैं. उसकी पीढ़ी की महिलाएँ कितनी ऊर्जा व्यर्थ गंवाती हैं. दो बजने को हैं, अब दिन का तीसरा पहर शुरू होता है !  

दोपहर के ढाई बजे हैं. बादल बरस-बरस कर थक चुके हैं सो अब आराम कर रहे हैं अथवा तो जितना जल लाये थे, सब लुटा चुके हैं. अब थोड़ी देर में उनके साथी आते होंगे फिर से आकाश धरा का मिलन होगा.  कितनी ठंड हो गयी है. मार्च महीने का आज अंतिम दिन है, जून आज फील्ड गये थे, अभी कुछ देर पहले ही आये हैं. माँ सो रही हैं, सुबह पांच बजे उठी थीं, उसके बाद सीधे साढ़े बारह बजे ही लेटीं. उन्हें डर लगता है शायद आजकल जब-तब लेटने से, कहीं सब उन्हें छोड़कर  चले जाएँ. बुढ़ापा एक रोग है, कैसी-कैसी वृद्धावस्थाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं. उसकी भी उम्र बढ़ रही है, पर खुशवंतसिंह हैं जो चौरानवे वर्ष के होकर सक्रिय हैं, राजनेता भी काम करते हैं उम्र के अंतिम पड़ाव पर. आज सुबह फुर्सत थी सो फोन पर कई लोगों से बात की. दोनों पिताजी, फुफेरी बहन, चचेरा भाई, चाची जी, बड़ी बुआ के नाती और नतिनी, बड़े भाई, दीदी, मंझली भाभी..कुल दस लोगों से बात की. ओशो को सुना कुछ देर, बुद्ध वायवीय नहीं थे. उनके पैर धरा पर टिके थे पर मस्तिष्क आकाश को छूता था. उन्हें जड़ को नकारना नहीं है पर स्वयं को चेतन जानना जरूर है. वे चेतन हैं जो जड़ को चला रहे हैं, न कि जड़ जो चेतन का उपयोग अपने सुख के लिए कर रहे हैं. कितना सरल है अध्यात्म का ज्ञान, चेतन व जड़ के संयोग से जो तीसरा तत्व निकला वह है अहंकार. अब अहंकार यदि दुःख पाना चाहता है तो स्वयं को जड़ माने, सुख पाना चाहता है तो चेतन माने. हो रहा है उल्टा पाना है सुख मानते हैं जड़, मिटाना है दुःख पर मानते नहीं चेतन..यही तो मोह है माया है, मिथ्याभास है. सद्गुरु उसे वक्त-वक्त पर संदेश भेजते रहते हैं. आज उनकी तस्वीर देखी, बर्फ की दरार में कितने प्रसन्न होकर बैठे हैं, जैसे अपने घर में हों, सारी दुनिया ही तो उनका घर है !

अप्रैल आ चुका है, आज दूसरा दिन है. धूप निकली है. कई दिनों के बाद मौसम खुला है पर कह नहीं सकते कब तक, शाम होते न होते फिर बदली छा जाएगी और वर्षा रानी अपने ताम-झाम के साथ पुनः पधारेंगी. माँ से आज थोड़ी देर बात की. वह कहती हैं, उन्हें कई आवाजें सुनाई पडती हैं. रात को डरावने सपने आते हैं और अकेले रहने में डर लगता है. पिताजी के जाने के बाद से ऐसा हो यह बात नहीं है, उनके होने पर भी वह घबरा जाती थीं. इस समय धूप में बाहर बैठकर बाल संवार रही हैं. आज मेडिकल गाइड में dementia के बारे में पढ़ा, लक्षण मिलते हैं लेकिन इलाज कुछ नहीं है. बूढ़े होकर मृत्यु के मुख में जाने से पूर्व यह कैसा दुःख किसी-किसी को झेलना पड़ता है, सारे वृद्धों को तो ऐसा नहीं होता. मानसिक रूप से जो आशावादी रहा हो, जो सजग, जागरूक तथा सदा कुछ न कुछ सीखने को तैयार रहता हो ऐसे व्यक्ति को बुढ़ापे में दिमाग की ऐसी हालत से शायद नहीं गुजरना पड़ता होगा. उनका मन क्या है, कैसे काम करता है, वे उस पर कैसे नियन्त्रण रख सकते हैं, यह सब सीखना हर एक का कर्त्तव्य है. आज उसने लेडीज क्लब को दिए जाने वाले सुझावों की एक लम्बी फेहरिस्त मन ही मन बनायी. प्रौढ़ शिक्षा उसमें से एक थी. बच्चों व बड़ों के लिए योग शिविर लगाना दूसरी थी. मृणाल ज्योति के लिए नये-नये सहायक ढूँढना भी उसमें शामिल है. वैसे उसने कुछ लोगों को फोन किया था, पर किसी ने भी ‘हाँ’ नहीं कहा है. यहाँ सभी अपने-अपने जीवन में मस्त हैं. किसी के बारे में सोचने की फुर्सत ही किसके पास है. एक उसका मन है कि सदा यही सोचता है कैसे सबके पास पहुँच जाये, सबको स्नेह से भिगो दे, सबकी झकझोर कर जगा दे, देखो, दुनिया तुम्हारी अपनी है !


Wednesday, May 11, 2016

गॉस्पेल ऑफ़ बुद्धा


नये वर्ष में वह पहली बार लाइब्रेरी गयी थी कल. Gospel of Buddha लायी है. बुद्ध कहते हैं आत्मा नहीं है, कोई ऐसी शाश्वत सत्ता भीतर नहीं है. मन है, विचार हैं, भावनाएं हैं ये सब प्रतिपल बदल रहे हैं, एक नदी के प्रवाह की तरह, लेकिन इस प्रवाह को कौन देखता है ? मन क्या स्वयं को देख पाने में सक्षम है, विचारों से परे जो देह व मन को देखता है वह क्या है ? उसे मन कहें या आत्मा क्या फर्क पड़ता है, शब्दों के पार जहाँ केवल शून्य है, कैसी शांति है, जहाँ नाद है, संगीत की लहरियां हैं. जहाँ न जीने की चाह है न मरने की परवाह है. जब कोई विराट शून्य में खड़ा हो जाता है तो दृष्टि अपने पर लौटती है.

आज क्लब की मीटिंग में उसे ‘मृणाल ज्योति’ पर बोलना है. यह बाधाग्रस्त बच्चों के पुनर्वास के लिए समर्पित एक संस्था है जो १९९९ में मात्र दो बच्चों को लेकर शुरू की गयी थी. ऐसे बच्चे जो पूर्ण समर्थ नहीं हैं, मंदबुद्धि हैं अथवा सुनने में अक्षम हैं. उनकी देखभाल शिक्षा तथा उनके इलाज के लिए मृणाल ज्योति जैसे संस्थाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वह हिंदी में अपने विचार सुचारू रूप से रख सकती है. सभी महिलाएं उस जैसी ही तो होंगी प्रेम से भरी, किन्तु थोड़ी सी नर्वस. उनमें आत्मविश्वास की कमी का कारण है आत्मा की कमी. आत्मा जितनी जितनी प्रखर होती जाएगी अर्थात स्वार्थ जितना-जितना कम होता जायेगा या अहंकार जितना-जितना शून्य होता जायेगा, आत्मा उतनी-उतनी उजागर होती जाएगी. उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि वे स्वयं को कभी खो ही नहीं सकते और पाने के लिए सब कुछ है क्योंकि आत्मा अनंत है जितना पा लें प्यास बढ़ती ही जाती है.


आज सुबह एक फोन आया. ध्यान में थी सो घंटी जैसे कहीं दूर बजती रही पर उठाने का मन नहीं हुआ. मन धीरे-धीरे उपराम होता जा रहा है, मरता जा रहा है. भीतर प्रकाश बढ़ता जा रहा है. लक्ष्य कुछ-कुछ दीखने लगा है. हर सुबह सद्गुरु से एक सूत्र मिलता है. कितना सुंदर, सरल और सीधा है उनका जीवन, इसकी पवित्रता देखकर आँखों में जल भर आता है, इतना निर्दोष और इतना पावन है उनका सहज स्वभाव. कितना पूर्ण और कितना तृप्ति से भरा है उनका खाली मन, ऐसा मन जो माँगता नहीं, चाहता नहीं, देने की भी चाह नहीं, कुछ करने की भी चाह नहीं. सहज जो होता रहे वही  पर्याप्त है ! करने वाला यदि बचा रहे, देने वाला और देखने वाला जब तक बचा रहे, तब तक भीतर कुछ न कुछ उथल-पुथल मची रहती है. अब कोई है नहीं भीतर, मौन है, सन्नाटा है, जो है बस है, होना नहीं है. कल सुबह एक परिचिता के पास गयी थी उसके इक्कीस वर्ष के भतीजे ने आत्मघात कर कर लिया. उसने प्रार्थना की, उसकी आत्मा को शांति का अनुभव हो वह सही मार्ग पा जाये ! 

Wednesday, October 14, 2015

कुम्भ का मेला


श्रद्धा, विश्वास, प्रेम और आस्था यदि जीवन में न हों तो जीवन अधूरा है बल्कि जीवन है ही नहीं. उसका अंतर सद्गुरु के बताये पथ पर सारे ही फूल समेटने में लगा है, जिसमें ज्ञान भी है, योग-प्राणायाम भी, कीर्तन भी और सेवा भी. अब तो जो भी सहज प्राप्त कर्म सम्मुख आता है उसे करने के अलावा शेष समय उसी की याद में गुजरे जो छिपा रहता है फिर भी नजर आता है !

कुम्भ का मेला प्रयाग में हो रहा है पर उसके अमृत में वे टीवी के माध्यम से यहाँ बैठे डूब रहे हैं. संतों द्वारा दिए गये अनमोल उपदेश जीवन को सुंदर बनाते हैं. जब तक कोई अल्प में सुख चाहता है तब तक मोह बना हुआ है. जब तक कोई ‘है’ यानि स्वयं को कुछ मानता है तब तक आग्रह भी रहेंगे और जब तक आग्रह है तब तक अहंकार बना हुआ है. आत्मा का ज्ञान होने पर जब अपना सच्चा परिचय मिल गया तो झूठा परिचय अपने आप ही छूट जाना चाहिए, लेकिन वह तो पहले की तरह ही बना रहता है. वह क्या है ? भीतर कौन है ? जो प्रशंसा सुनकर खुश होता है तथा निंदा सुनकर या अपनी बात न समझे जाने पर चिंतित भी होता है और परेशान भी, वह जो मन है, बुद्धि है, चित्त है, अहंकार है, वे तो जस के तस बने ही हैं, वे भी शाश्वत तत्व हैं उनके साथ जब कोई अपना तादात्म्य कर लेता है तो वह भी सुख-दुःख का भागी होता है, वरना तो सुख-दुःख का भागी मन होता है तथा चोट अहंकार को लगती है, वह तो वह है नहीं, उसे तो कुछ भी महसूस नहीं होना चाहिए, लेकिन होता है तो इसका अर्थ हुआ कि अभी उसका ज्ञान कच्चा है.

उनके कच्चे ज्ञान को परिपक्व करने के लिए ही जीवन में प्रभु भिन्न-भिन्न परिस्थितियां भेजते हैं. वे आत्मा के सुख के भी रागी न हो जाएँ, उसका भी उपभोग न करने लगें, उस रस का भी स्वयं पान करते हुए वे स्वयं को विशिष्ट न मानने लगें तथा अन्यों की प्रवाह ही न करें. वे आत्मसुख के यदि रागी हो गये तो परमात्मा तक कैसे पहुंचेंगे, उनका लक्ष्य तो अभी आगे है. भीतर यदि पीड़ा या दुःख हो तो वे उसके महत्व को समझें, वे उन्हें सजग करने के लिए आती है ! उनकी चेतना जगे यही लक्ष्य है. जो दिया वही बचता है, शेष तो यहाँ खत्म हो जाता है. जैसा कर्म वैसा फल, यह सूत्र जिसने समझ लिया वह कभी गलत कार्य क्यों करेगा.

अध्यात्म का सबसे बड़ा चमत्कार सबसे बड़ी सिद्धि तो यही है कि वे अपने बिगड़े हुए मन को सुधार लें, चित्त को सुधार लें. मानव होने का यही तो लक्षण है कि साधना के द्वारा मन को इतना शुद्ध कर लें कि मन के परे जो शुद्ध, बुद्ध आत्मा है वह उसमें प्रतिबिम्बित हो उठे. ज्ञान के द्वारा उस आत्मा को जानना है, फिर सत्कर्म के द्वारा उसे प्राप्त करना है तथा भक्ति के द्वारा उसका आनंद सबमें बांटना है. सेवा भी होती रहे तो मन शुद्ध बना रहेगा, जब तक अपने लिए कुछ पाने  की वासना बनी है मन निर्मल नहीं हो सकता, जब सारी इच्छाएं पहले ही पूर्ण हो चुकी हों तो कोई चाहे भी क्या ? व्यवहार जगत में दुनियादारी के लिए लेन-देन चलता रहे पर भीतर हर पल यह जाग्रति रहे कि वे आत्मा हैं, जो अपने आप में पूर्ण है ! तन यज्ञ वेदिका है, प्राणों को भोजन की आहुति वे देते हैं. इंद्र हाथ का देव है सो कर्म भी ऐसे हों जो भाव को शुद्ध करें. योग है अतियों का निवारण, मन व तन को जो प्रसन्न रखे तथा भीतर ऐसा प्रेम प्रकटे जिससे जीवन सन्तुलित हो.

बुद्ध पुरुषों के वचनों को समझ लेने मात्र से ही कोई बुद्ध नहीं हो जाता, जब तक स्वयं का अनुभव न हो तब तक उधर का ज्ञान व्यर्थ है. बुद्ध पुरुष जब कहते हैं तो वे केवल तथ्य की सूचना भर देते हैं, उनकी उद्घोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे उन्हें उनकी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं !       


Wednesday, May 28, 2014

द तिबतियन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग


She is waiting for Nanha to vacate the bathroom he is there since last one hour, he has to go his school with jun to bring his new books and dress  for new class. Today in the morning when she saw the capsicum bed, became sad to see its bad condition but then recalled ‘The Gospel of Buddha’ immediately became cheerful again and arranged it to be cleaned. Everything depends upon the mental state ie attitude which one  takes  towards various things. Ma-papa are sitting outside in the sun.
कल शाम माँ ने रास्ते में, जब वे घूम कर आ रहे थे, पिता की कठोरता की शिकायत की. उनका स्वभाव बच्चों जैसा है, मानसिक विकास भी उनका वहीं तक सीमित है, स्कूल कभी गयी नहीं, सीधा-सपाट मन जो प्रेम से भरा है और मीठी बोली, पर घर में सभी उनकी अस्वस्थता व भोलेपन की वजह से उन पर हुकुम चलाना अपना अधिकार समझते हैं. कोई उन्हें गम्भीरता से नहीं लेता. इसका उन्हें दुःख था.

Today is Women’s day ! she is proud to be a woman. Just now read another chapters  in ‘The gospel of Buddha’ and ‘The Tibetan book of living and dying’. Both are full of knowledge and stimulate the mind. They say all are changing with this continuously changing world. Today  weather is cloudy and cold. Her inside is also dull , feeling some fullness in stomach and hips. May be this is due to not doing exercise properly today. Yesterday they had a get together with DPS people. Nanha ‘s  maths teacher praised him very much she was happy to hear all the praise coming from all the sides. It is a great satisfaction to have a son or daughter  who is intelligent and laborious. Today she could not practice music but still there is time.

Last night it rained so weather is pleasant now. Surroundings are green and clean, wind is cool and so is earth, wet and cool. Tibetan master has advised-
Always recognize the dream like qualities of life and reduce attachment and aversion. Practice good-heartedness toward all beings. Be loving and compassionate, no matter what others do to you. What they will do not matters so much when you see it as a dream. The trick is to have positive intention during the dream. This is the essential point. This is true spirituality.
William black said-
He who binds to himself a joy
 Does the winged life destroy
He who kisses the joy as it flies
Lives in eternity’s Sun rise.

Every thing around us is bound to change so it is futile to hope for permanence and security. To let go is to love. When one lose someone he realizes  that he loves him/her.

कल उसने कुछ नहीं लिखा, ऐसा लगा जैसे लिखने को कुछ है ही नहीं. इस वक्त लेकिन मन में कितना कुछ है. सुबह छह बजे से कुछ पहले ही उठी, कल शाम को घर से जनवरी का लिखा खत आया, महीनों बाद लेकिन पूरा नहीं पढ़ा, उसके बाद का खत भी आ चुका है और फोन से बात भी हो चुकी है सो पत्र पढ़ने का उत्साह ही नहीं हुआ. वैसे भी घर पर मेहमान आये हुए हों तो दिमाग एक ही तरफ रहता है. परसों वे लोग यानि माँ-पापा वापस जा रहे हैं सो उसके बाद ही सभी पत्रों का जवाब दे पायेगी. मन की सहज स्वाभाविक स्थिति देर तक नहीं रह पाती, कभी-कभी शिकायती हो जाता है, एक क्षण में कैसे जीया जाता है कल यही पढ़ रही थी पर थोड़ी देर तक ही याद रहता है फिर सुविधाजीवी मन थोड़ी सी असुविधा भी सहन नहीं कर पाता और जाले बुनने लगता है.
वह कल का खत उसने आज पढ़ा, मन आर्द्र हो उठा है, पिता ने उसके उस पहले पत्र में व्यक्त भावों की कितनी अच्छी तरह समझा और जवाब दिया और वह सोचती रही कि उसका पत्र बिना जवाब के रह गया. डाकविभाग की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लोगों के बीच गलतफहमी पैदा करने में. उसे भी अब एक खत लिखना है जो उम्मीद करती है वक्त से मिल जायेगा.

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