Showing posts with label बुद्धि. Show all posts
Showing posts with label बुद्धि. Show all posts

Tuesday, July 4, 2017

बोगेनविलिया का पेड़



सदा खुश रहने के लिए बुद्धि को स्वच्छ रखना है. बुद्धि स्वच्छ हो तो उनके कृत्य भी स्वच्छ हो जाते हैं. बुद्धि को स्वच्छ रखने के लिए ‘मेरे’ के भाव का  का त्याग करना है. यहाँ सब कुछ मिला हुआ है, पहले देह फिर परिवार तथा फिर वस्तुएं ! सब कुछ परमात्मा का ही है. जितना-जितना उनका मोह घटेगा, प्रेम बढ़ता जायेगा. वे जब यह स्वीकार करना सीख जाते हैं, तब सारा फ़िक्र परमात्मा को दे देते हैं. आज टीवी पर सुंदर प्रेरणादायक वचन सुने, कोई दक्षिण भारत के संत थे-

Bring powerful completion in yourself and then every day, when you wake up, looks like Shiva is creating new world. When we are complete everything radiates completion, whatever we touch. When one is incomplete inside he or she cannot see the incompletion around him. We can change from karmic life to Avatar life. Move yourself to more and more of completion. Yoga gives us energy and little more we need we should from food. First rest should come from completion and little more from sleep. Prana is the greatest healer and completion is greatest rest.

शाम के सात बजे हैं. नैनी आज बगीचे से हरे प्याज लायी थी, उसी की रोटी बनाने का निश्चय किया है. आज दोपहर को बरामदे के सामने ही लॉन में लगा बोगेविलिया का पेड़ तेज हवा के कारण गिर गया. पहली बार गिरा तो वह घर के अंदर थी. माली को बुलवाकर खड़ा करने को कहा. एक घंटे बाद बाहर गयी तो एक बांस के सहारे खड़ा था. वह अक्सर वहीं बैठकर चाय पीती है. दोपहर को रोज की तरह वहाँ जाकर बैठी तो कुछ ही देर में पेड़ फिर गिर गया. वह उसके नीचे चाय के कप सहित दब गयी. मगर ‘जाको राखे साईंया मार सके न कोई’, न चाय के कप को कुछ हुआ न ही उसे. थोड़े से प्रयास से बाहर निकल आई. बाद में पुनः उसे अच्छी तरह से खड़ा किया गया. बहुत दिनों बाद आज पौधों में पानी भी खुद दिया. शाम को बच्चे भी आये, अब अगले बुधवार को आएंगे.

कल शाम को गुरूपूजा है उनके घर में, उसकी तैयारी शुरू कर दी है. फोन पर सभी को निमन्त्रण दिए. जून ने नये फोन खरीदे हैं उन दोनों के लिए, उन्हें जल्दी हो रही है कि नया सिम एक्टिवेट हो जाये. जिसे एक काम में जल्दी हो उसे हर काम में जल्दी होती है. उन्होंने दो दिनों से भगवद्गीता सुनना शुरू किया है. गुरूजी का छह सीडी का सेट है. जून भी सुन रहे हैं, पर उन्हें अभी संसार से मोहभंग नहीं हुआ है, सो बहुत दिल उसमें नहीं लगाते हैं. हरेक को अपनी गति से ही यात्रा करनी होती है. हरेक का मार्ग भी अलग होता है. आज टीवी पर गुरूजी को कहते सुना था, हरेक को शीघ्र विकास के लिए अपने जीवन में एक दिन पागलखाने में, एक दिन स्कूल में, एक दिन कोर्ट में तथा एक दिन अस्पताल में बिताना चाहिए. वह स्कूल तथा अस्पताल तो जा सकती है पर बाकी दो में जाना मुश्किल है. कल बहुत दिनों या कहें वर्षों बाद मामीजी से फोन पर बात की. परसों होली है, पर उन्हें इस वर्ष होली नहीं मनानी है. जैसे राखी मनाने का उत्साह नहीं था वैसे ही होली मनाने का भी भी मन ही नहीं है. पिताजी के बिना जैसे सब त्योहार अपनी आभा खो चुके हैं.



Wednesday, June 28, 2017

या देवी सर्वभूतेषु


परसों रात्रि एक स्वपन देखा जिसमें एक छोटा बच्चा जो चाय की दुकान पर काम करता है, झिड़कियां खा रहा है, लगा किसी जन्म में वह ही तो नहीं थी यह, इसीलिए उसे ऐसे बच्चों की तरफ सहज प्रेम झलकता प्रतीत होता है अपने भीतर. एक दिन और एक स्वप्न में एक लडकी को स्वयं अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारते देखा था. उन्होंने कितने जन्मों में न जाने कितनी गलतियाँ की हैं. हर गलती स्वयं को  कष्ट देना ही तो है. कल रात्रि का स्वप्न अद्भुत था, सुंदर रंग और आकृतियाँ तो दिखी हीं, एक श्वेत वसना देवी का आशीर्वाद भी मिला. देवी की आकृति हिली, उसका मुख खुला और हाथ से एक श्वेत ही दंड निकला, जिससे उससे निकलती ऊर्जा ने स्पर्श किया और भीतर कैसा तो अनुभव हुआ. कल वसंत पंचमी पर अपने घर को मिलाकर पांच स्थानों पर देवी सरस्वती के दर्शन किये. एक स्कूल में तो मूर्ति बहुत सुंदर थी और मृणाल ज्योति में मुस्कुराती हुई प्रतीत हुई, सम्भवतः इसी कारण वह स्वप्न देखा. दृष्टा ही दृश्य बन जाता है, इसका अनुभव अब दृढ़ होने लगा है. वे ही अपने सुख-दुःख के निर्माता हैं, यह ज्ञान मुक्त करने वाला है,. इसीलिए दृष्टा भाव को इतना महत्व दिया गया है.

वह आत्मा है, यह देह उसका घर है, मन व बुद्धि उसके साधन हैं, यह बात अब कितनी स्पष्ट दिखने लगी है. ऊर्जा का अहसास हर क्षण बना रहता है. कल शाम जून को भी इसका परिचय कराने का प्रयास किया, पर कोई जब तक अपने भीतर से ही न चाहे, बाहर से कोई भी किसी को कुछ बता नहीं सकता. सद्गुरू ऐसा कर सकते हैं पर उन्हीं के लिए जो इसके इच्छुक हैं. हरेक ही अवश्य एक न एक दिन अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा. आज बादल हैं आकाश पर, सुबह जब वे टहलने गये वातावरण इतना सुखद था कि चालीस मिनट जैसे चार मिनटों में बीत गये. सुबह आकाश सात्विक होता है, धरती भी रात्रि विश्राम के बाद शांत होती है और जीव प्रसन्नता से भरे. स्नान करके जब तुलसी व सूर्य भगवान को जल चढ़ाने गयी तो बादल थे, आकाश को निहारते समय वृक्षों व टहनियों के पीछे ऊर्जा की श्वेत आकृतियाँ भी दीख पड़ीं, बादलों के मध्य भी प्रकाश की झलक थी.

सद्गुरू कहते हैं, मूलतः सब पूर्ण हैं, सभी को अपने उसी स्वभाव को पाना है. अंतर की पूर्णता के क्षेत्र में अनुभव किया हर विचार सत्य हो जाता है. पूर्णता ही नित्य सत्संग है, जो भी उन्हें प्राप्त करना है, वह पूर्णता के विकास से मिल जाता है. जब अभावों के भूत सताने लगें, जब विचार अधूरे हों तब उसी की शरण में जाना है जो पूर्ण है. परमात्मा हर जगह है, हर समय है, वही सब रूपों में प्रकट हो रहा है. वास्तविक संपदा वैराग्य और भक्ति है.


Thursday, April 27, 2017

पीला गुड़हल


आज शाम को क्लब में मीटिंग है. खुद से परिचय जितना गाढ़ा होता जाता है, पता चलता है वे मालिक हैं पर नौकरों की भूमिका निभाते रहते हैं. मन व बुद्धि उनकी सुविधा के लिए ही तो हैं पर वे वही बन जाते हैं. जल जैसे स्वच्छता करने के लिए है, पर जल यदि गंदा हो तो सफाई नहीं कर पाता है, वैसे ही मन तो जगत में प्रेम, शांति व आनन्द बिखेरने के लिए हैं पर जो मन क्रोध बिखेरता है वह तो वतावरण को दूषित कर देता है. परमात्मा की निकटता का यही तो अर्थ है कि उनका मन परमात्मा के गुणों को ही प्रोजेक्ट करे न कि अहंकार के साथियों को जो दुःख, क्रोध, ईर्ष्या आदि हैं. इस समय दोपहर के दो बजे हैं. पिताजी सो रहे हैं, उनकी पीठ में दर्द है. आज सुबह अस्पताल गये थे सेंक लिया व ट्रेक्शन भी. आज बिजली नहीं है. हल्की हवा चल रही है. अब धूप तीखी हो गयी है. उसमें बैठा नहीं जाता. जरबेरा व गुलाब अपनी मस्ती में खिले हैं. कंचन में भी तीन-चार फूल आ गये हैं.

आज जून पिताजी को लेकर तिनसुकिया गये हैं, एकाध घंटे में वापस आएंगे. सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह विदेश में रहने वाली अपनी विवाहिता पुत्री को लेकर दोपहर बाद आयेंगी. सुबह वह एक सखी के होनहार पुत्र से मिलने गयी, उसने दो परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, उसे NASA की तरफ से बुलावा आया है. कल टीवी के कार्यक्रम वाह ! क्या बात है ! में एक कर्नल ने शानदार प्रस्तुति सुनी. लोगों के नामों को लेकर उसने एक लम्बी कविता बनाई और हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया. जीवन कितने विभिन्न रंगों से मिलकर बना है.
आज वह पीले गुड़हल का एक पौधा लायी है. शाम को एक शादी में जाना है, नन्हे के बचपन का मित्र. जून के दफ्तर में एक कर्मचारी की माँ का देहांत हो गया था, उनके यहाँ भी जाना है. विरोधी तत्व कैसे जीवन में साथ-साथ चलते हैं. द्वन्द्वों के पार हुए बिना मुक्ति नहीं है. आज हिंदी में शमशेर बहादुर सिंह का लिखा पाठ पढ़ाया, थोडा क्लिष्ट है.

आज वेलेंटाईन डे है. जून कल उसके लिए एक ड्रेस तथा एक जूता लाये हैं, ढेर सारे फल भी, रसभरी, बेर, अनार, अमरूद और सेब...इस समय ग्यारह बजे हैं, पिताजी बाहर माली को कुछ काम बता रहे हैं. अब उनका स्वस्थ्य कुछ ठीक है. उनमें दृढ़ इच्छा शक्ति है, दया है, दूसरों का दुःख समझते हैं, कुछ भावुक हैं, हृदय प्रेम से भरा है, बात-बात पर आंसू निकल आते हैं और वह स्वयं कैसी होना चाहती  है, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना, जो सदा परमात्मा का सान्निध्य चाहती है. निज स्वभाव से जो खुशबू फैलती है, वह शाश्वत है, जो पद, यश या धन के कारण प्रसिद्ध होता है तो कारण हट जाने पर वह स्वयं को दुर्बल मान सकता है, लेकिन स्वभाव में टिका व्यक्ति सदा ही प्रसन्न रहता है और उसके जीवन से ही ऐसी सुगंध निकलती है कि आस-पास का वातावरण सुवासित हो जाता है. कल उसे सरस्वती पूजा के लिए स्कूल जाना है. जून कर भेज देंगे, अब उन्हें  भी कार मिल गयी है. नन्हे ने ‘अनुगूँज’ शब्द का अर्थ दो-तीन पंक्तियों में अंग्रेजी भाषा में लिखकर भेजा है, बहुत अच्छा लिखा है, लेडिज क्लब की पत्रिका का यह नाम नूना ने चुना था. संपादिका को भेज दिया है. आजकल शाम को वह ‘योग वशिष्ठ’ पढ़ती है, शायद इसी का असर हो, पिताजी आस्था देखने लगे हैं.


उसे लगा मृणाल ज्योति में की सरस्वती पूजा उसके जीवन की पहली सच्ची पूजा थी, आज सुबह चढ़ाया प्रसाद भी शायद पहला प्रसाद था जो वास्तव में ईश्वर को अर्पित करके मिला था. दोपहर को बंगाली सखी के यहाँ गयी वहाँ भी पूजा का आयोजन किया गया था. उसका फूलों का बगीचा बहुत सुंदर है. उन्हें भी इस वर्ष बड़ा घर मिल जायेगा फिर वे भी ढेर सारे फूल उगायेंगे. दोपहर बाद रोज गार्डन गयी, अपने आप में डूबने का सबसे अच्छा तरीका है टहलना ! 

Wednesday, April 20, 2016

भगवद प्रेम अंक -कल्याण


केवल पूजा करना ही काफी नहीं है. गुरूजी कहते हैं जो पूर्णता से उपजती है वही पूजा है, अर्थात पूर्णता से जो प्रकट हो वही भाव युक्त कर्म, वही उन्हें सजग बनाता है. आज जून गोहाटी गये हैं, वह अपने सभी कार्य बिना घड़ी की ओर देखे कर सकती है. कहा जाता है कि कोई सफल तभी हो सकता है जब समय का ध्यान रखे, पर सफलता का मानदंड क्या है, जीवन के किसी भी मोड़ पर भीतर कोई पछतावा न रहे, आत्मग्लानि न रहे. टीवी पर भगवद कथा का प्रसारण हो रहा है. शरद पूर्णिमा की रात्रि को जो रास खेला गया था उसी को आधार बनाकर. वक्ता कह रहे हैं पुरुष कभी भी यह स्वीकार नहीं करेगा कि वह बुद्धि में कम है, इसलिए उसकी बुद्धि पर आक्षेप नहीं करना चाहिए. यदि ऐसा कभी महसूस हो तब भी नहीं, क्योंकि ईश्वर ने पुरुष को बुद्धि प्रधान तथा स्त्री को भावना प्रधान बनाया है. लेकिन साधक के हृदय में दोनों का अद्भुत संतुलन हो जाता है, दोनों परों की सहायता से ही पक्षी की उड़ान सम्भव है, एक से नहीं. आज कुछ लोगों को कल के सत्संग के लिए आमंत्रित किया, कल और भी फोन करने होंगे. जून उसकी किताब ‘मन के पार’ का दूसरा ड्राफ्ट बनाकर ले आये हैं, कुछ गलतियाँ थीं. उसे टाइप करने के काम में शीघ्रता करनी चाहिए, कितना कुछ लिखा हुआ पड़ा है. यूरोप पर लिखी कविताएँ उसकी सखी को अच्छी लगीं, जो अपने परिवार के साथ यूरोप घूमने गयी थी. अभी उन्हें और पढ़ने की चाह है. उसके जन्मदिन पर लिखकर ले जाएगी. परमात्मा ने उसे यह कला सौंपी है, इसका पूरा लाभ उठाना होगा जनहित में ! नन्हे ने कहा, वह सोचकर बतायेगा कि उनके साथ विदेश यात्रा पर जायेगा या नहीं. जून ने आस्ट्रिया पर काफी जानकारी मंगा ली है, वे अप्रैल के बाद कभी भी यूरोप जा सकते हैं. 

आज बड़ी भाभी का जन्मदिन  है, उनके लिए एक कविता लिखनी शुरू की है. अभी-अभी ऐसा लगा, यूँ पहले भी एकाध बार लगा है कि आजकल उसे नयी-नयी किताबें पढ़ने का शौक पहले जैसा नहीं रह गया है. यह भी कि वह सजग भी नहीं रह पाती है. कई काम जैसे असजगता में कर डालती है, ऊपर से तुर्रा यह कि वह कार्य करते समय भी यह याद रहता है कि असजग है, पर सजगता धारण नहीं करती. सद्गुरू कहते हैं कि सजग हुए बिना यह पता चलना कठिन है कि कोई असजग है, पर काम तो तब तक हो चुका होता है या हो रहा होता है. समय जैसे-जैसे बीत रहा है यह लक्षण बढ़ रहा है और वैसे ही बढ़ रहा है भीतर का आनन्द, मस्ती और नाद, प्रकाश सभी कुछ, ईश्वर ही सब कुछ है उसके सिवाय कुछ भी नहीं, यह भाव भी दृढ़तर होता जा रहा है, शायद इसलिए अब जगत फीका लगने लगा है. उपन्यास आदि में कोई रूचि नहीं रह गयी है, पढ़ना भाता है तो केवल अध्यात्म संबंधी कुछ भी. इसी महीने की अंतिम तारीख को उन्हें यात्रा पर जाना है, देव दीवाली देखने, उस पर लेख लिखेगी, आँखों देखा विवरण, फिर क्लब की पत्रिका में छपवाने देगी. कल दीवाली के लिए खरीदारी की, एक दुकान में उसे व्यर्थ क्रोध आ गया, वहाँ का वातावरण विषाक्त था, नकारात्मक ऊर्जा भरी थी, सजगता की कमी थी.

जून ने उसकी किताब ‘मन के पार’ की अंतिम सही पांडुलिपि प्रिंट करके ला दी है. वे इसकी पांच प्रतियाँ अपने साथ ले जाने वाले हैं. कल ‘सरस्वती सुमन’ का दूसरा अंक मिला, जिसमें उसकी कविता ‘तुम्हारे कारण’ भी छपी है. आज शाम को क्लब की पत्रिका के लिए मीटिंग है, उसे हिंदी अनुभाग देखना है, ज्यादा काम नहीं होगा, हिंदी में लिखने वाली चार महिलाएं भी नहीं हैं. कल दोपहर एक सखी की भेजी ब्यूटीशियन घर आयी, उसे काम चाहिए था. परमात्मा हर तरह से उसका ख्याल रखता है. आज सुबह एक सखी से बात हुई, वह keep of the grass पढ़ रही है, बनारस की काफी चर्चा है उसमें. दस दिन बाद उन्हें भी वहीं जाना है, उसके पहले दीवाली - दीवाली की मिठाइयाँ, फुलझड़ियाँ और रोशनियाँ ! शाम को कल्याण का ‘भगवद प्रेम’ अंक पढ़ना शुरू किया है. परमात्मा को प्रेम करना ही मानव होने का सर्वोत्तम आनन्द है. उस रसपूर्ण परमात्मा के रस को पाना सारे सुखों से बढ़कर है, वही अमृत है ! प्रेम ही परमात्मा है !

Thursday, March 3, 2016

वसंत के फूल


हर रोज वह दो पेज ‘भागवत महापुराण’ तथा एक-दो पेज ‘महाभारत’ के पढ़कर सासु माँ को सुनाती है. कभी-कभी पढ़ते वक्त यदि मन किसी अन्य बात के बारे में सोचने लगता है जैसे कि नाश्ते में क्या बनाना है, तो मुख बोलता है, आँख्ने देखती हैं, कानों में शब्द भी पड़ते हैं, पर भीतर एक भी शब्द का ज्ञान नहीं पहुँचता, फिर सजग होकर पूरा वाक्य पुनः पढ़ती है. आत्मा यह खेल भी देखती है, बुद्धि उस वक्त भी है पर क्योंकि मन से जुड़ी नहीं है तो इन्द्रियों के कार्यों का उसे भान  नहीं होता. मन एक वक्त में एक ही बात का चिन्तन कर सकता है और वे उसे टुकड़ों में बांटना चाहते हैं. आत्मा ही पाँचों देहों को सत्ता स्फूर्ति देती है, वह सत्य है, उपासना के योग्य है, ‘मैं’ का मूल है, यहाँ मन की गति नहीं, वाणी, बुद्धि की ताकत नहीं, क्योंकि बुद्धि का आधार वही है. इसी महीने गुरुपूर्णिमा है, वे सभी मिलकर इस उत्सव को मनाएंगे. ईश्वर प्राप्ति ही मानव का ध्येय है, सद्गुरू उसी मार्ग पर ले जाते हैं. एक ब्रह्मज्ञानी करोड़ों को ऊंचा उठाने का सामर्थ्य रखते हैं, ऐसे ब्रह्मवेत्ता व्यास जी की स्मृति में व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है. इसे देव पूर्णिमा भी कहते हैं. 

आज फिर उसने सुंदर वचन सुने, ईश्वर उनके भीतर है, जब वे तय करें उससे मिल सकते हैं. जीवन से भागना नहीं है, सारे अनुभवों से गुजर जाना मुक्ति का उपाय है. विचार की सीढियाँ चढ़कर ही कोई निर्विचार तक पहुंच सकता है. संसार एक चुनौती है, एक आयोजन है परमात्मा तक पहुंचने का. जीवन की पाठशाला मेनन उतर कर उत्तर स्वयं ही खोजने होंगे. जीवन उन्हें तीन सोपान देता है देह, मन तथा आत्मा, इनसे चढकर ही चौथे को पाया जा सकता है. जीवन के सभी रूप शुभ हैं, उन्हें सहज स्वीकारना होगा. जीवन में क्षुद्रताओं को उच्चताओं से लड़ाने जायेंगे तो उच्चता ही हारेगी.

यह जीवन तो वसंत है, सारा जगत उल्लास से भरा है और वे अब भी सो रहे हैं. एक बार यदि कोई जग जाये तो ऐसा वसंत जीवन में आ सकता है जो परम है. संसार की हर खोज व्यर्थ हो जाती है क्योंकि संसार वह दे ही नहीं सकता जो वे चाहते हैं, वे जिसे फूल बनकर चाहते हैं वह काँटा बनकर चुभने लगता है. उनका मन कहीं बैठना ही नहीं चाहता क्योंकि वह हर वक्त किसी न किसी की तलाश में रहता है. परमात्मा के बिना उसका ठौर नहीं, वह संसार में भी उसी को खोज रहा है, पर वह संसार के पार ही मिलता है. वे जिस प्रेम भरी नजर से इस जगत को देखते हैं उसी नजर को परमात्मा को देखने में लगाना है. उन के भीतर जो छोटा सा प्रेम का झरना है उसी को एक दिन सागर से मिलाना है. साधना में कुछ नया नहीं करना है, बस दिशा बदलनी है. हर कोई आनन्द पाना चाहता है, वह ठीक है, लेकिन जिस राह से चल कर पाना चाहता है वह राह गलत है. भक्त संसार के सौन्दर्य को भी परमात्मा का ही मानता है. उनका जीवन कब गुजर जायेगा पता ही नहीं चलेगा. वे अपने रूप की अकड़ में अपने असली स्वामी को रिझा ही नहीं रहे. उनके जीवन की एकमात्र सफलता इसी में है कि वे अपने भीतर के अमृत से जुड़ जाएँ. उनके चित्त का पंछी उसी अमृत का पान करना चाहता है, वे संसार में लगाने के लाख उपाय करें यह वहाँ नहीं लग सकता, यह तो शाश्वत को ही चाहेगा. जैसे-जैसे चित्त को लगता है वसंत बीता जा रहा है, उसकी अशांति बढती जाती है, उसकी बेचैनी का अर्थ है कि वह परमात्मा की ओर चलना चाहता है, वह अपने घर जाना चाहता है.

Tuesday, December 15, 2015

गणेश और शिव


आज उसे याद आ रहा है कि पहली बार जब सद्गुरू को देखा था तो देखते ही वह स्तब्ध हो गयी थी, उनके वर्तन ने, उनकी वाणी ने मन हर लिया, जिसके सामने हृदय झुक जाये वह सद्गुरु ही मंजिल तक ले जाता है. जो बुद्धि दूसरों में दोष देखती है वह नीचे गिराने वाली है, ज्ञान कभी भी नकारात्मक नहीं दिखाता, सदा सकारात्मक ही दिखाता है. उसके भीतर न जाने कितनी कमिया हैं, उन्हें यदि बुद्धि न देख सके तो वह बुद्धि पक्षपाती है, बुद्धि में राग-द्वेष हो, लोभ तथा ईर्ष्या हो तो ऐसी बुद्धि परदोष दिखाने लगती है. सद्गुरू कहते हैं आत्मा में रहकर ही कोई सारे दुखों से दूर हो सकता है. सतत् होश रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात भीतर न रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है. यह होश मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है.

इच्छा गति है, यह भविष्य में है, जब कोई इच्छा न रहे तभी कोई वर्तमान में आता है, स्मृति ही भूत है, समय केवल वर्तमान में है, वे कल्पना और स्मृति में रहकर वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. वर्तमान में आते ही वे साक्षी बन जाते हैं, शक्ति बच जाती है, और वे ऊपर की यात्रा कर सकते हैं, पानी नीचे बहता है और भाप ऊपर उठती है, भीतर भी जब ऊर्जा एकत्र हो जाती है, तो वह ऊपर की और जाने लगती है.

आज उसने सुना काल, स्वभाव, पुरुषार्थ, प्रारब्ध, नियति यह पांच संजोग मिलते हैं तब कोई कर्म होता है, और वे स्वयं को कर्ता मानकर सुखी-दुखी होते रहते हैं. कर्ता भाव से मुक्त होते ही चिंता का कोई कारण नहीं रहता. जीत भी यदि उसकी नहीं है तो अहंकार का कोई कारण नहीं बचता और हार भी यदि उसकी नहीं है तो दुःख भी नहीं, ईर्ष्या भी नहीं. उन्हें पकड़े रहने में दुखों को प्रयोजन भी क्या है, वे इतने मूल्यवान तो नहीं कि दुःख उनकी ओर आएं. यह जगत की व्यवस्था उनके लिए तो नहीं चल रही है, जो एक झूठे केंद्र को मानकर चलता है वह भीतर के सच्चे केंद्र को पाने से वंचित रह जाता है. अहंकार दूसरों के मत पत आधारित है. दूसरे का ध्यान मिले यही अहंकार का भोजन  है. यही अहंकार तो छोड़ना है.

ठीक ही कहते हैं एक माँ कई बच्चों को अकेले पाल सकती है पर कई बच्चे मिलकर एक माँ को सहारा नहीं दे सकते. जिस घर में माँ सुख से न रह पाती हो, उसे न रखा जाता हो, वह शांति का सागर कैसे बन सकता है. उसके अंतर में सासुमाँ के प्रति सम्मान है पर वाणी कठोर हो जाती है कभी-कभी, जो अवश्य उन्हें चुभती होगी. कल जून ने पिता से उनकी बात करके दोनों का दिल दुखाया. उन्हें क्या अधिकार है बड़ों का असम्मान करें. यही सोचना चाहिए कि भाग्यशाली हैं कि दोनों का हाथ सिर पर है.

आज सत्संग है, उसे सत्संग, ध्यान, साधना, स्वाध्याय के मर्म को जानना होगा. चिन्तन शक्ति व्यर्थ न हो, शक्ति का संचयन हो और फिर उस का सदुपयोग भी. बोलें तो ऐसा कि दूसरों को अप्रिय न लगे. सजगता के साथ-साथ सहजता भी आवश्यक है. जून आज गोहाटी गये हैं, परसों शाम को आयेंगे. आजकल वह अपने कम में बहुत रूचि ले रहे हैं. प्रसन्न रहते हैं तथा उत्साह से भरे. योग का चमत्कार है. उसकी साधना भी ठीक चल रही है, समय को व्यर्थ न गंवाए, यही महत्वपूर्ण है.  

अज सद्गुरू ने ‘गणेश पूजा’ का महत्व बतलाया. गणेश का जन्म पार्वती के शरीर की मैल से हुआ और शंकर जब लौटे तो उन्हें पहचान नहीं सके. पार्वती का अर्थ है जो पर्व, उत्सव अथवा जीवन के रंगमय रूप से उत्पन्न हुई है, एक अर्थ यह भी है जो पर्वत से उत्पन्न हुई है. उसमें जो भी मल, विक्षेप, आवरण है उसके द्वारा ही एक आकृति का निर्माण हुआ जो शिव तत्व, आत्मा को नहीं पहचान पाया. शिव ने उसे नष्ट करके हाथी का सिर अर्थात ज्ञान को आरोपित कर दिया. आत्मा के आने पर सारा मल दूर हो जाता है, ज्ञान उदार होता है इसलिए गणेश लम्बोदर हैं, उनके कान आँखों तक आ जाते हैं अर्थात वह देखी हुई और सुनी हुई बातों का मिलान करते हैं. उनकी सवारी चूहा है अर्थत एक छोटे से उपाय से महान आत्मा का ज्ञान गुरूजन करा देते हैं. एक छोटा सा मन्त्र साधक को भीतर के अनंत साम्राज्य से मिला देता है. उनके हाथ में पाश है अर्थात अंकुश आवश्यक है तथा पेट पर सर्प लिपटा है जो कहता है सदा सजग होकर रहो, उनके हाथ में मोदक है जो मस्ती का संदेश देता है, मस्ती भी सजगता भरी, ऐसे गणेश की उपासना उन्हें करनी है !


Friday, October 16, 2015

योगः कर्मसु कौशलम्


जिसके सिर ऊपर तू साईं सो दुःख कैसा पावे ! ज्ञानी के ऊपर परमात्मा की कृपा होती है. उनके भीतर सहज करुणा होती है, वे किसी को दोषी देखते ही नहीं, वह सम्पूर्ण निराग्रही होते हैं. ज्ञानी के पास सबसे बड़ा शस्त्र प्रेम होता है. वे वाक् चातुर्य नहीं दिखाते, प्रेम स्वयं उनके व्यक्त्तित्व से टपकता है. उनके भीतर राग-द्वेष नहीं रहते, वह अपेक्षा नहीं रखते. अपेक्षा वाला प्रेम घटता-बढ़ता रहता है, सच्चा प्रेम केवल ज्ञानी के पास ही मिलता है. उसके सद्गुरु ऐसे ही सच्चे ज्ञानी हैं, वह उसके आदर्श हैं. उसे अभी बहुत दूर जाना है. अभी लक्ष्य को पाना है, आग्रह छोड़ने हैं, मुक्त होकर जीना है, आकाश की तरह मुक्त..और निर्मल !

आज उसके मन-प्राण में कैसी अद्भुत शांति छाई है, भीतर एक निस्तब्धता है, गहरा मौन और सन्नाटा..जैसे कोई ठंडक बसी हो, उस मौन में कुछ आवाजें हैं जो निरंतर सुनाई पड़ती हैं..हर पल..हर क्षण..और आज भीतर से कैसा हास्य फूटा, कदम अपने आप थिरके और फिर अश्रु ! पूर्णमदः वाला श्लोक भी जाने कहाँ से भीतर याद आ गया, ऐसे ही सम्भवतः ऋषिगण द्रष्टा होते होंगे मन्त्रों के. परमात्मा की उपस्थिति पूरी तरह से महसूस की, ध्यान में सुंदर फूल दिखे. सद्गुरु को सुबह सुना, वह कितना सरल बना देते हैं कठिन विषय को भी. सारे शास्त्र भी तो पुकार-पुकार कर वही कहते हैं, ईश्वर भीतर है, वह सुह्रद है. भक्त व भगवान एक खेल रचते हैं, जब दो होते हैं, दोनों एक ही शै से बने हैं. भक्ति अग्नि के समान है जो सदा की ऊपर ही ले जाती है. ईश्वर उन्हें बुला रहा है, वह शांति और सुख देना चाहता है, वह योग करना चाहता है.  

जब भीतर विस्मय जगे या कर्मों में कुशलता की चाह हो, मन को समता में रखने की कला सीखनी हो तो कोई योग मार्ग की ओर कदम रखने की योग्यता रखता है. जब कोई सारे दुखों से छूटना चाहता है तो योग की शरण में जाने के योग्य है. योग में बाधक है जड़ता और मन की वृत्तियाँ..जिनके निरोध का नाम भी योग है. विस्मय में जाने से ज्ञान रोकता है. जहाँ निश्चय होता है  वहाँ विस्मय नहीं होता. जो ज्ञान अन्यों से पृथक करे, जगत से भेद कराए वह अधूरा है. उसे अद्वैत तक पहुँचना है, जहाँ दो हैं ही नहीं. मन एक होने से रोकता है, बुद्धि भेद करना सिखाती है और अहंकार हर क्षण अन्यों से श्रेष्ठ होने का आभास दिलाता है. ये सभी मन की वृत्तियाँ है जिनसे उसे मुक्त होना है. तब भीतर कोई भेद नहीं रहेगा, आत्मा के साथ मन एक हो जायेगा. उस एकता के कारण जगत के साथ विरोध भी नहीं रह जायेगा. समाहित मन अपने मूल को पा लेगा, बंटा हुआ मन हर पल स्वयं ही घायल होता है और दूसरों को भी दुखी बनाता है. योग ऐसे मन से मुक्त करता है.  
 जब भीतर सत्संग की चाह जगे, निर्मोहता बढ़े, प्रेम जगे तो मानना चाहिए कि गुरू की कृपा बरस रही है. कृष्ण कहते हैं जो चैतन्य के साथ स्वयं को जोड़ता है वह अपना मित्र है जो जड़ के साथ जोड़ता है वह अपना शत्रु है. आज टीवी पर सुना, मन ही भवसागर है और यह तन कुम्भ है, अच्छी-बुरी वृत्तियाँ ही देव व असुर हैं, मान पाने की आशा ही वह हलाहल विष है तथा समाधि ही अमृत है ! नश्वर को पाने से कोई स्वयं को बड़ा माने तो यह छोटापन है, नश्वर के खोने से कोई दुखी हो जाता है था स्वयं को छोटा मानता है तो यह भी छोटापन है. कोई दोष अपने में है यह मानने से दोष दृढ़ होता है, तो दोष कि सत्ता बढती है, उसे स्वयं में ण मानकर प्रकृति में मानना है जो परिवर्तनशील है. वह दोष भी बदलने वाला है, जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होने ही वाला है. दोषों को देखना भर है, उनको स्वयं में मानना ही भूल है !  

Monday, September 28, 2015

बापू की आत्मकथा


आज उसने सुना, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न चेतना का विकास ही है, पदार्थ चेतना को प्रभावित करते हैं. शुद्ध हुई चेतना ही आत्मा के पथ पर ले जाती है. आत्मा मन, बुद्धि तथा संस्कार के माध्यम से जगत को ग्रहण करती है तथा इन्हीं के माध्यम से स्वयं का अनुभव करती है, यदि देह में रहते हुए आत्मा का अनुभव करना है तो इन्हें शुद्ध बनाना होगा. मन में शुभ संकल्प उठें तथा बुद्धि उन्हें साकार करने का निर्णय दे तभी शुभ संस्कार बनेंगे. वर्तमान में रहना, प्रतिक्रिया न करना, मैत्री भाव तथा मिताहार बुद्धि को शुद्ध करने के लिए आवश्यक हैं. उसका शरीर इस समय तप रहा है, बिना बुखार के. कुछ ही पलों में पसीना निकलेगा और तपन शांत हो जाएगी, आजकल ऐसा दिन में दो-तीन बार तो हो ही जाता है. उम्र के इस दौर में ऐसा होना स्वाभाविक है डाक्टर ने कहा है.

आज महीनों बाद मृणाल ज्योति गयी. माहौल थोडा शांत व हल्की उदासी से ओत-प्रोत लगा. बच्चे भी पहले की तरह हँसते हुए नहीं लगे. एक बच्चे ने कहा, फिर मिलेंगे. मन में करुणा जगी, कितने विवश लगे वे, उनकी आत्मा उन अधूरे शरीरों में कितनी तंग होती होगी, कौन जाने उनके भीतर कैसे  विचार उठते हैं? वे अपने को व्यक्त कहाँ कर पाते हैं ? उनकी एक टीचर ने शाम को फोन किया, वह कम वेतन के बारे में बात कर रही थी. स्कूल के अधिकारियों ने बताया कि वे तंग आ चुके हैं सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता है. सरकारी अधिकारी काम को आगे नहीं बढ़ाते. संसार में कितने दुःख हैं. आतंक का शिकार यह प्रदेश कितना पिछड़ा हुआ है. गाँधी जी ने सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया, सेवा के माध्यम से वह अपने सत्य और अहिंसा के साधनों की परख करते थे. उसके जीवन में सेवा के अवसर अब थोड़े-बहुत आने लगे हैं पर वे बहुत कम हैं. जून उसकी पूरी मदद करते हैं. वह उसे ईश्वर से दूर ले जाने का प्रयत्न करते हुए ईश्वर के निकट ले जाते हैं. वह अभी इस बात को नहीं समझते कि ईश्वर से प्रेम करना मानवीय आवश्यकता है. उसे उनसे कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहिए, उनकी समझ में तो यह पागलपन ही है. वह तो उन्हें शुद्धात्मा ही देखती है और इस सृष्टि के जर्रे-जर्रे की तरह उनसे भी असीम प्रेम करती है. ईश्वर हर क्षण उसके साथ हैं और ईश्वरीय प्रेम उसके भीतर-बाहर हर ओर फैला है. यह सारा जगत उसी का रूप है. मनसा-वाचा-कर्मणा वह किसी का अहित न करे, यही उसका प्रयास है. वह उसकी इच्छा की पूर्ति तत्काल करते हैं और सोचते हैं कि जगत के मोहजाल में उसे खींच लेंगे, पर उसकी वे सारी इच्छाएं परमात्मा के मार्ग पर ले जाने वाली ही हैं. वह भी तो पुण्य के भागी हो रहे हैं. उसका हृदय प्रेम से लबालब भरा है. इस प्रेम का कारण कोई नहीं, पात्र भी कोई नहीं. यह तो सहज ही है सारी समष्टि के लिए और उससे परे उस परम पिता परमात्मा के लिए, बल्कि वही तो प्रेम रूप में उसके भीतर विराजमान है !
पिछले कुछ दिनों से वह बापू की आत्मकथा पढ़ रही थी, अभी कुछ देर पूर्व ही समाप्त की. वे सत्य के अन्वेषक थे और उनका साधन एकमात्र अहिंसा था. अहिंसा के बल पर वे सत्य की खोज कर रहे थे. बुद्धि की शुद्धि के बिना कोई अहिंसा का पालन नहीं कर सकता और राग-द्वेष से मुक्त हुए बिना वह सम्भव नहीं. राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए अहंकार का सर्वथा त्याग करना होगा, स्वयं को भुलाकर समष्टि के साथ एकता का अनुभव करना होगा. उसके बाएं कान में सुबह से तथा इस समय दायें कान में सोहम् की मधुर गुंजन सुनाई दे रही है, भीतर अखंड शांति का साम्राज्य है.

आज सुबह पिता जी आ गये, जून रात्रि को ढाई बजे ही उन्हें लेने चले गये थे. सासुमाँ बहुत खुश हैं, वे अपने साथ खाने-पीने का ढेर सारा सामान लाये हैं. दीपावली का त्योहार आने ही वाला है, तैयारी तो हफ्तों पूर्व ही आरम्भ हो जाती है. वे अपने भीतर भी दीवाली मनाते हैं और बाहर भी, भीतर की सफाई तथा शुद्धि भी करते हैं जैसे बाहर की. अमावस के अंधकार का प्रतीक है अज्ञान..जिसे आत्मज्ञान का दीपक जलाकर मिटाना है. मधुर भावों की मिठास से उर को मीठा करना है. उसके भीतर भी उजाला ही उजाला हो, चिदाकाश में दीप जले हों, अनहद का संगीत गूँजता हो तो ही सदगुरू की शिक्षा की अधिकारिणी वह कही जा सकती है. आज उन्हें सुना, नारद भक्ति सूत्र के आधार पर वह व्याख्या कर रहे थे, प्रेम का वर्णन नहीं कर सकते, वह भाव से परे है, भावुकता प्रेम नहीं है, भीतर की दृढ़ता ही प्रेम है, सत्यप्रियता ही प्रेम है और असीम शांति भी प्रेम का ही रूप है. भीतर ही भीतर जो मीठे झरने सा रिसता रहता है वह भी तो प्रेम है. प्रभु हर पल प्रेम लुटा रहे हैं. तारों का प्रकाश, चाँद, सूर्य की प्रभा, पवन का डोलना तथा फूलों की सुगंध सभी तो प्रेम का प्रदर्शन है. प्रकृति प्रेम करती है, घास का कोमल स्पर्श और वर्षा की बूंदों की छुअन सब कुछ तो प्रेम ही है. वृद्ध की आँखों में प्रेम ही झलकता है शिशु की मुस्कान में भी प्रेम ही बसता है. प्रेम उनका स्वभाव है और प्रेम से ही वे बने हैं. प्रेम ही ईश्वर है !   

Wednesday, July 15, 2015

कर्नाटक की ओर


पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. पहले की तरह लिखना अब नियमित नहीं रह गया है. जून के आने के बाद सम्भवतः नियमित हो सके. सुबह के काम के बाद सीधे ही ध्यान के लिए बैठ जाती है. टीवी पर योग कार्यक्रम देखकर आसन करने में भी थोड़ा अधिक समय जाता है, पर उसका प्रभाव भी साफ़ देखने में  आ रहा है. आजकल वह काफी स्वस्थ अनुभव कर रही है. नन्हा और जून इस समय कर्नाटक जाने वाली गाड़ी में बैठे हैं. वे काफी दिनों से सफर में हैं. नन्हे का सफर तो कल समाप्त हो जायेगा जब उसका दाखिला हो जायेगा. पर जून अभी एक हफ्ते बाद घर आएंगे. माँ को सर्दी लगी है, जुकाम हो गया है एसी में सोने के कारण. उस दिन नैनी ने कहा था कि बूढ़े लोग बच्चे की तरह हो जाते हैं, उन्हें अपने भले-बुरे का भी ज्ञान नहीं रहता. वे कभी-कभी ऐसी ही बातें भी करती हैं, बिलकुल बच्चों की तरह. लेकिन आमतौर पर वे स्वस्थ रहती हैं, उनकी दिनचर्या भी यहाँ रहके नियमित रहती है. उनके कारण किसी को कोई असुविधा नहीं होती, इस जगत में सभी को यदि ऐसे जीना आ जाये तो कोई शिकायत कभी भी न हो साथ-साथ रहते हुए भी अलग-अलग रहना ! नूना के लिए तो सारी स्थितियां समान हैं. वह अपने साथ रहती है अपने मन के साथ सो जगत के परिवर्तन का उस पर कोई असर नहीं पड़ता. उनके प्रति उसका व्यवहार और कोमल होना चाहिए कभी-कभी ऐसा उसे लगता है, शायद उन्हें भी लगता हो. वह उन्हें आत्मननिर्भर बनते हुए देखना चाहती है. हर समय दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. वैसे वह खुश रहती हैं पर थोड़ी सी अस्वस्थ होते ही घबरा जाती हैं. उसकी डायरी पुनः कुछ वर्षों जैसे होती जा रही है, क्या यह पतन की निशानी है ? जिन पन्नों पर ईश्वर चर्चा के अतिरिक्त और कुछ लिख ही नहीं पाती थी, वह अब सांसारिक बातों से भरे जाने लगे हैं. सम्भवतः इसका कारण यह हो कि अब उसे सभी के भीतर उसी आत्मा के दर्शन होते हैं. सभी उसे भगवान के मेहमान लगते हैं, जो भीतर है वही बाहर है. वही इस सृष्टि का कारण है, वह स्वयं ही सृष्टि हो गया है तो भौतिक और आध्यात्मिक के बीच का भेद भी अब समाप्त हो गया है. ईश्वर करे यही कारण हो क्योंकि पुनः गड्ढे में गिरने का तो उसका इरादा है नहीं !


आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ. सभी के भीतर एक ही चेतना है यह बुद्धि के स्तर पर तो जानते हैं वे पर जब तक यह अनुभूति के स्तर पर न जाना जाये तब तक इसका फल नहीं मिलता. ध्यान में उसे जड़-चेतन सभी के भीतर एक चेतना का अनुभव हुआ. वह ही पानी की लहर बन गयी वह ही हवा का झोंका ! वह ही नाव बन गयी और वह ही नाविक..जिस वस्तु या व्यक्ति की कल्पना वह करती उसके भीतर स्वयं को ही पाती. उनकी चेतना कितनी असीम है, दूर गगन के पार अनंत ब्रह्मांडों में भी व्याप्त है उनकी चेतना. वे सदा थे सदा हैं सदा रहेंगे, यह चेतना अजर है, अमर है,  नित्य है, शाश्वत है, यह असीम है ! सद्गुरु की कृपा उस पर बरस रही है. मन ध्यानस्थ रहता है. ईश्वर से जुड़ने के बाद जगत से थोड़ा ही प्रयोजन रहता है. इससे शरीर चलता है. शरीर के बिना आत्मा कैसे स्वयं को व्यक्त कर सकती है ?  

Tuesday, April 28, 2015

नाश्ते में परांठे


कल शाम को माँ-पिता जी वापस चले गये, अभी तो वे ट्रेन में होंगे, आने वाली शाम को पहुंचेंगे. वह उस अद्वैत, अच्युत, अनादि कृष्ण की कथा सुन रही है. जीवात्मा यदि भक्त हो तो वह कृष्ण की कथा में ही तो रस लेगा ! इस मार्ग पैर कितनी ही सफलता मिले, फिसलने का डर रहता ही है. सद्गुरु माँ-पिता की तरह कभी प्रेम से तो कभी डांट-फटकर कर सन्मार्ग पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं. पिछले दिनों कई बार ऐसा हुआ जब वह मोह का शिकार हुई, अर्थात उसकी बुद्धि विकृत हो गई, पर झट ही सचेत भी हुई. शुद्ध अन्तःकरण में ही ईश्वर का प्रागट्य होगा. कृष्ण का अवतरण हृदय की जेल में होगा तो सारे बंधन खुल जायेंगे, सारी गांठें भी खुल जाएँगी, तब शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा. अभी बहुत कुछ सीखना है. यह मार्ग कितना भी लम्बा क्यों न हो पर सुखदायक है. सद्गुरु का ममता भरा हाथ और कृष्ण का अहैतुक प्रेम सदा-सर्वदा उसके साथ जो है.

“पायी संगत जो संतन की, पायी पूंजी अपने मन की” सद्गुरु ने अपने वचनों और अपने कार्यों से उन्हें ‘स्वयं’ से मिला दिया है, और उन्हें अपने आप से प्यार हो गया है. पहले स्वयं से आँख मिलते भी डरते थे और दूसरों से भी. अब हर जगह वही दीखता है तो डर किसे और किसका ? उन्होंने स्वयं ही अपने लिए बाधाएँ खड़ी की हुई थीं, अब इनका अंत होता नजर आता है. बुद्धिफल है अनाग्रह, किसी भी स्थिति का आग्रह नहीं करना है, समर्पित बुद्धि को ही यह फल मिलता है. आज सुबह जून ने अपने घटते हुए वजन को देखते हुए नाश्ते में परांठा बनाने को कहा, साथ-साथ उन्होंने नाश्ता किया सो अभी व्यायाम नहीं कर पायी है. ग्यारह बजे तक सभी शेष कार्य हो जायेंगे यदि एक-एक मिनट का उपयोग किया तो. मौसम आज अच्छा है, पापा-माँ अभी भी ट्रेन में बैठे होंगे  !

नौ बजने को हैं, आज भी मौसम बदली भरा है, नैनी किचन की विशेष सफाई कर रही है. कल शाम को फोन आया, वे लोग सकुशल पहुंच गये हैं, उन्हें यहाँ रहना यकीनन अच्छा लगा होगा, वह बल्कि परीक्षा में कई बार फेल होते-होते बची. सबसे पहले तो असत्य भाषण, चाहे कितना भी निर्दोष असत्य हो..पर उससे छुटकारा तो पाना है न, दूसरा क्रोध, यह बहुत कम रह गया है पर समाप्त नहीं हुआ है, तीसरा लोभ, यह बहुत ज्यादा है, वस्त्रों की कमी का अहसास और किसी को दिए जाने वालों सामानों पर नजर रखने की प्रवृत्ति.. मन यदि शुद्ध नहीं तो ध्यान कैसे होगा और ध्यान में उतरे बिना ज्ञान भी नहीं टिकेगा...जीवन में ज्ञान नहीं तो पशु से भी गया गुजरा है जीवन...कृष्ण को सदा मन में बसाये रखे तो वही मुक्त करेगा... संगीत का अभ्यास हो चुका है. उसके गले में हल्की सी खराश है, सिर भी थोड़ा भारी है, कल रात पंखा तेज करके सोयी सम्भवतः यही कारण हो, पर यह इतनी मामूली सी बात है कि..अभी पाठ करना शेष है, माँ थीं तो वे सुबह-सुबह ही पाठ कर लेते थे, वे रोज सुनती थीं. एक सखी के ससुरजी  अस्पताल में दाखिल हैं. सम्भवतः अंतिम दिन नजदीक आ रहे हैं, आत्मा की नश्वरता के बारे में जानकर इतना ज्ञान तो हो चुका है कि शरीर जो जर्जर हो चुका है, उसके प्रति मोह न रहे. सो मन में दुःख नहीं होता. जीवन जितना भी जियें होशपूर्वक जियें, तभी सार्थक है अन्यथा तो लकड़ी के लट्ठे का सा ही जीवन है. सजगता अत्यंत आवश्यक है. एक चेतन सत्ता है जो उनके प्रत्येक कार्य, विचार व वचन की साक्षी है, उससे वे कुछ भी छुपा नहीं सकते. वह उनका आदर्श बने, तभी मुक्ति सम्भव है. श्रद्धा रूपी जल, मन रूपी सुमन था अपने कर्मफल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही ईश्वर को समर्पित करना है.





Tuesday, January 27, 2015

नटनागर का नृत्य


अभिमान में न आना इतना ख्याल रखना
यह राह बहुत कठिन है, पाँव संभाल रखना !

उसे अपने ज्ञान पर, अपनी भक्ति पर अभिमान होने लगा था और गुरू चेताने के लिए आ गये हैं. किसी के शब्दों पर मुरझाना या खिलना अहंकार के पोषण के कारण ही तो है. प्रज्ञा का अपराध ही इस स्थिति में डालता है. बुद्धि का विकास करना है इसका लक्षण है अनाग्रह, सत्य की खोज में लगे व्यक्ति को दुराग्रही या पूर्वाग्रही नहीं होना चाहिए. अपनी बात को ऊपर रखने की व्यर्थ चेष्टा यदि है तो बुद्धि अभी विकसित नहीं हुई है. सत्य को स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता है. प्रज्ञा का दोष न हो तो मन समत्व योग में स्थित रहता है. ऐसा अडिग हो सके अपना मन जो अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में समान व्यवहार करे तो ऐसा मन ध्यानस्थ है. ऐसा ही मन भक्ति कर सकता है, भक्ति का मार्ग इतना सहज नहीं है, सिर कटाकर ही इस मार्ग पर चला जा सकता है. आज जून शिवसागर गये हैं, नन्हा घर पर ही है, टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है.

गलतफहमियों में जिन्दगी गुजरी
कभी तुम न समझे, कभी हम न समझे

मन अहंकार से मुक्त हो तो छोटी-छोटी बातें पानी पर लकीर की तरह बेअसर हो जाती हैं, साथ ही दूसरों की व्यर्थ बातों पर ध्यान न देने की कला भी आती है व्यर्थ के विवादों से बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि भीतर के आँख और कान खुले रहें, बाहर के कान और नेत्र यदि बंद भी रहें तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है.
आज तीस जनवरी है, बापू की पुण्य तिथि ! सुबह-सुबह भजन सुना, वैष्णव जन तो तेने कहिये....नरसिंह मेहता का यह भजन मन को ऊंचे केन्द्रों पर ले जाता है. प्रेम सिखाता है, देना सिखाता है. सद्गुरु का यही काम है कि वह अपने हृदय की उदारता और प्रेम साधकों के अंतर में प्रवाहित करता है. उनके दिल-दिमाग को विस्तार देता है. वैदिक ऋचाओं का संदेश पहुंचाता है. सद्गुरु कहते हैं, भागवद समाधि भाषा है, उसे पढ़कर हृदय में रस उभरने लगता है, ‘बिगड़ी जन्म अनेक की, सुधरे अभी और आज’ !

आज फरवरी का पहला दिन है, सुबह जल्दी उठे वे. नन्हे की परीक्षा है, साइंस ओलम्पियाड. कल दीदी का पत्र आया, बड़े भांजे को अखिल भारतीय परीक्षा में प्रथम स्थान मिला है कम्प्यूटर की ‘c’ परीक्षा में. अब यह c में क्या सिखाते हैं, o लेवल क्या है उसे पता नहीं पर बहुत ख़ुशी हुई उसका नाम अख़बार में छपा देखकर. अभी-अभी ‘आत्मा’ में मुम्बई स्थित मन्दिर में आने का निमन्त्रण मिला, कीर्तन में शामिल होने व नृत्य देखने का भी. आज गुरुमाँ ने भी आधा घंटा नृत्य करने की सलाह दी जो सब कुछ भुला कर किया जाये. आँखें बंद हों और हृदय की उमंग इतनी तीव्र हो कि पैर स्वयंमेव ही थिरक उठें. परसों दोपहर भागवद् पढ़कर कुछ देर के लिए उसे भी ऐसा अनुभव हुआ था ! अभी कुछ देर पहले एक परिचिता का फोन आया, इस महीने क्लब में उनके एरिया को कार्यक्रम प्रस्तुत करना है, उसे कविता पाठ करना है तथा कोरस में भी भाग लेना होगा.
 


Wednesday, October 22, 2014

बंटवारे की याद


आज टीवी पर ‘अमृत कलश’ कार्यक्रम में कोई लेखक व समाज सेवी आये थे, पार्टीशन के समय उनके पाकिस्तान से भारत आने की बातें सुनकर उसे पिता का स्मरण हो आया. वह भी लगभग उसी उम्र के थे जब भारत आये थे. उन्होंने एक प्रसिद्द शेर सुनाया-

हम पर दुःख का पर्वत टूटा तो हमने दो चार कहे
उन पर क्या-क्या बीती होगी जिसने शेर हजार कहे

बाबाजी ने आज ईश्वर कीं शरण में जाने का वास्तविक अर्थ बताया. जहाँ से विचारों का उद्गम होता है वहाँ यदि मन विश्रांति पाना सीख ले तो ईश्वर की शरण अपने आप मिल जाती है. आजकल वह स्थितप्रज्ञ के लक्षणों पर विस्तृत व्याख्यान माला पढ़ रही है जो पिता की डायरी में लिखी है. उन्हें फोन पर धन्यवाद भी देना है पर जब तक स्वतः स्फूर्त प्रेरणा नहीं होगी फोन पर बात करना औपचारिकता ही होगी. माँ के न रहने से पत्र व फोन का उत्साह जैसे खत्म ही हो गया है. सुबह शाम उनकी आँखें उसे देखती रहती हैं. वह अब इस संसार के कर्म बन्धनों से मुक्त हो गयी हैं.

अशुद्ध बुद्धि में आत्मबोध नहीं होता, शुद्ध बुद्धि में ही यह सम्भव है. प्रज्ञा अर्थात शुद्ध बुद्धि तभी प्राप्त होती है जब मन शांत हो, निर्विचार और निर्विकल्प हो और चित्त शुद्ध हो और वह हर क्षण अपने चित्त की निर्मलता को मलिन करने के प्रयास में जुटी रहती है, फूलों को छोडकर कांटे चुनने की आदत जाती ही नहीं, अपने आप को क्रोध से रहित हुआ जानती है फिर किसी दुर्बल क्षण में क्रोध कर बैठती है. कल शाम एक सखी के यहाँ निंदा रस की भागी भी बनी, किसी अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में चर्चा को यही कहा जायेगा न. ज्यादा बोलना भी शुरू कर दिया है जबकि मौन से ही चित्त शांत होता है. अहंकार पीड़ा है, दुःख है, नर्क का द्वार है फिर भी अहंकार पीछा नहीं छोड़ता. समय के एक-एक क्षण का उपयोग करना चाहती है पर सारे कार्य नहीं कर पाती. जून की छुट्टियाँ हों तो ऐसे भी मन बँटा रहता है. नन्हे को खांसी है पर सुबह गरारे नहीं करता, सबकी यही दशा है जो कार्य उनके लिए सुखद हैं वे नहीं करते जो नहीं करने चाहिए वही करते हैं.


कल ‘बुद्ध पूर्णिमा’ का अवकाश था पर उसने एक बार भी महात्मा बुद्ध का स्मरण नहीं किया, अनजाने में नन्हे को हिंदी पढ़ाते समय बुद्ध प्रतिमाओं का विवरण अवश्य पढ़ा था. बुद्ध की हजारों, लाखों प्रतिमाएं विश्व के कई देशों में स्थित हैं, जिनमें उनके चेहरे पर शांति का अनोखा भाव झलकता है, सोयी हुई, खड़ी और बैठी मूर्तियाँ अपने शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं. उनके सान्निध्य में शांति का अनुभव भी होता है. बुद्ध ने जीवन को दुखों का घर कहा था जो सत्य ही था और हर दुःख का कारण है इच्छा, इच्छाओं की उत्पत्ति संकल्पों से होती है, उनको ही नष्ट करना है. इच्छा जब अपने मूल रूप में है, बीज रूप में तभी उसका नाश आसान है, जब वह जड़ पकड़ लेती है तब उसका नाश कठिन है. इस समय उसके मन में कोई संकल्प नहीं है सिवाय आत्मबोध के संकल्प के. उसे नन्हे को सुधारने के संकल्प का भी त्याग करना होगा. जब उसे सुझावों या सलाह की आवश्यकता होगी और जब वह स्वयं इसके लिए कहेगा तभी उसे कुछ कहेगी. ज्यादा बोलना प्रभावशाली नहीं होता, मौन ज्यादा प्रभाव डालता है. इससे घर में शांति भी रहती है और मन भी संकल्प-विकल्प से परे रहते हैं. वह अपने कर्त्तव्य का पालन करती रहे, किसी पर भी अपने विचार न थोपे, इसी में उसकी व अन्य की भी भलाई है. वह अन्य चाहे कितना भी निकटस्थ हो ! हरेक के पास अपनी जीवनदृष्टि है, हरेक में वही परमात्मा विराजमान है. हरेक को वही उसके हित हेतु  मार्गदर्शन देता है. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. वे अपनी ऊर्जा व्यर्थ ही गंवाते हैं जब अन्यों पर अपना अधिकार समझते हैं, साधक को तो इससे बचना चाहिए, साधक की दृष्टि में सभी प्राणी समान हैं सभी उस एक पथ के राही हैं, देर-सवेर हरेक को वहीं पहुंचना है. अपनी-अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार कोई पहले तो कोई बाद में वहीं जायेगा, उस पूर्णता की ओर !    

Monday, August 11, 2014

हाथ में प्लास्टर



हर रात नींद में जाते वक्त सभी संसार का त्याग करते हैं, सोये हुए व्यक्ति और मृत व्यक्ति में क्या अंतर है ? आज बाबा जी ने पूछा. रोज वह सुनती है कि संसार में सब कुछ अनिशचित है, परिवर्तनशील है, एक पल का भी भरोसा नहीं, कल इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया. नन्हा स्कूल से आया तो उसके दाहिने हाथ में दर्द था, बस स्टॉप पर एक लड़का उसके हाथ पर बैठ गया था, उन्हें उसके स्कूल जाना था सो दवा लगाकर वे चले गये. वापस लौटे तो उसके हाथ में सूजन थी और दर्द भी बहुत था. डाक्टर को फोन किया तो उसने आज सुबह एक्सरे करने की बात कही, एक्सरे में हल्का सा फ्रैक्चर है. सोमवार से उसकी छमाही परीक्षाएं हैं, दर्द में है फिर भी पढ़ रहा है. उसकी सहने की शक्ति नूना से कहीं अधिक है. कल सुबह वह परेशान थी तो सारा रूटीन गड़बड़ा गया था, आज सुबह नन्हे के साथ ही बीती. पिछले दो दिन दोपहर की पढ़ाई सिलाई के कारण नहीं कर पायी थी, पिछले दो दिनों की कविताएँ भी शेष हैं.

नन्हा हाथ के दर्द के बावजूद शांत भाव से पढ़ाई में व्यस्त है. पता नहीं सोमवार तक उसका हाथ ठीक हो भी जायेगा या नहीं, ईश्वर को जो मंजूर होगा वही होगा. वे अपनी अल्प बुद्धि का प्रयोग कहाँ तक करें. आज धूप बहुत तेज है, सुबह ही उनकी नैनी ने किचन खाली कर दिया था कि पुताई करने वाले मजदूर आएंगे. कल शाम को एक मित्र परिवार आया, नन्हे को शुभकामना कार्ड और चाकलेट दी उसे भी अच्छा लगा. उसका संगीत अभ्यास में पूरा मन नहीं लग पा रहा था, शायद गर्मी व उमस की वजह से अथवा ‘राग सोहनी’ के छोटा ख्याल की तानें बहुत कठिन हैं.

जो कुछ वह पढ़ती है, सुनती है उसका लाभ मन को सही-सही देखने के रूप में दीख रहा है. जब मन के विपरीत कोई कुछ कहता है तब कैसा विचलित हो जाता है, नसें तन जाती हैं और दुखद संवेगों का chain reaction शुरू हो जाता है. जैसे ही मन ने द्वेष जताया कि उसके विपरीत एक प्रतिक्रिया हुई और फिर उस के विरुद्ध एक और...अगर सजग नहीं रही तो कुछ ही देर में एक नया संस्कार जड़ पकड़ लेगा यदि सजग होकर देखा तो सब कुछ अपने आप विलीन होता जाता है. मन यदि गतिशील हो तो पानी की तरह है ठोस मन पर लकीर गहरी होगी ही. सभी को अपनी बात कहने का हक है, किसी को पसंद हो या न हो, उदार मन से सभी को स्वीकार करना और सुनना सीखना होगा. जून और नन्हा अस्पताल गये हैं, आज नन्हे को परमानेंट प्लास्टर लगाना पद सकता है, उसका दर्द अभी तक कम नहीं हुआ है. उसने बहादुरी से इस चोट का सामना किया है, किसी भी समय उन्होंने उसे उदास नहीं देखा.


पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. आजकल नन्हे के घर रहने के कारण समय कैसे बीत जाता है पता नहीं चलता. कल उसे चोट लगे पूरे आठ दिन हो गये. वे पहले की तरह सुबह जल्दी उठते हैं. जून आज ongc से आए अपने मेहमानों के साथ व्यस्त होंगे. कल शाम नन्हे ने पहली बार कहा कि वह अपने हाथ में लगे प्लास्टर के कारण परेशान हो गया है, सो उसने उसे व्यस्त रखने के लिए कुकिंग में साथ देने के लिए कहा. आज उन्होंने ‘अरबी दम’ बनायी. नन्हे को सारा सामान इक्कठा करने को कहा जो वह पहले भी किया करता था. अभी २-३ हफ्ते उसे और प्लास्टर के साथ रहना होगा. धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि एक हाथ से (वह भी बांया) काम करने पर असुविधा का सामना हर क्षण करना पड़ता है. नन्हा लेकिन अपने सारे काम कर लेता है सिवाय ब्रश पर पेस्ट लगाने के. उन्होंने घर पर किसी को कुछ नहीं बताया है, वे सभी लोग घबरा जायेंगे. एक बार तो फ्रैक्चर हुआ है, सुनकर ही कैसा भय लगता है, पर उन तीनो में से कोई भी भयभीत नहीं है. वे अपनी सामान्य जिन्दगी जी रहे हैं. नन्हा पढ़ाई, टीवी, व कम्प्यूटर में व्यस्त रहता है, शर्लक होम्स के किस्से उसे बहुत अच्छे लग रहे हैं. आज सुबह बड़ी ननद का फोन आया, बाकी कहीं से कोई पत्र या फोन नहीं आया है कई दिनों से. उसका भी अभी कहीं कोई पत्र भेजने का इरादा नहीं है. नन्हे का प्लास्टर खुलने के बाद ही लिखेगी. बाबाजी से रोज सुबह मिलना होता है. उस दिन रात को उसने उन्हें पुकारा था और स्वप्न में आकर उन्होंने जवाब भी दिया था. ध्यान करने का समय सुबह नहीं मिल पाता. नन्हे के स्कूल जाने के बाद ही सम्भवतः सम्भव होगा. शाम को अलबत्ता समय मिल सकता है या निकाला जा सकता है.  

Friday, August 1, 2014

प्रकृति का वैभव



William Bennett is absolutely right when he says that there are no menial jobs, only menial attitudes. Today in the morning itself when mind should be calm and quite, she accused jun for his poor GK, he did not know that yes minister was a serial not a talk show. Then he did not go to see off Nanha because he had no time and necessity to say bye, she should be more patient with them because she is doing practice.

मैं मेरे का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली  तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन रहने वाली चार तरह की बुद्धियाँ अनर्थकारी हैं. ऐसी जो ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसन्धान करने वाली हो, प्रकृति के रहस्यों को समझने वाली उसको सराहने वाली हो, अर्थकारिणी है. ईश्वर का सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है. ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी पर बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, विशाल वन संपदा उसके ऐश्वर्य के रूप में हमें प्राप्त है और उसका वैभव मीठे फलों, पंछियों की बोली और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है. बाबाजी ने यह बताकर आज एक मुल्ला और सिन्धी की कथा भी बतायी, मुल्ला ने कहा, खुदा की खुदाई कोई नहीं जानता, इन्सान के मन की बात कोई नहीं जानता और कयामत का दिन आने वाला है. पर सिन्धी के पास दूसरी तरह की बुद्धि थी, वह नदी दिखाकर खुदा की खुदाई दिखा देता है. कहता है, इन्सान के मन की बात वह स्वयं तो जानता ही है. और कयामत का दिन उसी क्षण आ जाता है जब किसी की मृत्यु होती है.


Today since early morning she is feeling his presence ‘Allah’ this was the first word she uttered and felt inner peace, joy and happiness. They themselves make their life complicated otherwise it is so simple and easy to live in the shadow of God ie all that is good and beautiful. When one leaves everything he gets Him and when one gets Him he gets everything. This is so simple, when her mind is calm she can do all things well. Just now she talked to one friend, her husband’s team could not make to final of Sur-Sangam antakshari. She wrote all five letters with Rakhi’s greetings. Yesterday jun made beautiful cards for  brothers.

Swedish proverb says, God gives every bird his worm, but he does not throw it into the nest. She thought, God gives every man his love but he does not grow it into the mind. Man himself has to grow it, develop it and nurture it, because without love, life is but a desert dry and horrid. To grow the flowers and springs they have to have feelings of love and compassion. When her mind is full of God’s love she is the happiest person on earth. She feels full of energy, directed towards her goal and is more sensitive to others. God is with her in her thoughts and in her heart. Last night she dream t of sour throat and when she got up felt some dryness in throat. They drank tulsi tea and now she is OK. Also she knows deep in her heart that she will be all right when He is with him. Last evening when they came back from walk, one friend’s family was there, while talking with them she noticed that they talked about other people’s personal life . it is not good for a devotee, she has to be careful in future. Today is Nanha’s hindi unit test so he took her pen and this pen is not much good. From today onward she will devote daily one hour for house keeping.



Wednesday, July 9, 2014

मेथी की बड़ियाँ


भारत ने पाकिस्तान को पांच विकेट से हरा दिया, क्रिकेट का खेल उनके दिलोदिमाग पर किस कदर छा गया है कि डायरी खोलते ही पहला वाक्य यही मन में आया. कल शाम को ‘मैडिटेशन’ पुस्तक का एक अध्याय पढ़ते-पढ़ते मन एकाग्र हो गया और कुछ मिनटों के ध्यान के कारण सारी शाम स्वयं को फूल सा हल्का महसूस किया. उसे लगा, पूर्वजों ने जीवन के उद्देश्य, जीने के तरीके और आत्मिक उन्नति के द्वार योग के रूप में खोल दिए हैं, अब यह उन पर निर्भर करता है कि पंक में सने रहें, सांसारिक मोह-माया और उलझनों में ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट कर दें अथवा मुक्त होकर अध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ें. सन्त कहते हैं ज्ञानी के अनुभव को अपना अनुभव बना लेने पर ही बंधन कट  सकता है. तब सुख-दुःख, मान-अपमान, यश-अपयश सभी स्वप्नवत् प्रतीत होते हैं क्योंकि ये सभी आने-जाने वाले हैं और एक चैतन्य ही शाश्वत है. उसी में विश्रांति मिल सकती है. अभी जो बुद्धि कंस की सेविका है जब कृष्ण की सेविका हो जाएगी तभी उसका उद्धार सम्भव है. आज जून वह पत्र पोस्ट कर देंगे जो छोटी बहन को कल रात उसने लिखा था कविताओं के साथ.

आज उसने सुना, “इच्छा पूर्ति में पराधीनता है, जड़ता है, इच्छा निवृत्ति में स्वाधीनता व चेतनता है. निष्काम होने का सुख बड़ा है, सकाम होने का दुःख उससे भी बड़ा. जो मन इच्छाओं से तपे वह कैसे दर्पण की भांति अंतर की पवित्रता को दर्शा सकता है. ‘नाम जप’ इसमें सहायक होता है”. सुबह जून ने धूप में बड़ी डालने में उसकी सहायता की, कल रात मेथी साफ़ कर दाल पीस कर तैयारी कर रखी थी. जून उसके घर में रहने से पहले की तरह खुश रहने लगे हैं, उनके स्वप्नों का घर फिर मिल गया है.

“मानस की गहराइयों में जाकर सारे विकारों को दूर करने का काम ही विपशना है. इसके लिए मन को नियंत्रित करना होता है, शील-सदाचार का पालन करना होता है और यह निरंतर होना चाहिए. सहज स्वाभाविक रूप से साँस को देखते रहना मन को एकाग्र करने का सर्वोत्तम साधन है”. आज जागरण में श्री गोयनका जी ने विपशना पर प्रवचन माला आरम्भ की है, अच्छा होगा यदि कल भी वे आयें लेकिन यदि न भी आये तो उसे विक्षोभ नहीं होगा क्योंकि समभाव रहकर मन को इच्छाओं से मुक्त रखने का प्रण श्रीकृष्ण के सामने लिया है. कल दोपहर उसने गीता को पुनः पढ़ा, कल से पहले न जाने कितनी बार पढ़ चुकी है पर वह पढना मात्र पढ़ना ही था उसका अर्थ समझने का सामर्थ्य उसमें बिलकुल नहीं था, कल उसका अर्थ अपने आप ही समझ में आने लगा और उसे लगता है यह ईश्वर की कृपा का फल है वह तभी किसी के अंतर में प्रकट होता है जब हृदय शुद्ध हो, भावनाएं उद्दात हों और निस्वार्थ भाव से मात्र ज्ञान के लिए ज्ञान की आकांक्षा हो. नन्हा और जून दोनों घर पर नहीं हैं, वह भी चली जाती थी तो उनका यह घर अकेला बंद रहा करता था, कितना सन्नाटा होता होगा यहाँ, अब इतने दिनों बाद घर पर रहना अच्छा लगता है. जून का शुक्रगुजार होना चाहिए. उस रात उसने जो कठोर वचन कहे थे वे सम्भवतः नियति ने ही कहलवाए थे. उसे लग रहा था कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है, बिखर रहा है. जून की बातें तब समझ में नहीं आती थीं, अब स्पष्ट हो रही हैं. उसका सही स्थान उनका घर ही है. मन की साधना करने के सारे उपाय यहीं मिल सकते हैं.