Friday, May 24, 2013

चन्द्रकान्ता संतति- एक रोचक उपन्यास


कल दोपहर का भोजन उसने दो सखियों के साथ खाया, अच्छा लगा, संयोग था कि सभी अकेली थीं. आज राई का पेस्ट बनाया गाजर की कांजी के लिए. शाम को टी.टी खेलने गये, बहुत दिनों बाद, बाहर हरी घास पर स्किपिंग भी की, ठंडी हवा चेहरे पर भली मालूम पडती थी. आज साइकिल से एक सखी के यहाँ जाएगी. कल तीन पत्र आये, एक दीदी का भी जो चाहती हैं, अगला पत्र वह अंग्रेजी में लिखे. उनके भारत आ जाने पर तो वे उनसे मिल ही पाएंगे अगले एक दो वर्ष में. आज अभी तक नैनी नहीं आई है, लगता है चावल आज कड़ाही में बनाने होंगे.

 दोपहर के डेढ़ बजे हैं, मन में कई विचार लिए वह अपने करीब आना चाहती है. आज सुबह  सब कार्य समय पर हो गया, यहाँ तक कि नन्हे के फोटो के लिए भी पांच मिनट का समय मिल गया. लेकिन उसने आज तक कैमरा हैंडल ही नहीं किया था सो बैटरी बदलने के चक्कर में रील एक्सपोज हो गयी लगती है, जून ने कहा तो है, पूरी रील खराब नहीं होगी, कैमरे के बारे में कितनी कम जानकारी है उसे, परसों लाइब्रेरी से इस विषय पर कोई किताब लाएगी. जून आज सासोनी गये हैं, देर से आने को कहा है, उसने स्पेशल बाथ लिया समय का सदुपयोग करते हुए. सुबह फूफाजी का पत्र आया, उन्हें कई बार नया पता लिखने के बावजूद वह जून के पुराने पते पर ही पत्र भेजते हैं, यह तो अच्छा है, वे लोग उनके विभाग में भेज देते हैं. उनकी असमिया की कक्षा आज है पर उसे लगता है, जब तक बोलने का अभ्यास नहीं होगा कोई लाभ नहीं है. आज उसने पहली बार करी पत्ते की चटनी बनाई जो जून को पसंद आई.

आज ऐसा लग रहा है जैसे गर्मियों का मौसम आ गया हो. नन्हे को दिगबोई में गर्मी लग रही होगी, आज वह दोस्तों के साथ वहाँ गया है, स्कूल की तरफ से. कल रात उनके पुराने परिचित, पंजाबी दीदी के पति खाने पर आये, साढ़े दस बजे वे गये. उसे लगता है, उन्हें भोजन अच्छा लगा. पर हर बार किसी को खाने पर बुलाने से सब्जियां बच जाती हैं, उसे बासी खाना पसंद नहीं, पर...वे तेजपुर से बेंत की जो बैलगाड़ी लाये थे, वह उसने दीदी के लिये भिजवाई, वे मट्ठियाँ और बर्फी लाये थे. आज सुबह वह पड़ोसिन के यहाँ अपने बगीचे की एक पत्तागोभी लेकर गयी पर उसने उससे बहुत बड़ी गोभी अपने बगीचे से निकल कर उसे दे  दी. पिछले दरवाजे पर दस्तक हुई है शायद, शिबू आया है, उसकी किताब का एक पेज थोड़ा सा फट गया है, वह थोड़ा परेशान है, उसे सेलोटेप से जोड़ देना चाहिए. कल उन्हें तिनसुकिया जाना है, अगले महीने घर भी जाना है और उसके बाद दो माह की गर्मी की छुट्टियाँ...वे चन्द्रकान्ता सन्तति के शेष भाग तब पढ़ेगी, नन्हे को भी बहुत अच्छा लग रहा है तिलिस्म भरा कथानक. जून आज भी कोई पत्रिका नहीं लाये, पहले जब वह मैगजीन क्लब के ऑर्गेनाइजर नहीं थे, हर दिन घर में एक पत्रिका आती थी, पर अब वह भूल जाते हैं.





Wednesday, May 22, 2013

ईद की सेवइयाँ



मार्च की पहली तारीख, पर मौसम कितना ठंडा और भीगा है, कमरे में हीटर जल रहा है,  जैसे जनवरी का कोई दिन हो. नन्हा स्कूल गया है, उसने सोचा उसे भी ठंड लग रही होगी, वह तो अच्छा हुआ, स्काउट की ड्रेस पहन कर नहीं गया. उसे याद आया वे भी बचपन में बेहद ठंडे दिनों में स्कूल जाया करते थे. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, कैरम खेला और रुबिक क्यूब बनाया, आज उसने बीस मिनट में ही ‘रुबिक क्यूब’ बना लिया.

कल सुबह से ही उसे असमिया क्लास की प्रतीक्षा थी, पर शाम को उनके सहपाठीजनों  का फोन आया कि आज वे नहीं आ पाएंगे, उसे खराब लगा और उसकी आवाज की तल्खी जरुर उस तक पहुँची होगी, उन्हें जिम्मेदारी का थोड़ा सा भी अहसास नहीं है. कल नन्हे का एडमिशन लेटर भी आ गया, खशी तो है ही पर जून की बातें और उनके व्यव्हार से यही लगा कि ज्यादा फ़ीस को लेकर वह चिंतित हैं. नन्हा खुश है यही बात मन को संतोष देती है. आज कई दिनों बाद धूप निकली है, गमलों में जरबेरा के सात फूल खिले हैं, और इम्पेशेंट के छोटे-छोटे गुलाबों जैसे फूल भी.

परसों सुबह उसने जून की पैसों को लेकर चिंता के बारे में लिखा था वह शत प्रतिशत सही लिकला. जब जून खाना खाने आये, उन्होंने प्रिंसिपल से बात की और निराश हुए, बात दरअसल पर्सनल मैनेजर से ही हो सकी, हर वर्ष १५% से २०% की बढ़ोतरी भी वार्षिक खर्च में होगी. वे दोनों ही परसों दिन भर उदास रहे, शाम को अमिताभ बच्चन की एक फिल्म लाये. कल ईद की छुट्टी थी दोनों की, उसने सेवइयाँ बनाई थीं. शाम होने तक वे काफी सामान्य हो चुके थे. जून के ऑफिस में कम्प्यूटर गेम खेला. और फिर एक मित्र के यहाँ गये, वह एक और मित्र भी थे, फिर तो बहुत बातें हुईं, सार यही निकला क नन्हे को तीन-चार वर्ष के बाद बाहर भेजना ज्यादा अच्छा रहेगा, तब तक उन्हें पैसों का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए. कल शाम को ही पड़ोसी भी आ गये, उन्हें भी शायद नन्हे की पढ़ाई के बारे उत्सुकता रही होगी. जून ने फैक्स भी भेजा है और किन्हीं श्री बोरबोरा से बात भी करने वाले हैं जिन्हें ज्यादा फ़ीस की वजह से अपने बेटे को वापस बुला लेना पड़ा था. आज फिर बदली छाई है, दिन में भी शाम जैसा अहसास हो रहा है. कल रात उन्हें फिर नींद नहीं आ रही थी, जून ने कहा फिल्म देखते हैं, ऐसा वह कम ही कहते हैं, सवा बारह बजे वे सोये पर उसके बाद भी परेशान करने वाला वही स्वप्न आया जो कई बार पिछले दो वर्षों में आ चका है.


Tuesday, May 21, 2013

शिवरात्रि का व्रत



सोमवार की सुबह वे तेजपुर के लिए रवाना हुए. नन्हे के इन्टरव्यू के बाद परसों, मंगल की शाम को वापस आये. कल सुबह घर व कपड़ों की सफाई में गुजर गयी. जून को पूरा विश्वास है, दाखिला हो जायेगा. उन्हें स्कूल की इमारत काफी शानदार लगी, अभी फर्नीचर वगैरह नहीं थे कक्षाओं में. पहली अप्रैल से स्कूल शुरू हो रहा है. इतने कम समय में कैसे होगा और अभी टीचर्स का इन्टरव्यू भी होना शेष है. लेकिन ये सब स्कल वालों की समस्याएं हैं. उनके सामने  है, नन्हे की कक्षा तीन की वार्षिक परीक्षा. जिन बातों का कोई हल नहीं उन्हें वक्त पर छोड़ देना ही बेहतर है. नन्हे ने कल पहली बार स्वयं बोर्डिंग स्कूल जाने को कहा, वे जानते हैं, वह  वह खुश रहेगा और कक्षा में अच्छे विद्यार्थियों में से भी. तीन महीने शुरू में रहने के बाद दो महीने की छुट्टियाँ होंगी. जिन्दगी में परिवर्तन होगा, पिछले नौ-दस सालों से चली आ रही जिन्दगी में.
आज फिर कुछ दिनों के अन्तराल के बाद डायरी खोली है. कुछ दिन अस्वस्थता और फिर अव्यवस्था, यानि ओढ़ी हुई व्यस्तता. आज माह का अंतिम दिन है. सुबह से वर्षा के कारण  मौसम काफी ठंडा हो गया है. कल शाम नन्हे को जून ने किस बात पर डांटा तो वह बहुत रोया, उसके डांटने पर वह इतना परेशान कभी नहीं होता. कल शिवरात्रि का व्रत था, जून ने भी उसका साथ दिया और उन्होंने सिर्फ फलाहार किया, शाम को मन्दिर गये पर विधि के अनुसार पूजा करना उसे आता ही नहीं है, सिर्फ दर्शन करके आ गये. पिछले कई महीनों से उसने कोई कविता नहीं लिखी, अपने आप से सम्बोधित होते हुए अपने करीब जाते हुए कतराने लगी है, कविता तभी उपजती है जब अपने अंतर में झांक कर पूरे दिल से कुछ महसूस करें, ऊपर –ऊपर से शान्त दिखने वाल मन रूपी सागर के अंदर जो खलबली मची है उसे देखना होगा, एक दर्द से दो चार होना पड़ेगा, पिछले दिनों जून धर्मयुग की कई प्रतियाँ एक साथ लये, क कविताएँ उनमें अच्छी थीं. छोटी बहन ने उसके खत का जवाब नहीं दिया, अपनी जिन्दगी की बागडोर जब तक वह स्वयं अपने हाथ में नहीं लगी, खुश नहीं रह पायेगी, जितनी जल्दी यह बात समझ ले अच्छा है. ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर लिखी कविता के लिए उन्हें पुरस्कार मिला है, हिंदी दिवस पर एक नारे के लिए भी एक पुरस्कार घोषित हुआ था. एक  स्वेटर पूरा हो गया है, अब दूसरा शुरू किया है.





Monday, May 20, 2013

गोल्फ फ़ील्ड में भ्रमण



कल दोपहर उसने टमाटर प्यूरी बनाई, उनके घर में उगे टमाटर अब साल के उन दिनों में भी उनका साथ देंगे जब वे बाजार में नहीं मिलते. परसों शाम उन्होंने ‘अलादीन’ फिल्म देखी. बहुत अच्छी लगी. कल शाम उसकी बंगाली सखी ने खाने पर बुलाया था, उसे अच्छा लगा, उसकी बातें अच्छी लगती हैं, और वह जानती है कि वह भी उसका साथ पसंद करती है. उसने शाम को क्लब में होने वाले “संगीत कार्यक्रम” में जाने के लिए कहा है, उसने सोचा यदि जून और नन्हा मान जाएँ तो वह जा सकती है.

अज भी ठंड ज्यादा है, उसने सारे काम निपटा लिए और हीटर के सामने आ गयी, जून का कहना है कि उसके घर आने से पूर्व खाना बिलकुल तैयार होना चाहिए. छह खतों के जवाब लिखे. जून एक स्वास्थ्य पत्रिका भी लाये हैं, जो वह तभी लाते हैं जब घर में कोई अस्वस्थ होता है.
आज मन में एक विचार आया है क क्यों न धूप में कुछ देर टहल आया जाये, इस समय सडकें भी खाली होती हैं. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, उनके पिता आए हुए थे, उसने सोचा तेजपुर से लौटकर वे भी उन्हें अपने घर बुलायेंगे, इतना लिखकर वह गोल्फ फील्ड तक टहलकर आयी है, कुछ दूर फील्ड के अंदर भी गयी, सूखी घास पर, सूखे पत्तों पर चलना अच्छा लग रहा था. कल रात वर्षा के साथ तूफान भी आया, उनके बगीचे में कई नाजुक पौधे जमीन पर गिर गये हैं, उसने सहारा देकर उन्हें खड़ा तो कर दिया पर बाद में माली ही उन्हें ठीक से सम्भालेगा. आज धूप में कई दिनों बाद तेजी है, वह चटाई पर बैठी है पिछले बरामदे में.

  कल शाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनकी ‘असमिया क्लास’ हुई. उसके कुछ देर बाद उसकी असमिया सखी आ गयी, उसके साथ वह बहुत अपनापन महसूस करती है. नन्हा कल शाम फिर कह रहा था, बोर्डिंग स्कूल नहीं जायेगा, पर बाद में उनके समझाने पर मान गया, यदि उसका दाखिला हो जाता है तो उसके भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा. वह कहाँ रहकर पढ़ेगा यह तो भविष्य ही बतायेगा.

अभी अभी उसकी हमराशि पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, लिखने का क्रम टूट गया तो अब कुछ मुश्किल हो रही है विचारों को पकड़ पाने में, मन कितना तेज भागता है. इस एक पल में जब वह एक वाक्य लिखती है, मन में एक पूरा विचार अंकित होकर जा चुका होता है. ऐसी कोई मशीन कभी न कभी बनेगी जो मन के एक एक भाव को पकड़ सके. ऋषि-मुनियों ने इसी भागते हुए मन को लगाम लगाने का प्रयास तपस्या के बल पर किया था. उसका सारा प्रयास उस वक्त व्यर्थ चला जाता है जब वह मन ही मन गीता पाठ करती है. उस दिन उसकी सखी ने ठीक ही कहा था, बोल कर पाठ करने से मन जल्दी एकाग्र होता है.  




Friday, May 17, 2013

तेजपुर का स्कूल



फरवरी का प्रथम उजला-उजला सा दिन ! दोपहर को जून जब गये तो अख़बार उठाई पढ़ने के लिए, उसके नचे ही एक पत्रिका दिख गयी, उसने ऐसा बांधा कि...ये सितारे भी किसी जादूगर से कम नहीं होते, अपने आकर्षण में खच ही लेते हैं, खास तौर से उस जैसे कमजोर इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति को...अब दोपहर के दो बजे हैं, नन्हा कह गया था एक बजे तक लौट आएगा पर अभी तक नहीं आया है, सम्भवतः अब जून उसे अपने साथ लायेंगे लौटते वक्त. सुबह उसने वाशिंग मशीन लगाई, मच्छरदानी धोयी जैसा कि उसे मालूम था, जून ने कहा, क्या जरूरत थी, साफ तो थी. कल नन्हे का एडमिशन कार्ड भी आ गया, इसी माह की तेरह को तेजपुर जाना होगा. स्कूल की इमारत आदि सब देखकर आएंगे, शायद देखने के बाद नन्हे का मन परिवर्तित हो. टीवी पर ‘शांति’ शुरू हो गया है, अब वह स्वेटर बुनेगी, तीनों भांजियों के लिए स्वेटर बना रही है, चमकदार पीले रंग की ऊन से.

  आज टीवी पर केरल के इमरान खान की, सोलह राज्यों की ४४९ दिनों की दौड़ कर की गयी यात्रा का, विश्व रिकार्ड बनने की खबर सुनकर मन प्रेरित हुआ और अपनी दिनचर्या को सुचारू रूप से चलाने का भाव उदित हुआ. जीवन क्षण भंगुर है और जिसे पलों में जीना आ जाता है वह अनंत में जीता है. जो हो चुका उस पर उनका वश नहीं और जो होगा वह वे जानते नहीं. तो वर्तमान जो उनका अपना है क्यों न ख़ुशी ख़ुशी जिएँ... उद्देश्य पूर्ण, क्रियाशील और सारे आरोपों, प्रत्यारोपों से परे. कल शाम उसने काले चने बनाये थे, जून के एक मित्र भी आये थे, दोनों को पसंद आये. आज नन्हे की पसंद पर मटर-पनीर बनाया है. उसके स्कूल में सोशल साइंस की विशाल प्रदर्शनी लगी है, जून ने भी कल देखी, और वापस आते समय उन्हें काफी देर हो गयी थी.

आज सरस्वती पूजा है, वसंत पंचमी अर्थात फूलों का मौसम. अगले शनि-रवि को क्लब में फ्लावर शो और गार्डन कम्पीटीशन है. कल तीन खत मिले, छोटी बहन, मंझले भाई व माँ-पिता के. छोटे भाई का पत्र पहले ही आ चका है, दीदी का पिछले महीने आया था, एकाएक सारे भाई-बहन उसके करीब आना चाहते हैं. छोटे भाई ने लिखा था जब भी वह खुश या उदास होता है, उन्हें अपने करीब पाता है. छोटी बहन ने लिखा है कि वह जानती है वे उसकी बात सुनेंगे अनसुनी नहीं कर देंगे. उसका खत पढ़कर थोड़ी सी हँसी भी आई और उदासी भी, वह अभी तक ससुराल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पायी है. उसको जवाब लिखा तो है, पता नहीं उसे पकर साहस मिलेगा अथवा वह यह सोचेगी कि उपदेशों की उसे जरूरत नहीं है. जून ने भी कल रात उसे व उसके पति को पत्र लिखा. कल शाम एक मित्र के यहाँ एक नया बोर्ड गेम खेला. घर में आज काम चल रहा है, सुबह आठ बजे से ही खट-खट  की आवाजें आ रही हैं, जो खल तो रही हैं पर काम एक न एक दिन तो होना ही था, कुछ दीवारों में क्रैक आ गये हैं. नन्हा आज घर में है, उसने सोचा आज वह उनके साथ ही ग्यारह बजे लंच करेगा, रोज स्कूल में साढ़े बारह बजे तक उसे इंतजार करना पड़ता होगा टिफिन टाइम का. आज वह पीले चावल बनाएगी तथा प्याज, टमाटर, धनिये का रायता और मिक्स्ड वेजिटेबल.


बथुए का रायता


  



पिछले हफ्ते बुध को दोपहर में पुरानी पड़ोसिन के यहाँ गयी, बृहस्पतिवार को मौसम बेहद ठंडा था, सुबह साढ़े दस बजे तक कोहरा छाया था, शुक्र को तबियत कुछ नासाज थी, शनी-इतवार वैसे ही व्यस्तता बढ़ जाती है, और अब आज सोमवार हो गया है, सुबह से अभी तक सभी कुछ सामान्य है, आज खतों के जवाब का दिन भी है, दीदी का पत्र भी पिछले हफ्ते आया है. देवांग पर जो कविता वह लिखने वाली है, एक पंक्ति  और मिली है, उसी ईश्वर ने  दी है, जिसे एकमात्र उपहार जो वह दे सकती है, वह है ‘प्रेम’, ईश्वर ने हर बार उसे मार्ग से विचलित होने से बचाया है. कल दोपहर एक पल के लिए जून झुंझला गये थे, पर बाद में अपने ढेर सारे स्नेह से भिगो ही तो दिया. वह सचमुच उसे और नन्हे को बेहद-बेहद प्रेम करते हैं. उन तीनों का ही वजूद एक-दसरे से है, एक के बिना दूसरा कुछ भी नहीं.

 आज फिर तीन दिनों के बाद डायरी खोली है. कल वे इन सर्दियों की आखिरी पिकनिक पर गये, आनन्द उतना तो नहीं आया पर अच्छा ही था. आज उसके मुंह का जायका जीभ में हो गये छाले की वजह से कुछ अजीब सा हो गया है, शायद गार्गल करने से कुछ ठीक होगा.  सुबह नन्हे से वह किसी बात पर नाराज हो गयी, उसे सॉरी बोलना चाहिए था, पर सारा काम चुपचाप खुद करता रहा, बिना एक भी शब्द बोले, जाते समय भी यही कहा, माँ, हो गया. उसे थोड़ा कठोर होना पड़ा पर उसे यह सिखाना जरूरी था कि सॉरी बोलने में कोई हर्ज नहीं. आज मौसम अच्छा है, उसके सारे सुबह के काम भी हो चुके हैं, फिर भी एक नामालूम सी बेचैनी है, शायद छाले की वजह से या स्कूल जाते समय नन्हे की आँखों में छलक आये दो आंसुओं की वजह से. वैसे भी ग्यारह बजने में सिर्फ बीस मिनट हैं, उसे अभी दाल में तड़का लगाना है, बथुए को मसलकर दही में डालना है, सलाद काटना है और फुल्के सेंकने हैं. सो लिखना यहीं बंद. आज जून को मिले नये साल के सारे ओफ़िशिअल कार्ड्स को भेजने वालों की लिस्ट बना दी है, देखें अब वे इसका इस्तेमाल भी करते हैं या नहीं ?

जनवरी का महीना देखते-देखते ही बीत गया, यानि नया साल एक महीना पुराना हो गया. आज स्वस्थ अनुभव कर रही है, सामान्य ढंग से बात भी कर पा रही है, शायद यह बाहर खाना खाने की वजह से हुआ हो, खैर अब सब ठीक है तो इन पलों को कायदे से जीना चाहिए. सुबह कुछ पलों के लिए कुछ अच्छा सा फिर नहीं लग रहा था फिर एक गिलास पानी पिया और ईश्वर को याद किया, जिसे आजकल ज्यादा ही याद करने लगी है, कबीर दास ने सही कहा है, दुःख में सुमिरन सब करे...नन्हे का स्वेटर बन गया है, बांह की सिलाई शेष है, अभी करे तो वह स्कूल से आकर पहन सकता है. कल दोपहर टीवी पर एक फिल्म देखी, “संध्या छाया” बहुत मार्मिक थी, बुढ़ापे में आदमी इतना अकेला हो जाता है ?



Thursday, May 16, 2013

चॉकलेट, फूल और कार्ड्स



दोपहर के पौने एक बजे हैं, वह पीछे वाले बरामदे में चटाई पर धूप में बैठी है, हल्की खुमारी वातावरण में है. भोजन के बाद उन्होंने धूप में ही विश्राम किया रोज की तरह और झपकी लग गयी, दही, खिचड़ी व मीठी गाजर की सब्जी का भी योगदान रहा होगा इस नींद में. जून ने कहा है, उनका मोजा आज पूरा कर दे, शाम को वह पहनना चाहते हैं, वह संडे मैगजीन पढ़कर ही बुनना शुरु करेगी. धूप एकाएक चली गयी है, शायद बादल का कोई बड़ा टुकड़ा सूरज के सामने आ गया है. नन्हा आज सुबह ठंड से बहुत डर रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया. उसने सोचा, अपने आप होस्टल में सभी काम कैसे कर पायेगा. कल शाम उन्होंने स्क्रेम्ब्लर खेला, वह जीत गया बहुत खुश था जीतकर.

आज सुबह कुछ वक्त “फिरदौस” देखने में गुजरा, और कुछ जमीन-आसमान. आयशा की हालत देखकर ही अशरफ को समझ आयेगी. उधर स्मृति को एक बार फिर जुगल धोखा देकर जा रहा है, बेचारा जुगल अपनी अब तक की करनी का फल भुगत रहा है. आज जून उसके लिए एक चॉकलेट लाये और बहुत स्नेह से शुभकामनायें भी दीं, उसे उम्मीद थी कि एक कार्ड भी लायेंगे, उसने शिकायत भी कर दी मजाक में ही सही कंजूस कहकर, पर उनके जाने के बाद सोचती रही, फूल, कार्ड आदि उतने महत्वपूर्ण नहीं जितना मन का प्यार. महीनों पहले से इस दिन के बारे में सोचती आ रही थी की विवाह की दसवीं सालगिरह कुछ विशेष होगी, पर रोज की तरह ही आज का दिन भी बीत जायेगा और जिन्दगी यूँ ही चलती चली जाएगी. यदि कल नन्हे का टेस्ट न होता तो आज शाम वे एक छोटी सी पार्टी का आयोजन करते. माँ-पिता और मंझले भाई की शुभकामनायें मिली हैं. अभी थोड़ी देर बाद वे शादी का अलबम देखेंगे  फिर टहलने जायेंगे जनवरी की ठंडी शामों को स्कार्फ, स्वेटर से लदे-फदे टहलने जाने का अपना ही आनन्द है.

जून की फरमाइश है, मैदे के नमकपारे बना कर रखे, अभी शुरू करने से दो बजे तक बन जायेंगे.
उसी दिन जिस दिन नमकपारे बनाये थे शाम को गिरकर नन्हे ने अपना सामने वाला दांत तोड़ लिया पूरा नहीं सिर्फ एक कोना, पर वे तीनो ही उस शाम बेहद उदास हो गये थे. जिसका असर अगले दिन भी रहा, पर शाम को लोहड़ी मनाते मनाते वे उसका दर्द भूल गये. शनी और इतवार अरुणाचल की अलौकिक सुन्दरता को निहारते गुजरे. कल यानि बीहू का अंतिम अवकाश, आराम करते हुए. आज नन्हा स्कूल गया है और जून दफ्तर. कल शाम खांसी से नन्हे को वमन हो गया, नागमणि अच्छी है रजाई का खोल खंगाल कर गयी है. अब बाकी का काम जून करेंगे, आज उसका रेस्ट डे है इस तरह के कामों के लिए. वर्षों पहले स्कूल में थी तब डायरी में यह बात लिखी थी तो उसकी सखी कितना हंसी थी, जाने कहाँ होगी अब वह ?


Wednesday, May 15, 2013

चांगलांग - अरुणाचल प्रदेश का सुंदर शहर



नये वर्ष का शुभारम्भ हुए तीसरा दिन है, पिछले दो दिन वे सभी मित्रो से मिलकर नये वर्ष की मुबारकबाद देने में व्यस्त रहे, कल दो गुलाब के पौधे अपने बगीचे में लगाये, मैरून और हल्का नारंगी रंग का गुलाब, अब छह रंगों के गुलाब उनके बगीचे की शोभा बढ़ा रहे हैं. डहेलिया में हल्के पीले रंग का पहला फूल खिला है लाल बस खिलने को है. सर्दियां अपनी चरम सीमा पर हैं इन दिनों, पानी इतना ठंडा कि हाथ लगाने से डर लगता है. नन्हे का स्कूल क्रिसमस के अवकाश के बाद आज खुला है. घर कितना शांत लग रहा है इस समय. ईश्वर की दया का, कहना चाहिए स्नेह का एक और उदाहरण अज ही सम्मुख आया, वह हर वक्त सबकी सहायता करता है बस एक पुकार ही काफी है. कल उसकी उड़िया सखी चली जाएगी फिर न जाने कब मिलना हो, अपने उस दिन के व्यवहार से उसके पतिदेव ने उनलोगों के जाने का दुःख हल्का कर दिया है, इसके लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए. जून ने कल फोन पर दोनों घरों में सभी से बात की, उनके घर फोन लग जाने पर कितना आसन होगा सभी के समाचार लेना.

सुबह दस बजे की सुनहली धूप में बालों को सुखाने के लिए कुछ वक्त चुरा लेना कितना भला लग रहा है, अभी किचन में आधे घंटे का काम शेष है. कल शाम जून को वह टोपी, जो उसने अपने दिल का सारा प्यार पिरोकर बुनी है, बहुत पसंद आई. अब उनके लिए वुलेन बूटीज शुरू की हैं. कल शाम उन्होंने ‘पपीहा’ फिल्म का शेष भाग देखा, अच्छी लगी सई परांजपे और उनकी बेटी विनी की यह फिल्म. कल माँ का नन्हे के लिए बनाया स्वेटर व हैट मिल, दोनों बहुत सुंदर हैं, जादू है उनके हाथों में. छोटी बहन का कार्ड और छोटा सा खत भी. मंझले भाई का पत्र भी आया है, नये वर्ष के कार्ड्स भी हर दिन आते ही जा रहे हैं.

  कल शाम वे क्लब गये, वहाँ की साज-सज्जा काफी बदल गयी है, पहले से ज्यादा सुंदर लग रहा है. इस बार क्लब मीट में वे नहीं जा पाएंगे. उसी दिन नन्हे को लेकर डिब्रूगढ़ जाना है एडमिशन टेस्ट दिलाने. सुबह-सुबह नाश्ते के लिए सब्जी काटने से खास तौर पर आलू काटने से उसके दायें हाथ का अगूँठा कितना मैला सा लग रहा है, अचानक उसका ध्यान जब हाथ पर गया तो उसने सोचा अबसे दस्ताने पहन कर सब्जी काटेगी. जून ने बताया, ‘चांगलांग’ जाने के लिए इनर लाइन परमिट तथा गेस्ट हाउस में बुकिंग के लिए कह दिया है, बीहू की छुट्टियों में वे वहाँ जायेंगे.    

Tuesday, May 14, 2013

राज भाषा हिंदी



जून के दफ्तर में आज पार्टी है, उन्हीं अधिकारी का विदाई समारोह, वह लंच पर घर नहीं आएंगे, अभी फोन पर बताया, अज सुबह उनकी पत्नी, जो उनके क्लब की सेक्रेटरी भी रह चुकी हैं, के बारे में सोचते-सोचते उसकी आँखें भर आयीं, वह एक बार उन्हें घर बुलाना चाहती है, पर जून नहीं चाहते, उसके जोर देने से शायद मान भी जाएँ. कल शाम वे कितने व्यस्त थे. नन्हा स्कूल से आया तो गृहकार्य करवाने के बाद उसके एक मित्र के घर ले गये उसका जन्मदिन था, जून छोड़कर आये तो साढ़े पांच हो चुके थे, पुनः एक घंटे बाद लेने गये, बाद में आठ बजे उन्हें फिर डिनर पार्टी के लिए जाना था, उन्हीं अधिकारी के यहाँ. उनका बनाया खाना तो उसे पसंद नहीं आया, सूप कुछ ठीक था, और उनका किचन देखा तो बेहद आश्चर्य हुआ, इतना टिपटॉप रहने वाली महिला का किचन इतना बेतरतीब व बिखरा हुआ था कि...सही है किसी का बाहरी रूप देखकर उसको सही रूप में नहीं जाना जा सकता. रात लौटने में देर हो गये हो गयी, नन्हे को नींद नहीं रही थी वापस आकर, उसकी आँखों में भी दर्द हो रहा था, सुबह सभी कुछ देर से उठे. कल अंततः सोफा बैक पूरा हो गया. अब नन्हे का हाई नेक बनाना है, उसके बाद वीसीआर का कवर पूरा करना है जो गर्मियों की एक दोपहर को एसी रूम में बैठकर शुरू किया था सम्भवतः जुलाई या अगस्त में. आज शाम को उसने भी एक परिवार को खाने पर बुलाया है. कुछ देर पूर्व उसकी बंगाली सखी का फोन आया कि उसका या नूना का सेंट्रल स्कूल का इन्टरव्यू लेटर अभी तक क्यों नहीं आया, जबकि वह इस बात को लगभग भूल ही चुकी थी, जब वह याद दिलाती है तभी याद आता है वरना...

  फिर तीन दिनों की चुप्पी लेकिन आज कहने को बहुत कुछ है, नन्हे की पहली छमाही परीक्षा हिंदी की है, सुबह उठा तो समय पर किन्तु वही हर बार की तरह एक नामालूम सी घबराहट व बेचैनी ने घेरा हुआ था, उसने उसे सामान्य रखने का भरसक प्रयस किया पर वह  ठीक से नाश्ता करके नहीं गया. शायद वे भी बचपन में परीक्षा के पहले दिन थोड़ा नर्वस हो जाते होंगे, और कुछ खाने की इच्छा नहीं होती होगी. आज क्लब की पत्रिका के लिए कविता देने की आखिरी तारीख है, और वह सोच रही है, इस बार कोई नई कविता लिखे, अपने उहापोह, संशयों से उबरने का इससे अच्छा साधन भला और क्या हो सकता है. कल शाम उसकी असमिया सखी अपने बगीचे के सेम देने आई, उनके बगीचे में इस वर्ष ऐसा कुछ नहीं हुआ जो बांटा जा सके. कल क्लब में सोविनियर की मीटिंग भी हो गयी, जून और वह गये थे, पन्द्रह मिनट में ही लौट आये, अभी तक उसकी कविता के अतिरिक्त हिंदी में लेख एक भी नहीं आया था, हिंदी राज भाषा हो या राष्ट्र भाषा लोग अंग्रेजी को ही प्राथमिकता देंगे.  
  ईश्वर के हीटर यानि सूर्य की ऊष्मा को ग्रहण करते धूप में बैठकर लिखने का इस वर्ष का पहला सुयोग है, इस वर्ष की जगह इन सर्दियों का कहना ही ठीक होगा. कमरे में सिहरन सी होने लगी थी, इस वर्ष गर्मी की तरह सर्दी भी ज्यादा पड़ रही है. फोन की घंटी बजी उसने सोचा पड़ोसिन का होगा, दोनों का नम्बर एक ही है, अपना फोन नहीं होने पर दुबारा फोन करने के लिए कहना होता है. पर जून का ही था, हाफजान जायेंगे.   

  आज पूरे एक सप्ताह बाद लिखने बैठी है, पिछले दिनों काफी कुछ घटा, नन्हे के इम्तहान हो गये. फिर क्लब की पत्रिका के लिए सामग्री का चयन आदि किया, टाइप होकर आ जाने के बाद एक बार फिर गलतियों का निरक्षण यानि प्रूफ रीडिंग करनी होगी. जीजीएम के भाषण का हिंदी अनुवाद जून और उसने किया उस दिन, पूरे ढाई घंटे वे बैठे रहे. शायद उन्हें पसंद आया हो. कल शाम वे एक उड़िया मित्र के यहाँ गये, शुरु में तो अच्छा लगा पर उसके बाद   उन मित्र ने अपने सभी सहकर्मियों की जिनके साथ पिछले दस-ग्यारह वर्ष से काम किया निंदा करनी शुरू की, मन बेहद उदास हो गया घर आकर काफी देर तक यही सोचती रही, कल शाम जून की मदद से उसने रजाई का खोल सिला, शनिवार तक रजाई भर जाएगी और कम्बल से जून को छुटकारा मिल जायेगा, उन्हें उसमें जरुर ठंड लगती होगी.

  वर्ष का अंतिम  दिन, मौसम बेहद ठंडा, जैसा कि होना भी चाहिए. यह साल विदा ले रहा है, मौसम भी उदास है. यह साल उनके लिए बेहद हसीन साबित हुआ. उसका मन ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर जाता है..आने वाला वर्ष भी ऐसा ही होगा इसका विश्वास भी वही दिलाता है, हर अंत एक नये की..शुरुआत है. आने वाले वर्ष के लिए न कोई वादा किया है न कोई उद्देश्य रखा है..जिन्दगी जिस राह लिए जाएगी चले जायेंगे...अहिस्ता अहिस्ता, सचमुच अब वह उम्र नहीं रही, अब हालत से समझौता करके जिए जाने में ही सुख मिलने लगा है. ईश्वर जिस तरह रखे, उसी में संतोष है. यह पलायन नहीं समझदारी है उसकी नजर में.

  


Saturday, May 11, 2013

ऊर्जा संरक्षण


   

 दिन खिला-खिला है आज, दोपहर के लिए उसने कई काम सोचे हुए हैं, शाम नन्हे को परीक्षा की तैयारी कराते ही गुजरेगी. कुछ देर के लिए टहलते हुए लाइब्रेरी भी जा सकते हैं. कल दोपहर वे घूमने गए थे पाइप ब्रिज पर, रोमांचक अनुभव था. कल उनकी असमिया टीचर ने व्याकरण पढ़ाई, और साथ ही कहा अब वे नहीं आ पाएंगी, उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया. उनकी याद हमेशा बनी रहेगी और एक दिन जब वे भाषा सीख जायेंगे उनके घर जायेंगे उनसे मिलने. दीदी का खत नहीं आया न ही छोटी बहन का बहुत दिनों से, क्या हुआ होगा वह कल्पना कर सकती है, और इसलिए कोई विशेष इंतजार भी नहीं है, अर्थात बेताबी भरा इंतजार. आज क्लब जाना है, इम्ब्रायडरी किट के साथ, कल दोपहर भर अभ्यास किया, देखें क्या होता है, फ़िलहाल तो अभी पौने दस हुए हैं, अभी कुछ काम बाकी है...पेट में कुछ हलचल सी लगती है, लगता है ठंड भी लग गयी है एक नामालूम सी बेचैनी भी है..पर इतनी नहीं कि रोजमर्रा के कामों में रुकावट पड़े, सो सब ठीकठाक ही है. जून को सुबह आलू+मकई की रोटी बना कर  दी थी, उसने भी खायी थी, शायद उसी का असर हो. नन्हा आज बिना स्वेटर पहने ही बस में चढ़ गया, फिर पड़ोस के बच्चे के हाथ उसे स्वेटर भिजवाया.

 मौसम आज कल जैसा बिलकुल नहीं है, कल शाम से ही बदली बनी है, बरसने को तैयार.. ठंडी हवा भी बह रही है. कल शाम से ही मन में विचारों का बवंडर उठ रहा है, वही खामख्याली...अपने आप से शिकायतें...उसकी बंगाली सखी ठीक ही करती है कि इन सब से ऊपर रहती है. न पानी में उतरेंगे न डूबने का डर रहेगा..मगर उसे आजकल ओखली में सर देने का शौक जो हो गया है. खैर, बहुत हो गया, इस पर और मगजमारी करना ठीक नहीं, जानती है सिर्फ इतना लिख भर देने से ही उस से मुक्ति नहीं है, वह तो समय ही लाएगा...समय जो सबसे बड़ा मरहम है हर जख्म को भर देता है. नन्हा आज जल्दी आयेगा, माह का अंतिम दिन है, खाना वे एक साथ ही खायेंगे. परसों जून एक सुंदर नया जग लाए हैं, प्लास्टिक बॉडी है अंदर स्टील है, शाम को कोई मेहमान आया तो वे उसे पहली बार इस्तेमाल करेंगे.

  दिसम्बर महीने के दो दिन गुजर गए, वक्त पंख लगाये उड़ रहा है जैसे. कल दोपहर उसकी पुरानी पड़ोसिन आई अपनी बहन के साथ, अच्छा लगा, पुरानी यादें फोटो देखकर ताजा कीं और शाम को मिलकर सबने कवितायें भी पढीं, पर रात होते तक इतना थक चुकी थी कि बिस्तर पर जाते ही नींद ने घेर लिया. कल जून क्लब मीट के सिलसिले में एक नोटिस लाये जिसमें सोविनियर में हिंदी अनुभाग के लिए उसका नाम भी था, अच्छा लगा पहली बार अपना नाम कमेटी मेम्बर्स की लिस्ट में देखकर. दो दिन पहले ऊर्जा संरक्षण के लिए स्लोगन व कविता लिखने का काम भी दिया था जून ने, जो अभी तक शुरू भी नहीं किया है.


Wednesday, May 8, 2013

सैंड प्रोड्यूसिंग वैल




   पिछले हफ्ते पहले जून को सर्दी-जुकाम हुआ फिर उनका ठीक होते न होते उसे हो गया. आज भी हल्की खराश गले में बाकी है.  बदलते हुए मौसम की पहली सौगात...खैर अब सब ठीक है, अंशतः और अंततः भी. कल बिल्ली की मालकिन आ रही है, देखते-देखते तीन हफ्ते बीत गए वक्त अपनी रफ़्तार से गुजरता जाता है, वे ही हैं कि वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं. मौसम भी बदलते रहते हैं. ठंडक सुबह-शाम बढ़ने लगी है.

  फ्रिज की आवाज और घड़ी की टिकटिक को छोड़कर कितनी नीरवता छायी है. पिछले दो-तीन दिनों की तरह धूप आज भी नहीं निकली है. जून शायद आज देर से आयें, उनकी व्यस्तता sand producing well  पर चल रहे कार्य के कारण ज्यादा ही बढ़ गयी है. रात को इतना थके होते हैं कि खाना खाते ही सो जाते हैं, दोपहर का आराम तो गुजरे दिनों की बात हो गयी है, लेकिन  इस तरह उन्हें काम में व्यस्त देखकर उसे अच्छा लगता है, एक संतुष्टि का भाव उनके चेहरे पर भी छाया रहता है, थकान के बावजूद.

  आज धूप खिली है, सर्दियों की शुरुआत की एक अच्छी सी भोर..जून आज घर पर हैं. नन्हे के स्कूल में कल ‘बाल दिवस’ पर फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता थी, उसे बहुत आनंद आया. शाम को वे उड़िया परिवार से मिलने गए उनके बेटे के जन्मदिन पर. कल नन्हा तीन साल पुरानी उसकी डायरी निकल लाया और एक पेज खोलकर पढ़ने लगा, नहीं पढ़ पाया तो उसे पकड़ा दी, उसने देखा छब्बीस जनवरी का विवरण लिखा था, जून को भी तब समझ में आया कि डायरी लिखना कितना सुखदायक हो सकता है. यूँ तो उन्हें उस दिन की कोई बात याद नहीं थी, हजारों दूसरे दिनों की तरह वह भी बीत गया लेकिन वे छोटी-छोटी बातें जो उसने उस दिन कागज पर उतार ली थीं, हमेशा रहेंगी उन पन्नों पर.

   आज भी मौसम अच्छा है, मधुर, गुलाबी ठंडक लिए, लगता है हर वक्त वे एसी में बैठे हैं, एक ठंडा सा अहसास गालों को छूता हुआ सा रहता है. कल दोपहर जून और उसने बगीचे में काफी देर तक काम किया, माली से भी करवाया, तीन नए पौधे भी लगाये, दो गुलाब और एक मुसन्दा. मूली भी फिर से लगाई. गुलदाउदी में कलियाँ आने लगी हैं, बिलकुल वैसी ही जैसी उसने स्वप्न में देखी थीं. कल शाम जून ने कुकिंग बुक में पढकर सांभर बनाया, बहुत जायके दार बना, और अब से वे लोग बाजार से सांभर पाउडर नहीं लायेंगे. नन्हे का आज दूसरी यूनिट टेस्ट है, उसे हॉस्टल भेजना उस पर अन्याय करना ही होगा, जिस तरह वह  आँखों में पानी भर लाता है, हॉस्टल जाने की बात पर.

    आज सुबह व्यस्तता में गुजरी, सो दोपहर के पौने एक बजे वह लिखने बैठी है. Baked cabbage, beans, peas with white sauce बनाने में समय कुछ ज्यादा ही लगता है, फिर पीछे आंगन में कल ब्लीचिंग पाउडर डलवाया था,  सुबह नन्हा तो वक्त से तैयार हो गया था फिर भी रोज की तरह एकाध बार तो उस पर झुंझलाई ही. आज उसका हिंदी का टेस्ट है और कल ‘गुरुपर्व’ का अवकाश. कल शाम एक परिवार मिलने आया था, उनके बच्चे ने ला-ओपेला की एक कटोरी तोड़ दी, माँ को बहुत बुरा लगा, यूँ शायद वह उसकी जगह होती तो उसे भी बुरा लगता, पर कल थोड़ा भी नहीं लगा, यूँ भी भौतिक वस्तुओं के प्रति इतना लगाव होना ठीक नहीं न. आज शाम दो परिवार आने वाले हैं, इसी तरह मिलने-जुलने रहने का नाम ही तो जिंदगी है. 

Tuesday, May 7, 2013

विश्व संचार दिवस



आज जबकि उसे भोजन में सिर्फ दाल ही बनानी थी, पौने ग्यारह बज गए हैं, और अब जाकर वह सुबह के कामों से निवृत्त हुई है. अभी भी सलाद आदि का काम है जो जून के आने के बाद ही करेगी, थोड़े से पल ये जो मिले हैं इनका उपयोग कर ही लेना चाहिए. कल जून ने भगवद्गीता के दो कैसेट और रिकार्ड कर दिए. इस समय भी एक बज रहा है, “जो स्थिरवान पुरुष सर्दी-गर्मी, मान-अपमान, सुख-दुःख में सम है, जो ममता से रहित है, वह मुझे प्रिय है” इतने उच्च आदर्शों तक पहुंच पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है, किन्तु वह किसी सीमा तक इन बातों पर अमल कर सकती है. मन को शांत रखने के लिए यह रामबाण है यानि सर्वोत्तम उपाय. कल उसकी एक उड़िया सखी अपनी नवविवाहिता ननद और उसके पति जो डॉ हैं, को लेकर आई थी, दोनों बहुत शांत स्वभाव के लगे, अच्छा लगा उनसे मिलकर, उसने उन दोनों को एक पेन सेट व दो पेन दिए जो पिता ने उसे बरसों पहले दिए थे. कल दोपहर बाद उसने सात पत्र लिखे, भाइयों को भाईदूज का टीका भेजना था, और दो कार्ड्स भी जो उसकी पड़ोसिन ले आयी थी तिनसुकिया से, शाम को उसे एक सखी के यहाँ जाना है, ‘जूनून’ देखने के बाद, उसे लगा कि वह इतनी छोटी-छोटी बातों को इतना महत्व देने लगी है कि उन्हें लिख रही है, शायद घर गृहस्थी के इस ताने-बाने में उलझ कर रह गया है उसके मन का वह कोना भी जो किसी और तरह सोचता था..पर यह घर संसार उसे इतना प्रिय है कि इसके बदले स्वर्ग भी मिले तो तुच्छ है. नन्हे के भोले-भाले से सवाल और शरारतें, जून का झूठमूठ का गुस्सा, सभी कुछ तो मोहक है. लेकिन उसके पास और भी बहुत कुछ है जो महत्वपूर्ण है.

  परसों रात की तरह कल स्वप्न में बिल्ली को फिर देखा, एक बार लगा गला घुट रहा है, शायद उसकी चेन फंस गयी थी. दीवाली की सफाई अभी बहुत शेष है. कल दोपहर बाद वे पड़ोसी के यहाँ गए, लगभग शाम को ही उनके यहाँ कम्यूनिटी फीस्ट था, अच्छा लगा, लोगों को बेहिचक मिलते-जुलते देखना उसे हमेशा ही अच्छा लगता है.

  कल दोपहर से ही उसे वही हर बार वाला सिर दर्द था, जून ने ऑफिस जाने से पहले दवा दी, फिर चाय बनाकर भी. कुछ देर सोयी. शाम को वह बाम लगाकर लेटी थी और जून साइकलिंग करके आये ही थे कि एक मित्र परिवार आ गया, और वे लोग जा ही रहे थे कि एक दूसरा परिवार. कल सुबह से ही बैठक की शक्ल बिगाड़ दी थी सारे कुशन कवर आदि धोबी को दे दिए थे, खैर, आज अभी रेडियो पर कमेंट्री आ रही है, वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड के बीच मैच हो रहा है. कल नन्हा दोनों घुटनों में चोट लगाकर आया, बहादुर है, इतनी चोट पर भी रोया नहीं, शायद रोया भी हो उसे बताया नहीं. ही इज सच अ स्वीट ...जेम ऑफ हर हार्ट. उसे अपने से दूर भेजने की हिम्मत कैसे आयेगी. कल जून ने घरों पर फोन से बात की, वे लोग भी पीएंडटी फोन के लिए अप्लाई कर रहे हैं. जून उसका व नन्हे का पासपोर्ट भी बनवा रहे हैं, इसका अर्थ हुआ कभी न कभी वे विदेश यात्रा पर जायेंगे ही.
  नवम्बर माह का पहला दिन, “विश्व संचार सप्ताह” का भी पहला दिन. दीवाली में सिर्फ एक दिन बाकी है, कल शाम उन्होंने नमकपारे बनाये आज नारियल के लड्डू बनाएंगे. उसकी उड़िया सखी का फोन आया था, उसे कैलेंडुला के पौधे चाहिए थे, वे उनका इंतजार करते रहे, जब वे नहीं आए तो वे एक मित्र के यहाँ चले गए, असमिया सखी ने आलू क्रश करके पकौड़े बनाये, जून को बहुत पसंद आये, कभी वह भी बनाएगी उनके लिए. कल शाम से ही वे एकदूसरे के साथ निकटता महसूस कर रहे थे, जैसे पहले-पहल किया करते थे, और जो कभी- कभी दुनिया भर के कामों में कहीं खो सी जाती थी. नन्हे की चोट अब ठीक हो रही है, आखिर उस दिन जून ने अन्ताक्षरी में भाग ले ही लिया, उन्हें गानों का शौक है और व गानों की धुन भी जानते हैं, लेकिन झिझक के कारण अपने इस शौक को बढ़ा नहीं पाते हैं, वह तो काम करते-करते ही गुनगुनाती रहती है. यकीनन गाना गाना थोड़ा बहुत तो आना ही चाहिए.



Monday, May 6, 2013

पालतू बिल्ली



आज फिर कुछ दिनों बाद डायरी खोली है, नन्हा पूजा की छुट्टियों के बाद आज स्कूल गया है, यूँ कारण यह नहीं है. कल दीदी को खत में लिखा कि लिखने का शौक बस डायरी लिखने तक ही सीमित रह गया है, लिखना चाहिए था कि कभी-कभार लिखने तक, पर स्वयं के प्रति ईमानदार रह सके इतनी हिम्मत अभी तक नहीं आयी है. हर बार छला है स्वयं को शब्दों से, सही-सही मन की बात बाहर आने से कतराती रही है. खैर अब उसकी फितरत यही है तो यही सही, ज्यादा भावुक होने की जरूरत नहीं, हाँ, अपनी बात को सच साबित करने के लिए कल से नियमित लिखना चाहिए. जून आज नन्हे को छोड़ने गए हैं, उसे प्रोजेक्ट वर्क लेकर जाना था. जिसमें पूरी छुट्टियों भर वे व्यस्त रहे. एक दिन दो अन्य परिवारों के साथ दिगबोई गए पिकनिक मनाने. पूजा देखने गए एक दिन, कुल मिलाकर पूजा का यह अवकाश अच्छा रहा. शाम को उनका एक मित्र परिवार घर जा रहा है, उनकी बिल्ली कुछ दिन यहाँ रहेगी, कुछ दिनों तक पेट् पालने का अनुभव भी हो जायेगा, पहले वह घबरा रही थी पर अब लगता है वे उसे आराम से रख पाएंगे. कल उसने पांच खतों के जवाब लिखे जो बहुत दिनों से पेंडिंग थे.  

  आज सुबह उठी तो सबसे पहले बिल्ली का ध्यान आया, दरवाजा खोल कर देखा तो बड़ी-बड़ी ऑंखें खोले वह रात वाली जगह पर ही बैठी थी, शायद रात को उसके लिए रखे बोरी के बिस्तर पर गयी ही नहीं. मालकिन को बहुत मिस कर रही है शायद, दिन भर बहुत थोड़ा सा ही खाया उसने. समय पर नैनी तो आ गयी पर सारा रूटीन अस्त-व्यस्त हो जाने के कारण दोपहर तक उसे काफी थकान लग रही थी, जून के जाने के बाद पढ़ना शुरू किया कि नींद आ गयी तेज और गहरी नींद. जो पौने तीन बजे खुली, फिर मशीन चलाई, कपड़े यूँ ही पानी में भीगे हुए थे, सुबह लाइट गायब हो गयी थी. नन्हे की सोशल की टीचर नहीं आयीं, उसे मॉडल और चार्ट सब वापस लाने पड़े. शाम को कुछ देर बगीचे में काम किया, कुछ देर बैडमिंटन खेला, फिर कुछ देर फिल्म देखी, और इस समय एक फिल्म के गाने बज रहे हैं, जो उसकी सखी ने बड़ी तारीफ करके दिया है, बेतुके से गाने हैं, वह पहला गाना जो उसे ज्यादा पसंद है अभी नहीं बजा, शायद वही अच्छा हो. जून भी कई दिन की छुट्टियों के बाद ऑफिस गए हैं उनका काम भी बढ़ गया है, विभाग में एक अधिकारी ने त्यागपत्र दे दिया है, उनकी पत्नी की अनुपस्थिति से लेडीज क्लब का आकर्षण भी कम हो जायेगा.

  आज सुबह बिल्ली जून की कार के नीचे छुप कर बैठ गयी और बहुत बुलाने पर भी नहीं निकली. वे दोनों जब सारे प्रयत्न करके हार गए तो नन्हे ने बिस्किट देकर उसे बाहर निकाला, उससे पहले जून ने बताया कि वह गेट से बाहर चली गयी थी, उसे हमेशा बाँध कर ही रखना होगा. उसकी मालकिन ठीक ही कहती थी, चीजलिंग शौक से खाती है, कोर्नफ्लेक्स कभी खाती है कभी सूंघ कर छोड़ देती है. लेकिन उसके कुछ दिन यहाँ रहने से बिल्लियों के प्रति उनके नजरिये में काफी बदलाव आ जायेगा.

 अभी साढ़े दस ही हुए हैं, यानि आधा घंटा तो है ही अपने आस-पास रहने का, सुबह साढ़े पांच बजे से लगातार कुछ न कुछ करते रहने से इस वक्त बैठना सुकून से भर गया है. मौसम आज भी पिछले कई दिनों की तरह अच्छा है, गर्म और खुला खुला सा दिन. सुबह उसकी पड़ोसिन ने सोमवार को उससे बड़ा पतीला देने को कहा, और फौरन ही उसने ग्रीटिंग्स कार्ड्स लाने का काम उसे थमा दिया, उसे शायद अच्छा न लगा हो. परसों कार्तिक का पहला सोमवार है, उनके यहाँ बहुत सारी महिलाएं आएँगी. उड़िया लोग त्योहारों को मिलजुल कर  मनाना पसंद करते हैं. कल नन्हे का न ही स्टोरी कम्पीटिशन हुआ न ही असेम्बली कार्यक्रम. बच्चों को निराशा का अनुभव कैसा लगता होगा, स्कूल से आया तो एक क्षण उदास था फिर सब भूल गया, यही तो बचपन कई सबसे बड़ी विशेषता है. इस हफ्ते उसे दो पत्र लिखने हैं, दीवाली तक चादर भी पूरी करनी है, दीवाली आने में सिर्फ बारह दिन शेष हैं, हो ही जायेगी, अर्थात होनी ही है.

Saturday, May 4, 2013

पहली वाशिंग मशीन




 उसकी तमिल सखी ने एक दिन पूजा में बुलाया, उसकी सासु माँ ने नूना के माथे पर टीका लगाया और बालों में सिंदूर भी. सुपारी, पान व केले का प्रसाद दिया, उनकी आत्मीयता कहीं अंदर तक छू गयी. उनका मंदिर तथा नित्य संस्कृत के श्लोकों का जप करना सब अच्छा लगा. प्राचीन भारतीय विरासत को ऐसे ही लोगों ने संभाल कर रखा हुआ है. उसे याद आया कहीं पढ़ा था, “उत्सव और क्या होता है, सिवाय इसके कि निचुड़े हुए रस का भरना और भर कर उफनना, अपने भीतर उसे समो न पाना, उसको वितरित करने की हिलोर भीतर से पैदा होना, यह सब हो और आदमी सबमें समा जाने के लिए, सबमें अपनी पहचान पाने के लिए आकुल हो जाये, उत्सव अकेले का नहीं होता”.

परसों उनकी पहली सेमी आटोमेटिक वाशिंग मशीन बीपीएल बीई ४० भी आ गयी. कल शाम को उसमें कपड़े भी धोए, ज्यादा नहीं  आठ-दस कपड़े. आज असमिया कक्षा में जाना है, काफी दिनों से अभ्यास छूट गया था. पूरी वर्णमाला लिखने बैठी तो कुछ वर्ण भूल गयी. अभी कुछ देर पहले उसकी बंगाली सखी का फोन आया, उसे उसने क्रिसेंथमम में कलियों वाले सपने के बारे में बताया, कितनी सारी, कितनी बड़ी गोल-गोल कलियाँ थीं और पीले रंग के फूल झांक रहे थे. यकीनन इस बार पीले फूल ज्यादा खिलेंगे बस थोड़े दिनों में फूलों से भर जाएँगी क्यारियां. वह लिख रही थी कि जून का फोन आया उन्हें दफ्तर में बैठकर भी इस बात कि चिंता रहती है कि नन्हा स्कूल गया कि नहीं.

“हैप्पी सेवेंथ” आज सुबह जून ने कहा तो अच्छा लगा और याद आया कि उनके विवाह के दस वर्ष पूरे होने में मात्र तीन महीने और रह गए हैं, यकीनन वह दिन यादगार होगा. आज फिर सुबह से टिप-टिप बूंदाबांदी हो रही है, यह बेवक्त की वर्षा अब नहीं सुहाती, अक्तूबर का महीना तो यूँ ही इतना मोहक होता है. ईश्वर ने जाने क्या सोच रखा है मानव जाति के लिए, मानव तो आगे बस आगे ही बढ़ना चाहता है इसका परिणाम चाहे कितना ही बुरा क्यों न हो. नन्हे की आज पहली छुट्टी है, वह नहा धोकर अपने दोस्त के यहाँ गया है. आज सुबह उसकी उड़िया सखी ने “एग लेस केक” की विधि पूछी, उसे भी कल केक बनाना है, वह सोच रही है अपनी तेलगु सखी को चाय पर बुलाए. कल उसने यूजीसी कार्यक्रम में भाषा विज्ञान पर एक अच्छा कार्यक्रम देखा. एक अच्छा भाषा विद्यार्थी नई भाषा के उपयोग का कोई अवसर नहीं छोड़ता, पर उसे झिझक होती है.




Friday, May 3, 2013

महालया- पूजा की खरीदारी




 फिर पांच दिनों का अंतराल, इसी बीच नन्हे के स्कूल का समय बदला और फिर पूर्ववत हो गया. पहले का समय ही ठीक है, दोपहर को कम से कम दो घंटे सुकून से अखबार-पत्रिकाएँ पढ़ते हुए गुजरते हैं और नन्हे को भी सुबह आराम से तैयार होने का समय मिल जाता है. आज कई दिनों बाद पुराना स्वीपर आया है, अस्वस्थ दीखता है, परिवार नियोजन के इस युग में एक और बच्चे का पिता बना है, जाने कब लोगों को समझ आएगी. जून आज देर से आएंगे, फील्ड गए हैं, कल शाम को उनके सिर में दर्द था, नूना ने बाथरूम का दरवाजा जोर से बंद क्र दिया, वह इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान कहाँ रख पाती है. आज अभी तक स्नान भी नहीं हुआ है, दस बजने को हैं, सीमा, उसकी नैनी के दो भतीजे कुछ देर पहले आये थे. उसकी बहन की बेटी ‘बेबीसिटर’ काम छोड़कर चली गयी है, उससे नौ-दस माह का शरारती बच्चा नहीं संभलता और जेठ अपने बच्चों को इनके घर आने नहीं देता...हर तरफ वही दरार. रिश्तेदार कभी भी आपस में प्यार से रहते नहीं देखे, छोटे लोग हों, या मध्य वर्गीय या उच्च  वर्गीय, आपसी तकरार, टकराव हर जगह देखने को मिलता ही है. कल शाम वे पहले असमिया सखी के यहाँ गए फिर उस नन्ही बच्ची को देखने, वह बहुत छोटी सी लगी चिड़िया के बच्चे की तरह नाजुक, उसकी बड़ी बहन के लिए तो एक खिलौना है. उसने डायरी में नीचे लिखी आज की पंक्ति पढ़ी-  you can discover more about a person in an hour of play than in a year of conversation. यह भी खरी उतरती है उनकी कसौटी पर. कैरम खेलने से वे कितने करीब आ गए हैं, कल बहुत दिनों बाद बैडमिंटन भी खेला, और बागवानी की. कल कई दिनों बाद धूप निकली थी, गुलदाउदी के सारे पौधे धूप में रखे हैं.

  ऐसा कम ही होता है कि नन्हे के स्कूल में छुट्टी हो और उसे सुबह के सारे कार्य निपटाकर डायरी खोलने का अवसर मिल जाये, पर आज इसके दो कारण हैं, पहला तो यह कि सोमवार से होने वाले टेस्ट की पढ़ाई के लिए वह जल्दी उठ गया और दूसरा यह कि आज लंच में सिर्फ कढ़ी-चावल बनाने हैं, जो आधे घंटे का भी काम नहीं. कल शाम फिर उसी परिचिता से बहस में उलझ गयी हिंदी-इंग्लिश के मसले को लेकर. रात देर तक शाम की बातें दिमाग में छायी रहीं फिर ईश्वर की सुमधुर याद ने आश्रय दिया. महीनों से उस भावना का स्पर्श तक नहीं हुआ है जिसके वशीभूत होकर वे कवितायें लिखी थीं जिनमें ईश्वर के सौंदर्य का वर्णन होता था. इन्हीं सांसारिक सुखों को अपना लक्ष्य मानकर जीने वाली वह अनुभव करे भी तो कैसे, पर यह छोटे-छोटे सुख भी तो उसी ईश्वर के दिए हुए हैं न, उसके जीवन का हर सुखद क्षण उसी के असीम उदार भाव का ही तो प्रतीक है. पिछले हफ्ते की तरह इस हफ्ते भी घर से कोई पत्र नहीं आया है, उसने सोचा, वह भी तभी लिखेगी जब वास्तव में कोई लिखने वाली बात होगी. जून आज देर से आएंगे, उन्हें फिर फील्ड जाना पड़ा है. गर्मी कुछ हो ही गयी है, और सुबह से इधर-उधर के कार्यों में उसकी सारी ताकत जैसे खर्च हो चुकी है, कलम चलाने में हाथ को श्रम महसूस हो रहा है.

  आज पुरे सात दिनों के बाद कलम उठायी है. मौसम आज बहुत अच्छा है, ठंडी-ठंडी हवा जब चेहरे को छू जाती है तो सिहरन का अहसास होता है, गुलाबी ठंड की आमद ही आमद है. आज महालया है, यानि नवरात्रि भी आरम्भ हो रही है, पिछले दिनों वे व्यस्त रहे, नन्हे के इम्तहान थे, और उसकी वही जानी-पहचानी सी व्यस्तता. एक दिन लेडीज क्लब की मीटिंग भी थी, लेडीज ने स्टाल लगाये थे, वह भी एक सखी के साथ वस्त्रों के स्टाल पर खड़ी थी, एक गाउन उसने लिया भी. बड़े भाई के खत के जवाब के साथ और भी पत्र लिखे, सोचती है दीदी और बड़ी ननद को कार्ड्स के साथ खत भेजेगी. पिछले दो दिनों से सबको स्वप्नों में देखती है, अगली यात्रा तक स्वप्नों में देखकर ही तो रहना है न. एक दिन वह अपनी बंगाली सखी के यहाँ गयी, उसने ‘पूजा’ की खरीदारी दिखाई अच्छा लगा. उनकी खरीदारी अभी नहीं हुई है, शनिवार को जब वाशिंग मशीन खरीदने जायेंगे तभी वह अपने लिए सूट के कपड़े खरीदेगी. इसी बीच एक दिन जून से नाराज भी थी वह, पर उनके धैर्य और प्यार ने उसे जीत लिया, वह अद्भुत हैं, इतना गहरा प्यार है उनका और इतना बड़ा दिल भी. उसे उन पर गर्व है. नन्हे का वीडियो गेम भी पता किया पर बहुत मंहगा है, इधर पूरे देश में प्लेग की खतरनाक बीमारी के कारण दहशत सी फैली रही. दो अक्टूबर को को गाँधी जी का एक सौ पचीसवाँ जन्म दिन भी मनाया गया. बस इसी तरह बीत गए ये पिछले सात दिन.