आज से वर्ष का दूसरा महीना शुरू हो गया। समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है। सुबह उसने फिर भीतर समाधान(समाधि) पाने के लिए ध्यान किया। नाश्ते के बाद वे टहलने गये, वापसी में उस भयानक हादसे के बारे में पता चला, जिसमें उनकी सोसाइटी के एक निवासी की पत्नी व पुत्री की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। पूरा नापा ही शोकग्रस्त है। जीवन की क्षणभंगुरता का सबूत ऐसे क्षणों में मिलता है। प्रतिदिन न जाने कितने लोग सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। आज छोटी ननद के यहाँ ‘माता की चौकी’ का आयोजन किया जा रहा है। आज शाम को दो छात्राएँ पढ़ने आयी थीं, तुलसीदास का एक सवैया और महादेवी वर्मा का एक संस्मरण पढ़ाया। हिन्दी साहित्य के पास एक विशाल भंडार है।
आज सुबह ध्यानस्थ थी, कितना सुकून और कितना सरल लग रहा था परमात्मा से गुफ़्तगू करना, वैसे वह कोई दूसरा तो है नहीं, अपने आप से मिलना भी कह सकते हैं ! मन की कल्पना यदि बीच में न आये तो वे हर वक्त उसकी यानि अपनी सोहबत में रह सकते हैं। मन के होते हुए भी पीछे तो वही रहता है। जैसे इस वक्त पीछे गुनगुन की सी आवाज गूँज रही है। सुबह छत पर सूर्योदय के दर्शन किए। दोपहर को नयी कविता टाइप की, पुरानी को दूरस्त किया। बड़े भांजे के विवाह में सम्मिलित होने के लिए परसों उन्हें यात्रा पर निकलना है।
आज सुबह भी सुंदर थी, यह शांति कहीं जाती हुई प्रतीत नहीं होती। यह टिकने के लिए आयी है। अब इसकी असली परीक्षा तो लोगों के बीच होगी। वाणी में कंपन न हो, मन में हल्का सा भी विक्षोभ न आये और स्वार्थ कभी भी मन को सजल बनाने से न रोके। परमात्मा कितना सुलभ है और वे उसे भूलकर स्वयं को तथा अन्यों को पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। कितना व्यर्थ है अपनी ऊर्जा को ऐसे कामों में लगाना, मन को ऐसे चिंतन में लगाना जो कहीं भी नहीं ले जाता, परमात्मा में मन टिका रहे तो अपने आप ही ऊपर उठता है। आज पहली बार घर में उगायी सरसों का साग बनाया। एक नयी कविता लिखी। पापा जी से बात हुई, छोटी बहन भारत आ रही है।
आज पाँच दिनों के बाद यह डायरी सम्मुख है, अपना घर और अपना समय !! पिछले पाँच दिन विवाह की गहमा-गहमी में बीते। सोने-जागने का समय भी बदल गया था। विवाह सोल्लास संपन्न हो गया। कुछ देर पहले ननद से बात हुई, आज विवाह का रजिस्ट्रेशन भी हो गया, कोर्ट में पाँच घंटे लग गये। सुबह नव दंपत्ति को लेकर वे लोग मंदिर भी गये थे।
आज सुबह वे चार बजे उठे, वातावरण कितना शांत और शीतल था। सुबह का वक्त दिन का सबसे अच्छा वक्त होता है। पड़ोस में बन रहे मकान के कारण उनके यहाँ लगी पॉलीकार्बोनेट की एक शीट ख़राब हो गई थी, उन्होंने बदलवा दी है, उस तरफ़ की दीवार पर पेंट भी करवा देंगे। छह फ़रवरी को तुर्की और सीरिया में आये भूकंप में मरने वालों की संख्या ५५००० से अधिक हो गई है। एक लाख से अधिक लोग घायल हुए हैं। भारत सरकार ने सहायता का हाथ बढ़ाया है। प्राकृतिक आपदाओं के सम्मुख मानव आज भी कितना बेबस है।
सुबह उन्होंने सोसाइटी के एक किसान के यहाँ से ताजी मूली और साग ख़रीदे, वह उनके सामने तोड़ रहा था। नन्हे ने कुछ नये क़िस्म के फल और सब्ज़ियाँ भी भेजी हैं। सुबह उसे भिस की सब्ज़ी बनानी है। शाम को सहजन के फूल की।कल सुबह उन्हें नन्हे के घर जाना है, वहीं से ‘कस्तूरबा’ नाटक देखने जाएँगे, जिसमें जीनत अमान ने काम किया है। नन्हा व सोनू बड़े भांजे के घर की सफ़ाई करवाने जाएँगे, वे लोग विवाह के बाद वापस आ रहे हैं। आज मंझले भाई के साथ छोटी बहन, पापाजी से के पास गयी है, कल वे लोग दीदी के पास भी जाएँगे। रिश्तों की यह डोर कितनी अटूट है, पुरातन भी और नित नूतन !
आज वे डेढ़ घंटे की कार यात्रा के बाद ‘चौघड़िया मेमोरियल हॉल’ में जीनत अमान व अभिजीत जकारिया द्वारा अभिनीत नाटक देखने गये, वहाँ जाकर पता चला, किसी कारण से नाटक का मंचन स्थगित हो गया है। लौटकर नन्हे के यहाँ आराम किया, शाम को घर आ गये। नन्हे और सोनू ने डेकोरेटर बुलवा कर भांजे के घर को फूलों से सजवाया, केक भी मँगवाया। नव जोड़े को बहुत अच्छा लगा।
आज वे नापा के उन निवासी के यहाँ मिलने व शोक प्रकट करने गये, पहली फ़रवरी को जिनकी पत्नी व बेटी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उन्होंने बताया, सामने से आ रहे कंकरीट मिक्सर ने उनकी हुण्डाई की कार (एवेन्यू) को टक्कर मार दी। ड्राइवर को भी चोट आयी। उनकी वृद्धा माँ व दत्तक पुत्री से मिले।पुत्री दस महीने की है। अप्रैल में उसका जन्म हुआ था, अड़तीस दिनों की थी, जब वे लोग उसे घर लाये थे। कह रहे थे, माँ और दीदी से खूब हिली हुई थी। रोज़ शाम को उनका इंतज़ार करती है। एक नैनी बच्ची को सँभाल रही थी। वृद्धा माँ को छोड़ दें तो एक तरह से वह नन्ही बच्ची ही अब उनका परिवार है।
आज सुबह वे उठे तो घर में धुँआ भरा हुआ था, शायद किसी ने रात को लकड़ियाँ जलायी हों। प्रातः भ्रमण के बाद आम के बगीचे में ही प्राणायाम किया। कल सुबह वे योगा मैट्स भी ले जायेंगे। छोटी ननद का फ़ोन आया। बड़े भांजे की नव विवाहिता पत्नी की दादी जी का देहांत हो गया। वे डेंटिस्ट के पास जाने से पूर्व वहाँ गये थे। पंडित जी अंतिम क्रिया कर रहे थे, फिर उन्हें शवदाह गृह ले जाया गया। डेंटिस्ट ने नाप ले लिया, सोमवार को नया दाँत लग जाएगा।
आज सुबह उसी ‘अनाम’ की आवाज़ सुनकर आरंभ हुई, फिर उन्हीं की प्रेरणा से कुछ पंक्तियाँ कविता वाली डायरी में लिखी जाने लगीं। पापाजी ने जिन्हें पढ़कर सुंदर प्रतिक्रिया भी दी। ईश्वर व गुरु निरंतर उनकें आश्वस्त करते हैं कि वे उनके साथ हैं, उनका ध्यान रखा जा रहा है। वे उन्हें प्रेम करते हैं, नितांत बेशर्त प्रेम ! प्रेम करना उनका स्वभाव है। प्रेम के बिना यह जीवन मरुस्थल के समान ही तो है। आज दोपहर, बनारस के एक घाट पर जिनमें चाय पी थी, और जिन्हें वह साथ ले आयी थी, उन मिट्टी के कप्स पर रंग भरना शुरू किया, दो-तीन दिनों में रंग जाएँगे। जून अगली यात्रा की तैयारी में लगे हैं । वे ढेर सारे फल भी लाये, आजकल फलों का रस उनके आहार का मुख्य अंग बन गया है। आश्रम में शिवरात्रि का कार्यक्रम अगले सप्ताह है, वे जाने वाले हैं।
आज वे भांजे की ससुराल पुन: गये। नन्हा भी आ गया था। घर की शुद्धि के लिए आर्यसमाज के एक पंडित ने हवन किया।सभी ने मंत्रोच्चार किया व आहुतियाँ दीं। दोपहर को एक कोरियन धारावाहिक का एक अंश देखा। संगीत, कला, किताबें और कहानी क्लब, ये सारी बातें उसे ख़ास बनाती हैं। वहाँ बर्फ गिरती है और घरों में पानी की पाइप्स जम जाती हैं। ऐसे कठोर मौसम में भी उनके भीतर की उष्मा कम नहीं होती।