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Thursday, November 5, 2020

चोर और चोरी


आज जून वापस आ गए हैं, हैदराबाद के प्रसिद्ध बिस्किट का एक डिब्बा लाए हैं। तेनाली राम में राज्य के क्रोध ने सब मर्यादाएं तोड़ दी हैं। कहा भी जाता है, क्रोध क्षणिक पागलपन ही होता है, जो व्यक्ति को उसकी स्मृति ही भुला देता है, उसे याद ही नहीं रहता वह कौन है, कहाँ है, किससे बात कर रहा है ? आज योग दिवस के लिए उसने एक इ-कार्ड बनवाया है जून ने बना दिया है।इसी के लिए एक बैनर बनाने का काम सेक्रेटरी कर रही है । योग कक्ष में एक साधिका मिल्क मेड से बना केक लायी। उसने बताया, कुछ दिन पूर्व  घर में चोरी हो गई थी, वे लोग क्लब गए थे, रात को बारह बजे लौटे तो आलमारी खुली थी, लगभग छह -सात हजार रुपये गायब थे, पर सोना, वस्त्र आदि सब वैसे ही रखे थे। चोर पिछले दरवाजे से आया, जाली काटकर हाथ डालकर उसने दरवाजा खोल लिया, उस पर ताल नहीं था, आगे कुछ भी बंद ही नहीं था, वह आराम से कमरे में जाकर ,अलमारी भी खोल पाया क्योंकि चाबी भी उसी में लगी हुई थी। चोरी नहीं होगी यह मानकर वे कितने लापरवाह हो जाते हैं। एक तरह से यह चोर उन्हें सुरक्षा का पाठ भी पढ़ा गया। वे भी जीवन में इसी तरह जीते चले जाते हैं मानो कभी कुछ गलत उनके साथ हो ही नहीं सकता और मनमाना जीवन जीते हैं। मन पर सजगता का ताला न लगा हो तो जीवन एक बिना पतवार की नाव की तरह इधर-उधर डोलता रहता है। दो धाराओं को जो एक-दूसरे के विपरीत चलना चाहती हैं, उन्हें बांधकर एक ही तरफ ले जाना है, उनका लक्ष्य सम्मुख हो तो जागरूकता बनी रहेगी, बीच-बीच में आने वाली विपदाएं उन्हें और सजग बनायेंगी।


आज का पूरा दिन महिला क्लब के नाम था। शाम को साढ़े पाँच बजे क्लब जाना था और रात को आने में दस बज गए। कार्यक्रम अच्छा रहा, फैशन परेड भी। कविताएं भी सभी को अच्छी लगीं, जो तीन सदस्याओं की विदाई के अवसर पर दोपहर को लिखी थीं। नैनी दो  हफ्ते के लिए परिवार सहित गाँव गई है, कामरूप से कोलकाता, वहाँ से आंध्र प्रदेश, चार दिन में पहुंचेंगे वे लोग। उसकी जगह मालिन काम करने आएगी। धोबी ने, जो उनके यहाँ पिछले तीन दशक से काम कर रहा है, बताया, उसके पिता को सन अठहत्तर में कंपनी से धोबी घाट पर काम करने की मंजूरी मिली थी , तभी से वे कागज उसने संभाल कर रखे हैं, अब वह वृद्ध हो गया है, सब काम अपने पुत्र को सौंप कर अपना कर्त्तव्य पूरा करेगा। 


आज ‘योग दिवस’ है, सुबह वे सामूहिक योग कार्यक्रम में भाग लेने गए। बाद में वह मृणाल ज्योति गई। अगले महीने दो दिन की टीचर्स वर्कशॉप है, उसे भी योगदान देना है।  सुबह ‘क्रिया’ के बाद ऐप में  गुरुजी का संदेश पढ़ा, उनके भीतर एक गीत है, जिसे उन्हें ही गाना है, और उसे गाने के बाद ही उन्हें चैन  मिलेगा। शायद उसी का असर था, स्नान करते समय स्वत: ही भीतर पंक्तियाँ उभरीं और उन्हें पहले ही प्रयास में बिना लिखे वीडियो बनाया, व्हाट्सएप पर डाला। एक साधिका ने फ़ेसबुक पर डाल दिया है। शाम के कार्यक्रम की तैयारी हो चुकी है। एओल की एक योग शिक्षिका भी आने वाली हैं। 


पौने नौ बजे हैं रात्रि के, अभी अभी नन्हे से बात हुई, वे लोग उनके भविष्य के घर से लौट रहे थे, वहाँ अभी भी कुछ कार्य शेष है। शाम को एक सखी के यहां गई, अगले महीने वे सब कहीं घूमने जाएं ऐसा कार्यक्रम बनाया। उसके वृद्ध  पिताजी काफी अस्वस्थ हैं, एक रात से ज्यादा वे लोग उन्हें  छोड़कर रह नहीं सकते। सुबह बंगाली सखी के यहाँ गई थी, उसने अच्छी तरह स्वागत किया बिल्कुल पहले की तरह। बगीचे से एक अनानास मिला, एक तो गिलहरी ने काट लिया, आधा ही शेष था। आज मूसलाधार वर्षा हुई, इतनी तेज कि  सामने वाला पूरा बरामदा भी पानी से भर गया। मानसून देश के कई राज्यों तक पहुँच चुका है। एक ब्लॉग के वार्षिक उत्सव में उसकी रचना को चुना गया है, कई लोगों ने पढ़ी। एक सीनियर ब्लॉगर उसकी तस्वीरें भी पसंद करती हैं फ़ेसबुक पर। लेखक के लिए एक सुहृद पाठक से मिलना सुखद होता है। लाइब्रेरी से दो किताबें लीं, एक रॉबिन शर्मा की दूसरी नेल्सन मंडेला की आत्मकथा, जो बहुत  रोचक है;  उनका बचपन  अफ्रीका के एक गाँव में बीता था बिल्कुल प्रकृति के निकट।  


.. बरसों पुरानी डायरी के के पन्ने पर पढ़ा -


किसी सूनी शाम को 

हथेलियों पर ठोड़ी टिकाये 

लिखने वाली मेज पर बैठे 

कोई बात फड़फड़ायी होगी तुम्हारे मन में 

लिखो फिर काट दो 

तकते रहो  निरुद्देश्य दीवार को 

अपनी आवाज को 

सुनने का प्रयत्न करो 


Friday, June 14, 2019

वस्त्रों पर सिलवटें



आज उच्च स्तरीय कमेटी के लिए नये अतिथि गृह में विशेष भोज का आयोजन किया गया है. उन्हें भी जाना है. सभी उच्च अधिकारी भी उपस्थित होंगे. सुबह चार घंटे उनमें से एक विशिष्ट महिला अतिथि के साथ बिताये, साथ में क्लब की प्रेसिडेंट भी थीं और एक अन्य अधिकारी की पत्नी. उन्हें लेकर ड्रिलिंग साइट पर भी गये. तेल के कुँओं की ड्रिलिंग कैसे होती है, नजदीक से देखा, समझा. आज सुबह उनके लिए एक कविता लखी थी. उनके पति देश के जाने-माने वैज्ञानिक हैं, उनकी उम्र सत्तर पार कर चुकी है पर अभी तक कार्यरत हैं. क्लब की प्रेसिडेंट के साथ काम करना अच्छा लग रहा है, वह काफ़ी जानकारी रखती हैं और कम्पनी को अपने परिवार की तरह मानती हैं.

आज सुबह शीतल थी पर अब धूप निकली है. बंगाली सखी से बात हुई. वे लोग पुरानी बातों को दिल से लगाकर बैठे हुए हैं, कहने लगी, समय के साथ भी कुछ घाव भरते नहीं हैं. उसकी आवाज आज दो बार ऊँची हुई, एक बार फोन पर उस बात करते हुए दूसरी बार नैनी को समझाते हुए, जिसे 'हाँ' बोलने की आदत है, बिना बात को समझे 'हाँ' बोल देती है. उसे जो क्रोध अथवा रोष बंगाली सखी से बात करके हुआ संभवतः वही नैनी पर उतर गया और फिर मन खाली हो गया. स्वयं को जाने बिना कैसे रहते होंगे लोग, अब आश्चर्य होता है. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से आयी है, वहाँ एक नया दफ्तर बन गया है. अब नई कक्षाओं के लिए जगह मिलेगी. स्कूल आगे बढ़ रहा है, अल्प ही सही उसका कुछ योगदान है इसमें. अगले शनिवार को वे इस समय बंगलौर में होंगे, उसके बाद लगभग एक महीना एक स्वप्न की भांति बीत जायेगा. आज ब्लॉग पर अभी तक तो कुछ नहीं लिखा है. अब जो भी सायास होता है वह नहीं भाता, जो सहज ही होता है, वही ठीक है.

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह स्कूल, वापस आकर क्लब, शाम को पहले योग कक्षा, फिर क्लब. कार्यक्रम सभी बहुत अच्छे थे, वे जल्दी घर आ गये. जून ने दो बार फोन किया. परसों रात को स्वप्न देखा था, वह आँखें बंद करके उसके साथ चल रही है. एक स्थान पर जाकर आँख खोलती है तो घुप अँधेरा है. वह उससे कहती है, यह रास्ता ठीक नहीं है, वापस चलो. उसने हामी भरी. फिर वह उस पर भरोसा करके आँख मूंद लेती है पर जब वे लक्ष्य पर पहुंचते हैं तो वहाँ का दृश्य ही अलग है. वह पूछती है, मार्ग नहीं बदला था, वह कहता है, नहीं. यह स्वप्न क्या बताता है...

कल कुछ नहीं लिखा. आज यात्रा से पहले का अंतिम दिन है. जून आज घर जल्दी आ गये हैं. मौसम बदली भरा है. मौसम में फेरबदल तो चलता रहता है पर आत्मा का मौसम सदा एक सा रहता है. जैसे पानी पर लकीर हो उतनी ही देर यदि मन का मौसम बदले तो ही मानना चाहिए कि मन आत्मा में स्थित है. मन आत्मा में रहकर यदि व्यवहार करना सीख जाये तो मुक्त ही है. मन पहले से ज्यादा सजग है और दृढ़ भी. आवरण और विक्षेप घट रहे हैं, सतोगुण बढ़ रहा है. तमो और रजो गुण से मुक्त होकर सतोगुण से भी पार जाना है. आज एक स्वामी जी से सुना, वस्र्त्रों को प्रेस करने से न उन्हें कुछ मिलता है न कुछ खोता है. वस्त्र पर सिलवटें मिट जाती हैं. सिलवट जो कुछ भी नहीं हैं, मिट जाती हैं. आत्मा में न कुछ जोड़ा जा सकता है न कुछ घटाया जा सकता है. मन रूपी सिलवट मिट जाती है, जो है ही नहीं. आज नन्हे और सोनू से बात की. वे योग और आहार के द्वारा अपना वजन घटा रहे हैं.   

Wednesday, July 11, 2018

किन्डल पर रामायण



कल रात्रि चेतना सघन थी, जो भी विचार आता था, मूर्त रूप होकर दिखने लगता था. कल दोपहर भी कितने अद्भुत दृश्य दिखे. छत की दीवार से लटकते हल्के बैंगनी रंग के फूलों की झालरें..तथा तेज हवा में उड़ते पत्ते, वृक्षों की डालियाँ, धूल तथा हवा का शोर भी कितना स्पष्ट था. अद्भुत है उनके भीतर का संसार ! सुबह उठी तो मन उत्साह से भरा हुआ था. वे टहलने गये, फिर स्कूल गयी, बच्चों ने ध्यान किया, उससे पूर्व ॐ की ध्वनि सुनाई दी तो वे सहज ही शांत हो गये. घर लौटी तो नैनी घर में काम कर रही थी, पर पीछे का दरवाजा पूरा खुला था, उसने नैनी को फटकारा, पर भीतर तब भी सन्नाटा था. ब्लॉग पर पोस्ट डालने के बाद कुछ देर किन्डल पर पढ़ने का विचार आया, पिताजी बाल्मीकि रामायण की बहुत तारीफ कर रहे थे. छोटी बहन भाई के घर पहुंच गयी है. वे उसे पुरानी तस्वीरें दिखा रहे हैं, जो वह व्हाट्सएप पर डाल रही है. अभी कुछ देर पहले घर के सामने के हैलीपैड पर एक हेलिकॉप्टर उतरा, फिर उड़ गया, उसका शोर इतना अधिक था कि घरों से लोग निकल कर देखने आ गये. ‘पवन हंस’ नाम है शायद इसका. जून के दफ्तर में एक टेंडर के कारण काफी हलचल है. बात दिल्ली तक जा पहुँची है, आज उन्हें मंत्री के पीए का फोन आया था, जाने क्या हल निकलता है. व्यक्ति के अहंकार के कारण ही ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं. पहली बार ऐसा हुआ है कि उनका वास्ता मंत्रालय से पड़ा है. उच्च अधिकारी भी दबाव में हैं.

मार्च का अंतिम दिन ! सुबह सामान्य थी, रात्रि को हुई वर्षा के कारण हल्की ठंडक थी, पर बादलों के पीछे से सूरज झांक रहा था. जून कल रात किसी सोच में मग्न थे पर सुबह सहज थे. वह अपने दफ्तर में चल रहे एक केस के कारण पिछले दो माह से व्यस्त हैं. सब कुछ को किसी खास कोण से देखा जाये तो सही जान पड़ता है. हर मानव को प्रकृति आगे बढ़ने का अवसर देती है. यदि जीवन में संघर्ष न हो तो विकास भी नहीं होगा, हाँ, विकास तभी सही होगा जब तथाकथित संघर्ष के पार कोई जाना सीख ले. आज भाई के घर पूजा हो गयी होगी और वे आगे यात्रा पर निकल गये होंगे. आज भी ब्लॉग पर दो पोस्ट प्रकाशित कीं, उसकी एक नई फेसबुक मित्र इन रचनाओं में काफी रूचि ले रही हैं. उसे ब्लॉग की पोस्ट फेसबुक पर भी पोस्ट करनी चाहिए ऐसा भांजे ने कहा था.

जून आज कुछ परेशान लगे. जो स्वाभाविक है, उन्हें अनजान व्यक्तियों से फोन पर व्यर्थ के आक्षेप सुनने पड़ रहे हैं. पर वह जरा भी क्रोधित नहीं होते, क्रोध से कोई हल नहीं होने वाला, यह वह जानते हैं. यदि किसी के पास धन हो क्या वह भूखा रहेगा, वस्त्र हों तो क्या वह ठंड में काँपेगा, फिर मानव क्यों अशांत रहे जब उसके भीतर शांति का अपार स्रोत है. आत्मा के रूप में उसे आनंदका स्रोत मिला है और वह दुखी है..आश्चर्य ही हो सकता है यह देखकर. जब भी कोई दुखी होता है, अपनी क्षमता का अनादर ही कर रहा होता है. किन्तु वे अपने कार्य के प्रति समर्पित थे, अब उसमें कुछ तो बदलाव आएगा ही, जीवन हर पल नया है, कब कौन सा मोड़ सामने आएगा, कौन जानता है. नन्हे से बात की, वह भी किसी केस का सामना कर रहा है. किसी मरीज का डाटा लीक हो गया. रात को एक-दो बजे तक घर पहुंच रहा था. आज सुबह वह उठी तो कितने अद्भुत दृश्य दिखे, वाणी भी दिखी, लिखी हुई ! रात की कोख से सुबह का जन्म होता है, नींद के आगोश से जागरण का !  

Monday, February 12, 2018

वर्षा की फुहारें



आज सुबह उठी तो मन सजग था. भीतर एक अचल स्थिरता का अनुभव अब देर तक टिकने लगा है, पर जब वे प्रातः भ्रमण से लौट कर आये तो जून से एक विषय पर कुछ बात हो गयी. जिसके कारण व्यर्थ ही कुछ समय गया. अहंकार कितने सूक्ष्म रूप से भीतर रहता है, पता ही नहीं चलता. जून को तो क्षमा किया जा सकता है, अभी उन्होंने क्रोध पर विजय पाने की न तो साधना शुरू की है और न ही ऐसा दावा करते हैं, पर उसने तो साधना भी की है और दावे भी बहुत किये हैं. फिर भी इस तरह व्यर्थ ही मन को नकार से भरना..शायद यही परमात्मा चाहते थे, ताकि उसे अपनी वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो सके. उस दिन नन्हे से कहा था कि अब क्रोध का शिकार नहीं होता मन, पर कोई जड़ वस्तु ही ऐसा दावा कर सकती है. चेतन के पास अनंत सम्भावनाएं हैं. उसके बाद से सजगता बढ़ी है. प्राणायाम भी सही विधि से किया, वस्त्रों को सहेजा, व्यायाम किया और अब यह लेखन.. उनका जीवन यदि सत्य को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा तो साधना का फल प्राप्त नहीं हुआ. शाम को मीटिंग है, नई कमेटी को पहला बुलेटिन निकालना है. वर्षा लगातार हो रही है. कल दीदी से बात हुई, उनका हॉल कमरा बीजेपी की मीटिंग्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था, पहले कांग्रेस के लिए भी वे दे चुके हैं और इसके लिए कोई चार्ज नहीं लेते. शादी के लिए देते वक्त भी वे कह देते हैं, जितना मन हो दे जाओ. सेवा का यह कार्य सहज ही उनसे हो रहा है.

आज बहुत दिनों के बाद भागवद का पाठ किया, अच्छा लगा. एक दिन समय निकाल कर राखियाँ बनाने का कार्य भी करना है, संडे क्लास में बच्चों को भी सिखाना है. आज सुबह से वर्षा थमी है. वातावरण शीतल है. पर सबसे जरूरी है भीतर की शीतलता. परमात्मा की बनाई इस सुंदर सृष्टि का आनन्द भी तभी ले सकता है कोई जब मन खाली हो. अहंकार से ग्रसित मन कुछ और देख ही नहीं पाता, वह स्वार्थ से भर जाता है और दुःख का भागी होता है. परसों ही जून ने कहा, ये लोग प्यार से रहना नहीं जानते, जब नैनी के घर में लोग लड़ रहे थे. तत्क्षण उसके मन में ख्याल आया था, क्या वे लोग स्वयं जानते हैं ? और कल सुबह ही उसका जवाब मिल गया. मानव रेत की दीवारों पर किले खड़ा करना चाहता है. नहीं सम्भव है यह. वर्षों साथ-साथ चलने के बाद भी आत्माएं अपनी-अपनी राह ही चलती हैं, और यही उनकी नियति है, यही उनके लिए सही है, क्योंकि वे अपनी-अपनी यात्रा पर हैं. परमात्मा के सिवा आत्मा का कोई सहयात्री नहीं है.

आज छोटे भाई का जन्मदिन है, सुबह उससे बात हुई. भाभी ने उसे सुंदर शब्दों में  बधाई दी है. सुबह अलार्म बजने से पहले ही किसी ने जगा दिया. जैसे कोई भीतर पल-पल की खबर रखता है. वे टहलने गये तो हल्की सी वर्षा हो रही थी न के बराबर. अब भी बदली है. आज विशेष सफाई का दिन है. घर की सफाई के साथ-साथ अंतर की सफाई भी आवश्यक है. आज भी सुमिरन किया, स्थिरता का अनुभव अब भीतर जाते ही हो जाता है. वह अनुभव तो सदा से वहीं था, वे ही दुनिया में उलझे थे. दोपहर को बाजार जाना है, शिक्षक दिवस के लिए क्लब की तरफ से उपहार खरीदने हैं. मृणाल ज्योति के लिए वे अपनी तरफ से भी कुछ उपहार खरीदेगी.

Thursday, January 26, 2017

सिक्किम का भूकम्प


कल पंखा भी था, टीवी भी था फिर भी गर्मी का जिक्र किया आज न बिजली है, न पंखा है, न टीवी पर बापू की कथा आ रही है, पर भीतर संतोष है. जून आधे घंटे में आ जायेंगे. आज सुबह काफी वर्षा हुई. सिक्किम में भूकम्प के कारण काफी नुकसान हुआ है, जापान में पुनः बाढ़ व तूफान आया है. पाकिस्तान में भी बाढ़ है. मानव ने अपनी मूर्खताओं से ऐसी स्थिति उत्पन्न कर ली है. प्रकृति का तो यह रोज का काम है. रोज ही कहीं न कहीं भूकम्प आते ही रहते हैं. पृथ्वी के होने का यही तरीका है. सागर है तो तूफान आयेंगे ही !

‘वह कौन है’ यह प्रश्न भीतर गूँज रहा था कि किसी ने पूछा, प्रश्न पूछने वाला कौन है..और गहन शांति हो गयी. कोई जवाब नहीं आया. लेकिन मौन में भी मन मुखर था. कुछ दृश्य, कुछ शब्द सुनायी दे रहे थे. आज से उसने यही ध्यान करने का निश्चय किया है. मन का शुद्धिकरण तो साधना से होता है पर विस्तार भी बहुत हो जाता है. जब सारा ब्रह्मांड ही खुद के भीतर भासने लगे तो अहंकार भी उतना ही विशाल होगा. अभी भी यही कामना भीतर बनी रहती है, देह स्वस्थ रहे, मन शांत हो, बुद्धि तीक्ष्ण हो, जगत में यश हो, सारी सुख-सुविधाएँ हों तो इन कामनाओं में और एक संसारी व्यक्ति की कामनाओं में जरा सा भी भेद नहीं है. हाँ, इतना जरूर हुआ है अब भीतर द्वेष नहीं रहा है, कोई विशेष पदार्थ ही मिले ऐसा आग्रह नहीं रहा, पर जब तक भीतर कोई भी कामना है, तब तक परमात्मा से दूरी बनी ही हुई है. भक्त को यह विश्वास होता है कि परमात्मा हर तरह से उसकी मदद करते हैं, जो भी उसकी उन्नति के लिए श्रेष्ठ है वही वह होने देते हैं !

आज सुबह जून को उसने शून्य के बारे में बताया, void के बारे में, कुछ नहीं है....केवल ब्रह्म सत्य है. जगत मिथ्या है, आज ध्यान में यह सूत्र समझ में आया. आज भी समाचारों में सिक्किम में आए भूकम्प की भयानक खबरें सुनीं, अब भी कई लोग लापता हैं, कुछ मलबे के नीचे दबे हैं. प्रकृति कितनी कठोर हो सकती है, यह वे सोचते हैं, लेकिन प्रकृति इतनी विशाल है, अनंत है, उसमें थोड़ा सा विक्षेप एक ग्रह पर आए तो उसके लिए कुछ भी नहीं है. जैसे कोई लखपति हो और उसके गाँव के अनेकों घरों में से एक ढह जाये तो उसे क्या अंतर पड़ेगा. मानव भी प्रकृति का ही अंश है, मानव इस सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर अनुभव कर सकता है, लेकिन प्रकृति के सम्मुख वह भी विवश है.

आज जून मुम्बई जा रहे हैं. दस बजने को हैं, थोड़ी देर में वह भोजन बनाने जाएगी. शाम को एक सखी की बिटिया से मिलने जाना है, उससे पहले घर में सत्संग है. कल सुबह केन्द्रीय विद्यालय जाना है एक प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाने. दोपहर को एक मीटिंग में दुलियाजान क्लब जाना है. शाम को भी मीटिंग है, पर उसमें वह नहीं जाएगी. आजकल माँ को किचन में जलती गैस से भय लगने लगा है, वह कब उठकर गैस बंद कर आती हैं पता ही नहीं चलता. वह कड़ाही में सब्जी रखकर आयी, और कुछ देर बाद जाकर देखा तो गैस बंद है. उसे पल भर के लिए क्रोध आया, पर फिर समझाया मन को, वह हर हाल में बड़ी हैं, उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिये. पिताजी उन्हें प्रेम से धमका सकते हैं, उनकी बात और है. नैनी की बेटी को खसरा हुआ था, पर अब उसका चेहरा लाल दानों से भर गया है, अस्पताल जाकर इलाज कराने के नाम से ये लोग घबराते हैं. नन्हा गोवा से लौट आया है, उसने वहाँ water sports तथा paragliding की. जीवन कितना अमूल्य है, एक-एक श्वास यहाँ अनमोल है, यह विचार उसके मन में कौंध गया जैसे ही नन्हे ने वह बताया.

आज उसने दीवाली के लिए सफाई का श्रीगणेश किया है. आज महालय है, आश्विन कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन. कल से नवरात्रि का आरम्भ हो रहा है. सिक्किम में लोग आपदा से जूझ रहे हैं, वहीँ गुजरात में लोग नृत्य में झूम रहे हैं. अजब है यह गोरखधन्धा, स्वप्न में जी रहे हैं जैसे सभी लोग. ऊपर से तुर्रा यह कि यह स्वप्न केवल रात को ही नहीं चलता, दिन को भी चलता है. यह स्वप्न चौबीसों घंटे चलता है. वे एक बड़ी साजिश के शिकार तो नहीं बनाये गये हैं ...?


Thursday, April 21, 2016

उत्तर पूर्वी भारत - सात बहनें


होश में जीना, साक्षीभाव में जीना, जागते हुए जीना ही असली बात है, वे अचेतावस्था में ही सारी भूलें करते हैं. आज सुबह उसने व्यस्तता के कारण फोन नहीं उठाया पर यह मान लिया कि कोई दूसरा उठा लेगा, यह मानना होश में नहीं हो सकता क्योंकि सभी व्यस्त हो सकते हैं. इस एक घटना के अलावा बेहोशी में कुछ विशेष नहीं हुआ. जून ने मृणाल ज्योति के हॉस्टल के लिए काफी चीजें बनवा दी हैं, उनके भीतर कितना परिवर्तन आता जा रहा है, वह मुस्कुराने लगे हैं, सामाजिक कार्य  करने लगे है. जीवन के प्रति नयी ललक जागी है, घर में नये-नये सामान ला रहे हैं. रजोगुण बढ़ रहा है धीरे-धीरे सतोगुण भी आएगा, अब क्रोध नहीं रहा, प्राणायाम का असर स्पष्ट दीख रहा है. जीवन है ही आनन्द के लिए, सेवा के लिए और परोपकार के लिए, वे मानव होने का सबूत तभी दे सकते हैं जब उनके चारों ओर आनन्द का वातावरण हो शांति हो और लोगों को उनसे कुछ न कुछ मिलता रहे, वे दाता बनें तभी जीवन का सच्चा मर्म समझ पाते हैं. प्रकृति हर पल लुटा रही है, बिना किसी आकांक्षा के, वे भी तो उसी प्रकृति का अंश है जैसे प्रकृति के पीछे वह अव्यक्त छिपा है ऐसे ही उनके पीछे आत्मा का साम्राज्य है, वे ही वह चेतन हैं, जड़ हाथों में क्या शक्ति कि अपने आप कुछ कर सकें !

आज ‘मृणाल ज्योति’ गयी थी, उस दिन एक परिचित ने पूछा था, आपकी वह संस्था कैसी है, और एक दिन क्लब की अध्यक्षा ने भी कहा कि वह इस संस्था से जुड़ी ही है तो उससे जुड़ा लेडीज क्लब का भी काम कर दे. कोई थोड़ा सा भी पुण्य का काम करे तो पहचान अपने-आप मिलने लगती है, लेकिन एक सच्चा साधक अपने लक्ष्य पर ही नजरें रखता है, वह लक्ष्य है परमात्मा, उससे कम कुछ भी नहीं ! आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद गुरूजी की कृपा का अनुभव हुआ, उन्होंने जैसे उसके मन में उठने वाले सवालों का जवाब दिया. आज जून ने कहा कि अगले महीने मुम्बई में उनकी पांच दिनों की ट्रेनिंग है, क्या वह यात्रा बीच में छोड़कर वहाँ जाएँ ? तो उसने कहा, हाँ, वह जा सकते हैं, भीतर कोई द्वंद्व नहीं बचा, कोई संदेह नहीं. इस दुनिया में ऐसा कुछ रहा ही नहीं बल्कि था ही नहीं जो परमात्मा से बढ़कर हो, वह जिसे मिल जाये अथवा उसकी जिसे तलाश हो वह किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है. गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य की अमृत वाणी पढ़ी, उनकी वाणी में आग है, कितने स्पष्ट दो टूक हैं उनके वचन. महामानव थे वह और बने कैसे, केवल परमात्मा की कृपा से ! उनके भीतर जो अनंत शक्ति छुपी है वह उसी की तो है, परमात्मा प्रकट होने को उत्सुक है, वे प्रमाद के कारण कभी अज्ञान के कारण स्वयं को दीन-हीन जानते हैं, वास्तव में वे शक्ति के ऐसे पुंज हैं जो इस दुनिया को बदल सकती है ! अगले दो घंटे उसे पढ़ाना है. शाम को सत्संग भी है.
कल दोपहर ‘मिजोरम’ पर पढ़ती रही, शाम को क्लब में मीटिंग थी. इस बार जो सदस्या संपादन कर रही हैं, उनका काम करने का तरीका बिलकुल अलग है. पहले तो उसे पत्रिका के मुखपृष्ठ, सज्जा आदि से कोई मतलब ही नहीं रहता था, केवल हिंदी की प्रूफ रीडिंग तक ही उसका काम सीमित था. कल एक नाम भी उसने सुझाया ‘AAMI NAM METRI’ उत्तर भारत की सात बहनों के सारे नामों के पहले अक्षरों को लेकर. आज अंकुर में दो दर्जन बच्चे आए थे, रामलीला खेली, उससे पहले रामायण की कहानी सुनाई, बच्चों को नाटक में बहुत मजा आता है. आज आकाश में बादल छाये हैं. 

Thursday, February 25, 2016

संस्कारों के बीज


फिर एक अन्तराल ! नये वर्ष का चौथा महीना बीतने को है, कितने ही पल हाथ से गुजरते जा रहे हैं, कुछ खट्टे कुछ मीठे, वह साक्षी है उन सभी की. सभी के प्रति सम्मान का भाव सदा मन में रहता है पर कभी-कभी वाणी कठोर हो जाती है, पूर्व के संस्कार कभी-कभी प्रकट हो जाते हैं. उनकी भावनाएं चाहे शुद्ध हों पर कर्म जब तक उनकी साक्षी नहीं देते तब तक वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते. आज सुबह इतने वर्षों में पहली बार स्वीपर को भी उसके क्रोध का प्रसाद मिला. चाहे उनके क्रोध करने का कारण कितना भी सही क्यों न हो पर क्रोध सदा करने वाले को तथा जिस पर किया गया हो उसे, दोनों को जलाता है, क्योंकि क्रोध में वे द्वैत का शिकार होते हैं. क्रोध क्षणिक पागलपन ही है, वही बात जो वे क्रोध में कह रहे हैं, शांत भाव से भी तो कह सकते हैं. क्रोध के बाद सिवाय पछतावे के कुछ भी हाथ नहीं आता. उसके भीतर अभी भी कितनी नकारात्मक भावनाएं भरी हैं. इतने वर्षों का ध्यान भी उन्हें मिटा नहीं पाया, बीज रूप में वे संस्कार पड़े हैं जो मौका मिलते ही पनप उठते हैं, लेकिन गुरू का ज्ञान तत्क्षण हाजिर हो जाता है और भीतर प्रतिक्रमण होने लगता है, पुनः हृदय पूर्ववत शांत हो जाता है. लेकिन जहाँ वे शब्द गये हैं वहाँ तो पीड़ा पहुँच ही चुकी है, दूसरे की गलती होने पर भी उसे पीड़ा पहुँचाने का उन्हें कोई हक नहीं बनता, उसमें उनकी ही हार है, स्वयं के लिए ही उन्हें शांत रहना सीखना होगा.


सुबह पांच बजने से पूर्व उठी, सद्विचारों को सुना. क्रिया आदि की. भीतर झाँका तो पाया सम्मान पाने की, अपने लिखे लेख पर कुछ प्रतिक्रिया सुनने की आकांक्षा भीतर बनी हुई है. उसका लिखने किसी अन्य के लिए महत्वपूर्ण क्यों हो ? किसी को क्या पड़ी है कि पहले तो वह पढ़े फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे. यदि वह लिखती है तो इसलिए कि उसे उसमें सुख मिलता है, बस वही उसका प्राप्य होना चाहिए. ईश्वर ने उसे यश का भागी बनाकर अहंकार से भरने के लिए तो इस संसार में नहीं भेजा है. उसके जीवन का उद्देश्य परम सत्य को पाना ही तो है, उसमें बाधक हैं यश, सुख-सुविधाएँ, अति व्यस्तता. उसका जीवन तो कितना साधारण है, यहाँ एकांत है, समय है, साधना का उपयुक्त वातावरण है. ऐसा सहज, सरल, स्वाभाविक जीवन पाकर और क्या चाहिए. आत्मस्वरूप में स्थिति बनी रहे, बोध बना रहे, किसी को उसके कारण रंचमात्र भी पीड़ा न हो, उसके मन को भी कभी कोई दुःख स्पर्श न करे. सहज हों उसके सभी कार्य, उसके सभी संबंध भी सहज हों तभी तो भीतर सत्य प्रकट होगा. उसके लिए अनुकूल वातावरण भीतर बनाना है, कोई चाह नहीं, कोई कामना नहीं, कोई आकांक्षा नहीं, बस एक प्रतीक्षा ! कब आएगा वह, और एक अटल विश्वास कि वह परम भीतर प्रकटेगा अवश्य ! वह अस्तित्त्व, वह चिन्मय तत्व जो भीतर कभी नाद तो कभी प्रकाश रूप में दिखाई देता है, वह स्पष्ट हो उठेगा, पर उसके पूर्व धो डालना होगा सारा कलुष, धो डालनी होगी सारी आतुरता, सारा द्वेष, सारी असंवेदनशीलता, भरना होगा प्रेम से भीतर का वातायन !

Thursday, September 24, 2015

गॉड लव्स फन



वे कितनी साधना करते हैं पर क्रोध, लोभ, मान, माया तो खत्म नहीं होते. जब तक यह ज्ञात नहीं होता कि वे कौन हैं? कर्ता कौन है? आत्मा में स्थिति हुए बिना वे कभी भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकते. आत्मा अकर्ता है तो वह भोक्ता भी नहीं हुआ. वे वास्तव में वही चैतन्य हैं, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तो आत्मा की ही शक्ति से हैं. कल से वह ‘गॉड लव्स फन’ पढ़ रही है. गुरूजी का ज्ञान अनमोल है, अनोखा है, अद्भुत है और अनुपम है. कितनी सरल भाषा में कितने गूढ़ विषय को वह समझा देते हैं. कुछ वर्ष पहले यह पुस्तक पढ़ी थी पर अब कुछ भी याद नहीं था. यूँ तो सारा ज्ञान उनकी आत्मा में ही है, सद्गुरु उनकी आत्मा ही तो हैं. वह ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि हैं जो उन्हें उनका परिचय कराने आये हैं. वह कहते हैं कि उन्हें प्रसन्न रहकर अपने जीवन को एक खेल समझते हुए, एक उत्सव समझते हुए जीना चाहिए. उनका ध्यान अपने मन की समता पर होना चाहिए, परिस्थितियां कैसी भी हों, उनसे प्रभावित न हों क्योंकि यह जगत भ्रम रूप ही है अर्थात स्वप्न रूप ही है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है, जब यह जीवन ऐसा ही है तो इसे लेकर इतना गम्भीर होने की क्या आवश्यकता है, इस जीवन में उन्हें बाहर से ख़ुशी लेने की भी जरूरत नहीं है. वे स्वयं ही ख़ुशी के स्रोत हैं. उनके मन की उलझन का कारण यही है कि वास्तव में वे जानते नहीं कि कौन हैं ?

पिछली दो रात्रियों से ॐ ध्यान करके सोये वे पता ही नहीं चला रात्रि कैसे बीत गयी. स्वप्न भी नहीं आये, आये भी होंगे तो याद नहीं रहे. मन में हर क्षण उसी परब्रह्म की स्मृति बनी हुई है. ध्यान में ऐसा अनुभव हुआ कि वह बिलकुल निकट ही है. वे जो भी सोचते हैं वह भी तो उसी स्रोत से आता है. लेकिन वह सारी सोचों से परे है. आज मौसम ठंडा है, रात को वर्षा हुई है. शाम को पंजाबी सखी के यहाँ सत्संग है. आज जून माँ को अस्पताल ले गये थे सुबह, अपने स्वभाव के अनुसार वह परेशान नजर आ रही थीं. घर में सबको शांत देखकर वह भी अब बदल रही हैं. परमात्मा ने उन्हें इसलिए ही निकट रखा है कि वे एक-दूसरे से कुछ सीखें ! आज सुबह सद्गुरु को सुना ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर उनके प्रवचन कितने गहरे हैं और कितने सरल भी, प्रेम को वे लाख चाहें, पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर सकते. उनके भीतर प्रेम का दरिया ठाठें मार रहा है, वे उसे महसूसते हैं पर बाहर नहीं ला पाते. संत पारदर्शी हो जाते हैं. उनके भीतर का प्रेम बाहर रिसने लगता है.

भक्ति, ज्ञान तथा कर्म ये तीनो आपस में जुड़े हैं परमात्मा का ज्ञान होने पर भीतर भक्ति का अनुभव होने ही लगता है और तब सद्कर्म होने लगते हैं या वे सद्कर्म करते हैं तो ज्ञान का उदय होता है और तब भक्ति मिलती है, अथवा तो भक्ति धीरे-धीरे ज्ञान तक ले जाती है फिर निष्काम कर्मों तक. उसके जीवन में भक्ति है, ज्ञान है तथा कर्मों का आरम्भ हो चुका है. इस शरीर को बनाये रखने के लिए भगवान की सुंदर व्यवस्था है, मन भक्ति में लगे इसकी भी व्यवस्था प्रभु ने उसके लिए कर दी है. ज्ञान के साधन हैं, सत्संग है, जो कुछ एक साधक को चाहिए वह सभी कुछ है देर परमात्मा की तरफ से नहीं है, देर जो भी है वह उसकी तरफ से ही है.

वही सच्चा पुरुषार्थ है जो आत्मा के लिए किया गया हो. इस क्षण हृदय शांत है, अभी कुछ देर पूर्व ही वह ध्यान करके उठी है. भीतर के सारे द्वंद्व समाप्त हो गये हैं. यह जगत तथा शरीर दोनों समानधर्मी हैं, परिवर्तनशील तथा सुख-दुःख के कारण. किन्तु आत्मा परमात्मा का अंश है सो सदा अछूता है. मन इन दोनों के बीच का पुल है, वे इस पुल पर खड़े हैं. चाहे तो आत्मा के आनंद को प्राप्त करने के लिए भीतर उतरें अथवा जगत की ओर मुड़ें, जहाँ छलावा ही छलावा है. मन के इस पुल पर खड़े उन्हें कितने जन्म बीत गये हैं, वे कभी इधर तो कभी उधर का रुख लेते हैं, फिर दोनों से घबराकर बीच में आ जाते हैं, वे न तो पूरी तरह संसार के हो पाते हैं और न ही पूर्ण रूप से आत्मा को जान पाते हैं. इसी तरह यह जन्म भी न गुजर जाये, सद्गुरु उन्हें चेताते हैं. एक बार आत्मा के पारस का स्पर्श हो जाये तो जगत उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, सारी साधना उसी डुबकी के लिए है, जो उन्हें आत्मा के सागर में लगानी है.


Friday, August 21, 2015

मलेशिया का मौसम


अभी-अभी नैनी ने कुछ कहा पर वह ठीक से सुन नहीं सकी और कुछ और समझ कर उस बात का जवाब दिया. उसका ध्यान पूरी तरह से उस पत्र में था जो वह सद्गुरु को लिख रही थी. आज सुबह एक परिचित का फोन आया, तीन दिनों के लिए उन्हें स्थान मिल जायेगा. कोई शुभ कार्य करने जब कोई निकलता है तो प्रकृति उसमें सहायता करने को आ जाती है. उसे लगता है उनका यह सेवा प्रोजेक्ट बहुत सफल होगा. ईश्वर के लिए किया गया कार्य कभी असफल हो ही नहीं सकता. कुछ देर पहले जून का फोन आया था, सुबह ससुराल से पिताजी का फोन भी आया, टिकट कराने की बात कह रहे थे. आज सुबह चिड़ियों की आवाज ने जगाया, स्वप्न में देखा( या वह तंद्रा थी) कि नीले आकाश में गुरूजी आगे-आगे तथा वह पीछे-पीछे चल रही है. मौन है प्रकृति ! मौन से ही ओंकार की उत्पत्ति हुई, उस दिन यह बात सुनी, यह बात सीधे दिल में उतर गयी है, मौन भाने लगा है..भीतर का मौन, कभी-कभी जब कोई विचार नहीं रहता वह इस मौन को सुनती है. यही वह शांति है, जिसे वह अनुभव करती आई है उसमें से फिर आनंद फूटता है, सभी क्यों नहीं इस आनंद को चख पाते, कितना सहज है यह पर जिसे नहीं मिला उसके लिए उतना ही कठिन ! तभी तो कहते हैं ईश्वर निकटतम है और दूरस्थ भी ! वह तो जैसे कृत-कृत्य हो गयी है. कृतज्ञता से कभी-कभी आँखें भर आती हैं. शास्त्रों के वचन कितने सच्चे लगते हैं. संतजन प्रिय लगते हैं और परमात्मा अपने लगते हैं, यही तो भक्ति है न !
बाहर तपन है पर भीतर शीतलता है ! जिसे तृष्णा की आग नहीं जलाती वह सदा ही शीतलता का अनुभव करता है. आज सुबह उठी तो मन-प्राण ध्यान से पूर्ण थे, आज एकादशी है, मन भोजन का ध्यान तो कर रहा है पर फलाहार का ही. मन का निरोध करना तो सम्भव नहीं लगता हाँ उसकी धारा को एक गति अवश्य दी जा सकती है. कल ध्यान करते समय मन में वह घटनाएँ मुखर हुईं जिनमें अन्यों का दोष देखा था. अपनी गलती तब नजर नहीं आई थी, पर अब स्पष्ट दिखी. भीतर की गंदगी को बाहर कर ध्यान पवित्र कर देता है. उस दिन जून जो इतना क्रोधित हुए तो बिलकुल सही था. उसने श्रद्धा का दामन छोड़ दिया था, अपनी अस्वस्थता से कितनी शीघ्र घबरा गयी थी. धैर्य का साथ छोड़ देने से वे बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों को अपने सुख-दुःख के लिए दोषी मानने लगते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनके स्वयं के कर्म ही उन्हें सुखी-दुखी बनाते हैं, फिर जिन्हें वे स्वयं से भी अधिक प्रेम करते हैं, उन्हें अपनी पीड़ा के लिए ( अपनी तुच्छ पीड़ा के लिए ) दोषी ठहराना तो निहायत ही घटिया काम है. वह कितना नीचे गिर गयी थी, ईश्वर ने सब देखा होगा, हंसा होगा वह कि उससे प्रेम का दम भरने वाली स्वयं का दर्द नहीं सह पायी. इस जन्म में जिस किसी को भी उसने जितनी भी बार दुखी किया है, सबमें उसका दोष स्पष्ट रूप से था, वह सभी से क्षमा मांगती है ! अपने उस दोष के कारण ही उसने स्वयं भी बहुत दुःख उठाया है, अब और नहीं..बस..यह बात सदा याद रहे !

हँसी आती है अपनी मूर्खता पर कि अपने जिस दुःख को वह इतना महत्व दे रही थी, वह तो कुछ था ही नहीं, उसकी तुलना में औरों के दुःख कितने बड़े थे पर वे तब भी मुस्कुरा रहे थे. उसका अहंकार ही तुच्छ से दुःख को बड़ा करके दिखाता है बल्कि जहाँ नहीं भी होता वहीं खड़ा कर लेता है. आज ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली एक लड़की की बातें सुनकर लगा कि वह अपने सारे दुखों के बीच कितनी शांत है. उसके पिता कैंसंर के मरीज हैं, मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल उसने जून से कहा कि ठीक ही चल रहा है, वह सोच रहे होंगे ऐसा क्या हो गया, आज फोन आने पर कहेगी कि सब कुछ बिलकुल ठीक है. वहाँ का मौसम कैसा है ? खाना कैसा मिलता है ? शाम को क्या करते हैं? तथा तबियत कैसी है ? उसने उनके बारे में कुछ पूछा ही नहीं, अपने तथा नन्हे के बारे में ही बताती रही. जून घर से दूर हैं, उन्हें उससे ज्यादा सम्भल कर चलना होता होगा. आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ, उससे पहले सद्गुरु का स्मरण हुआ और मन कृतज्ञता से भर  गया, कितना विश्वास है उनके भीतर, कितनी सहजता, कितना अपनापन, कितना प्रेम..उन्हें सुनना एक अनोखा अनुभव है, वह शांति का सागर हैं, सुबह उठी तो कैसी बेचैनी थी कि अभी तक सत्य का भान नहीं हुआ, पर उन्होंने बताया कि जो भी विकार हैं उन्हें देखते रहें, निर्मूल करने जायेंगे तो वे और दृढ़ होंगे, भीतर अपने आप से जुड़ते जाना है तो जो व्यर्थ है वह छूटता जायेगा अपने आप ही ! क्रोध के प्रति क्रोध का आना भी बंद करना होगा. प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह के उत्पन्न होने पर भी जो न तो हर्षित होता है न उद्ग्विन होता है, वही कृष्ण के शब्दों में स्थिरमति है ! 

Tuesday, April 28, 2015

नाश्ते में परांठे


कल शाम को माँ-पिता जी वापस चले गये, अभी तो वे ट्रेन में होंगे, आने वाली शाम को पहुंचेंगे. वह उस अद्वैत, अच्युत, अनादि कृष्ण की कथा सुन रही है. जीवात्मा यदि भक्त हो तो वह कृष्ण की कथा में ही तो रस लेगा ! इस मार्ग पैर कितनी ही सफलता मिले, फिसलने का डर रहता ही है. सद्गुरु माँ-पिता की तरह कभी प्रेम से तो कभी डांट-फटकर कर सन्मार्ग पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं. पिछले दिनों कई बार ऐसा हुआ जब वह मोह का शिकार हुई, अर्थात उसकी बुद्धि विकृत हो गई, पर झट ही सचेत भी हुई. शुद्ध अन्तःकरण में ही ईश्वर का प्रागट्य होगा. कृष्ण का अवतरण हृदय की जेल में होगा तो सारे बंधन खुल जायेंगे, सारी गांठें भी खुल जाएँगी, तब शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा. अभी बहुत कुछ सीखना है. यह मार्ग कितना भी लम्बा क्यों न हो पर सुखदायक है. सद्गुरु का ममता भरा हाथ और कृष्ण का अहैतुक प्रेम सदा-सर्वदा उसके साथ जो है.

“पायी संगत जो संतन की, पायी पूंजी अपने मन की” सद्गुरु ने अपने वचनों और अपने कार्यों से उन्हें ‘स्वयं’ से मिला दिया है, और उन्हें अपने आप से प्यार हो गया है. पहले स्वयं से आँख मिलते भी डरते थे और दूसरों से भी. अब हर जगह वही दीखता है तो डर किसे और किसका ? उन्होंने स्वयं ही अपने लिए बाधाएँ खड़ी की हुई थीं, अब इनका अंत होता नजर आता है. बुद्धिफल है अनाग्रह, किसी भी स्थिति का आग्रह नहीं करना है, समर्पित बुद्धि को ही यह फल मिलता है. आज सुबह जून ने अपने घटते हुए वजन को देखते हुए नाश्ते में परांठा बनाने को कहा, साथ-साथ उन्होंने नाश्ता किया सो अभी व्यायाम नहीं कर पायी है. ग्यारह बजे तक सभी शेष कार्य हो जायेंगे यदि एक-एक मिनट का उपयोग किया तो. मौसम आज अच्छा है, पापा-माँ अभी भी ट्रेन में बैठे होंगे  !

नौ बजने को हैं, आज भी मौसम बदली भरा है, नैनी किचन की विशेष सफाई कर रही है. कल शाम को फोन आया, वे लोग सकुशल पहुंच गये हैं, उन्हें यहाँ रहना यकीनन अच्छा लगा होगा, वह बल्कि परीक्षा में कई बार फेल होते-होते बची. सबसे पहले तो असत्य भाषण, चाहे कितना भी निर्दोष असत्य हो..पर उससे छुटकारा तो पाना है न, दूसरा क्रोध, यह बहुत कम रह गया है पर समाप्त नहीं हुआ है, तीसरा लोभ, यह बहुत ज्यादा है, वस्त्रों की कमी का अहसास और किसी को दिए जाने वालों सामानों पर नजर रखने की प्रवृत्ति.. मन यदि शुद्ध नहीं तो ध्यान कैसे होगा और ध्यान में उतरे बिना ज्ञान भी नहीं टिकेगा...जीवन में ज्ञान नहीं तो पशु से भी गया गुजरा है जीवन...कृष्ण को सदा मन में बसाये रखे तो वही मुक्त करेगा... संगीत का अभ्यास हो चुका है. उसके गले में हल्की सी खराश है, सिर भी थोड़ा भारी है, कल रात पंखा तेज करके सोयी सम्भवतः यही कारण हो, पर यह इतनी मामूली सी बात है कि..अभी पाठ करना शेष है, माँ थीं तो वे सुबह-सुबह ही पाठ कर लेते थे, वे रोज सुनती थीं. एक सखी के ससुरजी  अस्पताल में दाखिल हैं. सम्भवतः अंतिम दिन नजदीक आ रहे हैं, आत्मा की नश्वरता के बारे में जानकर इतना ज्ञान तो हो चुका है कि शरीर जो जर्जर हो चुका है, उसके प्रति मोह न रहे. सो मन में दुःख नहीं होता. जीवन जितना भी जियें होशपूर्वक जियें, तभी सार्थक है अन्यथा तो लकड़ी के लट्ठे का सा ही जीवन है. सजगता अत्यंत आवश्यक है. एक चेतन सत्ता है जो उनके प्रत्येक कार्य, विचार व वचन की साक्षी है, उससे वे कुछ भी छुपा नहीं सकते. वह उनका आदर्श बने, तभी मुक्ति सम्भव है. श्रद्धा रूपी जल, मन रूपी सुमन था अपने कर्मफल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही ईश्वर को समर्पित करना है.





Wednesday, April 1, 2015

तहरी का स्वाद


उसे लगता है क्रोध व्यक्तित्व को मिटा देता है, इच्छा अपने इशारों पर नचाती है और मोह विवेकहीन कर देता है. अपना आपा भूल जाएँ तो ऐसे शब्द निकल आते हैं जिनपर बाद में पछताना पड़ता है. एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सिर उठा लेती है और मोह भय का कारण बनता है. जीवन की धारा तभी बदल सकती है जब यह ज्ञान हो कि देह साधन रूप में मिला है. मुस्कुराते, गुनगुनाते तथा सबके भीतर तरंग पैदा करते हुए जीना होगा. मन का स्नेह, बुद्धि का विचार और आत्मा का आनंद सभी तो परमात्मा का दिया हुआ है. जो मिला है वह कभी भी छूट सकता है. जब तक देह में बल है तब तक इसकी कद्र करनी है. मन की सौम्यता को बनाये रखना है. ईश्वर हर क्षण साक्षी रूप से साथ है, अल्प बुद्धि से वे अल्प ही तो सोचेंगे. उसके साथ योग लगा रहेगा तो बुद्धि मार्ग पर रहेगी. मन एकदम हल्का हो जाये, पारदर्शी.. तो उसकी झलक अपने आप ही दिखायी देगी.

आज अमावस्या है, यानि उसके उपवास का दिन. सही मायनों में उपवास तो तभी होगा जब मन दिन भर भगवद् भाव से परिपूर्ण रहे. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में वे उठे. ‘क्रिया’ की और सत्संग सुना. संतों की वाणी सुनकर मन भाव विभोर हो गया है. भगवद् प्रेम की एक बूंद भी मन को भरने के लिए पर्याप्त है, वही मन जो संसार भर की वस्तुएं पाकर भी अतृप्त ही रहता है, ईश प्रेम के रस में पूर्ण हो जाता है. वह जो इस सृष्टि का स्रोत है, उसे प्रिय है. उसका स्मरण ही उसे सारे दुखों से दूर ले जाता है.

आज दीदी का फोन आया. उन्हें व बुआजी को पत्र मिल गये हैं यानि दो के जवाब उसे मिल गये. आज सुबह वे देर से उठे. कल सत्संग से आयी तो जून ने खाना ( तहरी)  बना लिया था. खाते-खाते थोड़ी देर हुई. कल योग अध्यापक भी आये थे. उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित बहुत अच्छे कुछ नये भजन गाए. इसी माह एक दिन विश्व शांति दिवस है, गुरूजी ने उस दिन शाम को साढ़े चार बजे सभी को अपने अपने सेंटर पर सत्संग करने को कहा है. इससे सब ओर शांति का संदेश फैलेगा, उनका भी योगदान उसमें रहेगा. आध्यात्मिकता का एक बड़ा उद्देश्य है लोकसंग्रह, यानि सेवा, दूसरों के जीवन में यदि कोई ख़ुशी का संचार कर सके, तो समाज के ऋण से कुछ तो मुक्त हो सकता है. एक व्यक्ति अपने लिए समाज से कितना कुछ लेता है यदि उसका शतांश भी लौटा सके तो समाज का कितना भला होगा. आज सुबह उसने सुना साधना के लिए पहला गुण है पवित्रता, अर्थात मन कभी कपट का आश्रय न ले, प्रमादी न हो. भक्ति मार्ग सरल कर देती है. कल शाम उन्होंने कृष्ण के कई भजन गाए, अच्छा लगता है उसके नाम का उच्चारण ! वह अति निकट है, इतना निकट,...इतना निकट कि दरम्यान से गुजर सके न हवा !


आज सुबह ध्यान में कृष्ण की अनुभूति हुई, जैसे वह उसके प्रश्नों को सुन रहे थे और जवाब दे रहे थे. ऐसा होता है कि कुछ दिन उसका हृदय, मन, बुद्धि पूरी तरह उसे अपनी धारणा का विषय बना लेते हैं और फिर अपने आप ही कभी-कभी वह दूर चला  जाता है. करने से कुछ नहीं होता. ‘थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई’ वह अपने आप ही हृदय में आकर दस्तक देता है. लेकिन इतना तो निश्चित है कि एक बार उसे चाहने की कला आ जाये वह उन्हें कभी छोड़कर नहीं जा सकता. वह भी उतना ही अपना लेता है. आज शनिवार है उसकी संगीत कक्षा का दिन, वर्षा कल रात से ही हो रही है. नन्हा स्कूल गया है, आज वह अपना प्रोजेक्ट ले गया है. उसे आराम-आराम से अपना काम करना पसंद है. जून की तरह जल्दबाजी उसके स्वभाव में नहीं है और यह भी कि जितना जरूरी हो उतना ही काम किया जाये, व्यर्थ ही अपने ऊपर बोझा लादना भी उसे पसंद नहीं, यह मानसिक स्थिरता की निशानी है. ईश्वर उसे सद्बुद्धि भी दे और वह सफलता प्राप्त करे. 

Thursday, February 5, 2015

आम के बौर की गंध


आज सुबह कराची वाले संत से ये सुंदर वचन सुने, “जैसे वे अपना कीमती सामान सुरक्षित रखते हैं वैसे ही अपना मन तथा बुद्धि कृष्ण के भीतर सुरक्षित रख के निश्चिन्त हो जाना चाहिए. अन्यथा मन के चोर उसे ले जायेंगे  अथवा मन अपनी चंचलता के कारण ही भटक जायेगा, खो जायेगा ! मन जब कोई संकल्प करता है तो बुद्धि उसके पक्ष या विपक्ष में निर्णय लेती है. इन्द्रिय रूपी अश्व और मन रूपी लगाम यदि ईश्वर को समर्पित बुद्धि के हाथ में हो जीवन सही मार्ग पर आगे बढ़ेगा !” इस समय पौने दस बजे हैं, साढ़े आठ बजे तक जब तक जागरण सुना और उसके बाद कुछ देर तक तो उसका सुमिरन चलता रहा, फिर व्यायाम, भोजन, दो सखियों से फोन पर बाते करने में विस्मृत हो गया, लेकिन अब पुनः उसी का स्मरण हो आया है. पड़ोसिन की तबियत ठीक नहीं है, उसे दिल की बीमारी है जो कभी-कभी बढ़ जाती है, उससे मिलने जाना है.

भक्ति का अभ्यास करना होता है इसे ही अभ्यास योग या साधना कहते हैं. कृष्ण उन्हें आश्वासन देते हैं कि यदि उनकी ओर जाने का लगाता प्रयास करते हैं तो एक न एक दिन अवश्य सफल होंगे ! भगवद गीता में कृष्ण कई अध्यायों में भक्तियोग पर चर्चा करते हैं पर बारहवें अध्याय में वह स्पष्ट आमन्त्रण देते हैं. आज अभी कुछ देर पूर्व छोटे भाई का फोन आया उसे उनकी भेजी पुस्तकें मिल गयी हैं. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है ! कल शाम उसे इसका अभूतपूर्व अनुभव हुआ ! आज मौसम बेहद अच्छा है, ठंडी, सुहानी, शीतल हवा बह रही है जिसमें आम के बौर व फूलों की सुगंध है ! सुबह पांच बजे से कुछ पहले ही उठी, क्रिया की, मन थोडा उद्व्गिन था लेकिन हर पल उसे अपने मन के भाव का बोध रहता है सो कोई भी अनचाहा भाव टिकने नहीं पाता. कृष्ण की स्मृति उसे हटा देती है. आज वह पुरानी संगीत अध्यापिका के यहाँ भी जाएगी, उन्हें पुस्तक देनी है और उनके गोद लिए पुत्र से मिले भी बहुत दिन हो गये हैं. एक और परिचिता को फोन किया पर वह मिली नहीं, कल पता चला कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. मन में संसार समाया है जहाँ केवल कृष्ण होने चाहिए. हो सकता है वही उसे प्रेरित कर रहे हों. आज कादम्बिनी की समस्यापूर्ति का हल भी पोस्ट किया है.

आज नन्हे की अंतिम परीक्षा है. सुबह से ही वह व्यस्त है. पांच बजे उठी, उसके पूर्व पौने चार बजे जी नींद खुल गयी थी. तिनसुकिया स्टेशन से जून के एक सहकर्मी का फोन आया था, उनकी ट्रेन तीन बजे ही पहुंच गयी थी पर कार तब तक नहीं पहुंची थी. जून की नींद रात को भी डिस्टर्ब रही, सो नन्हे को छोड़ने जाते समय उनके सर में दर्द था. उसका भी हाल कुछ ठीक नहीं रहा. बेवजह ही नैनी पर क्रोध किया, अपने भीतर का उठता क्रोध का आवेग बहुत अजीब लग रहा था, आश्चर्य भी हुआ कि यह था उसके भीतर, जो भीतर न हो वह महसूस कर भी कैसे सकते हैं, फिर कृष्ण के नाम का जप किया, कृष्ण हर संकट में उसकी रक्षा करते हैं. दो परिचितों के फोन आये, दोनों को नन्हे की किताब-कापियों में से कुछ चाहिए. आज सुबह भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी से बात हुई, दीदी AOL का कोर्स नहीं कर पा रही हैं, खैर..उन्हें भविष्य में कभी पत्र लिखकर अपने मन की बात कहेगी. पिताजी के यहाँ आने की उम्मीद उसे अब भी है, मई या जून में सम्भवत वह यहाँ आयेंगे. आज ‘आत्मा’ में गीता का बारहवां अध्याय ही चल रहा था. कृष्ण उन्हें आकर्षित करते हैं पर संसार की ओर वे खिंचे चले जाते हैं, उनकी वृत्तियाँ बहिर्मुखी हैं. अन्तर्मुखी होकर कृष्ण को अनुभव करने का प्रयास भी नहीं करते, जबकि उसका आश्रय लिए बिना इस भवबंधन से मुक्ति पाना असम्भव है. उसका मन कृष्ण का आश्रय ले चुका है और अब इससे उसे कोई नहीं अलग कर सकता !
   
 



Friday, August 29, 2014

गेंदे की क्यारी


कल शाम वह नैनी पर झुंझलाई और आज सुबह स्वीपर पर, दोनों अपने काम को टालने का प्रयत्न कर रहे थे. कभी-कभी ऊपर से क्रोध करना जरूरी हो जाता है, पर क्या वास्तव में सिर्फ ऊपर से ही क्रोध कर रही थी? इसका एक प्रमाण तो यह है कि अगले ही पल मन शांत था जबकि पहले देर तक असर रहता था. पूसी ने अपने बच्चों को बाहर खुले में ही रख छोड़ा है, जून का विचार है कि उन्हें प्राकृतिक रूप से पलने-बढ़ने दिया जाये, उसका भी यही विचार है, उस दिन उनके लिए दफ्ती के डिब्बे का घर बनाते-बनाते स्वयं को रोक लिया. आज भी धूप निकली है पर हवा बह रही है वह बाहर लॉन में ही बैठी है. दूर से किसी वाहन की आवाज आ रही है. कभी संगीत की और पंछियों की आवाजें भी ध्यान से सुनने पर आती हैं. कल शाम की पार्टी में पता चला कि ग्रेटर नोएडा में अपना घर बनाने के लिए जो सोसायटी बनाई गयी है उसमें ज्यादातर लोग रहने के लिए नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट के लिए पैसा लगा रहे हैं. जून भी कल की मीटिंग से ज्यादा खुश नहीं थे. पहली किश्त भरने के लिए उन्होंने पहले मकान के किराये के जमा हुए पैसे मंगाए हैं. सबकी बातें सुनकर तो उसे लगा कि एक बार और उन्हें भी सोच लेना चाहिए. रोज के कामों के आलावा आज उसे नन्हे का स्वेटर बनाना है, सुभाष चन्द्र बोस व शंकरदेव पर किताबें भी पढनी हैं. पत्रिकाएँ और अख़बार तो हैं ही. कविताओं वाली डायरी खोलनी है. बगीचे में भी कुछ समय देना है. कुल मिलाकर आज का दिन व्यस्त रहने वाला है.  

आज उसने जो सुना, उसका सार था, “साधना करने के लिए सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, श्रद्धा, भावना और विश्वास चाहिये, पुलक चाहिए, मन को पूरी तरह अहंकार से मुक्त करना होगा. भीतर डूबना आना चाहिए. ध्यानस्थ होना पड़ता है. अपने चित्त की सौम्यता को नष्ट नहीं होने देना चाहिए. मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भाव रखते हुए अपने चित्त को प्रसन्न रखना होगा. समय की धारा के साथ पुराने कर्मों का लेन-देन चलता रहता है. नये कर्मों का बंधन न बने यही प्रयास करना चाहिए.

कल वह गाने की प्रैक्टिस में नहीं जा सकी, आज साढ़े पांच बजे जाना है. परसों मीटिंग है. वह बाहर है गेंदे की क्यारी के पास, अभी एकाध फूल ही खिले हैं इसमें. आज सुबह माँ से फोन पर बात की. कल चचेरी बहन की शादी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. उसके मामा के परिवार ने काफी कुछ दिया. इधर उनकी तरफ से सभी का सहयोग रहा. यहाँ बाहर बैठकर चेहरे पर जो शीतल हवा छूकर जाती है, भली लगती है, उसका अहसास अंदर घर में नहीं हो सकता, पर तरह-तरह की आवाजें आती रहती हैं सो गम्भीर कार्य नहीं हो पाते. आज सुबह वह जल्दी उठी थी सो सभी कार्य समय से सम्पन्न हो चुके हैं. आजकल जून के प्रति उसका व्यवहार थोड़ा कम स्नेहपूर्ण रहता है. छोटी-छोटी बातों से चिढ़कर वह जवाब दे देती है. सहनशीलता खोती जा रही है या फिर अपनापन बढ़ता जा  रहा है. अब संगीत का समय है सो अंदर जाना चाहिए.

जीवन में ज्ञान और ध्यान हो तभी मुक्ति सम्भव है ! कल सुबह उसके दायें हाथ की अंगूठे के पास वाली अंगुली में जोड़ पर एक कांटा लग गया, बात छोटी सी है पर उसके मन ने उस हल्के दर्द को भी बड़ा मानकर देखा. नन्हे के हाथ का दर्द इससे कहीं ज्यादा रहा होगा लेकिन उसने संयम से सहा. इस वक्त सुबह के साढ़े सात बजे हैं वह टीवी पर  बाबाजी के आने की प्रतीक्षा में है.

“अपने मन. बुद्धि, विचार को देखने वाला इनसे अलग है, यदि इनसे जुडकर रहेंगे तो सही निर्णय नहीं कर पाएंगे. देह, मन बुद्धि के साथ जुड़कर कोई ‘स्वयं’ को खो देता है. इसका कारण तमो व रजो गुण है. यदि सात्विक गुण की प्रधानता हो तो धीरे-धीरे इन से मुक्त होना आयेगा. तमो गुण की प्रधानता का अर्थ है आलस्य व स्वार्थ और रजो गुण की प्रधानता का अर्थ है अपने मान-सम्मान की वृद्धि का सदा प्रयास करते रहना. देह की आवश्यकता सांसारिक वस्तुएं हैं, पर ‘स्वयं’ की आवश्यकता परमात्मा का स्वभाव है. ‘स्वयं’ को खोजना ही वास्तविक विज्ञान है. अंत में उन्होंने कहा एहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन भर प्रयास चलता रहता है पर स्वयं की आवश्यकता को नजर अंदाज कर दिया जाता है.

  



Tuesday, July 15, 2014

पूसी का परिवार


आज उनतीस अप्रैल की सुबह नौ बजे वह पंच भूतों, समस्त देवी-देवताओं व परम सत्ता को साक्षी बनाकर एक घोषणा करना चाहती है. “मानवीय सद्गुणों में जो सर्वोत्तम है, जिसके कारण इस सृष्टि में सुन्दरता है, वही प्रेम समस्त प्रश्नों का हल है”. उसने सोचा, यदि मानव, मानव के प्रति प्रेम का भाव रखे तो इस संसार से सारे वैमनस्य, सारी क्षुद्रता पल भर में मिट जाये. प्रेम लेकिन सच्चा होना चाहिए, ऐसा प्रेम प्रतिदान नहीं माँगता, वही प्रेम जो सबके जीवन में एक न एक बार अवश्य उदित होता है, पर उसे कुचल दिया जाता है, ईर्ष्या, लोभ, मोह, और क्रोध जैसे अवगुण उसे ढक लेते हैं. वह बीती वस्तु बन कर रह जाता है और कभी-कभी लगता है कि प्रेम कहीं था ही नहीं, शायद वह भ्रम था, पर वह भ्रम नहीं था, वह सत्य था जो झूठ के नीचे दबा सिसक रहा होता है. यदि क्रोध सत्य हो सकता है तो प्रेम क्यों नहीं. जरूरत है तो बस उस कोमल पौधे को जीवित रखने की, आस-पास के झाड़-झंखाड़ साफ कर उसे सही पोषण देकर बड़ा करने की, वही प्रेम का पौधा जीवन में फलीभूत होगा और खुशियों के फल देगा.

यह डायरी उसकी आध्यात्मिक यात्रा का भी दस्तावेज है, वर्षों पहले उस यात्रा का बीज अंतर में प्रकृति ने बोया था, पर मौसम आते-जाते रहे, कभी अनुकूलता मिली, कभी प्रतिकूलता और अंकुर से पौधा बनने में इतना वक्त लग गया. आज भी यह एक पौधा है अर्थात यात्रा का आरम्भिक चरण, लेकिन अब इसे दिशा मिल गयी है. भारत के मनीषियों, ऋषियों, संतों और अवतारों के जीवन, उनके सदुपदेश ने इसे पानी और भोजन दिया है. कल जून कोलकाता होते हुए मुम्बई से यहाँ आ गये. वह दोपहर का खाना खाकर थोड़ा आराम कर रही थी, टीवी पर ‘दिल ही दिल में’, internet love पर फिल्म आ रही थी. जून थोड़ा थके हुए थे, जो स्वाभाविक ही है, पर खुश थे, उनका भाव वही पहले की तरह था छलकता हुआ. शाम को एक सखी आयी, बेटे के लिए हिंदी के प्रश्न पूछने. बाद में उसे एक सखी को बुलाना पड़ा, जिसे पेट्स का अनुभव है, पूसी अपने बच्चों को भूखा छोड़कर रात से ही गायब थी, भूख से व भीग जाने के कारण वे रो रहे थे, उसने बड़े प्यार से दूध पिलाया और सुखाया और तब वे सो गये. रात को पूसी आ गयी थी, शायद वह कहीं शिकार को गयी थी. नन्हे का आज विज्ञान का टेस्ट है, कह रहा था प्रोजेक्ट वर्क में व्यस्त रहने के कारण क्लासेस ही अटेंड नहीं कर पाया था,  अपने आप पढकर, समझकर, याद करना कठिन कार्य है लेकिन उसे मालम है नन्हे का टेस्ट हमेशा की तरह अच्छा होगा.

ईश्वर पर विश्वास करो तो सब कुछ कितना सहल हो जाता है. आज मई महीने का दूसरा दिन है. उसके जन्मदिन का महिना. इस बार वह उस दिन अपने जन्मस्थान में होगी, जहाँ उन्होंने एक घर भी बनाया है भविष्य में रहने के लिए. वर्षों पहले जब वह बीस की हुई थी, सोच रही थी बहुत बड़ी हो गयी है, उस उम्र में बीस का होना भी बहुत बड़ा होता है. यह भी सोच रही थी कि इतने वर्षों में अपने जीवन का, ऊर्जा का, मानसिक शक्ति का सदुपयोग नहीं किया किन्तु आज वह मलाल नहीं है. जिन्दगी ने उसे बहुत कुछ दिया है और भरसक प्रयत्न करके उसने ईश्वर के मार्ग पर चलने का प्रयास जारी रखा है, क्योंकि वही एकमात्र सत्य है और हर मानव का अंतिम उद्देश्य है सत्य की प्राप्ति. आज सुबह जून ने उसे उठाया, वह और नन्हा दोनों उसके स्नेह के पात्र हैं, ऐसे स्नेह के जो निस्वार्थ, निष्काम और शुद्ध है, जो स्नेह के लिए स्नेह है, love for the sake of love क्योंकि सत्य के साथ ईश्वर प्रेम भी है. आज ‘जागरण’ में सुना सुख-दुःख आदि अवस्थाएं आती रहती हैं, इन्हें साक्षी भाव से देखने वाला आत्मा इनसे अलिप्त रहता है तो उसे यह प्रभावित नहीं करतीं. कल लाइब्रेरी से चार नई किताबें लायी है. आज से योगासन करते समय सचेत रहेगी, क्योकि ध्यानयुक्त होकर आसन करने से ही उसका लाभ मिल सकता है. आज नन्हे के स्कूल में extempore speech का टेस्ट है. नानाजी की दी एक डायरी से उसने सहायता ली है, कुछ साल पहले पिता ने ये डायरी उसे दी थी, जिनमें विभिन्न विषयों पर जानकारी है.






Sunday, December 29, 2013

बच्चों के कमरे के पर्दे


ऐसा क्यों होता है कि कभी-कभी भगवद् गीता के श्लोक और उनका अर्थ उसे पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है और कभी-कभी वे बहुत दुरूह लगते हैं. सम्भवतः इसका कारण है उसके मन की ग्राह्य शक्ति, वह एक सी नहीं रहती. कल की मीटिंग अच्छी रही, सुबह उसने इस सिलसिले में कई फोन किये. आज नन्हे का स्कूल जल्दी बंद होगा, माह का अंतिम दिन है. कल एक परिचिता ने बताया, उसे एक जगह काम मिल गया है, ठीक-ठाक पैसे मिलेंगे, लोग हमेशा ही पैसों को महत्व देते हैं. उसने जून को बताया तो वे भी यही बोले, ज्यादा पैसों के कारण थोड़ी तकलीफ सही जा सकती है, उसे आश्चर्य हुआ. उसने पुरानी बात याद दिलाई और बिना बात के ही मन को उदास किया. बाद में सोचा तो लगा, यदि कभी जून ने उसकी स्वतन्त्रता का हनन किया भी तो एक हक के साथ पर उससे उसके अहंकार को चोट पहुँची और ...क्या वाकई इन्सान का अहंकार इतना महत्वपूर्ण होता है कि रिश्तों की भी परवाह नहीं करता, वह उस वक्त भी खुद को समझने की कोशिश कर रही थी. अर्थात उसे भान था कि वह क्या कर रही थी, यह क्रोध में किया हुआ कोई ऐसा काम नहीं था जिसके लिए बाद में पछताना पड़ता है. उसे ठेस पहुँची थी और जून उस बात को समझ नहीं रहे थे. इसी को टेकेन for ग्रांटेड कहते हैं, उसका व्यवहार अनुचित था इसमें दो राय नहीं थी और इसलिय सुबह क्षमा मांगी और अब मन शांत है. आज दोपहर उसे हिंदी की क्लास लेने जाना है सो संगीत का अभ्यास अभी कर लेना होगा.

.... “और बुखार हो गया” कल इतनी धूप में वे तीनों हिम्मत दिखाते हुए तिनसुकिया गये. वापस आकर एक घंटे के अंदर ही उसे तपन सी महसूस हुई, बुखार चढ़ रहा था. पिछले कई हफ्तों से सबके बुखार की बात सुनते-सुनते वह स्वयं पर थोड़ा ज्यादा भरोसा करने लगी थी, स्वयं को ठीक रखने में सक्षम है, कि उसे कुछ नहीं हो सकता. जून कल से उसे कोई काम करने नहीं दे रहे हैं. पर उसने सुबह से अपने नियमित सभी काम किये हैं, पढ़ाना भी और दोपहर को संगीत सीखने भी जाएगी. छोटी बहन से बात की वह भी आराम करने व स्वास्थ्य लाभ के लिए घर आयी हुई है पर माँ-पिताजी छोटी बुआ के पास गये हैं उसकी देखभाल करने, अपने ही अपनों के काम आते हैं.  सुबह नन्हे ने कहा, फिर बुखार है, फिर माथा छूकर कहा, हाँ गर्म तो है. बुखार में लेकिन मन शान्त हो जाता है. ध्यान करने का प्रयास तो नहीं किया पर करे तो अवश्य आसानी होगी.

कल शाम को ही उसका बुखार उतर गया था. यूँ सुबह से ही वह उसे धता बताने का प्रयास कर  रही थी. शाम को अचानक आये मेहमानों का स्वागत भी सामान्य ढंग से किया. जून अलबत्ता कुछ ज्यादा ध्यान रख रहे थे. कल शाम उन्होंने नन्हे के कमरे के लिए नये पर्दे काटे, थोड़े से टेढ़े कट गये और वे घबरा गये पर बाद में पता चला समस्या उतनी गम्भीर नहीं थी जितनी वे समझ रहे थे. आज दोपहर से वह सिलना शुरू करेगी. आज खत भी लिखने हैं, राखियाँ भेजनी हैं. उसे ध्यान आया मंझले चाचा के बच्चों, दोनों भाई-बहन की उम्र हो गयी है पर उनके विवाह की कोई खबर सुनाई नहीं देती, बिन माँ के बच्चे ऐसे ही होते हैं. छोटे चाचा के बच्चे भी कुछ वर्षों में विवाह के योग्य हो जायेंगे. मातापिता के अयोग्य होने की सजा निर्दोष बच्चों को भुगतनी पडती है. आज भी धूप तो है पर गर्मी कम है.

जिन्दगी, कैसे कैसे राज छिपाए हैं तूने
खुल जाये तो फट जाये कलेजा खुदा का भी
जन्नत भी यहीं है और जहन्नुम भी इधर ही
मिल जाये सही राह तो मंजिल का पता भी