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Tuesday, May 18, 2021

ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स

नए वर्ष में पहली बार डायरी खोली है। मन में एक गहरी शांति है और कुछ भी लिखने जैसा नहीं लग रहा है। ‘कविता’ भी कई दिनों से नहीं लिखी। बुद्ध के बारे में दोपहर को पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ‘ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स’ में गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है. इसमें बुद्धि के जीवन के अस्सी वर्षों को गांव के एक भैंस चराने वाले लड़के स्वस्ति, जो बाद में उनका शिष्य बन जाता है, के माध्यम से और आंशिक रूप से स्वयं बुद्ध के माध्यम से दर्शाया गया है. जीवन के कितने गहरे सत्यों का अनुभव बुद्ध ने किया था, बच्चे उनके प्रथम शिष्य थे। बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है, क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं, वे सीधे आत्मा से ही अनुभव करते हैं। बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है; चीजें निरंतर बदल रही हैं। ध्यान की गहराई में जब तन, मन, भावना और विचार सब कुछ स्पष्ट दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता। सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं। इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है। प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है। वर्तमान में टिकना ही जागरण है, वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है। जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है। अतीत जा चुका वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है, इसमें पूरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्तव्य है। ऊर्जा का संरक्षण तब ही संभव है।  


सम्यक वाणी साधक के लिए अति आवश्यक है, उतनी ही जितना सम्यक कर्म, सम्यक विचार और सम्यक ध्यान। भोजन भी साधक को समुचित मात्रा में लेना चाहिए, ऐसा भोजन जो सुपाच्य हो और हल्का हो। आज सुबह का ध्यान अत्यंत प्रभावशाली था, चीजें कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। समझ जैसे  भीतर से स्वत: ही बह रही थी। मानव के भीतर कितनी समझ है और कितनी शांति, एक स्थिरता भरा अनंत आकाश है भीतर ! इसमें टिके रहना ही तो ध्यान है। 


आज भी ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा। कल से प्रारंभ करना है। आर्ट ऑफ लिविंग के एप में गुरुजी की लिखी कई किताबें हैं, वीडियो भी हैं, एक पूरा खजाना है। कल वे आश्रम जाएंगे। गुरुजी एक सप्ताह के लिए आश्रम में रहेंगे। वे स्वयं सेवक का कोर्स भी करने वाले हैं। आज भी दोपहर बाद बुद्ध की पुस्तक पढ़ी, कितनी अच्छी किताब है यह, उल्हास नगर की यात्रा के दौरान मासी के यहाँ यह किताब देखी थी, फिर यहाँ आकर मँगवाई। उसे उनका कृतज्ञ होना चाहिए। बुद्ध कहते हैं सभी कुछ आपस में जुड़ा है और नश्वर है। चीजें जैसी हैं वैसी ही उन्हें देखना आ जाए तो कहीं कोई तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, नकारात्मकता नहीं टिक सकती। स्वयं में टिककर ही वे आत्मा की शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं। जो मुक्ति का वरण करता है उसे संसार का आकर्षण नहीं लुभाता। वह तट पर बैठे व्यक्ति की भांति लहरों का आना जाना देखता रहता है और स्वयं में तृप्त रहता है. 


आज गुरूजी को देखा, सुना. वर्षों पहले उन्हें टीवी में नियम से सुनती थी. कैसा सौभाग्य है कि उनके आश्रम में उनको सुनने का अवसर मिल रहा है. वह सरल शब्दों में सभी प्रश्नों के कितने सुंदर उत्तर देते हैं. सत्य में प्रतिष्ठित व्यक्ति कैसा होता है और सिद्ध कौन होता है, आत्म अनुभव कैसा होता है, ऐसे और इसी तरह के प्रश्नों के उत्तर कितनी सहजता से वह दे रहे थे. हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओँ पर उनकी गहरी पकड़ है और परमात्मा से अभिन्न हैं वह ! आज बुद्ध की किताब आगे पढ़ी, मैत्री और करुणा का कितना सुंदर वर्णन किया है और प्रेम का भी, हृदय कितनी गहरी विश्रांति का अनुभव कर रहा है. संसार के हर जीव के प्रति प्रेम का भाव मन में उदित हो रहा है, सभी तो अपने ही हैं, एक ही हैं, शाम को एक पुरानी सखी का फोन आया, कितना आश्चर्य है कि दोपहर को उसका स्मरण हो आया था और अंतर में प्रेम था. जून के प्रति भी भीतर कितना स्नेह प्रकटा था, उनका स्वभाव बहुत अच्छा है, शाम से उनका व्यवहार भी कितना प्रेमिल लग रहा है. गुरूजी की बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है कि सभी एक ही चेतना से बने हैं ! कल विवाह की सालगिरह है , उससे भी पूर्व से वे एक-दूसरे से परिचित हैं, यानि साथ पुराना है.  


भगवान बुद्ध ने बच्चों को भी ध्यान सिखाया था. उनकी शिक्षा और समझ कितनी लाभप्रद है और कितनी गहरी. वे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझाते हैं, जीवन की नश्वरता और जगत के मिथ्या होने को भी, जैसे गुरूजी कहते हैं, अब तक का उनका जीवन एक स्वप्न से ज्यादा क्या है ? इतने वर्ष बीत गए कुछ वर्ष और हैं, यह देह एक दिन नष्ट हो जाएगी, उनके पहले कितने लोग चले गए, अब उनकी कोई खबर नहीं, वे भी एक दिन हवा हो जायेंगे तो क्यों न इसी क्षण स्वयं के कुछ न होने को स्वीकार कर लें. जीवन एक खेल से ज्यादा क्या है, कृष्ण की लीला या राम की लीला ... आज वे आश्रम गए थे. एच आर विभाग आज भी बन्द था, परसों भी देर हो जाने से कोई नहीं मिला था. कल जून के एक पुराने मित्र परिवार सहित आये, अपने साथ सुंदर सफेद बेला और लाल गुलाब के फूलों की मालाएं लेकर आये थे, एक-दूसरे को पहनने को कहा, तस्वीरें भी खींचीं. शाम को नन्हा व सोनू आये, गुलदाउदी के फूलों का एक गुलदस्ता, खजूर व मिठाई लाये.  लेखन कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है, जो पुस्तक पढ़ रही है, उसके खत्म होने पर ही लिखना हो पायेगा. 

 

Tuesday, July 21, 2020

विनोबा भावे के विचार


शाम के पौने पांच बजे हैं. बाहर धूप है, पंखे के बिना बैठना नहीं भा रहा है. आज नवरात्रि की सप्तमी तिथि है. कल कन्या पूजन करेंगे. सुबह नैनी व माली की बेटियां बीहू नृत्य की ड्रेस पहनकर आयीं, स्कूल के कार्यक्रम में जा रही थीं. उसने उनकी तस्वीरें उतारीं. अभी कुछ देर पहले मालिन आयी आशीर्वाद लेने, किसी ने उसे कह दिया है कि आज के दिन बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए. उसने मन ही मन प्रार्थना की परमात्मा इन सबको ढेर सारी खुशियाँ दे. सुबह उठने से पूर्व जैसे कोई भीतर कह रहा था, उन्हें किसी को बदलने की आवश्यकता नहीं है, वे जैसे हैं अति प्रिय हैं. सभी अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर्म करते हैं , यदि उन्हें वे संस्कार कष्ट देते हैं तो वे खुद ही उन्हें बदलने का प्रयास कर सकते हैं परमात्मा भी आकर यह काम नहीं कर सकता. बगीचे में जैसे बैंगन, आलू, भिंडी सभी कुछ जैसे बीज हों वैसे ही उगते हैं. वे यदि किसी को दोषी  देखते हैं तो वह दोष उनमें भी होता है. यदि वे स्वयं को आत्मा देखते हैं तो अन्यों को भी निर्दोष ही देखेंगे. परमात्मा के सिवा जब इस जगत में कुछ है ही नहीं तो कौन दोषी और कौन निर्दोष ! 

कुछ देर पहले नन्हे से बात की वह नए घर में था, काफी काम हो गया है पर काफी कुछ बाकी भी है. दो सप्ताह बाद वे वहाँ जा रहे हैं, शेष कार्य उनके जाने के बाद होगा. आज रामनवमी भी है और बैसाखी भी, बीहू का अवकाश भी शुरू हो गया है. उन्हें इस समय का अच्छा उपयोग करना है. सुबह अष्टमी की पूजा का कार्यक्रम ठीक रहा. मौसम आज भी गर्म है. पीछेवाली सब्जी बाड़ी में मजदूर काम कर रहे हैं, सीवर की पाइप बदलनी है जो इलेक्ट्रिकल विभाग के लोग जब खुदाई करने आये थे टूट गयी थी. छोटा भाई बहुत दिन बाद घर गया है. पिताजी के साथ तस्वीर भेजी है, वह बहुत शांत लग रहे हैं. सामने वाले लॉन में माली सफाई कर रहा है. कल रात आंधी बारिश के बाद ढेर सारे पत्ते गिरे. सुबह टहलते समय देखा, बस स्टैंड के पास एक फूलों वाले पेड़ की बड़ी सी डाल टूटकर गिरी हुई थी. बाद में नैनी ने बहुत से फूल लाकर सजा दिए. दोनों ननदों से बात की, दोनों का स्वास्थ्य नासाज था, नियमित दिनचर्या व व्यायाम कितने जरूरी हैं स्वस्थ रहने के लिए ! 

आज बाबा रामदेव का दीक्षा दिवस है, छोटे-छोटे बच्चों को अष्टाध्यायी के सूत्र सुनाते हुए देखा टीवी पर. उनके गुरुकुल में सैकड़ों बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं. लता मंगेशकर ने पीएम के द्वारा गायी पंक्तियों को गीत बनाकर रिकार्ड किया है. प्रधानमंत्री के रूप में वह उनके सम्मान के पात्र हैं, उन्हें रशिया का एक पुरस्कार भी मिला है. 

उसने विनोबा भावे का यह विचार पढ़ा- दूसरों को प्रेम करने से ही प्रेम मिलता है. वर्षों पहले लिखा  था इसे पढ़कर, कल शाम पिताजी की टाई ढूंढते समय वह बिलकुल यही बात सोच रही थी. यह दुनिया एक दर्पण है कोई जो कुछ करता है वही उन्हें दिखाई देता है. सब लोग एक जैसे होते हैं, थोड़ा बहुत अंतर हो तो हो, नीचे गहराई में सबका मन भरा हुआ है लबरेज प्याले की तरह छलक पड़ने को आतुर ! वैली ऑफ़ फ्लावर का सुंदर पोस्टकार्ड मिल गया टाई ढूंढते- ढूंढते उसके लिए ! उसे लगा, यह किसी और की बात है, पिताजी कभी टाई भी बांधते थे, यह तो जरा भी याद नहीं आता. 

Tuesday, June 2, 2020

सरसों के फूल



नया वर्ष ! आज सफाई करते समय उसे वर्षों पुरानी एक डायरी मिली, जब वह कालेज के अंतिम वर्ष में थी.  उसके पहले पन्ने पर लिखा है, आज प्रथम जनवरी है. कल रात्रि टीवी पर नए वर्ष के विशेष कार्यक्रम देखे सो वर्ष के प्रथम दिन ही देर से उठी. आज भी तो ऐसा ही हुआ. उस समय भी उसे लगा था कि एक ही दिन में पिछला वर्ष पुराना कैसा हो गया. वही आकाश, वही धरती बस मानव का बनाया हुआ सन ही तो बदला है. एक वर्ष गुजरता है तो उनकी उम्र का एक वर्ष और बढ़ गया, नहीं घट गया..., फिर भी नया साल मुबारक हो !  एक पुस्तक में एक पंक्ति पढ़ी थी उसने उस दिन, जैसे या जो कुछ आप करते हैं, वही आप हैं, पढ़कर चौंक गयी थी एकबारगी, पर बाद में लगा ठीक ही तो है किसी के मन में क्या है यह उसके कर्मों से ही तो जाहिर होता है. यदि मन में आदर्श भरे हों पर आचरण उनके अनुकूल न हो तो, आज भी वाचा, मनसा, कर्मणा एक होने की बात वह कहती है. जितना -जितना भाव, विचार तथा कर्मों में एकता होती जाएगी जीवन से दुःख विदा होते जायेंगे. 

दो जनवरी को मंझले भाई का जन्मदिन होता है, उस समय फूफाजी भी जीवित थे, दोनों के लिए अपने-अपने घरों में गाजर का हलवा बना करता था. आज भी यह प्रथा कायम है, सभी भाई-बहनों के जन्मदिन पर माँ एक विशेष व्यंजन अवश्य बनाती थीं. उन दिनों पिताजी उन्हें रविवार को गांव-खेत में घुमाने ले जाया करते थे. सर्दियों की उतरती हुई धूप में खेतों की पगडंडियों पर चलते हुए वे सब बेवजह ही ख़ुशी से भरे रहते थे. इतवार की फिल्म भी सब साथ बैठकर देखते थे, उस दिन सिकन्दर देखी थी, पृथ्वीराज कपूर सिकन्दर बने थे और सोहराब मोदी पोरस, दोनों बड़े कलाकार ! उन दिनों रेडियों पर कवि सम्मेलन आया करते थे, शिव कुमार की एक कविता की कुछ पंक्तियां भी उसने लिखी हैं - 

हवा बंधी पर नए बन्धन  में गुजर गयी पगडंडी से 
पीले-पीले चेहरे वाले हिला किये सरसों के फूल 
शायद किसी किशोरी की वेणी आमन्त्रित इन्हें करे 
देर रात तक जगते रहते यह छलिये सरसों के फूल
मौसम के अपशब्द सहे अपमान सहा हँसते-हँसते
खेतों के सुकरात बने खूब जिए सरसों के फूल !

दस दिन बाद कालेज खुलना था, गयी भी, किन्तु हाकी मैच जीतने की ख़ुशी में बन्द था. कम्पनी बाग़ के रास्ते से बेरी बाग चली गयी. कम्पनी बाग़ बिल्कुल वैसा ही लगा जैसा उस समय से दस वर्ष पहले था, उसके बचपन की कितनी ही संध्याएं वहाँ गुजरी हैं. वहां एक छोटी लड़की से भेंट हुई, कितनी प्यारी और समझदार ! उस नन्ही बच्ची में सौंदर्य की सराहना करने की शक्ति है, हवा में भागते हवा से खेलते बोली, हम कबूतरों की तरह उड़ रहे हैं. वह नदी को सराह सकती थी, उसने ठंडी हवा और उसकी मित्रता को  एक वाक्य कहा - तुम अच्छी लगती हो ! आज भी याद  करे तो उस सुबह के दृश्य उसकी आँखोँ  के सामने आ जाते हैं. अगले पन्ने पर भी किसी कविता की चार पंक्तियाँ लिखी हैं -

आँखें पगडंडी पर रख दीं दिया रख दिया देहरी पर 
तुमने मेरे इंतजार में लट में क्यों उलझाई रात 
पलकें हैं बोझिल-बोझिल और चेहरे पर सिंदूर लगा 
सुबह पूछती है सूरज से बोलो कहाँ बितायी रात !

Friday, January 24, 2020

कर्म का बंधन


 कल दोपहर पहली बार अकेले कार चलायी। सुबह गैराज से गाड़ी निकाली और वापस डाली, पर अभी बहुत अभ्यास करना है. संकरी जगह से कैसे गाड़ी निकाली जाती है, और ट्रैफिक में से कैसे बाहर लायी जाती है, इसे सीखने में काफी समय लगेगा, लेकिन अभ्यास तो जारी रखना होगा. शाम को भजन सन्ध्या थी. उसके पूर्व अस्पताल गयी. एक सखी दो दिनों से एडमिट है. उसका पुत्र युवा हो गया है पर मानसिक रूप से बालक है. शारीरिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं है. चौबीस घण्टे उसका ध्यान रखना पड़ता है. घर में सास-ससुर भी आये हैं. काम का बोझ ज्यादा है. रात को नींद पूरी न होने के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया. आज गुरू माँ को सुना, पित्त की अधिकता से कितने रोग हो जाते हैं. कफ व वात बिगड़ने से भी षट क्रियाओं को करके शरीर को शुद्ध किया जा सकता है. आज सुबह सुंदर वचन सुने, ‘सुख और दुःख के ताने-बाने से बुना है जीवन, यह जानकर उन्हें दोनों से ऊपर उठना है. राम चाहते तो वन जाने से मन कर सकते थे, पर उन्हें वन जाने में दुःख प्रतीत नहीं होता था. वह राजमहल में रहकर सब सुख भोग चुके थे, वहाँ कोई सार नहीं है, यह जान चुके थे. कर्म का फल सदा के लिए नहीं रहता, कोई भी दुःख आता है जाने के लिए. इसलिए दुःख के कारण आये बुरे वक्त को साधना के द्वारा काट लेना चाहिए.’ जो घट चूका वह खुद के ही कर्मों का फल मिलना था, वर्तमान में भूख-प्यास व नींद के अलावा कोई दुःख है ही नहीं. प्रकृति उनकी परीक्षा लेती है पर श्रद्धा रूपी देन भी उन्हें परमात्मा से मिली है. श्रद्धा को मजबूत करने के लिए ही प्रकृति उनके सामने नयी-नयी परिस्थितियाँ लाती है. जब वे दृढ रहते हैं तो प्रकृति सहायक बन जाती है. शाम के साढ़े छह बजने को हैं. सदगुरू कितनी सरलता से कर्म बंधन से मुक्त होना सिखा रहे हैं. उन्होंने कार्य सिद्धि के तीन उपाय बताये, पहला है प्रयत्न, दूसरा है जो प्राप्त करना है, वह मिला ही हुआ है, यह विश्वास. तीसरा है धैर्य. जैसे बीज हमें मिला है, उसे पोषित करना है. कार्य को सिद्ध करने के लिए, कार्य को सिद्ध हुआ मानकर ही प्रयत्न करने से मन सन्तुष्ट रहता है. यह रहस्य है. परमात्मा को पाना है तो यह मानना है कि वह मेरे पास है, और उसके बाद सत्संग, साधना आदि करना है. सुखी है मानकर जो बढ़ता जाता है, वह सुखी ही रहता है. साधन व साध्य में भेद नहीं मानना है. योगी है मानकर योग करने से योग सिद्ध होता है. मानसिक शांति ज्ञान से ही मिलती है. इसी माह गुरू पूर्णिमा है, गुरूजी के लिए एक कविता लिखेगी. प्रेम, ज्ञान सभी कुछ परमात्मा की देन है, जब कोई यह जान लेता है तो खुद के साथ-साथ समाज के लिए भी उपयोगी बन जाता है. उनके जीवन से एक महक फैलेगी तो वे भी सुखी रहेंगे औरों को भी उनसे सुख मिलेगा ! पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, इस समय पौने ग्यारह बजे हैं, भोजन बन गया है. जून थोड़ी देर में आने वाले हैं. भागते हुए समय से कुछ मिनट निकाल कर खुद से बात करने का सुअवसर ! आज एक वरिष्ठ रिश्तेदार का जन्मदिन है, पर सुबह भूल ही गयी, उन्होंने स्वयं ही याद दिला दिया, उम्र ने उन्हें परिपक्व बना दिया है. कल क्लब की एक सदस्या से बात की, उनके लिए कुछ लिखा और संबन्धी के लिए भी, उन्होंने वाह ! वाह ! कहकर तारीफ़ की है, पर उसे उसका प्रतिदान लिखने में ही मिल गया. हिंदी लेखन प्रतियोगिता में उसे पुरस्कार मिला है, लिखने वाले कम हैं शायद इसलिए.. उत्सव मनाना अहंकार को पोषित करना ही हुआ न. तारीफ होने पर जो प्रसन्नता का अनुभव करता है वही अपमान होने पर दुःख का भी अनुभव करने वाला है. मन जब इससे ऊपर उठ जाता है, संकल्प रहित हो जाता है. तब संसार नहीं रहता, यानि पल भर में ही इस संसार से मुक्त हुआ जा सकता है. परमात्मा जो अचल, घन, चेतन स्वरूप है, उसमें टिका जा सकता है.


Friday, December 6, 2019

आडवाणी जी की किताब





दोपहर के तीन बजने वाले  हैं. आज मौसम गर्म है, इस मौसम का पहला गर्म दिन ! माया के अधीन होकर ही आज दीदी से फोन करते वक्त पूछ लिया कि  कविता पढ़ी या नहीं, जीजाजी ने अपने स्वभाव के अनुरूप कह दिया, वह अपनी तारीफ सुनने के लिए कविता लिखती है क्या  ? कोई प्रशंसा करे तो भीतर जिसे ख़ुशी होती है अहंकार ही तो है वह, और यही कर्म का बन्धन है. फोन पर या आमने-सामने भी, किसी से बात करते समय बहुत सजग रहना होगा, अलबत्ता तो बात उतनी ही करनी चाहिए जितनी जरूरी हो. सुबह लॉन में घास पर नंगे पैरों चली, अच्छा लगा. माली को बुलाकर कुछ काम बताये पर उसने गेट के बाहर झाड़ू लगाने के सिवाय कुछ भी नहीं किया, शायद उसे काम पर जाना था.  इसी हफ्ते उन्हें यात्रा पर निकलना है. स्कूल से आकर नन्हे व सोनू से बात की. सोनू ने रोजे का महत्व बताया. यह उपवास राजा और रंक को एक धरातल पर ले आता है. अनुशासन सिखाता है, संकल्प शक्ति को बढ़ाता है. पूरे तीस दिन उसे यह करना है, यदि किसी दिन छूट जाये तो अगले वर्ष से पहले पूरा कर लेना है. दोपहर को भोजन में उसने आलू परांठा खाया, जून के न रहने पर पूरा भोजन बनना तो बन्द हो जाता है, अक्सर वह तहरी बनाती है. आज भी पंचदशी पर व्याख्यान सुना, बहुत विस्तार से इसमें तत्वज्ञान समझाया गया है.

ग्यारह बजने वाले हैं, जून आज आने वाले हैं. स्पीकिंग ट्री के एक लेख में स्वयं के विषय में एक जानकारी मिली. कल फोन पर भी ध्यान दिलाया गया था कि सम्मान पाने की आकांक्षा यदि भीतर अभी तक है तो हृदय फूलों के साथ काँटों से भी युक्त है. अपनी चिंता पहले सताये और दूसरा बाद में रहे तो साधना फलित नहीं हुई. वर्षों पहले वाणी के दोष से पीड़ित थी तो स्वयं को समझ कितनी बार सुधारा था, अब ऐसे ही भावों को अंतिम बिंदु तक शुद्ध करना है, कर्म तभी शुद्ध होंगे. जब पूरा का पूरा परमात्मा गुरूजी ने पकड़ा दिया है तो कैसा भय और कैसी सुरक्षा .. अब तो अंतिम पड़ाव नजदीक है. सत्य वही है जो सदा एक सा है, बदलने वाला मन और बदलना वाला तन तो सत्य नहीं हो सकता, पर ये दोनों उसी के विस्तार हैं, एक चेतना ही विभिन्न नाम-रूपों में अभिव्यक्त हो रही है, उस एक पर दृष्टि हो तो सभी एक ही विस्तार प्रतीत होंगे. उस एक का अनुभव विचार से भी किया जा सकता है और समाधि में भी. उस पर टिके रहना ही एक कला है, चेतना निरन्तर गतिमय है, चैतन्य अटल है. चैतन्य में स्थित होकर इस जगत को देखना है. उनका लाभ उसी में है और यदि इसके लिए अन्य हानियाँ भी उठानी पड़ें तो कोई बात नहीं.

परसों भूटान की यात्रा पर निकलना है. आज उसके विषय में कुछ लेख पढ़े. आडवाणी जी की पुस्तक आगे पढ़ी. आजादी के समय लाखों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए. विश्व के इतिहास में ऐसी दर्दनाक घटना शायद ही कभी घटी हो. राम और बुद्ध के देश में गाँधी जी के अहिंसा के सन्देश के बावजूद इतना रक्तपात, सोचकर भी भय भी लगता है. बचपन में उसे एक स्वप्न बार-बार आता था कि एक कोने में घेर कर किसी व्यक्ति को भीड़ मार रही है. सँकरी गलियाँ और और सटे हुए मकानों से गुजर कर भागना भी कितनी ही बार देखा होगा. अब तो गुरूकृपा से जीवन ही एक स्वप्न लगता है, भीतर एक ऐसा ठिकाना मिल गया है, जहाँ कुछ भी नहीं घटता, जो बस है.. जो ज्ञाता है और द्रष्टा ! आज सुबह साक्षी भाव काफी देर तक बना रहा. इन्द्रियों को अपना काम करते हुए देखा, मन भी अपना करता है और बुद्धि भी. आहार के अनुसार तीनों गुण भी घटते-बढ़ते हैं, फिर देह में हल्का व भारीपन लगता है.

Tuesday, December 3, 2019

हरसिंगार के फूल


दोपहर के तीन बजे हैं. आज का दिन भी वर्षा से आरम्भ हुआ, प्रातः भ्रमण के बाद जैसे ही घर पहुँची, बूँदें पड़ने लगीं, पर दिन चढ़ते-चढ़ते धूप निकल आयी. आज धारावाहिक का अंतिम भाग भी देख लिया. बुद्ध के अनोखे जीवन की गाथा पढ़ -सुनकर कौन प्रभावित नहीं होगा. वे अपार आशावादी थे जबकि कुछ लोग उन्हें दुखवादी कहते हैं. वह मानव को उसके मूल स्वरूप का अनुभव करना चाहते थे. वह उन्हें मानसिक रोगों के चक्र से बाहर निकलना चाहते थे. बुद्ध कहते हैं हर दिन को कृतज्ञ होकर जिन चाहिए. कोई न कोई सत्कर्म करना चाहिए. परमात्मा ने जो ज्ञान, प्रेम और शक्ति मानव को दी है, उसका वितरण करना चाहिए. भीतर के आनंद को जो स्वयं में पा लेता है, वह अन्यों को भी उसे पाने का मार्ग बता सकता है. बुद्ध होने की क्षमता हरेक के भीतर है. सदमार्ग पर चलना ही धर्म का पालन करना है, जिसके द्वारा वह बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है. मन की बिखरी हुई शक्तियों को एक्टर करना ही संघ की शरण में जाना है. वे जब अपने केंद्र में स्थित होते हैं तो सारी शक्ति एक पुंज के रूप में प्राप्त होती है, जो किसी कार्य को सजगता पूर्वक करने के लिए अनिवार्य है. आज भी सदगुरू को सुना, कर्म व पुनर्जन्म पर उनकी व्याख्या अत्यंत मनोरम व सरल है. जग की प्रत्येक वस्तु में चार बातें होती हैं, धर्म, प्रेम, कर्म तथा ज्ञान. उनमें भी ये चार बातें हैं, प्रेम से वे घिरे हैं, वह उन्हें चारों ओर से स्पर्श कर रहा है, इसी प्रकार ज्ञान वह अविनाशी सत्ता है जो जानने की क्षमता है. जानना है. हर वस्तु अपने नियत धर्म के अनुसार कर्म करती है, जैसे अग्नि का धर्म है जलाना  और प्रकाश देना. उनके पूर्व कर्मों का फल उन्हें अब मिल रहा है और वर्तमान के कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा. जून कल शाम को अपने गन्तव्य पर पहुँच गए. सोनू का फोन आया, बैंगलोर में एक स्टार्टअप कम्पनी छोटे-छोटे प्लॉट लोगों को सब्जी उगने के लिए दे रहे हैं, जिसमें हर महीने दो हजार रूपये देकर ऑर्गैनिक सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती हैं. उनके माली ही काम करेंगे, बस अपनी पसंद बतानी है और यदि मन हो तो बीच-बीच में जाकर देख सकते हैं कुछ काम भी कर सकते हैं.  महिला क्लब की साहित्यिक प्रतियोगिता होने वाली है, पर सलाहकार होने के नाते क्या उसे उसमें भाग लेना चाहिए, शायद नहीं, शेष लोगों को भी मौका मिलना चाहिए. हिंदी में बेहद कम प्रतियोगी होते हैं, इसलिए हर बार उसे कहा ही जाता है.

सामने हरा-भरा बगीचा है. बोगेनविलिया के फूल शाखाओं पर शीतल हवा में झूम रहे हैं. कुछ देर पहले हवा चलने लगी थी जैसे आंधी आने वाली हो. उत्तर भारत में पिछले दिनों अंधी-तूफान में कारण कितनी हानि हुई. बुद्ध ऐसी आंधी-तूफान में छह वर्षों तक तप करते रहे. अद्भुत थी उनकी आत्मशक्ति ! राजा के पुत्र होकर सन्यासी की भांति बेघर होकर रहना और भिक्षा मांगकर गुजारा करना कितना कठिन रहा होगा. उनके आकर्षण से खिंचे कितने ही युवा उस कल में सन्यासी बन गए. हिंसा का जीवन त्याग दिया. भारत में सैनिकों के प्रति श्रद्धा घट गयी और कालांतर में इसका परिणाम हुआ विदेशी राजाओं का आक्रमण, लेकिन बुद्ध के काल में जो हिंसा व्यर्थ ही होती थी, वह रुक गयी. आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट प्रकाशित की. बुद्ध पूर्णिमा के दिन अंतिम पोस्ट की थी. उनके प्रति श्रद्धा तो थी पर वे इतने महान हैं, इसका अनुभव नहीं किया था. अद्भुत थी उनकी करुणा, उसका हजारवां अंश भी यदि उसमें आ जाये तो जीवन सफल हो जायेगा. ऐसा लगता है जैसे वह कुछ भी नहीं जानती. जीवन और यह सृष्टि अनंत रहस्यों से भरी है, इसे जाना नहीं जा सकता, कोई बुद्ध होकर ही, इसके साथ एक होकर ही इसको थोड़ा-बहुत जान सकता है. सामने गमले में लाल सुर्ख एक गुलाब खिला है, जिस पर उसका ध्यान बरबस चला जाता है. बुद्ध के निर्वाण के समय उन पर फूलों की वर्षा आरम्भ हो गयी थी, जिस वृक्ष के नीचे वे लेटे थे, उसके फूलों का मौसम भी नहीं था तब. वनस्पति में भी जीवन है, चेतना है, ज्ञान है. जिस वर्ष वे इस घर में रहने आये थे, उस पुराने घर में हरसिंगार ने असमय फूल उगाये थे. प्रातःकाल भ्रमण के लिए जाते समय निकलते ही एक काली तितली सम्मुख आ गयी थी. कल सुबह उसे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर जाना है, वहां से किसी स्कूल में, गुरूजी के जन्मदिन पर सेवा कार्य के लिए. आज उनके लिए एक कविता लिखी. एक कविता आस्ट्रेलिया निवासी छोटी भांजी के लिए भी जिसका जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है. उसने बताया वहाँ ठंड पड़नी शुरू हो गयी है, जब भारत में ठिठुरती सर्दियां होती हैं, वहां तेज गर्मी होती है. जून ने उस स्थान की तस्वीरें भेजी हैं, जहाँ वह ठहरे हैं, बहुत सुंदर स्थान है. उन्होंने सुंदर फूलों के चित्र और एक मोर का चित्र भी भेजा है. अगली बार वह अवश्य जाना चाहेगी, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है ! पिताजी से बात करे ऐसा मन हो रहा है, इस वर्ष उनसे मिलना होगा या नहीं, पता नहीं !

आज सुबह हल्की फुहार पड़ रही थी, वातावरण शांत था. सदगुरू को सुना,  चेतना में अपार शक्ति है. देह को स्वस्थ करने का सामर्थ्य भी है. यदि मन टिक हो तो चेतना अपना काम कर सकती है, वरना विचारों का विक्षेप उसे अभिव्यक्त होने से रोकता है. ध्यान मन को स्थिर रखने का, निर्मल रखने का उपाय ही तो है. सुबह वह आर्ट ऑफ़ लिविंग के अन्य सदस्यों के साथ एक स्कूल में गयी, बच्चों से बातें किन, उन्हें योग कराया, कुछ सामान वितरित किया, दो घण्टे वहां बिताकर वे वापस लौटे. जैन धर्म के बारे में कुछ जानकारी हासिल करने के लिए महावीर स्वामी पर एक फिल्म देखी. इस समय रात्रि के सवा नौ बजे हैं मन आज किसी अनोखे लोक में भ्रमण कर रहा है. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अहसास इतना सघन है कि लगता है उसे हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है. भीतर एक मधुर सी झंकार जैसी आवाज सुनाई दे रही है, किसी पंछी की आवाज या चिड़िया की, जाने कहाँ से. शाम को एक घंटा ध्यान किया शायद उसी का परिणाम है, वैसे परम् कार्य-कारण से परे है, अकारण दयालु है ! शाम को नन्हे और जून से बात हुई, वे लोग इस स्थान पर गए थे, जहाँ नन्हे ने बारह क्यारियां किराए पर ली हैं, जहाँ से उन्हें ताज़ी सब्जियां मिला करेंगी. 

Saturday, November 30, 2019

मुक्ति बोध



आज सुबह तेज वर्षा हुई, उसी वर्षा में वे मृणाल ज्योति गए. बच्चों को योग कराया और क्लब की सदस्याओं द्वारा दिया सामान सौंपा. एक अध्यापिका ने कुछ पैसे मांगे थे, वे भी उसे दिए, वर्ष के अंत तक धीरे-धीरे करके लौटा देगी, ऐसा उसने कहा है. पिछले चार दिनों से मन बुद्ध के साथ है. वह बुद्ध के जीवन पर आधारित धारावाहिक देख रही है, जो बुद्ध पूर्णिमा के दिन देखना आरम्भ किया था. उस दिन उनके निर्वाण का दृश्य देखा था. उनके उपदेश हृदय को छू गए थे, फिर जन्म से लेकर उनके बुद्ध बनने तक का संघर्ष देखा. कितने महान थे वे, कितने करुणावान और कितने बड़े तपस्वी किन्तु देवदत्त उन्हें कभी समझ नहीं पाया. उन्हें मरवाने के कितने षड्यन्त्र किये उसने. यशोधरा का त्याग भी अनुपम है, उसने बुद्ध के हृदय को समझ था. स्वयं में स्थित होकर ही कोई सुखों-दुखों के पार जा सकता है. मानव के शुभ कर्म एक दिन मुक्ति पथ पर ले जाते हैं और दुष्कर्म बन्धन की ओर. जिसे बुद्ध निर्वाण कहते हैं उसे ही ऋषि मोक्ष कहते हैं, जहां पूर्ण शांति है, जहां जाकर मन खो जाता है. जो सारे द्वंद्वों से अतीत है. जून आज पाँच दिनों के लिए बाहर गए हैं. अभी कुछ देर बाद नैनी व उसके साथ की महिलाएं आएँगी योग कक्षा के लिए, शाम के योग सत्र को एक घन्टा पहले खिसका दिया है क्योंकि शाम को मीटिंग है, फ्रिज को कल रात से बन्द किया है, भीतर की सारी बर्फ पिघल जाएगी तब वह अपना काम करना शुरू कर देगा. मानव का मन भी कभी कभी नकारात्मकता के कारण जम जाता है, फिर उसे साधना के द्वारा पिघलाया जाता है, पहले सा खुशनुमा हो जाता है, प्रेम की ऊष्मा जो भीतर दबी हुई थी, फिर झलकने लगती है. उसके सर के दाहिने भाग में ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने के कारण तनाव महसूस हो रहा है, विश्राम देने से वह ठीक हो जायेगा. पिछले कई दिनों से नियमित लेखन नहीं हुआ. अब समझ-बुझ कर, जागकर लिखना होगा. इस समय मौसम सुहाना है, भीतर एक सहजता का अनुभव हो रहा है, ध्यान के बाद की सहजता ! भीतर के उस अछूते केंद्र का पता उसे भी मिल गया है, वर्षों पूर्व उसकी झलक मिली थी, पर उसमें हर पल स्थित रहने के लिए सजगता बहुत जरूरी है. 

शाम के साढ़े चार बजे हैं. मन बुद्धमय हो गया है. उनकी मंजुल मूर्ति तथा सुंदर देशना भीतर तक छू जाती है. उनके उपदेश सरल हैं और अनुभव से उपजे हैं. वे सिद्धांत की बात नहीं कहते, व्यावहारिक ज्ञान देते हैं वे कहते हैं, सन्देह अति विकट शत्रु है, वह मानव को पतन की ले जाता है. ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, अग्नि के समान जलाते हैं और अहिंसा व करुणा आनंद को उपजाते हैं. बुद्ध शीलाचरण की बात करते हैं, फिर ध्यान का मन्त्र सिखाते हैं, जिससे विवेक का जन्म होता है, तथा शील का पालन सहज ही होने लगता है. ध्यान की गहराई में जो ज्ञान मिलता है, वही सच्चा ज्ञान है जिसके प्राप्त होने के बाद शील का पालन प्रयास पूर्वक नहीं करना पड़ता, लेकिन आरम्भ में तो पुरुषार्थ करना होगा, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा. शम, दम, तप, सन्तोष व ईश्वर प्राणिधान का पालन भी करना होगा. आज सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, दुःस्वप्न ही कह सकते हैं अथवा तो पूर्व के किये अशुद्ध कर्मों का फल देने वाला स्वप्न ! बुआ जी को देखा, उनका मुख बिलकुल अलग था. उनकी पुत्री का विवाह हो रहा है. वह रसोईघर में है पर शौच का पालन नहीं किया. अतीत के कितने ही विकर्मों का स्मरण हो आया. वह जगी तो भीतर प्रार्थना चल रही थी. उनका अवचेतन मन नींद में भी सक्रिय रहता है. उठकर टहलने गयी, वर्षा के बाद सब कुछ साफ-सुथरा था, मौसम शीतल था. सद्गुरु को सुना जो कह रहे थे, यदि अपने घर वापस लौटना है तो पहले पूरी तरह थक जाओ, जैसे बुद्ध कहते हैं, अपने भीतर सुख के केंद्र को खोजना है तो जीवन में दुःख है इसे अनुभव करना होगा. भीतर जाकर पता चलता है, परम् आनंद व प्रेम का स्रोत भीतर ही है . आज भी बुद्ध के जीवन की गाथा देखी-सुनी. अब कुछ ही अंक रह गए हैं. मगध, कपिलवस्तु, कौशल आदि राज्यों में ही बुद्ध विहार करते थे, पर उनका धर्म पूरे विश्व में फ़ैल गया जैसे सदगुरू का सन्देश पूरे विश्व में अपनाया जा रहा है. इसी महीने उनका जन्मदिन है, उस दिन वे दोपहर को श्रमदान करेंगे  और शाम को गुरुपूजा में सम्मिलित होंगे. जून आज तमिलनाडु जा रहे हैं, वह जो पौधे ले गए थे, नन्हे ने गमलों में लगा दिए हैं. 

Sunday, July 28, 2019

सत्यार्थ प्रकाश



आज मौसम सुहावना है, हल्की सी धूप है और हल्की सी बदली ! आज एक प्रसिद्ध महिला ब्लॉगर ने उसकी एक पुरानी कविता, 'हरसिंगार के फूल झरे' पुनः प्रकाशित की है. कल होली पर एक कविता लिखनी आरम्भ की थी. जून आज गोहाटी जा रहे हैं. कल सुबह वह उन दोनों महिलाओं से उनके घर जाकर अथवा फोन पर बात करेगी जिनके लिए विदाई कविताएँ लिखनी हैं. टीवी पर दीपक भाई 'नई दृष्टि - नई राह' में आ चुके हैं. कहते हैं, वे सभी शुद्धात्मायें हैं, यदि किसी में दोष देखा तो प्रतिक्रमण करना है. किसी को दुःख न हो इसका ध्यान रखना है. आत्मा में रहने पर कर्म नहीं बंधता और जन्म-मरण का चक्र छूटता है. प्रारब्ध कर्म प्रकट होता है, फिर फल देता है और खत्म हो जाता है. जगत किसी को नहीं बांधता, मन के राग-द्वेष ही जगत से उन्हें बांधते हैं. जगत निर्दोष है, वे व्यर्थ ही उसके प्रति अपने भाव बिगाड़ लेते हैं. उनके भाव शुद्ध हों तो मन हल्का रहता है. आत्मा के प्रकाश में जगत जैसा है वैसा ही दिखता है, उन्हें आत्मा में स्थित रहना है. यदि किसी के प्रति राग-द्वेष आदि है तो हिसाब चुकता नहीं हुआ और पुनः उनका सामना होगा. इसीलिए इसी जन्म में सभी आसक्तियों को त्याग कर मुक्तभाव से जीना है.

पौने दस बजे हैं रात्रि के, जून कल आ रहे हैं. आज गोहाटी में उनका कार्यक्रम अच्छा रहा, तस्वीरें बहुत अच्छी आई हैं. कम्पनी ने 'स्टार्ट अप इंडिया' के लिए काफ़ी बजट रखा है. आज 'जीत चैनल' पर स्वामी रामदेव पर आधारित कार्यक्रम देखा. वह बालक जिसे इतने अत्याचार सहने पड़े, पर जो असीम शक्ति का मालिक है, उसे सत्यार्थ प्रकाश पढने को मिली आज. वर्षों पहले उसने भी पढ़ी थी एक बार, पूरी नहीं पढ़ पायी, बहुत कठिन लगी थी. शायद वह एमएससी कर चकी थी, एक विद्यार्थी ने दी थी या फिर पुस्तकालय से ली थी, याद नहीं है. उस विद्यार्थी ने कहा था कि जैसे कोई जन उपन्यास पढ़कर आनंद का अनुभव करता है वैसी ही ख़ुशी उसे यह पुस्तक पढ़कर होती है. कमरे में न जाने कहाँ से एक छोटा सा पतंगा आ गया है, शायद कोई संदेश लाया हो परमात्मा का..नासिकाग्र पर मनमोहक गंध आ रही है, कभी मीठी कभी किसी पकवान की गंध..पता नहीं कहाँ से आती है ये गंधे, और कैसे ? अस्तित्त्व के लिए मन अपार प्रेम का अनुभव करता है, उसकी उपस्थिति अब एक क्षण के लिए भी नहीं हटती. उस अदृश्य से मुलाकात करनी हो तो ध्यान ही माध्यम है. आज शाम को पिताजी से बात की. छोटी बहन का वीडियो कॉल भी आया, वह बाल बांधकर बहुत प्यारी लग रही थी, काले रंग की सुंदर वेस्टर्न ड्रेस पहनी थी. उसे पार्टी में जाना था दुबई, वह समय के साथ-साथ और युवा दिखने लगी है, मोह-माया से छूटकर मुक्त आत्मा... शाम की योग कक्षा में एक सदस्या ने बताया, उनका तबादला हो गया है, दिल्ली जाना होगा, उसने एक मैथिली गीत सुनाया, जिसे नूना ने रिकार्ड कर लिया, उसकी स्मृति उन सबके साथ रहेगी. उसने बताया, छोटा पुत्र आ रहा है, उसे कम उम्र में कई रोग लग गये हैं. उससे कहा, एक दिन उसे लेकर आये, प्राणायाम या योग का महत्व बताकर शायद उसे प्रेरित कर सके. उन्होंने एक भजन पर नृत्य किया, एक अन्य सदस्या ने रिकार्ड कर लिया. डिनर में 'पत्ता गोभी और पालक' बनाया, दीदी ने यह रेसिपी बतायी थी. आज ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं डाली. आलमारी ठीक की, ड्रेसिंग टेबल की दराजें भी सहेजीं. 'मातृत्व' पर स्वामी अनुभवानंद जी के सुंदर व्याख्यान सुने, संत के भीतर माँ का हृदय होता है. कितना सुंदर गीत भी सुना अभी वात्सल्य पर आधारित जो व्हाट्स एप पर आया है. सुबह गुरूजी का सुंदर प्रवचन सुना, शुद्ध चेतना में अपार क्षमताएं हैं, वह देह को स्वस्थ कर सकती है यदि कोई उससे जुड़ा रहे. नन्हा और सोनू उनके नये घर के लिए इंटीरियर डेकोरेटर ढूँढ़ रहे हैं.


Friday, April 12, 2019

झीनी सी फुहार



अगस्त का आरम्भ वर्षा से हुआ है. सुबह वे हल्की फुहार में ही टहलने गये. बाद में वर्षा लगभग रुक गयी थी. आज उसने मोबाइल से खींची एक तस्वीर पर ‘सुप्रभात’ लिखकर व्हाट्सएप पर भेजा, अब कोई सूक्ति लिखना भी सीखना होगा. कल छोटी ननद की भेजी राखी मिली, सुंदर है. दोपहर को उसने भी कुछ राखियाँ बनायीं. आज बाजार जाकर डोरी लानी है, कल भी बनाएगी. इस वर्ष नैनी का पुत्र अस्वस्थ है. अपने हाथ से बनाने में भी अलग आनन्द है. सुबह उठी तो मुंह का स्वाद कटु था, पित्त बढ़ गया लगता है. परमात्मा क्लेशों से अछूता है, वे क्लेशों से ग्रस्त होते हैं. कल माली के पैर में तलवार से चोट लग गयी, टांके लगे हैं, उसका काम भी छूट गया है. जीवन एक संघर्ष है इन लोगों के लिए. आज एक पुराने परिचित का जन्मदिन है, उसने कल एक कविता लिखी उनके लिए जैसे पिछले कई वर्ष में लिखती आई है. बंगाली सखी ने बुलाया नहीं है, वह तो उसे जून के जन्मदिन पर बुलाने वाली है. सुबह ध्यान नहीं हुआ. मन में एक मौन तो निरंतर बना हुआ है. प्रत्यक चेतना का अनुभव होता है, परमात्मा उनके साथ है. उन्हें जो कर्म करने हैं, उसका संयोग तो वही बिठाता है. वे कर्म में अकर्म महसूस करें तो..कर्म की पकड़ छूटने लगती है.

बड़े भाई का फोन आया, उन्हें राखी मिल गयी है, फुफेरे भाई को भी. जून को पिछले दो तीन दिन से सर्दी लगी हुई है. कल सुबह पूल में उतरते समय उसे भी पानी ठंडा लग रहा था, शावर में भी पानी ठंडा लगा और तभी यह विचार आया कहीं ठंड न लग जाये और यही हुआ, कल रात से गले में दर्द था. आँख से पानी आ रहा है. तुलसी व अदरक ग्रीन टी को ओपरेटिव से लायी.

योग दर्शन में सुना, इस जन्म में वे जो कर्म करते हैं, उनके अनुसार ही अगला जन्म मिलता है. उनके संचित कर्मों में से ही कुछ कर्म नये जन्म का कारण होते हैं. जीवन में कुछ चीजें नियत हैं, कुछ अनिश्चित. उनका वर्तमान का पुरुषार्थ ही उसमें फेरबदल कर सकता है. यह भी सत्य है कि कर्म के मूल में यदि क्लेश होगा तभी कर्म का फल मिलता है. कर्मों के आधार पर ही के भोग मिलते हैं, आयु भी कर्मों के अनुसार कम या अधिक होती है..

सुबह से वर्षा हो रही है, सर्दी ठीक नहीं हुई, हीलिंग ध्यान किया कल की तरह. सुबह गुरूजी को सुना, शुद्ध चेतना में स्थित होकर वे अपने शरीर व मन को स्वस्थ रख सकते हैं. वे चाहें तो आत्मा में स्थित रहकर शांति, आनंद, प्रेम, सुख, शक्ति, ज्ञान तथा पवित्रता का अनुभव कर सकते हैं. और क्रमशः श्वसन तन्त्र, हृदय, रक्त वाहिनियाँ, पाचन तन्त्र, पेशी तन्त्र, नर्वस सिस्टम, तथा इन्द्रियों को स्वस्थ रख सकते हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं.

आज भी सुबह वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण के लिए नहीं गये. जून के जाने के बाद वह घर के सामने सड़क पार भ्रमण पथ पर टहलने गयी. श्री श्री का प्रवचन सुना. चेतना द्वारा शरीर का निर्माण, भरण पोषण तथा इलाज होता है. यदि मन चेतना से जुड़ा है, तो स्वस्थ है. मन जिस क्षण स्वयं में ठहर जाता है, ध्यान में स्थित होता है. मन के विकारों का प्रभाव ही देह पर पड़ता है. आत्मा से यदि देह सीधी जुड़ जाती है तो स्वस्थ होने लगती है. वापस आकर गुरूजी का गाइडेड मेडिटेशन किया. आज सर्दी काफी ठीक है. जून कल मुलेठी, काली मिर्च व मिश्री भी लाये. नैनी ने सरसों के तेल का नुस्खा बताया था, वह भी काम में लिया.


Monday, September 10, 2018

तीन परतों वाला केक



आज टीवी पर सुंदर वचन सुने, इन्द्रियां प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती जा रही है और मृत्यु सामने खड़ी है, फिर भी उन्हें दुखदायी सांसारिक भोगों में सुख भास रहा है. जन्म, मृत्यु और जरा संबंधी दुखों से सदा आक्रांत होकर संसार में मनुष्य पकाया जा रहा है तो भी वह पाप से उद्व्गिन नहीं हो रहा है. जैसे कछुआ अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, वैसे ही साधक कामनाओं को संकुचित करके रजोगुण रहित हो जाता है.’’
भोग में रोग का भय है, ऊँचे कुल में पतन का भय है. मान में दीनता का, रूप में वृद्धावस्था का तथा देह में काल का भय है. संसार में सभी वस्तुएं भयपूर्ण हैं, भय से रहित तो केवल वैराग्य ही है.
उनके शुभ और अशुभ कर्मों के एकमात्र साक्षी वे स्वयं ही हैं, क्योंकि कर्मों के पीछे की भावना ही उन्हें शुभ अथवा अशुभ बनाती है. मनसा, वाचा, कर्मणा किये गये हर कर्म का फल उन्हें ही मिलने वाला है. अज्ञान दशा में जो कर्म उन्होंने आज तक किये हैं, उनका फल सुख या दुःख के रूप में सम्मुख आने ही वाला है. उनको सम अवस्था में रहकर ही काटा जा सकता है, अन्यथा नये कर्मों का जाल खड़ा हो जायेगा. जैसे यदि कोई अपनी आदत या संस्कार के कारण दुःख पा चुका है, पुनः वही स्थिति आने पर उसे समता बनाये रखनी है न कि पूर्व की भांति उसे दोहराना है, तब तो वह उस संस्कार को दृढ ही करता जायेगा. जहाँ कहीं भी आसक्ति दिखाई दे तो उसमें दोष दृष्टि करके स्वयं को उससे मुक्त करना चाहिए, क्योंकि जहाँ वह परमसुख का स्रोत है, वहाँ कुछ भी नहीं है, कोई विचार कोई भाव भी वहाँ प्रवेश नहीं पा सकता. उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं होती रहती है, अनावश्यक का ही त्याग करना है.

शाम के सात बजे हैं. आज स्वतन्त्रता दिवस है. सुबह वे समय से उठे, नेहरू मैदान जाने से पूर्व प्रधानमन्त्री का भाषण सुना. अस्पताल में मरीजों को मिठाई दी. कम्पनी में बहुत उत्साह से आज का दिन मनाया गया. घर में भी झंडा फहराया और लड्डू बांटे. प्रधानमन्त्री का भाषण उत्साहवर्धक था. उन्होंने पाकिस्तान में बढ़ते असंतोष का भी जिक्र किया. नैनी ने आज सुबह पुत्र के जन्मदिन के केक का फोटो दिखाया. तीन परतों में सजा था, जिसपर एक बच्चे का पुतला था तथा एक गेंद. केक बनाकर सजाने के एक से एक नायाब तरीके निकल रहे हैं. आजकल नेट से देखकर लोग काफी सृजनशील हो गये हैं. शाम को वे यात्रा की तैयारी के लिए खरीदारी करने गये. सुबह ध्यान में गुरूमाँ के मुद्रा ध्यान का सीडी लगाया, अंत में एक सखी के साथ नृत्य किया, उसे भी आनन्द आया होगा.
साढ़े आठ बजे हैं. अज उसने स्वयं से वादा किया है कि वह सहजता से शुद्ध अंग्रेजी भाषा में बोलने का अभ्यास करेगी, और किसी के भी सम्मुख इस भाषा में बोलने से झिझकेगी नहीं. परमात्मा उसके साथ है उसने कल्पना में एक विशाल समूह के सामने स्वयं को अंग्रेजी में भाषण करते हुए देखा, उसे लगा वह कर सकती है. अगले हफ्ते उसे एक कोर्स के लिए गोहाटी जाना है. वहाँ उसे समूह मे काम करने का अवसर भी मिलने वाला है.

आज जो पीड़ा है, कल वही हँसी बनेगी. विनाश की महाक्रीड़ा से ही नई सृष्टि जगेगी ! ब्रह्मा ने सृष्टि की, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार ! हर अश्रु छिपाए है भीतर, एक मुक्त हँसी का कलरव स्वर ! आज एक परिचिता के घर गयी पहली बार, उसने अपनी सीडी दिखाई, सुनाई. असमिया, हिंदी, तथा बंगाली गाना सुनाया जो अपनी माँ के लिए लिखा है तथा फिल्माया है. उसकी माँ ने भी पूरा साथ दिया है. कितनी ऊर्जा है उसमें. चित्रकला का भी पांच वर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रही है, अंतिम वर्ष में है. लिखती भी है, संगीत भी देती है और गाती भी है. केक भी बनाती है. परमात्मा ने उसे सब कुछ दिया है, सुंदर भी है, पर फिर भी संतुष्ट नहीं. इन्सान को कितना भी मिल जाये, वह तृप्त होना नहीं जनता. तृप्ति केवल और केवल आत्मा में जाकर ही मिलती है. जो भी वे होना चाहते है,  वे हैं ही, यह जानकर ही मन शांत होकर बैठ जाता है.   

Tuesday, September 4, 2018

बगिया या जंगल



पौने दस बजे हैं रात्रि के. जून कल आ रहे हैं. अभी कुछ देर पहले उसने नन्हे से बात की. उसके एक मित्र की पत्नी को स्लिप डिस्क की समस्या हो गयी है. डाक्टर ने बताया, छींक को कभी रोकना नहीं चाहिए, उसके कारण भी स्लिप डिस्क हो सकती है. बहुत दिनों बाद शहनाज हुसैन की किताब का कुछ अंश पढ़ा जो कई वर्ष पहले पुस्तक मेले से खरीदी थी. शाम को कार्यक्रम के लिए योगाभ्यास किया. क्लब की दो सदस्याओं का विदाई समारोह भी उसी दिन होगा, उनसे कल कुछ जानकारी उसने ली, दोनों के लिए कविताएँ लिखेगी. कल रात घर आने में दस बज गये, और सोते-सोते काफी देर हो गयी. एक स्वप्न भी देखा, जिसमें वह नृत्य कर रही है, पता नहीं, किसी जन्म में वह नृत्यांगना भी रही हो. कितना अजीब सा स्वप्न था. जून के जिस सहकर्मी की बेटी के पहले जन्मदिन की पार्टी में गयी थी, उसकी माँ को भी एक अन्य स्वप्न में देखा. वह ऊपर से छलांग लगाती है, उसने नई-नई जॉब शुरू की है, सुबह भाग-दौड़ कर स्कूल जाती है, शायद यही सब सुनने से ऐसा स्वप्न आया हो. हो सकता है उसके नृत्य वाले स्वप्न का भी ऐसा ही अर्थ हो. कुछ दिनों बाद जून को एक महीने के लिये बाहर जाना है, उसे काफी दिन अकेले रहना होगा. वे कुछ दिनों के लिए बड़े भाई को यहाँ आने के लिए कहेंगे.

चार दिनों का अन्तराल, शुक्र को जून आये, शनि को मृणाल ज्योति की वार्षिक सभा थी. इतवार को वैसे भी दिन भर व्यस्तता बनी रहती है. आज शाम को क्लब में परसों के कार्यक्रम के लिए रिहर्सल है. शनिवार को सुबह स्वप्न में देखा, एक लम्बे श्वेत दाढ़ी वाले बाबा ने कहा, दही खाना बंद करो. जून के घुटने में दर्द है, शायद दही खाना उन्हें नुकसान कर रहा है. उन्हें कुछ भी खट्टा नहीं खाना है. आज अस्पताल में चेकअप कराया है. उसने भी आँख दिखाई, टीयर ड्रॉप्स दी हैं, दिन में तीन-चार बार डालनी हैं. उम्र के साथ-साथ शरीर में कुछ टूट-फूट होना स्वाभाविक है. वर्षा लगातार हो रही है. धूप निकले जैसे कई दिन हो गये हैं, ऐसा लग रहा है. ग्यारह बज गये हैं, जून आने वाले होंगे. कल भाई को सितम्बर में यहाँ आने का निमन्त्रण दिया, संभवतः वे मान जायेंगे.

वर्षा ने आज सुबह सारे रिकार्ड तोड़ दिए, सारा लॉन जल से आप्लावित हो गया. इस समय धूप झाँकने लगी है, अजब है प्रकृति की लीला ! बरसात का वीडियो फेसबुक पर डाला है. दोपहर भर कितने पंछी बगीचे में गाते रहते हैं, बिलकुल जंगल का सा आभास होता है. जून के घुटनों का दर्द पहले से कम हुआ है. वे बहुत सारी सावधानियां बरत रहे हैं. सुबह योग साधना करते हैं. प्रातः भ्रमण में जो समय जाता था, अब प्राणायाम में जाता है. प्रकृति उन्हें किसी न किसी तरह मार्ग पर लाकर खड़ा कर ही देती है. भाई से अभी बात की, वह बिल्डिंग की सोसाइटी के दफ्तर में थे, उनके आने की टिकट बुक हो गयी है. स्वयं को व्यस्त रखना ही सबसे जरूरी है. कर्म ही आत्मा को शुद्ध करता है. विकर्म उसे शुद्ध करता है और अकर्म उसे आता नहीं. अकर्म का विज्ञान जिसने सीख लिया हो, उसके लिए कर्म भी आवश्यक नहीं रह जाता. सहज ही कर्म होते हैं तब. कल का कार्यक्रम अच्छा हो गया, उसने सुझाव दिया, पूरे समूह को एक साथ मिलकर एक दिन उत्सव मनाना चाहिए.

Tuesday, April 17, 2018

मेथी की बड़ियाँ



नये वर्ष का प्रथम दिन अरुणाचल में आरम्भ हुआ और असम में समाप्त. बोलेरो में की यादगार यात्रा  में चालक ने सावधानीपूर्वक गाड़ी चलाते उन्हें सुरक्षित घर पहुंचा दिया. पत्थरों, कच्चे रास्तों और नदियों को पार करते हुए वे दोपहर तक घर पहुंचे. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर नये लोगों से मुलाकात हुई. वह मोटी सी अरुणाचली महिला जो पीकर चहक रही थी और वह शांत सी महिला जो  अपने पुत्र को गोदी में सुलाए बैठी थी. अरुणाचल के वर्तमान संसद सदस्य और भूतपूर्व मुख्यमंत्री से बातचीत, सभी कुछ स्मृतियों में कैद हो गया है. वापस आकर बंगाली सखी से फोन पर बात की. पिछले हफ्ते तोड़ कर रखे  केले, जो सभी पक गये थे, बाँट दिए. कुछ अभी भी शेष हैं. जो आनंद बाँट कर खाने में है, वह स्वयं खाने में कहाँ ? कुछ वस्त्र भी निकले हैं, जो दे देने हैं.   

शाम को ध्यान करने बैठी तो मन तंद्रा में चला गया. चौंक कर उठी, मुख पर शीतल जल के छींटे मारे. ध्यान और नींद में एक समानता है. दोनों में चेतन मन शांत हो जाता है और बातें अचेतन मन में चली जाती हैं. सब काम करते हुए भी सजगता कायम रहे इसका ध्यान रखना है, व्यर्थ के संकल्प ही व्यर्थ कर्मों को जन्म देते हैं. कर्मों से सुख पाने की इच्छा भी बांधती है. पानी जैसा मन स्वयं को नीचे बनाये रखने के लिए कई जाल फैलाता है, पर उन्हें आत्मा रूपी अग्नि बनकर ऊपर ही जाना है.

सुबह वे टहलने गये तो हल्का अँधेरा था और हल्का कोहरा भी, पर इस वर्ष ज्यादा ठंड नहीं है, सो सुबह के भ्रमण में व्यवधान नहीं आया है. वापस आते समय कम्पनी के मुख्य अधिकारी व उनकी पत्नी मिले, अच्छा लगा. वैसे भी उस समय मिलने वाले लोग बहुत कम होते हैं. आज मंझले भाई व छोटी ननद का जन्मदिन है, उन्हें मुबारकबाद दी. भाई जहाँ है, तापमान शून्य से पन्द्रह डिग्री कम है. कमरे में हीटर जलाने के बाद -२ डिग्री तक आ जाता है. इतनी ठंड में भी वहाँ जीवन चल रहा है. मानव की सहनशीलता व क्षमता की कोई सीमा नहीं है. ननद ने नया दफ्तर ज्वाइन किया है, उसके बैंक में सभी ने मिलकर केक मंगाया व जन्मदिन मनाया. कल वापसी की यात्रा में वे तिनसुकिया होते हुए आये, मेथी लाये. आज सुबह मेथी की बड़ी बनाकर सुखाने के लिए रखी हैं. जून ने ही सारी तैयारी की. मेथी की बड़ी उनकी प्रिय खाद्य वस्तु है. इतवार को अक्सर लंच में इसका मेथी पुलाव बनाते हैं, और इतवार की सुबह यदि दक्षिण भारतीय नाश्ते का मन हो तो वे इडली बनाने में दक्ष हैं. शाम को एक परिचित दम्पति अपने पुत्र के विवाह का निमन्त्रण पत्र देने आये, अगले महीने रिसेप्शन है. गुलाबी रंग का कार्ड बहुत सुंदर है, उनका पुत्र स्कूल में नन्हे का सहपाठी था. नन्हा कूर्ग के पास किसी स्थान पर मित्रों के साथ घूमने गया है. शाम को ‘मृणाल ज्योति’ की मीटिंग थी. दस दिनों बाद कन्या छात्रावास का उद्घाटन है. तीसरे सप्ताह में उत्तर-पूर्व सम्मेलन है, जहाँ अन्य राज्यों से विशेष बच्चों के लिए बनी संस्थाओं के प्रमुख आएंगे.
   

Friday, March 2, 2018

शक्ति और शक्तिमान



पांच दिनों का अन्तराल ! पिछले दिनों घर में रंग-रोगन का कार्य होता रहा. सारा घर अस्त-व्यस्त सा हो गया था. किचन का सामान बैठक में, इस कमरे का सामान उस कमरे में. पेंट का कार्य पूरा गया है. आज बरामदे के फर्श पर पॉलिश का अंतिम कार्य हो रहा है. नैनी किताबों वाली रैक साफ कर रही है. आज भी दिन भर ही व्यस्तता बनी रही. शाम को योग कक्षा में कुछ नये आसन सिखाने हैं, कुछ पुराने दोहराने हैं. क्लब में पूजा का उत्सव भी है. अब अगले दस दिन सात्विक भोजन ही बनेगा, फिर अष्टमी की पूजा है. उसके पहले व्रत. स्कूल भी बंद है सो सुबह का वक्त उसे लेखन के लिए अधिक मिलेगा. कल तिनसुकिया जाना है. सर्दियों की सब्जियों के लिए बीज लाने हैं. कपड़े सिलने दिए थे वे भी. कल शाम क्लब में ‘तलवार’ दिखाई जाएगी, उसे नहीं देखनी है यह उदास करने वाली फिल्म. दो दिन से पेट कुछ नासाज है, शायद दूध वाली चाय पीने से, आज ग्रीन टी पी है, कहते हैं उसके बड़े फायदे हैं. आज बड़ी भांजी का जन्मदिन है. छोटी ने उसके मेल का अच्छा सा जवाब दिया था कल. तीन दिसम्बर को वह एक और पुत्र की माँ बनने वाली है. विदेश में पहले से ही सब पता चल जाता है, लिंग भी. जून ने कहा वह भी अब क्रोध करने वाले पर करुणा करते हैं. वह अपने विभाग में अनुशासन लाना चाहते हैं. वह एक दृढ़ लीडर की भूमिका निभा रहे हैं. कम्पनी की उन्नति ही उनका एकमात्र लक्ष्य है.

आज साप्ताहिक सफाई का दिन था. जून के दफ्तर में आज प्रधानमन्त्री की ‘स्वच्छ भारत’ योजना के अंतर्गत सफाई अभियान का आयोजन किया गया है. वे लोग डेली बाजार में एक क्षेत्र की सफाई करेंगे और कुछ कूड़े दान लगवाएंगे.

रात्रि के आठ बजने को हैं. टीवी पर भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच आ रहा है. जून भी आज बहुत दिनों बाद लिख रहे हैं. आज शाम उन्होंने सिंधी तरीके से दाल माखनी बनाई, बहुत स्वादिष्ट थी. उसके सिर में हल्का दर्द है, बीच-बीच में बिलकुल गायब हो जाता है, शायद उन क्षणों में उसका साक्षी भाव प्रमुख हो जाता होगा. आज दिन में बगीचे में कुछ देर काम किया. सर्दियों के लिए बगीचा आकार ले रहा है. इस बार वे हैंगिंग गमले भी लाये हैं. उनमें लटकते हुए पिटूनिया के फूल बहुत सुंदर लगेंगे.

शाम के चार बजे हैं. सुबह सामान्य थी. दोपहर को बगीचे में साग के बीज डलवाए. पालक, मेथी, चौलाई, मूली आदि के. दोपहर को कुछ देर सोयी तो स्वप्न में मिट्टी से बनी एक देह को देखा. श्वेत मिटटी की बनी है वह और उसमें चेतना भी है. उठकर ब्लॉग पर बाल्मीकि रामायण की एक छोटी सी पोस्ट लिखी. आज षष्ठी है. दुर्गा माँ की कृपा तो हर पल बनी ही हुई है. प्रकृति ही माँ है. आत्मा की शक्ति ही माँ है. शक्ति और शक्तिमान दो होकर भी एक हैं. भीतर के मौन में जाकर जो शक्ति चेतना में भर जाती है वह माँ की ही शक्ति है. कल दिगबोई जाते समय कम्पनी की एक महिला अधिकारी की मृत्यु हो गयी, दो अन्य घटनाओं में नौ अन्य लोगों की. एक पूरा परिवार तथा उनका एक संबंधी तथा चार एडवोकेट, सभी की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हुई. भाग्य कब किस मोड़ पर क्या दिखायेगा, कोई नहीं जानता. कौन सा कर्म कब उदय होगा और कब किस सुख-दुःख का अनुभव होगा, कोई नहीं कह सकता. शुद्ध चेतना सदा सबकी साक्षी रहती है, उसे कुछ भी स्पर्श नहीं करता.  



Friday, February 23, 2018

विघ्नविनाशक हे गणनायक



आज सुबह उसे टीवी पर सद्गुरू के पावन वचन सुनने का मौका मिला है. वह गणेशजी का वन्दन उस स्त्रोत से कर रहे हैं जो आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया है. गणेश जी प्रथम मूलाधार चक्र के अधिपति हैं. उन का जागरण ही चैतन्य को जगाता है, भीतर शक्ति को मुक्त करता है. वे अजन्मा, निर्विकार, निराकार, गुणातीत, चिदानन्दरूप हैं, पर उनका साकार रूप भी बहुत अनुपम है. सद्गुरू उनकी वन्दना करते हुए कह रहे हैं, साकार के आलम्बन के साथ-साथ निराकार में पहुँचना है, निरंजन तक पहुंचना है. जो परब्रह्म है, सर्वव्यापी है, जगत का कारण है, सुख प्रदाता है, दुःख हर्ता है. जो ज्ञान, ज्ञाता व ज्ञेय तीनों है, सब के भीतर देखने वाला ही वह चैतन्य है. गणेश पूजा के उत्सव के दौरान भक्त भगवान के साथ खेलना चाहते हैं. उनकी मूर्ति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, भीतर की चेतना को ही उसमें स्थापित करते हैं. भगवान जो कुछ भक्त को देते हैं, वे भी उन्हें अर्पण करना चाहते हैं. जैसे सूरज व चाँद भगवान की आरती करते हैं, भक्त कपूर जलाकर आरती करते हैं. पुनः उन्हें अपने हृदय में स्थापित करके साकार मूर्ति को जल में प्रवाहित कर देते हैं. गणपति विद्या के अधिपति भी हैं, सर्व पूजित ब्रह्म तत्व भी वही हैं. उन्हें स्वयं के भीतर अनुभव करना ही सच्ची पूजा है. स्वयं के भीतर विराजमान निराकार शक्ति के साथ खेलना ही पूजा है. चेतना में छिपे गुणों को जागृत करना ही पूजा का लक्ष्य है.

बंगलूरू में दो दिन उन्हें और बिताने हैं. आज गणेश पूजा है. जून यहीं निकट ही कुछ सामान लेने गये हैं. नन्हा भी किसी काम से बाहर गया है. आज उसका अवकाश है. कुछ देर पहले नेट पर उसने एक इंटरव्यू लिया. आज बाई नहीं आई है. सुबह कुक आया था, नाश्ते में पोहा बनाया है. कुछ देर बाद वे तीनों घूमने जायेंगे. पहले चिड़ियाघर, फिर राजधानी में दोपहर का भोजन, जहाँ बड़े भाई की बिटिया भी आ जाएगी, जो यहीं रहकर पढ़ाई करती है. उसके बाद वे आर्ट ऑफ़ लिविंग आश्रम जायेंगे. उसने आज सुबह महाभारत में भगवद गीता का एपिसोड देखा. गीता अब कुछ-कुछ समझ में आने लगी है. पहले कृष्ण ज्ञान योग की बात करते हैं, आत्मा के ज्ञान की बात, पर अर्जुन उसे समझ नहीं पाता. फिर वे निष्काम कर्मयोग की बात करते हैं. कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता, पर कर्म बंधन न बने इसके लिए स्वार्थ के बिना कर्म करना होगा. फल पर उनका अधिकार नहीं है, केवल कर्म पर ही है. यज्ञ रूप में किये गये कर्म उन्हें बांधते नहीं हैं तथा रजोगुण को शांत रखते हैं. अर्जुन जब यहाँ भी संदेह से मुक्त नहीं हो पाया तब कृष्ण ने भक्ति योग की बात कही. परमात्मा को अर्पण हुए कर्म भी मुक्ति का कारण बनते हैं. कृष्ण की महिमा को जानकर अर्जुन के मन में श्रद्धा का जन्म होता है, वह उनकी बात समझ जाता है.


Wednesday, July 19, 2017

नूरपुर की रानी


अभी-अभी नैनी ने कौए और कबूतर के झगड़े की गाथा सुनाई. उसकी सास ने रोज की तरह कबूतरों के लिए कटोरी में पानी रखा और चावल के दाने बिखेरे. दो कौए आकर पानी पीने लगे. एक ने कटोरी ही चोंच से उलट दी, फिर चावल खाने आये कबूतरों को खदेड़ने लगे. बाद में एक बड़े कौए को बुलाकर लाये, शायद वह उनके नेता था. एक कबूतर की पूंछ पकड़कर उसे गोल-गोल घुमाने लगे और इस क्रिया में उसका एक पंख भी निकल गया. कौआ शनि देवता का रूप माना जाता है और कबूतर तो शिव का प्रिय पक्षी है. दोनों का यह झगड़ा फिर क्यों ! इन जीवों में भी कितना ज्ञान होता है. रात को दो अनोखे स्वप्न देखे, एक में वह आचार्य रजनीश से मिल रही है. वे अभी युवा हैं, वह कहती है, सर, आप कहाँ रहते हैं, उन्होंने इलाहाबाद का नाम लिया, इलाहबाद के किसी स्थान का. दूसरे में श्री श्री का सत्संग हो रहा है, आगे क्या करना है, इसके लिए वह उनसे मन्त्रणा कर रही है. गुरूजी से इतनी निकटता से बातचीत स्वप्न में ही सम्भव है, शायद भविष्य में कभी जागृत में भी सम्भव हो. भीतर कैसा तो अहोभाव भर गया है, परमात्मा की महक चारों और भरी है, धनक कण-कण में है, उसका स्पर्श हर शै पर है ! उसका सौन्दर्य अप्रतिम है. कितनी सुंदर सृष्टि रची है उसने, और पल-पल रच रहा है. उन्हें उसे कुरूप करने का कोई अधिकार नहीं है. उनका मन भी सुंदर होना चाहिए, विचार तथा भावनाएं भी. सभी कुछ एक सौन्दर्य का प्रकटीकरण करे, ऐसा होना चाहिए. बाहर माली की कैंची की आवाज सुनाई दे रही है, वह आज जल्दी आया गया है. उसने सोचा बगीचे में क्या-क्या काम और करवाए जिससे बगीचा और सुंदर लगे. जून कल आ रहे हैं, उन्होंने कोलकाता में कुछ सामान खरीदा है, उन्हें खरीदारी करने में बड़ा मजा आता है, जैसे उसे कविताएँ लिखने में ख़ुशी मिलती है.

कल कुछ नहीं लिखा, आज सुबह से मन स्थिर नहीं है. कोई पुराना कर्म अवश्य ही जागृत हुआ है. साक्षी में टिकना कोई ऐसी बात नहीं है कि एक बार यदि हो गया तो सदा के लिए हो गया. पल-पल  सजग रहना होगा. पूर्ण ज्ञान के बाद सम्भवतः वह सदा ही हो जाता हो, अप्रयास ही. कबीर तभी कहते हैं, साधो, सहज समाधि भली ! आज सुबह बाबा रामदेव जी की गंगोत्री यात्रा पर अच्छा सा कार्यक्रम देखा. वे साधु-संतों से भेंट करते हुए, अपने शिष्यों के साथ गंगोत्री से गोमुख की ओर जा रहे थे.  

आज धूप बेहद तेज है, पर पंखे के सामने बैठकर गर्मी का अहसास नहीं हो रहा है, यूँ भी मन यदि शीतल हो तो बाहर का ताप विशेष असर नहीं करता. बड़ी ननद का फोन आया, कल बेटी के ससुराल वालों के साथ बात हुई, पर कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है. कुछ देर ‘नूरपुर की रानी’ धारावाहिक देखा. नायिका नूरी कितनी अच्छी उर्दू बोलती है और बहुत संवेदनशील है. वह शहजादी बनकर अच्छे-अच्छे लिबास पहनती है तो उसे भी आज बहुत खूबसूरत लिबास मिले हैं. दो कुरते, जिनमें एक कुरता चिकन का है, और दो सूट के कपड़े, जिनपर कश्मीरी कढ़ाई है.

आज क्लब की वार्षिक मीटिंग है, नई कमेटी को जिम्मेदारी सौंपने का दिन, उसका काम अब कोई और संभालेगा. जुलाई भी समाप्त होने को है, नया वर्ष आता है और उसके जाने का वक्त भी आ जाता है. दोपहर को उठी तो सिर में दर्द था, आचार्य बालकृष्ण जी का तरीका अपनाया. दायीं नासिका को बंद करके बायीं नासिका से लम्बे श्वास लेना, दर्द काफी चला गया है, शायद पित्त बढ़ गया है. आजकल वे रोज ही आम खा रहे हैं. 

Friday, June 9, 2017

बूँदा-बाँदी


दो दिनों का अन्तराल..परसों राखी थी, वह दो अन्य महिलाओं के साथ  मृणाल ज्योति गयी, सबने बच्चों को राखी बांधी, लड़के-लडकियों दोनों को..ये विशेष बच्चे जो हैं. कल भी वार्षिक सभा में वहाँ जाना है, हर बार की तरह उसने इस अवसर के लिए एक कविता लिखी है. राखी पर मन में कामना उठी थी कि उसने भेजी है तो भाईयों की ओर से भी फोन तो आने चाहिए, पर इस वर्ष भेजते वक्त भी मन में हर वर्ष की तरह उत्साह नहीं था, सो परिणाम भी वही हुआ. किसी ने फोन नहीं किया. अब अंतर के स्नेह के लिए किसी माध्यम की भी क्या आवश्यकता भला..यह तो आसक्ति ही हुई. ईश्वर आसक्तियों के धागे एक-एक करके तुड़वाता जा रहा है. जो हो सो हो, कोई आग्रह नहीं रहा अब भीतर. मन इच्छा का ही दूसरा नाम है, इच्छा न रहे तो मन नहीं रहता और तब अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं रहती. कर्ता भाव भी तो तभी मिटेगा. जब कर्म किया हो तभी उसके प्रतिफल की आशा रहती है, जब वे करने वाले ही नहीं तब परमात्मा ही जाने, और वह कभी कुछ चाहता ही नहीं तभी तो वह परमात्मा है. आत्मा, देह, मन, बुद्धि से पृथक है, उसे अपने आप में सुखी रहना आ जाये तो देह भी स्वस्थ रहेगी और मन भी. 

सुबह हल्की बूँदा-बाँदी में छाता लेकर टहलना अच्छा लग रहा था. मनन-चिन्तन भी चल रहा था. अज्ञान दशा में कोई न कोई अभाव ही उन्ह कृत्य में लगाता आया है, वे कुछ बनकर, कुछ करके दिखाना चाहते हैं ताकि अपने भीतर के अभाव को ढक सकें, वे जो दिखाना चाहते हैं, वास्तव में उससे विपरीत होते हैं. ज्ञान होते ही समीकरण बदल जाते हैं, कृत्य सहज स्फूर्त होते हैं, भीतर जो भी शुभ-अशुभ होता है उससे संबंध मात्र दर्शक का ही रह जाता है. अज्ञानवश उससे स्वयं को चिपका कर वे सुख-दुःख का अनुभव मन द्वारा करते हैं. संवेदनाओं से जो सुख मिलता है वह कितना उथला होता है, इन्द्रधनुष जैसा..ओस की बूंद जैसा..भीतर शाश्वत सुख है, वही वे हैं, वही उन्हें मुक्त करता है !   


अज गर्मी कुछ ज्यादा है. उसने सोचा दोपहर के भोजन में खिचड़ी बनाएगी, तीन दालों वाली खिचड़ी, जून को पसंद आएगी. स्वयं के साथ यदि किसी का संबंध दृढ़ हो जाये तो संसार के साथ अपने आप ही जाता है. स्वयं पर विश्वास हो तो जगत भी विश्वासी नजर आता है. जून और उसका रिश्ता और दृढ हो गया है, बल्कि जगत में किसी से भी जुड़ना अब कितना सहज लगता है जैसे श्वास लेना. एक वक्त था जब परिचय होने पर भी बात करना कठिन लगता था, अब कोई अजनबी लगता ही नहीं. परमात्मा भी तब दूर था, और अब तो वह अपना आप ही है, निकट से भी निकट. उसकी शक्ति अपनी हो गयी है, उसकी प्रीत भी, संसार और परमात्मा दो नहीं हैं. स्वयं से जुड़ने के बाद ही उस शांति का अनुभव कोई कर सकता है जिसका जिक्र धर्म ग्रन्थों में मिलता है. सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, कोई हीनता-दीनता भी नहीं रहती. किसी के सम्मुख अब कुछ सिद्ध नहीं करना होता, किसी को कुछ नहीं सिखाना होता उस तरह जैसे पहले सिखाना चाहता है कोई. हर की अपनी यात्रा कर रहा है. हरेक एक पास अपनी पूंजी है. हरेक के पैरों में अपना बल है. हर कोई तो उससे जुड़ा हुआ है पर सबको इसका ज्ञान नहीं है जैसे पहले उसे भी नहीं था, उन्हें भी एक न एक दिन हो ही जायेगा. उनका यह क्षण ठीक रहे बस इतना ही पुरुषार्थ करना है, वे स्वयं से जुड़े रहें, स्वयं से पीठ न फेर लें, बस इतनी सी प्रार्थना है !

Friday, May 12, 2017

बचपन की बेफिक्री


पिताजी की कमजोरी बढ़ती जा रही है, अब वे अपने आप उठने-बैठने में भी असमर्थता महसूस करने लगे हैं. स्नान के लिए भी उनके पास शक्ति नहीं थी आज, एक सहायक रख लिया है उनके लिए. उसी ने सहायता की. नाश्ता भी ठीक से नहीं खाया. इस जगत से प्रयाण कैसे धीरे-धीरे होता है. अचानक कोई नहीं जाता. जन्मते ही मृत्यु भी साथ हो लेती है. टीवी पर वर्षा के कारण कोई सिगनल नहीं आ रहा है. उसने एक सीडी लगाकर सुना, संत कह रहे थे, जिस कर्म और उसके फल में आसक्ति न हो तो वह कर्म भक्ति में बदल जाता है. कठिन काम करने से काम करने की योग्यता भी बढ़ती है. अभी-अभी नन्हे की एक मित्र व उसकी माँ से बात की. दो महीने बाद वे उन लोगों से मिलेंगे. जून अभी तक नहीं आये हैं, बादलों के कारण शाम जल्दी हो गयी है. छह बजे उसे क्लब जाना है, पत्रिका के लिए फोटोग्राफी होनी है. उसने सोचा अपना कैमरा भी ले जाएगी. बड़ी भांजी ने वसंत ऋत का सुंदर फोटो शूट किया है.

अज चैत्र नवरात्रि का पहला दिन है. चेट्टी चाँद भी आज है. रात कोई स्वप्न नहीं आया, आया भी हो याद नहीं है. दो दिन पूर्व का अजीब सा स्वप्न अब भी पहेली बनकर मन में बना हुआ है. माँ भी थीं उसमें, नन्हा छोटा था तब, उसके शरीर से अनवरत जलधार निकल रही है, जैसे शिव से गंगा की धारा, पर माँ कहती हैं, इसमें हवा भी है, जिसकी गंध अच्छी नहीं है, पर वह रुकता ही नहीं. वह समझदार है और कल तो उसने विवाह के लिए हाँ भी कह दिया, देखें अब लड़की के पिताजी कब तक नम्र पड़ते हैं. कल वे नये घर में नहीं जा सके, आज जून की मीटिंग है, वह अकेले ही जाएगी. वहाँ काम शुरू हो गया है. बड़ी भाभी का आपरेशन ठीक हो गया, अभी भी अस्पताल में हैं, समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई ऐसा भाई ने कहा. उन्हें अपने भीतर की शक्ति जगानी होगी.

पिताजी को आज अस्पताल ले जाना ही पड़ा. कल रात को जून चौंक कर उठ गये. उन्हें लगा जैसे पिताजी ने आवाज दी है, पर वे उस वक्त सोये थे. उनकी कमजोरी बहुत बढ़ गयी है. भोजन भी बहुत कम खाते हैं, बैठे-बैठे सो जाते हैं, नहाना भी नहीं चाहते. दो कदम चलना भी मुश्किल हो गया है उनके लिए. अब तो इतनी भी शक्ति नहीं है भीतर कि अपनी समस्या कह सकें, या आँसू ही बहा सकें. उसी कमरा नम्बर चार में उन्हें जगह मिली है जहाँ एक वर्ष पूर्व माँ रही थीं. जून उन्हें भोजन खिला के आयेंगे. वह सुबह मिलकर आई. नैनी की बिटिया गाना गा रही है झूम-झूम कर, यह उम्र कितनी बेफिक्र होती है.
सुबह के साढ़े सात बजे हैं, उस समय वर्षा हो रही थी जब जून सुबह बहुत जल्दी ही अस्पताल चले गये, पिताजी की देखभाल के लिए जो सहायक रखा है, उसे सुबह रिलीज करना था. उसने बताया रात को उन्हें नींद नहीं आ रही थी, तीन बजे वे दोनों सोये. परमात्मा मानव को शोधित करने के लिए ही दुःख देता है, पिताजी का दुःख उन्हें भी तपाकर शुद्ध कर रहा है. आत्मा के निकट हो जाना जिसने जीते जी सीखा हो, वही तो मृत्यु को सामने देखकर भी प्रसन्न रहता है.  


कल भी भीतर क्रोध का धुआं उठा, एक क्षण को ही सही, अब याद भी नहीं क्यों ? बाहर कारण कुछ भी रहा हो, उसे केवल भीतर देखना है. आज शाम को फिर ऐसा हुआ, लगता है कोई कर्म जगा है. मन की न जाने कितनी परतें हैं, किस जगह से क्या उठेगा, पता नहीं चलता. ध्यान आजकल नहीं हो पा रह है. पिछले चार दिनों से पिताजी अस्पताल में हैं, घर से अस्पताल जाते-जाते जून भी परेशान हैं. उन्हें कष्ट में देखकर मन भी द्रवित होता होगा. ऊपर से कितना भी कहें कि एक न एक दिन सबके साथ ऐसा होता है, पर अपने सामने किसी को धीरे-धीरे जाते देखना बहुत कष्टदायी है. उसका अंतर भी इस समय दुःख से भरा है, खुद भी आश्चर्य हो रहा है, सदा आनन्द से ओत-प्रोत रहने वाला मन क्यों ऐसा अनुभव कर रहा है, पर उसे तो इस दुःख को भी साक्षी होकर देखना है. जीवन रहस्यमय है. वे मन को कितना भी जानने का दावा करें, वह अथाह है. आत्मा द्रष्टा है, वे उससे जरा नीचे उतरे तो दुःख के शिकार होने ही वाले हैं. इसलिए तो कृष्ण को अच्युत कहते हैं. वह कभी अपने दृष्टाभाव से च्युत नहीं होते, जब वे स्वयं को मन, बुद्धि या अहंकार मानते हैं या कोई धारणा मानते हैं तो नीचे ही उतर आते हैं. आत्मा सदा सर्वदा एकरस है. व्यवहार करते समय उन्हें नीचे उतरना पड़ता है पर तब भी स्वयं को द्रष्टा मानना है. एक अभिनय ही तो करना है, अभिनय को सच्चा मानने से ही पीड़ा होती है. कल रात भी स्वप्न में दो हाथी देखे, एक बड़ा एक छोटा, नन्हे को भी देखा, पता नहीं काले मोटे जानवर और उसे एक साथ क्यों देखती है. कुछ भी तो पता नहीं है उसे..सिवाय उस एक के जो सदा हजार आँखों से उस पर नजर रखे है. परमात्मा और सद्गुरू का साथ न हो तो संवेदनशील व्यक्ति का इस जगत में रहना कितना कठिन है .  

Monday, May 8, 2017

धर्मयुग का विशेषांक


कल रात अनोखा स्वप्न देखा. एक बिल्ली और उसका बच्चा..उसके पहले नन्हे को बचपन में देखा, उसे किसी बात पर डांट लगायी थी उसने. मन ग्लानि से भर गया, किस कदर मूर्खता से भरा कृत्य था यह. बहुत देर तक अपने इसी प्रकार के कृत्यों के लिए क्षमा मांगी. भीतर जैसे कुछ धुल-पुंछ गया हो. उनके जीवन की जड़ें न जाने कहाँ तक फैली हुई हैं..शायद पिछले जन्मों तक..वे अपने इर्द-गिर्द कितने ही कर्मों का जाल बना लेते हैं. उसने सोचा, आज सुबह से ऐसा कोई कृत्य तो नहीं किया जिसका परिणाम बाद में भोगना पड़े..जो भी किया सब समर्पण कर देना है. पल-पल उसी को समर्पित करते जाना है, तब कोई भी कर्म नहीं बंधेगा. परमात्मा सत रूप में जड़ में भी है, चित रूप में चेतन में है और आनंद रूप में सद्गुरु में है.  
कल जून आ गये, घर जैसे भर गया है. उनके न रहने पर मन कैसा शांत हो गया है, ऐसा प्रतीत होता था. शायद वह विरह ही था, परमात्मा ही तो उनके स्वजनों के रूप में उनके पास रहता है. पहले माता-पिता सन्तान के लिए देव स्वरूप होते हैं फिर आत्मीयजन, लेकिन इसकी खबर ही नहीं हो पाती अक्सर तो.. उसका गला पूर्ण रूप से ठीक नहीं है, लेकिन भीतर उत्साह का निर्झर फूट रहा है. आज महीनों बाद संगीत का भी अभ्यास किया. गान, ज्ञान और ध्यान तीनों जीवन को सुंदर बनाते हैं. सद्गुरु की प्रिय बहन की आवाज में मधुर देवी स्तुति सुनी. आज ‘महादेव’ में देखा लक्ष्मी भी नारायण से कहती हैं, उनके सिवा नारायण के हृदय में किसी अन्य का चिन्तन तो नहीं होता न ! हृदय तो आखिर एक ही है न.. महादेव का पुनर्विवाह भी दिखाया जायेगा, वे सनातन प्रेमी हैं, पुरुष और प्रकृति दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं, आत्मा व परमात्मा की तरह ! पति-पत्नी कितने पवित्र बंधन में बंधे होते हैं, एकदूसरे के लिए ही मानो उनका जीवन होता है, जीवन को सरस बनाते हैं ये रिश्ते, लेकिन आत्मबोध हो जाने के बाद ही कोई इन रिश्तों की अहमियत समझ सकता है. पिताजी का स्वास्थ्य बेहतर है. कल उन्हें पहला इंजेक्शन भी लग गया. वे सौ वर्ष जियें, उनके साथ बैंगलोर चलें, ऐसी वह शुभेच्छा करती है, उनमें जीवन के प्रति असीम उत्साह है, ऐसे व्यक्ति से मृत्यु भी दूर भाग जाएगी.
पिछले तीन दिन फिर नहीं लिख सकी. शुक्रवार को ‘बंद’ था, जून घर पर ही थे, उसके बाद सप्ताह का अंत ! दोपहर के पौने तीन बजे हैं, वह लॉन में फूलों के पास पोखरी के निकट बैठी है. नन्हे-नन्हे गुलाबी फूल भी खिले हैं जो तीन पत्ते वाली खट्टी घास में अपने आप ही उग आये हैं. चिड़ियों की मधुर आवाजें वातावरण को सरस बना रही हैं. न जाने कौन से पंछी अपना कलरव गुंजा कर जाने क्या कह रहे हैं. प्रकृति में हर क्षण कुछ घट रहा है पर एक गहन रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है यह. अभी-अभी नासापुटों में एक मदमस्त करने वाली सुगंध भर गयी है, हवा का कोई झोंका उसे अपने साथ लिए आया है. उसने एक गीत लिखा. सुबह चार बजे नींद खिली पर कुछ पल नहीं उठी तो एक स्वप्न देखा, एक छोटा बच्चा रो रहा है, शायद वह नन्हा था, उसे चुप कराने का प्रयास करती है तो नींद खुल जाती है, उनकी आत्मा कितनी सजग है, वह हर पल उन्हें जगाये रखना चाहती है.

पिताजी का स्वास्थ्य लगता है आज ठीक नहीं है, आज उन्होंने अपना पसंदीदा कार्य, दूध लेना व गर्म करना नहीं किया. वह बगीचे से पालक तोड़कर लाये हैं. आज नेट नहीं चला, सो उसने पढ़ने के लिए बाईस वर्ष पुराना धर्मयुग का एक विशेषांक निकाला है. दीदी व छोटी बहन से बात हुई, छोटी बहन के यहाँ आज रात्रि भोज है, देर रात तक चलने वाला. वे लोग नया बिजनेस भी शुरू कर रहे हैं. एक कम्पनी का को-ओपरेटिव स्टोर चलाएंगे, तीन परिवार मिलकर. शाम को अस्पताल जाना है, वृद्धा आंटी कुछ दिनों से अस्पताल में हैं, कल रात बेड से गिर गयीं, शायद सिर में चोट लगी है. बुढ़ापे में कितने कष्ट झेलने पड़ते हैं, इन्सान विवश हो जाता है.