Wednesday, July 17, 2019

पक्षी विहार



आज सुबह तेज गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई, लगा कि फरवरी में ही वर्षा का मौसम आ गया असम में, पर दोपहर होते-होते बादल छंट गये और मौसम सुहाना हो गया. इस समय शाम होने को है, जून अभी तक नहीं आये हैं. दोपहर को उन्होंने तिनसुकिया के पास स्थित डिब्रू सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान यानि पक्षी विहार जाने के लिए कार्यक्रम को रूप दिया. रिजार्ट के मालिक से बात करके इतवार सुबह आठ बजे पहुंचने का समय तय हो गया. एक और परिवार भी उनके साथ जायेगा, उनसे भी बात कर ली है. कल मृणाल ज्योति की 'क्षेत्रीय अभिभावक सभा' के लिए तैयारी भी कर ली है. नेट पर दिव्यंगो के लिए बनी राष्ट्रीय नीतियों के बारे में पढ़ा. सरकार ने कई संस्थाएं खोली हैं और कई नीतियाँ बनाई हैं ताकि दिव्यंगों को समाज और राष्ट्र में अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिल सके. देश की जनसंख्या का तीन से पांच प्रतिशत हिस्सा इस श्रेणी में आता है, यानि ढाई करोड़ से भी ज्यादा दिव्यांग हैं देश में, जिन्हें यदि उचित अवसर मिले तो सक्षम बन सकते हैं. कोई भी समाज तभी विकसित कहा जा सकता है जब उसमें सभी के लिए समान अवसर हों. संवेदनशील समाज अपने कम सक्षम नागरिकों के लिए, उन लोगों के लिए जो किसी न किसी कारण से पीछे रह गये हैं, अपने द्वार खुले रखता है. उन्हें बाहरी रूप को देखकर किसी की क्षमता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाने हैं, भीतर की शक्ति को जगाना है ताकि एक सम्मानपूर्ण जीवन उनके हिस्से आ सके, उन्हें दया अथवा सहानुभूति की नजर से नहीं देखना है. उन्हें भी एक सामान्य नागरिक की तरह शिक्षा का अधिकार है तथा अपनी बात कहने का भी अधिकार है. हर जीवन को दिव्य मानकर उन्हें किसी के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होना है. उनके साथ काम करने वाले शिक्षक व अन्य लोग समझते हैं कि वे अपने को व्यक्त करना चाहते हैं और उन्हें इस बात का अवसर दिया जा चाहिए.

"जलता हुआ दीपक जिस समय बुझ जाता है, अंधकार छाने में पल भर भी नहीं लगता, वैसे ही एक क्षण का प्रमाद भी आत्मा के प्रकाश को ढक लेता है और भीतर अंधकार छा जाता है." महावीर स्वामी का यह वचन आज सुना, इसीलिए संत कहते हैं, प्रमाद मृत्यु है क्योंकि आत्मा अमृत है ! आत्मा का सूर्य भीतर प्रज्ज्वलित हो रहा है पर प्रमाद रूपी बादल उसे ढक लेता है और वे उसके प्रकाश से वंचित हो जाते हैं. मन जिस क्षण भी उद्ग्विन हो यही समझना चाहिए कि अज्ञान के बादल ने आत्मा को ढक लिया है. आज आत्मा कितनी मुखर है, सिर के ऊपरी भाग में हल्की सिहरन हो रही है, दाहिने कान में संगीत गूँज रहा है, मन बिलकुल खाली है. पिछले तीन-चार दिनों से न समाचार सुने न अखबार पढ़ा. ध्यान किया और सद्वचन सुने, जैसे कोई कोर्स घर बैठे कर लिया हो, ऐसा ही लग रहा है. ध्यान रखना होगा कि अध्यात्मिक यात्रा ऐसे ही चलती रहे. भोजन हल्का होना चाहिए और समय का सदुपयोग !

'पीस ऑफ़ माइंड' पर कितना सुंदर गीत आ रहा है, और नासिकाग्र पर कितनी दिव्य गंध आ रही है. आजकल कोई न कोई मदमाती गंध आसपास डोलती रहती है. परमात्मा की कृपा अनंत है, वह अकारण दयालु है और सच्चा सुहृद है, अनंत प्रेम करने वाला है. वह लिख ही रही थी कि जून भोजन ले आए, मेथी पुलाव, भिन्डी की सब्जी और पापड़, पूरा सिन्धी खाना.


Monday, July 15, 2019

साईं भजन



जून शाम को आये तो उन्होंने टीवी पर एक फिल्म का कुछ अंश देखा, फिर आमिर खान की 'सीक्रेट सुपर स्टार' का भी. सोने गयी तो नींद का दूर-दूर तक पता नहीं था, पता नहीं चला बाद में कब नींद आई, सुबह फिर कोई देवदूत जगाने आया. आज इतवार है सो जून ने नया नाश्ता बनाया, 'पनिअप्पम तथा फिल्टर कॉफ़ी'. बाद में सभी से फोन पर बात की, हर इतवार को वे एक-डेढ़ घंटा इसी में बिताते हैं, हफ्ते भर के समाचार मिल जाते हैं. बगीचे में ढेर सारे फूल खिले हैं, फूलों का ही मौसम है यह फाल्गुन का महीना. दो दिन बाद शिवरात्रि है. उस दिन बीहुताली में ब्रह्माकुमारी का कोई कार्यक्रम भी होने वाला है. वह इस बार रात्रि जागरण करेगी, वैसे भी देर तक नींद कहाँ आती है. भीतर सुमिरन चलता रहता है चाहे आँख खुली रहे या बंद. कभी रूप बनकर, कभी गंध बनकर आस-पास ही कोई डोलता रहता है. अब वह जगाता भी है, पढ़ाता भी है. जून ने एक नयी डायरी दी है, उसमें विशेष अध्यात्मिक अनुभव लिख रही है आजकल. सुना है, कबीर पहले भगवान को पुकारते थे और फिर एक दिन भगवान उनके पीछे कबीर-कबीर कहकर पीछा करने लगे. कैसा अनोखा है प्रेम का यह आदान-प्रदान ! दोपहर को नन्हे और सोनू से बात हुई, वे दोनों भी प्रेम के एक बंधन में बंधे हैं, जहाँ अभिमान की गंध भी नहीं. प्रेम और अभिमान का साथ हो ही नहीं सकता, प्रेम तो समर्पण का ही दूसरा नाम है. जून बाहर टहलते हुए फोन पर अपने मित्र से बात कर रहे हैं. दोपहर को तीन छोटी लडकियाँ आयीं जिन्हें गणित पढ़ाया, फिर कुछ देर बैडमिंटन खेला. अब समय है 'अष्टावक्र गीता' पर गुरूजी की व्याख्या सुनकर ध्यान करने का. ध्यान मन के पार होकर ही किया जा सकता है, बल्कि मन के कारण ही ध्यान उपलब्ध नहीं होता. अमन अवस्था ही ध्यान है. ध्यान कार्य-कारण में नहीं आता. कार्य-कारण के कारण ईश्वर को नहीं पाया जा सकता है. कार्य-कारण का सिद्धांत जहाँ लागू होता है वहाँ नियति है, पर परमात्मा भाग्य से नहीं मिलता, अर्थात उनके कुछ करने से नहीं मिलता. परमात्मा कृपा से मिलता है. बल्कि परमात्मा सदा ही है, सब जगह है, उसे देखने की दृष्टि हमें जगानी है. परमात्मा सब सीमाओं के पार है. ध्यान उन्हें वह अवसर देता है कि वह दृष्टि अपने भीतर जागृत कर लें.  

कुछ देर पहले कम्पनी के आई टी विभाग से एक मकैनिक आया माउस बदलने, उसके पिता का कुछ समय पहले देहांत हो गया था, कहने लगा, माँ को योग सिखने के लिए लायेगा किसी दिन. कल सुबह स्कूल में बच्चों को योग के बाद ध्यान कराया, एक अध्यापिका ने धन्यवाद कहा, वह आजकल पहले की तरह क्रोध नहीं करती हैं. कल शाम क्लब में 'पैडमैन' थी, अच्छी फिल्म है, सामाजिक विषय को लेकर बनायी गयी. उसके बाद महिला क्लब की एक सदस्या का विदाई समारोह था. आज आसू ने 'बंद' का आवाहन किया है, कम्पनी के वाहन नहीं चल रहे हैं, जून अपनी गाड़ी लेकर दफ्तर गये हैं. ऐसे में थोडा सा डर तो बना ही रहता है, फ़ील्ड जाने वाली गाड़ियों को पत्थर मारने की घटनाएँ भी कभी-कभी हो जाती हैं. एक सखी ने अपने घर पर 'साईं भजन' रखा है, साईं बाबा को मानने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. उसने देखा है सभी भजनों में थोडा सा परिवर्तन करके साईं के नाम से गाते हैं. उसने मना कर दिया, क्योंकि वही समय शाम की योग कक्षा का होता है.


Saturday, July 13, 2019

सेमल के फूल



पिछले पांच दिन कुछ नहीं लिखा, कारण क्या हो सकता है सिवाय प्रमाद के. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं. जून बंगलूरू में हैं, परसों वापस आ रहे हैं. आज दिन भर कुछ नहीं सुना, अब और कुछ सुनने की आवश्यकता नहीं है, भीतर के मौन को ही सुनना है. निरंतर भीतर एक स्मृति बनी रहती है. एक अचल मौन का भान होता है. कानों में कोई रुनझुन बजती है और विचार दूर प्रतीत होते हैं. उनके पास परमात्मा का दिया बहुत कुछ है. उसके लिए कृतज्ञ होना है. जीवन में चुनौतियाँ तो आने ही वाली हैं, उनका सामना करना है, बचना या भागना नहीं है उनसे. हर दिन कोई न कोई सृजनात्मक कार्य करना है और अन्यों का सहयोग भी. यदि किसी का हाथ नहीं बंटा पाए तो सोचना है किसी को कोई दुःख तो नहीं दिया. यदि स्वस्थ हुए तो भी परमात्मा का धन्यवाद करना है और अगर अस्वस्थ भी हो गये तो भी यही सोचना है कि हमारी मृत्यु तो नहीं हो गयी, अभी श्वासें शेष हैं तो मुक्ति की सम्भावना है !  

कल रात स्वप्न में बूढ़े माली को देखा, कह रहा था, साहब ने उसका अपमान किया था, उससे नाराज नहीं था. इसलिए बगीचे से सब्जी तोड़कर नहीं देगा. स्वप्नों की दुनिया जागृत से कितनी भिन्न होती है. हर बार स्वप्न देखने वाला अलग ही होता है, कोई दो रात लगातार धारावाहिक सपने नहीं आते. कल शाम दायीं तरफ की पड़ोसिन के यहाँ भजन है, वे जायेंगे. बाद में रात्रि भोजन भी वहीं होगा. दोपहर को अगले हफ्ते डिब्रूगढ़ में होने वाली मृणाल ज्योति की मीट के लिए कुछ पढ़ा, अभी दो-तीन दिन और पढ़ना होगा. उसे एक भाषण में सहायता करनी है. दीदी का फोन आया सुबह, जीजाजी का स्वास्थ्य अब ठीक है. उससे पूर्व एक मराठी सखी का नया घर देखने गयी, उसके माता-पिता से मिली. गणेश की मूर्ति ले गयी थी, उन्हें अच्छी लगी. एक अन्य सखी के यहाँ गयी, और बड़े आराम से उससे बातें कीं. उसके प्रति जो भी दुविधा मन में थी, अब नष्ट हो गयी है. अब इस पूरे संसार में कोई नहीं है जो उससे उद्ग्विन हो और जिससे वह उद्ग्विन हो. सारा संसार अपना घर बन गया है, गुरूजी का ज्ञान सफल हो रहा है. सुबह सेमल के वृक्ष की फोटो भी उतारी. कितने सुंदर फूल होते हैं सेमल के. इतने वर्षों में पहली बार इस बड़े वृक्ष के फूल देखे, पहले कई बार सेमल के फाहे देखे थे हवा में उड़ते हुए. जून का फोन आया अभी-अभी, उन्होंने अकेले ही भोजन किया. नन्हा फ्लाइट में है, रात को साढ़े बारह बजे तक आएगा. सोनू भी ग्यारह बजे तक आएगी. आज पिताजी से बात नहीं हुई. वह बंगलूरू जाने के लिए तैयार हैं. उनका नया घर जब तैयार हो जायेगा, वह वहाँ जायेंगे.

कल दिन में फिर कुछ नहीं लिखा, रात नींद नहीं आ रही थी. सुमिरन करने लगी फिर पता ही नहीं चला, कब नींद आ गयी. स्वप्न देखा जिसमें मन परेशान हुआ तो झट स्मृति आ गयी, यह स्वप्न है. किसी ने कहा, 'अब वह नहीं भटकेगी'. स्वप्न में भी संदेश सुन सकी. जो जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा समाधि का आधार है, उसे वे भुला देते हैं. जो उनको राह दिखाने वाला है, पथ प्रदर्शक है. जून कल वापस आ रहे हैं. उन्होंने ढेर सारे काम निपटाए आज. नये घर के लिए कितने ही जॉब शेष थे. वह आज आँख के अस्पताल भी गये थे, उनकी दूसरी आँख के आपरेशन के लिए भी डाक्टर ने कह दिया है. आज उनके दफ्तर का ड्राइवर घर आकर गाड़ी धोने के लिए कहने लगा, फिर धोयी, खुली जगह और खुला पानी देखकर उसे अच्छा लगता होगा. शाम को नैनी ने कहा उसका राशिफल पढ़कर सुनाये. उसकी राशि मीन है. वह उदास थी. उसके माता-पिता भी नहीं हैं, इस बात को लेकर आँसूं भी बहाये. मानव का मन कितना नाजुक होता है, एक फूल से भी कोमल. उसे समझाया पर इस दुःख का इलाज तो खुद ही ढूँढना होता है. थोड़ी ही देर में वह सामान्य भी हो गयी. बगीचे से फूल गोभी, शलजम, पत्ता गोभी, लाइ साग आदि लाकर दिए. काफ़ी दिनों से सब्जी नहीं लाये हैं वे बाजार से, काम चल ही रहा है. उसकी सास ने सहजन के फूल भी लाकर दिए, उसके दायें हाथ का अगूँठा कितना सूजा हुआ था. अपने छोटे-मोटे दर्द को ये लोग सहते ही रहते हैं. पिताजी से बात हुई आज. छोटी भाभी ने पकौड़े बनाये थे शाम को, आलू के पकौड़े. पिछले दिनों से अक्सर उसे भिन्न-भिन्न तरह की गंधों का अनुभव होता रहा है. हलवा बनने की गंध, मीठी सी गंध, कभी घी की गंध, कभी विचित्र सी गंध. कल-परसों से मुख का स्वाद भी कुछ अलग सा है. जीवन एक रहस्य है और वह रहस्य गहराता ही जा रहा है. आज सुबह भी प्रातः भ्रमण से वापस आकर कुछ शब्द लिखे, जिन्हें दोपहर को ब्लॉग में लिखा. परमात्मा कितना सृजन शील है, इसलिए ही उसे कवि कहते हैं. आज योग कक्षा में उपस्थिति ज्यादा थी. शिव के नाम का जप किया और उनके 'चन्द्रशेखर' नाम पर चिन्तन भी.

Friday, July 12, 2019

वीरवार की पूजा



शाम के पांच बजने वाले हैं. ''जब वे अपने आप से भी बात करना बंद कर देते हैं तब वास्तविक मौन होता है, ऐसा संत कह रहे हैं. मन पर काम करने का पहला उपाय है अपने आप से बातें करना बंद करना, दूसरा उपाय है दृश्य से हटकर द्रष्टा में टिक जाना. मन में जब विचार आते हैं तब शब्दों के वस्त्र पहन कर ही आते हैं, शब्दों के बिना वे कोई चिन्तन नहीं कर सकते, शब्द निर्माण होते ही मन निर्माण हो जाता है. मन ही दृश्य है, इसे देखने वाला साक्षी जब अपने आप में ठहर जाता है, तो विचार बंद हो जाते हैं. आगे उन्होंने कहा, जगत के विषयों का प्रभाव इन्द्रियों पर नहीं पड़ता. जैसे  शब्द होने या न होने से कानों को कोई लाभ या हानि नहीं होती. इसी तरह इन्द्रियों का प्रभाव मन पर नहीं पड़ता और मन का प्रभाव साक्षी पर नहीं पड़ता. साक्षी सदा अलिप्त रहता है. आत्मा भी अलिप्त है, जिसका संसार से कोई भी संबंध नहीं है. परछाई जैसे दिखती है, उसकी अपनी कोई सत्ता होती नहीं, संबंध भी ऐसे ही होते हैं, जो दीखते तो हैं होते नहीं. कुछ देर पहले जून से बात हुई, आज उनका प्रेजेंटेशन था, ठीक हो गया. कल भी जाना है, वह कह रहे थे कि एक दिन के लिए घर हो आयें, पर उसने मना कर दिया, जिस कार्य के लिए गये हैं, उसे ही पूरा करना ज्यादा ठीक होगा. दोपहर की योग कक्षा में पांच महिलाओं के अलावा बच्चे भी थे, शाम की कक्षा में पता नहीं कौन-कौन आएगा ? आज भी एक कविता लिखी, संगीत सुनते हुए मन में सहज ही कुछ पंक्तियाँ आ रही थीं. सुबह गाँधी जी के चित्र सहित उनके कुछ विचार पोस्ट किये फेसबुक पर, आज उनकी पुण्यतिथि है. सुबह ओशो को सुना, ताओ पर उनका प्रवचन अद्भुत है.

आज सुना, नींद में देहात्म भाव खो जाता है. स्वप्न में कुछ-कुछ बना रहता है और जागृत अवस्था में पूर्ण रूप से बना रहता है. देहात्म भाव से मुक्त होना है और जीव भाव से भी मुक्त होना है. स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर दोनों से परे जाना है. ध्यान में साधक को कुछ नहीं होना है, जब वे कुछ भी नहीं हैं, उन्हें कुछ भी सिद्ध नहीं करना होता. जब वे स्वयं को कुछ भी देखते हैं, उसी के अनुरूप उन्हें कर्त्तव्य कर्म करने होते हैं. मन वृत्तियों को जगाता है. मन के दो मुख्य कार्य हैं, पहला- देह में होने वाली क्रियाओं को करना तथा दूसरा- देह का आकार ले लेना. जो मन सभी के लिए समान है वह पहला कार्य करता है तथा दूसरे कार्य में व्यक्ति स्वयं को अन्यों से पृथक समझने लगता है. यदि हाथ में कोई वस्तु हो और कोई उसी हाथ से लिखने का प्रयास करे तो लेख अच्छा नहीं होगा. इसी तरह मन जिस देह को धारण करता है, उसी के विषय में विचार करता है, जब देह भाव से मुक्त हो जाता है, तब विचारों से भी मुक्त हो जाता है. इस समय पौने दस बजे हैं रात्रि के. कल जून आ रहे हैं. क्लब में 'पद्मावत' दिखाई जाएगी. गुरूवार का सत्संग वे दोपहर को ही करेंगे. कर्ता भाव से मुक्त होने पर कोई कर्म करना ही है, ऐसा भाव नहीं रहता, जो होता है वही संतुष्टि देता है.

आज फरवरी का प्रथम दिन है. सुबह नींद खुली तो सदा की तरह मन में चिन्तन आरम्भ हो गया. आज का चिन्तन बिलकुल अलग था, लगा जैसे हृदय से कुछ बाहर निकला और सभी कुछ तोड़ता हुआ पूरे विश्व में फ़ैल गया. खुदी को जैसे खुदा का ठिकाना मिल गया. कितने ही सत्य प्रकट होने लगे, जो इतनी बार शास्त्रों में पढ़े थे. सद्गुरु कहते हैं, आत्मा, परमात्मा और गुरू में कोई भेद नहीं है, तीनों एक ही सत्ता से बने हैं. एक ब्रह्म ही विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ है. देवी-देवता भी उसी की शक्तियाँ हैं. जीव-जगत के सारे प्राणी भी उसी की शक्ति से प्रकट हुए हैं. देह को आधार देती है आत्मा और आत्मा की गहराई में छिपा है परमात्मा. जिस तरह एक ही व्यक्ति विभिन्न भूमिकाएं निभाता है वैसे ही एक ही चेतना जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्था को आधार देती है. जीवन उस आधार भूत सत्ता पर ही टिका है. आज स्वयं ही श्वेत वस्त्र पहनने का मन हुआ तथा प्रार्थना भी भीतर स्वयं घटी, पूजा भी स्वयं घटी. गुरूजी कहते हैं, पूर्णता से ही पूजा प्रकट होती है. देवता का स्मरण भी हो आया. बचपन में बड़ी बुआ को वीरवार को पूजा करते देखा करती थी, उसमें की गयी प्रार्थना वर्षों से नहीं सुनी थी. आज मन पंजाबी की उस प्रार्थना को अपने-आप ही गाने लगा. परमात्मा की कृपा निरंतर बरस रही है.


Monday, July 8, 2019

मानव श्रृंखला



कल गणतन्त्र दिवस का अवकाश था, लिखने का भी अवकाश हो गया. सुबह समय से उठे वे, आठ बजे नेहरू मैदान में ध्वजारोहण के लिए गये. दस बजे के बाद लौटे, विभिन्न स्थानीय स्कूलों के बच्चों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया. वापस आकर घर में झंडा लगाया, सर्वेंट लाइन से बच्चे व उनकी माएं, कुछ के पिता भी आ गये थे. सबको लड्डू बांटे, जो ड्राइवर पहले ही आर्डर करके ले आता है. उसके बाद टीवी पर परेड देखी. दोपहर का भोजन उच्च अधिकारी के यहाँ था, जहाँ हर वर्ष की तरह काफी लोग आये थे. दोपहर बाद उस सखी के यहाँ गये जिनकी माँ अकेले रह रही हैं. देशभक्ति के गीत सुनते-सुनते गौरव का भाव दिन भर भीतर सहज ही बना रहा. रात्रि को वर्षा और गर्जन-तर्जन के कारण एक बार नींद खुल गयी, फिर आई तो स्वप्नों की दुनिया में ले गयी. चाचीजी को देखा, छोटी ननद व ननदोई को, फिर सोनू को भी. सूक्ष्म शरीर कितनी देहें धर लेता है स्वप्नों में. आज इस समय धूप खिली है. दोपहर बाद तिनसुकिया जाना है. नन्हा व सोनू दीदी के यहाँ गये हैं, उनसे बात हुई, वे कल समय पर पहुँच गये थे. लखनऊ में भी उन्हें कुछ समय मिल गया, इमामबाड़ा आदि देखा. मौसेरे भाई की कार ठीक कराकर उसी में वह नाना जी से मिलने जा रहे हैं. वापस आकर बुआ दादी से मिलेगा. उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. वृद्धावस्था का असर ही होगा, जीवन जब लक्ष्यहीन नजर आता है, मनुष्य विवश हो जाता है. जून आज देर से आने वाले हैं. उन्हें डेंटिस्ट के पास जाना है.

आज माह का अंतिम रविवार है यानि 'मन की बात' वाला इतवार. नये वर्ष की पहली 'मन की बात'. मोदी जी महिलाओं के योगदान की सराहना कर रहे हैं. दहेज व बाल विवाह जैसी कुरीतियों को दूर करने के लिए तेरह हजार किमी लम्बी मानव श्रंखला का जिक्र भी उन्होंने किया, आत्म सुधार करने का प्रयास करना भारतीय समाज की विशेषता रही है. जन औषधि का जिक्र किया जिससे आम  आदमी का खर्च कम हो रहा है. वह कह रहे हैं और यह सराहनीय कदम है कि पद्म भूषण आदि पुरस्कार के लिए व्यक्ति अब सामान्य लोगों के मध्य से चुने जाते हैं. अब दोपहर के साढ़े बारह बज चुके हैं. बगीचे में काम चल रहा है. जून ने इतवार का विशेष लंच बना दिया है. बादलों को धकेलकर धूप खिल गयी है और मोदी जी के भाषण के बाद जनता की सराहना के शब्द भी सुनाये जा चुके हैं. उनके जैसा नेता हजारों वर्षों में कभी-कभार ही पैदा होता है. भारत ही नहीं पूरे विश्व के नेतृत्व की क्षमता है उनमें. परमात्मा की शक्ति से जुड़कर ही वह यह महती कार्य कर पा रहे हैं. उसने आज सुबह से कोई विशेष कार्य नहीं किया है, गुरूजी को सुना, ध्यान-साधना की, परमात्मा को सुमिरन किया, ये सारे सामान्य कार्य ही हैं जिन्हें करना उतना ही जरूरी है जितना श्वास लेना. फोन पर बातचीत की, संदेशों का आदान-प्रदान किया. अभी दोपहर को बच्चों को कुछ समय देना है. शाम को अध्ययन करना है. जून कल देहली जा रहे हैं, उन्हें पैकिंग में मदद करनी है और मन को साक्षी भाव में रखना है.

शाम हो गयी है. अगले दो दिन उसे अकेले रहना है. कुछ देर पहले योग कक्षा समाप्त हुई. उससे पहले 'बीटिंग रिट्रीट' देखा, परेड की वापसी की यह सुंदर प्रथा हर वर्ष गणतन्त्र दिवस के दो दिन बाद मनाई जाती है. सुबह स्कूल गयी थी, इस वर्ष बच्चों को पहली बार योग कराया. सुबह वे टहलने गये तो तापमान १२ डिग्री था, अब इतनी ठंड में आराम से वे भ्रमण के लिए जाते हैं, कुछ वर्ष पूर्व ऐसा नहीं कर पाते थे. ढेर सारे वस्त्र पहनने पड़ते थे, योग से सहन शक्ति का विकास होता है. उसे आज तीन वर्ष पूर्व आज के दिन एक सखी द्वारा पनीर की सब्जी भिजवाये जाने की बात याद आ रही है, उस समय उनके संबंध अच्छे थे, फिर समय ने करवट ली और अब वह ही कभी-कभार फोन पर हाल-चाल ले लेती है, उन्होंने दूरियां बना ली हैं. लेकिन मन अब इन बातों को उतना ही सामान्य मानता है, जितना तब मानता था जब सब कुछ ठीक था. जीवन इसी धूप-छाँव का ही तो नाम है.



Friday, July 5, 2019

काला जोहा



आज उसने काले चावल बनाये हैं, 'काला जोहा' जो आसाम में ही उगाया जाता है. बनने के बाद भी बिलकुल काले होते हैं. उन्हें पकने में ज्यादा समय लगता है. एक सखी अपनी बिटिया को लेकर लगभग दस-बारह दिनों के लिए बाहर गयी है, उसकी माँ और भाई यहाँ अकेले थे, वह उनके लिए अक्सर दोपहर को एक सब्जी बनाकर भेज देती है. शेष भोजन वे बना लेते हैं. बगीचे में फूल गोभी हुई है, आज पहली बार बनाई है, उन्हें अवश्य पसंद आएगी. उससे पहले ध्यान किया पर मन सात्विक भावदशा में नहीं था. शायद शरीर पूरी तरह से शुद्ध नहीं था या कल रात्रि को नींद पूरी न होने के कारण मन एकाग्र नहीं हो पा रहा था. कल सरस्वती पूजा के कारण शोर बहुत देर तक आ रहा था, यहाँ आजकल पूजा के नाम पर देर रात तक तेज आवाज में संगीत बजाने का अधिकार मिल जाता है. रात को एक बार नींद खुली, कुछ देर ध्यान के लिए बैठी, फिर नींद आयी पर स्वप्न चलने लगे. एक बार लगा, नींद में कुछ शब्द उसके मुख से निकले हैं, और जून पूछ रहे हैं, क्या हुआ ? उस समय लगा था, सचमुच उसी क्षण की बात है. वह आँख बंद किये रही, कुछ जवाब नहीं दिया. कुछ देर बाद लगा कि उसके कंधों में दर्द है पर उसके कहने के बावजूद भी जून सुन नहीं रहे हैं. अचानक स्वप्न टूटा और सारा दर्द गायब हो गया. स्वप्न में दर्द कितना तीव्र था. वे स्वयं ही अपने दर्द के निर्माता हैं. मोह और आसक्ति का त्याग करना होगा. जब स्थूल के प्रति मोह नहीं  त्यागा जा रहा है तो संबंध तो अति सूक्ष्म हैं, कितना सूक्ष्म मोह होगा उनके प्रति. शारीरिक अशुद्धि के कारण ही स्वप्न भी आते हैं. इसीलिए शौच का इतना महत्व है योग में. वे ही अपने भाग्य के निर्माता हैं और हन्ता भी..
आज सुबह अवधेशानंद जी ने एक अच्छा शेर सुनाया-
"वह खुद को बेहतर में शुमार करता है
अजीब है, कितना खुद का शिकार करता है"

अपने ही दुश्मन वे स्वयं बन जाते हैं. अनुभवानंद जी ने कहा कि बाल ही बालक है, नर ही नरक है, नर जब तक देहात्म भाव में है, नर्क में ही है. कामना जब तक है तब तक नर्क में ही हैं वे. अनाहत चक्र से अध्यात्म की यात्रा आरम्भ होती है. उन्हें कितना अच्छा अवसर मिला है कि मानव देह मिली है. सुख-सुविधा मिली है और गुरू का ज्ञान मिला है. श्री श्री कहते हैं, "ध्यान या योग ठहरना सिखाता है, भोग दौड़ना सिखाता है."

कल रात नींद अच्छी आयी. सुबह समय पर उठे वे, इक्का-दुक्का तारे नजर आ रहे थे आसमान पर जो ज्यादातर बादलों से ढका था. इस समय धूप खिली है पर उसमें तेजी नहीं है. गले में हल्की खराश सी लग रही है, देह को स्वस्थ रखने का कितना भी प्रयास करो, कुछ न कुछ लगा ही रहता है. आत्मा निर्लेप है, निरंजन, निर्विकार..कल शाम योग कक्षा में आत्मा के बारे में बताया. 'अष्टावक्र गीता' सुनी, गुरूजी कितने सुंदर ढंग से श्लोकों का अर्थ बता रहे हैं. आज एक राजयोगी के मुख से सुना, दिन में आठ घंटे परमात्मा के साथ योग लगाना चाहिए, सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं, शक्ति प्राप्त होती है और ज्ञान में सहज गति होती है. संत तो आठ घंटे क्या चाबीसों घंटे योग में ही स्थित रहते हैं. आज शाम को क्लब में मीटिंग है.

आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है, उसके लिए  कविता रिकार्ड की, भेजी. माली को आलस्य त्याग कर कुछ श्रम करने को कहा, समझाया, उसे किताब दी. 'तू गुलाब होकर महक'. बाबाजी की लिखी किताब. एक नोटबुक तथा एक पेन भी. शायद उसकी बुद्धि में कुछ बात बैठ जाये. आज के ध्यान का समय इसी सेवा में बीत गया. उसकी पत्नी अपने पुत्र को स्कूल ले गयी थी कल. उसने दाखिले के लिए पैसे मांगे हैं, अगले महीने का एडवांस. वह अस्वस्थ है और दुखी भी, पति यदि नाकारा हो तो पत्नी के पास आँसू ही बचते हैं. आज वर्षा के कारण ठंड बढ़ गयी है. रात से ही झड़ी लगी है, पर आश्चर्य प्रातः भ्रमण के समय रुकी हुई थी.

Wednesday, July 3, 2019

नारियल का वृक्ष



आज सफाई कर्मचारी नहीं आया, नैनी को भी अपना काम खत्म कर बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना था, सफाई का काम अधूरा ही पड़ा है. कुछ वर्ष पहले यदि ऐसा हुआ होता तो वह झुंझला जाती फिर खुद ही करने में जुट जाती पर अब मन में एक ख्याल भर आया, उम्मीद पर दुनिया टिकी है, हो ही जायेगा सब जून के आने से पहले. अभी पौन घंटा शेष है न. आज धूप अच्छी निकली है, ठंड पहले से कम है फिर भी काफ़ी है, क्योंकि इनर पहनने के बाद भी स्वेटर तो पहनना ही पड़ा है. आज सुबह आचार्य प्रद्युम्न का प्रवचन सुना. सगुण ईश्वर व निर्गुण ब्रह्म का भेद स्पष्ट हुआ. जीव माया के अधीन है और माया ईश्वर के अधीन है. सतोगुण बढ़ने पर जीव माया के पार जा सकता है और ईश्वर की भक्ति करने से भी. मन को दूषित करते हैं रजोगुण तथा तमोगुण. सतोगुण आत्मा को हल्का बनाता है. समाधि की अवस्था में तमोगुण घटता है, संस्कार मिटते हैं तथा आत्मा को नई ऊर्जा मिलती है.

सुबह टहलने गये तो ठंड अधिक नहीं थी. सूरज का लाल गोला उनके साथ साथ चल रहा था. मौसम अब बदल रहा था. आज बहुत दिनों बाद उसने दोपहर के भोजन में इडली बनाई है. माली ने बगीचे से नारियल लाकर दिया था, उसकी चटनी बनाई. सुबह क्लब की सेक्रेटरी के साथ जाना था, एक पुराने कमरे को देखने जो भविष्य में क्लब का दफ्तर बन सकता है. हालत अच्छी नहीं है, काफ़ी काम करवाना होगा. स्कूल का पुराना फर्नीचर भी एक बड़े हॉल में रखवा दिया गया है, उसने सुझाव दिया, इसे दान कर देना चाहिए. कितने ही पुराने ब्लैक बोर्ड भी थे. आजकल वह योग दर्शन में 'समाधि पाद' के श्लोकों का भाष्य सुन रही है. संस्कार के रूप में ज्ञान उनके भीतर रहता है, जो वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है. क्लिष्ट व अक्लिष्ट दोनों तरह की वृत्तियाँ भीतर हैं तथा दोनों से संस्कार भी बनते हैं. वे संस्कार फिर वृत्तियों को जन्म देते हैं. हर वृत्ति एक संस्कार को छोड़ जाती है, चित्त में वृत्ति-संस्कार चक्र अनवरत चलता रहता है. ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी क्लिष्ट वृत्तियाँ उठ सकती हैं पर उनमें उतनी तेजी नहीं रहती. जब चित्त शांत हो जाता है तब क्लिष्ट वृत्तियाँ नहीं उठतीं.

पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. कारण सोचे तो कुछ भी नहीं है. स्मरण ही नहीं रहा. आज इस समय शाम के सात बजे हैं. अभी-अभी 'अष्टावक्र गीता' पर गुरूजी की व्याख्या सुनी, जिसमें भिन्न-भिन्न आसक्तियों की चर्चा गुरूजी कर रहे थे. जून भी सुन रहे हैं आजकल. उन्हें तरह-तरह के व्यंजन बनाना पसंद है, क्या यह भोजन के प्रति आसक्ति कही जाएगी ? आज दोपहर को बच्चों के साथ 'सरस्वती पूजा' का उत्सव मनाया. जून सुबह वाग्देवी की एक तस्वीर प्रिंट करके लाये थे, घर में फ्रेम मिल गया जो नन्हे को उपहार में मिला था. काले चनों और नारियल का प्रसाद बांटा. दो दिन पहले धोबी ने अपने हाथ से लगाये नारियल के पेड़ से नारियल लाकर दिया था. बच्चों ने तस्वीर देखकर अपने हाथों से उसकी अनुकृति बनाई. आज माली ने गमलों में फूलों के पौधे लगाये. फ्लॉक्स और डायंथस अब खिलने लगे हैं. फरवरी के अंत तक बगीचा फूलों से भर जायेगा. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बहुत लोग आये थे. पिछले वर्ष लगे एक कैम्प में सौ परिवारों का चयन किया गया था, जिन्हें सरकार की तरफ से दिव्यांग बच्चों एक लिए किट बांटे गये. स्थानीय एम एल ए महोदय भी आये थे. कल वहाँ भी सरस्वती पूजा है, उसने लड्डू मंगाए हैं कल लेकर जाएगी.   

Friday, June 28, 2019

मेजी की आग



रात्रि के पौने आठ बजे हैं. रात्रि भोजन हो चुका है. कल गायत्री समूह की सदस्याएं 'सत्संग पिकनिक' का आयोजन कर रही हैं. उनके लॉन में ही सब मिलेंगे. सभी अपने घर से कोई पकवान बना कर लायेंगी. भजन, नृत्य, 'सूर्य ध्यान' के बाद भोजन, फिर वे मिलकर नन्हे के विवाह की व अन्य तस्वीरें देखेंगे. हाँ, पहले फूलों को निहारने रोज गार्डन भी जायेंगे. आज सुबह वे टहलने गये तो देखा, बच्चों के पुराने स्कूल का कुछ भाग गिरा दिया गया है. नये स्कूल का मुख्य द्वार अब स्पष्ट दिखाई देता है. शाम को स्कूल की मीटिंग में गयी. क्लब की प्रेसिडेंट काफ़ी बदलाव ला रही हैं. कुछ पुराने लोग जा रहे हैं, नये आ रहे हैं. स्कूल का भविष्य अच्छा नजर आ रहा है. सुबह उसकी एक पुरानी हिंदी की छात्रा अपनी माँ के साथ मिलने आई. कोहिमा स्थित अपने गाँव के चावल लायी थी  और स्थानीय कला का एक लकड़ी का कटोरा. उसने भी उसे एक उपहार दिया. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अनुभव आज शाम को योग साधना के दौरान हुआ और सुबह ध्यान में भी. परमात्मा उनके कितने करीब है, उन्हें उसकी प्रतीति करनी है प्राप्ति नहीं, वह तो सदा ही सब जगह है !  

आज का दिन स्मृति पटल पर एक सुखद अनुभव बनकर अंकित हो गया है. उन्होंने ढेर सारी तस्वीरें उतारीं. भजन गाए, ध्यान किया, कई खेल खेले. सभी लोग आये और स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ लाये. उसने विवाह की तस्वीरें दिखाईं तथा वह कविता भी सुनाई जो नन्हे के विवाह के अवसर पर पढ़ी थी. पिताजी से बात की, धूप में बैठे थे. अब उनका स्वास्थ्य ठीक है पहले की अपेक्षा. आज गुरूजी को सुना, 'भक्ति सूत्रों' पर उनकी व्याख्या पहले भी सुनी है. वह बहुत सरल भाषा में बोलते हैं, अध्यात्म को बिलकुल सहज बना दिया है उन्होंने. जून की फरमाइश पर मूड़ी के लड्डू बनाये आज. कल लोहरी है.

आज पूरे उत्तर भारत में लोहरी का उत्सव मनाया जा रहा है. नये वर्ष का प्रथम उत्सव ! उन्होंने भी अग्नि जलाई, एक मित्र परिवार आया था. मूंगफली, फुल्ले, लड्डू, गजक खाने खिलाने का दिन. कल मकर संक्रांति है, यानि पतंग उड़ाने का दिन. कल इतवार है और परसों जून का अवकाश है, वे डिब्रूगढ़ का जगन्ननाथ मंदिर देखने जायेंगे तथा मन्दिर के निकट स्थित पार्क में भी. आज दोपहर को तिनसुकिया गये थे. सुबह नींद खुली पर दस मिनट तक उठने का मन नहीं हुआ, उस समय मन कितना शांत होता है. जब देह बिलकुल निस्पंद होती है, मन भी रुक जाता है. दोपहर को योग दर्शन पुनः पढ़ना आरम्भ किया. चित्त की अवस्थाओं का वर्णन पढ़ा आज.   

आज सुबह टहलने गये तो हर तरफ धुआं था, कोहरा और धुआं मिलकर धुंधलका फैला रहे थे. क्लब में सुबह मेजी जलाई गयी थी, आवाजें आ रही थीं. इस समय शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वे भ्रमण पथ पर टहल कर आये हैं. उससे पूर्व गमले से तोड़े एलोवेरा का जूस बनाया लौकी और आंवले के साथ. आधा घंटा बैडमिंटन खेला. नन्हा आज नये घर गया है. दो वर्ष बाद जनवरी तक तो वे वहाँ रह रहे होंगे, यानि बस एक और लोहरी उन्हें असम में मनानी है.  

Wednesday, June 26, 2019

स्पीकिंग ट्री



सुबह के ग्यारह बजने वाले हैं. अभी-अभी पिताजी से बात की, उन्होंने यू-ट्यूब पर बच्चों की कोई फिल्म देखी. स्मार्ट फोन का जादू चल गया लगता है, अब वह व्हाट्स एप भी इस्तेमाल करना सीख गये हैं. सुबह क्लब की एक सदस्या से मिल कर आयी. उन्होंने अपने अभिनय के शौक के बारे में बताया. कह रही थीं, स्टेज की बजाय रिहर्सल के दौरान उन्हें अधिक आनंद आता है. शेष दोनों महिलाओं से फोन पर बात हुई, आज सबके लिए लिखेगी. कल शाम की परांठा पार्टी अच्छी रही. एक सखी की माँ आई हुईं थी, परिवार सहित बुलाया, जून के मित्र भी आये. दोपहर को सब क्लब गये थे, वार्षिक उत्सव था क्लब का आज. साज-सज्जा अच्छी थी. पिछले दिनों मन में जो उहापोह चल रहा था, व्यर्थ था. उनकी कल्पना और स्मृति में डोलने की आदत ही ऊर्जा के सर्वाधिक क्षय का कारण है. जीवन को जैसा वह है वैसा ही स्वीकारने की कला आ जाये तो मन निर्भार रह सकता है. आज अमेजन से मंगवाए 'वाकिंग शू' भी आ गये हैं, सी ग्रीन रंग के बेहद हल्के जूते हैं.

अभी हाथों में जुम्बिश है, अभी कदमों में राहे हैं
अभी है हौसला दिल में, मंजिल पर निगाहें हैं

अभी ग्यारह बजने में आधा घंटा है, हाथ में कलम है, सामने खुला हरा-भरा लॉन और खिली हुई धूप..पेड़ों के पत्तों की सरसराहट, चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है. हल्की सी ठंडक भी है, हवा जब छूती है तब ज्ञात होती है. पिताजी से बात की सुबह साढ़े आठ बजे. वह हिंदी के अख़बार से 'ऊर्जा' तथा अंग्रेजी के अख़बार से 'स्पीकिंग ट्री' नोट कर रहे थे. आज का विषय था करुणा, करुणा और प्रेम का अंतर बताया उन्होंने, फिर कहा, ये तो बड़ी-बड़ी बातें हैं, जन्मों लग जाते हैं इनका पालन करने में. विनम्र आत्मा की यही पहचान है, पर उसे उस वक्त जो सही लगा कह दिया, यदि कोई पूरे दिल से इन्हें स्वीकारता है तो वह उस क्षण उस भाव में स्थित ही माना जायेगा. आत्मा जिस क्षण अपने मूल स्वभाव में टिक जाती है, उतनी देर तो वह परमात्मा के साथ एक होती है. साधना का तो कोई अंत नहीं क्योंकि परमात्मा अनंत है. सुबह टहलने गये तो इक्का-दुक्का लोग ही दिखे. वापसी में ऊपर लिखी पंक्तियाँ मन में गूँज उठीं, दोपहर को इसे पूर्ण करेगी. इस वर्ष की पहली कविता होगी यह. कल शाम क्रिया के बाद गले में खराश हुई, रात को नींद भी खुल गयी थी, पहले किसी ड्रामे का शोर आ रहा था, बाद में एक स्वप्न देखकर खुली, जिसमें मिठाइयाँ हैं ढेर सारी, मन भोजन के प्रति कितना आसक्त है, यह इस स्वप्न से ही ज्ञात होता है. साधक को तो किसी भी  वस्तु के प्रति आसक्त नहीं रहना है. रात्रि को सोने से पूर्व का ध्यान पुनः आरम्भ करना होगा, ध्यान यानि अपने स्वरूप में टिकना, अपने भीतर उस मौन का अनुभव करना जो आनंददायक है, तृप्तिदायक है.

सिस्टर निवेदिता



ठंड बढ़ गयी है. आज पहली बार इन सर्दियों में धूप में बैठकर लिख रही है. बाहर निकली तो एक बगुला बैठा था, हल्की सी आहट से ही उड़ गया, कितना संवेदनशील रहा होगा. सुबह उठे तो कोहरा बहुत घना था, तापमान बारह डिग्री था. लेकिन उसी ठंड में वे टहलने गये, आकाश पर तारे थे और सब कुछ शांत था. आज जून को लंच पर घर नहीं आना है, इसलिए किचन बंद है. कल शाम का भोजन भी फ्रिज में पड़ा है. जब भूख ज्यादा सताएगी तभी कुछ खाएगी. पिछले दिनों स्वप्न में खाने-पीने की वस्तुएं देखीं. मन भोजन के प्रति कितना आसक्त रहता है, जब तक देह भाव बना हुआ है भोजन के बिना वे रह सकते हैं, यह विचार भी नहीं आ सकता. वे भूख के बिना भी खाते हैं, केवल स्वाद के लिए भी खाते हैं. चाय से अम्लता होती है, इसका अनुभव होने के बाद भी उसके प्रति मोह बना ही हुआ है. कितने ही साधु-संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने क्षुधा पर विजय पायी है. मन निर्विकल्प स्थिति में रहे इसका निर्णय भी अडिग नहीं रहता. पुरानी स्मृतियाँ कब मन को घेर लेती हैं, ज्ञात ही नहीं होता, स्मरण आते ही मन वर्तमान में आ जाता है पर इतनी देर ऊर्जा का व्यर्थ ही अपव्यय होता है. नैनी के बच्चे आंवला चुनने आए हैं, जो घास पर गिरे ही रहते हैं. कल शाम की मीटिंग ठीक थी, अध्यक्षा का भाषण हमेशा की तरह बहुत लम्बा था. अगले हफ्ते वह उन तीन महिलाओं से मिलेगी जिनका विदाई समारोह होना है, सभी के लिए कुछ लिखेगी. मृणाल ज्योति की पत्रिका पढ़ी, और वार्षिक रिपोर्ट भी, आज मीटिंग है, अब शायद कुछ ही समय और वह उनके साथ काम कर पाएगी. सुबह एक सखी को व्हाट्स एप पर संदेश भेजा, उसने कोई इमोजी भेजा जो उसके फोन पर खुल ही नहीं पाया. मन में विचार उठा पता नहीं क्या भेजा है.यही तो माया है, महामाया की उपासना करने से माया के पार जाया जा सकता है.

कुछ देर पहले ठंड थी, कोहरा था और अब सूरज निकल आया है, धूप कितनी भली लग रही है. आज हवा भी चल रही है. सुबह पूजा के बाद जल डालने आई तो सूर्य देव बादलों के पीछे छिपे थे, देखते ही देखते प्रकाश झलकने लगा, एक ही चेतन सत्ता से यह सारा जगत बना है, गुरूजी का यह वाक्य स्मरण हो आया. उनके भीतर जो तत्व है वही सूरज की गहराई में में है, उस तक संदेश पहुँच जाता होगा तत्क्षण ! आज शनिवार है, कल रात सोने में कुछ देर हुई, जून के बहुत पुराने मित्र भोजन के लिए आए थे, लग रहा था पहले के दिन लौट आए हैं. इधर-उधर की बातें भी ज्यादा हुईं. अख़बारों की सुर्खियाँ, राजनीति, कम्पनी की नई नीतियाँ, देश का वातावरण आजकल मिश्रित है.. देश जैसे बंट रहा है, गणतन्त्र में ऐसा होता ही है, सबको अपनी बात कहने का अधिकार है आदि आदि.  क्लब से किसी कार्यक्रम में गाने की आवाजें भी आ रही थीं. सुबह उठने में कुछ देर हुई. आज नये वर्ष का छठा दिन है. पिताजी से बात हुई. उन्होंने अपनी उम्र के कारण होने वाली तकलीफों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेने की बात कही. आत्मा का अल्प मात्र भी अनुभव हुए बिना कोई ऐसा कह नहीं सकता, अपने भीतर शक्ति और शांति के उस अमृत स्तम्भ को पाकर ही कोई निर्भार हो सकता है.

अब दोपहर हो गयी है. धूप में वे अब भी बैठे हैं. लॉन के कोने में, शायद एक दो घंटे और रहेगी धूप. आज लंच में कर्ड-राईस बनाये थे. शाम के लिए बगीचे से मेथी व हरे प्याज के पत्ते तोड़े हैं मकई के आटे में मिलाने के लिए. इस माह गुरूजी के जीवन पर लिखी उनकी छोटे बहन भानु दीदी की पुस्तक प्रकाशित हो रही है. जून ने आज ही आर्डर कर दी है. इंटरनेट पर बनी मित्र वाणी जी की कविता पर अपने विचार अभी तक नहीं लिखे हैं, उन्हें इंतजार होगा, समय कितनी शीघ्रता से गुजर जाता है, वे वहीं खड़े रह जाते हैं. योग सीखने आने वाली एक सखी ने सिस्टर निवेदिता द्वारा लिखी एक पुस्तक उपहार स्वरूप दी है. स्वामी विवेकानन्द के भीतर जगत के कल्याण की कितनी तीव्र पिपासा उनके गुरू ने जगाई थी. जैसे उनके गुरूजी सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उनके कर्म सहज हों, निस्वार्थ हों और कतृत्व अभिमान न हो. मनसा सेवा तो हर क्षण की जा सकती है. जब भी उनके मन अस्तित्त्व के साथ एक हो जाते हैं, वे प्रेम ही तो बहने देते हैं स्वयं के माध्यम से !

Tuesday, June 25, 2019

नया कैलेंडर



आज जून ने यह डायरी भेजी है. इस बार की कम्पनी की डायरी पहले मिल गयी थी, सलेटी रंग की, सुंदर है, पर लिखने का स्थान कम था, एक ही पेज में दो तिथियाँ. अब एक वर्ष बाद अंतिम डायरी मिलेगी कम्पनी की. अगले वर्ष अगस्त में उन्हें विदाई दे दी जाएगी. असम में अब दो वर्ष से भी कम समय रह गया है. इस समय का सदुपयोग करना है, सेवा, सत्संग और साधना के द्वारा. रात्रि के पौने आठ बजे हैं. जनवरी का महीना वैसे ही इतना ठंडा होता है, ऊपर से झीनी-झीनी वर्षा भी हो रही है. सुबह से ही बादल बने थे. दोपहर को बूंदा बांदी हुई, जब सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखा रही थी. एक ने कहा, उनकी माँ ने भी कभी इस तरह नहीं समझाया जैसे वह उन्हें लड़ाई-झगड़े से दूर रहने के लिए कहती है. उसने सोचा, माँ को भी किसी ने नहीं समझाया होगा शायद. सुबह सेक्रेटरी ने उसका नाम क्लब के प्रोजेक्ट स्कूल की कमेटी में सम्मिलित कर दिया. प्रेसिडेंट ने दस बजे मीटिंग के लिए बुलाया, पर स्वयं सवा दस बजे आयीं. भारतीय समय में इतनी देरी को सामान्य मान लिया जाता है, पर उस कारण वापसी में देर हुई. दोपहर को एक वरिष्ठ सदस्या के यहाँ जाना था, उनकी बहन का दामाद अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री है, जो परिवार सहित असम आया हुआ है. डेढ़ घंटा वहाँ बिताया. वर्षों पूर्व जब वे नासा गये थे, उनके घर भी गये थे, उसने ही उन्हें घुमाया था. शाम को गायत्री समूह की महिलाओं के साथ नियमित योग की साधना, यानि सारा दिन कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. झींगुर की आवाज आ रही है और कमरे में इतना सन्नाटा है कि घड़ी की टिक-टिक भी स्पष्ट सुनाई दे रही है. पिताजी ने आज स्मार्ट फोन छोटी भाभी को वापस कर दिया है. कुछ दिनों तक व्हाट्स एप पर संदेशों का आदान-प्रदान करने के बाद अब वह उससे विरक्त हो गये हैं, उनका स्वास्थ्य अब ठीक है. टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है, जो रोचक और मनोरंजक भी है.

रात्रि के नौ बजने वाले हैं, यानि सोने से पूर्व आज के दिन की अंतिम घड़ी. जून ने शाम को गाजर का हलवा बनाया है. कल उनके एक मित्र आ रहे हैं गोहाटी से, उन्हें खाने पर बुलाया है. वैसे भी उनके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. दोपहर बाद को ओपरेटिव स्टोर गयी, बीहू के लिए पीठा आदि लिया, सर्दियों के मौसम में तिल खाने की सलाह दी ही जाती है. मन्दिर की साज-सज्जा बदली, ध्यान कक्ष में भी नया कैलेंडर लगाया व नई मूर्तियाँ भी, नये वर्ष का फेर-बदल अभी चल रहा है. आज वर्षा नहीं हुई. आज योग कक्षा में एक साधिका की भांजी भी आई थी, जो बिहार योग स्कूल से योग सीख चुकी है. उसने शिथलीकरण सिखाया और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी.

इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. वह रात के भोजन की तैयारी कर चुकी है. उनके पूर्व सहकर्मी आयेंगे ऐसा जून ने कहा था पर अब ज्ञात हुआ वह किसी अन्य जगह निमंत्रित हैं. कल दोपहर भी जून का लंच बाहर है, उनके दफ्तर के चार अधिकारी परीक्षा के बाद स्थायी हुए हैं, वे मिलकर पार्टी का आयोजन कर रहे हैं. अब यह भोजन कल रात्रि को खाया जायेगा. कुछ बना हुआ कुछ बनने के लिए तैयार. फ्रिज में रखा हुआ भोजन तो लोग तीन-चार दिन तक भी खाते ही हैं. आज सुबह क्लब गयी, एक स्थानीय क्लब ने उनके क्लब द्वारा चलाई जा रही सिलाई कक्षा के लिए सात सिलाई मशीनें दी हैं, जो उनके यहाँ वर्षों से रखी हुई थीं. कल मृणाल ज्योति में भी मीटिंग है. सुबह एक सखी को पहली बार अपने पति के साथ टहलते देखकर अच्छा लगा, वह वर्षों तक अकेले ही टहलने जाती रही है. उसके लिए उसने मन ही मन शुभकामनायें भेजीं. परमात्मा ही हर आत्मा के द्वारा प्रकट हो रहा है. उन्हें उसके प्रकट होने में बाधक नहीं बनना है. किसी भी तरह की आसक्ति, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर मन को पारदर्शी बनाना है, तभी परमात्मा की ज्योति मन में झलकेगी. वे अकेले ही इस जगत में आते हैं और अकेले ही यहाँ से जाने वाले हैं. मित्रता का भ्रम यदि टूटता है तो वह इसी सत्य की ओर इशारा करता है.

Monday, June 24, 2019

क्रिसमस ट्री



आज क्रिसमस है. हर जगह उत्सव का माहौल है. सुबह बड़े दिन का संदेश सुना था. हर आत्मा को स्वयं पर लगे दाग-धब्बे साफ करने हैं ! न दीन बनना है, न अधीन बनना है, पूर्ण स्वाधीन बनना है. न बेबस, न मजबूर, न असहाय बनना है, जीवन के अंतिम क्षण तक. उम्र चाहे कितनी भी हो, मन को सदा युवा बनाना है. मृणाल ज्योति गयी वह, केक और क्रिसमस ट्री सजाने का कुछ सामान लेकर. पहुँची तो कुछ बच्चे काम में लगे थे, उनके हाथ मिट्टी से सने थे. हाथ धोकर आये, उन्हें संगीत  सुनाया, केक खिलाया, बहुत खुश हुए. जून भी आये बाद में उसे लेने. उन्होंने देखा किस तरह वहाँ  निर्माण कार्य चल रहा है, स्कूल आगे बढ़ रहा है. वहीं से वे नाहरकटिया पुल के नीचे नदी तट पर गये. पानी कम था, लगभग स्थिर ही लग रहा था. किनारे पर काई भी जमी थी. एक-दो पिकनिक पार्टियाँ भी चल रही थीं. इस समय शाम के पांच बजे हैं. कुछ देर पहले वे भ्रमण पथ पर टहलने गये, उससे सटा हुआ  बगीचा गुलाब के फूलों से भरा था. हर रंग के गुलाब थे वहाँ, लाल, गुलाबी, पीले, सुनहरे, नारंगी, हल्के जामुनी, पीच और मैरून !

आज इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद के बारे में एक कार्यक्रम देखा. सत्तर वर्ष की उम्र में वह विदेश गये और सत्तर देशों में गीता का ज्ञान फैलाया. ग्यारह बजने को हैं, आज मौसम खुशनुमा है. खिली-खिली धूप और वातावरण में शांति..ध्यान के बाद मन भी शांत है. पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. परसों सुबह रात्रि भोज की तैयारी में निकल गयी, दोपहर भोजन बनाने-बनवाने में व शाम खाने-खिलाने में. जून के एक सहकर्मी आये थे परिवार के साथ, तीन बच्चे, तीन बुजुर्ग तथा दो व्यस्क. बहुत अच्छा समय बीता. उसके पूर्व की संध्या को वे संगीत सुनने गये थे, शास्त्रीय गायन व वादन ! उससे पूर्व एक सखी ने विदाई पार्टी में बुलाया था. इस वर्ष के दो दिन शेष हैं. आज वे अरुणाचल प्रदेश जा रहे हैं. नये वर्ष का स्वागत तेजू में करेंगे, जहाँ सूर्य की किरणें सर्वप्रथम उदित होती हैं. जून कुछ देर में आने वाले होंगे. वह बगीचे की धूप में हाथ में डायरी थामे खड़े होकर ही लिख रही है. घास अभी भी भीगी हो शायद, सो वस्त्र खराब होने के भय से नीचे नहीं बैठ रही है, पर धूप इतनी तेज हैं कि नन्ही-नन्ही ओस की बूँदें कब की सूख चुकी होंगी, उसका भय हजार भयों की तरह व्यर्थ ही सिद्ध होगा यदि वह बैठ जाये.

सुबह वे टहलने गये, फूलों की सुगंध जो पहले दूर से ही आ जाती थी, आज निकट से गुजरने पर भी नहीं आयी. उसकी सूंघने की शक्ति पूरी तरह वापस नहीं लौटी है. गले में कभी-कभार खराश भी हो जाती है. खैर, भोजन के प्रति उसकी आसक्ति को छुड़ाने के लिए ही शायद प्रकृति के द्वारा रचा गया यह प्रपंच है. उसे अपना उद्धार करना है. परमात्मा इसमें सहायक है. कोई भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थति उसे अनंत से जुड़ने से रोक न पाए, अपनी ही नजरों में वह पराजित न बने. मन संकुचित न रहे, निज स्वार्थ से ऊपर उठे. नये वर्ष में यही प्रार्थना लेकर प्रवेश करना है. कुछ भी ऐसा न रहे जो उसे भारी कर दे, रोग का कारण बने. साधना के प्रति श्रद्धा सदा बनी रहे इसका ध्यान रखना है. साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए सदा विद्यार्थी बनकर रहना है. कैवल्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करना है, जब तक कैवल्य की प्राप्ति न हो तब तक विश्राम नहीं, आराम नहीं. जीवन का एक भी पल विवाद में न बीते. शोक और मोह से आत्मा एक क्षण के लिए भी ग्रस्त न हो. परमात्मा उसी हृदय में विराजमान होंगे जो हृदय खाली होगा. संबंधों का बोझ जब तक आत्मा पर है तब तक वह उड़ान नहीं भर सकती. परमात्मा सदा ही उसका रक्षक है. वह भीतर से शिक्षा देता है और बाहर से कृपा रूप में ऐसी परिस्थतियाँ खड़ी करता है कि आत्मा स्वयं की परख कर सके. कितने दाग लगे उसे यह स्पष्ट दिखाई दे. उनकी यात्रा आत्मशुद्धि की यात्रा है. जगत इसमें सहायक होता है, जगत दर्पण है, जिसमें वे अपने ही अक्स को देखते हैं.

Wednesday, June 19, 2019

कच्चे केले का चोखा



रात्रि के आठ बजे हैं. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी. नये वर्ष का कैलेंडर और डायरी लेकर गयी थी, और क्लब के कुछ सदस्यों का दिया सामान भी. रास्ते में व्हाट्स एप पर कितने ही सुंदर संदेश पढ़े, जीवन का हर पल शुभ हो, मन अहंकार से मुक्त रहे, न मोह का शिकार हो न दैन्यभाव का. कोई पाखंड जीवन में रहे. योग में स्थित रहे बुद्धि और आत्मभाव कभी भी विस्मृत न हो. योग की महिमा को स्वयं जानकर व अनुभव करके वे अन्यों को भी बताएं. परस्पर आदान-प्रदान से प्रीति भी बढ़ती है.

सुबह के सवा आठ बजे हैं. सुबह से सुवचनों को सुनकर मन-प्राण शांति का अनुभव कर रहे हैं. आत्मा सदा ही परमात्मा के सान्निध्य में है. मन जो आत्मा रूपी सागर की ही एक लहर है सदा अपना राग अलापता रहता है. यदि उसे यह ज्ञात हो जाये कि उसका मूल अनंत है तो वह अपनी क्षुद्रता को भूल जायेगा और अपने भीतर ही विश्राम का अनुभव कर लेगा. अनंत स्वरूप का विस्मरण ही उन्हें दुःख की ओर ले जाता है तथा मन में कामना का उदय होना ही उसे विस्मृत करा देता है. कामना पूर्व संस्कार से उत्पन्न होती है. भीतर जो संस्कार हैं उनसे मुक्त होने का उपाय ध्यान है और समाधि का अनुभव. मन जब तक भय, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष के संस्कारों  से मुक्त नहीं होगा, तब तक कोई न कोई संस्कार सिर उठाता रहेगा और आत्मा व्यर्थ ही दुखी होती रहेगी. जिसका खामियाजा देह को भी उठाना पड़ता है. विनाशकाले विपरीत बुद्धि होती है सो उस वक्त ज्ञान की बाते भी नहीं भातीं.

रात्रि के पौने आठ बजे हैं. सोनू से बात हुई. उसने पिता जी व मंझले भाई से बात की, वह रिश्ते निभाना जानती है. दीदी वहाँ पहुँच गयी हैं. दो दिन रुकेंगी, फिर बड़े भाई आ जायेंगे. सभी भाई-बहन मिलजुल कर पिताजी की देखभाल कर रहे हैं. आज काव्यालय पर लिखा. जून कल गोहाटी जा रहे हैं. दोपहर को देर से आये. आयकर भरने के लिए सीए के साथ घंटों बैठे रहे, अभी भी काम पूरा नहीं हुआ है. अख़बार वाले ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की जगह आज टेलीग्राफ दे दिया है, बहुत दिनों बाद जम्बल पहेली हल की.

हर दिन पूर्व से अलग होता है. हर दिन की शुरुआत भी अलग होती है और समाप्ति भी. आज का दिन फोन पर सबसे बातें करते ही बीता है. सुबह पांच बजे से थोडा पहले उठी. टहलने गयी. गुरूजी को सुना, ज्ञान प्राप्ति के चार साधन-विवेक, वैराग्य, षट सम्पत्ति व मुमुक्षत्व ! मन प्रसन्न हो गया. पिताजी से बात हुई. कल रात उन्हें फिर तेज दर्द हुआ. लगता है दिल की ही समस्या है उन्हें. दीदी, बड़े भाई, दोनों भाभियों सभी से बात हुई. वृद्धावस्था में व्यक्ति कितना असहाय हो जाता है. आगे कोई मार्ग नहीं सूझता. देह साथ नहीं देती. ऐसे में घर वालों का साथ ही उसका सम्बल होता है. उसे भी एक बार वहाँ जाना है, पर उससे पूर्व स्वयं को पूर्ण स्वस्थ करना होगा. इस समय काफ़ी ठीक है.

सुबह ग्यारह बजे जून आ गये थे. लंच में उनकी पसंद की कढ़ी बनाई. उससे पूर्व साप्ताहिक सफाई. सुबह रोज की तरह थी पर एक खास बात हुई. कल रात पहले समाचार सुनते हुए, फिर सर्वेंट लाइन में होते झगड़े की आवाजों के कारण देर से सोयी. सुबह नींद खुली तो झट उठने का मन नहीं हुआ. स्वप्न और जागरण के मध्य की स्थिति थी कि अचानक सिर के पीछे किसी के श्वास लेने की आवाज आई और अगले ही क्षण ऐसा लगा जैसे जून रजाई ओढ़कर धीरे से आकर लेट गये. उसे आश्चर्य हुआ, दरवाजे पर ताला लगा है, वह अंदर कैसे आये, आंख खुल गयी और वहाँ कोई नहीं था, स्वप्न टूट गया. कितना सजीव था वह दृश्य, कितना वास्तविक लग रहा था. इसी तरह जो उन्हें  जगते हुए वास्तविक लगता है एक स्वप्न ही है ऐसा ही तो संत कहते हैं. रात्रि के पौने नौ बजे हैं, टीवी पर तारक मेहता..आ रहा है. डिनर में मकई की रोटी के साथ कच्चे केले का चोखा बनाया. नैनी ने मेथी काट दी है, कल सुबह उड़द दाल की बड़ी बनानी है.


Saturday, June 15, 2019

ग्लैडियोली के बल्ब



पिछले महीने के दूसरे सप्ताह में उसने इस डायरी में लिखा था, फिर महीना समाप्त होने तक बंगलौर में किसी और कापी में लिखा, पर वे पन्ने कहीं खो गये. इस माह के प्रथम सप्ताह में अस्वस्थता के कारण कुछ नहीं लिखा. जिस दिन बुखार हुआ, उन्हें अगले दिन बंगलूरू से वाराणसी की यात्रा पर निकलना था, वहाँ एक दिन रुके और अगले दिन इलाहाबाद, छोटे भाई की बिटिया का विवाह संस्कार था. छह दिन बाद लौटे, तब भी स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं था. इस समय भी सिर भारी है और खांसी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुई है. उसके ही कृत्यों का फल है यह रोग. मन यदि तनाव से ग्रस्त रहेगा, शंका से ग्रस्त रहेगा तो...साधना और सत्संग से दूर विवाह की गहमा गहमी और चकाचौंध..ऊपर से रोज ही गरिष्ठ भोजन, तीन हफ्तों से बाहर का खाना...आधी-अधूरी नींद..ऊपर-ऊपर से कुछ भी कारण रहा हो, असली कारण तो कर्म फल ही है, यह उसे ज्ञात है. मन में उठा हर नकारात्मक भाव देह पर किसी न किसी रूप में तो प्रकट होगा ही. आज शाम को यहाँ नन्हे के विवाह का स्वागत समारोह है, जिसके लिए कार्ड्स देने में उन्होंने इतने दिन लगाये थे.

आज छोटे भांजे का जन्मदिन है. भोपाल में रहकर वह लॉ कालेज में दाखिले के लिए तैयारी कर रहा है. छोटी ननद ससुराल गयी है, उसके ससुर जी का स्वर्गवास हो गया है. कल उन्हें गोहाटी जाना है, परसों शाम को विवाह का स्वागत समारोह वहाँ भी है.

समारोह अच्छी तरह सम्पन्न हो गया, नन्हा वापस वहीं से वापस बंगलौर चला गया, अब घर पहुंचने वाला होगा. सोनू वहीं रह गयी है, घर में एक और शादी है, उसमें सम्मिलित होगी. आज हफ्तों बाद वे घर पर बैठकर टीवी पर एक धारावाहिक देख रहे हैं. क्लब से गाने की आवाजें आ रही हैं. कल महिला क्लब का वार्षिक उत्सव है, वे शायद ही जाएँ. उसका स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है. जून को किसी कांफ्रेंस में भी भाग लेना है. आज पिताजी से बात हुई, उन्हें चार दिन पूर्व हृदय के पास दर्द हुआ, उसके बाद उन्हें डाक्टर के पास ले गये. आज भी सुबह चक्कर आया तो डाक्टर ने दस दिनों की दवा दी है. दीदी व बड़े भाई से बात हुई, डाक्टर ने उन्हें ठंड से बचकर रहने  को कहा है.

पौने छह बजने वाले हैं शाम के, जून अभी तक नहीं आये हैं. वर्ष का अंतिम माह आ गया है, ठंड अभी तक नहीं बढ़ी है. यह पूरा वर्ष नन्हे और सोनू के विवाह की तैयारी में तथा विवाह समारोह मनाने में ही बीत गया. कल यहाँ के क्लब तथा दिगबोई क्लब की वार्षिक पत्रिका के लिए लेख व कविताएँ भेजी हैं. आज तीन पोस्ट्स भी प्रकाशित कीं. गुलदाउदी की तस्वीर फेसबुक पर डाली. सुबह पिताजी से बात हुई. अपने स्वास्थ्य को लेकर वह काफ़ी सकारात्मक लगे.

शाम के सात बजे हैं. सुबह तारों की छाँव में भ्रमण के लिए गये. नाश्ते में बनारसी चिवड़ा-मटर बनाया. साप्ताहिक सफाई का भी दिन होता है शनिवार. दोपहर को तिनसुकिया गये, शेष बची क्यारियों के लिए फूलों की पौध खरीदी, ग्लैडियोली के बल्ब भी. आज बड़े भाई ने पिता जी के लिए व्हाट्स एप पर एक अकाउंट बनाया है, जिसमें सभी परिवार जनों को शामिल किया है, ताकि उनका हालाल सभी को नियमित मिलता रहे. नन्हे से बात की पता चला वे अपने दफ्तर में हैकाथन करवा रहे हैं, वह आज रात भर दफ्तर में ही रुकने वाला है. उसने बताया, सोनू के घर पर मेहमान आने शुरू हो गये हैं, बहुत बड़ा परिवार है उनका.   
 

Friday, June 14, 2019

वस्त्रों पर सिलवटें



आज उच्च स्तरीय कमेटी के लिए नये अतिथि गृह में विशेष भोज का आयोजन किया गया है. उन्हें भी जाना है. सभी उच्च अधिकारी भी उपस्थित होंगे. सुबह चार घंटे उनमें से एक विशिष्ट महिला अतिथि के साथ बिताये, साथ में क्लब की प्रेसिडेंट भी थीं और एक अन्य अधिकारी की पत्नी. उन्हें लेकर ड्रिलिंग साइट पर भी गये. तेल के कुँओं की ड्रिलिंग कैसे होती है, नजदीक से देखा, समझा. आज सुबह उनके लिए एक कविता लखी थी. उनके पति देश के जाने-माने वैज्ञानिक हैं, उनकी उम्र सत्तर पार कर चुकी है पर अभी तक कार्यरत हैं. क्लब की प्रेसिडेंट के साथ काम करना अच्छा लग रहा है, वह काफ़ी जानकारी रखती हैं और कम्पनी को अपने परिवार की तरह मानती हैं.

आज सुबह शीतल थी पर अब धूप निकली है. बंगाली सखी से बात हुई. वे लोग पुरानी बातों को दिल से लगाकर बैठे हुए हैं, कहने लगी, समय के साथ भी कुछ घाव भरते नहीं हैं. उसकी आवाज आज दो बार ऊँची हुई, एक बार फोन पर उस बात करते हुए दूसरी बार नैनी को समझाते हुए, जिसे 'हाँ' बोलने की आदत है, बिना बात को समझे 'हाँ' बोल देती है. उसे जो क्रोध अथवा रोष बंगाली सखी से बात करके हुआ संभवतः वही नैनी पर उतर गया और फिर मन खाली हो गया. स्वयं को जाने बिना कैसे रहते होंगे लोग, अब आश्चर्य होता है. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से आयी है, वहाँ एक नया दफ्तर बन गया है. अब नई कक्षाओं के लिए जगह मिलेगी. स्कूल आगे बढ़ रहा है, अल्प ही सही उसका कुछ योगदान है इसमें. अगले शनिवार को वे इस समय बंगलौर में होंगे, उसके बाद लगभग एक महीना एक स्वप्न की भांति बीत जायेगा. आज ब्लॉग पर अभी तक तो कुछ नहीं लिखा है. अब जो भी सायास होता है वह नहीं भाता, जो सहज ही होता है, वही ठीक है.

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह स्कूल, वापस आकर क्लब, शाम को पहले योग कक्षा, फिर क्लब. कार्यक्रम सभी बहुत अच्छे थे, वे जल्दी घर आ गये. जून ने दो बार फोन किया. परसों रात को स्वप्न देखा था, वह आँखें बंद करके उसके साथ चल रही है. एक स्थान पर जाकर आँख खोलती है तो घुप अँधेरा है. वह उससे कहती है, यह रास्ता ठीक नहीं है, वापस चलो. उसने हामी भरी. फिर वह उस पर भरोसा करके आँख मूंद लेती है पर जब वे लक्ष्य पर पहुंचते हैं तो वहाँ का दृश्य ही अलग है. वह पूछती है, मार्ग नहीं बदला था, वह कहता है, नहीं. यह स्वप्न क्या बताता है...

कल कुछ नहीं लिखा. आज यात्रा से पहले का अंतिम दिन है. जून आज घर जल्दी आ गये हैं. मौसम बदली भरा है. मौसम में फेरबदल तो चलता रहता है पर आत्मा का मौसम सदा एक सा रहता है. जैसे पानी पर लकीर हो उतनी ही देर यदि मन का मौसम बदले तो ही मानना चाहिए कि मन आत्मा में स्थित है. मन आत्मा में रहकर यदि व्यवहार करना सीख जाये तो मुक्त ही है. मन पहले से ज्यादा सजग है और दृढ़ भी. आवरण और विक्षेप घट रहे हैं, सतोगुण बढ़ रहा है. तमो और रजो गुण से मुक्त होकर सतोगुण से भी पार जाना है. आज एक स्वामी जी से सुना, वस्र्त्रों को प्रेस करने से न उन्हें कुछ मिलता है न कुछ खोता है. वस्त्र पर सिलवटें मिट जाती हैं. सिलवट जो कुछ भी नहीं हैं, मिट जाती हैं. आत्मा में न कुछ जोड़ा जा सकता है न कुछ घटाया जा सकता है. मन रूपी सिलवट मिट जाती है, जो है ही नहीं. आज नन्हे और सोनू से बात की. वे योग और आहार के द्वारा अपना वजन घटा रहे हैं.