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Friday, July 5, 2019

काला जोहा



आज उसने काले चावल बनाये हैं, 'काला जोहा' जो आसाम में ही उगाया जाता है. बनने के बाद भी बिलकुल काले होते हैं. उन्हें पकने में ज्यादा समय लगता है. एक सखी अपनी बिटिया को लेकर लगभग दस-बारह दिनों के लिए बाहर गयी है, उसकी माँ और भाई यहाँ अकेले थे, वह उनके लिए अक्सर दोपहर को एक सब्जी बनाकर भेज देती है. शेष भोजन वे बना लेते हैं. बगीचे में फूल गोभी हुई है, आज पहली बार बनाई है, उन्हें अवश्य पसंद आएगी. उससे पहले ध्यान किया पर मन सात्विक भावदशा में नहीं था. शायद शरीर पूरी तरह से शुद्ध नहीं था या कल रात्रि को नींद पूरी न होने के कारण मन एकाग्र नहीं हो पा रहा था. कल सरस्वती पूजा के कारण शोर बहुत देर तक आ रहा था, यहाँ आजकल पूजा के नाम पर देर रात तक तेज आवाज में संगीत बजाने का अधिकार मिल जाता है. रात को एक बार नींद खुली, कुछ देर ध्यान के लिए बैठी, फिर नींद आयी पर स्वप्न चलने लगे. एक बार लगा, नींद में कुछ शब्द उसके मुख से निकले हैं, और जून पूछ रहे हैं, क्या हुआ ? उस समय लगा था, सचमुच उसी क्षण की बात है. वह आँख बंद किये रही, कुछ जवाब नहीं दिया. कुछ देर बाद लगा कि उसके कंधों में दर्द है पर उसके कहने के बावजूद भी जून सुन नहीं रहे हैं. अचानक स्वप्न टूटा और सारा दर्द गायब हो गया. स्वप्न में दर्द कितना तीव्र था. वे स्वयं ही अपने दर्द के निर्माता हैं. मोह और आसक्ति का त्याग करना होगा. जब स्थूल के प्रति मोह नहीं  त्यागा जा रहा है तो संबंध तो अति सूक्ष्म हैं, कितना सूक्ष्म मोह होगा उनके प्रति. शारीरिक अशुद्धि के कारण ही स्वप्न भी आते हैं. इसीलिए शौच का इतना महत्व है योग में. वे ही अपने भाग्य के निर्माता हैं और हन्ता भी..
आज सुबह अवधेशानंद जी ने एक अच्छा शेर सुनाया-
"वह खुद को बेहतर में शुमार करता है
अजीब है, कितना खुद का शिकार करता है"

अपने ही दुश्मन वे स्वयं बन जाते हैं. अनुभवानंद जी ने कहा कि बाल ही बालक है, नर ही नरक है, नर जब तक देहात्म भाव में है, नर्क में ही है. कामना जब तक है तब तक नर्क में ही हैं वे. अनाहत चक्र से अध्यात्म की यात्रा आरम्भ होती है. उन्हें कितना अच्छा अवसर मिला है कि मानव देह मिली है. सुख-सुविधा मिली है और गुरू का ज्ञान मिला है. श्री श्री कहते हैं, "ध्यान या योग ठहरना सिखाता है, भोग दौड़ना सिखाता है."

कल रात नींद अच्छी आयी. सुबह समय पर उठे वे, इक्का-दुक्का तारे नजर आ रहे थे आसमान पर जो ज्यादातर बादलों से ढका था. इस समय धूप खिली है पर उसमें तेजी नहीं है. गले में हल्की खराश सी लग रही है, देह को स्वस्थ रखने का कितना भी प्रयास करो, कुछ न कुछ लगा ही रहता है. आत्मा निर्लेप है, निरंजन, निर्विकार..कल शाम योग कक्षा में आत्मा के बारे में बताया. 'अष्टावक्र गीता' सुनी, गुरूजी कितने सुंदर ढंग से श्लोकों का अर्थ बता रहे हैं. आज एक राजयोगी के मुख से सुना, दिन में आठ घंटे परमात्मा के साथ योग लगाना चाहिए, सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं, शक्ति प्राप्त होती है और ज्ञान में सहज गति होती है. संत तो आठ घंटे क्या चाबीसों घंटे योग में ही स्थित रहते हैं. आज शाम को क्लब में मीटिंग है.

आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है, उसके लिए  कविता रिकार्ड की, भेजी. माली को आलस्य त्याग कर कुछ श्रम करने को कहा, समझाया, उसे किताब दी. 'तू गुलाब होकर महक'. बाबाजी की लिखी किताब. एक नोटबुक तथा एक पेन भी. शायद उसकी बुद्धि में कुछ बात बैठ जाये. आज के ध्यान का समय इसी सेवा में बीत गया. उसकी पत्नी अपने पुत्र को स्कूल ले गयी थी कल. उसने दाखिले के लिए पैसे मांगे हैं, अगले महीने का एडवांस. वह अस्वस्थ है और दुखी भी, पति यदि नाकारा हो तो पत्नी के पास आँसू ही बचते हैं. आज वर्षा के कारण ठंड बढ़ गयी है. रात से ही झड़ी लगी है, पर आश्चर्य प्रातः भ्रमण के समय रुकी हुई थी.

Monday, June 24, 2019

क्रिसमस ट्री



आज क्रिसमस है. हर जगह उत्सव का माहौल है. सुबह बड़े दिन का संदेश सुना था. हर आत्मा को स्वयं पर लगे दाग-धब्बे साफ करने हैं ! न दीन बनना है, न अधीन बनना है, पूर्ण स्वाधीन बनना है. न बेबस, न मजबूर, न असहाय बनना है, जीवन के अंतिम क्षण तक. उम्र चाहे कितनी भी हो, मन को सदा युवा बनाना है. मृणाल ज्योति गयी वह, केक और क्रिसमस ट्री सजाने का कुछ सामान लेकर. पहुँची तो कुछ बच्चे काम में लगे थे, उनके हाथ मिट्टी से सने थे. हाथ धोकर आये, उन्हें संगीत  सुनाया, केक खिलाया, बहुत खुश हुए. जून भी आये बाद में उसे लेने. उन्होंने देखा किस तरह वहाँ  निर्माण कार्य चल रहा है, स्कूल आगे बढ़ रहा है. वहीं से वे नाहरकटिया पुल के नीचे नदी तट पर गये. पानी कम था, लगभग स्थिर ही लग रहा था. किनारे पर काई भी जमी थी. एक-दो पिकनिक पार्टियाँ भी चल रही थीं. इस समय शाम के पांच बजे हैं. कुछ देर पहले वे भ्रमण पथ पर टहलने गये, उससे सटा हुआ  बगीचा गुलाब के फूलों से भरा था. हर रंग के गुलाब थे वहाँ, लाल, गुलाबी, पीले, सुनहरे, नारंगी, हल्के जामुनी, पीच और मैरून !

आज इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद के बारे में एक कार्यक्रम देखा. सत्तर वर्ष की उम्र में वह विदेश गये और सत्तर देशों में गीता का ज्ञान फैलाया. ग्यारह बजने को हैं, आज मौसम खुशनुमा है. खिली-खिली धूप और वातावरण में शांति..ध्यान के बाद मन भी शांत है. पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. परसों सुबह रात्रि भोज की तैयारी में निकल गयी, दोपहर भोजन बनाने-बनवाने में व शाम खाने-खिलाने में. जून के एक सहकर्मी आये थे परिवार के साथ, तीन बच्चे, तीन बुजुर्ग तथा दो व्यस्क. बहुत अच्छा समय बीता. उसके पूर्व की संध्या को वे संगीत सुनने गये थे, शास्त्रीय गायन व वादन ! उससे पूर्व एक सखी ने विदाई पार्टी में बुलाया था. इस वर्ष के दो दिन शेष हैं. आज वे अरुणाचल प्रदेश जा रहे हैं. नये वर्ष का स्वागत तेजू में करेंगे, जहाँ सूर्य की किरणें सर्वप्रथम उदित होती हैं. जून कुछ देर में आने वाले होंगे. वह बगीचे की धूप में हाथ में डायरी थामे खड़े होकर ही लिख रही है. घास अभी भी भीगी हो शायद, सो वस्त्र खराब होने के भय से नीचे नहीं बैठ रही है, पर धूप इतनी तेज हैं कि नन्ही-नन्ही ओस की बूँदें कब की सूख चुकी होंगी, उसका भय हजार भयों की तरह व्यर्थ ही सिद्ध होगा यदि वह बैठ जाये.

सुबह वे टहलने गये, फूलों की सुगंध जो पहले दूर से ही आ जाती थी, आज निकट से गुजरने पर भी नहीं आयी. उसकी सूंघने की शक्ति पूरी तरह वापस नहीं लौटी है. गले में कभी-कभार खराश भी हो जाती है. खैर, भोजन के प्रति उसकी आसक्ति को छुड़ाने के लिए ही शायद प्रकृति के द्वारा रचा गया यह प्रपंच है. उसे अपना उद्धार करना है. परमात्मा इसमें सहायक है. कोई भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थति उसे अनंत से जुड़ने से रोक न पाए, अपनी ही नजरों में वह पराजित न बने. मन संकुचित न रहे, निज स्वार्थ से ऊपर उठे. नये वर्ष में यही प्रार्थना लेकर प्रवेश करना है. कुछ भी ऐसा न रहे जो उसे भारी कर दे, रोग का कारण बने. साधना के प्रति श्रद्धा सदा बनी रहे इसका ध्यान रखना है. साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए सदा विद्यार्थी बनकर रहना है. कैवल्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करना है, जब तक कैवल्य की प्राप्ति न हो तब तक विश्राम नहीं, आराम नहीं. जीवन का एक भी पल विवाद में न बीते. शोक और मोह से आत्मा एक क्षण के लिए भी ग्रस्त न हो. परमात्मा उसी हृदय में विराजमान होंगे जो हृदय खाली होगा. संबंधों का बोझ जब तक आत्मा पर है तब तक वह उड़ान नहीं भर सकती. परमात्मा सदा ही उसका रक्षक है. वह भीतर से शिक्षा देता है और बाहर से कृपा रूप में ऐसी परिस्थतियाँ खड़ी करता है कि आत्मा स्वयं की परख कर सके. कितने दाग लगे उसे यह स्पष्ट दिखाई दे. उनकी यात्रा आत्मशुद्धि की यात्रा है. जगत इसमें सहायक होता है, जगत दर्पण है, जिसमें वे अपने ही अक्स को देखते हैं.

Monday, March 4, 2019

अस्सी घाट पर दादरा



शाम के सात बजने को हैं, वे पांच बजे घर से चले थे. उस समय आकाश में सूरज बादलों के पीछे से झांक रहा था. धीरे-धीरे साँझ ढलती गयी, गगन गुलाबी से सुरमई हो गया और स्टेशन पहुँचने तक तो पूर्ण अंधकार हो चुका था. मार्ग में हरे-भरे चाय बागान, झोपड़ियाँ और बांसों के झुरमुट थे. कहीं-कहीं खेतों में पानी भरा था. कहीं महिलाएं घरों के सामने बैठ कर बातें कर रही थीं तो कहीं ठूँठ बचे खेतों में दूर तक कोई पंछी भी नजर नहीं आ रहा था. डिब्रूगढ़ शहर का मुख्य बाजार रोशनियों से जगमगा रहा था. कई नई दुकानें भी नजर आयीं. रेलवे स्टेशन काफी साफ-सुथरा था, कहीं भी गंदगी नजर नहीं आई. लगभग खाली ही था पूरा स्टेशन. टीटी के दफ्तर में जाकर पता किया, प्रथम श्रेणी के चार के कूपे में अन्य दो यात्री कौन हैं, तथा कहाँ से चढ़ने वाले हैं. पता चला कोई मारवाड़ी दंपति हैं, आधी रात के बाद ही चढ़ेंगे. वे लगभग तीन वर्ष बाद वाराणसी जा रहे हैं. ट्रेन की इतनी लंबी यात्रा किये भी काफी अरसा हो गया.

दस बजे हैं अभी सुबह के. ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई है. सुबह वे पांच बजे के बाद ही जगे. रात को देर तक नींद नहीं आ रही थी, फिर आयी भी तो स्वप्नों भरी. रेल यात्रा बहुत दिनों बाद कर रहे हैं सो जैसे अभ्यास ही नहीं रहा. जून ने नाश्ते में आलू परांठा व दही मंगवाया. कॉर्न फ्लेक्स तो था ही. सहयात्री आ चुके हैं, उनका एक चार-पांच वर्ष का पुत्र भी है, जिसकी आँखें बहुत कमजोर हैं. मोबाइल को लगभग आँख से सटाकर देखता है. उसके दांत में भी दर्द था. माता-पिता तो बन जाते हैं लोग पर उसके लिए ज्यादा श्रम नहीं करना चाहते. माँ को सोने में ज्यादा आनंद आ रहा है, बजाय इसके कि पुत्र के साथ खेले जो मोबाइल में ही खेल रहा है. उसने एक कहानी लिखी छोटी बहन के साथ घटी घटना पर आधारित.

कल रात्रि समय पूर्व ही उनकी ट्रेन वाराणसी स्टेशन पर पहुँच गयी थी. पौने दो बजे घर पर थे. छोटी ननद व ननदोई ने स्वागत किया. हाल-चाल पूछ कर सो गये पर सुबह साढ़े पांच बजे ही लगातार आती तोते की आवाज ने उठा दिया, पता चला पड़ोस के घर में रहता है और सुबह से रटना शुरू कर देता है. प्रातः भ्रमण भी किया और वापस आकर प्राणायाम भी. नाश्ते में छोलिया-पोहा था और फल. शाम को विवाह उत्सव में जाना है, जहाँ बहुत लोगों से मुलाकात होगी. कल शाम बाजार जाना है, परसों गंगा आरती देखने, एक दिन चुनार का किला देखने तथा किसी आश्रम में भी. यहाँ मौसम थोडा गर्म है, पर बहुत अधिक भी नहीं.

दोपहर के ढाई बजे हैं. बाहर धूप तेज है पर कमरा एसी के कारण ठंडा है. वे दोपहर का विश्राम करके अभी उठे हैं. शाम से पूर्व बाहर निकला नहीं जा सकता है. आज की सुबह शानदार थी. वे साढ़े चार बजे उठ गये थे और अस्सी घाट गये. घर के पास ही इ-रिक्शा वाला रहता है, जिसे शाम को ही बुक कर लिया था. छह बजे घाट पर पहुंचे तो शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम चल रहा था, कुछ कुर्सियां लगी थीं और दरियां भी बिछी थीं. सुबह पांच बजे ही आरती होती है, जो वे नहीं देख सके. एक गायिका जो कोलकाता से आई थी, स्थानीय तबला वादक ( युवा छात्र) तथा हारमोनियम वादक के साथ बहुत ही सधे हुए अंदाज में दादरा गा रही थी. सात बजे योग का कार्यक्रम आरम्भ हुआ. योगाचार्य जी ने पहले नौ प्राणायाम कराए-अनुलोम-विलोम, कपालभाती, शीतलीकरण, भस्त्रिका, उज्जायी, अग्निसार, भ्रामरी तथा तीन बंध. उनकी वाणी ओजस्वी थी तथा उत्साहवर्धक भी. उसके बाद आसन करवाए, ताड़, अर्ध चन्द्र, मंडूक, पर्वत आसन. कुछ क्रियाएं पैरों हाथों तथा सर्वाइकल के लिए भी थीं, जिनमें पैरों को जमीन पर पटकना भी शामिल था. सिंहासन तथा हास्यासन भी करवाए. योग करने के बाद तन-मन ऊर्जा से भर गया, फिर वे नाव से गंगापार गये. स्नान करके नाव से वे दशाश्वमेध घाट पर उतरे. नाश्ता किया, शालिग्राम तथा नर्मदेश्वर से मिलने वाला एक पत्थर लिया. दुकानदार का नाम धर्मेन्द्र था, जो बातें बनाने में कुशल था. उसने दोनों पत्थरों के बारे में बताया तथा उनकी पूजा करने से पूर्व उन्हें पंच गव्य से अभिषिक्त करने को कहा. उसके बाद वे पैदल ही चलकर पुरानी गली में गये. कुछ समय पुराने घर में बिताया. वर्षों पूर्व वहाँ जो विद्यार्थी उससे गणित के सवाल पूछा करता था, अपने परिवार के साथ रह रहा था. दो बच्चों का पिता वह एक अख़बार में काम करता है. एक स्वयं सेवी संस्था से भी जुड़ा है.   

Friday, February 15, 2019

फुलकारी की कढ़ाई




जून का प्रेजेंटेशन ठीक हुआ आज, छोटा सा ही था, इसके लिए इतनी दूर आना तथा इतने सुंदर वातावरण में रहने का अवसर मिलना भी एक सौभाग्य ही है. सुबह लंच से पूर्व सभी महिलाओं ने अंताक्षरी खेली तथा तम्बोला भी. उसके पूर्व वह दो अन्य महिलाओं के साथ कैम्पटी फॉल देखने गयी. बहुत ऊंचाई से गिरता हुआ जल अद्भुत दृश्य उत्पन कर रहा था. रास्ते में छोटी-बड़ी दुकानें थीं, जहाँ से कुछ खरीदारी भी की. उससे पूर्व पौष्टिक व स्वादिष्ट नाश्ता. दोपहर बाद वे मालरोड के लिए निकले. होटल की शटल बस द्वारा दो अन्य महिलाओं के साथ, जिनके पति भी इसी कांफ्रेंस में भाग लेने आये हैं. वे लोग एक दुकान में गये जहां फुलकारी किये हुए सूट, दुपट्टे तथा साड़ियाँ मिल रही थीं. उसने तीन कुर्तियों का कपड़ा खरीदा. मॉल रोड पर काफी चहल-पहल थी. उन्होंने एक बड़ा सा भुना हुआ भुट्टा भी लिया और तीन टुकड़े कर के खाया. ज्यादा भूख नहीं थी बस ठंड को दूर करने के लिए कुछ खाना था. शाम होते-होते कोहरा छाने लगता और ठंड बढ़ गयी थी. कल रात्रि भोजन से पूर्व ‘गजल संध्या’ भी शानदार थी, दोनों गायक श्रेष्ठ थे तथा गीतों व गजलों का चयन भी अच्छा था. अब वह शाम के डिनर पर जाने के लिए तैयार है. आज शाम भी संगीत का कोई न कोई कार्यक्रम अवश्य होगा. कल दोपहर के भोजन के बाद उन्हें वापसी की यात्रा आरम्भ करनी है. सुबह इसी रेजॉर्ट में कुछ देर घूमकर कुछ तस्वीरें उतारेगी, जब जून अपने कार्य में व्यस्त होंगे.

हवा में ठंडक है और सामने पहाड़ों पर धूप चमक रही है. नीले आकाश पर हल्के श्वेत बादल और पंछियों की आवाजें ! पहाड़ों की हवा कितनी अलग होती है, प्रदूषण मुक्त और शीतल, हरियाली और नीरव एकांत भी पर्वतों पर ही मिल पाते हैं. होटल के कमरे से बाहर निकल कर इस छोटे से लॉन में बैठकर डायरी लिखने का आज अंतिम दिन है. कुछ देर पूर्व ही वे टहलने गये, कुछ और फोटोग्राफी की. कल रात नींद ठीक आई, स्वप्न आयें भी हों तो कुछ याद नहीं. आज पिताजी के पास जाना है, उन्हें जून से मिलकर बहुत अच्छा लगेगा. इसके बाद अब वर्ष भर बाद ही मिलना होगा. परमात्मा ने उसे एक और पाठ इस बार की यात्रा में सिखाया है. देने का सुख कितना बहुमूल्य है, बदले में कुछ भी पाने की तिलमात्र भी ललक यदि भीतर है तो मानो दिया ही नहीं. जो उनकी अपनी निधि है वह तो उनसे मृत्यु भी नहीं छीन सकती, वह है उनका परमात्मा, वह सदा ही है, सदा ही रहेगा ! मसूरी में यह दो-ढाई दिनों का प्रवास एक सुखद यादगार बनकर मन पर अंकित हो गया है.

Monday, September 10, 2018

तीन परतों वाला केक



आज टीवी पर सुंदर वचन सुने, इन्द्रियां प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती जा रही है और मृत्यु सामने खड़ी है, फिर भी उन्हें दुखदायी सांसारिक भोगों में सुख भास रहा है. जन्म, मृत्यु और जरा संबंधी दुखों से सदा आक्रांत होकर संसार में मनुष्य पकाया जा रहा है तो भी वह पाप से उद्व्गिन नहीं हो रहा है. जैसे कछुआ अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, वैसे ही साधक कामनाओं को संकुचित करके रजोगुण रहित हो जाता है.’’
भोग में रोग का भय है, ऊँचे कुल में पतन का भय है. मान में दीनता का, रूप में वृद्धावस्था का तथा देह में काल का भय है. संसार में सभी वस्तुएं भयपूर्ण हैं, भय से रहित तो केवल वैराग्य ही है.
उनके शुभ और अशुभ कर्मों के एकमात्र साक्षी वे स्वयं ही हैं, क्योंकि कर्मों के पीछे की भावना ही उन्हें शुभ अथवा अशुभ बनाती है. मनसा, वाचा, कर्मणा किये गये हर कर्म का फल उन्हें ही मिलने वाला है. अज्ञान दशा में जो कर्म उन्होंने आज तक किये हैं, उनका फल सुख या दुःख के रूप में सम्मुख आने ही वाला है. उनको सम अवस्था में रहकर ही काटा जा सकता है, अन्यथा नये कर्मों का जाल खड़ा हो जायेगा. जैसे यदि कोई अपनी आदत या संस्कार के कारण दुःख पा चुका है, पुनः वही स्थिति आने पर उसे समता बनाये रखनी है न कि पूर्व की भांति उसे दोहराना है, तब तो वह उस संस्कार को दृढ ही करता जायेगा. जहाँ कहीं भी आसक्ति दिखाई दे तो उसमें दोष दृष्टि करके स्वयं को उससे मुक्त करना चाहिए, क्योंकि जहाँ वह परमसुख का स्रोत है, वहाँ कुछ भी नहीं है, कोई विचार कोई भाव भी वहाँ प्रवेश नहीं पा सकता. उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं होती रहती है, अनावश्यक का ही त्याग करना है.

शाम के सात बजे हैं. आज स्वतन्त्रता दिवस है. सुबह वे समय से उठे, नेहरू मैदान जाने से पूर्व प्रधानमन्त्री का भाषण सुना. अस्पताल में मरीजों को मिठाई दी. कम्पनी में बहुत उत्साह से आज का दिन मनाया गया. घर में भी झंडा फहराया और लड्डू बांटे. प्रधानमन्त्री का भाषण उत्साहवर्धक था. उन्होंने पाकिस्तान में बढ़ते असंतोष का भी जिक्र किया. नैनी ने आज सुबह पुत्र के जन्मदिन के केक का फोटो दिखाया. तीन परतों में सजा था, जिसपर एक बच्चे का पुतला था तथा एक गेंद. केक बनाकर सजाने के एक से एक नायाब तरीके निकल रहे हैं. आजकल नेट से देखकर लोग काफी सृजनशील हो गये हैं. शाम को वे यात्रा की तैयारी के लिए खरीदारी करने गये. सुबह ध्यान में गुरूमाँ के मुद्रा ध्यान का सीडी लगाया, अंत में एक सखी के साथ नृत्य किया, उसे भी आनन्द आया होगा.
साढ़े आठ बजे हैं. अज उसने स्वयं से वादा किया है कि वह सहजता से शुद्ध अंग्रेजी भाषा में बोलने का अभ्यास करेगी, और किसी के भी सम्मुख इस भाषा में बोलने से झिझकेगी नहीं. परमात्मा उसके साथ है उसने कल्पना में एक विशाल समूह के सामने स्वयं को अंग्रेजी में भाषण करते हुए देखा, उसे लगा वह कर सकती है. अगले हफ्ते उसे एक कोर्स के लिए गोहाटी जाना है. वहाँ उसे समूह मे काम करने का अवसर भी मिलने वाला है.

आज जो पीड़ा है, कल वही हँसी बनेगी. विनाश की महाक्रीड़ा से ही नई सृष्टि जगेगी ! ब्रह्मा ने सृष्टि की, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार ! हर अश्रु छिपाए है भीतर, एक मुक्त हँसी का कलरव स्वर ! आज एक परिचिता के घर गयी पहली बार, उसने अपनी सीडी दिखाई, सुनाई. असमिया, हिंदी, तथा बंगाली गाना सुनाया जो अपनी माँ के लिए लिखा है तथा फिल्माया है. उसकी माँ ने भी पूरा साथ दिया है. कितनी ऊर्जा है उसमें. चित्रकला का भी पांच वर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रही है, अंतिम वर्ष में है. लिखती भी है, संगीत भी देती है और गाती भी है. केक भी बनाती है. परमात्मा ने उसे सब कुछ दिया है, सुंदर भी है, पर फिर भी संतुष्ट नहीं. इन्सान को कितना भी मिल जाये, वह तृप्त होना नहीं जनता. तृप्ति केवल और केवल आत्मा में जाकर ही मिलती है. जो भी वे होना चाहते है,  वे हैं ही, यह जानकर ही मन शांत होकर बैठ जाता है.   

Wednesday, June 15, 2016

एकांत - एक का अंत


वे कैसे बेहोशी में जीये चले जाते हैं. ऊपर-ऊपर से सब ठीक लगता है पर सब लीपा-पोती ही है, जरा सा खरोंचो तो भीतर की सच्चाई का अहसास हो जाता है. भीतर ज्वालामुखी है, जहर है, क्रोध की आग है, ईर्ष्या है, जलन है और न जाने क्या-क्या है. सारी शुभकामनायें एक झूठ है, सारा स्नेह एक दिखावा है, इन्सान अपने लिए जीता है, अपने स्वार्थ सिद्ध होते रहें तभी तक उसके संबंध सुमधुर हैं. सदियों से, हजारों सालों से संतजन सत्य ही कह रहे हैं. इस संसार से जो आशा लगाता है, उसके हिस्से में दुःख के सिवाय कुछ भी नहीं आता. दुःख से यदि मुक्ति चाहिए तो अपनी आत्मा का आश्रय लेना होगा, परमात्मा का आश्रय लेना होगा, सद्गुरु का आश्रय लेना होगा. जीवन की कटु सच्चाई को कोई जितना शीघ्र समझ ले उतना ही अच्छा है. यहाँ सारे नाते स्वार्थ पर टिके हैं, इन्सान अकेला ही आता है, वह अकेला ही रहता है, और अकेला ही जाता है. इस अकेलेपन को एकांत बनाकर जो अपने भीतर चला जाये और वहाँ सत्य को पा ले तभी उसका जीवन सफल है, वरना तो चिता की आग तक जाते-जाते उसके मन में चिंता की आग कई बार जल-जल कर बुझेगी और बुझ-बुझ कर जलेगी ! इस आग को बुझाने वाला शीतल जल केवल भीतर ही मिल सकता है, उसे तो उस जल का पता मिल गया है !  

आज नई ड्रेस पहनी है जो खास सर्दियों के लिए जून लाये हैं, वह चार-पांच दिनों के लिए गुवाहाटी गये हैं. वह इस कमरे में हैं जहाँ कम्प्यूटर टेबल लगा दी है, जो उनका योग-ध्यान कक्ष है, तथा नन्हा घर आने पर वह यहीं रहना पसंद करता है. पिछली बार आया था तब उसने असमिया, बंगाली तथा पाकिस्तानी गीतों का एक अच्छा संग्रह नेट से किया. आज कुछ देर तक सुना.


जून कल आ रहे हैं, फ्रिज में सब्जियां भी खत्म हो रही हैं और दालें भी, अपने आप भी बाजार जा सकती है पर सोचती है कि एकाध समय यदि कुछ विकल्प ढूँढ़कर काम चलाया जाये तो अच्छा रहे, सभी कुछ हर समय मौजूद हो तो आदमी का मस्तिष्क जड़ हो जाता है. आवश्यकता आविष्कार की जननी है. शाम को यूँ तो क्लब की तरफ से बाल दिवस के लिए उपहार लेने जाना है. इस बार लेडीज क्लब सामान्य बच्चों के लिए केवल एक फिल्म दिखा रहा है और विशेष बच्चों के लिए सैंडविच, उबले अंडे, चार्ट पेपर, साबुन, टॉवल व एक बाथ टब भी दे रहा है, साथ ही कुछ गेंदें व गुब्बारे भी ! बबल मेकर भी दिया जा सकता है. अगले दिन वे भी बाल दिवस मनाएंगे ‘अंकुर’ के बच्चों के साथ, केक या अन्य़ कोई मिठाई वह घर से बना कर ले जा सकती है. उन्हें पेपर प्लेट्स भी खरीदनी होंगी. इस समय माँ-पिताजी चाय पीकर आराम कर रहे हैं. माली बगीचे में काम कर रहा है, चारों ओर सन्नाटा है, एक शांति ! उसके भीतर भी गहन शांति है, तभी भीतर का संगीत सुनाई दे रहा है. आज ध्यान में एक नवीन अनुभव हुआ, कुछ क्षणों के लिए स्वयं का बोध भी जाता रहा. सद्गुरु का शिव सूत्र सुना, कितना अद्भुत ज्ञान है, बात तो वही एक है, लेकिन उसे कहने के हजार-हजार तरीके हैं. सदियों से संत कहते आ रहे हैं, लेकिन हर किसी का ढंग अनोखा है, एक ही चेतना अनंत रूपों में विराज रही है. वह स्वयं अद्भुत है तो उसका बखान करने वाले भी अनोखे क्यों न हों ?

Tuesday, April 19, 2016

सुमेरु संध्या


कल एओल का ‘सुमेरु संध्या’ कार्यक्रम सम्पन्न हो गया. विक्रमजी व उनकी टीम ने सभी को प्रभावित किया तथा संगीत के माध्यम से ध्यान की गहराइयों में ले जाने में सफल हुए. जो संगीत आत्मा से निकलता है आत्मा को छूता है. कल सुबह भी वह सवा दस बजे घर से कार्यक्रम स्थल पर गयी, ढाई बजे लौटी, उन्होंने वहाँ फूलों से सज्जा की. पहली बार उसने इस तरह काम किया. शाम को एक उड़िया साधिका अपने साथ ले गयी, वह अच्छी सखी बनती जा रही है. कार्यक्रम से लौटते-लौटते साढ़े नौ बज गये थे, जून सो गये थे पर उठकर उसके लिए भोजन लाये. आज दोपहर नैनी की बेटी की फ़ीस जमा करने जाना है तथा हिंदी पुस्तकालय की किताबें भी लौटानी हैं. ड्राइवर आ जायेगा, जून ने फिर उसका काम आसान कर दिया है. इटानगर में गुरूजी आ रहे हैं, वहाँ जाने के लिए बस की लम्बी यात्रा करनी पड़ेगी. जून ने कहा है गुरूजी के साथ आश्रम में रहकर एडवांस कोर्स करने वे भविष्य में कभी बैंगलोर जायेंगे. भविष्य में क्या लिखा है कोई नहीं जानता.

यश की इच्छा, वित्त की इच्छा तथा जिए चले जाने की इच्छा, तीनों ही दुःख के कारण हैं. यश की इच्छा के कारण ही मानव दूसरों के सामने अपनी प्रतिभा को दिखाना चाहता है. धन की इच्छा यानि सुख-सुविधा की इच्छा के कारण ही वह दूसरों की गुलामी सहता है तथा जीने की इच्छा अर्थात प्रेम करने, प्रेम पाने तथा अधिकार जताने की इच्छा के कारण ही वह अपना अपमान सहता है, दुःख उठाता है. यहाँ हर आत्मा आजाद है, हर एक को अपनी निजता प्रिय है, हरेक अपनी मालिक है सो किसी का हुकुम बजाना किसी को पसंद नहीं.


सितम्बर खत्म होने को है. उसने फिर पिछले चार-पांच दिनों से कुछ नहीं लिखा. परसों रात एक अजीब सा स्वप्न देखा. एक नवजात शिशु का क्रन्दन. वह शिशु उसकी छोटी बहन थी या वह खुद, यह स्पष्ट नहीं हो पाया. माँ की आवाज में लोरी सुनी, बिलकुल साफ गीत जिसकी एक पंक्ति थी सोजा मेरे सोना चाँदी, मत रो मेरे सोना चाँदी ! सुबह उठने सी पूर्व भी एक स्वप्न देख रही थी. घर में बहुत सारे मेहमान आये हुए हैं, वे कमरे में हैं, दरवाजा खुला है और उन्हें होश नहीं है. कल रात देखा वह समोसा या ऐसा ही कोई पदार्थ खाती ही जा रही है. कितनी ही वासनाएं भीतर छिपी हैं जो स्वप्न में प्रकट होती हैं. कल रात छोटी बहन व छोटी भांजी से बात हुई. वह संगीत सीख रही है, गोल्फ भी खेलना शुरू किया है तथा फ़्लाइंग क्लब जाकर टू सीटर प्लेन भी उड़ा चुकी है. जिन्दगी को पूरी शिद्दत से जीना शुरू किया है लेकिन इतना तो तय है बाहर कितना भी बड़ा आयाम वे फैला लें, भीतर गये बिना मुक्ति नहीं मिलती. छोटे भाई ने ओशोधाम जाकर भीतर की यात्रा तेज कर दी है. जून सोचते हैं यह आत्मविश्वास की कमी है पर अभी तक उन्होंने भीतर की झलक पायी ही नहीं है कैसे समझेंगे कि यही एक कार्य है जिसे करने के लिए आत्मविश्वास चाहिये अपनी आत्मा पर पूर्ण विश्वास करके उसकी ओर बढ़ते चले जाना ! दुनिया ने सदा ही परमात्मा की तरफ बढ़ते लोगों को पागल कहा है क्योंकि दुनिया स्वयं परमात्मा की तरफ पीठ किये बैठी है. वैराग्य, ज्ञान, श्री, ऐश्वर्य, धर्म, यश.. ये छह जिसमें हों वही भगवान है. 

Friday, August 28, 2015

फूलों का गुलदस्ता


आज का दिन विशेष है. अख़बारों में लिखा है कि इस तिथि को जब तारीख, महीना तथा वर्ष तीनों एक ही हैं तो कोई दुखद घटना घट सकती है. पर उसके लिए तो यह दिन, बल्कि हर दिन ही शुभ दिन है क्योंकि भीतर ज्योति जली है, भीतर संगीत जगा है तथा भीतर प्रेम की कली खिली है. मन के सिंहासन पर सद्गुरु सम भगवान को और भगवान सम सद्गुरु को प्रतिष्ठित किया है. जीवन एक शांत धारा के समान प्रवाहित हो रहा है पर उसमें नीरसता नहीं है, सरसता है !  

आज एकादशी है, जून आज भी फील्ड गये हैं. टीवी पर गुरूजी को देखा सुना. वह गूढ़ ज्ञान को जिस तरह सरल शब्दों में व्यक्त कर देते हैं, वह अतुलनीय है. आज उन्हें सुनकर हर बार की तरह उनके चरणों में शीश झुक गया. कल भी उन्हें सुना तो प्रायश्चित तथा पश्चाताप का नया अर्थ सुना. जब चित्त पहले का सा हो जाये तो प्रायश्चित घटता है. किसी से कोई भूल हुई, हृदय ग्लानि से भर गया, भीतर पीड़ा हुई, पश्चाताप हुआ तब प्रायश्चित किया और हृदय पूर्ववत हो गया तब वह उस भूल से छूट जाता है. वे हर शब्द में नया अर्थ भर देते हैं. रक्तबीज का उदाहरण देकर कहा कि ध्यान की गहराई में जाने पर जीवन में परिवर्तन हो जाता है. कोई बार-बार होने वाली भूलों से बच जाता है, वरना रक्तबीज की तरह एक विकार को दूर करते ही दूसरा सर उठाकर खड़ा हो जाता है. कोई पूर्ण मुक्त होकर जीना चाहता है तो गुरू की शरण से बढ़कर कोई उपाय नहीं है. उसे लगता है ज्ञान जीवन की सबसे अमूल्य निधि है, उसका होना तभी सार्थक है जब हृदय में परमात्मा का वास हो, आँखों में उसकी छवि हो और श्वासों में उसके ज्ञान की खुशबू हो. परमात्मा ही परम पुरुष हैं, वही तो वह हैं जिन्हें वेदों में पुराण पुरुष कहा गया है. और ऐसे भगवान कितने सहज प्राप्य हैं, उन्हें एक बार प्रेम से पुकारो तो सही.. वे तत्क्षण उत्तर देते हैं.

आज शाम को सत्संग मे जाना है. फूलों का गुलदस्ता लिए, अनौपचारिक ढंग से मुख से हरिनाम का उच्चारण करते हुए स्वयं को पाने के लिए, जो स्वयं को भुलाकर ही सम्भव है. झूठी पहचान जब मिटती है तो सच्ची पहचान जगती है. खुद को खोकर ही कोई खुद को पाता है. आज उसके भीतर कैसी पीड़ा ने जन्म लिया है, यह कुछ खोने का अहसास है. कोई प्रिय जैसे बिछड़ा जा रहा हो, यह पीड़ा भीतर की है, इसका समाधान भी भीतर ही मिलेगा ! यह पीड़ा मुक्ति का साधन बनेगी !

दोपहर के तीन बजने को हैं, आज कई दिनों के बाद उसने पढ़ाया नहीं बल्कि स्वयं पढ़ा है. कल सुबह बच्चों को सिखाने जाना है. कल सत्संग में आर्ट ऑफ़ लिविंग की एक स्थानीय टीचर ने ब्लेसिंग कोर्स के अपने अनुभव कहे. चार एडवांस कोर्स करके कोई भी यह कोर्स कर सकता है तथा इसे करने के बाद दूसरों को आशीष दे सकता है, गुरूजी उसके माध्यम से दूसरों को ब्लेस करेंगे, उसके बदले में कुछ दान-दक्षिणा देनी होगी, जो सीधे आश्रम जाएगी. उसे पहले-पहल तो अटपटा सा लगा कि कृपा का भी कोई मूल्य हो सकता है क्या ? फिर बुद्धि ने कहा कि यह बात उसकी समझ से बाहर है अतः वह उसका भरोसा न करे, जब वह भी इस कोर्स को कर लेगी तभी इसका अनुभव होगा, अभी तो मात्र कल्पना ही कर सकती है. सद्गुरु के प्रति यदि मन में संशय जगेगा तो हानि स्वयं की ही होगी, अतः अब उसने इस बारे में सोचना छोड़ दिया है. संतों-महापुरुषों के आचरण के बारे में उन्हें टिप्पणी करने का क्या अधिकार है, उन्हें तो उस राह पर चलना है जो बतायी गयी है. योग और ध्यान की राह पर चलने से उनका लाभ ही लाभ है. श्रद्धा उन्हें निज स्वरूप तक ले जाएगी और अश्रद्धा कहीं भी नहीं, तो अच्छा यही है कि वह अपने काम से काम रखे और उन बातों के बारे में व्यर्थ ही न सोचे जो उसकी समझ से बाहर हैं !


आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को वे जायेंगे. इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं, वर्षा लगातार पिछले कई दिनों से हो रही है, ठंड हो गयी है. निर्माणाधीन कमरे में मजदूर काम कर रहे हैं. वर्षा में भीगते हुए पंछी भी किसी तरह अपना दाना जुटा रहे होंगे !  तिनसुकिया में बम ब्लास्ट की खबर अभी एक सखी ने सुनी, तब उसे बतायी. 

Thursday, July 23, 2015

आंवले का वृक्ष


आज कई दिनों बाद डायरी खोली है. यह तो निश्चित है कि जो पन्ने खाली रह गये हैं, वे भी भर ही जायेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’... प्रभु के बारे में यदि लिखना हो तो शब्द अपने आप भीतर से झरते आते हैं. वह प्रभु, परमेश्वर, ईश्वर, ब्रह्म, कृष्ण, राम, शंकर या पारब्रह्म किसी भी नाम से उसे पुकारो वह जितना-जितना समझ में आता जाता है उतना ही उतना रहस्यमय भी होता जाता है. वही भीतर है वही बाहर है. टीवी पर राम कथा आ रही है. ईश्वर का रस जिसे भीतर से मिलने लगता है, उसके लिए यह जगत अपनी सत्ता ईश्वर रूप में रखता है. संत कह रहे हैं कि ‘तुलसी’ प्रभु को प्रिय है. तुलसी तथा निंब इन दोनों का औषधि रूप में भी महत्व होता है. बगीचे में आंवले के वृक्ष के नीचे एक क्यारी बनवाई है, उसमें फूल लगाने हैं. आज शेष फूलों के बीज भी डालने हैं. कल बालों में मेहँदी लगाई थी एक महीने बाद, अब लगता है दो हफ्तों के अन्तराल पर ही लगानी होगी.

पिछले दो दिन फिर कुछ नहीं लिखा, इसे प्रमाद भी कह सकते हैं और अति व्यस्तता भी. उपन्यास पढ़ने को एक साधक की दृष्टि में प्रमाद ही कहा जायेगा. john की जिंदगी के बारे में पढ़कर इतना ज्ञान हुआ कि यह जीवन क्षणिक है, इतना ज्ञान तो शास्त्रों के अध्ययन से भी होता है. मन को जहाँ साधक खत्म करता जाता है वहाँ उसकी आत्मा मुखर होती जाती है पर उसने आत्मा को दबाकर मन को सुख देने के लिए ही उपन्यास में इतना समय लगाया, खैर जो हो चुका है वह हो चुका. कल सत्संग भी ठीक-ठाक हो गया. उन्होंने aol के लिए कुछ योगदान भी दिया, इतने बड़े यज्ञ में उनकी छोटी सी आहूति. कल चने व सूजी का हलवा खाया सो आज पेट में कुछ हलचल है. आज सुबह से वक्त का पूरा उपयोग किया है, लेकिन सारे कार्य तो शरीर के स्वास्थ्य और मन की शुद्धि के लिए ही हुए. सेवा का तो कोई कार्य नहीं हुआ, अभी दिन शेष है, जो भी सम्मुख आएगा, सहर्ष उसे ग्रहण करना है. आज बड़ी ननद की छोटी बेटी का जन्मदिन है, उसे फोन करना सुबह वे भूल गये. परमेश्वर को सुबह याद किया उठते ही तो पवनपुत्र हनुमान का स्मरण हो आया. उनकी कृपा से सुबह-सुबह समुद्र तट पर बैठे श्रीराम के दर्शन हुए. कैसी अद्भुत घटना है यह, उनके भीतर ही सभी कुछ है, उस दिन नदी, पानी, रस्ते सब इतने स्पष्ट दिख रहे थे !


आज सुबह चार बजे से पूर्व ही उठ गयी थी. मन था कि विचारों से मुक्त ही नहीं हो रहा था. नींद में भी उसे पता चलता रहता है कि मन खाली है या विचार चल रहे हैं. कुछ देर ध्यान का प्रयास किया पर कोई बेचैनी थी भीतर. जब तक मन सारी चेष्टाएँ त्याग नहीं देता तब तक निर्विचार नहीं हो सकता. हर चेष्टा एक न एक विचार को जन्म देती है. उन्हें तो सब छोड़कर मात्र साक्षी भाव में जीना है. एक बार यदि साक्षी भाव में आ गये तो सारी चेष्टाएँ होती भी रहें बाधक नहीं होंगी, बाधा तभी आती है जब मन स्वयं सभी कुछ करना चाहता है. ‘कीत्या न होई, थाप्या न जाई आपे आप सुरंजन सोई’ ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव ही करना है, कहीं से लाना नहीं है. वह करने से नहीं, न करने से प्रकट होता है. बाद में क्रिया के बाद मन खाली हो गया. क्रिया के दौरान भी कई बार भटका, पर बोध रहा. संगीत अभ्यास के समय मन एक पुलक से भरा हुआ था जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, वे चाहें तो तत्क्षण उन्हें पा सकते हैं. मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोया रहता है और जो निधि सहज ही पा सकता है जन्मभर उससे वंचित ही रह जाता है. सद्गुरु का आना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है, वे सुख स्वरूप परमात्मा को पहचानने लगते हैं !         

Monday, February 2, 2015

रवीन्द्र जैन का संगीत


मार्च महीने का आरम्भ ! आज फूलों के बीज एकत्र किये, अगले वर्ष इन्हीं बीजों को अक्टूबर में बोया जायेगा और जनवरी-फरवरी में खिलकर फिर नये बीज...इसी तरह जीवन का क्रम भी चलता रहता है. आज सुबह वे जल्दी उठे, नन्हा भी, सुबह-सुबह क्रिया करके तन-मन दोनों खिल उठते हैं. सद्गुरु की उन पर बहुत बड़ी कृपा है. उसने भागवद् का नवम स्कन्ध पढ़ना शुरू कर दिया है, वामन भगवान की कथा बहुत मधुर है. सुबह गुरुमाँ ने बताया, जिस प्रकार स्वप्न में मन का ही विस्तार होता है, वैसे ही यह जगत ईश्वर के मन का विस्तार है, उसकी लीला है, उसकी माया है, इसे खेल समझ कर ही देखना चाहिए, स्वप्नवत् ही जानना चाहिए. तब यह जगत दुखों का घर नहीं लगता बल्कि क्रीड़ा स्थली लगता है. किसी ने पूछा कि जब वह कष्ट में होते हैं तब ईश्वर की आराधना नहीं हो पाती, उसका बखूबी उत्तर दिया, उनके मुखड़े पे एक अनोखा तेज दिखायी देता है. शायद उसकी दृष्टि ही बदल गयी है. ईश्वर से सम्बन्ध के बाद ही उनके भक्तों की मस्ती का रहस्य समझ में आता है. कृष्ण को अपने अंतर में देखने के बाद कोई भौतिक कष्ट उस तरह प्रभावित नहीं कर सकता, लेकिन उस रात सरदर्द के कारण वह कृष्ण से शिकायत तो कर रही थी. जीवन में सुख-दुःख, मान-अपमान तो तभी तक है जब तक द्वैत भाव बना है. जब कोई यह जान ले कि वह उसी परमात्मा का अंश है, जिसने अपनी चितवन मात्र इस सृष्टि की रचना कर दी है तो अपने सामर्थ्य पर गर्व होता है !

टीवी पर ‘हैलो डीडी’ आ रहा है, जिसमें गीतकार, संगीतकार रवीन्द्र जैन जी प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं. वह साधना के महत्व को बता रहे हैं, इन्होंने अनेक फिल्मों में गीत और संगीत दिया है. रामायण आदि कई धारावाहिकों में भी संगीत दिया है. यह अपना आदर्श रवीन्द्रनाथ टैगोर जी को मानते हैं. बहुत दिनों बाद एक अच्छा कार्यक्रम देखने का मौका मिला है. उन्होंने कहा, “हम कॉमन रहें तो अपने आप अनकॉमन हो जाते हैं” ‘विश्वास अपने आपपर हो तो सफलता अवश्य मिलेगी’. उनकी आंखें नहीं हैं पर उनके मन की हजार आँखें हैं, वह इतने सुंदर गीत जो लिखते हैं, शेर लिखते हैं और सभी धर्मों को समान आदर देते हैं. चितचोर भी उन्हीं की फिल्म थी. कितने प्रभावशाली लोग फिल्म इंडस्ट्री में हैं तभी तो दशकों से इतना अच्छा गीत-संगीत देशवासियों को मिलता आ रहा है. अभी-अभी जून ने फोन किया दिगबोई से, नन्हा परीक्षा दे रहा होगा, यकीनन उसका एक्जाम अच्छा होगा. सुबह जून और नन्हे के जाने के बाद वह कुछ देर के लिए बाहर ही टहलती रही, एक सखी ने बहुत बार बुलाया था सो वहाँ चली गयी, चाय पिलाई उसने और अपने अस्त-व्यस्त घर व अस्त-व्यस्त जिन्दगी की दास्तान सुनाई, लौटी तो व्यायाम किया फिर टीवी ऑन किया और रवीन्द्र जैन जी से मुलाकात का मौका मिला जो सदा याद रहेगी. साढ़े ग्यारह हो चके हैं, टीवी पर गुजरात में हुई ताजा हिंसा के समाचार आ रहे हैं जो देखे नहीं जाते, लोगों की अक्ल पर पत्थर पड़ जाते हैं जो ऐसी हरकतों पर उतर आते हैं. कल भागवद का नवम स्कन्ध भी पढ़ लिया. कल बहुत दिनों बाद एक कविता लिखी !

आज सुबह सुबह जून ने हिंदी लाइब्रेरी से भागवद का दशम स्कन्ध तथा द्वादश स्कन्ध लेकर भिजवा दिया है. कल रात भर हुई वर्षा से मौसम ठंडा हो गया है और चारों दिशाएं भीगी-भीगी सी लग रही हैं. मन प्रभु प्रेम में आकंठ डूबा है, ऐसे में देहात्म बुद्धि का अपने आप क्षरण हो जाता है, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व्दों से परे मन निर्विकल्प समाधि में स्थित रहता है ! आज बाबाजी ने गांधीजी के बारे में बताया और फिर वे रमन महर्षि के बाल्यकाल में देखे उस स्वप्न की बात बताने लगे जिसमें उन्होंने अपनी मृत्यी देखी थी. राजा जनक ने एक स्वप्न में देखा कि उनका राज्य छीन गया और वह भोजन के लिएय भटक रहे हैं. दोनों ने सोचा कि जो स्वप्न देख रहा था और जो जागृत अवस्था को देख रहा है वह कौन है और दोनों में से क्या सच था ? यह जिज्ञासा ही उन्हें आत्म साक्षात्कार तक ले गयी. ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ जितनी तीव्र यह जिज्ञासा किसी में होगी उतना शीघ्र उन्हें भगवद ज्ञान की प्राप्ति होगी लेकिन वे ईश्वर को याद करते हैं तो सुख की कामना के लिए, वे चाहते हैं उनका जीवन कष्टों से मुक्त रहे, वे ईश्वर को चाहते ही कहाँ हैं? वे तो सुख-सुविधाओं के आकांक्षी हैं फिर यदि ईश्वर उनसे दूर है तो इसमें क्या आश्चर्य है, लेकिन ईश्वर इतना दयालु है कि उनकी कृतघ्नता से वह अप्रसन्न नहीं होता, उनका साथ नहीं छोड़ता, हृदय में सदा विराजमान रहता है. आत्मा स्वयं को उनमें देखने के बजाय मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में देखती है और सुख-दुःख का अनुभव करती है. जिस दिन वह मुड़ कर स्वयं को परमात्मा के दर्पण में देखती है तो सब कुछ बदल जता है ..  यह ज्ञान ही उन्हें मुक्त करता है !

   

Monday, December 15, 2014

गीता का गीत


नन्हा विज्ञान पढ़ने गया है. उसने ‘इंडिया टुडे’ में दिली के एक चूड़ीवाले के बारे में रोचक लेख पढ़ा .पढ़ते-पढ़ते ही पता नहीं कब आँख लग गयी और स्वप्न में एक नन्हे बच्चे की गार्गलिंग जैसी ध्वनि सुनी, आवाज इतनी वास्तविक थी कि वह झट उठ गयी. चाय पीकर तरोताजा हुई और स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक का अध्ययन शुरू किया, जो उसे बहुत भाती है. संगीता अध्यापिका फिर चली गयी हैं, सो अभ्यास नहीं हो रहा. हर क्षेत्र में गुरू की आवश्यकता है. आज शाम को क्लब में मीटिंग है, वह कुछ देर ध्यान करने के बाद ही जाएगी. पहली तारीख से एक और कोर्स आरम्भ हो रहा है, पुराने प्रतिभागी भी जा सकते हैं. वे जायेंगे. पिछले महीने के अंतिम दिन ही उसे वह अनुभव हुआ था जिसने उसके जीवन को बदल दिया है.

आज ध्यान में अद्भुत शांति का अनुभव हुआ. मन की आँखों से कई अद्भुत रंग देखे. भीतर से एक ध्वनि भी आती प्रकट हुई पहले तो थोड़ा सा डर लगा पर बाद में सुनने में भली लग रही थी. अब ध्यान के लिए बैठने पर मन शीघ्र एकाग्र हो जाता है. सुबह वे उठे तो तेज हवा चल रही थी, देखते-देखते तेज वर्षा होने लगी. नन्हे को स्कूल जाना था पर नहीं गया. आज से उसके स्कूल में ‘स्पोर्ट्स मीट’ शुरू हुई है. उसे बहनों को पत्र लिखने हैं पर उस क्षण की प्रतीक्षा है जब सहज स्फुरणा होगी और कलम खुदबखुद चलने लगेगी.

कल रात जब उन्होंने गेट पर ताला लगा दिया था तो केन्द्रीय विद्यालय की अध्यापिकाएं आयी थीं फिर वे पड़ोसिन के यहाँ गयीं और वहाँ से फोन किया, पर उन्होंने फोन भी स्टैंड पर रख दिया था जो इस कमरे से दूर होने के कारण सुनाई नहीं दिया, कुल मिलाकर उनसे मुलाकत होनी नहीं बदी थी सो नहीं हुई. यूँ भी बिना इत्तला किया किसी के यहाँ इतनी देर से जाना ठीक तो नहीं है. खैर, सुबह पड़ोसिन ने ये सारी बातें फोन पर बतायीं तो नन्हे के हाथ से वह पत्र मंगवाया जो वे देने आयी थीं. कल दोपहर को कार्यक्रम है.

आज सुबह प्रवृत्ति तामसिक थी, बिस्तर छोड़ने में थोडा विलम्ब किया फिर ध्यान भी कहाँ गहन होने वाला था. कल शाम को जून के मजाक पर झुंझलाई और उससे पूर्व बातचीत में परचर्चा की. नये संगीत अध्यापक मिले हैं, अगले हफ्ते फिर जाना है. संगीत की शिक्षा मानव को ऊपर उठाती है और उसे तो उस पथ पर ही अब आगे बढ़ना है.

अक्तूबर का आरम्भ हो गया है. ‘जागरण’ में कृष्ण की गीता से आये अमृत वचन सुने तो अंतर में आह्लाद हुआ. ईश्वर महान है विभु है पर भक्त के छोटे से उर में समा सकता है. उसके दिव्य प्रेम का अनुभव ही साधक को बदल देता है. वही ज्योति बनकर चैतन्य रूप में मानव के भीतर है. वह मित्र भी है और किसी की पुकार को अनसुना कर ही नहीं सकता. ध्यान में तुष्टि बनकर वही तो साधक को प्रेरित करता है. कल शाम जून की लायी एक पुस्तक पढ़ती रही. शाम को एक सखी के यहाँ से भी श्री श्री की भी दो पुस्तकें लायी. उनकी कृपा है जो आनंद के स्रोत का पता बताया है. खबरों में सुना था, विमान दुर्घटना में श्री माधवराव सिंधिया की मृत्यु हो गयी. जीवन कितना क्षणिक है. अगले पल का भी भरोसा नहीं है. कल श्रीनगर में आतंकवादी हमले में इक्कतीस लोग मारे गये, कौन कब किस वक्त इस धरती से उठ जायेगा कौन कह सकता है सो जितना उनका जीवन है, वे पल-पल उल्लास पूर्वक जीयें, उस की याद में जीयें जो उनका पालक है, उन्हें चाहता है. आज उसने योग शिक्षक को अपने अनुभव बताये तो उन्होंने कहा, अच्छा है, पर इसे बहुत महत्व नहीं देना है. अहंकार को पोषने वाली हर शै से दूर रहना है. जिनमें उस की स्मृति बनी रहे वही क्षण मुक्ति के होते हैं शेष तो बंधन में डालने वाले ही हैं !





Thursday, December 11, 2014

यात्रा का आरम्भ


आज की सुबह की शुरुआत सामान्य हुई, सुबह ही संगीत कक्षा में जाना था. लौटी तो साधना शुरू की, दो फोन आये, बीच में उठकर जाना पड़ा. अब उन्होंने तय किया है शनिवार को शाम चार बजे वे साधना करेंगे, जैसे इतवार को वे दो मित्रों के साथ करते हैं. अज सुना था, जिसका प्रत्येक कर्म ईश्वर को समर्पित है, वह हर क्षण उससे जुड़ा है लेकिन उनका हर कर्म प्रभु के लिए कहाँ हो पाता है, अपनी ख़ुशी के ही लिए वे कर्म करते हैं. उसे लगता है, उसके फल की प्राप्ति में सम रहना ही कर्म ईश्वर को अर्पित करना है. मानव को अपनी अयोग्यता के विषय में ज्ञान उतना नहीं होता जितना योग्यता के बारे में वह सचेत रहता है, बल्कि वास्तविकता से कहीं ज्यादा ही सोचता है. अपने अवगुणों के प्रति सजग रहना ही उन्हें निकालने की ओर पहला कदम है. सही-गलत व उचित-अनुचित का भेद करना इतना सहज नहीं है लेकिन धर्म का तत्व तर्क-वितर्क करके प्राप्त नहीं किया जा सकता. यह तो महापुरुषों का अनुसरण करने से ही मिलता है.

आज उपवास का दिन है, यह विचार स्वास्थ्य की दृष्टि से ही उसे आया था पर इस समय लग रहा है ईश्वर ने ही उसे यह प्रेरणा दी होगी. वैसे भी कोई भी कार्य अकारण नहीं होता, अदृष्ट का हाथ तो इसमें रहता ही है. टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है, जनक राजा होते हुए भी विदेह भाव में रहते थे, उनको छूकर गयी हवा ने पीड़ितों के दुखों को कम कर दिया तो वे नर्क में आकर रहने को भी तैयार हो गये. लोक कल्याण की भावना की पराकाष्ठा थी यह, उन्हें भी अपने जीवन में पहले स्वयं को उन्नत करना है फिर अपनी शक्ति का उपयोग अपने इर्दगिर्द की उन्नति में लगाना है. परसों उसकी यात्रा का शुभारम्भ है, तीन दिनों की यह यात्रा सम्भवतः उसके जीवन में एक सुखद मोड़ साबित होगी !

“मानव जन्म सर्वोत्तम है, मानव ऊँचाई के शिखर पर पहुंच सकता है. मानव ही ब्रह्म को जान सकता है. वह अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, वह ज्योतियों की ज्योति है. वह अज्ञान के अंधकार से दूर जा सकता है. जो उसका आत्मा है वह सुख के केंद्र है मानव आसुरी तथा दैवीय अंश का सम्मिश्रण है. जब कोई आत्मा के निकटतर होता है, दैवीय अंश उसमें प्रमुख रूप से प्रकट होता है”. आज उपरोक्त बातें ‘जागरण’ में सुनीं. इस समय दोपहर के पौने तीन बजे हैं, उसकी तैयारी सम्पन्न हो चुकी है. एक बैग तथा एक छोटी से अटैची. मन में उत्साह है, यात्रा का उद्देश्य बहुत पवित्र है. सद्गुरु के दर्शन होंगे, सद्गुरु जो ईश्वर का प्रतिनिधि है. आजकल ध्यान में अति आनंद आता है, मन अद्भुत शांति से भर जाता है. अगले तीन दिन यह डायरी उसके पास नहीं रहेगी लेकिन दूसरी छोटी डायरी में गोहाटी के अनुभव जरूर लिखेगी. शाम को एक मित्र परिवार आएगा, उनका नया बुककेस देखने. बैठक में थोड़े फूल लगाने हैं और नाश्ता तैयार करना है. शाम को किसी वक्त एक और सखी का फोन भी आएगा. कल नन्हे की अंतिम  परीक्षा थी. उनका कम्प्यूटर अपने आप ही ठीक हो गया जैसे उस दिन खराब हुआ था. ईश्वर उसकी पुकार सुनते हैं.  



Tuesday, December 9, 2014

पानी बिच मीन पियासी


अहंकार हिंसक पशु से भी अधिक भयावह है, जो मानव को संसार रूपी जंगल में भटका सकता है तो अहंकार से मुक्ति पानी होगी. इस बात का भी अहम् ठीक नहीं कि  ईश्वर ने उस पर विशेष कृपा की है. कल रात ससुराल व मायका दोनों जगह सभी से बात की. छोटी बहन फिर किसी पारिवारिक बात से परेशान है. सुबह संगीत की कक्षा में गयी, अभी कुछ देर पूर्व ही लौटी है, वहाँ भी अहंकार की भावना आ रही थी कि उसकी आवाज थोड़ी मधुर हो गयी है पहले से. ईश्वर की कृपा से ही यह सम्भव हुआ है. अब से हर पल सचेत रहना होगा. कल एक योगी की आत्मकथा पुनः पढ़नी आरम्भ की है, रस आ रहा है. जीवन में रस न हो तो क्या जीना. जून ने कहा उसके जीवन में दैवीय शक्ति का प्रवेश हुआ दीखता है. कल सुमित्रानंदन पन्त की किताब ‘कला और बूढ़ा चाँद’ पढ़ी. उन्हें भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ था. उनका आनंद भी अपरिमित था. उन्हें भी प्रेम व शांति की वैसी ही अनुभूति हुई थी.

आत्मसाक्षात्कार  का अर्थ है, आत्मा को जानना, आत्मा को जानने की क्रिया दो प्रकार से वर्णित की गयी है, एक ज्ञान योग दूसरा भक्ति योग. आत्मसाक्षात्कार ही जीवन का ध्येय है. गुरू को आत्मसमर्पण करने पर परमात्मा उस जीव को शरण में ले लेते हैं. कृष्ण को समर्पित करके यदि सभी कार्य करें तो कार्य पूजा हो जाती है. कल शाम एक मित्र के यहाँ गये. प्राणायाम आदि किया फिर चाय नाश्ता और फिर जो उपस्थित नहीं थे उनकी चर्चा की, जो बेहद बुरी आदत है. अच्छी-भली शाम का बेढंगा सा अंत कर लिया. जून को रात को नींद नहीं आई, उसे एक परेशान करने वाला सपना कि जो भोजन उन्हें मिला है, उसमें रोटियों में बाल हैं. खैर, सुबह सामान्य रही. वह अपना ध्यान भी कर पायी, पर मन में जो हर वक्त छलकता हुआ सा प्रेम, शांति और आनंद का स्रोत था वह जाने कहाँ सूखता जा रहा है. वह है तो उसके ही अंदर, उस दिन वह उजागर हो गया था और कुछ दिन उसे भिगोता रहा पर अब वह उसे इस तरह छोड़कर नहीं जा सकता. उसे अपने भीतर से निकाल लाना ही आत्मसाक्षात्कार है. इसमें सहायक होगी उसकी अपनी सजगता, हृदय का प्रेम और वाणी की मधुरता. यदि गोहाटी जाने का अवसर मिला तो एक बार पुनः मन, प्राण ज्योति से भर उठेगा. आज से नन्हे की परीक्षाएं हैं. इस बार वह शांत है, पता नहीं यह शांति किस बात का प्रतीक है. यह तो समय ही बतायेगा.

अभ्यास में और गहराई में उतरना होगा, तभी अनुभव होगा. आज ही निर्वासनिक होना होगा. जीवन अभी है. शरीर आज है कल नहीं रहेगा, जो रहेगा वह वही होगा, उसी का अंश होगा. इस समय मन में क्या चल रहा है, इसका पता पल पल चलता रहे सुख का केंद्र परमात्मा भीतर है. उसी से जुड़ना है, यह जुड़ाव यदि कायम रहे तो दुनिया की कोई वस्तु मिले या न मिले कोई अंतर नहीं पड़ता, तब सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है. मानव के पास श्रद्धा, ज्ञान और योग की कला है. श्रद्धा के बना मनुष्य यंत्र के समान हो जाता है. श्रद्धा के साथ साथ उत्साही और संयमी होना ही ज्ञान के पथ पर ले जाता है. जीवात्मा स्वयं को परमात्मा से जोड़ सकता है. अव्यक्त को व्यक्त करने की शक्ति मनुष्य में ही है. कबीर ने कहा है कि “मोहे सुन सुन आवे हांसी, पानी विच मीन प्यासी”   


Sunday, November 16, 2014

रेगिस्तान का एकांत


उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है, जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है ! यह निद्रा अज्ञान की है जिससे जितनी शीघ्र जागे उतना ही अच्छा. हृदय में शुद्ध प्रेम जगे तभी यह अज्ञान मिटता है और अज्ञान मिटे तो प्रेम अपने आप उपजता है ! वस्तुओं या व्यक्तियों में यदि आसक्ति हो तो शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी आसक्ति का नाश नहीं होता, प्राप्ति होने पर बल का नाश होता है, न मिलने पर दुःख होता है. ऐसा कोई सुख भोग नहीं जिसके पीछे भय-रोग नहीं ! सुख और मान लेने की वस्तु है ही नहीं देने की वस्तु है. किन्तु यही आसक्ति यदि सत्पुरुषों और सद्विचारों के प्रति हो तो यह कटती है और धीरे-धीरे शुद्ध प्रेम में बदल जाती है. परमात्मा में विश्वास ही उसमें आसक्ति है और उसकी प्राप्ति ही अंतर में जगा शुद्ध प्रेम है. शुद्ध प्रेम मुक्त रखता है, मुक्त होता है. आज बाबाजी प्रवचन देते-देते मौन हो गये, ईश्वर की असीम करुणा का वर्णन करते हुए कहा जो भी विपत्तियाँ ईश्वर देता है वह नश्वर से शाश्वत की तरफ मोड़ने के लिए ही देता है, अपने भीतर की शक्ति को पहचानने के लिए ही देता है. कल दोपहर उसकी आँख लग गयी, एक भव्य मकान में घूम रही थी, पर वे उसमें किराये पर रहते हैं. आलीशान संगमरमर का मकान है जो कई भागों में बंटा है, पहले भी कई बार इसी तरह का स्वप्न देख चुकी है. सीढ़ियों से नीचे उतरने के कई रास्ते हैं, वह सदा भूल जाती है, कौन सा रास्ता उनके घर की तरफ ले जाता है. कल ‘सरसों’ वाले आलू बनाये, आज भी एक नई डिश बनानी है, ‘तोरई’ की जिसकी रेसिपी जून इंटरनेट से लाये हैं. कल शाम एक सखी ने ढेर सारे नींबू भिजवाये, दो सखियों से फोन पर बात की अच्छा लगा, एक के लिए आम तोड़े, अभी भिजवाने हैं.

आज बहुत दिनों के बाद सम्भवतः एक वर्ष के बाद वह संगीत अध्यापिका के घर गयी, सचमुच गुरू की बेहद-बेहद आवश्यकता है. सुबह-सुबह जागरण में भी बाबाजी गुरू की आवश्यकता पर बल देते हैं. आज अमृत कलश में एक पत्रकार, जो मुस्लिम थे पर जिनकी भाषा शुद्ध हिंदी थी, को सुना. बहुत सी नई बातों का इल्म हुआ. रेगिस्तान में पनपे धर्मों का रूप वहाँ की भौगोलोक स्थिति की देन है और नदियों के किनारे पनपे धर्मों का रूप जुदा है. यहाँ लकड़ी की बहुतायत थी सो लोग मृतक के शरीर को जलाने लगे और रेगिस्तान में मीलों तक फैली जमीन थी एक तिनके का भी पता नहीं मिलता था सो दफनाने लगे. धीरे-धीरे वह धर्म का रूप लेता गया और कट्टरवाद को जन्म मिला. भौगोलिक और ऐतिहासिक जरूरतों की वजह से पनपा धर्म बंधन बनकर इन्सान के पैरों में लिपट गया. कल्चर और संस्कृति का भेद भी उन्होंने स्पष्ट किया.


सत्ता एक की है, जैसे आकाश एक है, घड़े अनेक हैं ! यह ज्ञान नहीं है इसलिए भेद दिखता है. जैसे कमरे में समान पड़ा हो, अँधेरे में वहाँ जाने पर टकराने की सम्भावना रहती ही है, इसी तरह हृदय में अज्ञान का अंधकार हो तो कुछ स्पष्ट नहीं दीखता, ठोकरें ही मिलती हैं. ईर्ष्या, जलन, डाह, हीन भावना ये सभी ठोकरें ही तो हैं. ज्ञान हो तो इनमें से एक की भी सत्ता नहीं रहेगी. इस जगत में न जाने कितने जीव वास करते हैं. इसकी गति को सिवाय ईश्वर के और कोई नहीं जान सकता. सुबह उठी तो रात्रि में देखा कोई स्वप्न याद नहीं था पर देखे थे इतना याद था. जैसे स्वप्न में सब सत्य प्रतीत होता है लेकिन होता वहाँ कुछ भी नहीं है, उसी तरह यह संसार भी स्वप्नवत् है. कल जो था  वह आज नहीं है, आज जो होने वाला है कल नहीं रहेगा. जीवन का क्रम यूँही चलता चला जायेगा. दीदी व छोटे भाई का मेल आया है. सुबह बड़ी ननद से बात की, आज एक सखी आने वाली है पता चला है उनकी ट्रेन लेट है. आज गोयनका जी भी आये थे, बड़ी सरल भाषा में विपासना की विधि समझाते चलते हैं, देह एक पाँचों तत्वों को किस तरह अनुभूति के स्तर पर जाना जा सकता है, आज बताया. उनकी बातें वैज्ञानिक होती हैं और बाबाजी की भक्तिभाव से परिपूर्ण !   

Friday, September 5, 2014

कोहरे का जाल


आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. उस दिन जून उसे छोड़ने एयरपोर्ट गये थे. वह दिल्ली पहुंच गयी थी शाम साढ़े सात बजे, घर पहुंचते नौ बज गये. अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे ही भाई के साथ टैक्सी स्टैंड गयी. कोहरा घना था और स्टेशन तक के रास्ते में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, लग रहा था कोई स्वप्न चल रहा है. उड़ान के दौरान भी और ट्रेन में भी सारा वक्त मन में एक वही ख्याल मंडरा रहा था. कोहरे के कारण उनकी ट्रेन बहुत रुक-रुक कर चल रही थी. दोपहर बाद वे गन्तव्य पहुंचे, मंझला भाई लेने आया था पर उसकी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया, भागदौड़ में उसे भरवाने का वक्त ही नहीं मिला था, बस से वे अस्पताल पहुंचे. जहाँ शेष सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. थोड़ी देर में ही अस्पताल गयी, उनको ऑक्सीजन दी जा रही थी और भी कई नलियां उनके विभिन्न अंगों से जुडी थीं, देखकर उसकी आँखें भर आयीं. वह उसे देखकर पहले तो खुश हो गयी थीं, जिसे उन्होंने ताली बजकर भी दर्शाया पर उसके आँसूं देखकर दुखी हो गयीं. वह बोल नहीं सकती थीं. उन्हें इतनी पीड़ा सहते देख सभी दुखी हैं पर कोई कुछ नहीं कर सकता. उसके बाद वह चार दिन वहाँ और रही. एक बार माँ ने उसका लिखा संदेश पढ़ा और आशीर्वाद भी दिया. लिखना भी चाहा पर इस बार उनकी लिखाई ठीक नहीं रह गयी थी. एक दिन बाद वह वापस दिल्ली आ गयी और अगले दिन असम, जहाँ जून और नन्हा उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

कल रात भर उसे वही स्वप्न आते रहे. ऑक्सीजन, हीमोग्लोबिन, ICU, और डॉक्टर, अस्पताल शब्द कानों में गूँजते रहे. एक बार माँ को बोलते हुए भी सुना. वह ठीक होकर आ गयी हैं और किसी बारे में पिता के सवाल का जवाब दे रही हैं. कल शाम वे लाइब्रेरी भी गये और माँ की बीमारी पर जानकारी हासिल की. उन्होंने बहुत कष्ट सहा है इस रोग के कारण. ईश्वर ही अब उनका सहायक है. उसका सिर भारी है, मस्तक के दोनों ओर की नसें तन गयी हैं. कल शाम को जून को तनावमुक्त रहने का उपदेश दे रही थी पर स्वयं तनावमुक्त रहना कितना मुश्किल है. आज सुबह सुना विजयाराजे सिंधिया तेईस दिन ICU में रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं तो दिल धक से रह गया. माँ को भी अस्पताल में दो हफ्ते हो गये हैं. अभी-अभी छोटी बहन को फोन किया, शायद वह व्यस्त थी, फोन नहीं उठाया. जून भी उसे उदास देखकर परेशान हो गये हैं. उसे स्वयं को सामान्य रखने का प्रयास करना चाहिए, जिस बात पर उनका कोई वश नहीं है उसके बारे में चिन्तन करते रहने से क्या लाभ ? आज से संगीत का अभ्यास शुरू करेगी, मन को व्यस्त रखने से ही वह शांत रहेगा. सबसे बड़ा दुख संसार में है इच्छा, इच्छा पूरी हो जाये तो दूसरी उत्पन्न होगी, पूरी न हो तो दुःख देगी.

“कबिरा सब ते हम बुरे हम तज भलो सब कोई
जिन ऐसा करि देखिया मीत हमारा सोई”

मन को जितना धोते हैं उतना पता चलता है कि मैल की कितनी परतें चढ़ी हैं.


Friday, August 29, 2014

गेंदे की क्यारी


कल शाम वह नैनी पर झुंझलाई और आज सुबह स्वीपर पर, दोनों अपने काम को टालने का प्रयत्न कर रहे थे. कभी-कभी ऊपर से क्रोध करना जरूरी हो जाता है, पर क्या वास्तव में सिर्फ ऊपर से ही क्रोध कर रही थी? इसका एक प्रमाण तो यह है कि अगले ही पल मन शांत था जबकि पहले देर तक असर रहता था. पूसी ने अपने बच्चों को बाहर खुले में ही रख छोड़ा है, जून का विचार है कि उन्हें प्राकृतिक रूप से पलने-बढ़ने दिया जाये, उसका भी यही विचार है, उस दिन उनके लिए दफ्ती के डिब्बे का घर बनाते-बनाते स्वयं को रोक लिया. आज भी धूप निकली है पर हवा बह रही है वह बाहर लॉन में ही बैठी है. दूर से किसी वाहन की आवाज आ रही है. कभी संगीत की और पंछियों की आवाजें भी ध्यान से सुनने पर आती हैं. कल शाम की पार्टी में पता चला कि ग्रेटर नोएडा में अपना घर बनाने के लिए जो सोसायटी बनाई गयी है उसमें ज्यादातर लोग रहने के लिए नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट के लिए पैसा लगा रहे हैं. जून भी कल की मीटिंग से ज्यादा खुश नहीं थे. पहली किश्त भरने के लिए उन्होंने पहले मकान के किराये के जमा हुए पैसे मंगाए हैं. सबकी बातें सुनकर तो उसे लगा कि एक बार और उन्हें भी सोच लेना चाहिए. रोज के कामों के आलावा आज उसे नन्हे का स्वेटर बनाना है, सुभाष चन्द्र बोस व शंकरदेव पर किताबें भी पढनी हैं. पत्रिकाएँ और अख़बार तो हैं ही. कविताओं वाली डायरी खोलनी है. बगीचे में भी कुछ समय देना है. कुल मिलाकर आज का दिन व्यस्त रहने वाला है.  

आज उसने जो सुना, उसका सार था, “साधना करने के लिए सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, श्रद्धा, भावना और विश्वास चाहिये, पुलक चाहिए, मन को पूरी तरह अहंकार से मुक्त करना होगा. भीतर डूबना आना चाहिए. ध्यानस्थ होना पड़ता है. अपने चित्त की सौम्यता को नष्ट नहीं होने देना चाहिए. मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भाव रखते हुए अपने चित्त को प्रसन्न रखना होगा. समय की धारा के साथ पुराने कर्मों का लेन-देन चलता रहता है. नये कर्मों का बंधन न बने यही प्रयास करना चाहिए.

कल वह गाने की प्रैक्टिस में नहीं जा सकी, आज साढ़े पांच बजे जाना है. परसों मीटिंग है. वह बाहर है गेंदे की क्यारी के पास, अभी एकाध फूल ही खिले हैं इसमें. आज सुबह माँ से फोन पर बात की. कल चचेरी बहन की शादी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. उसके मामा के परिवार ने काफी कुछ दिया. इधर उनकी तरफ से सभी का सहयोग रहा. यहाँ बाहर बैठकर चेहरे पर जो शीतल हवा छूकर जाती है, भली लगती है, उसका अहसास अंदर घर में नहीं हो सकता, पर तरह-तरह की आवाजें आती रहती हैं सो गम्भीर कार्य नहीं हो पाते. आज सुबह वह जल्दी उठी थी सो सभी कार्य समय से सम्पन्न हो चुके हैं. आजकल जून के प्रति उसका व्यवहार थोड़ा कम स्नेहपूर्ण रहता है. छोटी-छोटी बातों से चिढ़कर वह जवाब दे देती है. सहनशीलता खोती जा रही है या फिर अपनापन बढ़ता जा  रहा है. अब संगीत का समय है सो अंदर जाना चाहिए.

जीवन में ज्ञान और ध्यान हो तभी मुक्ति सम्भव है ! कल सुबह उसके दायें हाथ की अंगूठे के पास वाली अंगुली में जोड़ पर एक कांटा लग गया, बात छोटी सी है पर उसके मन ने उस हल्के दर्द को भी बड़ा मानकर देखा. नन्हे के हाथ का दर्द इससे कहीं ज्यादा रहा होगा लेकिन उसने संयम से सहा. इस वक्त सुबह के साढ़े सात बजे हैं वह टीवी पर  बाबाजी के आने की प्रतीक्षा में है.

“अपने मन. बुद्धि, विचार को देखने वाला इनसे अलग है, यदि इनसे जुडकर रहेंगे तो सही निर्णय नहीं कर पाएंगे. देह, मन बुद्धि के साथ जुड़कर कोई ‘स्वयं’ को खो देता है. इसका कारण तमो व रजो गुण है. यदि सात्विक गुण की प्रधानता हो तो धीरे-धीरे इन से मुक्त होना आयेगा. तमो गुण की प्रधानता का अर्थ है आलस्य व स्वार्थ और रजो गुण की प्रधानता का अर्थ है अपने मान-सम्मान की वृद्धि का सदा प्रयास करते रहना. देह की आवश्यकता सांसारिक वस्तुएं हैं, पर ‘स्वयं’ की आवश्यकता परमात्मा का स्वभाव है. ‘स्वयं’ को खोजना ही वास्तविक विज्ञान है. अंत में उन्होंने कहा एहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन भर प्रयास चलता रहता है पर स्वयं की आवश्यकता को नजर अंदाज कर दिया जाता है.