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Friday, January 31, 2020

तेनालीरामा का पुत्र


आज सुबह जब वे उठे तो वर्षा हो रही थी, रात्रि को ही आरम्भ हो गयी थी. ड्राइव वे पर ही छाता लेकर कुछ देर टहलते रहे, फिर योग कक्ष में आ गए. कल शाम वहां एक दर्जन योग साधिकाएं थीं, कमरा पूरी तरह से भर गया था, उसने सोचा कमरे के बाहर गैलरी में भी चटाई बिछा कर दो लोगों का स्थान बन सकता है. कल मुख्य सड़क से होकर ट्रेनर ने कार को बाजार की तरफ ले जाने को कहा. सड़क पर पानी भरा था, एक बार उसमें गाड़ी रुक गयी, उसे डिफेंसिव ड्राइविंग करने की जरूरत नहीं है, ऐसा ट्रेनर ने कहा, एक कंट्रोल उसके पास भी है. दोपहर को तीसरे गियर पर गाड़ी चलाई. लर्नर लाइसेंस  के लिए अगले महीने की डेट आयी है, एक परीक्षा देनी होगी डिब्रूगढ़ जाकर. उसने मॉक टेस्ट दिया, कुछ ही प्रश्नों के उत्तर नहीं आते थे. अभ्यास करते-करते आ जायेंगे जैसे एक दिन गाड़ी चलना अभ्यास में आ जायेगा. कुछ देर पहले जून के भूतपूर्व अधिकारी की पत्नी का फोन आया, अधिकारी का गॉल ब्लेडर का ऑपरेशन होना था, लेप्रोस्कोपी करते समय आंत में छिद्र हो गया, हालत बिगड़ने से ओपन सर्जरी करनी पड़ी, अभी भी एक प्रक्रिया शेष है. अभी छह हफ्ते और वहां रहना पड़ेगा .उनका परिवार वहां पहुँच गया है. कल मृणाल जयति के एक टीचर का फोन आया, वह भोजन के बाद आम खा रही थी, जून ने कह दिया दो बजे के बाद फोन करें.  बाद में पता चला उसके पिता का देहांत हो गया, कभी भी किसी के फोन को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए. भीतर का मौन खो नहीं सकता पर कभी-कभी विस्मृत हो जाता है. नन्हा अगले हफ्ते सिंगापुर जा रहा है, जून उसी दिन बंगलूरू से वापस आ रहे होंगे, वह इतवार को जा रहे हैं. 

टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है. जिसमें उसका पुत्र भी हो चुका है, जो अपने माता-पिता की बातों को सुन सकता है, उनका जवाब देता है. दर्शक सुन पाते हैं पर वे नहीं सुन पाते. आज योग कक्षा में एक साधिका अपनी माँ को भी लायी थी, उसकी बेटी आज नहीं आयी. शाम को एसी व पंख चलाने के बावजूद कमरे में काफी गर्मी थी, शायद कल पुनः वर्षा हो जाये. 

पौने नौ बजे हैं सुबह के, सफाई कर्मचारी नहीं आया है, कुछ देर पहले उसकी पत्नी आयी थी. ग्यारह वर्ष उनके विवाह को हो गए हैं. दो पुत्र हैं व एक पुत्री. दो पुत्र पहली पत्नी के हैं, जिसकी मृत्यु होने के बाद इनका विवाह हुआ. पांच बच्चों को संभालती है. पति की शिकायत कर रही थी, किसी के साथ चक्कर है, चार-चार दिनों तक घर नहीं आता है. वैसे घर में सब कुछ लेकर देता है, पर कौन पत्नी है जो पति को इस तरह देख सकती है. उसे हिम्मत दिलाने के लिए कुछ शब्द कहे. अपने मन को शांत करने के लिए पूजा करने को कहा तो कहने लगी वे लोग क्रिस्तान हैं. माथे पर लाल बिंदी, साड़ी, मांग में सिंदूर.. वह पूरी हिन्दू लग रही थी. कानपुर में मायका है. पति ने विवाह से पहले बताया भी नहीं कि धर्म परिवर्तन कर लिया है. उससे बात चल ही रही थी कि नैनी की सास भी अपना दुखड़ा लेकर आ गयी. घर के दोनों जवान बेटों ने कल रात नशा करके बहुत झगड़ा किया, दोनों ज्यादा नहीं कमाते पर नशा करने के लिए पैसे जुटा लेते हैं. घर का मुखिया कमाकर लाता है तो घर का खर्च चलता है. वह अपनी बात कहकर थोड़ा शांति प् लेती है, पहले उसकी बात सुनकर वह बेटों को समझाती थी, पर उस समय वादा करने के बाद वे कुछ दिनों बाद फिर वही करते हैं. अजीब गोरखधंधा है यह दुनिया, सुना है गोरखधंधा शब्द का जो अर्थ लगाया जाता है वह गलत है, अब इसका उपयोग नकारात्मक रूप में नहीं किया जा सकता। आज गर्मी बहुत ज्यादा है. सुबह टहल कर आये तो घर में बिजली नहीं थी, लॉन में बैठकर आसन व प्राणायाम किया. मोबाइल पर सदगुरू के मधुर वचन सुने. पहले उनकी आवाज में एक सहज भोलापन झलकता था, जब वे छोटे थे. अब उम्र के साथ-साथ एक परिपक्वता आ गयी है. इसी महीने गुरू पूर्णिमा भी है. 

Monday, April 1, 2019

सफेद बैंगन



एक लंबा अन्तराल ! इतने दिनों में याद भी नहीं आया कि डायरी लेखन भी करने की वस्तु है. पौने ग्यारह बजे हैं. आज हवा बंद है. एक अजीब सी गंध भी है चारों तरफ, कटहल पक रहे हैं, जामुन पक चुके हैं, पिछले कई दिनों से वर्षा हो रही है, पत्ते सड़ गये हैं, सभी की मिली-जुली गंध है. कुछ देर पहले एक व्यक्ति आया, पूछ रहा था, क्या कटहल बेचने हैं ? उसके पूर्व तीन किशोर बालक आये थे, जामुन तोड़ने. कह रहे थे, बाजार में बेचेंगे. सौ रूपये प्रति किलो बिक रहे हैं. उसे याद आया पिछले वर्ष मृणाल ज्योति के एक अध्यापिका ने कहा था, वहाँ के बच्चों को पका कटहल खिलाने के लिए. उसे फोन करके कहा, वे लोग ले जा सकते हैं. आज भी सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखाना है, पिछले मंगलवार को भी वे आयीं थीं. आज सुबह दांत के डाक्टर के पास गयी, फिलिंग कराने. अभी तक दांया गाल पूरी तरह से होश में नहीं आया है. अभी भी दांत में हल्का दर्द महसूस हो रहा है, शायद आरसीटी करनी पड़े भविष्य में. पित्त बढ़ गया है ऐसा लग रहा है. सबसे पहला लक्षण है आँख में जलन, शरीर में इरीटेशन जैसा कुछ. सिर में भारीपन और भी एकाध लक्षण. कल शाम को जामुन खाए, फिर मूंगफली. रात्रि भोजन में सरसों वाली अरबी. भोजन ही रोग का मुख्य कारण है. कल जून को भी जाना है डेंटिस्ट के पास.

नन्हे का जन्मदिन आने वाला है. जून ने उपहार तो पहले ही भेज दिया है उसे, उसके लिए कुछ लिखना है. दोपहर के भोजन के बाद जून को जल्दी जाना था, वह भी विश्राम करना टाल गयी, कम्प्यूटर पर लिखने के बाद सुस्ती भगाने के लिए एक कप चाय बनाकर पी है. आज ही जून ने कहा दफ्तर में अब वह ग्रीन टी ही लेते हैं. उसने उन्हें समर्थन दिया. कल शाम योग कक्षा में आने वाली महिलाओं ने कहा, उन्हें भी कटहल व जामुन चाहिए. माली से कह तुड़वाकर रखे हैं उसने. सुबह-सुबह नैनी बगीचे से ढेर सारी सब्जियाँ लायी, सफेद बैंगन भी और एक बड़ा सा कद्दू भी, सिंड्रेला की कहानी के लिए सारा सामान !

कल फिर कुछ नहीं लिखा. अब से सुबह ही लिखेगी. दिन भर के कार्यों की सूची भी बन जाएगी. आज घी बनाना है. मृणाल ज्योति के स्टाफ की लिस्ट बनानी है. तीन बजे वहाँ मीटिंग में जाना है, उनके वार्षिक अधिवेशन के लिए भी कविता लिखनी है. शिक्षक दिवस पर दिए जाने वाले उपहारों की सूची बनानी है. टीचर्स वर्कशॉप के लिए रूपरेखा बनानी है. आकाश पर बादल बने हैं, लग रहा है वर्षा कभी भी हो सकती है. कल गुरु पूर्णिमा है, वे सभी आर्ट ऑफ़ लिविंग केंद्र जायेंगे.

गुरू पूर्णिमा की स्मृतियाँ सुखद हैं. कल दोपहर भर गुरूजी के लिए लिखी गयी कविताएँ पढ़ीं और गीत गतिरूप की सहायता से उन्हें ठीक किया. शाम को सेंटर में गुरूपुजा में भाग लिया. ज्ञान के वचन सुने, ऐश्वर्य, बल, सुन्दरता, ज्ञान, कला तथा यश बढ़ाने की इच्छा जिनमें होती है, वे मन की क्षिप्त अवस्था वाले होते हैं. सत्व के साथ रज तथा तम भी उनमें समान मात्र में होते हैं, वे पुरुषार्थी होते हैं, पर उनका मन चंचल होता है. तमोगुण की अधिकता होने पर मन की मूढ़ अवस्था होती है. अधर्म, अज्ञान तथा अवैराग्य की तरफ व्यक्ति प्रवृत्त होगा. सत्व गुण की अधिकता होने पर मन एकाग्र अवस्था में होता है. जब साधक सत्व गुण के भी पार चला जाता है, तब समाधि अवस्था को प्राप्त होता है. उनके संचित कर्म बहुत ज्यादा हैं. उनमें से कुछ कर्मों का फल ही उन्हें इस जन्म में मिलता है. प्रारब्ध कर्म जब तक चलते हैं, तब तक जीवन है, जो नये कर्म वे करते हैं उन्हें क्रियमाण कर्म कहते हैं. उनके प्रति ही साधक को सदा सजग रहना है.

Thursday, May 26, 2016

शाही टोस्ट का नाश्ता


अभी कुछ देर पहले पिताजी का फोन आया, वह उसके सास-ससुर से बात करना चाहते थे. माँ लेटी थीं, उसे लगा सो रही हैं, पिताजी ने बात की तो वह भी जग गयीं और शिकायत करने लगीं कि उन्हें फोन क्यों नहीं दिया. उन्हें दुखी देखकर उसे अच्छा नहीं लगा फिरसे फोन लगाया. बाद में उसने सोचा तो पाया कि स्वयं को ही पीड़ा से बचाने के लिए उसने ऐसा किया न कि उन्हें सुख पहुँचाने के लिए. मन का स्वार्थ साफ-साफ दिख रहा था.

कल ‘गुरू पूर्णिमा’ थी, उन्होंने एओल सेंटर में सत्संग व ध्यान किया, प्रसाद बांटा और घर लौट आये. आज सुबह बैंगलोर आश्रम में हुए उत्सव का प्रसारण देखा. गुरूजी ने इस दिन की महिमा बताई फिर सबने झूम-झूम कर गीत गए ! प्रभु की कृपा से ही ऐसे आनन्द का अनुभव होता है. यदि कोई दिन भर बादशाह बनकर रहना चाहता है तो प्रभु के आगे समर्पण करना सीखना होगा. जो सहज ही उपलब्ध है उसके लिए याचना करनी पड़े इसमें कितना आश्चर्य है पर यह जीवन रहस्यों से भरा पड़ा है. भीतर के आनन्द का अनुभव अपने आप में एक रहस्य है, कहाँ से आता है ? उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं, केवल एक तृप्ति का अहसास होता है, इसे शब्दों में कहना बेहद कठिन है, कैसे होता है ? क्या होता है, कुछ कहा नहीं जा सकता.

नन्हे का जन्मदिन उन्होंने मनाया, उसके मित्र आये थे, दोनों एक रात रुके. कल की योग कक्षा में बच्चों को चित्र बनाने को कहा था. सुंदर रंगों को कागज पर उतारते बच्चे कितने प्रसन्न लग रहे थे. आज बहुत दिनों बाद पड़ोसिन से बात हुई, उसे दिल का एक पुराना रोग है उसके साथ टिशु डीजनरेट होने का रोग भी हो गया है. उसने कई बार कहा पर ध्यान आदि में उसकी रूचि नहीं है. टीवी पर  यदि वह सत्संग लगा दे तो माँ सुनती हैं, पिताजी बाहर बैठकर अखबार पढ़ते हैं, एक-एक लाइन पढ़ जाते हैं. उसके आस-पास उनके मित्रों व परिचितों में कोई भी ऐसा नहीं है जो परमात्मा के रस्ते जा रहा हो पूरे मन से. सभी व्यस्त हैं, जीवन के कार्य उन्हें इतनी फुर्सत ही नहीं देते, या मन ही मन सभी उसी पथ के राही हों, कौन जानता है ? सभी गुप्त साधना करते हो सकते हैं, परमात्मा के बिना किसी का भी गुजरा नहीं. वह परमात्मा हरेक के भीतर है, वही उन्हें निमन्त्रण देता होगा.

आज शाम को उनके यहाँ सत्संग है. भजन गाने पर कैसी मस्ती छा जाती है, पर जिसे उस मस्ती की खबर ही न हो वह कैसे उसे महसूस करेगा. कल शाम को एक सखी व उसकी भाभी को बुलाया है, जो कुछ दिनों के लिए आई है. शाही टोस्ट व इडली बनाएगी नूना. कल दीदी-जीजाजी से बात की, मन का बोझ जो था ही नहीं उतर गया. उस दिन कितना अजीब सा स्वप्न देखा था. मृत्यु के बाद का स्वप्न ! नरक के दर्शन किये, अपने पाप की सजा भोगी. उस दुःख को महसूस किया. वर्षों पहले जब वह अज्ञान से ग्रस्त थी, मन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था, क्योंकि उन्हें यात्रा पर जाना था, उन्होंने एक आत्मा को कितना दुःख दिया था. वे भूल ही गये इस घटना को जैसे यह उतनी ही तुच्छ हो जैसे कोई घर की गंदगी बाहर फेंक दे फिर भूल जाये. स्वप्न में एक कपड़े की गुड़िया दिखी बिना आँख-नाक की. इससे स्पष्ट क्या हो सकता है और अंत में यह कहते हुए रुदन कि यह यात्रा तो उन्हें बहुत मंहगी पड़ी जी ! कितना अजीब स्वप्न था पर कितना सत्य था. उनके कृत्यों का फल तो उन्हें ही मिलना है, चाहे जिस रूप में मिले. उन्हें उसे स्वीकारना ही होगा. 

Tuesday, September 1, 2015

पुनर्नवा


आज ‘गुरू पूर्णिमा’ है. सद्गुरु की कृपा का अनुभव उसे कल से ही हो रहा है. कल शाम को स्वयं ही मंत्रजाप होने लगा, आँखों से जल कृतज्ञता स्वरूप बहने लगा. सुबह क्रिया में अपने आप ही दर्शन होने लगे. मन कितने उच्च भावों में स्थित है. जीवन में सद्गुरु का आना एक विलक्षण घटना है. यदि उसके जीवन में यह न घटा होता तो कितना अधूरा होता यह जीवन ! गुरू नई जीवन दृष्टि देते हैं, असत से सत की ओर ले चलते हैं. साधना से समाधि की ओर ले चलते हैं. मन की बिखरी हुई ऊर्जा को एक दिशा प्रदान करते हैं. जब जीवन में यह प्रश्न जगता है कि आखिर यह जगत क्यों ? कहाँ से आया, और वे यहाँ क्यों हैं तो इन प्रश्नों का उत्तर सद्गुरु ही देते हैं. भीतर की सोयी चेतना को जगाकर वह सत्य स्वरूप से परिचय कराते हैं. साधक को जिस क्षण लगता है कि वह पूर्ण है, प्रेम का सोता फूट पड़ता है, भीतर सरसता छा जाती है तो बाहर भी उसकी तरावट का अहसास होता है. जीवन में एक गति, एक लय का जन्म होता है. गुरू तत्व यूँ तो हर तरफ फैला है पर साधक की उस तक पहुंच नहीं है, एक बार जब भीतर उसकी झलक मिल जाती है तो हर जगह उसका दर्शन होने लगता है. जीवन में कोई कमी रह जाये तो गुरू कदम-कदम पर मार्ग दर्शन करता है. वह पुरानी सारी मान्यताओं को छुड़ाकर नया बना देता है, ‘पुनर्नवा’..जो गुरूजी की एक पुस्तक का नाम भी है. भीतर जड़ता समाप्त हो जाती है, विवेक नया सा हो जाता है और प्रतिक्षण बढ़ता रहता है..आत्मा में रहकर ही यह सम्भव है, अहंकार तो जड़ है वह सिकुड़ना जानता है, मन रक्षात्मक है, आत्मा प्रेमात्मक  है !  

आज ध्यान में उसे अद्भुत अनुभव हुआ. रंगीन प्रकाश तथा रंगीन छोटी-छोटी कांच या पत्थर की गोलियां दिखीं, बेहद सुंदर और चमकती हुई. पहले तो कभी ऐसा नहीं दिखा. बाद में उसने स्वयं के शरीर को आग में जलते हुए देखा पर उस पर कोई असर नहीं हो रहा था. गुरू माँ ने बताया कि जो नींद में स्वयं को देख लेता है वह मृत्यु से डरता नहीं. जो हर पल अपने भीतर के प्रति सजग हो गया है, वह मुक्त है, मृत्यु से भी मुक्त है वह ! कल शाम वे सत्संग में गये उससे पूर्व वह उन परिचिता के घर गयी जिनके पति की मृत्यु बोन मैरो के कैंसर से हो गयी. वह दुःख की साकार मूर्ति लग रही थीं. कल शाम मुम्बई में ग्यारह मिनट में सात विस्फोट हुए. लोगों ने साहस का परिचय दिया, समय के अनुसार लोगों को भीतर से साहस भी मिलने लगता है.

कल रात स्वप्न में स्वयं को देखा, मन ही स्वप्न रचता है व उसको भोगता है, मन की दुनिया निराली है, पर उसे इस मन से पार जाना है, जहाँ तक मन की सीमा है, वहाँ तक सुख-दुःख का घेरा है उसके पार जाते ही अखंड आनंद का सागर लहरा रहा है, उसे उसी सागर में ड़ुबकी लगानी है, किनारे पर खड़े होकर चंद बूँदें ही अभी उसे मिली हैं, उन फुहारों में भीगकर मन तृप्त हो रहा है, जब तृप्ति पर्याप्त नहीं लगेगी, प्यास और बढ़ेगी तो आगे बढना ही होगा..सद्गुरु सागर के उस तट से पुकार रहे हैं, वे अभी इसी तट पर हैं, उनके पास पहुंचने के लिए वे ज्ञान की नाव भेज रहे हैं, भक्ति और श्रद्धा की पतवारें भी उन्होंने दी हैं. वह नाव में बैठ भी चुकी है, उस तट पर जाने की यात्रा ही कितनी सुखद है..आज सुबह पाँच बजे के बाद नींद खुली, नन्हा अभी कुछ देर पहले सोकर उठा है, और अब टीवी देखने लगा है. बचपन और युवावस्था कितने बेफिक्र होते हैं, जीवन के गूढ़ प्रश्नों से बेखबर, उसने भी अपने जीवन के इतने वर्ष ऐसे ही बिताये होंगे पर अब समय नहीं खोना है. भीतर की जागृति हर पल कायम रहे, पर ऐसा होता नहीं है. खासतौर से तब, जब वह अन्य लोगों से व्यवहार कर रही होती है. एक अजीब सा रूखापन जबान में आ जाता है. एक शुष्कता सी, जो मध्य के सम्बन्ध को और बिगाड़ देती है. जब उसकी कोई चाह शेष नहीं रह गयी तो जगत उससे माँग क्यों करता है कि सदा उसकी तरफ प्रेम भरी दृष्टि से ही देखे. सही को सही और गलत को गलत कहने की छूट क्या नहीं मिलनी चाहिए, पर दुःख देकर मन स्वयं भी दुखी होता है !

Thursday, March 26, 2015

गुरू पूर्णिमा का चाँद


गुरू पूर्णिमा’ में कुछ ही दिन शेष हैं. उस दिन वह उपवास व मौन व्रत भी रखने का विचार रखती है. गुरू से उसका मानसिक सम्पर्क बना हुआ है इसका आभास कल दोपहर को हुआ जब हृदय में से उसके नाम का उच्चारण स्पष्ट सुनाई पड़ा. वह दर्द में थी उस पीड़ा में गुरू की आवाज जैसे मरहम लगाती हुई आयी. बहुत अच्छा लगा. वासनाएं मिटती जा रही हैं, क्रोध आने से पूर्व ही शांत होने लगा है. जाने कौन आकर समझा जाता है, जो कहने वाली थी वह न कहकर कुछ ऐसा कहती है जो प्रेम को दर्शाता है, अर्थात प्रेम की पकड़ क्रोध से ज्यादा हो गयी है. सभी के प्रति बस एक ही भाव उसे अपने हृदय में दिखायी पड़ता है, प्रेम और स्नेह का भाव. सभी उस परमात्मा के ही तो हैं जिसे वह इतना चाहती है. कभी-कभी दोनों आँखें भर जाती हैं. आँसू बहते हैं पर इनमें भी कैसी प्रसन्नता है. वह कृष्ण भी जैसे उसका साथ पसंद करने लगा है. वह उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता. उस कृष्ण के नाम के साथ भाव की हिलोरें उठती हैं. समझ नहीं आता कौन ज्यादा प्रिय है सद्गुरु या कान्हा. कभी लगता है दोनों एक ही हैं और वह अपना मन उन्हें अर्पित कर देती है. her ordinary mind merges with their wisdom mind.

आज जागरण में ‘श्रद्धा’  के बारे में सुना. श्रद्धा जितनी दृढ होगी सात्विक भाव भी उतना ही दृढ़ होगा. आज सुबह वे उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी धूप न होते हुए भी उमस युक्त गर्मी है, पर उनकी सुबह ‘योग’ से होती है, ऐसे में मौसम की प्रतिकूलता या अनुकूलता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता. ईश्वर ने, उसके कान्हा ने भी तो कहा है कि शीत-उष्ण, सुख-दुःख सभी में समान भाव से रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहना होगा. सुख बाहरी परिस्थितयों पर नहीं बल्कि उनके सच्चे स्वरूप पर निर्भर करता है जो सदा एक सा है, आकाश के समान मुक्त, विक्षेप रहित !

आज गुरू पूर्णिमा है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. स्नान-ध्यान किया फिर नन्हे और उसके मित्र के लिए नाश्ता बनाया. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी The Gospel of Buddha पढ़ रही है. शाम को aol के फॉलो अप में जाना है. कल शाम को मन उद्ग्विन था, ध्यान किया सोने से पूर्व. काफी समय बाद लगा कि अब सो जाना चाहिए. मन एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करता है उसे उसी तरह मनाना, पुचकारना और कभी-कभी फटकारना भी पड़ता है. गुरुमाँ कहती हैं जिसके विचारों की श्रंखला टूट गयी है वही मुक्त है, सो वह हर क्षण मन पर नजर रखती है कि कहीं कोई बिन बुलाये मेहमान सा अनचाहा विचार तो प्रवेश नहीं कर रहा. उसे क्षण भर देखें तो जैसे समुन्दर में लहर स्वयं शांत हो जाती है वह विचार स्वयं समाप्त हो जाता है. पर देखना पड़ेगा अन्यथा पता ही नहीं चलता और एक से दूसरा शुरू होते होते श्रंखला सी बन जाती है. आज सुबह पिताजी व छोटी बहन से बात की, जो आजकल मुम्बई में है. पिता ने कहा राखियाँ अच्छी बनी होंगी. उसके लिए तो वह अध्याय समाप्त हो गया है. सिर्फ यह क्षण यानि वर्तमान का क्षण जीवित है. जो छूट गया वह चला गया और अब मृत प्रायः है. उन्हें हर क्षण को अंतिम क्षण मानकर जीना आ जाये तो मन क्यों अतीत व भविष्य के चक्कर लगाए. यही बुद्ध कहते हैं, यही योग वसिष्ठ में कहा गया है यही श्री श्री कहते हैं.