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Monday, May 11, 2026

प्रकाश- एक ऊर्जा


प्रकाश- एक ऊर्जा


आज वे ‘रॉकेट्री-द नांबी इफ़ेक्ट’ देखने गये थे। नन्हे ने पीवीआर में टिकट बुक कर दी थी। रिक्लाइनर पर बैठकर आराम से फ़िल्म देखी।बहुत पहले सोनू अपनी एक सखी के साथ देखकर आयी थी, उसी ने देखने के लिए कहा था। नांबी नारायणन इसरो के एक वैज्ञानिक थे, जिन पर १९९४ में झूठा आरोप लगाया गया था। दो साल बाद केस वापस ले लिया गया पर उन्होंने अपने पर लगाये झूठे आरोपों के ख़िलाफ़ केस कर दिया और वर्षों बाद जाकर उन्हें न्याय मिला, क्षतिपूर्ति भी मिली। सभी भाइयों को राखी भेज दी है, मँझला भाई कनाडा में है, उसे कविता और शुभकामनाएँ भेजी हैं। शाम को वह पार्क नंबर ५ गई, गाँव के स्कूल के बच्चों की स्लाइड के लिए पैसे एकत्र किए, चार महिलाएँ आयी थीं। 


छोटी बहन के लिए जन्मदिन की जो कविता उसने भेजी थी, उसे अच्छी लगी। ब्लॉग में ‘सत्य’ कविता प्रकाशित की, सत्य की राह पर चलना कितना सुखद होता है। सुबह बगीचे से करौंदे लाए थे, उसे धो-पोंछ और काटकर आम के अचार के बचे तेल में ही डाल दिये हैं जून ने। 


कल रात तेज वर्षा हुई, बिजली चली गई। सुबह दस बजे नन्हा सोनू और उसकी मॉम को एयरपोर्ट छोड़कर आया तो उसने बताया, कल रात वे लोग बाहर खाना खाने गये थे; सड़क पर पानी भर गया था, उन्हें घर लौटने में काफ़ी देर हुई। आज बायीं तरफ़ के पड़ोसी के यहाँ बहुत शोर हो रहा था। शायद कोई पार्टी चल रही थी, उन्हें सारे खिड़की और दरवाज़े बंद करने पड़े। अभी कुछ देर पहले नापा की आर्ट ऑफ़ लिविंग की एक टीचर ने फ़ोन किया। वह डीएसएन कोर्स करने के लिए कह रही हैं, यदि जून यह कोर्स नहीं करते हैं तो उनके साथ ही आश्रम जा सकती है । पापाजी को नूना की आज की कविता पढ़कर लगा, वह अभी बहुत कुछ मात्र शब्दों के द्वारा ही कह रही है। अध्यात्म के पथ पर हर कोई अपने दिल का हाल बस ख़ुद ही जान सकता है। 


कल शाम को शिक्षिका का फ़ोन आया और उनके कहने पर नूना ने आर्ट ऑफ़ लिविंग के ‘दिव्य समाज का निर्माण’ कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन कर लिया है। जून थोड़ा सा नाराज़ हैं पर जल्दी ही ठीक हो जायेंगे। आज सुबह से उसके सिर में हल्का दर्द था, जून ने तेल लगा दिया। छोटी बहन से बात हुई, वह चित्र बना रही थी, जन्मदिन अच्छा रहा, कुछ खट्टी-मीठी यादें  दे गया। आज की कविता पापाजी को अच्छी लगी। उन्हें राखी भी मिल गई है। ‘इचिगो इची’ पुस्तक आगे पढ़ी। कुछ शब्द उतरने लगे- 

 एक बार ही आता हर पल  


गुजर गया तो, गया हाथ से 

बार-बार नहीं घटता इक पल 

रोज़ रोज़ नहीं सच्चे होते 

सपने दिल के 

रोज रोज नहीं रस्ते मिलते 

मंज़िल के 

गुजर गया पल, था सपना

 जो आएगा, अभी नहीं अपना 

केवल यह पल हाथ लगा

इसमें जागे तो भाग्य जगा 

नई बात हो नया मार्ग हो 

नव पथ का निर्माण करें 

नये द्वार खुलते जाते हैं  

ख़ुद में जब थम कर बैठें 

सजग रहें काल द्रष्टा बन 

 उत्सव हर क्षण बन जाएगा  

निज कर्म अपने हाथों में  

भाग्य स्वयं सँवर गाएगा।  


कल रात फिर एक बार बिजली चली गई। एक बार नींद खुल जाने के बाद जून को जल्दी दुबारा नींद नहीं आती। सुबह नाश्ते के बाद नूना ने एक कविता लिखकर पोस्ट की, फिर अनुवाद कार्य किया, फिर भांजे और भतीजी के लिए जन्मदिन की कविताएँ लिखीं।सोनू का फ़ोन आया, भाई के विवाह की तैयारियाँ चल रही हैं, दोनों नन्दों से बात हुई, वहाँ भी विवाह योग्य बच्चों के विवाह की तैयारी हो रही हैं। आज एक मुस्लिम कलाकारा के भजन सुने, बहुत अच्छा गाती है। कला की कोई सीमा नहीं होती ऐसे ही कलाकार की भी। जून आज कल से भी ज़्यादा खुश लगे पर अभी भी पूरी तरह से सहज नहीं हुए हैं। उनका प्रेम शर्तिया है। आत्मा में गये बिना बेशर्त प्रेम कोई कर भी कैसे सकता है ? 


आज दिन भर वर्षा होती रही। रात्रि भ्रमण के लिए निकले तब थम गई थी। सब तरफ़ भीगा-भीगा सा आलम था, सड़कें चमक रही थीं। नन्हा अकेला है पर इतना व्यस्त रहता है, फ़ोन करने का समय नहीं मिलता।आज से नूना ने ‘बौद्ध दर्शन प्रस्थान’ पढ़ना आरंभ किया है। नन्हे के एक तिब्बती मित्र ने भिजवाई थी यह पुस्तक। जून अब सहज स्वभाव में आ गये हैं। नाराज़ रहने का भी स्वभाव बन जाता है, जैसे किसी को प्रसन्न रहने की आदत हो जाती है।आज स्वतंत्रता दिवस पर एक नयी रचना लिखी, कल जन्माष्टमी पर लिखेगी। 


कल ही उसने याद किया और आज नन्हे का फ़ोन आया, अगले साल उनका ऑफिस शायद इलेक्ट्रॉनिक सिटी में शिफ्ट हो सकता है। छोटी ननद ने होने वाली बहू की तस्वीर भेजी है, बहुत सुंदर है।गुरुजी का ‘रुद्रम’ पर तीन दिनों का एक कार्यक्रम आने वाला है। शाम को वह दायीं तरफ़ के पड़ोसी के यहाँ गई, वरलक्ष्मी की पूजा थी। आज के अनुवाद कार्य में गुरुजी द्वारा रक्षा बंधन का वास्तविक अर्थ समझाया गया था।


आज वर्षा के बावजूद वे तीनों बार टहलने जा पाये, बहुत दिनों बाद फ़िटबिट अठारह हज़ार कदम दिखा रहा है। आज भारत के नये उपराष्ट्रपति जगदीश धनखड़ चुने गये हैं। मार्ग्रेट अल्वा को हार मिली। भारत कॉमन वेल्थ गेम्स में पाँचवें स्थान पर आ गया है, नौ स्वर्ण पदक जीते हैं। पापाजी को आज की कविता अच्छी लगी, दिल से निकली बात दिल तक जाती है। जून के जन्मदिन की कविता आज ही लिख दी है।आज भी गुरुजी को टीवी पर देखा, सुना।यदि कल मौसम अच्छा रहा तो वे आश्रम जाएँगे, वैसे आश्रम जाने के लिए जून को अब पहले जैसा उत्साह नहीं रहा है।   


आज कृष्ण पर कविता लिखी। वर्ष के अंत में उन्हें गुजरात व असम में होने वाले दो विवाहों में सम्मिलित होने जाना है, जून ने टिकट बुक कर दी हैं।छोटी बहन ने ज़ूम पर बेसिक कोर्स के लिए एक मीटिंग में उसे भी बुलाया था, आयोजनअच्छा रहा।आज दोपहर को वाकिंग मैडिटेशन किया।आज भी आश्रम से प्रसारित होने वाला कार्यक्रम देखा, कोल्हापुर से आये एक कलाकार ने तलवार चलाने की अद्भुत कला का प्रदर्शन किया।


आज लगभग पाँच सप्ताह बाद वे आश्रम गये। हवा ठंडी थी, आकाश पर काले बादल थे और चौदहवीं का चंद्रमा झाँक रहा था। गुरुजी ने सदा की तरह प्रश्नों के सटीक उत्तर दिये।गायकों ने सुमधुर भजन गये, भीड़ बहुत थी, अधिकतर लोग बंगाल से आये थे। आज सुबह उसे प्रकाश के बारे में जानने की उत्सुकता जगी तो कुछ जानकारी हासिल की। कितना विचित्र है सब कुछ इस सृष्टि में ! यह एक प्रकार की ऊर्जा है जिसके कारण वस्तुएँ दिखती हैं। यह तरंग भी है और कण  भी, फ़ोटान इसका मूल कण है। प्रकाश का रंग इसकी आवृत्ति पर निर्भर करता है। लाल रंग की आवृत्ति सबसे अधिक होती है।सुबह भानु दीदी का रक्षाबंधन पर एक साक्षात्कार सुना और दोपहर बाद ‘लॉक एंड की’ का एक अंक देखा। जादुई चाबियों वाला यह धारावाहिक बच्चों ने देखने को कहा था।         


Wednesday, March 2, 2022

दीया -बाती

आज इतवार है। वे प्रातः भ्रमण के लिए गए तो हवा में ठंडक थी, तापमान १८ डिग्री रहा होगा। सुबह का टहलना अभी तक तो चल रहा है लेकिन कब रोकना पड़े, कह नहीं सकते, टहलते समय बार-बार ऐसा लग रहा था जैसे क़ानून का उल्लंघन कर रहे हैं। कल शाम ही एक नोटिस आया था कि टहलना आवश्यक कार्यों में नहीं आता, छह महीने की सजा हो सकती है। भगवान ही जानता है स्थिति कब सामान्य होगी। अभी लॉक डाउन ख़त्म होने में दो हफ़्ते शेष हैं। इसके बाद भी क्या होने वाला है यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। आज एक पुरानी सखी से महीनों बाद बात हुई, सभी भाई-बहनों से भी फ़ोन पर बात हुई। आजकल सभी लोग घर में हैं और सभी के पास समय है। फुफेरे भाई ने पुरानी तस्वीरें भेजीं, चाची के परिवार में सबसे बात हो गयी। विपदा में सब जैसे किसी एक तल पर बहुत क़रीब आ गये हैं। वापस आकर समाचार सुने, कोरोना पीड़ितों की संख्या  भारत में एक हज़ार हो गयी है। नौ बजे रामायण का तीसरा अंक देखा, अनेक बार देखने पर भी रामायण की कहानी नई जैसी लगती है। मोदी जी की “मन की बात’ सुनी। धीरे-धीरे दिल्ली में दिहाड़ी मज़दूरों व अशक्त लोगों के लिए जग-जगह रहने व खाने के इंतज़ाम हो रहे हैं। पहले वे लोग अपने-अपने गावों में जा रहे थे। पर वहाँ भी उनके लिए कौन स्वागत में बैठा होगा ? किसी भी तरह की विपदा हो उसका सबसे ज़्यादा और सबसे पहला असर मज़दूरों पर ही पड़ता है। जून ने पीएम केयर्स फंड में पैसे भेजे हैं। उन्होंने ग्रामीण लोगों की सहायता के लिए भी कुछ मदद की, दुकान तक भी गए। आर एसएस के कुछ लोग राशन ख़रीद कर निर्धन लोगों में बांट रहे हैं। इस समय सभी को सहायता के लिए आगे आना होगा। समाज के हर वर्ग को देश के लिए कुछ करने का अवसर मिला है। नन्हे से बात हुई, उसने कहा अभी काफ़ी समय लग जाएगा दुनिया को कोरोना से मुक्त होने में। न्यूयार्क में तीन से चार हज़ार लोग महामारी से पीड़ित हैं। 


रात्रि के नौ बजे हैं। कुछ देर पूर्व छत पर टहलने गये तो अष्टमी का सुनहला पीला  चाँद चमकीले सितारों के मध्य जगमगा रहा था। जैसे उसे कोई खबर ही नहीं है कि जिस धरती के वह चक्कर काट रहा है, उसे क्या हो रहा है? अर्थात उस पर रहने वाले मानव नाम के जीव पर क्या बीत रही है ?  शाम को सूर्यास्त भी देखा था। प्रकृति अपने कर्म में कभी नहीं चूकती, न जाने कितने युगों से रोज़ यह क्रम चल रहा है। आज दोपहर को अचानक तेज अंधड़ चला, मुश्किल से दो-तीन मिनट के लिए, पर ढेर सारे सूखे पत्ते छत पर, लॉन में और गैराज में फैल गए। शाम को झाड़ू लगाया। आजकल सफ़ाई कर्मचारी भी नहीं आ रहे हैं। 


आज रामनवमी है, गुरूजी ने राम ध्यान करवाया। सुबह क्रिया के दौरान सोहम का अर्थ स्पष्ट हुआ, अद्भुत थे वे क्षण ! प्रधान मंत्री ने अगले इतवार को देशवासियों को रात्रि नौ बजे नौ मिनट के  लिए दीपक, टार्च या मोमबत्ती जलाकर घर के द्वार या बालकनी में खड़े होने को कहा है। घर की बत्तियाँ बंद कर देनी हैं ताकि दीपकों का प्रकाश ज़्यादा प्रज्ज्वलित हो सके। कोरोना के ख़िलाफ़ युद्ध के लिए सभी भारतवासियों को एकजुटता की शक्ति को महसूस करना है। सभी की चेतना जब एक होकर इस विपत्ति का सामना करने का निश्चय करेगी तभी उन्हें सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। 


Friday, August 9, 2019

प्रकाश और पतंगे



आज बहुत दिनों बाद 'कल्याण' के 'जीवनचर्या अंक' में वेदों के सुंदर मन्त्र पढ़े, अद्भुत प्रार्थनाएं की गयी हैं उनमें. इन्हें स्कूलों में पढ़ाना चाहिए. लोपामुद्रा और अगस्त्य मुनि का जीवनचरित पढ़ा. सूर्य उपासना के बारे में एक अध्याय है, बाद में पढ़ेगी. जून का बुखार उतर गया है पर स्वास्थ्य अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, पर उनमें गजब की जीवट शक्ति है, दफ्तर गये हैं. कल दोपहर पदोन्नति के लिए उनका साक्षात्कार है. सौ में दस अंक ही हैं इसके. पचास एपीआर, बीस इडीसी और अन्य बीस भी किसी अन्य परीक्षा के जो पहले ही हो चुकी है. परिणाम अप्रैल में आएगा. वर्षा दोपहर को रुक गयी थी पर शाम होते-होते बादल फिर से जुट गये और वर्षा आरंभ हो गयी तेज हवा के साथ. शाम को ही अचानक सैकड़ों पतंगे बरामदे के बल्ब पर मंडराने लगे, कुछ ही घंटों में उनकी जीवनलीला समाप्त हो गयी और सब जमीन पर गिर गये. पर्वत भी मानवों को देखकर सोचते होंगे, कितना क्षणिक है इनका जीवन.

सुबह टहलने गयी तो कल रात की वर्षा के कारण सड़क पर पानी जमा था, जिसमें पेड़ों की छायाएं बेहद सुंदर लग रही थीं, तस्वीरें उतारीं. शाम को गुरु माँ का एक प्रवचन सुना जो वह बच्चों को दे रही थीं. एक नई कविता लिखी. काव्यालय की संपादिका ने उसके कमेन्ट को पसंद किया है. सुबह  महीनों बाद रामदेव बाबा का सीडी लगाकर प्राणायाम किया, कपालभाति के कितने ही लाभ उन्होंने उसमें गिनाये हैं.  

टीवी पर भारत-बांग्लादेश क्रिकेट मैच का फाइनल मैच आ रहा है, भारत शायद विजयी हो जायेगा. आज उसने अरसे बाद गाजर का हलवा बनाया है, भूल ही गयी थी कैसे बनता है. जून इसमें दक्ष हैं. फुफेरे भाई से बात की, बुआ जी आज डाक्टर्स को डांट रही थीं, अपने दामाद को पहचान नहीं पायीं, अभी आईसीयू में ही हैं. दोपहर को बच्चों ने योग किया, भजन गाये और खेल खेले, कितने मस्त होते हैं बच्चे, भोले-भाले. सुबह सामान्य थी, रविवार का दक्षिण भारतीय नाश्ता और फिल्टर काफ़ी. दीदी ने बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट किया है. अच्छा लगा पढ़कर. पिताजी 'लाओत्से' पर किताब पढ़ा रहे हैं, लाओत्से पर ओशो के प्रवचन की किताब. उन्हें अपनी कमजोरी अच्छी नहीं लगती, शायद वृद्धावस्था में सभी को इस अनुभूति से गुजरना पड़ता है.

आज का दिन भी समाप्ति की ओर है. उनका रात्रि भोजन और भोजन के बाद का रात्रि भ्रमण भी हो चुका है. जून अख़बार पढ़ रहे हैं.  रात के लिए एक निमन्त्रण था पर वे नहीं गये. कम्पनी के सभी उच्च अधिकारी यहाँ हैं, उन्हीं के सम्मान में विशेष भोज का आयोजन किया गया है. आज ही कम्पनी की साठवीं वर्षगांठ भी है. इसी उपलक्ष में ग्रामीण किसानों को ट्रैक्टर बांटे गये, मुख्य मंत्री तथा एमपी भी आये थे. यह पूरा वर्ष ही हीरक जयंती वर्ष है, अंत में भी कुछ कार्यक्रम होंगे. उनमें से एक है निबन्ध प्रतियोगिता. जून को इसकी जिम्मेदारी मिली है. कल दोपहर को मीटिंग बुलाई है उन्होंने. निबन्ध के लिए विषय क्या दिए जाएँ इसका निर्णय होगा. शाम को बगीचे में टहलते समय उन्होंने इस बारे में चर्चा की. विषय ऊर्जा से जुड़ा होना चाहिए. पूरे भारत से नवीं से बारहवीं कक्षा तक पहला ग्रुप तथा स्नातक व स्नातकोत्तर कालेज के छात्रों का दूसरा ग्रुप भी इस प्रतियोगिता में ऑनलाइन भाग ले सकता है. आज नैनी के छोटे पुत्र का जन्मदिन है, जिसके लिए वह उन दिनों इतनी चिंतित हुई थी. शाम की योग कक्षा में उसने स्वाध्याय के लिए सुझाव दिया. बुआजी से फोन पर बात हुई, वह कह रही थीं, मेरठ में हैं, जबकि अपने घर पर ही हैं. उन्हें मतिभ्रम हो गया है. परमात्मा की कृपा है कि व्यक्ति सब कुछ भूल जाता है, अपने दुःख-दर्द भी भूल ही जाता होगा अंत समय में. नवरात्र पर नेट पर पढ़ा और देवी भागवद् में भी एक अध्याय पढ़ा, स्कूल में बच्चों को नवरात्र के बारे में बताया. देवी को अपने भीतर जागृत करना है, यह भी बताया. छोटी बहन से बात हुई, विदेश में रहकर भी वह नवरात्र के नौ दिनों तक रोज भजन में सम्मिलित हो पा रही है.  आज अशोक के फूलों की तस्वीरें भी उतारीं. उन प्रसिद्ध महिला ब्लॉगर ने कंचन के तने से निकली कलिका को देखकर कहा, यह है आध्यात्मिक सौन्दर्य, उनके रूप में उसे एक सुहृदय पाठिका मिल गयी हैं. आज मृणाल ज्योति की एक अध्यापिका का फोन आया, एक अन्य अध्यापिका के पिता जी का देहांत हो गया है. तीन दिन बाद उनका श्राद्ध है. उनका घर यहाँ से दो सौ किमी दूर है. उसका जाना तो सम्भव नहीं होगा. कल वहाँ डाउन सिंड्रोम डे मनाया जायेगा.

Sunday, March 5, 2017

बरसे बदरिया सावन की


प्राणायाम कराने से उसके एक छात्र में काफी बदलाव आ रहा है, जो पढ़ते-पढ़ते ही सोने लगता था. अभी कुछ देर पहले ही वह पढ़कर वापस गया है, आज काफी सचेत था, उसका ध्यान टिकने लगा है. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि इस बालक पर अपनी कृपा बनाये रखे. सुबह एक सखी से बात की, वे लोग मकान बदलने वाले हैं, इसी घर की जब वे नये-नये आये थे, कितनी तारीफ़ की थी पर अब इसकी कमियां नजर आ रही हैं. नये घर में सब अच्छा ही होगा यह भी तो नहीं कह सकते, फिर भी बेहतर के लिए प्रयास तो निरंतर चलता ही रहता है, और चलना भी चाहिए. कल उसने एक स्थानीय लेखक की कविताओं की एक किताब के लिए प्रस्तावना लिखी. आज धूप तेज है. कल सुबह सड़क किनारे के पेड़ से आंधी में गिरे आम लाने पर उसने पिताजी को टोका तो वे आज न फूल ही लाये न आम, घर में खिले चाँदनी के फूलों को सजाया है. अपने ही घर में जब सब कुछ हो तो बाहर से लाने की क्या आवश्यकता है, पर मानव के भीतर का नन्हा बच्चा कभी बूढ़ा नहीं होता. अनंतपुर स्टेशन पर एक भयंकर रेल दुर्घटना हो गयी आज सुबह, काफी लोग मृत हुए, काफी घायल हुए, अभी भी कुछ लोग फंसे हुए हैं. जीवन में वैसे ही कितने दुःख होते हैं, ऊपर से यह भयंकर दुःख..

आज फिर वर्षा हो गयी है, मौसम सुहावना है. नन्हे ने कल बताया अगले महीने वह आ सकता है. रात को एक अद्भुत स्वप्न देखा, उसे लग रहा था वह जाग रही है, ध्यान में है, दो काली चीटियाँ दिखती हैं, बिलकुल जीवंत, चलती हुईं, उन्हें देखती है तो कंधे के पीछे से किसी के हँसने की आवाज आती है और यह वाक्य भी, ‘अब मृत्यु ही शेष है जीवन नहीं’ और तभी एक प्रवचन सुनाई देता है स्पष्ट था एक-एक शब्द उसका, वह मुस्का रही है, यह आभास भी हुआ यानि स्वयं को मुस्काते देखा..कैसा अनोखा स्वप्न था यह ! टीवी पर बापू द्वारा इजराइल में गायी रामकथा का प्रसारण हो रहा है, शायद दुनिया का कोई कोना नहीं बचा होगा, जहाँ वह न गये हों. राम का नाम विश्व भर में गूँज रहा है. अभी कुछ देर पहले उपनिषद के उपदेश पढ़े, Indian Philosophy में से, जो पिछली बार पब्लिक लाइब्रेरी से लायी थी. आज कान्हा से बातें भी हुईं, पहली बार कॉफ़ी भी ऑफर की, जागते रहने का मन्त्र उसने दिया. वे जागते हुए भी स्वप्न देखते हैं अर्थात सोये रहते हैं. पिताजी टीवी नहीं देख रहे हैं, बरामदे में बैठे हैं. यूँही बिना कुछ किये बैठे रहना उन्हें अच्छा लगता है. बड़े भाई की बिटिया का दसवीं का परीक्षा परिणाम आ गया, बहुत अच्छा रहा, उसे ९.५ की उम्मीद थी, ९.८ रहा, भैया-भाभी बहुत खुश हैं और सारा परिवार ही खुश है. सरदारनी आंटी की पोती के बारहवींमें ९७.२% अंक प्राप्त किये हैं, उसे याद आया उनके समय में ६०% अंक प्राप्त करने पर ही घर में लड्डू बांटे जाते थे.

आज शाम वे पूजा कक्ष की जगह आंगन में सत्संग करने वाले हैं, नैनी के परिवार को भी शामिल होने को कहा है शायद एकाध और भी परिवार आयें, धीरे-धीरे इसमें और भी लोग जुड़ते जायेंगे, आरम्भ के लिए आज का दिन उत्तम है. कल उसका जन्मदिन है और गंगा दशहरा भी. पिताजी ने बनारस से पंचाग मंगवाया है उसमें देखकर बताया. उसने कल एक कविता ‘मस्ती’ पर लिखी थी, पर लोग इतने दुखी हैं कि मस्ती की बात उन्हें जंचती ही नहीं. अभी-अभी कृष्ण भक्त प्रवीर की कथा पढ़ी, भक्त को मरना ही पड़ता है, बिना मरे कोई भक्ति नहीं कर सकता, तभी तो संतों ने गाया है, भक्ति करे कोई सूरमा..

कल शाम का सत्संग बहुत अच्छा रहा, चार बच्चे, चार बड़े, सद्गुरू की उपस्थिति स्पष्ट महसूस हो रही थी. उसके बाद उसे जिव्हा पर नियन्त्रण रखने का उपदेश भी दिया एक लीला रच के. बाद में लॉन में एक अभूतपूर्व अनुभव हुआ, उसका स्मरण होते ही अब भी रोमांच होता है. वह घास पर बैठी थी कि अचानक घास प्रकाश से भर गयी, फिर उसमें पारदर्शी धुंध सी निकलने लगी, जो ऊपर उठकर नीचे गिरने लगी, फिर तो बाकायदा प्रकाश की वर्षा होने लगी झर झर झर..बूँदें टपक रही हों जैसे, मीरा का भजन याद आया, बरसे बदरिया सावन की..यह इसी वर्षा को देखकर उन्होंने लिखी होगी. अमृत की वर्षा का जिक्र कबीर ने भी किया है. परमात्मा उनके साथ है, इसकी खबर वह कई रूपों में देता है. आज एक सखी अपनी बिटिया को छोड़ने मुम्बई जा रही है, जहाँ वह एमबीए की पढ़ाई करेगी. एक अन्य सखी नाराज है उससे, जिसका एक अनुरोध वह मान नहीं पायी थी, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे और तत्क्षण अपने लिए भी उसने यही प्रार्थना की.             
   


Wednesday, November 2, 2016

फटी हुई पुस्तक


दायें तरफ की पड़ोसिन ने फोन किया और पूछा क्या वह क्लब की कमेटी में है, उसने कहा, नहीं, और फिर कहा इस बार नहीं. वर्षों पहले एक ही बार वह कमेटी में थी, प्रोजेक्ट कन्वेनर तीन साल से है, लेकिन उसकी बात से लग रहा था जैसे वह हमेशा ही रहती है पर इस बार नहीं. मन कितना झूठ बोलता है, अपने आपको कुछ दिखाने के लिए, फिर यह भी कहा कि मीटिंग में देर से जाकर जल्दी आ गयी, जबकि सारा समय वह लाइब्रेरी में ही बैठी रही. मन को झूठ बोलने में सोचना भी नहीं पड़ता. अपनी इमेज बनाये रखने के लिए कितने झूठ बोलता चला जाता है. झूठी इमेज की रक्षा के लिए झूठ के सिवा और साधन हो भी क्या सकते हैं. आज सुबह का अंतिम स्वप्न बड़ा मजे का था. उसने एक पुस्तक नींद में फाड़ दी है पर जिसकी है उसे तो लौटानी होगी सो सेलो टेप लगाकर जोड़ने का प्रयास कर रही है, पर जुड़ना कठिन है सो परेशान होकर नींद खुल जाती है व ठीक अगले ही पल अलार्म बजता है, बल्कि उस क्षण मन में यह विचार आया अब अलार्म बजेगा और ऐसा ही हुआ. तभी बंद आँखों के आगे प्रकाश नृत्य करने लगा, यह परमात्मा के आने का ढंग है, सुबह सन्ध्याकाल में वह इसी तरह मिलने आता है. फिर उसने उससे बात भी की. सुबह उठते ही कुछ पंक्तियाँ उसने लिखीं क्योंकि बाद में वे भाव ओस की बूंदों की तरह उड़ जाते हैं ! कितनी देर तक तो वह भीतर अपनी उपस्थिति जाहिर किये रहा फिर मन पर पर्दे छाते चले गये और वह छुप गया, उनके पीछे, झूठ, अहंकार और अज्ञान के पर्दे ! शाम को सूप उसकी असावधानी से कुर्ती पर गिर गया पर मन ने झट कह दिया कि मैच देखते समय उसका ध्यान विकेट की तरफ था सो..कितना चालाक है उसका मन, एक क्षण में कैसे-कैसे बहाने गढ़ लेता है.पर उसे पता चल गया था, उसके भीतर कोई जाग रहा है जो सब जानता है !

आज सुबह फिर चमत्कार घटा, आज्ञा चक्र पर ज्योति जल रही थी, एक दीपक की लौ, नींद खुली और विचार आया, अब अलार्म बजेगा और वही हुआ, ठीक चार बजे कोई जगा देता है, वही जो भीतर जाग रहा है. परमात्मा उसे धीरे-धीरे अपने नजदीक ले रहा है, पहले वह उसे पुकारती थी अब वह खुद उसे बुलाता है, उसने अपने को प्रकट कर दिया है. उसके अहंकार को चूर करने के उसके प्रयास भी जारी हैं. उसे अपने भीतर सूक्ष्म से सूक्ष्म विकार भी स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं. सभी के भीतर उसी की ज्योति भी दिखाई देती है, किसी को तिलमात्र भी चोट पहुँचाने पर भीतर कैसी पीड़ा जगती है जैसे खुद को ही सताया हो..वे सब एक ही हैं, इस बात का अनुभव भी हो रहा है. अब सारी कामनाएं एक ही केंद्र पर केन्द्रित हो गयी हैं. वह परमात्मा इसी जन्म में उसे मुक्त कर दे. इस में बाधा उसके पूर्व संस्कार हैं व प्रारब्ध कर्म, लेकिन सद्गुरू की कृपा का अक्षय भंडार भी तो साथ है. आज सत्संग है, वे भजन गायेंगे, ध्यान करेंगे और परमात्मा को अपने सारे गुण-अवगुण समर्पित कर देंगे, खाली होकर बैठ रहेंगे फिर वही वह रहेगा, वह एकछत्र साम्राज्य चाहता है..दो दिन बाद नन्हा आ रहा है, उससे भी अध्यात्म पर चर्चा होगी. मुरारी बापू बाबा रामदेव के पतंजलि आश्रम में कथा कर रहे हैं. वे पतंजलि के योग सूत्रों का रामचरित मानस के आधार पर वर्णन कर रहे हैं. यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि ! ये आठ अंग रामायण के सात कांडों में व्यक्त हुए हैं ! वह कह रहे हैं कृपा का पात्र बनना है, अंतर घट को पावन करना है, उसे सीधा करना है तथा उसके छिद्रों को पूरना है.

सुबह अलार्म बजा तो वह पहले से ही जगी थी, परमात्मा को जगाने नहीं आना पड़ा, वैसे भी वह कहीं दूर तो है नहीं जो उसे आना पड़े. वह उनकी आत्मा ही तो है, प्रकाश उसका स्वरूप है, शांति, आनंद, प्रेम, सुख, शक्ति, ज्ञान तथा पवित्रता उसके गुण हैं, जिनके अनंत प्रकार हैं. वह परमात्मा छिपा नहीं है पर उनकी दृष्टि पर ही मोटे-मोटे पर्दे पड़े हैं. उसे देखने के लिए अंतर की आँख चाहिए. कल दिन भर जून ठीक रहे पर शाम को नन्हे का फोन आ गया. वह बंगलूरू में एक घर खरीदने की सोच रहे हैं. उनको भी अपनी स्वतन्त्रता उतनी ही प्रिय है जितनी उसे. कल आभास हुआ कि किसी को जब वे सलाह देते हैं तो उसे कैसे चुभती है, कोई भी नहीं चाहता कि कोई और उसे बताये कि उसके लिए क्या ठीक है, उसे क्या करना चाहिए. अब जबकि वह तथाकथित साधना कर रही है, अहंकार को विसर्जित करना जिसकी पहली शर्त है, उसे कितना नागवार गुजरा चाहे पल भर को ही, क्योंकि तुरंत भीतर वाले ने सचेत कर दिया, लेकिन अब उसे कान पकड़ लेने हैं, किसी को भूल कर भी कोई सलाह नहीं देनी है, क्योंकि उन्हें दी गयी पीड़ा उसे ही मिलने वाली है, अंततः वे जुड़े हए हैं. जून का उसे सम्मान करना करना है और उनकी रजोगुणी प्रवृत्ति स्वत: ही सतोगुण में बदलेगी, वैसे ही नन्हे की भी, वह ऊपर उठ रहा है, उसे तो केवल खुद को देखना है, भीतर कोई दम्भ न रहे, पाखंड न रहे, भेद न रहे, खाली हो जाये मन..तभी तो उस परमात्मा को भरा जा सकता है..सारी इच्छाएं बस इसी एक में मिल गयी हैं..एक ही काम है लिखना, पढ़ना और सुनना..   


Tuesday, August 9, 2016

कविता का ब्लॉग


बुध की शाम को नैनी अस्पताल गयी और रात डेढ़ बजे एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया, शुक्र को वापस आ गयी. उसकी देखभाल उसका पति व बुआ दोनों कर रहे हैं. बुआ घर का काम निपटा कर यहाँ भी आ गयी है. धीरे-धीरे काम करती है. पंछियों की आवाजें आजकल सुबह से ही सुनायी देने लगती हैं. एक कौवा पीछे आंगन में ही कांव-कांव कर रहा है. वह यदि ध्यान न दे तो पता ही न चले, सुनने लगे तो आवाजों का एक हुजूम है. आजकल वे सुबह थोड़ा देर से उठने लगे हैं. जून का दर्द पहले से काफी ठीक है. नींद पूरी हो रही है, कोई तनाव नहीं. समय की किसी पाबंदी का वह पालन नहीं करते आजकल. नन्हे की तरह मुक्त भाव से जीने लगे हैं, अभी बाह्य मुक्ति का अनुभव हो रहा है एक दिन यही भीतरी मुक्ति का भी दर्शन कराएगी. आज ध्यान में उसने अनंतानंत ब्रहांड का अनुभव किया. कितनी शांति थी वहाँ, एक सन्नाटा था, प्रकाश था और सदगुरुओं की झलक थी..वे व्यर्थ ही स्वयं को सीमाओं में कैद रखते हैं ! सभी के भीतर एक अनंत आकाश है जो चेतन है, आनन्दमय है और सनातन है..उसका पता लगते ही भीतर अपूर्व शांति का अनुभव होता है. गुरूजी ठीक कहते हैं ध्यान में जो ताकत है जो करते हैं वह जानते हैं...दांयी तरफ की पड़ोसिन सखी का फोन आया है, वह भी ‘मृणाल ज्योति’ की डोनर मेम्बर बनना चाहती है. उसकी माँ को कोई रोग है जिसमें रक्त की लाल कोशिकाएं कम हो जाती हैं. शरीर कमजोर होता जाता है. बुढ़ापे में कोई न कोई रोग शरीर को घेर ही लेता है.

जून अब काफी स्वस्थ हैं. आज सुबह वे टहलने गये. रास्ते में नन्हे के मित्र की माँ से भेंट हुई. उन्हें फोन किया सत्संग में आने के लिए, किसी दिन आएँगी. आज क्लब की एक वरिष्ठ सदस्या का फोन आया, उनके लिए उसने कविता लिखी थी, उसी के लिए धन्यवाद दे रही थीं. आज My Poetry Collection में कुछ और कविताएँ डालीं, नन्हे ने उसका look बदल दिया है, कभी हिंदी कविता में उसका लिंक भेजेगी. मौसम आज अच्छा है, न सर्दी न वर्षा न धूप न गर्मी..मधुर-मधुर सा. जून आज देर से आने वाले हैं, वह कुछ देर पढ़ सकती है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की. आज छोटे भाई को गुरूजी के जन्मदिवस के लिए लिखी कविता भेजी है. जीवन का रथ आगे बढ़ रहा है. एक सखी को फोन किया, नहीं उठाया तो संदेश भेजा, कल वे लोग आ रहे हैं.

जून को पुनः दर्द हुआ. आज वे नेहरु मैदान की हरी-हरी घास पर नंगे पैरों चले. एक सखी ने शादी का कार्ड भिजवाया है, उसकी ननद के बेटे की शादी है, नूना ने उसके लिए चंद दोहे लिखे हैं कल टाइप करेगी. नेट पर उसके ब्लॉग के छह फालोअर जाने कहाँ से आ गये हैं ! अच्छा है ! श्री श्री कहते हैं जब आपके पास ज्यादा समय है तभी आपको व्यर्थ के ख्याल दिमाग में आते हैं, व्यस्त रहो मस्त रहो !

कल शाम को उसने जून को ध्यान कराया, कितना आश्चर्य है न, कुछ समय ( कुछ महीने पहले) पूर्व वह ध्यान को इतना महत्वपूर्ण नहीं समझते थे, फिर वह उन्हें इस तरह करा सकती है, यह तो उसकी कल्पना में भी नहीं था. सद्गुरू की कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है. कल शाम को छोटे भाई ने उसकी कविता की तारीफ़ की. तारीफ तो उसकी है जिसने वह कविता लिखने की प्रेरणा दी, जो स्वयं उस कविता का विषय है. कुछ ही देर में तो लिखी गयी थी वह, आज ध्यान में सद्गुरु अनंत रूप में उस अणु पर बरस गये. अनंत ऊर्जा का अनुभव किया उसने अपने सिर की चोटी पर. अभी साधना के इस पथ पर चलते ही जाना है, विश्राम नहीं लेना है. जो रास्ते को ही मंजिल मानकर रुक जाते हैं, वे योगभ्रष्ट हो जाते हैं. परमात्मा की अकारण कृपा दिन-रात उस पर बरसती रहती है. वह कृपा का सागर है, उसकी स्मृति भी आ जाये तो मन भीग जाता है जैसे सागर के पास खड़ा यात्री अप्रयास ही भीग जाता है !


Monday, July 11, 2016

होली के रंग


मौसम भीगा-भीगा सा है, गरज रहा है मेघ और छम-छम बरस रही हैं बूँदें ! मन भी भीगा है किसी अनजाने प्रेम की मस्ती में ! सद्गुरु क्या आये उसकी आध्यात्मिक यात्रा को पंख लग गये हैं, कितनी असीम करुणा है उनकी, वह जानते हैं सब कोई तो उन तक पहुंच नहीं सकते, सो उन्हें खुद ही आना पड़ा. ईश्वरीय कृपा का कोई पार नहीं पा सकता, वह दिन-रात अखंड अनवरत उन पर बरस रही है. वे ही अनदेखा किये अपने क्षुद्र मन का शिकार होते रहते हैं और झूठे अहम को सजाते रहते हैं, एक बार जब आभास होता है कि परमात्मा उनके साथ है ओर उनसे नितांत एकान्तिक प्रेम करता है, वे कृत-कृत्य हो जाते हैं, भीतर हिलोरें उठती हैं, तन-मन हल्का हो जाता है, फूल सा हल्का और ऐसा लगता है जैसे जन्मों का भार सिर से उतर गया हो...मुक्ति इसी को कहते हैं न ? भक्ति की दासी है मुक्ति यह कभी सुना था, सच ही सुना था !

गुरू का आदेश यही है कि वे हुकुम में रहें, उसका संदेश है कि हुकुम में रहकर जो शांति, आनंद और सुख उन्हें मिला है वह सभी को बाँटें. आज सुबह स्नान के बाद अनुग्रह हुआ और भीतर ध्यान का सूत्र मिला. उन्हें कुछ नहीं करना है, कुछ नहीं पाना है और वे कुछ नहीं हैं. कितना आसान है ध्यान करना सद्गुरु की कृपा के बाद. परमात्मा ने उन्हें अपने जैसा बनाया है और वे हैं कि अपने होने से ही संतुष्ट नहीं हो पाते, वे अपने होने को भी जान नहीं पाते. सबमें उसी परमात्मा का नूर है, जो एक ओंकार, अकाल मूरत, निर्भव, निर्वैर, अजूनी है. वह सत्य स्वरूप परमात्मा उनका अपना आप होकर भीतर ही बैठा है. वह कितना निकट है उनके, वह प्रकाश रूप है, वह चिन्मय है ! वह उनके हर कार्य हर भाव को देखता है, वह द्रष्टा है ! टीवी पर मुरारीबापू राम कथा सुना रहे हैं. उन्होंने भी अपने भीतर उस परमात्मा को अनुभव किया है. वह कह रहे हैं, हरि उनका फैमिली डाक्टर है, वह सारे अस्तित्त्व को सम्भालने वाला है. यदि वे भी अस्तित्त्व का हिस्सा बन जाएँ तो उनका भी ध्यान अपने आप होने लगता है !


कल होली है और परसों दुलहण्डी, इस वर्ष वे होली नहीं मना रहे. न ही गुझिया बनाने का उत्साह है, न ही सबको बुलाकर रात्रिभोज करने का, न ही सबके लिए टाइटिल लिखने का. कुछ खल तो रहा है तभी तो बार-बार ख्याल इसी बात की ओर जा रहा है, पर हर अच्छी चीज भी आखिर कभी न कभी तो खत्म होती है. इस साल ऐसे कई कारण हैं. सबसे बड़ा तो माँ का गिरता हुआ स्वास्थ्य, पिताजी के दातों की समस्या है. एक सखी के बेटे के बारहवीं के इम्तहान हैं. दूसरी की सासूजी को हाथ में चोट लगी है. एक अन्य को लोहरी पर बुलाया था तो बहुत बुलाने पर आये थे, इन सब बातों से जैसे भीतर उत्साह नहीं है. नैनी का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, काम बढ़ जायेगा तो वह भी परेशान हो जाएगी और इन सब बातों से बढकर जो कारण है वह है सद्गुरु का आना, उस पर कृपा करना और भीतर जागृति दिलाना कि समय बहुत कीमती है. व्यर्थ गंवाने की जरा भी गुंजाइश नहीं है. इस वर्ष वे ध्यान करते हुए ईश्वर के प्रेम के रंगों से भीगने की होली खेलने वाले हैं. बाहर की होली बहुत खेल ली, अब भीतर जाने का वक्त है. मैदे की वस्तुएं उन्हें रास नहीं आतीं, सो गुझिया कैंसिल, हाँ गुलाब जामुन बनायेंगे, जो भी मिलने आये, खुले दिल से उनका स्वागत किया और उन्हीं का रंग लगाकर खिला दिया गुलाब जामुन ! 

Wednesday, May 11, 2016

गॉस्पेल ऑफ़ बुद्धा


नये वर्ष में वह पहली बार लाइब्रेरी गयी थी कल. Gospel of Buddha लायी है. बुद्ध कहते हैं आत्मा नहीं है, कोई ऐसी शाश्वत सत्ता भीतर नहीं है. मन है, विचार हैं, भावनाएं हैं ये सब प्रतिपल बदल रहे हैं, एक नदी के प्रवाह की तरह, लेकिन इस प्रवाह को कौन देखता है ? मन क्या स्वयं को देख पाने में सक्षम है, विचारों से परे जो देह व मन को देखता है वह क्या है ? उसे मन कहें या आत्मा क्या फर्क पड़ता है, शब्दों के पार जहाँ केवल शून्य है, कैसी शांति है, जहाँ नाद है, संगीत की लहरियां हैं. जहाँ न जीने की चाह है न मरने की परवाह है. जब कोई विराट शून्य में खड़ा हो जाता है तो दृष्टि अपने पर लौटती है.

आज क्लब की मीटिंग में उसे ‘मृणाल ज्योति’ पर बोलना है. यह बाधाग्रस्त बच्चों के पुनर्वास के लिए समर्पित एक संस्था है जो १९९९ में मात्र दो बच्चों को लेकर शुरू की गयी थी. ऐसे बच्चे जो पूर्ण समर्थ नहीं हैं, मंदबुद्धि हैं अथवा सुनने में अक्षम हैं. उनकी देखभाल शिक्षा तथा उनके इलाज के लिए मृणाल ज्योति जैसे संस्थाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वह हिंदी में अपने विचार सुचारू रूप से रख सकती है. सभी महिलाएं उस जैसी ही तो होंगी प्रेम से भरी, किन्तु थोड़ी सी नर्वस. उनमें आत्मविश्वास की कमी का कारण है आत्मा की कमी. आत्मा जितनी जितनी प्रखर होती जाएगी अर्थात स्वार्थ जितना-जितना कम होता जायेगा या अहंकार जितना-जितना शून्य होता जायेगा, आत्मा उतनी-उतनी उजागर होती जाएगी. उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि वे स्वयं को कभी खो ही नहीं सकते और पाने के लिए सब कुछ है क्योंकि आत्मा अनंत है जितना पा लें प्यास बढ़ती ही जाती है.


आज सुबह एक फोन आया. ध्यान में थी सो घंटी जैसे कहीं दूर बजती रही पर उठाने का मन नहीं हुआ. मन धीरे-धीरे उपराम होता जा रहा है, मरता जा रहा है. भीतर प्रकाश बढ़ता जा रहा है. लक्ष्य कुछ-कुछ दीखने लगा है. हर सुबह सद्गुरु से एक सूत्र मिलता है. कितना सुंदर, सरल और सीधा है उनका जीवन, इसकी पवित्रता देखकर आँखों में जल भर आता है, इतना निर्दोष और इतना पावन है उनका सहज स्वभाव. कितना पूर्ण और कितना तृप्ति से भरा है उनका खाली मन, ऐसा मन जो माँगता नहीं, चाहता नहीं, देने की भी चाह नहीं, कुछ करने की भी चाह नहीं. सहज जो होता रहे वही  पर्याप्त है ! करने वाला यदि बचा रहे, देने वाला और देखने वाला जब तक बचा रहे, तब तक भीतर कुछ न कुछ उथल-पुथल मची रहती है. अब कोई है नहीं भीतर, मौन है, सन्नाटा है, जो है बस है, होना नहीं है. कल सुबह एक परिचिता के पास गयी थी उसके इक्कीस वर्ष के भतीजे ने आत्मघात कर कर लिया. उसने प्रार्थना की, उसकी आत्मा को शांति का अनुभव हो वह सही मार्ग पा जाये ! 

Thursday, April 28, 2016

इंटरनेट की दुनिया


एक शिष्य के जीवन में दो ही ऋतुएं होती हैं, एक जब वह सद्गुरू की निकटता का अनुभव करता है और दूसरी जब वह उनसे दूरी का अनुभव करता है. आजकल उसके जीवन में दूसरा मौसम चल रहा है, लेकिन उनकी ‘कृपा’ असीम है कि वह उसे इस ऋतु में नहीं देखना चाहती, वह पुनः उसी निकटता का अनुभव कराना चाहती है, जिसे पाकर उनके भीतर एक प्रेम की लहर दौड़ जाती है. आज भी सद्वचन सुने थे, खुदा का अर्थ है जो खुद आये, उन्हें केवल इंतजार करना है. काल के दायरे में रहने पर मन उन्हें इस दुनिया में खींच कर ले जाता है, पर उन्हें काल से परे उस देश में जाना है, जहाँ आनन्द का मौसम है. उस दुनिया में उड़ान भरने के लिए वे उन्हें बार-बार बुलाते हैं. उनकी पुकार को वे अनसुनी कर ही नहीं सकते, इतनी शिद्धत से वह उन्हें पुकार रहे हैं.

‘मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे, जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि पुनि ताते आवे’ उसके मन की भी ऐसी ही दशा है आजकल. पुण्य उदय होते हैं तो भीतर प्रकाश छा जाता है, गुरु की कृपा का अनुभव होता है. उसकी आध्यात्मिक यात्रा भी बीच में ही दम तोड़ देती यदि कृपा ने पुनः हाथ पकड़ कर न उठा लिया होता. साधक थोड़े से अनुभव पाकर ही स्वयं को ज्ञानी, ध्यानी समझने लगता है. उसे लगता है अब गुरू की क्या आवश्यकता, भीतर से आनंद मिलने लगता है तो वह सोचता है अब स्वनिर्भर हो गया, पर उसे पता नहीं कि उसकी सामर्थ्य ही कितनी है, तत्वज्ञान हो जाने पर भी उसमें टिके रहना सरल नहीं. पूर्वजन्मों के संस्कार कब प्रकट हो जाएँ. उसे पिछले दिनों अपनी कमियों का अहसास कई तरह से हुआ. उसका ज्ञान अल्प है, तुच्छ है, अधूरा है. उसकी भाषा भी संयत नहीं है और उसका समाज के लिए कोई योगदान भी विशेष नहीं है. ऐसे में व्यर्थ ही स्वयं को विशेष मानने की भूल करना अहंकार ही तो है. ध्यान में कई अच्छे अनुभव हुए हैं पर अभी यात्रा बहुत शेष है, अभी तो वे कुछ भी नहीं जानते, कल क्लब की अध्यक्षा ने उसे क्लब की तरफ से मृणाल ज्योति का संयोजक नियुक्त किया, उनसे मिलकर कार्यों की जानकारी लेनी होगी.


गुरु माँ गा रही हैं, ‘प्रभो जी मोरी विनती सुनो’, इंटरनेट पर उनका भजन सुन पा रही है. गीता पर उनका प्रवचन भी उपलब्ध है. नन्हे का कम्प्यूटर कल ठीक हो गया, वह मानसिक रूप से परिपक्व है पर अपने स्वास्थ्य तथा नींद का ख्याल नहीं रखता. उसे उसने कहा, child is the father of the man यह कहावत उसने सिद्ध कर दी है. कल पिता जी से बात हुई, उन्होंने उसकी किताब पूरी पढ़ ली है, उन्होंने कहा कि यह किताब उसने दिल से लिखी है, कुछ दिनों से कुछ नया नहीं लिखा. आज बहुत दिनों बाद कायोत्सर्ग ध्यान किया. सद्गुरू को भी सुना वह कह रहे थे भीतर जो अधूरापन, तलाश जारी है वह साधक को जड़ नहीं बैठने देती, वह उसे आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, प्रभु अनंत है, उसका ज्ञान अनंत है, उसे जानने का दावा करने वाले वे उसकी शक्ति का एक कण भी तो नहीं है, प्रेम की एक बूंद भी तो नहीं हैं और ज्ञान की बस झलक भर ही तो पायी है, इसलिए साधक बार-बार उड़ान भरता है और अनंत आकाश की एक झलक पाकर उसे लगता है कि कुछ मिला तो थोड़े दिन बाद फिर कुलबुलाहट होने लगती है कि कुछ और है जो अनजाना है, कि वे तो कुछ जानते ही नहीं !

Thursday, April 7, 2016

आदमीनामा


आजादी की इकसठवीं सालगिरह ! आज उन्होंने पहली बार झंडा ऊँचा लगाया है. ओशो कह रहे हैं सतयुग और कलियुग दोनों साथ-साथ चलते हैं, व्यक्ति पर निर्भर है कि वह किस युग में रहना चाहता है. उसका जीवन अंधकार से भरा हो अथवा प्रकाश से यह उसके ऊपर निर्भर है. राम, कृष्ण इसलिए पूजे जाते हैं क्योंकि उन्होंने सतयुग में रहना चुना, उनके साथ ही रावण, कंस तथा अँधेरे में रह रहे लोग भी थे. ‘मैं’ जब शुद्ध ‘मैं’ में परिवर्तित हो जाता है, अहंकार मुक्त हो जाता है तो सारे प्रश्न स्वयं हल हो जाते हैं.
आज भी घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है. सारा घर अस्त-व्यस्त है, लेकिन उसका मन अनंत विश्राम में डूबा है. मजदूरों के रूप में भी वही चेतना है. वही जड़ में है वही चेतन में. वह जब एकटक कहीं देखती है, दीवार हो या घास का मैदान, सब कुछ रूप बदलने लगता है. जैसे सब कुछ पिघल रहा हो, नजर बदली तो नजारे बदले ! ऑंखें बंद करते ही जैसे आकाश नजर आता है नन्हे-नन्हे सितारों से युक्त ! भीतर व बाहर एक ही सत्ता है और सत्ता में परम शांति है, विश्राम है, आनन्द है, कितना अनोखा अनुभव है यह, कोई नहीं समझ सकता जब तक कि वह स्वयं ही न जाने. सद्गुरू ने उसे यह अनुभव कराया है, कृपा का पात्र समझा है. उनकी वह दृष्टि जो उस पर पड़ी थी, भीतर बीज बो गई थी, अब वह पनपने लगा है !
उनके देश में कितनी ही उन्नत, महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ संस्थाएं हैं, जहाँ ज्ञान है, प्रकाश है और जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. जहाँ कला है, विज्ञान है, शोध है, आदर्श हैं, समूह भावना है, जहाँ देश की विरासत को, प्रेम को बढ़ावा दिया जाता है. जहाँ सीखने का, जानने का और कुछ नया करने का जोश है, जहाँ सामान्य से ऊपर उठकर कुछ ऐसा करने की प्रेरणा मिलती है जिसका असर सारी मानवता पर पड़ता है अथवा तो जहाँ मानव अपने भीतर से जुड़ता है. वह भी अपने भीतर से जुड़ी है, जहाँ एक ऐसी सत्ता का साम्राज्य है जो प्रेम के तन्तुओं से बनी है, शांति जिसका आधार है और आनन्द के वस्त्र जिसने धारण किये हैं. वह सत्ता ज्ञान की तलवार लिए है और सुख के कमल पर बैठी है, वह पावन सत्ता उनमें से हरेक के भीतर है, सभी एक न एक दिन उसका ज्ञान पा लेंगे. सद्गुरू की कृपा से इस जन्म में उसे वह ज्ञान मिला है. उसका समय, उसकी ऊर्जा, उसकी वाणी, उसके विचार, उसकी बुद्धि सभी कुछ उसी से भरी हुई हो. वाणी में दोष अब भी बहुत दिखाई देता है, भीतर छल भी है और द्वेष भी साफ दिखाई देता है. अब से पूर्ण प्रयत्न करेगी कि ऐसी गलती दोबारा न हो. अभी कुछ देर में एक छात्रा पढ़ने आने वाली है, उसे ‘आदमीनामा’ पढ़ाया था. नजीर की यह कविता इसी फितरत पर तो बयान दर्ज करती है, आदमी कितने रंग बदलता है. रक्षक भी वही है, भक्षक भी वही है. कभी वह प्रेम का पुतला बन जाता है तो कभी क्रोध का अंगार, कभी द्वेष से भर जाता है तो कभी ऐसा अनुरागी कि उसे देखकर फरिश्ते भी शरमा जाएँ !

पिछले चार दिनों से डायरी नहीं लिखी, याद नहीं आता क्यों समय नहीं मिला. कल इतवार था सो तो ठीक है, शनि को भी वह सुबह योग सिखाने जाती है, शुक्र व गुरूवार को क्या व्यस्तता थी, उम्र के साथ-साथ याद भी कमजोर पड़ती जाती है. अगले वर्ष अर्ध शतक लग जायेगा. अभी कल की ही बात लगती है, विवाह से पहले घर के सामने रहने वाली एक पागल सी लडकी ने पूछा, कितने साल की हैं आप, तो ‘बीस’ जवाब में सुनकर वह बोली, इतनी बड़ी ! पर आज तो अर्ध शतक भी ज्यादा नहीं लगता. मन तो वैसा ही है बल्कि गुरूजी की कृपा से बच्चों जैसा हो गया है ! अभी-अभी एक सखी से बात की, उसे नन्हे के जॉब की खबर उसकी बिटिया ने दी है.   

Wednesday, January 6, 2016

अंतहीन आकाश



उसके भीतर ख़ुशी का एक ऐसा स्रोत है, जहाँ से प्रतिपल तरंगें उठती हैं, अहैतुकी कृपा प्रतिपल बरस रही है, अमृत का स्रोत भीतर है, जिसका राज उसे मिल गया है. भीतर अनंत शांति है, अपार नीरवता, भीतर एक ऐसी दुनिया है जिसका इस बाहर की दुनिया से कोई संबंध नहीं, वह इसके बिना भी है, वह कुछ करने से प्राप्त नहीं होती, वह बस है. उसकी खबर बस भीतर ही मिलती है. उसके आसपास के लोगों को इसकी भनक भी नहीं है कि इन्सान के भीतर ऐसा भी एक खजाना छिपा है जो अनमोल है. जिसकी खबर मिलने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रह जाता. जो संतुष्टि व तृप्ति का सागर है, जिसे पाने के बाद ही जीवन को उसकी पूर्णता में जीना वे सीखते हैं. इन्द्रियां सजग हो जाती हैं, मन सजग हो जाता है, तन हल्का हो जाता है, त्वचा की संवेदना बढ़ जाती है. कान वह भी सुनते हैं जो और लोग नहीं सुन सकते, भीतर प्रकाश का एक अजस्र स्रोत उत्पन्न हो जाता है. तरंगों के रूप में ऊर्जा का अनुभव निरंतर होता है. कोई भी समस्या होने पर ज्ञान समाधान बनकर सम्मुख आ जाता है. दूसरों के लिए कुछ करने का जज्बा हर वक्त जागृत रहता है. जब अपने लिए कुछ पाना शेष न रहे तो मन अपने आप ही दाता बन जाता है. भीतर कोई उहापोह नहीं, द्वंद्व भी नहीं, विचार भी नहीं, बस एक स्थिरता तथा आनन्द का अहसास. उसे लगता है कि इस ऊर्जा तथा इस शांति का उपयोग सृजनात्मक कार्य में करना चाहिए तथा ज्ञान के इस अमृत का औरों को भी पान कराना चाहिए.
ज्ञान ही वह दर्पण है जिसमें वे अपना वास्तविक रूप देखते हैं. संबंधों की नींव में यदि मोह नहीं है तो उनमें कभी कटुता नहीं आती, कर्म नहीं बंधते. भीतर जब एक क्षण के लिए भी विचलन न हो, सदा समता ही बनी रहे तो मानना चाहिए कि ज्ञान में स्थिति है. आज उसने सुना, उनके कर्मों के अनेक साक्षी हैं. सूर्य, चन्द्र, अनल, अनिल, आकाश, भूमि, यमराज, हृदय, रात्रि तथा दिवस, संध्या तथा धर्म और आत्मा स्वयं भी कर्मों की साक्षी है. परमात्मा रूपी सद्गुरू का हाथ सदा सिर पर है, मस्तिष्क पर उसकी पकड़ है, बुद्धि को प्रेरणा वही देता है, वही सद्विचारों से भर देता है. साधना के समय जब मन दूसरी ओर चला जाता है तो वही इसे श्वास पर टिकाने में सहायक होता है. कल दिन भर, नये वर्ष के पहले दिन तथा आज भी सुबह से अब तक उसका मन किसी बात से विचलित नहीं हुआ है. वाणी का अपव्यय अवश्य हुआ. नया वर्ष उसके जीवन में नई जाग्रति लाये, ज्ञान में स्थिति दृढ़ हो हो, अहंकार न रहे, इसके लिए सजगता की ही आवश्यकता है. इसके द्वारा ही मन की खुदाई कर उसकी गहराई में प्रवेश मिल सकता है. जहाँ का परिष्कार कर संस्कार शुद्ध किये जा सकते हैं, पिछले जन्म के संस्कारों से मुक्ति पाने के लिए यह बहुत जरूरी है.

निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाए पति-पत्नी के लिए एक-दूसरे से बढ़कर निंदक कौन हो सकता है, आंगन की दूरी भी नहीं, दोनों एक ही कमरे में रहते हैं, एक दूसरे की कमियों को दूर करने का कितना बड़ा कार्य करते हैं. उन्हें एक-दूसरे का सम्मान इसलिए करना चाहिए. वे एकदूसरे को जागृत करत हैं, मोह को दूर करते हैं. वे यदि चाहें तो स्वयं का कल्याण हर कदम पर कर सकते हैं. आज मुरारी बापू के यह वचन सुने तो उसे लगा कितना सही कह रहे हैं वे. हर अगला क्षण कितनी नयी सम्भावनाओं से भरा है. उनके सम्मुख है ख़ुशी का आकाश, अंतहीन आकाश ! पर वे हर बार धरा को चुन लेते हैं, डरते हैं आकाश में गुम न हो जाएँ, पर गुम हुए बिना क्या कोई अपने को पा सका है. एक बार तो मरना ही होता है, खोना ही होता है, सहना ही होता है. नितांत अकेलापन जिसके बाद मिलता है निरंतर साहचर्य का भाव, उस परमात्मा से एकता का, अभिन्नता का अपार सुख ! वह जो भीतर कटुता छिपाए है, छल, वंचना तथा ईर्ष्या छिपाए है, तब प्रकट हो जाती है, वह उसे स्वयं से भिन्न देखती है. जैसे कोई अपने को देखे और अपने कपड़ों को जिन पर मैल लगी है, वैसे ही वह अपने मन को देखे और मन पर लगे धब्बों को. वह परमात्मा उन्हें उसके साथ ही कबूल करता है, वह उन्हें चाहता है, उसके उनके संबंध में कोई छल न हो बस इतना ही. वे उसके प्रति सच्चे हों. पर इस जगत में उसे अपने चारों और कोई ऐसा नजर नहीं आता जैसा गुरु जी उनसे चाहते हैं, कोशिश तो हरेक की होनी ही चाहिए.

Tuesday, December 16, 2014

अदृश्य की तरंग



सारी रात सुबह की प्रतीक्षा करती रही. नींद आती भी कैसे. आँखों में उस परम की छवि जो बसी थी. अंतर में उसका असीम स्नेह, उसके दिए प्रेम का अनमोल भंडार ! कल शाम को क्रिया के दौरान उसे आनंद का वह स्रोत पुनः मिला. वह उससे थोड़ी ही दूर पर प्रकाश के रूप में स्थित था. उसका हृदय भावों से भरा हुआ था. निष्पाप, पवित्र हास्य जो झरने की तरह भीतर से फूट रहा था, नियंत्रित नहीं हो रहा था, इतना तो शायद वह पिछले कई हफ्तों में मिलाकर भी नहीं हँसी होगी. इतना प्यार, इतनी ख़ुशी उनके भीतर छिपी है, इतना ज्ञान भीतर छिपा है पर वे उससे दूर रहते हैं. सद्गुरु की जीवन में कितनी महत्ता है, वह अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं. वास्तव में वही जीने की राह दिखाते हैं. कल उसे अनुभव हुआ उसका जन्म इसी क्षण के लिए हुआ था. उस क्षण की प्रतीक्षा में इतने वर्षों से उसके सारे प्रयास चल रहे थे. उस परम से उसने पूछा वह कौन है, वह उसके सारे सवालों के जवाब दे रहा था. उसका प्रश्न समाप्त होते ही न होते जवाब हाजिर हो जाता था. वह उसकी चेतना थी या उसकी चेतना का अंश, वह जो भी रहा हो पर उसका मन गुरूजी व उनके शिक्षक के प्रति कृतज्ञता से भर गया है.

कल शाम ‘ज्ञान चर्चा’ के बाद घर आने से लेकर इस वक्त तक एक क्षण के लिए भी उसके मन से गुरूजी और ईश्वर का भाव नहीं हटा है. मन उनके प्रति श्रद्धा से भर जाता है. मन को जैसे एक आधार मिल गया है, अब तक सिर्फ अव्यक्त ईश्वर ही उसके प्रेम का केंद्र था पर अब एक धारा गुरू की ओर भी प्रवाहित होने लगी है, जैसे ईश्वर ने ही उन्हें भेजा है. ईश्वर के प्रति प्रेम ही वास्तव में प्रेम है, उसके लिए रोने और हँसने दोनों में ही आनंद है.

कल वे तिनसुकिया गये थे, नया ‘म्यूजिक सिस्टम’ खरीदना था. उसके बाद शिक्षक को लेने एक परिचित के यहाँ गये जो उन्हीं के यहाँ रुके हुए हैं. वापसी में उन्होंने श्री श्री के बारे में बहुत सी बातें बतायीं. तेजपुर में होने वाले अगले कार्यक्रम के बारे में भी बताया. art of living हजारों-लाखों व्यक्तियों के जीवन में परिवर्तन ला रहा है और भक्तों को परमात्मा के करीब ला रहा है. जहाँ परमात्मा है वहाँ क्या भय, वहाँ उसके अतिरिक्त कोई कामना भी नहीं रहती. वह तो सदा ही मानव के हृदय में है पर वह उससे दूर बना रहता है. यदि कोई उसे अपने हृदय पर थोड़ा सा भी अधिकार करने दे तो धीरे-धीरे वह उसका स्वामी बन जाता है. इतर इच्छाएं अपने आप झर जाती हैं. एक उसी की सत्ता चलती है. उसके सान्निध्य में रहना मानो स्वर्ग में रहना है. कोई विषाद शेष नहीं रहता. तन भी हल्का हो जाता है. आँखों में ऐसी गहराई की दर्पण में स्वयं अपना चेहरा देकें तो पानी भर आता है. ईश्वर की स्मृति में डूबा मन कैसे मस्ती का अनुभव करता है. बैठ-बैठे ध्यान में डूब जाता है !  


Saturday, August 31, 2013

ताय कांडू yani taekwondo


‘दिल का मरहम कोई न जाने जो जाने सो ज्ञानी’

दिल का प्याला कभी छलक उठता है
और कभी खाली हो जाता है
दूर समुन्दर में कभी दिखते कभी छिप जाते
जहाज के प्रकाश की तरह
वह एक जादूगर जो छिपा है
सात पर्दों के पीछे
चुपचाप हँसता रहता है
या शायद उसकी हँसी भी रूठ जाती हो
दिल के टूटने की आवाज पर
जो वह हजार पर्दों के पीछे भी सुन सकता है !

आज मौसम ठंडा है, कल दोपहर जब वे एक और मित्र के यहाँ थे, वर्षा की मधुर झंकार सुनाई दी और तीन बजे तक बिजली भी आ गयी थी. आज शनिवार है, पिछले दो शनिवारों को नन्हे ने कोई विशेष डिश बनाने में सहायता की थी, आज भी वह तरला दलाल की किताब से कोई नई रेसिपी खोज रहा है.

टीवी पर खबरें सुनकर उसने सोचा, राजनीति यानि राज करने की नीति, राज यानि शासन और नीति यानि कुछ नियम अथवा आचार संहिता, जिसके अनुसार राज चलाया जाना चाहिए. पर राजनीति शब्द का गलत अर्थ निकाला जाता है जब उसे आज के हालात में देखा जाये, राजनीति यानि जोड़-तोड़ करके पाई गयी सत्ता का दुरूपयोग !

शाम के छह बजने को हैं, जून क्लब गये हैं, नन्हा पढ़ाई कर रहा है. वह स्कूल से आकर तायकांडू देखने एक अन्य स्कूल में गया था, आजकल वह सुबह साढ़े चार बजे उठकर क्लब तायकांडू सीखने जाता है. उसके साथ वे भी उठ जाते हैं, कुछ देर टहलते हैं, फिर समाचार देखते हुए चाय, उसके बाद जागरण. आज स्वीपर से घर का जाला आदि साफ करवाया, घर साफ-सुथरा, भला सा लग रहा है. दोपहर को हिंदी पढ़ाने गयी, लौट कर नाश्ता बनाने के बाद एक घंटा बगीचे में काम किया. कल उसने धूप की कामना की थी, जिससे आज गुलदाउदी के पौधे लगा सके, अब आज धूप न निकलने की कामना है ताकि नन्हे पौधे धूप में कुम्हला न जाएँ. इन फूलों का जिक्र आते ही उसे बंगाली सखी याद आया ही जाती है, पता नहीं वह उसे याद करती है या नहीं. सुबह से वह व्यस्त रही है फिर भी एक खालीपन का अहसास मन पर छाया हुआ है. पिछले दो तीन दिनों से जून कोई पत्रिका भी नहीं ला रहे हैं जिसे पलटकर दिल का खालीपन को भर लिया जाये, पर यह खालीपन उस एक की प्रतीक्षा में है वह उसका खुदा जाने कहाँ है ? घर से खत आया है, माँ ने लिखा है, उन्हें खुशी है कि उसकी दिनचर्या व्यस्त है. कल लेडीज क्लब की मीटिंग में गयी थी, वहाँ कुछ खास नहीं हुआ पर घर आई तो नन्हे और जून ने जिस तरह स्वागत किया वह मन को छू गया. फिर ‘हम पांच’, सैलाब और समाचार के बाद जब आँख बंद कर लेटी तो मन में क्लब की बातें ही थीं.