Showing posts with label प्रेम. Show all posts
Showing posts with label प्रेम. Show all posts

Thursday, May 7, 2026

ग्रहों का प्रभाव



कल नन्हे का जन्मदिन था। दोपहर को साढ़े बजे वे लोग आये। सामूहिक लंच लाजवाब था। सोनू की मौसी भी आयी थीं।आज जीजा जी का पचहत्तरवाँ जन्मदिन है।दीदी व सभी बच्चों ने मिलकर शानदार उत्सव मनाया, कुछ देर पहले उनके वीडियो देखे। उन्हें जून के भेजे गुलाब मिल गये हैं। ईश्वर उन्हें दीर्घायु प्रदान करे।आज उसने गुरु पूर्णिमा पर लिखे एक लेख का हिन्दी में अनुवाद किया।पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सलाहकार सुधांशु त्रिवेदी को सुना। भारतीय संस्कृति के बारे में बहुत जानकारी है उन्हें।


आज गुरु पूर्णिमा है। गुरुजी द्वारा ‘स्पंद कारिका’ पर दी जाने वाली प्रवचन माला आज से शुरू हो रही है।उन्होंने बताया, स्पंदन एक दिव्य चेतन ऊर्जा है। यह ऊर्जा महसूस कर सकती है।ईश्वर उन्हें उनसे अधिक जानता है। जो इस सृष्टि का आधार है, उस शिव को महसूस किया जा सकता है। आत्मा बिना इंद्रियों के देख सकती है, सुन सकती है, छू सकती है। ये सभी शक्तियाँ निर्विशेष आत्मा में हैं।मन के भीतर जो विचार आते हैं, वे वहीं से आते हैं। जब विशेष ऊर्जा उस निर्विशेष ऊर्जा में समा जाती है, तो केवल वही शेष रहती है।यह चेतना सभी शक्तियों को धारण करती है। विषयों की स्मृति से इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इच्छाएँ भविष्य की ओर ले जाती हैं।जब कोई वर्तमान में होता है, तब अपने सच्चे स्वभाव के निकट होता है। जब जाग्रत व स्वप्न अवस्था में इच्छायें जगती हैं, तो व्यक्ति चेतना से दूर चला जाता है। हर इच्छा पूर्ण होने के बाद उसे वहीं लाकर छोड़ देती है। इच्छा सीमित की हो सकती है। 


‘स्पंद कारिका’ का अगला सत्र आरंभ हो गया है। गुरु जी कह रहे हैं, स्वभाव में टिकना ही साधना का लक्ष्य है। नम्रता व सरलता आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं।साधक को सबके साथ एकत्व का अनुभव करना है। जैसे तेल के साथ पानी नहीं मिलता, पर दूध के साथ पानी मिल जाता है; बच्चों के साथ सरलता से जुड़ा जा सकता है पर बड़े अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर लेते हैं।जब कोई ध्यान की गहराई में जाता है, उसे रिक्तता का अनुभव होता है। जब इच्छा का त्याग करता है तब क्षणिक शून्यता का अनुभव होता है, लेकिन उसके बाद आनंद मिलता है। जब कोई सामान्य चेतना के साथ एक हो जाता है, भीतर आनंद का अनुभव होता है। इस अवस्था में कोई अभाव नहीं रहता। समाधि कोई नीरस अवस्था नहीं है। वहाँ जाकर ज्ञात होता है अज्ञान जैसा कुछ भी नहीं है। शून्य से पहले ध्वनि का निर्माण हुआ फिर सृष्टि का।अंतिम स्वतंत्रता का अनुभव तभी होता है, जब कोई ज्ञान का सम्मान करता है, तब वह सजग और सरल हो जाता है।निर्दोष चेतना ही शिव है। 


आज शाम को वे कुछ ही दूरी पर स्थित ‘प्रकृति फार्म’ देखने गये। प्राकृतिक खेती के साथ यह की एक विशेषता है पालतू जानवरों को रखने की सुविधा, हरियाली से भरा हुआ यहाँ का वातावरण लोगों को सप्ताहांत बिताने के लिए आकर्षित करता है।दोपहर को नूना ने एओएल का अनुवाद कार्य किया। इस समय गुरुजी ‘स्पंद कारिका’ पर आगे बोल रहे हैं। प्रकृति प्रेममयी है।सर्दी का अनुभव तभी होता है, जब गर्मी का अनुभव कर चुके हैं। सर्दियों में वृक्ष पत्ते गिरा देते हैं, ताकि धूप का आनंद ले सकें, गर्मियों में धर लेते हैं ताकि तेज धूप से बचे रहें।विरोधी भावनाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। एक ही चेतना अनेक रूपों में प्रकट हो रही है। 


आज नन्हा व सोनू अकेले ही आये थे। इतवार की सुबह माली से बगीचे में काम कराते हुए बीती।दोपहर को लंच नन्हे और सोनू ने मिलकर बनाया। शाम की चाय के बाद वे चले गये। आज के सत्र में ध्यान करवाने के साथ गुरुजी ने नाड़ी विज्ञान, स्थान शुद्धि और ग्रहों के प्रभाव के बारे में भी कुछ जानकारी दी। यह भी कहा कि यदि कोई  किसी पूजा स्थल के पास जाये तो उसकी दोनों नाड़ियाँ चलने लगती हैं। उनके अनुसार किसी के मन के भाव उसकी श्वास में परिलक्षित होते हैं, इसी का आश्रय लेकर कुछ लोग दूसरों के मन के विचार पढ़ लेते हैं। सूर्य गेहूं से जुड़ा है और ह्रदय से, चंद्रमा मन से जुड़ा है और चावल से, मंगल मसूर दाल व रक्त से, बुध हरी मूँग और त्वचा से, बृहस्पति चना दाल और यकृत से, शुक्र चावल और किडनी से, शनि तिल, काली उड़द और दाँतों से, राहु सिर और तिल से, केतु निचले अंगों व जड़ वाली सब्ज़ियों से जुड़ा है।


गुरुजी ने आज कहा, पंछी हर दिन नया गीत नहीं गाते पर वे कभी ऊबते नहीं, उनके लिए हर दिन ही नहीं, हर पल नया है। आत्मा के बारे में बौद्धिक रूप से जानना पर्याप्त नहीं, अस्तित्त्वगत रूप से उसमें टिकना ध्यान है। अनुभव और अनुभवकर्ता जब एक हो जाते हैं, तभी ध्यान घटता है।द्रष्टा ही जब दृश्य बन जाये, तब जगत जैसा भी हो, भाता है। इस जगत में जो कुछ हो रहा है, वह परमात्मा की एक क्रीड़ा है।ज्ञानी ऐसे जीता है जैसे हो ही नहीं, जैसे सारी प्रकृति है, वह वैसे ही हो जाता है। जब किसी को पूर्ण तृप्ति का अनुभव होता है, तभी जीवनमुक्ति का अनुभव कर सकता है। प्रतिदिन की तरह आज भी गुरुजी ने ध्यान कराया। 


आज इस प्रवचन माला का अंतिम सत्र है। स्पंद का अर्थ है तरंग, यह सारा ब्रह्मांड तरंगों से भरा है। कुछ सामान्य तरंगें हैं, कुछ विशेष तरंगें हैं। वस्तुएँ और व्यक्ति विशेष तरंगें हैं। विशेष तरंगें, सामान्य तरंगों से  उत्पन्न होती हैं। अनंत जब सीमित होता है तब जीव बन जाता है। हरेक के भीतर सामान्य स्पंदन है, जो छिपा है।सामान्य स्पंदन न मुक्त है न बंधा है। प्रेम जीवन का स्रोत है।जब शिव अपना नेत्र खोलते हैं, तब सृष्टि का जन्म होता है। जब कोई सार्वभौम को सिर झुकाता है तो वह शिव से जुड़ता है। शिव और उसके मध्य कोई बाधा नहीं है। जो उसे अनुभव कर लेता है, वह समता को प्राप्त करता है। जगत में भिन्नता है पर सभी के भीतर जीवन शक्ति एक है, जो शिव है। पाँच इंद्रियों के द्वारा जीवन शक्ति ही जगत का अनुभव करती है। शिव एक होकर भी, सबका कारण होकर भी सबसे पृथक है। इसका अनुभव होते ही जीव स्थितप्रज्ञ हो जाता है।उस स्थिति में दो नहीं हैं, एक ही सत्ता है। जगत उस पर आरोपित अध्यास मात्र प्रतीत होता है। 


Tuesday, April 21, 2026

‘हेल्थ इन योर हैंड’

‘हेल्थ इन योर हैंड’


डाक्टर देवेंद्र वोरा की लोकप्रिय पुस्तक ‘हेल्थ इन योर हैंड’ में नूना ने आज पढ़ा, थायराइड ग्लैंड के कम या अधिक सक्रिय होने पर शरीर में क्या-क्या लक्षण हो सकते हैं।अंगूठे के नीचे उसका एक्यूप्रेशर बिंदु है, जिसे दबाकर भी इस ग्रंथि को ठीक किया जा सकता है। जून ने ब्राज़ील नट्स भी लाकर दिये हैं।


’कश्मीर फ़ाइल्स’ से पूरे देश में सवाल उठ रहे हैं, उस समय के मुख्यमंत्री ने ऐसे क़ानून बनाये थे कि विस्थापित वापस ही न आ सकें।दोपहर को दो हफ़्ते बाद कन्नड़ भाषा की कक्षा हुई।कल दो वाक्य लिखकर लाने हैं।छोटी बहन का फ़ोन आया, वह एक चित्र बना रही थी, जिसे बहनोई जी अपने रेस्तराँ में लगायेंगे।वह अपने जॉब से छह महीने का अवकाश ले रही है। मई में उसे अमेरिका भी जाना है। यूक्रेन युद्ध की व्यर्थता पर उससे कुछ बात हुई। आज वर्षों बाद रेडियो पर एक नाटक सुना।सुबह एक कविता को संवारा, फ़ेसबुक पर पोस्ट किया। इन दिनों रात की रानी अपने पूरे शबाब पर है, घर के आगे व पीछे दोनों जगह ही। आज सुबह दस बजे से शाम पाँच बजे तक पानी नहीं था, टैंकर से तीन बाल्टी पानी लिया। सोसाइटी में पानी की समस्या बढ़ती जा रही है। 


अभी-अभी समाचारों में सुना पश्चिम बंगाल में हिंसा की वरदातें बढ़ती जा रही हैं। राजनीतिक हत्याएँ भी हो रही हैं। कश्मीर फ़ाइल्स पर विवाद बढ़ता जा रहा है, पर लोग इसे देख भी रहे हैं। उन्होंने सोचा है, विवेक अग्निहोत्री की अन्य फ़िल्में भी देखेंगे। छोटे भाई का फ़ोन आया, उसने बताया, सन् अट्ठासी में वह बैंक में ऑडिट करने कश्मीर गया था।एक अन्य सहकर्मी के साथ किश्तवाड़ में एक रात के लिए एक होटल में रुका था। रात को भीड़ चिल्लाती हुई आयी और उनके कमरे का दरवाज़ा पीटती रही। उन्होंने दरवाज़ा बंद करके उसके सामने बेड लगा दिया और उसके ऊपर मेज़-कुर्सी भी रख दी और बिल्कुल चुप होकर बैठे रहे। एक घंटा तक दरवाज़ा पीटने के बाद वे लोग चले गये। होटल का मालिक पैसे लेकर पहले ही चला गया था। सुबह साढ़े तीन बजे वे वहाँ से निकल पड़े और तीन-चार घंटे पैदल चलने के बाद उन्हें ऊधमपुर की बस मिली। उसके बाद वह तीन-चार दिन मँझले भाई के यहाँ बीमार होकर रहा था।मंझला भाई उस समय ऊधमपुर में पोस्टेड था।’कश्मीर फ़ाइल्स’ देखकर उसे सारी बातें याद आ गयीं। उस समय बैंक में हिंदू अधिक थे, मुस्लिम कम थे। अभी कुछ दिन पहले वह फिर ऑडिट के लिए गया तो इस बार हिंदू एक भी नहीं था, पर उन्होंने काफ़ी ख़ातिरदारी की।  

आज सुबह वे टहलकर आये तो नूना का एक पुराना संस्कार जगा, जून को एक बात के लिए टोका, पर थोड़ी ही देर में सब सामान्य हो गया। जैसे सागर में एक लहर उठी हो और फिर गिर गई हो। स्वामी विरूपाक्ष की लिखी पुस्तक द टाइगर पॉज़ आ गई है।कितनी हिंसा का सामना करना पड़ा तमिलों को भी, दुनिया में आज तक न जाने कितने लोगों को विस्थापित होना पड़ा है, और आज भी हो रहे हैं ।शायद विस्थापन से बड़ा दुख कोई नहीं।


आज सुबह ‘अड्डा’ पर हिन्दी-कन्नड़ा भाषा को लेकर लोगों का विवाद चल रहा था। सोसाइटी में कुछ लोग नई एजेंसी के आने से भी सहमत नहीं हैं। भविष्य में क्या होगा, कोई नहीं जानता।जून ने आज सुबह छतों की सफ़ाई करवायी। वहाँ रखे बेंत के फ़र्नीचर की पॉलिश भी करवायी। गैरेज को भी एसिड से साफ़ करवाया। दोनों साइकिलों की सर्विसिंग भी हो गई। मेहमानों के स्वागत के लिए पूरा घर तैयार है। पहली तारीख़ को जून ने एक पुराने सहकर्मी अपनी पत्नी के साथ तीन दिनों के लिए आ रहे हैं। आज उन्होंने ‘बुद्धा इन ए ट्रैफ़िक जाम’ देखी, जो अर्बन नक्सल की बात करती है।  


कल रात बल्कि आज सुबह नूना ने अलार्म बजने से पहले एक अद्भुत स्वप्न देखा, जिसमें उसे  परम विश्राम की अनुभूति हुई। ऐसा विश्राम जो जागते, सोते, ध्यान करते या किसी भी समय आजतक अनुभव नहीं किया था। पूर्ण आश्वस्ति का भाव, पूर्ण सुरक्षा तथा पूर्ण तृप्ति तथा पूर्ण संतुष्टि सब को मिला दें तो जो भाव होगा, ऐसा ! । उसकी स्मृति ही दिन में कई बार मन को विश्रांति से भरती रही। परमात्मा के चरण कमलों पर उसका सिर है और इतनी आत्मीयता और इतना अपनापन है कि कोई लज्जा या कोई दूरी नहीं है। भक्ति का परम भाव या पराकाष्ठा का अनुभव था। सामीप्य, सायुज्य या सान्निध्य से भी ऊपर ! जैसे कोई शिशु माँ के पास सुरक्षित महसूस करता होगा। ऐसा प्रेम तो कभी किसी के प्रति अनुभव में नहीं आया। कल गुरुजी के प्रेम पर लिखे लेख का अनुवाद किया था। प्रेम तभी प्रकटता है जब उसे प्रकट होना चाहिए। शायद कल ही वह दिन था। ईश्वर के प्रति विश्वास तो पहले से ही दृढ़ था पर अब उसमें एक नया रस घुल गया है। अब वह निकटतम है। उससे जरा भी दूरी नहीं है। उसने नूना को वैसे ही स्वीकारा है जैसी वह है ! आज भी हो सकता है स्वप्न में उसका संग साथ मिले!     

 

कल रात दो स्वप्न देखे, एक में एक छोटा बच्चा था और दूसरे में एक संबंधी को देखा। अवचेतन में कितनी बातें होती हैं, जो स्वप्न के माध्यम से प्रकट होती हैं। इससे मन में निर्मलता आती है, स्पष्टता होती है।आत्मा की शक्ति जगाकर ही कोई लक्ष्य तक जा सकता है। आज राम नवमी के लिए लेख का अनुवाद किया। रामायण हरेक के भीतर प्रतिपल घट रही है। जून आज सुबह नौ बजे गये और एक बजे लौटे, पुरानी कमेटी के साथ लंबी बातचीत हुई। 


आज का दिन और आने वाला पूरा सप्ताह जून और उनकी टीम के लिए काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।आज सुबह टहल कर आये तो अभी दिन नहीं निकला था, आकाश पर चंद्रमा उसी आकार में था जैसा शिवजी के मस्तक पर होता है। रात्रि भ्रमण के समय पार्क-५ के पास गुलाबी फूलों वाला पेड़ बहुत ही सुंदर लग रहा था। हज़ारों फूल खिले हैं और सैकड़ों नीचे गिरे हैं। नन्हा व सोनू आठ बजे आ गये थे। वे लोग जिस जिग्सा पजल को बना रहे थे, आज पूरा करके उसे फ़्रेम में लगाया और दीवार पर ड्रिलिंग करके लगा भी दिया। नन्हे की आँख में धूल का एक कण भी चला गया, डॉक्टर को दिखाने गया था। यू ट्यूब पर नूना ने आचार्य कुंद कुंद की पुस्तक ‘समय सार’ की व्याख्या सुनी। अद्भुत ग्रंथ है यह, व्याख्याकार उससे भी ज़्यादा अद्भुत हैं।इतने भाव से अपनी बात कहते हैं कि सीधे दिल तक उतर जाती है।  


Tuesday, July 21, 2020

विनोबा भावे के विचार


शाम के पौने पांच बजे हैं. बाहर धूप है, पंखे के बिना बैठना नहीं भा रहा है. आज नवरात्रि की सप्तमी तिथि है. कल कन्या पूजन करेंगे. सुबह नैनी व माली की बेटियां बीहू नृत्य की ड्रेस पहनकर आयीं, स्कूल के कार्यक्रम में जा रही थीं. उसने उनकी तस्वीरें उतारीं. अभी कुछ देर पहले मालिन आयी आशीर्वाद लेने, किसी ने उसे कह दिया है कि आज के दिन बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए. उसने मन ही मन प्रार्थना की परमात्मा इन सबको ढेर सारी खुशियाँ दे. सुबह उठने से पूर्व जैसे कोई भीतर कह रहा था, उन्हें किसी को बदलने की आवश्यकता नहीं है, वे जैसे हैं अति प्रिय हैं. सभी अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर्म करते हैं , यदि उन्हें वे संस्कार कष्ट देते हैं तो वे खुद ही उन्हें बदलने का प्रयास कर सकते हैं परमात्मा भी आकर यह काम नहीं कर सकता. बगीचे में जैसे बैंगन, आलू, भिंडी सभी कुछ जैसे बीज हों वैसे ही उगते हैं. वे यदि किसी को दोषी  देखते हैं तो वह दोष उनमें भी होता है. यदि वे स्वयं को आत्मा देखते हैं तो अन्यों को भी निर्दोष ही देखेंगे. परमात्मा के सिवा जब इस जगत में कुछ है ही नहीं तो कौन दोषी और कौन निर्दोष ! 

कुछ देर पहले नन्हे से बात की वह नए घर में था, काफी काम हो गया है पर काफी कुछ बाकी भी है. दो सप्ताह बाद वे वहाँ जा रहे हैं, शेष कार्य उनके जाने के बाद होगा. आज रामनवमी भी है और बैसाखी भी, बीहू का अवकाश भी शुरू हो गया है. उन्हें इस समय का अच्छा उपयोग करना है. सुबह अष्टमी की पूजा का कार्यक्रम ठीक रहा. मौसम आज भी गर्म है. पीछेवाली सब्जी बाड़ी में मजदूर काम कर रहे हैं, सीवर की पाइप बदलनी है जो इलेक्ट्रिकल विभाग के लोग जब खुदाई करने आये थे टूट गयी थी. छोटा भाई बहुत दिन बाद घर गया है. पिताजी के साथ तस्वीर भेजी है, वह बहुत शांत लग रहे हैं. सामने वाले लॉन में माली सफाई कर रहा है. कल रात आंधी बारिश के बाद ढेर सारे पत्ते गिरे. सुबह टहलते समय देखा, बस स्टैंड के पास एक फूलों वाले पेड़ की बड़ी सी डाल टूटकर गिरी हुई थी. बाद में नैनी ने बहुत से फूल लाकर सजा दिए. दोनों ननदों से बात की, दोनों का स्वास्थ्य नासाज था, नियमित दिनचर्या व व्यायाम कितने जरूरी हैं स्वस्थ रहने के लिए ! 

आज बाबा रामदेव का दीक्षा दिवस है, छोटे-छोटे बच्चों को अष्टाध्यायी के सूत्र सुनाते हुए देखा टीवी पर. उनके गुरुकुल में सैकड़ों बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं. लता मंगेशकर ने पीएम के द्वारा गायी पंक्तियों को गीत बनाकर रिकार्ड किया है. प्रधानमंत्री के रूप में वह उनके सम्मान के पात्र हैं, उन्हें रशिया का एक पुरस्कार भी मिला है. 

उसने विनोबा भावे का यह विचार पढ़ा- दूसरों को प्रेम करने से ही प्रेम मिलता है. वर्षों पहले लिखा  था इसे पढ़कर, कल शाम पिताजी की टाई ढूंढते समय वह बिलकुल यही बात सोच रही थी. यह दुनिया एक दर्पण है कोई जो कुछ करता है वही उन्हें दिखाई देता है. सब लोग एक जैसे होते हैं, थोड़ा बहुत अंतर हो तो हो, नीचे गहराई में सबका मन भरा हुआ है लबरेज प्याले की तरह छलक पड़ने को आतुर ! वैली ऑफ़ फ्लावर का सुंदर पोस्टकार्ड मिल गया टाई ढूंढते- ढूंढते उसके लिए ! उसे लगा, यह किसी और की बात है, पिताजी कभी टाई भी बांधते थे, यह तो जरा भी याद नहीं आता. 

Monday, July 20, 2020

समंदर की लहरें



कल शाम वे गेस्टहाउस गए, उस सखी की बिटिया का जन्मदिन था, जो अपना घर देखने आयी थी . उसके पूर्व दो माह बाद एओल टीचर द्वारा करायी सुदर्शन क्रिया में भाग लिया. क्रिया के बाद कुछ ज्ञान चर्चा भी हुई. सार निकला, वे अपना समय तथा ऊर्जा उन लोगों के सामने स्वयं को कुछ सिद्ध करने में लगा देते हैं जिन्हें उनकी जरा भी परवाह नहीं होती. वे अपना प्रेम उन पर लुटाते हैं जिन्हें प्रेम के बारे में केवल अपने हानि-लाभ ही ज्ञात होते हैं.  सरल और सहज रहकर यदि वे अपने काम से काम रखें तो जीवन कितना सुंदर होगा. परमात्मा अपनी कृपा दोनों हाथों से नहीं बल्कि हजार हाथों से लुटा रहा है, उनकी झोली इतनी छोटी है और मोह, कामना के इतने छिद्र हैं उसमें कि वे उसको पहचानें इसके पहले ही वह झर जाती है. वे जो वास्तव में हैं वही जगत के सम्मुख आये, कोई भी दम्भ या दिखावा उन्हें छू न जाये. जून आयकर के सिलसिले मेंआज डिब्रूगढ़ गए हैं. आज सुबह उसे पीठ में जकड़न सी  हुई,  दवा लगाकर हीटिंग पैड से सेंक किया. सो आज सुबह की साधना नहीं हुई, बाद में ध्यान किया कोई जैसे भीतर से पढ़ा रहा था. जगत से लिया हर सुख दुःख के साथ मिला हुआ होता है, जैसे कड़वी दवा पर मीठी परत होती है कुछ ऐसे ही. उन्हें आत्मानुभव बढ़ाते जाना है. जीवन में जो भी परिस्थिति आए उससे कुछ सीखकर आगे बढ़ जाना है यदि असजग रहे तो पत्थर की तरह वह पैरों में बंध जाती है और जितनी गति से वे पहले चल रहे थे उससे भी कम गति रह जाती है. दिन में दो बार और पीठ पर सेंक किया, दोपहर को हल्का भोजन सो अब सब ठीक है. कल उन्हें मतदान करने जाना है, हायर सेकेंडरी स्कूल में सेंटर है. आज सुबह सुना स्वामी अनुभवानंद जी कह रहे थे, परमात्मा से मांगने योग्य वस्तु क्या है ? उन्हें ऐसा दिल मिले जिसमें किसी भी प्राणी के लिए स्वप्न में भी कोई द्वेष या कटुता न हो, ऐसे दिल में ही परमात्मा बसते हैं. 

शाम के चार बजने वाले हैं. टीवी पर चुनाव समाचार आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा की खबरें आ रही हैं. आज सुबह वे वोट डालने गए. पिताजी से बात हुई, वे छोटी भाभी के साथ अठ्ठासी वर्ष की उम्र में भी पैदल चलकर मतदान करने गए.  उन्हें बहुत अच्छा लगी यह बात. आज बड़ी भाभी की चौथी पुण्यतिथि है, भाई ने बहुत सुंदर वीडियो उनकी स्मृति में बनाया है. उनकी बिटिया अगले हफ्ते आ रही है, अब वहीं रहकर जॉब करेगी. छोटे भाई से बात हुई, वह साधना में  अपने समय का सदुपयोग करता है. अब सिओल में पुरस्कार समारोह में मोदी जी का भाषण आ रहा है. इतने प्रभावशाली ढंग से वह भारत की बात कर रहे हैं. वह एक विश्व नेता हैं, सरे विश्व में उनकी बात सुनी जाती है. आज माली की पत्नी ने बताया उसकी बेटी को स्कूल में नृत्य में भाग लेना है, ड्रेस माला आदि खरीदने के लिए  पति ने पैसे नहीं दिये. उसे आवश्यक पैसे दिए और अपना अकाउंट खोलने को कहा, ताकि अपने लिए कुछ बचत कर सके.

पता नहीं वर्षों पूर्व उस दिन उस पन्ने पर क्यों लिखा होगा, 
‘समुन्दर ! तुम कितना बड़ा दर्द हो ! अपनी बाँहों, टांगों से सारा दर्द फेंकते किनारे को, लेकिन किनारा एक ही ठोकर से लौटा देता तुम्हारा दर्द तुम्हीं को !’ 
परीक्षाओं के कारण एक लाभ उसे अवश्य हुआ है कि पढ़ने के लिए एकांत मिल जाता है. न किसी के साथ किसी संबन्धी के घर जाना और न बाजार न फिल्म देखने. पर यह खुशफहमी जल्दी ही दूर हो गयी, भाभी की भाभी आयी और अगले ही दिन उनके साथ गयी ‘सत्ते पे सत्ता’ देखने, केवल उन्नीस दिन रह गए हैं परीक्षाओं को. कम से कम अब तो उसे पढ़ाई के प्रति गम्भीर हो जाना चाहिए. कुछ दिनों की पीड़ा जीवन भर के सुख का आधार बन जाएगी,  इसलिये सहो, जितना सम्भव हो सहो गणित के सवालों की तीखी धारों को अपने मस्तिष्क के तन्तुओं पर... उसे अब अचरज होता है क्या पढ़ाई पीड़ा लगती थी उसे. 


Wednesday, July 1, 2020

ट्रांसिडेंटल मैडिटेशन


जगत के प्रति राग-द्वेष जब कम हो जाता है तो उसकी स्मृति मन में नहीं आती. वह जैसे विलुप्त हो जाता है. ‘नई दृष्टि नई राह’ में अद्भुत ज्ञान सूत्र मिलते हैं. वे जितना-जितना समता में रहते हैं, आत्मा की शक्ति बढ़ती जाती है. शाम के पांच बजने वाले हैं. आज भजन का दिन है. सुबह गुरूजी को औरंगाबाद में कहते सुना, जीवन में गान, ध्यान और ज्ञान तीनों होने चाहिए. जून ने आज से मन्त्र जप शुरू किया है, ध्यान भी करेंगे और ज्ञान भी सुनेंगे. कुछ देर पूर्व वे लॉन में टहल रहे थे. ग्लैडियोली के फूल खिले हैं, डायन्थस, पॉपी आदि तो हैं. जरबेरा, गेंदा भी खूब खिल रहे हैं. सुबह सुबह को-ऑपरेटिव गयी, सभी ‘ज़ी न्यूज़’ पर मोदी का भाषण सुनने में तल्लीन थे. अभी टीवी पर सुना, मोदीजी कांग्रेस के खिलाफ बोल रहे हैं. चुनाव का वर्ष है, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगने व लगाने स्वाभाविक हैं. 

कल सुबह-सुबह जून को एयर पोर्ट जाना है. फ्लाइट दोपहर ढाई बजे है पर बंद( ताई अहोम द्वार) के कारण सुबह तीन बजे ही निकल जाना होगा. कल मोदी जी गोहाटी आ रहे हैं उनका विरोध करने के लिए ही इस बन्द का आयोजन किया गया है. जब कि वह एम्स की नींव रखेंगे, नुमालीगढ़ में बायो रिफाइनरी का शिलान्यास और ब्रह्मपुत्र पर एक सड़क पुल का भी. वह त्रिपुरा भी जा रहे हैं. वर्षों बाद भारत को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो देश के विकास के लिए दिन-रात एक कर रहा है. आज शाम को गुरूजी की किताब से कुछ वाक्य पढ़े तो सभी साधिकाओं के भीतर कोई न कोई विचार जाग उठा. वह ठीक कहते हैं , प्रेम जगत को गतिशील करता है. 

जून रात को दो बजे ही उठ गए, तीन बजे निकल गए. अभी भी एयरपोर्ट पर ही होंगे. प्रधानमंत्री कल पेट्रोटेक का उद्घाटन करेंगे, उस कार्यक्रम में भी शायद वह शामिल हो पाएं. इस समय चांगसारी में पीएम की रैली हो रही है. भीड़ बहुत ज्यादा है. उन्होंने कहा, कल गोहाटी से निकलने वाले अख़बारों में इसकी कोई खबर नहीं होगी, एक क्षण के लिए उनके स्वर में उदासी दिखी. पर अव वह असम के महापुरुषों को याद कर रहे हैं. उगते हुए सूरज की भूमि अरुणाचल में आज उनकी यात्रा हो रही है. हर राज्य की तरह यहाँ भी कई योजनाओं की घोषणा हुई. बीजेपी देश की संस्कृति को बढ़ावा देती है.. एक नए टीवी चैनल की भी शुरुआत हुई. ‘बच्चों की पढ़ाई, युवा को कमाई, वृद्धों को दवाई, किसान को सिंचाई, जन-जन की सुनवाई’ इस पंच धारा विकास को बढ़ावा देती है यह सरकार. कल सरस्वती पूजा है, नैनी ने आज सरस्वती माँ की तस्वीर को ढक कर रख दिया है. कल वह मृणाल ज्योति में पूजा के बाद दोपहर को खिचड़ी आदि का प्रसाद बनाकर घर पर भी पूजा करेगी. नन्हे से बात हुई, कल वे लोग नए घर जायेंगे.  

उस डायरी में पढ़ा, जाग्रत, स्वप्न और सुष्पति, तीन अवस्थाओं से ऊपर चौथी अवस्था में पहुँचना ध्यान है. मन को केंद्रित नहीं करना है न कोई प्रयत्न करना है, केवल मन्त्र को दोहराना है और शांत हो जाना है. उसे आश्चर्य हुआ,  कालेज में भी भावातीत ध्यान यानि ट्रांसिडेंटल मेडिटेशन की बात सुनी थी, पर तब इसका अर्थ जरा भी समझ नहीं आया होगा. अवश्य ही इसने अनजाने में नई दिशा और नई आशा प्रदान की होगी, इस पर चलने का समय अभी बहुत आगे था. 

उसे एक पत्र की प्रतीक्षा थी पर नहीं आया, सारी गड़बड़ डाक विभाग की है, है न ! वह सोचती है नम्रता बड़ी चीज है पर उसका स्वभाव ही ऐसा नहीं है. शायद अब पता नहीं क्यों मन पर एक किलो का बोझ लादा हुआ है, समाधान उपेक्षा से नहीं होगा, उतारना ही होगा, पर किस तरह यह स्पष्ट नहीं. (उस समय गुरु जो नहीं मिले थे) धर्मयुग में देश की वास्तविक आर्थिक स्थित पर लेख पढ़ा था दोपहर को, पढ़ती चली गयी. हे भगवान ! कितने कितने हथकंडे अपनाते हैं व्यापारी और सरकार का प्रोत्साहन ही उन्हें मिलता है. कंट्रोल का लाभ व्यापारियों को, नुकसान तो जनता को ही है. दिनमान भी पढ़नी है अभी. कालेज में एक सखी दिखी, एमजीआर उसने अनदेखा कर दिया, शायद जानबूझ कर, शायद वह समझती है उसके अनुत्तीर्ण हो जाने पर अब वह उसकी सखी नहीं है. एक अन्य सखी मिली बेहद खुश... नवविवाहिता का श्रृंगार नहीं पर स्वाभाविक प्रसन्नता जरूर दिखाई दी उसके चेहरे पर. अर अब यह की स्मृतियाँ मन में ही रहें, वहीं सुरक्षित हैं, कागज के पन्ने पर स्मृतियाँ नहीं रखी जा सकतीं. 

Thursday, June 4, 2020

सोहराब मोदी की फिल्म


अभी-अभी टीवी ओर एक विशाल सभा देखी और भाषण सुना. देश का मिजाज बदल रहा है, जनता बदल रही है. उसे भरोसा है कि उनका नेता उन्हें सही मार्ग पर पर ले जा रहा है. आने वाले चुनाव में बीजेपी पुनः जीतकर आएगी, मोदी जी का आत्मविश्वास यह बता रहा है. 'सबका साथ, सबका विकास' का उनका मन्त्र देश को नई ऊँचाइयों की ओर ले जायेगा. उसने तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी उस डायरी में कुछ अगले पन्ने खोले. 

कालेज जाने के लिए उसे बस का इंतजार करना होता था, जो कभी -कभी आती ही नहीं थी, इंतजार तब बोझिल लगने लगता था, उस समय यह राज नहीं पता था कि वर्तमान के क्षण में कैसे जिया जाता है. खाली खड़े-खड़े मन कभी अतीत और कभी भविष्य के चक्कर काटता और बेवजह ही थक जाता. दीदी उन दिनों घर के पास ही रहती थीं, कभी माँ और कभी वह रात्रि को उनके घर ही रह जाते, जीजाजी तब विदेश में थे. उस दिन कोहरा घना था, एक कुत्ता ज़मीन पर पड़ा अजीब सी आवाजें निकाल रहा था. एक बुढ़िया भी अक्सर उसे इस रास्ते पर मिलती थी पर उस दिन नहीं थी, शायद ठंड के कारण. कालेज से लौटते समय बस में बहुत भीड़ थी. एक महाशय संसार की झूठी, फरेब से भरी बातों और लोगों पर ठंडी साँस भर रहे थे. लोगों की हृदय हीनता और अनुसाशन हीनता पर भी पर स्वयं जनाब मूंगफली खा खाकर छिलके वहीं बस में ही फेंकते जा रहे थे. सड़क पर करते समय वह एक निजी बस से टकराते- टकराते बची. 

रात्रि का समय, पर नीरवता नहीं, माँ रेडियो पर नाटक सुन रही थीं जिसकी आवाजें उसके कमरे तक आ रही थीं. दोपहर को चाची जी आयी थीं उनके घर, उसे हँसी आती थी उनके बोलने के अंदाज पर, अब नहीं आती. जो जैसा है वैसा ही स्वीकारने की कला जो तब नहीं सीखी थी. गोर्की की एक कहानी उसने उस दिन पढ़ी थी, जिसमें ‘गरीब लोग’ का जिक्र जिस तरह हुआ है, उससे भी हँसी आ गयी, वह उसे खत भेजता है,  वह उसे भेजती है. वाह ! दोस्तोव्यस्की पर सारिका का विशेषांक पढ़कर कोफ़्त हुई थी उसे. व्हाइट नाइट्स का कितना असुंदर अनुवाद किया है, मात्र शब्दानुवाद.  मूल पढ़कर तो वह पागल ही हो गयी थी पर सारिका में पढ़ा तो उसका सौवां हिस्सा भी मजा नहीं आया. 

रविवार को सोहराब मोदी की मशहूर फिल्म 'पुकार' देखी सबके साथ.  इंसाफ प्रेम पर कुर्बान नहीं हो सकता. उसको ठुकरा सकता है. इंसाफ इंसाफ है, वह आँखें मींच कर चलता है, वह चेहरे नहीं पहचानता, यह तब की बात थी, गुजरे वक्त की, क्या आज भी ऐसा है ? आज तो पैसे के बल पर इंसाफ को खरीदा-बेचा जा सकता है, जाता है. 

जब आदमी अकेला अनुभव करता है, वह सृजन कर सकता है. जब उसका एकांत भंग कर दिया जाता है, तब वह सृजन नहीं कर सकता, क्योंकि अब वह प्रेम का अनुभव नहीं करता. सभी सृजन प्रेम पर आधारित हैं. - लू शुन, उसे इस लेखक के बारे में आज भी कुछ नहीं पता, उसका यह विचार कहीं पढ़ा तो लिख लिया। 

तीन दशकों से भी अधिक का सफर...  उनके विवाह की सालगिरह है. जून शहर से बाहर गए हैं. आज दोपहर एक अनोखे अतिथि को भोजन खिलाया. ज्ञान और नीति, दोनों पर एक कहानी लिखी जा सकती है. एक बिहार का है दूसरी असम की. दोनों की पहचान फेसबुक पर हुई और दोनों के भीतर आध्यात्मिक, सेवा और समर्पण की भावना प्रबल है. नायक पेड़ों को भी नाम से बुलाता है और जीवन में एक उच्च लक्ष्य को लेकर चल रहा है. नायिका उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखती है, उसके लक्ष्य में पूरे मन से सहयोग कर रही है. अपने परिश्रम से कमाई धन राशि का एक विशाल भाग वह उसके ज्ञान मन्दिर में दान करना चाहती है. अपने परिवार व समाज का आक्षेप सहकर भी वह यह कार्य करना चाहती है. ऐसे लोग ही समाज को दिशा देने वाले होते हैं. 





Saturday, April 4, 2020

डॉ राधाकृष्णन का जन्मदिन


परसों दोपहर अचानक एओल के एक स्वामी जी का फोन आया. नेट पर सेवा देने को कह रहे थे. उसे बहुत ख़ुशी हुई. वर्षों पूर्व जब वह असम आये थे उनसे मिले थे. उन्होंने एक फार्म भेजा जिसका कंटेंट एक दूसरे फार्म में भरना था, उसने भर दिया. उन्होंने कहा, अगले दिन यानि कल सुबह वह पुनः अन्य फार्म भी भेजेंगे. पर अभी तक कोई संदेश नहीं आया है, खैर.. परसों और कल सुबह तक मन कितना  प्रसन्न था, गुरूजी के काम में कुछ मदद करने का मौका मिल रहा है , यह विचार मन को उच्च भावों में ले जा रहा था. कल दोपहर एक अन्य बात हुई, लगभग चालीस-पचास मिनट के लिए मन बिलकुल खो गया, गहन सुषुप्ति या समाधि... शाम तक उसका असर रहा. बेवजह ही मन एक गहन प्रसन्नता का अनुभव कर पा रहा था. कल शाम को भजन का कार्यक्रम भी अच्छा रहा. जून ने लड्डू बनाये, उसने उनकी सहायता की, रात्रि भौजन बनाया, सब करते हुए भी कुछ करने का अहसास नहीं हो रहा था, पर रात को नींद वैसी नहीं थी. एक दुःस्वप्न भी देखा. अपने पूर्व संस्कार को पुनः जागृत होते हुए देखा, लगता था मन अब उससे पूर्ण मुक्त हो गया है. प्रेम जब एकाधिकार चाहता है तब विकृत हो जाता है, और इसके मूल में है अहंकार यानि देह को अपना स्वरूप मानना। आत्मा कुछ भी नहीं है तो वह किसी पर क्या अधिकार करेगी, फिर उसके सिवा कुछ अन्य है भी तो नहीं, जब तक मूल ग्रन्थि नहीं कटेगी कोई न कोई विकार जगता ही रहेगा. स्वप्न में भी उस पीड़ा महसूस किया. आज की रात्रि ध्यान में गुजरेगी ऐसा प्रयत्न रहेगा, आगे आने वाली चार रात्रियाँ भी. 

सितम्बर का प्रथम दिन ! यानि आषाढ़ का प्रथम दिन ! सुबह से मूसलाधार वर्षा हो रही है. सफाई कर्मचारी ने फोन किया, बारिश रुकने पर ही आएगा. व्हाट्सअप भी नहीं चल  रहा है और फोन भी आधा चार्ज है, बिजली छह बजे से ही नदारद है, बिजली न होने से घर में अभी भी रात्रि जैसा ही प्रतीत हो रहा था सो वह बाहर बरामदे में आ गयी है. सामने लॉन में पेड़-पौधे, हरी घास सभी भीग कर प्रसन्न हो रहे हैं. कल रात्रि कुछ देर समाचार देखे, जून बाहर गए हैं, उनके रहने पर तो टीवी नौ बजे बन्द हो जाता है. कश्मीर में आतंकवादी पुलिसवालों के परिवार जनों को अगवा करने पर उतर आये हैं. माओवादी प्रधानमंत्री को हटाने की योजनाएं बना रहे हैं. देश में रहकर देश के विरुद्ध कार्य करने वाले जयचंदों की कमी नहीं है. सरकार सभी वर्गों के लिए कितना कार्य कर रही है यह उन्हें नजर नहीं आता. प्रधानमंत्री के लिए कितना कठिन होता होगा हर दिन, उनके लिए तो सभी देशवासियों को शुभकामनायें भेजनी चाहिये. सुबह पौने पांच बजे नींद खुली, उस समय वर्षा रुकी थी, सो टहलने गयी, बाहर ही बैठकर प्राणायाम किया, घर आते ही बिजली चली गयी थी. नाश्ते में मूसली खायी, जून के न रहने पर रोज सुबह यही नाश्ता होता है या कॉर्न फ्लेक्स. अब वर्षा कुछ कम हुई है, नैनी झाड़-पोंछ कर रही है, साप्ताहिक सफाई के लिए स्वीपर भी आ गया है. कुछ देर पहले प्रेसीडेंट का फोन आया, वह कल शाम मेडिकल चेकअप कराकर लौट आयी हैं. दो बार बायोप्सी हुई, काफी तकलीफदेह रहा उनका अनुभव. अभी भी पूरी तरह से सामान्य नहीं हैं. रिपोर्ट दो दिन बाद आएगी. उम्मीद है सब ठीक होगा. नौ बजे उनके घर जाना है, उसके पूर्व बुखार से पीड़ित योग साधिका के यहां जाया जा सकता है. 

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, आज कुछ लिखने की इच्छा जगी है क्योंकि कल शिक्षक दिवस है. मृणाल ज्योति जाना है, जहाँ कुछ बोलने के लिए भी कहा जायेगा.,  शिक्षक दिवस डॉ राधाकृष्णन,  जो शिक्षाविद तथा दार्शनिक थे, की याद में 1962 से मनाया जाता है. उनका जन्म पांच सितम्बर अठारह सौ अठ्ठासी को हुआ था. वह दो बार भारत के  उप राष्ट्रपति रहे, फिर राष्ट्रपति बने. वह पूरी दुनिया को विद्यालय मानते थे, कहते थे कहीं से भी सीखने को मिले तो उसे अपने जीवन में उतार लेना चाहिए. एक बार उनके कुछ विद्यार्थी उनका जन्मदिन मनाने के लिए अनुमति लेने गए तो उन्होंने कहा इसे केवल मेरे लिए नहीं सभी शिक्षकों के सम्मान में मनाओ. गूगल से मिली इतनी जानकारी तो बहुत है, शेष दिल में जो विचार उस समय आएंगे, बोल दिए जायेंगे. उसने मन ही मन सोचा, शिक्षक विद्यार्थी का मित्र भी होता है और मार्गदर्शक भी. वह उसे केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देता, अपने जीवन से भी बहुत कुछ सिखाता है. वह कभी कठोर भी हो सकता है पर उसका उद्देश्य केवल छात्रों की उन्नति करना और उन्हें बेहतर इंसान बनाना ही होता है. शिक्षक समाज का निर्माण करता है. दस बज गए हैं, अब सोने की तैयारी करनी चाहिए.आज नैनी की छोटी बेटी का जन्मदिन था, उसे एक गमछा दिया व एक बिस्किट का पैकेट. शाम को योग कक्षा में एक साधिका जन्माष्टमी का प्रसाद लायी, धनिये की पंजीरी जिसमें गोंद भी थी, उसने पहली बार खायी. दोपहर को सबने मिलकर गिफ्ट्स पैक किये. आज राधा-कृष्ण के असीम प्रेम व विरह वाला कृष्ण का अंक देखा, कितना गहरा था उनका प्रेम ! प्रेम ही इस जगत का आधार है, यदि प्रेम न हो तो इस जगत में क्या आकर्षण रह जायेगा, प्रेम ही तो ईश्वर है ! कल जून आ रहे हैं, कल इस समय तक तो वे सो चुके होंगे. 

Monday, July 15, 2019

साईं भजन



जून शाम को आये तो उन्होंने टीवी पर एक फिल्म का कुछ अंश देखा, फिर आमिर खान की 'सीक्रेट सुपर स्टार' का भी. सोने गयी तो नींद का दूर-दूर तक पता नहीं था, पता नहीं चला बाद में कब नींद आई, सुबह फिर कोई देवदूत जगाने आया. आज इतवार है सो जून ने नया नाश्ता बनाया, 'पनिअप्पम तथा फिल्टर कॉफ़ी'. बाद में सभी से फोन पर बात की, हर इतवार को वे एक-डेढ़ घंटा इसी में बिताते हैं, हफ्ते भर के समाचार मिल जाते हैं. बगीचे में ढेर सारे फूल खिले हैं, फूलों का ही मौसम है यह फाल्गुन का महीना. दो दिन बाद शिवरात्रि है. उस दिन बीहुताली में ब्रह्माकुमारी का कोई कार्यक्रम भी होने वाला है. वह इस बार रात्रि जागरण करेगी, वैसे भी देर तक नींद कहाँ आती है. भीतर सुमिरन चलता रहता है चाहे आँख खुली रहे या बंद. कभी रूप बनकर, कभी गंध बनकर आस-पास ही कोई डोलता रहता है. अब वह जगाता भी है, पढ़ाता भी है. जून ने एक नयी डायरी दी है, उसमें विशेष अध्यात्मिक अनुभव लिख रही है आजकल. सुना है, कबीर पहले भगवान को पुकारते थे और फिर एक दिन भगवान उनके पीछे कबीर-कबीर कहकर पीछा करने लगे. कैसा अनोखा है प्रेम का यह आदान-प्रदान ! दोपहर को नन्हे और सोनू से बात हुई, वे दोनों भी प्रेम के एक बंधन में बंधे हैं, जहाँ अभिमान की गंध भी नहीं. प्रेम और अभिमान का साथ हो ही नहीं सकता, प्रेम तो समर्पण का ही दूसरा नाम है. जून बाहर टहलते हुए फोन पर अपने मित्र से बात कर रहे हैं. दोपहर को तीन छोटी लडकियाँ आयीं जिन्हें गणित पढ़ाया, फिर कुछ देर बैडमिंटन खेला. अब समय है 'अष्टावक्र गीता' पर गुरूजी की व्याख्या सुनकर ध्यान करने का. ध्यान मन के पार होकर ही किया जा सकता है, बल्कि मन के कारण ही ध्यान उपलब्ध नहीं होता. अमन अवस्था ही ध्यान है. ध्यान कार्य-कारण में नहीं आता. कार्य-कारण के कारण ईश्वर को नहीं पाया जा सकता है. कार्य-कारण का सिद्धांत जहाँ लागू होता है वहाँ नियति है, पर परमात्मा भाग्य से नहीं मिलता, अर्थात उनके कुछ करने से नहीं मिलता. परमात्मा कृपा से मिलता है. बल्कि परमात्मा सदा ही है, सब जगह है, उसे देखने की दृष्टि हमें जगानी है. परमात्मा सब सीमाओं के पार है. ध्यान उन्हें वह अवसर देता है कि वह दृष्टि अपने भीतर जागृत कर लें.  

कुछ देर पहले कम्पनी के आई टी विभाग से एक मकैनिक आया माउस बदलने, उसके पिता का कुछ समय पहले देहांत हो गया था, कहने लगा, माँ को योग सिखने के लिए लायेगा किसी दिन. कल सुबह स्कूल में बच्चों को योग के बाद ध्यान कराया, एक अध्यापिका ने धन्यवाद कहा, वह आजकल पहले की तरह क्रोध नहीं करती हैं. कल शाम क्लब में 'पैडमैन' थी, अच्छी फिल्म है, सामाजिक विषय को लेकर बनायी गयी. उसके बाद महिला क्लब की एक सदस्या का विदाई समारोह था. आज आसू ने 'बंद' का आवाहन किया है, कम्पनी के वाहन नहीं चल रहे हैं, जून अपनी गाड़ी लेकर दफ्तर गये हैं. ऐसे में थोडा सा डर तो बना ही रहता है, फ़ील्ड जाने वाली गाड़ियों को पत्थर मारने की घटनाएँ भी कभी-कभी हो जाती हैं. एक सखी ने अपने घर पर 'साईं भजन' रखा है, साईं बाबा को मानने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. उसने देखा है सभी भजनों में थोडा सा परिवर्तन करके साईं के नाम से गाते हैं. उसने मना कर दिया, क्योंकि वही समय शाम की योग कक्षा का होता है.


Thursday, September 27, 2018

महालया अमावस्या


आज महालया है. नवरात्रि का समय संधिकाल है, संधि बेला है. ग्रीष्म खत्म होने को है सर्दियां शुरू होने को हैं. गुरूजी कह रहे हैं, इन दिनों में यदि कोई श्रद्धा से उपासना करेगा, तो गहन तृप्ति के रूप में उसका लाभ उसे अवश्य मिलेगा. इष्ट के प्रति एकनिष्ठ होकर यदि कोई नवरात्रि का अनुष्ठान करता है, भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करता है, तब सहज आनंद के रूप में उसे पूजन का लाभ मिलेगा. मानव की देह मिली है तो उसका पूर्णलाभ लेना होगा. भावना और श्रद्धापूर्वक किया गया नवरात्रि पूजन उन्हें तृप्त कर देता है. साधक को ज्ञान प्राप्त करना है फिर सब कुछ छोड़कर शरण में आ जाना है.
आज प्रथम नवरात्र है. मन में एक विचित्र शांति का अनुभव हो रहा है. मन जैसे पिघलना चाहता है. अस्तित्त्व के चरणों में बह जाना चाहता है. परमात्मा इतना उदार है और अपार है उसकी कृपा..उसके प्रति प्रेम की हल्की सी किरण भी सूरज की खबर ले आती है एक न एक दिन.
आज मौसम गर्म है. नैनी घर की सफाई में लगी है, अभी यह हफ्ता लगेगा पूरा घर साफ होने में. आज तीसरा नवरात्र है. दोपहर को अयोध्या काण्ड में आगे लिखना आरम्भ किया पर पूरा नहीं किया. कुछ देर पतंजलि योग सूत्र पर एक सखी से कल लाई किताब पढ़ी. जून की यूरोप से लायी काफी पी.
जीवन को सुंदर बनाने के लिए दो वस्तुओं की आवश्यकता होती है. ज्ञान तथा ऊर्जा, इसीलिए वे शिव और शक्ति दोनों की आराधना करते हैं. दुर्गापूजा के नौ दिनों में प्रथम तीन दिनों में काली की पूजा होती है, जो तमोगुण का प्रतीक है, फिर अगले तीन दिन लक्ष्मी की तथा अंत में सरस्वती की, जो रज तथा सत गुण की प्रतीक हैं. उनके भीतर की ऊर्जा तीनों गुणों से प्रभावित होती है ! कभी वे तमोगुण के शिकार हो जाते हैं, तो कभी सतो या रजोगुण से. ज्ञान की देवी सरस्वती की कृपा तभी होगी जब तमोगुण से मुक्त होकर वे क्रियाशील बनते हैं, सौन्दर्य का सृजन करते हैं. अस्तित्त्व प्रतिपल अपना सौन्दर्य लुटा रहा है, वही सृजन उसका ज्ञान है, ज्ञान से ही प्रकटा है और ज्ञान इसके बाद भी अक्ष्क्षुण है. जड़ता को हटाकर क्रियाशील होने के बाद जो विश्रांति का अनुभव होता है, वही तृप्त करने वाला है !
आज स्कूल जाना है. ग्रैंड पेरेंट्स डे पर कुछ बातें जो उस दिन लिखी थीं, उनके साथ बांटने के लिए. बातें जो वे सब जानते हैं पर समय आने पर याद नहीं रहतीं. दादा-दादी के महत्व को कौन नकार सकता है एक बच्चे के जीवन में, पर यह बात माता-पिता को समझ में नहीं आती. उन्हें लगता है बच्चे पर पूर्ण रूप से उनका ही अधिकार है और उसकी परवरिश से जुड़ा हर फैसला केवल वे ही ले सकते हैं. जब समझ आती है तब बहुत देर हो चुकी होती है. जिसकी बुद्धि खुल गयी है, जो सभी को अपना अंश मानता है, वह तो प्रेम के किसी भी रूप का सम्मान करेगा. प्रेम बाँटने और और प्रेम स्वीकारने में कंजूसी करते हैं जो, वे उस महान प्रेम को महसूस नहीं कर पाएंगे. माता-पिता के प्रति कृतज्ञता जब तक भीतर महसूस नहीं होगी, तब तक उनके स्नेह की धारा में वे भीग नहीं सकते. जीवन उन्हें चारों और से पोषित करना चाहता है. उनके पूर्वजों का रक्त उनके भीतर बह रहा है. वे बहुत संकुचित दृष्टिकोण रखते हैं और तात्कालिक हानि-लाभ को देखते हैं, अपने अतीत और भविष्य की तरफ जिसकी नजर होगी, वह पूर्वजों का सम्मान करेगा. आज की उसकी वक्तृता यकीनन दिल से ही बोली जाएगी. कागज पर लिखा वहीं का वहीं रह जायेगा.

Tuesday, September 25, 2018

जय हनुमान ज्ञान गुणसागर



शाम के पांच बजे हैं. सुबह सवा ग्यारह बजे नींद छाने लगी, कुछ देर सोयी. दोपहर बाद बैठे-बैठे कमर में दर्द सा महसूस हुआ. मकर आसन में लेटकर एक सखी से फोन पर कुछ देर बातचीत की और दर्द गायब, प्रकृति सारे उत्तर अपने भीतर ही छिपाए है. सखी ने बताया, उसकी बाहरवीं में पढ़ने वाली बेटी को वह अगले वर्ष हॉस्टेल में रखकर पढ़ाना चाहते हैं वे लोग, पर वह घर पर रहकर पढ़ना चाहती है. कल छोटी भांजी का जन्मदिन है, कविता लिख कर भेजी है उसके लिए. जून का फोन आया, उसके लिए नया सूटकेस खरीदा है, पुराना निकाल देना चाहिए. दीवाली की सफाई भी शुरू करनी है परसों से. सुबह भ्रमण के लिए गयी तो भीतर वाले की बात सुनी. अब कुछ भी याद नहीं है. परमात्मा बहुत धीरे बोलता है, उन्हें चुप होकर उसे सुनना है. उसका साथ शक्ति से भर देता है, उससे योग लगाकर वे प्रेम, शांति और आनन्द का अनुभव करते हैं. उस शक्ति और ज्ञान का उपयोग फिर जगत में करना है, जो भी मिले उसे शुभ भावनाएं देकर.. उसके प्रति शुभकामना हृदय में भरकर ! यदि कोई आत्मस्थ रहे तो सहज ही उससे शुभ तरंगें निकलेंगी. उनके हाथों से से निरंतर ऊर्जा प्रवाहित हो तरही है, यदि मन शांत होगा स्थिर होगा तो प्रेम की तरंगें प्रवाहित होंगी वरना..
आज सुबह कितनी अनोखी थी, ठीक चार बजे थे, एक आवाज आई जो किट से मिलती-जुलती थी, फिर भीतर शब्द कौंधा, हनुमान या अनंत..या ऐसा ही कुछ, हनुमान तो स्पष्ट था. एक अद्भुत भावना से तन-मन स्पन्दित हो गया. हनुमान रामभक्त हैं तथा राम के भक्तों की सहायता करते हैं, एक सखी का स्मरण हो आया, उसने कहा था, वह हनुमान को मानती है और हनुमान चालीसा का पाठ करती है, उस समय उसे कहा था, भगवद गीता भी पढ़ा करो, हनुमान चालीसा तो ठीक है. मुरारी बापू का भी स्मरण हो आया, वह अपनी कथा के आयोजन में हनुमान का विशाल चित्र लगते हैं, राम का नहीं. परमात्मा कितने-कितने उपायों से उन्हें जगाने आता है, वह उन्हें प्रेम करता है. आज स्कूल में हनुमान आसन कराया बाद में ध्यान भी. वापस आकर दो नई पोस्ट लिखीं. भीतर कोई प्रेरणा दे रहा था जैसे. जून लौट आये हैं, उनका स्वास्थ्य अभी भी पूर्ण रूप से ठीक नहीं हुआ है, काम बढ़ गया है, अपने लिए बिलकुल समय नहीं निकाल पाते. शाम को महिला क्लब की मीटिंग है. अभी एक घंटा ध्यान करना है और स्वयं को ऊर्जा से भरना है.

आज सुबह उठने से पूर्व आज्ञा चक्र पर ज्योति दिखाई दी, जलती हुई लौ, परमात्मा हर रोज कोई न कोई उपहार देकर उठाता है. वह उनके सच्चा सुहृद है, सच्चा मीत है. आज आयल के अस्पताल की तरफ से आयोजित वाकाथन में गयी. हर समय कोई न कोई सुगंध साथ रहती है, कभी जाने-पहचानी कभी नामालूम सी सी कोई खुशबू...परमात्मा एक रहस्य है और जो उसे प्रेम करे, उसे भी एक रहस्य बना देता है. आज ओशो का विज्ञान भैरव से लिया एक ध्यान किया. किसी वस्तु को प्रेम से देखो और उस वस्तु में ही सत्य की झलक मिलती है. वे कहने को तो स्वयं से प्रेम करते हैं पर अपनी देह के साथ कितनी नाइंसाफी करते हैं. न खाने योग्य पदार्थ खाकर वे उसे सताते हैं. देह की हर कोशिका एक प्रेम भरी दृष्टि की प्रतीक्षा में है. उनका मन भी विश्राम चाहता है, पर वे किसी न किस उधेड़बुन में उसे लगाये रखते हैं. चौबीस घंटे धडकता हुआ उनका हृदय भी सुकून ही तो चाहता है. पेट की मांग है, शीतलता, वह मिर्च-मसालों से जल रहा है. प्रेम की धार यदि निरंतर बहनी हो तो चाह के पत्थर मार्ग से हटाने होंगे.

Thursday, September 6, 2018

मुरली की धुन



अगस्त आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये और डायरी खोले पांच दिन. पिछले दिनों ऐसी व्यस्तता रही कि कलम कहाँ पड़ी है, इसका भी ख्याल नहीं आया. उस दिन कमेटी मीटिंग में जो भोजन परोसा गया उसे किसी भी तरह स्वास्थ्यवर्धक नहीं कह सकते. घर आकर रस्क, दूध व आम खाए जो जून ने शीघ्रता से लाकर  दिये. अगले दिन विशेष बच्चों के स्कूल गयी, बारह बजे लौटी, तीन बजे से कुछ पहले वे तिनसुकिया गये, लौटे तो शाम को जून के एक मित्र सहकर्मी के जन्मदिन की पार्टी में चले गये. अगला दिन रविवार का था. उसी रात को आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर का फोन आया. रूद्र पूजा के लिए एक स्वामी जी तिनसुकिया आ गये हैं तथा सोमवार की रात्रि उनके यहाँ आयेंगे. सोम की सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को मेहमान कक्ष साफ करवाया. एक घंटा राखियाँ बनाने में लगाया. मंगल व बुध स्वामी जी रहे. पूजा में शामिल होने सेंटर भी गयी. आज सुबह वह चले गये सो इस तरह आज समय मिला है डायरी खोलने का. शाम को योग सत्र में आठ-दस महिलाएं आ रही हैं, अच्छा लगता है समूह में साधना करना. कल दोपहर महिला क्लब में सिलाई कला से जुड़े एक प्रोजेक्ट का कार्यक्रम भी है. ‘एक जीवन एक कहानी’ में आजकल जून की पिछली अस्वस्थता का जिक्र आ रहा है, आजकल उनके घुटने का दर्द कम हुआ है.

आज टीवी पर मुरली सुनी, कृष्ण की मुरली नहीं, वह तो तब सुनी थी जब एओएल के कोर्स में वह अनुभव हुआ था और नियमित ध्यान करना आरम्भ किया था. यह मुरली तो एक ब्रह्मकुमारी द्वारा पढ़ी गयी थी. उसके अनुसार वह आत्मा है, जो परमधाम से अवतरित हुई है और विश्व के लिए कल्याणकारी है. यह स्मृति उन्हें सदा सजग बनाये रखेगी और सर्व शक्तियों का स्फुरण स्वतः ही होता रहेगा. उन्हें चलते-फिरते प्रकाश स्रोत बनकर सेवा करनी है, कितना उच्च भाव है यह. गुरूजी भी कहते हैं, वे सब ऊर्जा का केंद्र हैं, अग्नि स्वरूप हैं. परमात्मा के ज्ञान और प्रेम के वे अधिकारी हैं. वे उस राजा के बच्चे हैं, उसके दिल के तख्त पर आसीन रहते हैं. उस तख्त से नीचे नहीं उतरना है उन्हें. स्वयं को चुम्बक जैसा बनाना है ताकि शांति और प्रेम की तरंगे फैलने लगें. जैसे जल से तृषा बुझती है, वैसे आत्मा के लिए शांति और प्रेम ही जल है जिससे उसकी तृषा बुझ सकती है. वे यदि शांति और प्रेम में टिक जाएँ तो किरणें अपने आप ही प्रसरित होने लगेंगी. स्वयं यदि कोई तृप्त है तो सम्पर्क में आने वाले भी तृप्ति का अनुभव करेंगे. याद की यात्रा में निरंतर रहना है उन्हें. निरन्तरता ही चाहिए. शक्तिशाली संकल्प द्वारा भी उन्हें सेवा का कार्य करना है. परमात्मा चाहते हैं आत्मा उनके जैसी हो जाये. दोनों का लक्ष्य एकत्व ही है.

यह समय सुनने का समय है. प्रकृति पुकार रही है, आये दिन की प्राकृतिक आपदाएं यही तो बता रही हैं. व्यक्ति पुकार रहे हैं. यह पुकार सुनने में नहीं आती क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों में लगे हैं. आत्म स्मृति में रहकर ही उनकी उन्नति हो सकती है, इससे उनकी ऊर्जा का सदुपयोग होने लगता है. परमात्मा से कैसे मिलें इस प्रतीक्षा काल को भूलकर अब तो उसे अपने सम्मुख पाना है. जैसे गुलाब के साथ कांटा होता है वैसे ही ये तकलीफें परमात्मा के और निकट जाने का साधन ही बनती हैं.

Tuesday, August 28, 2018

दफ्ती का घर



शाम होने को है. टीवी पर केन्द्रीय मंत्री बता रहे हैं कि उत्तर-पूर्व भारत के विकास और सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार क्या काम कर रही है, इसको बताने के लिए एक पुस्तिका का प्रकाशन भी हुआ है. पिछले दिनों यहाँ काफी ‘बंद’ हुए और तेल कम्पनी को भी इसके कारण काफी खामियाजा भुगतना पड़ा है. जून अभी आने वाले हैं, शाम को उन्हें बंगाली सखी के यहाँ जाना है, चाय पर बुलाया है. कल शाम को एक अन्य सखी ने रात्रि भोज पर बुलाया है. ‘नजर बदली तो नजारे बदले’, कितनी सही कहावत है यह. किसी के प्रति उनका दृष्टिकोण बदलते ही सामने वाला भी बदला सा नजर आने लगता है. यदि पहले कभी मित्रता रही हो तो वही पहले वाला प्रेम भरा. किसी के प्रति कभी भी कोई विपरीत भाव न जगे, क्योंकि एक का ही विस्तार है सब. एक के प्रति भीतर प्रेम जगे तो सबके प्रति उसकी खुशबू फ़ैल ही जाती है और उसमें प्रेम देने वाला स्वयं भी शामिल होता है. जगत के साथ उनका व्यवहार खुद के साथ के व्यवहार को ही झलकाता है. जब भी जगत के प्रति उनके मन में कोई भी निंदा का भाव जगता है, वे हर बार स्वयं को ही पीड़ित कर रहे होते हैं. भीतर की शाश्वतता का अनुभव जिसे हो जाये फिर वह बदलने वाले इस जगत को नहीं देखता, उसके पीछे छिपे अबदल ही देखता है, जो बदल ही रहा है, उसकी चिंता कब तक और क्यों ? जो अबदल है उससे ध्यान हटते ही पीड़ा व दुःख का संसार आरम्भ हो जाता है. उनके भीतर ही है शांति का वह परमधाम जहाँ अनंत सुख का साम्राज्य है !

नन्हे ने आज अपनी कम्पनी व कार्य के विषय में बहुत कुछ बताया. अगले कुछ वर्षों में वे अधिक लाभ प्राप्त करेंगे, अभी तो वे पैसा लगा रहे हैं, जो इन्वेस्टर ने लगाया है. वह अपने काम से संतुष्ट लगता है. सुबह उसकी मित्र से फोन पर बात हुई, वह इसी माह नन्हे को अपने पिता से मिलाएगी. वह कह रही थी कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, उसे जरा भी अंदाजा नहीं है. चार बजने को हैं शाम के. अभी कुछ देर पूर्व अस्पताल से लौटी. आँख का दबाव सामान्य है. दस दिन बाद फिर जाना है. आंख के आगे एक काला घेरा सा दिखाई देता है. उसकी वजह से और कोई समस्या तो नहीं है फ़िलहाल. नन्हे ने पूसी के लिए दफ्ती का एक घर बना दिया है, पर वह उसमें कम ही टिकती है. कल ही वह वापस जा रहा है.

सुबह से लगातर वर्षा हो रही है. अभी-अभी धोबी आकर धुले सूखे कपड़े दे गया, ऐसे मौसम में भी वह अपना कर्त्तव्य पूरी तरह निभाता है, पुत्र की पढ़ाई को लेकर चिंतित है. उसे बीए के बाद एमए कराना है, क्या उसके बाद सरकारी नौकरी मिल जाएगी, क्या पढ़ाई कर लेने मात्र से ही मिल जाएगी ? ये उसके प्रश्न थे. नन्हे ने कहा, प्राइवेट नौकरी ही ढूँढनी पड़ेगी. आज लाओत्से पर ओशो के वचन सुने. अद्भुत वचन हैं उसके, ज्ञान जितना-जितना बढ़ेगा, पाखंड भी बढ़ेगा, होशियारी बढ़ेगी तो चालाकी भी बढ़ेगी. जब तक कोई द्वन्द्वों के पार नहीं चला जाता, उनसे मुक्त नहीं हो सकता. अच्छे बने रहने का आग्रह बुरे से पीछा छुड़ाने नहीं देता. आत्मा में रहकर मन के सारे द्वंद्व स्पष्ट दिखने लगते हैं. शिवानी भी कहती है, सतयुग में ज्ञान की, पूजा की कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी क्योंकि अज्ञान ही नहीं होगा. स्वभाव में टिकना आ जाये किसी को तो वह सुख-दुःख दोनों के पार निकल जाता है.    

Saturday, May 12, 2018

बहते हुए कमल



आज सुबह आत्मभाव में रहने का अनुभव कितना प्रबल था, देह स्वयं की अनुमति के बिना हिल नहीं सकती, बिलकुल जड़ हो गया था शरीर. भीतर से किसी के कहते ही उठकर बैठ गया. मन भी आत्मा के सम्मुख विवश है, वह लाख कहता रहे पर जब तक अन्तर्वासी हामी नहीं भरता, उसकी बात का क्या अर्थ है, तभी तो वे मन से जिन वायदों को करते हैं, उन्हें टूटने में देर नहीं लगती, क्योंकि किसी गहराई में वे स्वयं ही उन्हें पूरा करना नहीं चाहते. आत्मा तक पहुंच होगी तभी तो उसकी ‘हाँ’ या ‘न’ को समझ पाएंगे. ध्यान के सिवा आत्मा को जानने का कोई तरीका नहीं है.

कल रात को कितना सुंदर स्वप्न देखा. नदी किनारे कुछ ऊँचाई पर एक कच्ची-पक्की सड़क के किनारे उनका घर है. ऊपर से नदी दिखती है. पानी में हजारों की संख्या में लाल कमल बहे चले आ रहे हैं. कितने वास्तविक लग रहे थे. पर उसे विचार आया कि नदी के उस पार जाकर निकट से देखे, फिर फूल समाप्त हो गये. पानी बह रहा था और उसमें एक पतली सी नौका थी, जिसके द्वारा नदी को पार किया जा सकता था. तभी अचानक स्वप्न बदल गया. अब एक वाहन में बैठकर वह सड़क के अंत तक जाती है. वापसी में एक बहुत बड़ा सा शेर पानी से निकल कर सड़क किनारे स्थित पर्वत पर चढ़ जाता है. ड्राइवर भी भयभीत है. शेर बोनट पर आकर खिड़की से सिर अंदर कर लेता है, मृत्यु निकट है पर अचानक वह शेर शांत हो जाता है, वे उसके पंजे बाँध देते हैं और वह उसका चेहरा सहलाती है. वह मित्र बन गया है. कितना अद्भुत था यह स्वप्न ! सुबह नींद भी समय से खुल गयी. क्लब के आयोजन का प्रबंध कार्य ठीक चल रहा है, यकीनन इस बार का कार्यक्रम पहले से अच्छा होगा. परसों पूरा दिन उसी को समर्पित होगा. इस डायरी के पन्ने पर नीचे लिखा वाक्य कितना सुंदर है, उसने सोचा फेसबुक पर उसे पोस्ट करेगी.

We find comfort among those who agree with us, growth among those who don’t.
By Frank A.Clark

कल रात्रि कोई स्वप्न नहीं देखा. आज पढ़ा व कल सुना था कि बायीं करवट लेकर सोना बहुत फायदेमंद है. आज से वही करेगी. मन को व्यर्थ के संकल्पों से बचाना है, जो कुछ बाहर दिखाई दे रहा है, अथवा जिसके बारे में मन सोच रहा है, वह सब प्रतिपल बदल रहा है. भीतर मन की गहराई में जो एक रस, स्थिर, अडोल सत्ता है, वही सदा एक है, उसी में टिकना है, वह ऊर्जा का स्रोत है. मन के व्यर्थ विचार उसे व्यर्थ बहाना है. वही ऊर्जा कविता बन सकती है, प्रेम, ज्ञान और शांति बन सकती है. वही उर्जा संसार के हित में कुछ करने की शक्ति बन सकती है. कल नैनी के पुत्र के अन्नप्राशन में गयी. उसे अच्छी तरह पाल रहे हैं ऐसा लगा, काफी चुस्त है और ठीक बढ़ रहा है. आज माली ने एक नई क्यारी खोदी, उनके सुंदर बगीचे में एक और कदम ! आज धूप में बैठने का भी मुहूर्त निकला है, अंदर काफी ठंड है, यहाँ धूप में कितनी राहत है. पड़ोस के घर में मजदूर काम कर रहे हैं, नये पड़ोसी आने में अभी समय लगेगा. आज एक पाकिस्तानी गीत देखा, सुना, जो उन बच्चों की याद में बना है जिन्हें आतंकवादियों ने स्कूल में ही मार दिया था. आतंकवादी निरीह बच्चों तक को नहीं छोड़ते. समाचारों में सुना एक नया वायरस निकला है जो कई देशों में तबाही मचा रहा है, जिसका इलाज अभी खोजा नहीं गया है, लेकिन यह वायरस आया कहाँ से ?

आज का सारा दिन क्लब में गुजरा. सुबह सामान्य थी, वे प्रातः भ्रमण के लिए गये. तत्पश्चात तैयार हो ही रही थी की एक सखी का फोन आया. वह बुला रही थी. दोपहर को जून के साथ ही लंच के लिए लौटी और उन्होंने ही वापस जाते समय छोड़ दिया. शाम को फिर एक बार घर आई नाश्ते के लिए और उसके बाद रात्रि साढ़े आठ बजे. गोहाटी, जोरहाट, तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, मार्गरेट तथा स्थानीय आस-पास के कितने ही डिजाइनर और वस्त्र विक्रेताओं ने अपने स्टाल लगाये थे. इसी तरह का आयोजन दो माह बाद एक बार और करना है. जून ने कहा, वह उस दिन कहीं घूमने चले जायेंगे, सम्भवतः दिन भर अकेले रहना उन्हें खल गया है. हो सकता है उनका कोई टूर अपने आप ही तभी निकल आये.   


Sunday, October 29, 2017

दही और मुसली


आज सुबह साढ़े तीन बजे ही नींद खुल गयी, लगा जैसे भीतर कोई कह रहा है, बैठ जाओ. उठकर कुछ देर बैठी. अद्भुत शांति थी सब ओर. फिर जब पंछी बोलने लगे दिनचर्या आरम्भ हो गयी. नाश्ता आज जून ने बनाया, मुसेली में दही मिलाकर, पिछले दिनों उसके न रहने पर वह यही खाया करते थे. आज भाई के यहाँ हवन और ब्राह्मण भोज है. उसने फोन किया पर शायद वह व्यस्त थे. समय के साथ उनके मन का घाव भी भर जायेगा. भाभी को याद करके उसे लगता है, कितना कुछ वे इस जगत में एकत्र करते हैं पर मृत्यु के एक झटके में सब खो जाता है.

कल इतवार था, कुछ नहीं लिखा. आज स्कूल का दिन था. सुबह अलार्म सुनकर बंद किया तो एक स्वप्न शुरू हो गया. एक हॉस्टल में वे हैं. ढेर सारी लडकियाँ हैं. सुंदर ड्रेसेज हैं उसके सूटकेस में. कालेज है जिसमें लडके भी हैं. वहाँ एक बगीचा भी है. सब्जियां लगी हैं उसमें, कितना स्पष्ट था सब कुछ पर सभी मिथ्या, असत्य..कितने दिनों बाद ऐसा स्वप्न देखा. इमारत, कमरा सब कुछ कितना बड़ा और कितना भव्य. निकुंजों में चिड़ियाँ भी दिखीं. स्वप्न जगाने के लिए ही आते हैं. शाम के चार बज चुके हैं. बाहर धूप तेज है. कल स्कूल में नन्हे-मुन्नों को व्यायाम कराते वक्त वह फिर से वह नन्हा भूरा कीट आया था, उसके वस्त्रों पर बैठ गया. सुबह नन्हे की मित्र व उसकी माँ को फोन किया, पर उन्होंने नहीं उठाया. नन्हे ने कहा किसी भी हालत में वह पुनः उस विषय पर नहीं सोच सकता है. अवश्य ही उसे बहुत दुःख हुआ होगा, पर वह समझदार है, आशावादी भी है. ईश्वर से प्रार्थना है उसे सद्बुद्धि दे, ईश्वर उसे सन्मार्ग पर ही ले जा रहे हैं. उसके लिए जो सही है वही प्रकृति उसके लिए प्रस्तुत करेगी. उनके भीतर जो साक्षी है, वे उसे न देखें पर वह सदा जागृत है ! इस समय भी वह उसे देख रहा है, भीतर एक अखंड शांति है, जिसमें कोई लहर भी नहीं उठती. मन कितना दूर है उससे, काश सभी उस मौन का अनुभव कर पाते ! कल शाम वे जून के मित्र के घर गये थे. आंटी के श्राद्ध व चौथे के लिए तैयारी शुरू हो गयी है.

आज सुबह भी दिनचर्या व्यवस्थित रही. प्रातः भ्रमण से आकर माली को कुछ निर्देश दिए, फिर सहज ही आईने में देखा तो पाया, एक तरफ का बुंदा गायब था, जबकि पीछे का स्टॉपर वहीं लगा था, इसका अर्थ था कि कुछ देर पूर्व ही गिरा होगा. भीतर कोई हलचल नहीं हुई पर बाहर ढूँढने का प्रयास जारी हो गया. माली व स्वीपर बाहर बगीचे में देखने लगे और वह घर में. बाद में नैनी को कपड़े धोते समय टब से मिला. कब गिरा होगा, पता नहीं. नैनी को पुरस्कार दिया, उसने कहा, नहीं चाहिए, पर शायद उसे इतन देय था जो यह घटनाक्रम घटा. कल रात नन्हे को फोन किया, वह परसों चेन्नई जा रहा है, वहाँ से वे पांडिचेरी भी जायेंगे. उसने कहा, वह अपनी मित्र से बात करेगा. आजकल बच्चे बहुत व्यावहारिक होते हैं. वे अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से नियन्त्रण में रख सकते हैं. एक तरह से देखा जाये तो प्रेम के नाम पर व्यक्ति एक-दूसरे का उपयोग ही तो करते हैं, जो स्वतंत्र वनाये वही वास्तविक प्रेम है. प्रेम बंधन का नाम तो नहीं. जो भविष्य में होगा वह तो होगा ही, पर वर्तमान को जीने से वे क्यों चूक जाएँ, वर्तमान का यही पल उनके हाथ में है.


Thursday, July 20, 2017

लिट्टी-चोखा


कल ईद थी. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आया. वे लोग यहाँ से जा रहे हैं, अपने घर से पौधे ले जाने को कहा था, उन्होंने लिट्टी-चोखा खाने का निमन्त्रण भी दिया है. जून ने गाड़ी भेजी है, अभी माली आएगा, उसे साथ लेकर जाना है. उनके लिए एक कटहल भी लिया है. इस समय भी धूप भी काफी तेज है, शाम के पांच बजने को हैं. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखी है. उसने एक कविता की पैरोडी बना दी, खुदा की बात इतनी आसानी से समझ में आती कहाँ है. उसे भी नहीं आती थी, अब भी आई है ऐसा नहीं लगता. खुदा उन्हें खाली कर देता है, बिलकुल ‘हॉलो एंड एम्प्टी’ ! सितम्बर में छोटा भाई परिवार सहित यहाँ आ रहा है, यकीनन वे दिन बहुत अच्छे होंगे ! परसों एक जन्मदिन पार्टी में जाना है, अभी उसे एक कविता ( यदि उसे कविता कहें तो) लिखनी है, मन हल्का है, खाली-खाली सा..सो परमात्मा का सत्य उसमें से वैसे ही बहेगा जैसे खाली बांसुरी से हवा !  

अगस्त का आरम्भ हो चुका है, आज सारे कैलेंडर बदलने हैं. दूधवाले, धोबी, माली, नैनी सभी का हिसाब चुकतू करना है, जन्मदिन के कैलेंडर में इस माह पड़ने वाले विशेष दिनों को भी देखना है, शरीर का भार लेने का एक कार्य और करते हैं वे हर माह के पहले दिन. सुबह वे आज समय पर उठे, पिछले कुछ दिनों से उसका पाचन कुछ ठीक नहीं था. इतने वर्षों उस पर जो जुल्म ढाए हैं, उनकी भरपाई करने का वक्त आ गया है. इन्सान अपने छोटे-से छोटे कृत्य से भी बच नहीं सकता. जितनी नकारात्मकता इस मन के द्वारा उपजी है, उसका भुगतान उन्हें हर हाल में करना होगा. अब समय आ गया है कि पूर्ण सकारात्मकता को अपनाया जाये, उससे कम रत्ती भर नहीं, हर रत्ती का जवाब देना होगा जो सदा बढ़कर ही मिलता है. नन्हे ने बताया, कल कर्नाटक बंद था.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल, कल कमेटी की पहली मीटिंग थी, एक सदस्या के साथ मिलकर उसने सभी के लिए स्नैक्स व रात्रि भोजन का इंतजाम किया. सब कुछ ठीक से हो गया. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को राखियाँ बांधी. जीवन एक धारावाहिक की तरह है, उसकी कहानी भी ऐसी ही है. कभी कुछ घटता है जो परेशान कर जाता है पर अपने स्वभाव में टिकते ही सब कुछ पूर्ववत् हो जाता है, बाहर न भी हो पर भीतर तो अवश्य. जो कुछ भी उन्हें निर्बल बनाता है वह त्याज्य है. सकारात्मकता में टिके रहने से हर क्षण नयेपन का अनुभव भी होता है. अभी-अभी नैनी की बच्चियां आई थीं, ईश्वर के प्रेम से परिपूर्ण, कितनी प्यारी मुस्कान है इन दोनों की ! उनके साथ जाकर फुहार में ही फूल चुने और तुलसी के चौरे पर सजाये. बहुत सी बातें वे बिन कहे ही समझ जाती हैं. प्रेम भी प्रेमी हृदय ही महसूस कर सकते हैं, संत या बच्चे ! सामने का दृश्य हरियाली का एक समुन्दर जैसा ही तो है, मौन है पर सब कुछ कहता और सब कुछ सुनता हुआ ! जीवन कितना सुंदर है और कितना अनोखा ! परमात्मा और जीवन एक ही तो हैं ! 

Wednesday, July 12, 2017

किताबों वाला घर


जून का महीना भी कल आरम्भ हो गया. मौसम काफी गर्म है. आज स्कूल गयी थी, करेंट नहीं था, बच्चों को पसीना बहाते हुए व्यायाम/आसन कराए. छोटे बच्चे बहुत आनंद लेते हैं. एओल की टीचर का फोन आया, वह कल से आने वाली थीं, पर अब लडकियों को वहीं बुलाया है. कल से वे जाएँगी. शाम के सवा चार बजे हैं, बाहर धूप इतनी तेज है जैसे भरी दोपहर हो. ब्लॉग पर उसकी कहानी अब अध्यात्म की ओर बढ़ रही है. एक वर्ष पहले से ही भूमिका बननी शुरू हो गयी थी, तभी क्रिया के दौरान वह अनुभव हुआ. सद्गुरू तक उसकी प्रार्थना पहुंच ही गयी थी. कितना विचित्र है परमात्मा का यह चक्र, यह व्यवस्था कितनी अबूझ है. वह परम कितना दूर है पर कितना निकट...जीवन कितना अद्भुत है, यदि वे जाग जाएँ तो हर पल उसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं. स्वप्न की धारा जो भीतर चलती रहती है, जिसने उनकी नींद को भी निर्दोष नहीं रहने दिया और उनके जागरण को भी, उसे रोकना ही साधना का लक्ष्य है. वह धारा उनके नियन्त्रण से बाहर हो गयी है क्योंकि वे इतने कमजोर हो गये हैं. पहले उन्हें जानना होगा किस तरह वे मन से पृथक हैं, जैसे आकाश बादलों के पार है, वैसे ही वे भी मन के पार हैं. स्वयं के मुक्त स्थान में स्थित होते ही वे मन के पार चले जाते हैं. जब वे उस स्रोत से जुड़ जाते हैं, उत्साह से भर जाते हैं, ऊर्जा से भर जाते हैं. उन्हें परमात्मा से जुड़कर पहले शक्तिशाली बनना है फिर इस धारा पर उनका नियन्त्रण होगा !

वही दोपहर की बेला है, पंछियों की आवाज के अतिरिक्त मौन की गूंज ही है जो सुनाई दे रही है. दोनों बहनें सो रही हैं, वे आज सुबह योग की कक्षा में गयी थीं, पहला दिन था, उन्हें आनंद नहीं आया. बच्चे तो बच्चे ही हैं, अब कल वे जाएँगी या नहीं, यह उन पर निर्भर करता है. आज सुबह भीतर जो भय जगा लेडीज क्लब के दफ्तर में चल रहे खिडकियों पर जाली लगाने वाले काम को लेकर, क्रोध के रूप में प्रकट हुआ नैनी की एक भूल के कारण उसके ऊपर, जो आज अचानक ही जल्दी आ गयी थी. एक ही ऊर्जा तो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है. सुबह ध्यान किया, केवल शुद्ध चेतना में रहने का अभ्यास, स्वप्न की जो श्रृंखला जो भीतर चलती रहती थी अब खंडित होने लगी है, विचार वे स्वयं ही बनाते हैं और स्वयं ही उनसे पीड़ित होते हैं, सुबह इसका कितना स्पष्ट अनुभव हुआ. परमात्मा कितनी कृपा करता है जो पहले उन्हें प्रेम से भर देता है, वे तो उसे बाद में प्रेम कर पाते हैं. सद्गुरू को आज टीवी पर देखा, fb पर रोज ही देखती है. आज शाम उन्हें क्लब ले जाना है, आज क्लब का स्थापना दिवस है.

टीवी पर आज गुरूजी अपने कार्य के आरम्भिक दिनों के बारे में बता रहे हैं. हर इन्सान को अपना मार्ग स्वयं चुनना होता है और यदि वह सच्चे हृदय से प्रार्थना करे तो ईश्वर स्वयं उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं. उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर ही कुछ करना होता है. आज उसे क्लब की कुछ सदस्याओं के साथ मोरान ब्लाइंड स्कूल जाना है. सेक्रेटरी का फोन आया, उनके साथ इस वर्ष उसकी कई यात्रायें हो रही हैं, कितना कुछ सीखने को भी मिला है.

आज नन्हे के बचपन के मित्र, असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन था, उसने फोन किया. एक अन्य सखी से बात हुई, उन्होंने पोहा बनाने का अच्छा तरीका बताया, भांजियों ने वैसा ही बनाया. दोनों निकट ही बंगाली की दुकान पर भी गयीं, फल खरीदे और अपने लिए मैगी भी. दोनों बहुत शांत व समझदार हैं, अपने काम से काम रखने वालीं. क्लब की एक सदस्या सदा के लिए जा रही हैं, उनके पति रिटायर हो गये हैं, किताबों से भरा था उनका घर, ड्राइंग रूम में बड़ी सी आलमारी तो भरी ही थी, छोटी-छोटी शेल्फ पर भी ढेरों किताबें सजी थीं. उनके पति लेखक हैं, वे स्वयं भी लिखती हैं. वर्षों से बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विद्यालय चला रही हैं. उसने सोचा उनके लिए भी एक कविता लिखेगी. आज फेसबुक पर अस्सी वर्षीय एक महिला को सालसा नृत्य करते देखा, कमाल का नृत्य था, बच्चों की तरह वे घूम रही थीं.  देह, मन के अधीन रहे तो वे उसे अपनी इच्छा से प्रयोग कर सकते हैं. तमस और जड़ता से भरी देह मन पर हावी हो जाती है. जून आजकल बहुत व्यस्त रहते हैं, कल उन्हें दिल्ली जाना है. नन्हे के दफ्तर में एक प्रतियोगिता होनी थी, अच्छी ही होगी. वह अपनी टीम का हेड हो गया है अब. जे कृष्णमूर्ति की जो किताब वह वर्षों पहले बोस्टन से लायी थी, मिल नहीं रही थी, उस दिन मिल गयी, पढ़ना शुरू किया है.  


Thursday, June 29, 2017

स्वप्नों का संसार


परसों सुबह पुनः दो स्वप्न देखे, एक में कोई व्यक्ति बाँह में सूई के द्वारा कुछ डाल रहा है, कई लोग हैं, उनमें से एक वह भी है ऐसा कुछ भास हुआ, दुसरे में मृत्यु का अनुभव हुआ, अब दूसरा स्वप्न जरा भी याद नहीं है, पर यह ज्ञात हुआ था कि इस तरह मृत्यु हुई थी. पिछले जन्मों की स्मृतियाँ भी हो सकती हैं ये. परमात्मा ही जानता है. आज सुबह एक स्वप्न में समय बता रही थी कि किसी ने कहा, दस पैंतालीस नहीं दस तिरालिस और नींद खुल गयी. उनके घर का नम्बर तक उसे पता है, उनकी चेतना से कुछ भी छिपा नहीं है, आखिर वह स्वयं ही तो हैं !

फिर छह दिनों का अंतराल, कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह स्नानगृह में है. एक ऊर्जा गले तक चढ़ती है, थोडा भय लगता है पर वह स्वयं को तैयार कर लेती है, पुनः एक ऊर्जा चढ़ती है और उसके बाद होश नहीं रहता, फिर अचानक एक सुंदर चित्र दीखता है, फिर तो एक के बाद एक चित्रों की श्रृंखला शुरू हो जाती है. रंगीन चित्र थे, कला कृतियाँ थीं, जैसे कोई टीवी देख रहा हो. स्वप्न उनके मन में छिपी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं. ध्यान का गहन अनुभव जागृत में नहीं हुआ सो स्वप्न में कुछ हो गया !

कल रात्रि कोई स्वप्न नहीं देखा, ध्यान की स्मृति आती रही. परमात्मा उस पर अवश्य ही नजर रखे हैं. अभी कुछ देर पूर्व सद्गुरू को बहुत दिनों बाद पत्र लिखा. उन्हें अपने प्रति ईमानदार होना चाहिए, साधना का यह पहला सूत्र है. भीतर जो कुछ भी चल रहा है उसका साफ-साफ पता होना चाहिए. अतीत में जो भी हुआ वह स्वप्न मात्र है. संस्कारों के वश होकर जो भी किया उसको अब बदल नहीं सकते पर अब जो हर क्षण हो रहा है वह होश में रह कर हो. क्लब की पत्रिका छप कर आ गयी है. एक लेख की लेखिका के नाम के आगे भूल से डॉ लिखा गया है, उनसे बात की, पहले तो वह कुछ नाराज दिखीं फिर संतुष्ट हो गयीं. अगले हफ्ते क्लब की मीटिंग में कवियत्री सम्मेलन का आयोजन करना है. सुबह नैनी ने कुछ माँगा तो उसने ले लेने को कह दिया, उसे शायद अच्छा लगा हो, अपने आप ही कुछ काम कर दिए, बिना कहे ही. उसके ससुर के झगड़े से घर के सभी लोग परेशान हो गये हैं. उसे उनके प्रति सहानुभूति होती है. मन के भीतर न जाने कितने संस्कार दबे पड़े हैं, खुद को भी आश्चर्य होता है. परमात्मा हरेक के हृदय में है. वह उसे हर तरह के बंधन से मुक्त देखना चाहते हैं. अहंकार की हल्की सी छाया भी न रहे. मन बिलकुल सपाट नीले आकाश सा हो जाये निरभ्र..निर्मल..तभी तो होगा उसका पदार्पण !

कल शाम को गुरु माँ का अद्भुत प्रवचन सुना. सभी जगे हुए एक ही बात कहते हैं. उनके भीतर जब चैतन्य की शिखा अखंड जलने लगती है, कोई भी घटना उसे कंपाती नहीं, वह स्वयं भी मन, बुद्धि के रूप में व्यर्थ ही नहीं चुकती, तब ही भीतर अखंड प्रेम का साम्राज्य छा जाता है. वही सत्य है, वह अबदल है, सारे द्वंद्व तभी समाप्त हो जाते हैं जब सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, सारी चाहें गिर जाती हैं. प्रकृति का खेल समाप्त हो जाता है, आत्मा निसंग हो जाती है, कैवल्य का अनुभव घटता है. द्रष्टा भाव में जो टिक जाता है उसके लिए जगत का क्रिया कलाप एक खेल सा ही जान पड़ता है. रात्रि को फिर कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं पड़ता. सारे स्वप्न अधूरी इच्छाओं के कारण ही जगते हैं.