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Wednesday, July 22, 2020

वसिष्ठ और राम



आज सुबह अप्पम बनाये नाश्ते में, जून के एक सहकर्मी आये थे दस बजे कुछ जानकारी लेने, उन्हें भी खिलाये. पसन्द आये उन्हें. उन्होंने अपने बाल्यकाल की बातें बतायीं, किस तरह उनके माता-पिता ने कृषि का काम करना सिखाया तथा भोजन बनाना भी. कक्षा पांच में थे तब दोसा बना लेते थे. अब भी वे घर पर खेती करते हैं, उनके लिए खुद की उगाई सब्जियां लाये थे. टीवी में रामदेव जी को देखकर नियमित योग अभ्यास भी करते हैं. जून ने भी उन्हें सहजन व नारियल तुड़वा कर दिए. कल माली ने बहुत सारे सहजन तोड़े थे, दो तीन अन्य परिवारों को भी बांटे। सुबह शिवानी को सुना, कितना ज्ञान उनके भीतर भर है सीधा परमात्मा से उतरता है ज्यों ! दोपहर को सब्जी-फल लेने वे तिनसुकिया गए. बीहू के कारण बहुत चहल-पहल थी. नन्हे-सोनू  से बात की कल वे लोग किसी मित्र के विवाह में राजस्थान जा रहे हैं. नए घर में रंगरोगन का काम शायद कल से शुरू होगा. दोनों के लिए उसने वस्त्र खरीदे, पहली बार एक साथ दोनों के लिए ! बड़े भांजे के विवाह की सालगिरह है आज, दीदी के यहां फोन किया, सभी आये हुए हैं, विदेश में रहने वाली भांजी भी आयी है. शनिवार को वे पुस्तकालय गए थे उसे याद करते हुए शाम को एक घन्टा पढ़ने में बिताया. पिताजी ने बताया वह आजकल योगवशिष्ठ व भागवद पढ़ रहे हैं, पर इन ग्रन्थों को नॉवल की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, नियमित एक या दो पृष्ठ का अध्ययन करना चाहिए. योग वसिष्ठ में राम ने हर अवस्था में मानव के दुखों का कैसा मार्मिक वर्णन किया है. कलात्मक भाषा में अहंकार, मोह व तृष्णा के दुष्परिणामों का वर्णन किया गया है. चित्त की अशुद्धि को दूर रखने के लिए मन को स्थिर रखना होगा. समता को भावना में टिके बिना आत्मपद में स्थित होना असंभव है. तेनाली रामा में मुल्ला नसरुद्दीन भी आ गए हैं आजकल, उन्हें त्रिदेव के दर्शन करने हैं !

मौसम आज सुहाना है. सुबह साढ़े तीन बजे ही उठ गयी, उससे पूर्व ही एक स्वप्न देखकर नींद खुल गयी थी. छोटे भाई को देखा और उसके पूर्व स्वर्गवासी सास-ससुर को भी, वे अस्पताल में हैं. मन पुरानी स्मृतियों को दोहराता है पर कुछ इशारे भी करते हैं ये स्वप्न. मन आकर्षक दृश्यों को दिखाता है ताकि अपनी उपस्थिति जताता रहे. अव्यक्त की अनुभूति अब कितनी स्पष्ट होती है, एक प्रकाश, एक शांति और एक चैन के रूप में ! सुबह प्रातः भ्रमण से लौटते समय पलाश के फूलों से लदे  लाल वृक्ष देखे, कल वे  मोबाईल लेकर जायेंगे  और उनकी तस्वीरें उतारेगें. पहली बार पूरे के पूरे वृक्ष फूलों के लद गए हैं.  दोपहर को अचानक तेज हवा चलने लगी और एक घण्टे  तक मूसलाधार वर्षा होती रही. योग सत्र में ध्यान किया व करवाया, गुरूजी का ज्ञान पत्र पढ़ा; यह देह भी एक युद्ध क्षेत्र है, ऐसा उन्होंने कहा. उन्हें अपने भोजन पर ध्यान देना है, एक वृद्ध व्यक्ति से सुना था, ‘कम खाओ और अधिक खाओ’ भोजन  ऐसा हो कि देह में सुस्ती न आने पाए स्फूर्ति बनी रहे. टीवी पर प्रधानमंत्री की उड़ीसा में की गयी विशाल रैली दिखाई जा रही है. विपक्षी उनकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा  रहे हैं और बीजेपी कांग्रेस के घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र कह रहे हैं. गंधराज खिल गए हैं अभी उनकी तस्वीर उतारी ! 

शायद कोई संदेश मिला था उस दिन जो उसने बरसों पहले लिखा होगा - 

आ सकती नहीं वह 
आ सकता वह 
आएगा 
या बन जायेगा पत्थर पर खुदा
उसने उठाया उसे बाँहों में 
हवा उठाती ज्यों चिन्दी को 
ज्यों उठाते हैं जल चढ़ाने सूर्य को 
नसीब एक भारी पत्थर 
वे बच्चे 
करते हैं कोशिश हटाने की 
पत्तों के बीच थिरकती किरणों से खेल 
बनना नहीं चाहती वह नाव 
उसे ला दो समुन्दर 
वह घुल जाये बह जाये उसी में 
हवा आती है गुजर जाती है 
जैसे दूसरे देश का वासी 
जैसे परछाईयाँ तेज बादल की 
घाटी पर रुकती नहीं चली जाती हैं !

Thursday, July 9, 2020

भोर का आकाश


कल शाम बच्चों के स्कूल में अध्यापिकाओं का साक्षात्कार था। उसे भी बुलाया गया था, इंटरव्यू लेने का पहला और एक बिलकुल नया अनुभव था और स्वयं को परखने का एक स्थल भी. मेज के इस तरफ बैठी है, यह भाव आया तो भीतर के सूक्ष्म अहंकार का बोध हुआ. प्रश्न पूछते समय खुद को ही लगा, वाणी में अभी भी मधुरता नहीं आयी है. एक क्षण के लिए भीतर हलचल भी हुई, जो बाद में व्यर्थ ही प्रतीत हुई. परमात्मा उन्हें उनसे बेहतर जानते हैं. वह उन-उन परिस्थितियों में भेजते हैं जहाँ से वे चाहें तो सीखकर आगे बढ़ सकते हैं. यह सृष्टि उसी परमात्मा का विस्तार है, वह सर्वज्ञ है और यदि कोई आत्मा उसकी ओर कदम बढ़ाती है तो वह उसे स्वीकार करता है. जैसे धूल से सन हुआ शिशु माँ की तरफ हाथ बढ़ाता है तो माँ उसे झट गोद में उठा लेती है, वह अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करती. शिशु को साफ-सुथरा करती है, वैसे ही परमात्मा उन्हें निखारता है. वह प्रेरणाएं भेजता है  जिन्हें वे सुनी-अनसुनी कर देते हैं, पर वह असीम धैर्यशील है. वह बार-बार अपनी ओर खींचता है, क्योंकि उनकी अभीप्सा उसने भांप ली है. संस्कारों के कारण या पूर्व कर्मफल के कारण वे उस पथ से विमुख हो जाते हैं ,पर उसका हाथ उन्हें कभी नहीं छोड़ता. कल एक स्वप्न में स्वयं को कहते सुना कि  जून के जीवन में सच्चाई बढ़ रही है. वह भोजन के प्रति भी पहले के जैसे आग्रही नहीं रहे. परमात्मा उनके हृदय पर भी अपना अधिकार कर रहा है. आज दोपहर मृणाल ज्योति जाना है, सेवाभाव से बच्चों को पढ़ाना है. संध्या को श्लोक उच्चारण का अभ्यास करना है. शेष समय में लिखना-पढ़ना. व्यर्थ अपने आप छूट जाता है जब वे सार्थक  को पकड़ लेते हैं. 

घर के बायीं तरफ वाले मैदान में बीहू नृत्य की शूटिंग चल रही है. कभी संगीत की आवाज आती है कभी ‘कट’ की और सब थम जाता है. छोटी लड़कियाँ भी हैं और बड़ी भी. अप्रैल में तो यहाँ चारों ओर ढोल की थापें सुनाई देती हैं, इस बार मार्च से ही बीहू आरंभ हो गया है. जून दो दिन के लिए आज टूर पर गए हैं. दोपहर को क्लब गयी थी,  शाम के आयोजन की तैयारी चल रही थी, एक अन्य सदस्या भी आयी थी, जो पहले बहुत बीमार रहा करती थी, एक वर्ष पूर्व योग करना आरंभ किया और अब पूर्ण स्वस्थ है. उसने ज्ञान के पथ पर कदम रख दिया है और तेजी से आगे बढ़ रही है.  नैनी भी ढेर सारे फूल लेकर वहाँ आयी और चार गुलदान सजा दिए, वह इस कार्य में दक्ष हो गयी है. घर पर भी शाम के लिए उसने कुछ व्यंजन बनाये हैं.अगले हफ्ते महिला क्लब की तरफ से कम्पनी की एक महिला उच्च अधिकारी का विदाई समारोह है. वह उनसे वर्षों पहले एक बार विदेश में मिली थी. उसके बाद दो-तीन बार क्लब की मीटिंग में. नई प्रेसीडेंट ने कहा, उनके लिए कुछ लिखना है. 

और अब उस पुरानी डायरी का एक पन्ना - रात्रि के ग्यारह बजने वाले हैं. सुचना और प्रसारण मंत्रालय के ‘नाटक व गीत विभाग’ के ‘दुर्गे कला केंद्र’ के कलाकारों का नृत्य-गीत देखकर बहुत अच्छा लगा. सचमुच नृत्य और संगीत में जादू है, लोक नृत्य का तो कहना ही क्या, उसके पाँव थिरकने लगते हैं धुन सुनते ही, अफ़सोस कि उसने कक्षा सात के बाद कभी नृत्य नहीं किया. कल उसे दादाजी के घर जाना है. किताबें और एक ड्रेस लेकर जाएगी. फिर उसके कमरे में छोटी बहन रहेगी. परीक्षाएं इतनी नजदीक हैं और उसकी पढ़ाई अभी तक गति नहीं पकड़ पायी है. खैर ! अब वह क्या कर सकती है, ऐन वक्त पर उसका पागल मन धोखा दे जाता है. उसे तो केवल नीला आसमान, फूल, नदी, छोटे बच्चों की मुस्कान... देखकर ही ख़ुशी मिलती है. 

बिलकुल वही अनुभूति, बल्कि उससे भी अच्छी ! इस समय वह दादी जी के घर पर है. आस पड़ोस की छोटी-छोटी बच्चियाँ मिलने आयीं, ये सब बहुत अच्छी हैं, भोली.. मगर दुनिया इन्हें ऐसा रहने कहाँ देगी. वह सबसे छोटी रेणु उसने कैसा चुटकुला सुनाया.. एक ने कहा, आप क्यों आजकल हर वक्त सपने बुनती हैं ! ...और दादाजी ने भी एक चुटुकुला सुनाया, कहा, वे वैष्णव हैं सो एक अंडा खाएंगे और फूफा जी यदि आएं तो उन्हें दो खिला देना. कल सम्भवतः बुआ जी आएं. शाम को उसकी घड़ी खो गयी, सारा कमरा ढूंढ लिया तो मिली बड़े सन्दूक के पीछे. चचेरे भाई ने कहा, एक दिन पता चल जाये कि सुबह पांच बजे आकाश में तारों की स्थिति या प्रकाश कितना है तो रोज समय पर उठने में आसानी होगी. उसने सोचा, वह भी कल जल्दी उठेगी और आकाश दर्शन करेगी. 

Thursday, June 4, 2020

सोहराब मोदी की फिल्म


अभी-अभी टीवी ओर एक विशाल सभा देखी और भाषण सुना. देश का मिजाज बदल रहा है, जनता बदल रही है. उसे भरोसा है कि उनका नेता उन्हें सही मार्ग पर पर ले जा रहा है. आने वाले चुनाव में बीजेपी पुनः जीतकर आएगी, मोदी जी का आत्मविश्वास यह बता रहा है. 'सबका साथ, सबका विकास' का उनका मन्त्र देश को नई ऊँचाइयों की ओर ले जायेगा. उसने तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी उस डायरी में कुछ अगले पन्ने खोले. 

कालेज जाने के लिए उसे बस का इंतजार करना होता था, जो कभी -कभी आती ही नहीं थी, इंतजार तब बोझिल लगने लगता था, उस समय यह राज नहीं पता था कि वर्तमान के क्षण में कैसे जिया जाता है. खाली खड़े-खड़े मन कभी अतीत और कभी भविष्य के चक्कर काटता और बेवजह ही थक जाता. दीदी उन दिनों घर के पास ही रहती थीं, कभी माँ और कभी वह रात्रि को उनके घर ही रह जाते, जीजाजी तब विदेश में थे. उस दिन कोहरा घना था, एक कुत्ता ज़मीन पर पड़ा अजीब सी आवाजें निकाल रहा था. एक बुढ़िया भी अक्सर उसे इस रास्ते पर मिलती थी पर उस दिन नहीं थी, शायद ठंड के कारण. कालेज से लौटते समय बस में बहुत भीड़ थी. एक महाशय संसार की झूठी, फरेब से भरी बातों और लोगों पर ठंडी साँस भर रहे थे. लोगों की हृदय हीनता और अनुसाशन हीनता पर भी पर स्वयं जनाब मूंगफली खा खाकर छिलके वहीं बस में ही फेंकते जा रहे थे. सड़क पर करते समय वह एक निजी बस से टकराते- टकराते बची. 

रात्रि का समय, पर नीरवता नहीं, माँ रेडियो पर नाटक सुन रही थीं जिसकी आवाजें उसके कमरे तक आ रही थीं. दोपहर को चाची जी आयी थीं उनके घर, उसे हँसी आती थी उनके बोलने के अंदाज पर, अब नहीं आती. जो जैसा है वैसा ही स्वीकारने की कला जो तब नहीं सीखी थी. गोर्की की एक कहानी उसने उस दिन पढ़ी थी, जिसमें ‘गरीब लोग’ का जिक्र जिस तरह हुआ है, उससे भी हँसी आ गयी, वह उसे खत भेजता है,  वह उसे भेजती है. वाह ! दोस्तोव्यस्की पर सारिका का विशेषांक पढ़कर कोफ़्त हुई थी उसे. व्हाइट नाइट्स का कितना असुंदर अनुवाद किया है, मात्र शब्दानुवाद.  मूल पढ़कर तो वह पागल ही हो गयी थी पर सारिका में पढ़ा तो उसका सौवां हिस्सा भी मजा नहीं आया. 

रविवार को सोहराब मोदी की मशहूर फिल्म 'पुकार' देखी सबके साथ.  इंसाफ प्रेम पर कुर्बान नहीं हो सकता. उसको ठुकरा सकता है. इंसाफ इंसाफ है, वह आँखें मींच कर चलता है, वह चेहरे नहीं पहचानता, यह तब की बात थी, गुजरे वक्त की, क्या आज भी ऐसा है ? आज तो पैसे के बल पर इंसाफ को खरीदा-बेचा जा सकता है, जाता है. 

जब आदमी अकेला अनुभव करता है, वह सृजन कर सकता है. जब उसका एकांत भंग कर दिया जाता है, तब वह सृजन नहीं कर सकता, क्योंकि अब वह प्रेम का अनुभव नहीं करता. सभी सृजन प्रेम पर आधारित हैं. - लू शुन, उसे इस लेखक के बारे में आज भी कुछ नहीं पता, उसका यह विचार कहीं पढ़ा तो लिख लिया। 

तीन दशकों से भी अधिक का सफर...  उनके विवाह की सालगिरह है. जून शहर से बाहर गए हैं. आज दोपहर एक अनोखे अतिथि को भोजन खिलाया. ज्ञान और नीति, दोनों पर एक कहानी लिखी जा सकती है. एक बिहार का है दूसरी असम की. दोनों की पहचान फेसबुक पर हुई और दोनों के भीतर आध्यात्मिक, सेवा और समर्पण की भावना प्रबल है. नायक पेड़ों को भी नाम से बुलाता है और जीवन में एक उच्च लक्ष्य को लेकर चल रहा है. नायिका उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखती है, उसके लक्ष्य में पूरे मन से सहयोग कर रही है. अपने परिश्रम से कमाई धन राशि का एक विशाल भाग वह उसके ज्ञान मन्दिर में दान करना चाहती है. अपने परिवार व समाज का आक्षेप सहकर भी वह यह कार्य करना चाहती है. ऐसे लोग ही समाज को दिशा देने वाले होते हैं. 





Monday, April 20, 2020

विश्वकर्मा पूजा


रात्रि के आठ बजने वाले हैं, आज विश्वकर्मा पूजा का उत्सव उन्होंने जून के दफ्तर में मनाया. सुबह साढ़े नौ बजे वह उनके एक सहकर्मी की पत्नी के साथ वहाँ पहुँच गयी थी. पूजा दस मिनट पहले ही समाप्त हो चुकी थी, प्रसाद वितरण की तैयारी थी. जाते ही नाश्ते का एक पैकेट मिला. एक मिठाई, एक नमकीन व एक केला. प्रसाद में नारियल व अदरक के टुकड़े मिश्रित अंकुरित मूंग व चने तथा चिनिया केला. पहले तंबोला और लॉटरी निकलने का मजेदार खेल हुआ फिर भोजन, जो बाहर से मंगवाया गया था. घर आकर कुछ देर आराम किया, पर नींद नहीं आ रही थी, मन में उत्सव के विचार आ रहे थे, फिर सुबह सुनी गुरु माँ की बात याद आयी. जप को गहरा करके पैर के अगूँठे तक स्पंदन को महसूस करना है, मन एकाग्र हो जाता है, ऐसा ही हुआ. दोपहर बाद उसी सखी के साथ एक अन्य सखी को देखने अस्पताल गयी. उसकी किडनी में स्टोन है छोटा सा. उसके पति दफ्तर के काम से विदेश  गए हैं, पुत्र भी यूरोप में जॉब के सिलसिले में हैं, तथा ससुर जी दूसरे अस्पताल में एडमिट हैं, उनका आपरेशन हुआ है शायद एक-दो दिनों में घर आ जायेंगे. भगवान सबकी सहायता के लिए किसी न किसी को भेज ही देता है, उनका माली ससुर की सेवा में है और उसकी पत्नी घर की देखभाल कर रही है, पुत्र ससुर जी के लिए भोजन लेकर गया है. शाम को योग कक्षा में एक साधिका ने पूछा, उसके बाएं पैर में दर्द है, क्या करे, तिल के तेल की मालिश से अवश्य ही लाभ होगा, ऐसा उसे बताया. 

रात्रि के आठ बजे हैं, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में गणेश पूजा का एपिसोड आ रहा है. जिसमें मूसलाधार वर्षा हो रही है. कुछ देर पहले क्लब की अध्यक्षा का फोन आया, कैंटीन में उनके द्वारा मंगाए गए उपहार आ गये हैं. पहली बार ऐसा हो रहा है कि सभी सदस्याओं को वार्षिकोत्सव के बाद उपहार दिए जायेंगे. शाम को बेसिक कोर्स का फॉलोअप था, सुदर्शन क्रिया करायी गयी. दोपहर को अगले महीने होने वाले क्लब के एक कार्यक्रम की तैयारी के लिए मीटिंग थी, परसों कुक को बुलाकर मेनू तय करना है. आज सुबह पीछे वाले घर से लड़कियों के रोने की आवाजें आयीं तो नैनी को भेजकर बुलवाया. दो किशोरी कन्याओं को उनके चाचा ने पिता के कहने पर डंडे से पीटा. उसे भी बुलाया, डांटा। लड़कियों को समझाया, वे दोनों रात भर गांव में कोई कार्यक्रम देखकर सुबह घर लौटी थीं. किशोरावस्था में दोनों ने कदम रखा ही है और मित्र बना लिए हैं. आज माली ने बांस का एक गोल ढाँचा बनाया, जिस पर पॉलीथिन लगाना है. क्यारी में बीज डालकर उसे ढकना होगा वर्षा जल से बचाने के लिए. आज फिर दो ठेले गोबर की खाद के खरीदे बगीचे के लिए. यह वर्ष उनकी खेती-बाड़ी के लिए अंतिम वर्ष है, इसलिए अभी से तैयारी शुरू कर दी है. 

आज का दिन कुछ अलग था, सुबह-सुबह ही प्रेसीडेंट का फोन आया. साढ़े दस बजे वे उपहार में दिए जाने वाला सामान देखने कैंटीन गए, वहां के लोगों का व्यवहार बहुत शालीन था. एक घंटे के अंदर उन्होंने सामान भिजवा दिया.  दोपहर को मृणाल ज्योति गयी, जहां चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष तथा दो सदस्यों से मिलने का अवसर मिला. जिला बाल वेलफेयर अधिकारी भी आयीं थीं. मीटिंग काफी देर तक चली. वे साढ़े तीन बजे घर लौटे. जून सुबह नौ बजे ही दफ्तर चले गए थे और दोपहर को डिब्रूगढ़. विशेष बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार कितनी सजग है, कई बातों की जानकारी हुई. 

मौसम काफी गर्म है आज, सितम्बर का तीसरा हफ्ता चल रहा है पर अभी तक जून का सा आभास हो रहा है धूप में. आज सुबह कुक आया था अक्टूबर में क्लब के कार्यक्रम में नाश्ते व भोजन का जिम्मा उसे दिया गया है. कुछ देर पूर्व टीवी पर राजस्थान सीकर से गुरूजी का ज्ञान सुना जो वे किसी कालेज के छात्र-छात्राओं को दे रहे थे. सीधी-सरल भाषा में उन्होंने ज्ञान के गहरे सूत्र समझा दिए. उनकी बातें इतनी सरल होते हुए भी कितना गहरा अर्थ लिए होती हैं. दोपहर को हिंदी की कक्षा के लिए मृणाल ज्योति गयी. एक से ग्यारह तक गिनती के साथ कुछ शब्द लिखवाये. मोबाइल पर साइन लेंग्वेज में हिंदी सिखाने का तरीका देखा, उसकी सहायता से पढना आसान हो गया है. 

Monday, June 24, 2019

क्रिसमस ट्री



आज क्रिसमस है. हर जगह उत्सव का माहौल है. सुबह बड़े दिन का संदेश सुना था. हर आत्मा को स्वयं पर लगे दाग-धब्बे साफ करने हैं ! न दीन बनना है, न अधीन बनना है, पूर्ण स्वाधीन बनना है. न बेबस, न मजबूर, न असहाय बनना है, जीवन के अंतिम क्षण तक. उम्र चाहे कितनी भी हो, मन को सदा युवा बनाना है. मृणाल ज्योति गयी वह, केक और क्रिसमस ट्री सजाने का कुछ सामान लेकर. पहुँची तो कुछ बच्चे काम में लगे थे, उनके हाथ मिट्टी से सने थे. हाथ धोकर आये, उन्हें संगीत  सुनाया, केक खिलाया, बहुत खुश हुए. जून भी आये बाद में उसे लेने. उन्होंने देखा किस तरह वहाँ  निर्माण कार्य चल रहा है, स्कूल आगे बढ़ रहा है. वहीं से वे नाहरकटिया पुल के नीचे नदी तट पर गये. पानी कम था, लगभग स्थिर ही लग रहा था. किनारे पर काई भी जमी थी. एक-दो पिकनिक पार्टियाँ भी चल रही थीं. इस समय शाम के पांच बजे हैं. कुछ देर पहले वे भ्रमण पथ पर टहलने गये, उससे सटा हुआ  बगीचा गुलाब के फूलों से भरा था. हर रंग के गुलाब थे वहाँ, लाल, गुलाबी, पीले, सुनहरे, नारंगी, हल्के जामुनी, पीच और मैरून !

आज इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद के बारे में एक कार्यक्रम देखा. सत्तर वर्ष की उम्र में वह विदेश गये और सत्तर देशों में गीता का ज्ञान फैलाया. ग्यारह बजने को हैं, आज मौसम खुशनुमा है. खिली-खिली धूप और वातावरण में शांति..ध्यान के बाद मन भी शांत है. पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. परसों सुबह रात्रि भोज की तैयारी में निकल गयी, दोपहर भोजन बनाने-बनवाने में व शाम खाने-खिलाने में. जून के एक सहकर्मी आये थे परिवार के साथ, तीन बच्चे, तीन बुजुर्ग तथा दो व्यस्क. बहुत अच्छा समय बीता. उसके पूर्व की संध्या को वे संगीत सुनने गये थे, शास्त्रीय गायन व वादन ! उससे पूर्व एक सखी ने विदाई पार्टी में बुलाया था. इस वर्ष के दो दिन शेष हैं. आज वे अरुणाचल प्रदेश जा रहे हैं. नये वर्ष का स्वागत तेजू में करेंगे, जहाँ सूर्य की किरणें सर्वप्रथम उदित होती हैं. जून कुछ देर में आने वाले होंगे. वह बगीचे की धूप में हाथ में डायरी थामे खड़े होकर ही लिख रही है. घास अभी भी भीगी हो शायद, सो वस्त्र खराब होने के भय से नीचे नहीं बैठ रही है, पर धूप इतनी तेज हैं कि नन्ही-नन्ही ओस की बूँदें कब की सूख चुकी होंगी, उसका भय हजार भयों की तरह व्यर्थ ही सिद्ध होगा यदि वह बैठ जाये.

सुबह वे टहलने गये, फूलों की सुगंध जो पहले दूर से ही आ जाती थी, आज निकट से गुजरने पर भी नहीं आयी. उसकी सूंघने की शक्ति पूरी तरह वापस नहीं लौटी है. गले में कभी-कभार खराश भी हो जाती है. खैर, भोजन के प्रति उसकी आसक्ति को छुड़ाने के लिए ही शायद प्रकृति के द्वारा रचा गया यह प्रपंच है. उसे अपना उद्धार करना है. परमात्मा इसमें सहायक है. कोई भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थति उसे अनंत से जुड़ने से रोक न पाए, अपनी ही नजरों में वह पराजित न बने. मन संकुचित न रहे, निज स्वार्थ से ऊपर उठे. नये वर्ष में यही प्रार्थना लेकर प्रवेश करना है. कुछ भी ऐसा न रहे जो उसे भारी कर दे, रोग का कारण बने. साधना के प्रति श्रद्धा सदा बनी रहे इसका ध्यान रखना है. साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए सदा विद्यार्थी बनकर रहना है. कैवल्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करना है, जब तक कैवल्य की प्राप्ति न हो तब तक विश्राम नहीं, आराम नहीं. जीवन का एक भी पल विवाद में न बीते. शोक और मोह से आत्मा एक क्षण के लिए भी ग्रस्त न हो. परमात्मा उसी हृदय में विराजमान होंगे जो हृदय खाली होगा. संबंधों का बोझ जब तक आत्मा पर है तब तक वह उड़ान नहीं भर सकती. परमात्मा सदा ही उसका रक्षक है. वह भीतर से शिक्षा देता है और बाहर से कृपा रूप में ऐसी परिस्थतियाँ खड़ी करता है कि आत्मा स्वयं की परख कर सके. कितने दाग लगे उसे यह स्पष्ट दिखाई दे. उनकी यात्रा आत्मशुद्धि की यात्रा है. जगत इसमें सहायक होता है, जगत दर्पण है, जिसमें वे अपने ही अक्स को देखते हैं.

Friday, March 29, 2019

सदिया पुल



रात्रि के सवा दस बजे हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, किसी ऑफिशियल मीटिंग में भाग लेने गये हैं. आज ‘विश्व योग दिवस’ है. सुबह समय पर उठे, योगा प्रोटोकाल के अनुसार प्रैक्टिस की. जून कम्पनी की तरफ से आयोजित सामूहिक योग सम्मेलन में भाग लेने बीहुताली गये. वह ‘पूर्वांचल कारिकारी स्कूल’ गयी जहाँ बच्चों को योग कराया. वापस आकर मृणाल ज्योति में भी योग सेशन का आयोजन किया. शाम को पौने चार बजे संगिनी गयी, जहाँ गायत्री समूह की महिलाओं के साथ चार घंटे तक आर्ट ऑफ़ लिविंग के ‘बेसिक कोर्स’ में भाग लिया. इस तरह आज का पूरा दिन ही योग के नाम था. सुबह से ही आज मौसम अच्छा था. शाम को कोर्स में बहुत दिनों बाद ‘सुदर्शन क्रिया’ की, वर्तमान का क्षण ही वास्तव में जीवन का अवसर देता है, वरना वे अतीत की स्मृतियों को ही ढोते रहते हैं, कभी भविष्य की आशंकाओं को. अब नींद आ रही है. उसने सोचा, जून को संदेश कर देती है, दरवाजा खुला है, आ जायेंगे !

आज कोर्स में कुछ महिलाओं को देखकर लगा, वे सभी कुछ शीघ्र चाहते हैं और जल्दी से बिना कुछ किये चाहते हैं. संसार में कुछ भी पाना हो तो प्रयास करना होता है प्रतीक्षा करनी पड़ती है. अध्यात्म में कुछ पाना है तो कुछ करना नहीं, केवल प्रतीक्षा करनी होती है. जाने अनजाने जो भूलें वे कर बैठते हैं, उनका खामियाजा एक न एक दिन भुगतना ही पड़ता है.

आज कोर्स का चौथा दिन है. अभी तक तो सब ठीक चल रहा है. सभी महिलाएं कोर्स में पूरे उत्साह से भाग ले रही हैं. एक महिला के सिर में कल से दर्द था, आज सुबह फोन आया. अब तक ठीक हो गया होगा. अभी-अभी एक सखी से बात की, सोमवार को ‘सदिया पुल’ देखने जाने का कार्यक्रम है. ब्रह्मपुत्र की उपनदी लोहित नदी पर बना भूपेन हजारिका सेतु या ढोला-सदिया सेतु भारत का सबसे लम्बा पुल, जिसका उद्घाटन मोदी जी ने पिछले महीने ही किया है. रविवार को डिब्रूगढ़ में जगन्ननाथ पुरी की यात्रा है. सम्भवतः कोर्स के बाद वे भी जाएँ, जहाँ पुरी की तरह एक नया विशाल मन्दिर वहाँ बना है. कल शाम को सोनू से बात हुई, उसके दफ्तर में एक लड़की की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है, वह काफी परेशान लग रही थी. दीदी ने लिखा है भीतर की शांति का अनुभव योग से हुआ है उन्हें, समय निकालकर अपने साथ बैठना, फिर स्वयं को भीतर तक पहचानना कितना जरूरी है स्वस्थ रहने के लिए.

कोर्स की समाप्ति पर उसने कुछ पंक्तियाँ कहीं

अभय की चट्टान पर घर बनाना है
प्रीत का दिल में सदा दिया जलाना है
दिल के आइने को सदा सच से चमकना है
ज्ञान का दीपक सदा आगे दिखाना है
बाँट देना है जगत में पास जो कुछ भी है निखारें  
यम-नियम को साध कर वे पूर्ण जीवन को संवारें !     


Tuesday, February 12, 2019

काले और हरे अंगूर



सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. दिल्ली आये दूसरा दिन है. कल दोपहर साढ़े ग्यारह वे घर से निकले, फ्लाईट समय पर थी. जून रास्ते में ही उतर गये यानि गोहाटी में. वह शाम को दिल्ली पहुंची, बड़े भाई लेने आये थे. कार पार्क जोन में वह मिले, उन्हें उसकी वजह से कार छोड़कर आना पड़ा, थोड़ी सी परेशानी हुई पर जल्दी ही वे घर पहुंच गये. रात्रि भोजन मंझली भाभी के यहाँ किया, वापस आते-आते देर हो गयी थी. भतीजी ने अपने विवाह की तस्वीरें दिखाईं एक वीडियो भी. भाई सोसाइटी के दफ्तर में काम करते हैं, उन्होंने बताया लोगों के बिल बनाने के लिए उन्होंने एक तकनीक बनाई है, जिसमें वर्ड में बनाये फॉर्म में एक्सेल से डाटा अपने आप ट्रान्सफर हो जाता है. हो सकता है यह विधि मृणाल ज्योति में वे काम में ला सकें. रात को सांख्य शास्त्र सुना और सुबह ओशो को. ज्ञान के बिना मन तूफान में डोलती नैया की तरह डांवाडोल ही रहता है. ज्ञान जैसे एक लंगर का काम करता है जिसके सहारे नाव स्थिर हो जाती है. सुबह वे दूर तक घूमने भी गये, तापमान १०-१२ डिग्री रहा होगा, लेकिन अनेक लोग पार्कों में निकले हुए थे. वापस आकर चाय पी, भीगे हुए बादाम, खजूर और बिस्किट के साथ. कुछ देर धूप में बैठकर इधर-उधर की बातें कीं तत्पश्चात नहाधोकर नाश्ता. भाई द्वारा बनाया अंकुरित मूंग व मोठ का नाश्ता, फिर वह सब्जी लेने नीचे चले गये. सफाई करने व खाना बनाने दो सहायिकाएं अपना काम कर रही थीं. सामने बालकनी में धूप आ रही थी, उसने सोचा कुछ देर धूप में बैठने का आनंद लिया जा सकता है.

धूप तेज है, ऊपर छत पर धूप में बैठकर उन्होंने फलों का आनंद लिया. घर में गमले में उगा अमरूद, पपीता, काले व हरे अंगूर तथा केला. सभी फल मीठे व रसीले. आज सुबह वह दिल्ली से पिताजी से मिलने आ गयी है. ट्रेन समय पर थी, छोटा भाई डिब्बे में ही आ गया था. सामान लेकर प्लेटफार्म से सीढ़ी चढकर वे बाहर निकले. अकेले आने पर भाइयों का सहयोग मिलता है निस्वार्थ और स्नेह भरा. स्टेशन से घर आते समय भाई ने मिठाई व फल खरीदे.

रात्रि के दस बजे हैं. भाई-भाभी एक विवाह समारोह में शामिल होने गये हैं, पिताजी अपने कमरे में सोने चले गये हैं. घर में शांति है आज, कल रात पिताजी का ट्रांजिस्टर भी चल रहा था और नीचे तेज आवाज में टीवी. शाम को पुरानी तस्वीरें देखीं, उससे पूर्व नाद-ब्रह्म ध्यान किया. दोपहर को चचेरा भाई आया था, अकेला रहता है और अपना ध्यान जरा भी नहीं रखता. पैरों-हाथों पर मैल जमा था, उसे गर्म पानी व साबुन दिया. पिताजी ने कहा, सेवा का मौका दिया है उसने, करनी चाहिए. उसे हर बार यानि हर महीने आने के लिए कहा. सुबह पिताजी के साथ टहलने गयी बॉस थोड़ी सी दूर. उनमें जरा भी आलस्य नहीं है. हर समय काम करने को तत्पर हैं, चलने में दिक्कत होती है पर खुद के लिए बॉर्नविटा लेने खुद जाते हैं. कल भी उनके साथ टहलने जायेगी. उसके बाद छोटी भाभी के साथ बाजार गयी. दो छोटी लडकियों के लिए उपहार खरीदने थे. भाभी के माँ-पिता के विवाह की स्वर्ण जयंती पर लिखी कविता का प्रिंट लिया. जून ने इसमें दूर से ही सहायता की. दोपहर को ओशो की पुस्तक पढ़ी. छोटा भाई ओशो के प्रवचन सुनता है और बैठे-बैठे कहीं खो जाता है, वह भाव समाधि में रहता है, सदा होश्पूर्ण विश्राम की स्थिति में !  

Friday, December 7, 2018

द जंगल बुक



शाम के सात बजे हैं, पहली बार ऐसा हुआ है जब जून और वह घर में अकेले हैं. नन्हा दफ्तर गया है, और उसकी मित्र अपने किसी रिश्तेदार से मिलने. भांजा अपने हॉस्टल चला गया है. उसकी मित्र ने कहा है जब वे वापस घर जायेंगे, उसकी माँ उनसे मिलने आयेंगी. अगले वर्ष के आरम्भ में ही नन्हा और वह विवाह बंधन में बंध जायेंगे. सुबह भी पांच बजे उठे. नन्हे ने सभी के लिए दक्षिण भारतीय नाश्ता बाहर से मंगवा लिया था, इडली, डोसा, पोंगल तथा हलवा. आज PPT पर थोड़ा काम किया. जून का कहना है वह पूर्व निर्धारित तिथि को वापस नहीं जा रहे हैं, पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाने के बाद ही वह वापस जायेंगे. अगले माह पहले सप्ताह में प्लास्टर खुलेगा, उसके बाद जून की इच्छा के अनुसार सम्भवतः वे दुबई भी जा पायें. छोटी भांजी का मेल आया, वह भी दुबई जा रही है, सो बहुत खुश थी कि वहाँ उनसे भी मिलेगी. आज उसके पास समय है पर भीतर कुछ कहने को नहीं है. न ही कुछ जानने को है, जिसे जानकर सब कुछ जान लिया जाता है, उसे जानने के बाद भीतर कैसा मौन छा जाता है. इस संसार में यूँ तो जानने को बहुत कुछ है पर जो संसार एक स्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं, उसे जानकर भी क्या लाभ हो सकता है. कुछ देर योग साधना करना ही सबसे उत्तम है !

रात्रि के आठ बजे हैं. आज सुबह नींद देर से खुली. प्रातः भ्रमण की जगह सांध्य भ्रमण किया. छत पर टहलने गयी तो सूर्यास्त होने ही वाला था. बादलों का रक्तिम रंग आकाश को अनोखे रंगों से दहकाता जा रहा था. वापस आकर बालकनी से देखा आकाश गुलाबी हो गया था. कैमरे से कुछ तस्वीरें लीं जो जून ने फेसबुक पर प्रकाशित कर दी हैं. आज रात्रि भोजन में काले चने की सब्जी बनाई है, जो नन्हे को बहुत रुचिकर है. दाल व मेथी की जो बड़ी वह साथ लाये थे उसे डालकर कुम्हड़े की सब्जी भी. साथ ही छोटी कटी सब्जियों का सादा सूप. आज से रसोइया छुट्टी पर जा रहा है, कल से दूसरा आएगा. दोपहर को छोटी बहन ने एक चित्र पूरा करके व्हाट्सएप पर भेजा, जो शायद वह कई दिनों से बना रही थी. टेक्नोलोजी ने दूरियाँ मिटा दी हैं. सुबह से एक बढ़ई घर में काम करता रहा, जो कल भी आएगा. नन्हे ने कलात्मक वस्तुओं से घर को सुन्दरता से सजाया है, खुला स्थान भी काफी है. आज सुबह नन्हे के साथ नेत्रालय भी गयी, डाक्टर ने परीक्षण किया पर PVD के कारण दायीं आँख के सामने जो काला घेरा दिखाई देता है, उसका कोई इलाज नहीं है, समय के साथ वह अपने आप ही कम हो जायेगा.

आज फिर बढ़ई आ गया है. शाम तक काम चलेगा. जून कुछ देर के लिए विश्राम करने शयन कक्ष में गये हैं. सुबह काफी देर तक वह दफ्तर का काम करते रहे. उन्हें घर बैठे खरीदारी करने का साधन ‘जॉप नाउ’ मिल गया है, अमेजन तो है ही. सुबह तिल भूने, अभी मूंगफली भूननी है गुड़ भी मंगाया है, वे गजक बनाने वाले हैं. कल रात देर तक ‘द जंगल बुक’ देखी, जिसका थोड़ा सा शेष भाग आज सुबह देखा. बहुत अच्छी फिल्म है. छोटा मोगली एक सखी की बिटिया की याद दिला रहा था, उसके हाव-भाव में कुछ समानता तो अवश्य है. उसके पास पढ़ने के लिए इस समय कोई प्रिय पुस्तक नहीं है. यहाँ रखी एक पुस्तक The deep work पढ़ना शुरू करेगी और करना भी. समय को व्यर्थ ही गंवाया जाये अथवा उसका सार्थक उपयोग किया जाये यह तो उन पर ही निर्भर करता है. दोपहर के बारह बजने को हैं. आजकल उसे ऐसा लगने लगा है उसे कुछ भी ज्ञान नहीं है, न ही कुछ जानने को शेष रह गया है. भीतर कैसा सन्नाटा है, पर ऊर्जा जो मौन के रूप में प्रकट होती है वही तो मुखरित होगी और वह ऊर्जा तो अनंत है, चाहे जितना उपयोग करें उसका. परसों बड़े भाई का जन्मदिन है, उनके लिए एक कविता लिखेगी.



Tuesday, December 19, 2017

भात करेले की बेल


रात्रि के सवा आठ बजे हैं. जून आईपीएल मैच का फाइनल देख रहे हैं जो चेन्नई और मुम्बई के मध्य खेला जा रहा है. इसके पूर्व ‘पृथ्वीराज चौहान’ पर एक एपिसोड देखा. उसने दिन भर में हुई विशेष बातों को स्मरण किया. आज दोपहर की कक्षा में एक नया बच्चा आया, जिसके पिता उसे खुद छोड़ने आये थे और विशेष ध्यान देने को कह गये हैं. बच्चों ने बहुत सुंदर कला कृतियाँ बनायीं. दोपहर को भात करेला की सूखी सब्जी बनाई थी, जो जरा भी कड़वा नहीं होता. बगीचे में उसकी बेल अपने आप ही हर वर्ष निकल जाती है और सब तरफ फ़ैल जाती है. आज मंझले भाई का फोन आया, वह तबादले पर लेह जा रहा है. जून में वे भी वहाँ जायेंगे.

चार बजने को हैं शाम के. सुबह बिस्तर त्यागने से पूर्व संध्याकाल का अनुभव किया. बाहर वर्षा हो रही थी, बरामदे में ही टहलते रहे कुछ देर. अब जाकर थमी है. आज मंगलवार है, साप्ताहिक भजन का दिन, समूह में सत्संग किये सालों हो गये हैं. जून को पसंद नहीं है पर घर पर करना उन्हें अच्छा लगता है. संस्कार पड़ रहे हैं, एक दिन तो पनपेंगे. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को व्यायाम कराया, उन्हें अच्छा लगा. आज तीनों ब्लॉगस पर पोस्ट प्रकाशित कीं. जीवन में क्या महत्वपूर्ण है, यह समझने में व्यक्ति कितना समय लगा देता है. कल शाम को जून के एक सहकर्मी अपने परिवार के साथ आये थे, उनके साथ फिल्मों की बातें कीं, और पौधों की भी. वे मैकरोनी लाये थे. सालों बाद खायी.

एक दिन का अन्तराल, आज का दिन कुछ अलग सा बीता, जून को चेन्नई जाना था सो भोजन दस बजे ही कर लिया. उसे भी स्कूल से एक शिक्षिका के साथ अन्य स्कूलों में जाना था, लौटी तो एक बजने को था. वे किशोरियों के एक कार्यक्रम के लिए आमन्त्रण देने कई स्कूलों में गयीं. हिंदी हाई स्कूल, नहोलिया, गोपीनाथ बरदलै हाई स्कूल, लखिमी बरुआ हाई स्कूल, दुलियाजान गर्ल्स कालेज, राष्ट्रभाषा हाई स्कूल और दुलियाजान उच्च विद्यालय. कल एक और स्कूल आशादीप में जाना है. वापस आकर कुछ देर सोने की कोशिश की पर नींद नहीं आई. माली की बेटी कुछ मांगने आयी थी, होते हुए भी उसे नहीं दी, शाम को दी. गधा अपनी मर्जी से ही चलता है. परमात्मा उन्हें बेशर्त हर पल ही दे रहा है पर वे कितने सुविधा लोभी हैं. कुछ देर नेट पर किशोरावस्था के बारे में पढ़ा. वह छात्राओं को कुछ व्यायाम सिखाएगी और प्राणायाम भी. शाम को टहलते हुए उन वृद्ध सज्जन से मिलने गयी. बहुत जिंदादिल हैं, उन्होंने अपना जीवन बहुत सलीके से जीया है. अभी भी सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं. सुबह उठकर योगासन करते हैं. आंटी ने दोनों हाथ फैलाकर घूमकर दिखाया जो वे सुबह इक्कीस बार करती हैं. ज्ञान जीवन को पुष्पित करता है और गुरू का होना कितना अंतर ला देता है किसी के जीवन में. गुह्यतम ज्ञान का खजाना मिल जाता है, भीतर का प्रकाश मिल जाता है. उस प्रकाश के बिना ज्ञान टिकता नहीं. अंकल ने कहा, वह उस प्रकाश को पा चुके हैं इसके बारे में कुछ नहीं कहेंगे. वाकई उसके बारे में क्या कहे कोई. उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा है. नन्हे को भी बताया उनके बारे में. उसने बताया वह एक अच्छे से नये घर में रहने लगा है, पौष्टिक आहार भी लेने लगा है. तैराकी भी शुरू की है. उन्हें वहाँ आने के लिए निमन्त्रण दिया. अगस्त में वे उसके पास जा सकते हैं. जून अभी तक चेन्नई नहीं पहुंचे होंगे, फोन अभी आया नहीं है.

Friday, June 9, 2017

बूँदा-बाँदी


दो दिनों का अन्तराल..परसों राखी थी, वह दो अन्य महिलाओं के साथ  मृणाल ज्योति गयी, सबने बच्चों को राखी बांधी, लड़के-लडकियों दोनों को..ये विशेष बच्चे जो हैं. कल भी वार्षिक सभा में वहाँ जाना है, हर बार की तरह उसने इस अवसर के लिए एक कविता लिखी है. राखी पर मन में कामना उठी थी कि उसने भेजी है तो भाईयों की ओर से भी फोन तो आने चाहिए, पर इस वर्ष भेजते वक्त भी मन में हर वर्ष की तरह उत्साह नहीं था, सो परिणाम भी वही हुआ. किसी ने फोन नहीं किया. अब अंतर के स्नेह के लिए किसी माध्यम की भी क्या आवश्यकता भला..यह तो आसक्ति ही हुई. ईश्वर आसक्तियों के धागे एक-एक करके तुड़वाता जा रहा है. जो हो सो हो, कोई आग्रह नहीं रहा अब भीतर. मन इच्छा का ही दूसरा नाम है, इच्छा न रहे तो मन नहीं रहता और तब अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं रहती. कर्ता भाव भी तो तभी मिटेगा. जब कर्म किया हो तभी उसके प्रतिफल की आशा रहती है, जब वे करने वाले ही नहीं तब परमात्मा ही जाने, और वह कभी कुछ चाहता ही नहीं तभी तो वह परमात्मा है. आत्मा, देह, मन, बुद्धि से पृथक है, उसे अपने आप में सुखी रहना आ जाये तो देह भी स्वस्थ रहेगी और मन भी. 

सुबह हल्की बूँदा-बाँदी में छाता लेकर टहलना अच्छा लग रहा था. मनन-चिन्तन भी चल रहा था. अज्ञान दशा में कोई न कोई अभाव ही उन्ह कृत्य में लगाता आया है, वे कुछ बनकर, कुछ करके दिखाना चाहते हैं ताकि अपने भीतर के अभाव को ढक सकें, वे जो दिखाना चाहते हैं, वास्तव में उससे विपरीत होते हैं. ज्ञान होते ही समीकरण बदल जाते हैं, कृत्य सहज स्फूर्त होते हैं, भीतर जो भी शुभ-अशुभ होता है उससे संबंध मात्र दर्शक का ही रह जाता है. अज्ञानवश उससे स्वयं को चिपका कर वे सुख-दुःख का अनुभव मन द्वारा करते हैं. संवेदनाओं से जो सुख मिलता है वह कितना उथला होता है, इन्द्रधनुष जैसा..ओस की बूंद जैसा..भीतर शाश्वत सुख है, वही वे हैं, वही उन्हें मुक्त करता है !   


अज गर्मी कुछ ज्यादा है. उसने सोचा दोपहर के भोजन में खिचड़ी बनाएगी, तीन दालों वाली खिचड़ी, जून को पसंद आएगी. स्वयं के साथ यदि किसी का संबंध दृढ़ हो जाये तो संसार के साथ अपने आप ही जाता है. स्वयं पर विश्वास हो तो जगत भी विश्वासी नजर आता है. जून और उसका रिश्ता और दृढ हो गया है, बल्कि जगत में किसी से भी जुड़ना अब कितना सहज लगता है जैसे श्वास लेना. एक वक्त था जब परिचय होने पर भी बात करना कठिन लगता था, अब कोई अजनबी लगता ही नहीं. परमात्मा भी तब दूर था, और अब तो वह अपना आप ही है, निकट से भी निकट. उसकी शक्ति अपनी हो गयी है, उसकी प्रीत भी, संसार और परमात्मा दो नहीं हैं. स्वयं से जुड़ने के बाद ही उस शांति का अनुभव कोई कर सकता है जिसका जिक्र धर्म ग्रन्थों में मिलता है. सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, कोई हीनता-दीनता भी नहीं रहती. किसी के सम्मुख अब कुछ सिद्ध नहीं करना होता, किसी को कुछ नहीं सिखाना होता उस तरह जैसे पहले सिखाना चाहता है कोई. हर की अपनी यात्रा कर रहा है. हरेक एक पास अपनी पूंजी है. हरेक के पैरों में अपना बल है. हर कोई तो उससे जुड़ा हुआ है पर सबको इसका ज्ञान नहीं है जैसे पहले उसे भी नहीं था, उन्हें भी एक न एक दिन हो ही जायेगा. उनका यह क्षण ठीक रहे बस इतना ही पुरुषार्थ करना है, वे स्वयं से जुड़े रहें, स्वयं से पीठ न फेर लें, बस इतनी सी प्रार्थना है !

Wednesday, October 12, 2016

लाल चौक पर तिरंगा

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कल गणतन्त्र दिवस है. बीजेपी काश्मीर में लाल चौक पर तिरंगा फहराना चाहती है. उत्तरपूर्व के कई उग्रवादी संगठनों ने इसे न मनाने का फैसला किया है. उनकी अपनी समझ है. अलगाववादी गुट हजारों वर्षों के इतिहास को झुठला कैसे सकते हैं, वे ही जानें. जून ने सुबह उसका नाम डेंटिस्ट के पास लिखवा दिया था और गाड़ी भी भेज दी थी. वह बहुत ध्यान रखते हैं उसका. कल वे पहले नेहरु मैदान में फिर टीवी पर परेड देखेंगे, घर पर भी तिरंगा फहराएंगे. सुबह रामदेवजी का जोशीला भाषण सुना. देश जाग रहा है, परिवर्तन की लहर सब ओर दिखाई दे रही है, देश के लिए एक भावना लोगों के मनों में घर कर रही है. 

लॉन में हरी घास पर धरा का कोमल स्पर्श पाकर ( मकर आसन में ) लिखना एक नितांत सुंदर अनुभव है, जब कुनकुनी धूप बरस रही हो. स्वर्गिक, अलौकिक अनुभव कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. फूलों की कतारें हैं, हरियाली है और है सन्नाटा जिसे चीरता है पंछियों का कलरव! आज सुबह भी सुंदर वचन सुने, ब्रह्म मुहूर्त में आत्मा के विषय में सुनना भी प्रभु की अनंत कृपा का फल है. उन्हें कल एक फिल्म देखने जाना है, नन्हे के एक मित्र की कंपनी ने मॉल तथा उसमें स्थित पिक्चर हॉल का रिव्यू करने का काम उन्हें सौंपा है, टिकट के पैसे वे देंगे. कल उसने स्वर्गीय फुफेरे भाई की भेजी कविता ब्लॉग पर डाली. कल वह बहुत याद आ रहा था. बचपन में वह बहुत गोरा था, पारदर्शी त्वचा और नाजुक भी बहुत था. खांसता रहता था, सब उसे बुड्ढा कहते था. बड़ा हुआ तो किशोरावस्था भी देर से आयी, इलाज करने के बाद, लम्बा बहुत हो गया और दुबला भी..उसने मन ही मन प्रार्थना की जहाँ भी वह होगा उसे शुभकामनायें पहुंच ही जाएँगी.

आज सुबह ध्यान में सागर और लहर का संबंध स्पष्ट हुआ. वे एक अनायास उठी हुई लहर से ज्यादा कुछ भी नहीं, इस अनंत ब्रहमांड के सामने एक धूल के कण से भी छोटे हैं, पर जब वे उस सागर के साथ अपनी एकता का अनुभव कर लेते हैं, तब अहंकार उन्हें दुःख नहीं देता, जैसे बंधन उनका ही बनाया हुआ है, मुक्ति भी उन्हें ही खोजनी है. जानने के बाद ही पता चलता है कि वे कुछ भी नहीं जानते. मिलने के बाद ही पता चलता है कि अभी कितने दूर हैं. वर्तमान में रहें तो कोई बात ही नहीं करने के लिए, ज्ञान में रहें तो कुछ कहने के लिए बचता ही नहीं, ध्यान में रहें तो जगत के लिए कहने लायक क्या शेष रह जाता है. सेवा के सिवा करने को भी क्या है ! 

फरवरी का पहला दिन ! इसी महीने पिताजी यहाँ आ रहे हैं, जून देहली जा रहे हैं, उन्हीं के साथ आयेंगे. आज ब्लॉग पर हास्य कविताएँ पोस्ट कीं. कुछ लोगों की कविताएँ उसे समझ नहीं आतीं, जटिल मन की जटिल कविताएँ ! ध्यान में मन सरल हो जाता है, सहज जैसे प्रकृति के शांत रूप, लेकिन प्रकृति कभी विकराल रूप भी धर लेती है. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसने कविता लिखी, बड़ी भांजी, छोटा भांजा, भाभी-भैया व एक सखी के लिए भी, इसी महीने सभी का खास दिन है. जून आफिस से प्रिंट करके लायेंगे. उसके सिर में हल्का सा भारीपन है, दोपहर से लिखने में लगी है, शायद इसीलिए..अभी फूलों का गुलदस्ता बनाना है, जून भी आने वाले होंगे. 




Wednesday, August 17, 2016

इन्द्रधनुष के रंग


दीदी का फोन आया आज, उन्होंने स्मृति पर आधारित वह कविता पढ़ी, कुछ और बातें भी बतायीं जो उसे ज्ञात नहीं थीं. उनकी उस बहन को डिप्थीरिया हुआ था, जो बचपन में ही चल बसी थी. आज तो उसका टीका है उस वक्त नहीं था. आज शाम को वर्षा में वे भीगे, जून और वह, उन्हें देखकर पिताजी भी आ गये, फिर कुछ देर तेज मूसलाधार वर्षा के बाद आकाश में इन्द्रधनुष बन गया बहुत सुंदर ! उसने वर्षा पर कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं, कल सुबह उन्हें टाइप करेगी. इस वक्त शाम गहराती जा रही है. वह लॉन में है. हवा में ठंडक है और वातावरण धुला-धुला सा है. पंछियों की आवाजें आ रही हैं. प्रकृति का जैसा सान्निध्य यहाँ प्राप्त है वैसा बड़े शहरों में रहने वालों को शायद ही होता हो ! कल रात को नैनी के यहाँ झगड़ा हुआ पर आज शांति है, देखे, कब तक टिकती है. उसके पति को उसने समझाया और वादा भी किया कि उसे काम पर जाने में कोई बाधा नहीं होने देगी. ईश्वर उसकी सदा की तरह मदद करेंगे ! यह वाक्य ही गलत है, ईश्वर और वह क्या दो हैं ?

परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसे कविता याद करनी है. निराला की कविता भिक्षुक, बचपन में पहली बार पढ़ी थी. आज भी हल्की-हल्की फुहार पड़ रही है. कुछ नई कविताएँ लिखीं, ब्लॉग पर डालीं. हजारों लोग हजारों कविताएँ लिख रहे हैं. वास्तव में कवि स्वान्तः सुखाय ही लिखता है, रचना का पहला पाठक भी तो वही होता है. आज योग अभ्यास व क्रिया साधना करते समय बीच में ही रुककर उसने जून से जो कहा, वह पहले कभी कहा ही नहीं जा सकता था, अब भीतर साहस आया है, साहस जो ध्यान से उपजा है. सद्गुरु कहते हैं, ध्यान प्रार्थना की पराकाष्ठा है. ध्यान में जो ताकत है जो करते हैं वे जानते हैं !

कल दीदी से बात की, छोटी भांजी दुबई आ रही है, ओपेरा का जॉब उसने छोड़ दिया है. उसके नार्वेजियन पतिदेव पिछले पांच महीने से लन्दन में हैं. दोनों के बीच सम्पर्क कम होता जा रहा है, ऐसा दीदी ने कहा. वह जरा भी परेशान या दुखी नहीं थीं. जीवन जब जैसा हो वैसा ही वे स्वीकार करें तो..दुःख कैसा ? उसे यहाँ आने का निमन्त्रण दिया है, शायद वह आये..कभी न कभी यह इच्छा भी पूरी होगी ही ! आज उनकी मीटिंग है, कविता उसे याद हो गयी है, देखे, क्या होता है. आज सुबह उसने एक बात कही तो जून ने कहा कि उन्हें सदा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए, अब वह उसकी भाषा बोलने लगे हैं. कल माँ-पिताजी का जन्मदिन वे मना रहे हैं. कल पिताजी का फोन आया, वह कह रहे थे कि जितना-जितना ज्ञान उन्हें होता जाता है , उतना-उतना लगता है वे तो कुछ भी नहीं जानते. उसे अब इस जगत में जानने जैसा कुछ भी नहीं लगता, जो है सो है, जो जैसा है तब वैसा है..बस यही ज्ञान है, ज्यादा पढ़ना-सुनना अब व्यर्थ ही लगता है और सुनती भी है क्योंकि कुछ न कुछ तो करना ही है, कुछ किये बिना रहना हो नहीं सकता...शाम की तैयारी करनी है.

जुलाई माह का आरम्भ हो चुका है. मौसम भी बदल रहा है, उमस और चिपचिपाहट भरी गर्मी का मौसम. जब तक बादल बरसते हैं तभी तक ठंडक रहती है वरना..आज नन्हे के लिए उन्होंने गोंद के लड्डू तथा एक कविता भेजी है. इसी महीने छोटी बहन आ रही है. जून को कोलकाता तथा जोधपुर जाना है. उनका दर्द अभी पूरा गया नहीं है, थोडा़-थोडा़ सा शेष है, सद्गुरू की कृपा से उनके भीतर भक्ति, श्रद्धा व ध्यान का उदय हुआ है, प्रार्थना करना उनकी आदत में शुमार हो गया है.आशा नामकी एक लडकी जो कभी-कभी उसके पास पढ़ने आती है, आज पीतल के बर्तनों को चमका रही है. कभी-कभी मेहमानों को आना चाहिए अथवा तो त्योहारों को..

सलाह देने या दूसरों को उपदेश देने का उसे रोग है. कोई मांगे या न मांगे हर बात पर सलाह उसके भीतर तैयार ही रहती है, शायद इसकी वजह यही है कि उसे भीतर समाधान मिल गया है और उसे लगता है कि सभी को फटाफट समाधान मिल जाये, कि वे क्यों व्यर्थ ही परेशान रहें, हो सकता है उसके सूक्ष्म अहम् की पुष्टि होती हो..लेकिन सद्गुरु कहते हैं कि इस जग में जो सबसे ज्यादा दी जाती है और सबसे कम ली जाती है वे हैं सलाहें..यहाँ हर एक आत्मा को अपना समाधान स्वयं ही खोजना होता है कोई बना बनाया उत्तर किसी के काम नहीं आता तो आज के बाद यह निश्चय किया कि कई सलाह नहीं देनी है, किसी को भी नहीं देनी है, सभी अपनी मंजिल स्वयं ही तलाशेंगे, जब परमात्मा उन्हें जगायेगा तब वे जागेंगे !                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        


Thursday, July 7, 2016

चन्दन की लकड़ी


आज गुरूजी दुलियाजान आये. कल रात से ही उसका मन, प्राण सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. सुबह से ही मन पुलकित था. वे नौ बजे आयोजन स्थल पर पहुंच गये. भजन गायन का आरम्भ हुआ तो उन्होंने मगन होकर भजन गाए. पंडाल बहुत सुंदर सजाया गया था. उसने हिंदी में उनका परिचय दिया, असमिया में एक अन्य व्यक्ति ने दिया, जो मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाला एक प्रोफेशनल कलाकार था. गुरूजी ग्यारह बजने से कुछ देर पहले आये. उन्होंने उसे दृष्टि भर देखा, वह स्टेज पर पीछे बैठी थी, सोच रही थी, वह पीछे मुड़कर देखेंगे तो वह उनके दर्शन करेगी. उन्होंने ध्यान भी कराया. बहुत सी बातें कीं. वे पूरा कार्यक्रम नहीं देख सके क्योंकि उन्हें सेंटर जाने की जल्दी थी, जिसका उद्घाटन करने वे आने वाले थे. वहाँ कुछ देर प्रतीक्षा की, भजन गाए. तब गुरूजी आये, उसने उन्हें उनके आगमन पर लिखी कविता व ‘श्रद्धा सुमन’ पुस्तिका दी, घर पर बनायी मिठाई दी जिसपर उन्होंने हाथ रखा, पर बाद में उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर से भिजवा दी. उन्होंने अवश्य ही खायी होगी. उससे कहा, बिंदी क्यों नहीं लगाई, लगानी चाहिए तब जून की शिकायत की उसने उनसे, कि वही मना करते हैं ! वह उसके दिल के इतने करीब हैं कि उनसे कुछ छिपाने का कोई अर्थ नहीं रह जाता, वह उसे उससे भी अधिक जानते हैं. क्लब में भी उन्होंने प्रवचन दिया, सूक्ष्म व्यायाम करवाए, प्रश्नों के उत्तर दिए. सौ प्रतिशत शक्ति लगाकर काम करें, दूसरों के बारे में गलत न सोचें, ईश्वर सदा सबके साथ है और सदा मुस्कुराएँ ! ज्ञान के ये अनमोल मोती उन्हें दिए. यादों का एक खजाना छोड़ गये हैं वह दुलियाजान वासियों के दिलों में. उसके सिर पर हाथ रखा, अभी भी उस स्थान पर सिहरन हो रही है. परमात्मा सत्य है, वही शिव है और शिव ही सुंदर है. सद्गुरु परमात्मा का ही रूप है और वे कितने भाग्यशाली हैं कि ऐसे जीवित सद्गुरु उनके जीवन में हैं. उनकी कृपा तो उन पर सदा ही बरस रही है, उन्हें उसे पाने के लिए सुपात्र बनना होगा. उसने प्रार्थना की कि वह उनकी कृपा के लिए सुपात्र बनेगी.

गुरूजी कल दोपहर वापस चले गये लेकिन उसके मन में अमिट यादें छोड़ गये हैं. उनकी दृष्टि भीतर तक बेध गयी, उनका उसके सिर पर प्रेम भरा स्पर्श, याद आते ही ऑंखें भर आती हैं, वह प्रेम का महासागर हैं. कितना अद्भुत है परमात्मा जो एक मानव देह का आश्रय लेकर प्रकट होता रहा है. कितने भाग्यशाली हैं वे जो उनका प्रेम पा सके हैं. उसका मन कृतज्ञता के अश्रुओं से सराबोर है. यही हाल तब हुआ था जब वह गोहाटी से वापस आई थी. सुबह से सिवाय उनको याद करने व अश्रु बहाने के और कुछ भी नहीं किया है. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है, उसकी विवाह की वर्षगांठ है. उसके लिए कुछ लिखने का भाव ही नहीं जग रहा, वह खुश रहे यही भाव उठ रहा है. मन किसी भी तरह के पूर्वाग्रह या द्वेष से न ग्रसित हो, सद्गुरु की पावन स्मृति बनाये रखे, बुद्धि निर्मल रहे यही प्रार्थना है ! गुरूजी कहते हैं शब्दों को अर्थ मानव प्रदान करते हैं. शुभ-अशुभ, हानि-लाभ से परे जो शुद्ध तत्व है उसी में उन्हें विश्राम पाना है. उसके भीतर एक गूँज दिन-रात गूँजती है, इस समय कितनी स्पष्ट सुनाई दे रही है, उसे बिंदी लगाने को कहा उन्होंने पर उसने उनका कहना अभी तक नहीं माना है. उसके पास बिंदी है ही नहीं. सम्भवतः जून ने चन्दन की लकड़ी व घिसने का पत्थर कहीं छिपा दिए हैं या फेंक ही दिए हैं. उन पर उसकी बात का कोई असर नहीं होता पता नहीं किस मिट्टी का उनका दिल है जो तिलक के लिए पिघलता ही नहीं. शायद अंत में पिघले अथवा तब भी नहीं. उसे एक कविता सखी के लिए लिखनी है और एक होली पर हिंदयुग्म के लिए तथा एक हिंदी कविता के लिए. एक लेख लिखना है जो बच्चों के सही पालन-पोषण पर है ताकि भविष्य में वे अच्छे नागरिक बन सकें. गुरूजी के लिए भी एक और किताब लिखनी है, नई कविताएँ होंगी उसमें. उनके जीवन व बचपन पर एक कहानी भी लिखनी है. कितना अनोखा व्यक्त्तित्व है उनका, बचपन से ही भक्तिभाव में डूबे हुए.. सदा मुस्कुराते हैं.. लाखों लोग उनके दीवाने हैं और सभी को वे अपने लगते हैं. उसे भी उनके अपरिमित स्नेह में भीगने का डूबने का अवसर मिला है. तन, मन, प्राण सभी भीगे हैं उस प्यार के रंग में..अब वे किसी नये शहर में अपना जादू बिखेर रहे होंगे. पिताजी बाहर बगीचे में पानी डाल रहे हैं, उन्होंने यह काम बखूबी सम्भाल लिया है, माँ रोज की तरह कुर्सी पर बैठी हैं, आज वे ठीक हैं.



Friday, May 13, 2016

कली और फूल


भीतर परमात्मा पल रहा है, जिसके अंतर में एक बार भी परमात्मा के लिए प्रेम जगा है मानो उसने उसे धारण कर लिया. अब जब तक परमात्मा बाहर प्रकट नहीं हो सकेगा वह चैन से नहीं बैठ सकता. दुःख इसलिए नहीं है कि कोई परमात्मा से दूर है, वरन् इसलिए कि वह भीतर ही है और वह उसे खिलने नहीं दे पा रहे. कली जो फूल बनना चाहती है पर बन नहीं पाती, कितनी पीड़ा झेलती होगी. वे भी जो अहंकार, मान, मोह, लोभ, और कामनाओं द्वारा दंश खाते हैं, इसलिए कि आनन्द, शांति, प्रेम और सुख जो भीतर ही है पर ढक गया है. लेकिन एक गर्भिणी स्त्री जिस तरह अपने बच्चे की रक्षा करती है वैसे ही उन्हें अपने भीतर उस ज्योति की रक्षा करनी है. एक न एक दिन उसे जन्म देना ही है. उनकी चाल-ढाल, रहन-सहन, खान-पान ऐसा होना चाहिए मानो एक कोमल, निष्पाप शिशु उनके साथ-साथ जगता सोता है. उनकी भाषा उनके विचार ऐसे हों कि उसे चोट न पहुंचे क्योंकि उसका निवास तो मन में है. भीतर जो कभी-कभी असीम शांति का अनुभव होता है वह उसी की कृपा है और वह परमात्मा उन्हें चुपचाप देखा करता है. उनके एक-एक पल की खबर रखता है. वह स्वयं बाहर आना चाहता है, पर उनकी तैयारी ही नहीं है. उसका तेज सह पाने की तैयारी तो होनी ही चाहिए. वह भीतर से पुकार लगाता है, कभी वे सुनते हैं कभी दुनिया के शोरगुल में वह आवाज छुप जाती है.  

जून आजकल कुछ चिंतन में लगे हैं. क्रोध उनके स्वभाव में था, पर अब वह इससे मुक्त होना चाहते हैं. वह अपने मन के विचारों को संयित करना चाहते हैं. वह ध्यान करना सीख रहे हैं. अंततः यही एक मार्ग है. हर संवेदनशील व्यक्ति को एक न एक दिन खुद को पहचानने की यात्रा शुरू करनी होगी. सद्गुरु उन्हें भीतर जाने को कहते हैं. भीतर जाकर ही ज्ञान होता है कि बाहर कुछ भी पकड़ने को नहीं है. दूसरे से सुख मिल सकता है ऐसी कामना ही व्यर्थ है, दूसरे से न कभी कुछ मिला है न मिलेगा. यह जानना ही भीतर के खजाने से परिचय करा देता है. प्रेम ही एकमात्र दौलत है जो उनके पास है. उसे जितना बांटें वह बढ़ता ही जाता है. यह संसार जो पहले कारागार लगता था अब वह सुंदर आश्रय स्थल बन जाता है.

आज उसने सुंदर वचन सुने, तन मिट्टी से बना है, मन ज्योति से बना है. मन को भरना इस संसार से सम्भव नहीं हो सकता. वह विराट चाहता है. अनंत ही उसकी प्यास बुझा सकता है. मन जब मूलरूप को पहचान लेता है, घर लौट आता है तो उसका आचरण, उसका बाहरी दुनिया से सम्पर्क का तौर-तरीका ही बदल जाता है. प्रेम, शांति और अपनापन वह परमात्मा से पाता है, सो बाहर लुटाता है, जितना वह लुटाता है उतना-उतना परमात्मा इसे भरता ही जाता है. स्वयं की पहचान उसे सभी मानवों से जोड़ती है सभी जैसे उसी के भाग हैं, कोई पृथक नहीं, सभी का भला ही उसकी एकमात्र चाह रह जाती है. उसके जीवन में मानो फूल ही फूल खिल जाते हैं !

सद्गुरु कहते हैं, कीचड़ में कमल की सम्भावना है, पैर रहें जमीन पर सिर रहे आकाश में तो उनके भीतर एक सुंदर कमल खिलता है. उन्होंने यदि सद्गुरु के ज्ञान के बीज को अपने हृदय में धारण किया, सींचा और पलना की तो भीतर एक कमल खिलता है ! जागना उनके हाथ में है, प्रेम उनके भीतर है अगर अपनी पीड़ा से अभी तक घबरा नहीं गये तो बात और है लेकिन यदि भीतर का खालीपन खलने लगा है तो खिलने दें कमल को !


पुराने संस्कारों से छुटकारा पाना कितना कठिन होता है, लेकिन भीतर प्रेम जगाना जरा भी कठिन नहीं, प्रेम की बाढ़ भीतर आ जाये तो सारे विकार बह जाते हैं. इस दुनिया में प्रेम की भाषा पढने वाले कोई बिरले ही होते हैं. सच्चा प्रेम हो, जैसे सद्गुरु का.. उसे तो हर कोई पढ़ लेता है. वह तो प्रेम ही हो गये हैं और वे अपने छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति में खोये रहकर थोडा बहुत प्रेम जो भीतर पाते हैं उसे भी बांटने से डरते हैं. वे प्रेम भी करते हैं तो पात्र देखकर, छानबीन करके. वह तो प्रेम नहीं हुआ सौदा हो गया. लेकिन.. उन्हें अपनी आजादी तो कायम रखनी होगी. यह बात दिखाती है कि अभी अहंकार बचा हुआ है. 

Wednesday, May 11, 2016

मेले में स्टाल


कल मृणाल ज्योति जाना है. वहाँ एग्जीक्यूटिव मीटिंग है. नये वर्ष से उसने वहाँ नियमित जाना आरम्भ किया है. पूरी जानकारी लेनी है यदि उनके लिए कोई सार्थक काम करना है. एक सखी भी उसके साथ जाने वाली है. पड़ोसिन सखी ने बास्केटबाल का नेट भिजवाया है, शायद वहाँ बच्चों के काम आ सके. जून को उसने मिठाई लाने को कहा है, क्लब की सेक्रेटरी को गाड़ी के लिए. एक छोटे से कार्य के लिए कितने लोगों का सहयोग चाहिए होता है. यह संसार एक संयुक्त इकाई की तरह कार्य करता है. यह माया नहीं है, क्षण भंगुर अवश्य है. इसका उपयोग अपने विकास के लिए करना ही उनका उद्देश्य होना चाहिए. वे इसमें फंसे नहीं, इससे कुछ पाने की आशा भी न करें. लोभ मिटाना है, मोह, मान, क्रोध और स्वार्थ के फंदों को काटना है. तभी वे अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकेंगे. यह जगत एक विद्यालय है, यहाँ उन्हें अपनी शक्तियों का विकास करना है. यहाँ पर एक चौराहा उन्हें हर कदम पर मिलता है, वे चाहें तो नीचे गिरें, चाहें तो ऊपर जाएँ, चाहें तो दाएँ या बाएँ जाएँ. इस दुनिया में वे क्यों आये हैं यह स्पष्ट हो जाये तो वे उस पथ पर चल सकते हैं जो उन्हें लक्ष्य की ओर ले जाये. मानव के भीतर अपार सम्भावनाएं हैं, वह देवता भी हो सकता है और यदि सोया रहे तो पशु भी हो सकता है. उसे सद्गुरु का ज्ञान मिला है, उसका उपयोग करते हुए अपने भीतर को शुद्धतम करते जाना है. शुद्ध मन ही खाली मन है, वहीँ फिर ईश्वर अपनी शक्तियों को भरने का काम शुरू करता है !
आज सुबह आचार्य रामदेव जी का ओजस्वी वक्तृत्व सुना, भीतर जोश भर गया है. शब्दों में ताकत होती है. तेजस्वी विचार उन्हें तेज से भर देते हैं. भीतर जो शक्ति ध्यान से जगी है, उसका उपयोग करने का अब वक्त आ गया है. व्यक्तिगत साधना से साधक पहले आत्मा फिर परमात्मा को पहचानता है. इस जगत की वास्तविकता का जब ज्ञान होता है तो पता चलता है यह सारा जगत एक ही सत्ता का विस्तार है. हरेक के भीतर उसी की ज्योति है, उसी का प्रकाश है. वे उससे पृथक नहीं हैं, वे किसी से भी पृथक नहीं हैं, एक ही सत्ता भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई दे रही है. वही सत्ता उसकी छात्रा के रूप में अपनी अज्ञता को दिखा रही है, वही सत्ता रामदेव जी के रूप में अपनी विद्वता दिखा रही है ! और वही सत्ता वह है ! सद्गुरु के रूप में वही सत्ता अपने पूरे ऐश्वर्य के साथ प्रकट हुई है. इतना ज्ञान जिसे हो जाये उसे न मृत्यु का डर रहता है न अपमान का, न मान की चिंता रहती है न अन्य कोई लोभ ! ऐसा व्यक्ति तो जीवन मुक्त हो जाता है. उन सभी के भीतर इसकी सम्भावना है, वे सभी बुद्ध हो सकते हैं, उन सभी के भीतर अकूत शक्ति है पर उन्हें इसका पता ही नहीं है. एक असीम खजाना उनके भीतर है पर वे भिखारी की तरह व्यवहार करते हैं. वे चाहें तो सारे ब्रह्मांड को अपने इशारे पर चला सकते हैं, जब वे उस सत्ता के साथ स्वयं को जोड़ लेते हैं. जब उसके हाथों में स्वयं को सौंप देते हैं, तब वह उनके द्वारा काम लेने लगता है. वे अपने भीतर की शक्तियों को सुलाए रखते हैं, शेर के वंशज होकर गीदड़ की भांति व्यवहार करते हैं, अमृत पुत्र हैं पर मरने से डरते हैं, जब बाबा जैसे लोग जगाते हैं तब उन्हें चेत होता है !
अगले हफ्ते fete है, उन्हें भी एक स्टाल लगाना है. एक मेज पर किताबें, कैसेट्स, सीडी और दूसरे पर खाने का सामान. अभी तक कुछ तैयारी नहीं की है, समय आने पर अर्थात दो-तीन दिन पहले ही शुरू कर देनी होगी.