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Thursday, June 4, 2020

सोहराब मोदी की फिल्म


अभी-अभी टीवी ओर एक विशाल सभा देखी और भाषण सुना. देश का मिजाज बदल रहा है, जनता बदल रही है. उसे भरोसा है कि उनका नेता उन्हें सही मार्ग पर पर ले जा रहा है. आने वाले चुनाव में बीजेपी पुनः जीतकर आएगी, मोदी जी का आत्मविश्वास यह बता रहा है. 'सबका साथ, सबका विकास' का उनका मन्त्र देश को नई ऊँचाइयों की ओर ले जायेगा. उसने तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी उस डायरी में कुछ अगले पन्ने खोले. 

कालेज जाने के लिए उसे बस का इंतजार करना होता था, जो कभी -कभी आती ही नहीं थी, इंतजार तब बोझिल लगने लगता था, उस समय यह राज नहीं पता था कि वर्तमान के क्षण में कैसे जिया जाता है. खाली खड़े-खड़े मन कभी अतीत और कभी भविष्य के चक्कर काटता और बेवजह ही थक जाता. दीदी उन दिनों घर के पास ही रहती थीं, कभी माँ और कभी वह रात्रि को उनके घर ही रह जाते, जीजाजी तब विदेश में थे. उस दिन कोहरा घना था, एक कुत्ता ज़मीन पर पड़ा अजीब सी आवाजें निकाल रहा था. एक बुढ़िया भी अक्सर उसे इस रास्ते पर मिलती थी पर उस दिन नहीं थी, शायद ठंड के कारण. कालेज से लौटते समय बस में बहुत भीड़ थी. एक महाशय संसार की झूठी, फरेब से भरी बातों और लोगों पर ठंडी साँस भर रहे थे. लोगों की हृदय हीनता और अनुसाशन हीनता पर भी पर स्वयं जनाब मूंगफली खा खाकर छिलके वहीं बस में ही फेंकते जा रहे थे. सड़क पर करते समय वह एक निजी बस से टकराते- टकराते बची. 

रात्रि का समय, पर नीरवता नहीं, माँ रेडियो पर नाटक सुन रही थीं जिसकी आवाजें उसके कमरे तक आ रही थीं. दोपहर को चाची जी आयी थीं उनके घर, उसे हँसी आती थी उनके बोलने के अंदाज पर, अब नहीं आती. जो जैसा है वैसा ही स्वीकारने की कला जो तब नहीं सीखी थी. गोर्की की एक कहानी उसने उस दिन पढ़ी थी, जिसमें ‘गरीब लोग’ का जिक्र जिस तरह हुआ है, उससे भी हँसी आ गयी, वह उसे खत भेजता है,  वह उसे भेजती है. वाह ! दोस्तोव्यस्की पर सारिका का विशेषांक पढ़कर कोफ़्त हुई थी उसे. व्हाइट नाइट्स का कितना असुंदर अनुवाद किया है, मात्र शब्दानुवाद.  मूल पढ़कर तो वह पागल ही हो गयी थी पर सारिका में पढ़ा तो उसका सौवां हिस्सा भी मजा नहीं आया. 

रविवार को सोहराब मोदी की मशहूर फिल्म 'पुकार' देखी सबके साथ.  इंसाफ प्रेम पर कुर्बान नहीं हो सकता. उसको ठुकरा सकता है. इंसाफ इंसाफ है, वह आँखें मींच कर चलता है, वह चेहरे नहीं पहचानता, यह तब की बात थी, गुजरे वक्त की, क्या आज भी ऐसा है ? आज तो पैसे के बल पर इंसाफ को खरीदा-बेचा जा सकता है, जाता है. 

जब आदमी अकेला अनुभव करता है, वह सृजन कर सकता है. जब उसका एकांत भंग कर दिया जाता है, तब वह सृजन नहीं कर सकता, क्योंकि अब वह प्रेम का अनुभव नहीं करता. सभी सृजन प्रेम पर आधारित हैं. - लू शुन, उसे इस लेखक के बारे में आज भी कुछ नहीं पता, उसका यह विचार कहीं पढ़ा तो लिख लिया। 

तीन दशकों से भी अधिक का सफर...  उनके विवाह की सालगिरह है. जून शहर से बाहर गए हैं. आज दोपहर एक अनोखे अतिथि को भोजन खिलाया. ज्ञान और नीति, दोनों पर एक कहानी लिखी जा सकती है. एक बिहार का है दूसरी असम की. दोनों की पहचान फेसबुक पर हुई और दोनों के भीतर आध्यात्मिक, सेवा और समर्पण की भावना प्रबल है. नायक पेड़ों को भी नाम से बुलाता है और जीवन में एक उच्च लक्ष्य को लेकर चल रहा है. नायिका उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखती है, उसके लक्ष्य में पूरे मन से सहयोग कर रही है. अपने परिश्रम से कमाई धन राशि का एक विशाल भाग वह उसके ज्ञान मन्दिर में दान करना चाहती है. अपने परिवार व समाज का आक्षेप सहकर भी वह यह कार्य करना चाहती है. ऐसे लोग ही समाज को दिशा देने वाले होते हैं. 





Monday, March 10, 2014

असम स्टाइल का घर


सच्ची ख़ुशी का राज है सृजन, कल शाम उसने इस वर्ष की अपनी पहली कविता लिखी..और लग रहा है असीम सम्भावनाओं के द्वार खुल गये हैं, आज प्यार की सच्ची परिभाषा पढ़ी जहाँ कोई प्रतिदान चाहता है वहाँ व्यापार होता है और जब किसी का मन अपनी ख़ुशी के लिए किसी अन्य पर निर्भर करता है तो वह आजाद नहीं है, वह प्रेम नहीं कर सकता. यह खुबसूरत दुनिया और इसमें बसने वाली हर शै से हमें प्यार तो करना है पर उन पर निर्भर नहीं होना है. आत्मनिर्भरता ही निडरता को जन्म देती है, जब हम किसी पर निर्भर नहीं रहेंगे तो भयभीत होने की भी जरूरत नहीं, एक नाजुक बेसहारा, कमजोर आश्रित होकर जीने से कहीं बेहतर है मजबूत आत्मशक्ति के साथ जीना, क्योंकि वह शक्ति कहीं बाहर से मिलने वाली नहीं है, हमारे अंदर ही मौजूद है. जगत में सच का सामना करते हुए निर्भयता पूर्वक अपनी बात कह देने का आत्मविश्वास लिए जीना ही सही मायनों में आजाद होकर जीना कहा जायेगा. आज सुबह हिंदी कक्षा में ‘वियोगी हरि’ का एक निबंध पढ़ा, ‘विश्व मन्दिर’ फिर IGNOU में एक अफ्रीकन लेखक का साक्षात्कार सुना/देखा. लेखक अपने समाज की विसंगतियों, विषमताओं, कलह तथा अराजकता के प्रति सचेत होता है, लोगों का ध्यान इनकी ओर दिलाना तथा उनको दूर करने के उपाय सुझाना भी उसीका काम होता है. अपने परिवेश तथा समाज, राष्ट्र में चल रही गतिविधियों के प्रति जागरूक होता है और अनुभव करने की उसकी शक्ति तीव्र होती है. वह बदलाव को भी भांपता है और ठहराव को भी. कवि बनने का उसका स्वप्न भी एक दिन पूर्ण होगा !

कल रात भीषण वर्षा हुई, आंधी और तूफान के साथ, एक बार तो बिजली इतनी जोर से कड़की की उनकी नींद टूट गयी, लगा जैसे पास ही में कहीं बिजली गिरी हो. उसके बाद जो नींद आई, एक स्वप्न देखा जिसमें उसे बिजली का करेंट लग जाता है. सुबह आधा घंटा देर से आँख खुली. कल शाम एक मित्र के यहाँ गये, वे लोग जैसे उनका इंतजार ही कर रहे थे, चेहरे बदल जाते हैं लेकिन कोई न कोई ऐसा परिचित परिवार सदा रहा है जहाँ उनका दिल से स्वागत होता है. वहाँ से हँसते-हँसाते लौटे तो रास्ते में ही मूसलाधार वर्षा शुरू हो गयी, एक भीगते हुए परिचित को लिफ्ट भी दी. समाचारों में उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में आये तूफान के बारे में सुनकर प्रकृति की भीषणता और शक्ति का अहसास होता है, प्राकृतिक आपदाओं के सामने मानव विवश है. यहीं आकर उसे ईश्वर की याद आती है, इस विशाल ब्रह्मांड में अपनी तुच्छ स्थिति का बोध होता है. किन्तु मानव ने भी प्रकृति के आगे हार न मानने की कसम खायी है, उन्हीं तटवर्ती इलाकों में जहां तूफान आते हैं, लोग फिर भी बसेंगे. कल दिन भर लिखने-पढने में व्यस्त रही, अरुंधती राय की किताब रोचक है, आराम से पढ़ रही है, उसका बचपन पढ़ते-पढ़ते अपना भी याद आने लगता है.
   
पिछले दो दिनों में कितना कुछ घट गया, नन्हे को वे परसों दिगबोई ले गये. लंच उन्होंने दिगबोई के Blw No २६ में किया. असम स्टाइल का खूबसूरत लकड़ी का दुमंजिला घर, खुले-खुले कमरे, ड्राइंग रूम से आगे काफी खुला बरामदा ऊपर, बेडरूम से थोड़ा नीचे उतर कर बाथरूम, सामने सुंदर लॉन और कई वृक्ष. ऊँचाई पर स्थित इस बंगले में घुमावदार मार्ग से आना पड़ता है. दिगबोई वाकई सुंदर जगह है. डीपीएस स्कूल भी काफी अच्छा लगा, बगीचा है, सुन्दर फूल-पौधे हैं, कक्षाओं में रंगीन फर्नीचर है, डेस्क ऐसे हैं जिसके अंदर बच्चे अपना बैग रख सकते हैं. नन्हे का टेस्ट अच्छा हो गया, वह खुश था पर थोड़ा परेशान भी. कल वे सुबह-सवेरे ही दिगबोई चले गये, दोपहर को लौटे, नन्हे का दाखिला भी हो गया. कल रात को चोर फिर आए थे, गाड़ी की बैटरी चोरी करने, पर बोनट में चेन बंधी होने के कारण काट नहीं पाए. जून बेहद परेशान हैं, नन्हा अलग परेशान है कि उसे सेंट्रल स्कूल छोड़कर नहीं जाना है, उसे समझाना आसान कार्य नहीं है. उसे रोज इतना सफर करके पढ़ने जाना होगा, वह पता नहीं किस बात घबरा रहा है. बच्चे खुलकर अपने मन की बात बता भी नहीं पाते, शायद सभी चीजों का मिलाजुला असर हो. उसका मेडिकल checkup भी आज होना है और फोटो भी खिंचानी है. इस वक्त जून उसे लेकर अस्पताल गये हैं.